छ Sanskrit Stanzas with Hindi Translation Translated by Munilal ` . श्रीरामस्य निगृद्व॒तत्तमखिल प्राह प्रियाय भवः ॥ व्या अध्यात्मरामायण हिन्दी-अनुवादसहित आलोब्याखिल्वेदराशिमसकृबत्तार्क॑ ब्रह्म त- रामो विष्णुरहस्यमूर्तिरिति यो विज्ञाय भूतेश्वरः । उदूधत्याखिठसारसडग्रहमिदं सल्लेपतः प्रस्फुटम्‌ ok अनुवादक सुनिलाळ मूल्ये | गीताप्रेस, गोरखपुर | साधारण जिल्द १॥।) बढ़िया जिल्द २) REI हावाका षी ~ 00८, क ह के जल म, “चुन amet के ० क. 55 टह मी 1-2 र अरा f र प्रपद्ये ॥ तं भवभयं शोका देवास्तमेच शरणं सततं प्रप जितकालचक e जि योगिवृन्रे ~ जितडुः्खशो र यत्पादपङ्कजपरागसुरागयो यन्ञामकोतनपरा ( अ० रा० बाल० ६1७५) 122 £ 7. 1१4 2.2 क भ ब AS स कप f श्रीराभ | कोसलपाल कृपालु, आप ही हैं भेरकवर । प्रभु-इच्छा ही पूर्ण सतत करते सब सुर-नर । इससे भी जो बना आपकी ही लीला है। अहो ! आपकी केलि परमविस्मयशीला है !! अब इसको दीजे यही, दानी दशरथलाल ! तुम्हें छोड चाहे न कुछ-- पद्पायक मुनिलाल 1 रक 1 भक्ति ही सार है । — sere भक्तवत्सल जगन्नाथ श्रीरामके प्रसन्न होनेपर संसारम क्या दुर्लभ है । देखो, उनकी कृपासे नीच जातिमें उत्पन्न हुईं शब्ररीने भी मोक्ष-पद प्राप्त कर लिया । फिर श्रीरामका ध्यान करनेवाले पुण्यजन्मा ब्राह्मणादि यदि मुक्त हो जाये तो इसमें क्या आश्चर्य है £ निःसन्देह, भगवान्‌ रामको भक्ति ही मुक्ति है । अरे लोगो ! भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रकी भक्ति ही मोक्ष देनेवाली है । अतः उनके कामपेशुरूप चरणयुगलोंकी अति उत्साहपूर्वक सेवा करो । हे बुद्धिमान लोगो | इन विविध विज्ञान-वाताओं और मन्त्रवि्तारको अलग रखकर तुरन्त ही श्रीशंकरके हृदयघाममें शोभा पाने- चाले श्यामहारीर भगवान्‌ रामका भजन करो । ( अरण्य० १०। ४२-४४ ) सूकं करोति वाचाछं पदु' लङ्घयते गिरिम्‌। यत्कृपा तमहं चन्दे परमानन्दमाधवम्‌ ॥ भगवान्‌की छीढाका रहस्य कोन जान सकता है ? बड़े-बड़े ऋषि, सुनि, महात्मा और सिद्धगण आजन्म उसीका मनन करते रहनेपर भी उसका पार नहीं पा सके । किन्तु वह इतनी दुर्विज्ञेय और गूढ़ होनेपर भी कितनी मधुर, मनमोहिनी और कल्याणमयी है । रसिकजन संसारके समी भोगोंको छोड़कर अपनी आयुको एकमात्र उसीके अनुशीलनमे लगाकर अपनेको अत्यन्त बड़भागी समझते हैं । वे उसकी माधुरीका आखादन करते-करते कमी नद्ध अपाते । अन्य लोकि एवं पारळौकिक भोगोंका पर्यवसान उनसे विरक्त हो जाने- अघा आानेगं होता हैं, किन्तु इस लोकोत्तर रससे इसके रसिकका चित्त कभी नहों ऊबता । जिसका चित्त इससे ऊत्रने ढगे, समझना चाहिये उसने इसका आस्वादन ही नहीं किया । इसीलिये रसिकचक्रचूडामणि श्रीमदूगोस्वामी तुळसीदासजी कहते हॅ--- | रामचरित जे सुनत अघाही । रस विसेस जाना तिन नाहो ॥ धन्य है, चे गहाभाग जिन्हें उसके यदेष्ट आस्वादनका सौभाग्य प्राप्त हुआ है ! "___ भगवानके उसी दुर्छम गृढ़ रहस्यको, जिसका यथावत समझना बड़े-बड़े मेधावी आचार्य और योग- निष्ट यतियोंके झिये भी अत्यन्त कठिन हैं और जिसे विभिन्न रूपसे ग्रहण करनेके कारण ही इस अनादि संसारमें अनादि काळसे अनन्त सम्प्रदायों और मतोंकी प्रचत्ति होती आयी है, मुझ-जैसे मन्दमतिको ठौक-ठीक समझ टेना बीसे सम्भव है ? उसे समझनेके योग्य मेरे पास विद्या, बुद्धि, विवेक अथवा श्रद्धा आदि कोई भी तो सामग्री नही है | इस ओर मेरा प्रदत्त होना भी बड़ी हँसीकी वात है और प्रदत्त होनेके अनन्तर जितनी भी सेत्रा मुत्रसे बनी हे उसपर भा मुझे तो आश्चर्य है । में इस वातको स्तयं ही अनुभव करता हूँ कि इस अनपिक्रार चेष्टाम प्रवृत्त होकर में विद्या और त्रिद्वानोंका अपराध कर रहा हूँ | किन्तु, एक विचार है जो मुझे इन संकोच और आश्चर्य दोनोंहीसे मुक्त कर देता है । हम पद-पदपर देखते हैं कि अपनी इच्छा न द्वोनेपर भी हमें बछात्कारसे बहुत-से ऐसे कार्योंमें छग जाना पड़ता है जिनमें ' ग्रवृत्त होनेकी पळे कर्मी आशा भी नहीं थी | इसका कारण यही है कि हमारी सारी प्रवृत्तियोंका नियामक कोई और हाँ हैं, जो देद्ामिमानके पेग छिपा हुआ हमारे अन्तःकरणोंमें विराजमान है । हमारी सारी प्रवृत्तियरो उस हृदयस्ित देवके ही इशारेपर नाचती रहती हैं । वस्तुतः तो हमारी प्रवृत्तिया, हमारी चित्त- वृत्तियॉ' ऐसा कहना और गानना भी अज्ञानव्रशा परिच्छिन अहंकारको स्वीकार करनेके ही कारण है । विज्ञान- विभावसुका विमल प्रकाश होनेपर अज्ञानान्यकारके नष्ट होते ही जव देहामिमानरूप उदक न जाने कहाँ छुक जाता है, तब कर्ता कग और करणादिका कोई भेद नहीं रहता । फिर तो प्रवृत्ति, प्रवर्तक और प्रवर्त्य- सत्र कुळ एकमात्र वद अन्तयीमी ही रहते हैं जिनके यत्वि्षित्‌ कपा-कटाकषसे ही यह सम्पण प्रपञ्च भासित हो -रहा है तथा जिनकी सत्ता पाकर ही यह, सर्वथा असत्‌ होनेपर भी, ध्रुब-सत्य बना हुआ है। अतः हमारा सारा [२] संकोच और आश्चर्य तमीतक है जवतक हम सचे कर्ताको भूलकर तुच्छ देहामिमानके दिरपर सारे वर्ज भोक्तत्वका भार लाद देते हैं और उस देद्दाभिमानको देहाभिमान न समझकर अपना परमाथरवरूप मान वेठते हैं, नहीं तो जो लीळामय बिना किसी प्रयोजनके केवल छीछाके जिये ही इच्छामात्रसे इस अनन्त ब्रह्माण्ड- की सृष्टि करते हैं, जिनकी मायासे मोहित होकर हमारी इस हाइ-मांसके पन्नरमें आत्मबुद्धि होती है और फिर इसीकी आसक्तिमें फैसकर खी-धन-धरती आदि महाश्ृणित और असार चस्तुओंगं रमणीय-सुद्धि होनी है तथा जिनके छेशमात्र कृपाकणसे यह अनन्त ब्रह्माण्ड बाळकी भीत हो जाता है, उन मद्दामद्विम सर्वशक्ति- मान्‌ सर्वेश्वरके लिये क्या दुष्कर है ! उनकी जैसी इच्छा होती हैं उसी ओर सत्रको प्रदत्त होना पढ़ता है और उनकी इच्छाके अनुसार ही उन्हें उसमें सफलता अथवा असकळता प्राप्त होती रहती है । अस्तु । "तोमार इच्छा पूर्ण हउक करुणामय स्वासी' इस बंग-कहावतके अनुसार प्रशुने जो कार्य सांपा है उसे उन्दका काम समझकर उन्हंके इत्गितके अनुसार करते रहनेमें हा हमारा कल्याण है; और बागवे हम करते भी ऐसा ही हैं, परन्तु ऐसा समझते नहीं । इसीलिये उसकी सफळता-असफलटतामे हर्प-दाकिके शिकार होते हैं । प्रभु हमें ऐसा ही समझते रहनेकी शक्ति प्रदान करें । श्रीमदष्यात्मरामायग कोई नवीन ग्रन्थ नही है, जिसके विषयं कुछ विशेष कहनेकी आवश्यकता हों। यह परम पवित्र गाथा साक्षात्‌ भगवान्‌ शंकरने अपनी प्रेयसी आदिशक्ति श्रीपार्वती जीका सुनायी हे । यह आख्यान ब्रह्माण्डपुराणके उत्तरखण्डके अन्तर्गत माना जाता है । अतः इसके रचयिता मह्दासुनि वेदव्यासजी ही हैं । इसमें परमरसायन रामचरिनका वर्णन करते-करते पद-पदपर प्रसंग उठाकर भक्ति, ज्ञान, उपासना, नीति और सदाचार-सम्बन्धी दिव्य उपदेश दिये गये हैं । विविध विपयोका विवरण रहनेपर भा इसमे प्रधानता अध्यात्मतत्वके विवेचनकी ही है । इसीलिये यह 'अध्यात्म-रामायण' कहदाता हैं । उपदेशभागके सित्रा इसका कथाभाग भी कुछ कम महरवका नही है। भगवान्‌ श्रीराम मूर्तिमान्‌ अध्यात्मतत्त है, उनके परमपावन चरित्रकी महिमाका कहाँतक वर्णन किया जाय ? आजकल जिस थीरामचरितमानसमें अवगाहन कर करोड नर-नारी अपनेको कृतकृत्य मान रहे हैं उसके कथानकका आधार भी अविकांशमें यही ग्रन्थ है। श्रीराम- चरितमानसकी कथा जितनी अध्यात्मरामायगसे मिळती-जुळती है उतनी ओर विसीसे नहीं मिलती । इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि श्रीगोखामी हुळसीदासजीने भी इसीका प्रामाण्य सवसे अधिक स्वीकार किया हैं | अवतक इस ग्रन्थको कई अनुवाद हो चुके हैं | चार-पाच तो मेरे देखनेमें भा आये हैं । प्रस्तुत अनुवादमें श्रीवेकटेश्वर स्टीमग्रेसद्वारा प्रकाशित स्वगीय पं० वलदेवप्रसादजी मिश्र तथा स्वगीय पं० रामेश्वरजी भटके अनुवादोसे सहायता छी गयी है। इसके लिये उक्त दोनों महानुभावोका मैं हृदयसे कृतज्ञ हुँ । इस म्रन्थरलका अनुवाद करनेका आदेश देकर गीताप्रेसने मुझे इसके अनुशीळनका अमूल्य अवसर दिया है. और पिर उसीने इसका संशोधन कराकर इसे प्रकाशित करनेकी भी कृपा की है, इस उपकारके लिये मैं उसके सद्वाटकांका हृदयसे आभारी हूँ । | अन्तर्मे, जिन छीछामयके छीछाकठाक्षसे प्रेरित होकर यह लौळा हुई है, उनकी यह लीला आदरपूर्वक उन्हींको समर्पित है । इसमें यदि कुछ अच्छा है तो उन्होंके कृपाकटाक्षका प्रसाद है और जो भूल है व्ह मेरी अहंकारजनित 'धृष्टताका फल है । इत्यम्‌ | विनीत- अनुवादक विषय-सूची Ee Td सरग विपय पृष्ठ | सर्ग विषय १-माहात्म्य “कढ “° * रा | ६-भगचान्‌ राम और भरतका मिलन, बालकाण्ड भरतजीका अयोध्यापुरीको छौटना (-रामहृदय = = | ओर श्रीरामचन्द्रजीका अत्रिसुनिके २-भारपीडिता पृथियीका ब्रह्मादि देवताओं- आश्रमपर जाना शा के पास ज्ञाना और भगवानका उनकी अरण्यकाण्ड प्रार्थनासे प्रकट होकर उन्हें घय बघाना ”* ६ | १-विराधन्वध्र = ° ३-मगवानक्रा जन्म और वाल-लीला १२ | २-शरभंगतथा खुतीक्षण आदि सुनीश्वरों- ४-विश्वामित्रजीका आगमन; राम भोर से भेट न न बट लक्ष्मणका उनके साथ जाना और ३-मुनिवर अगस्त्यजीसे भेंट ** ताटकांका बंध करना ४! /” १९८ | ४-पञ्चवटीमें निवास और लक्ष्मणजीको ५-मारीच आर सुबाहुका दमन तथा उपदेश हे = भू अहल्योद्धार ४! ० *“* २१ | ५-शूपंणखाको दण्ड, खर आदि राक्षसों- . ६-धनुभंदठ भोर विवाह २७ | का वधर और शूपणखाका रावणके ७-परशुरामजीसे भेंट "° ३३ पास जाना `" न्न "° अयोध्याकाण्ड ६-रावणका मारीचके पास जाना *** (-भगवान्‌रामकें पासनारदजीका आना “* ४३ | 9 मारीचवध और सीताहरण 7 २-राज्यामिपेककी तयारी तथा चल्िएजी ८-सीताजीके वियोगर्मे अगवान साका र विलाप और जरायुसे भेंट *** ०० र रघुनाथजीका संवाद “* ४९ , ३-राजा दशरथका फेकेयीको घर देना “' ५१ &-कवन्धो द्वार दा ्ि हु प र { १०-शावरीसे सैंड" ००० ° ४-भगवान रामा भातासे विदा होना ~ तथा सीता और छद्ष्मणके सहित . _ _ किाष्कन्याकाण्ड धननामनकी तैयारी करना “* ५८ १-सु्रीयसे भेट 7 र 7 ५-भगवानफा धनगमन ५०० “> ६५ रवालीका वध और भगवानके साथ ६-गंगोततरण तथा भरद्धाञजञ और ३ तारा विराप ओरामचल्दजीका. बाल्मीकिजीस में ~ न समाकल भट 5 " ७ उसे समभाना तथा सुग्रीवका राजपद ७-खुमन्यका प्रत्यागमन, राजा दशरथका घात करना“ ,.. ५०० स्वगंचास तथा भरतजीका ननिहालसे ४-भगवान रामका लक्ष्मणजीसे क्रिया- आना और बसिए्ठजीके आदेशसे थोगका वर्णन करना हक प्रिताक्रा अन्त्येष्टि-संस्कार करना!” ७८ | ५-भगवान्‌ रामका शोक और लक्ष्मणजी- ८-भरतजीका चनको प्रस्थान, मागमें गुह का किष्किन्धापुरीमें जाना "” और भरद्वाजजीसे भेंट तथा चित्रकूट- ६-सीताजीकी खोज, वानरोंका शुहाप्रवेश दर्शन "हे १ “* ८७] औरखयम्प्रभातचरि्र " श्रीहरिः ६२ * १०३ ` RT क्ट १५६ १६५ १७० ` १७५ १८१ ( सर्ग विपय पृष्ठ ७-वानरोंका प्रायोपवेशन ओर सम्पाति- से भेंट + ‘° न १८८ ८-सम्पातिकी आत्मकथा "” * १६३ ६-समुद्रोलडुनकी मन््णा `" "" १६७ सुन्दरकाण्ड -हचुमानजीका समुद्रोह्ङ्कच और लंका- तरवे ss क्क २०३ २-हनुमानजीका वाटिकामे जावा तथा रावणका सीताजीको भय दिखलाना "* २०८ ३-जानक्जीजीसे सेंट, घाटिका-विध्यंस २) सर्गं ६-मेधनाद्‌-वश्च १०-रावणका यश-विध्वंस तथा उसका सन्दोद्रीको समकाना '** ११-राम-राचण-संग्राम ओर रावणका चत्र *** १२- विभीपणका राञ्यास्िपेक और सीताजीकी अच्चि-परीक्षा " “क १३-देवताओंक्रा भगवान, रामकी स्तुति करना, सीताजीसहित अज्िदेवका प्रकट होना, अयोध्याके लिये प्रस्थान *** १४-अयोध्या-याज्ञा, भरद्वाज सुनिका चिपय ५०७ क्क ७७८२ शि * कमाड और ब्ह्मपाश-बन्घन "° २१३ आतिथ्य तथा भरत-मिलाप a ४-इचुमान, और रावणका संवाद तथा १५-ध्रीराम-राज्याभ्िपेक "" ० __ लड्ढभादृहन (१ ४” २२० | १६-वानरोंकी विदा तथा प्न्थप्रशंसा ण-हचुमानजीका सीताजीसे विदा होना उत्तरकाण्ड आर शालन उनका अन्द २२६ | १ भगवान्‌ रामके यहाँ अगस्त्यादि काण्ड `| मुलोश्वरोका आना और रावणादि है े राक्षक्तोका पूर्वचरित्र सुनाना “न १-चानर-लेनाका प्रस्थान "° २३३ २-रावणद्वारा विभीपणका तिरस्कार" २३७ २-राक्षसतोके राज्यस्थापनका विवरण ** ३-विभीषणकी शरणागति, समुद्रका त्रास ४-बाली और सुग्रीवका पूवचरित्र तथा तथा सेतु-बन्धका आरम्भ ` -- २४१ रावणन्सनत्कुार-संचाद्‌ `` "° ४-सधुद्र-तरण, छड्ढा-निरीक्षण तथा ४-रामराज्यका वणन तथा सीता-वनवाख राचण-शुक-संचाद्‌ "ण “° २४८ | प-रामगीता र्ण ४ ५-शुककापूर्व-चरित्र, माल्यवानका ६-लव॒ण-बध, भगवान्‌ रामके यप्रमें कुश- रावणको खमभाना तथा घानर- लचके सहित महपि बाह्मीकिका राक्षस-संत्राम ``" भक *** २५३ पधारना भोर कुशको परमार्थोपदेश ६-लक्ष्मण-मूच्छां, राम-रावण-संग्राम, करना र ° हचुमानजीका ओषधि लेने जाना और । ७-भगवान्‌ रामके यक्षमें कुश और लवका रावण-कारनेमि-संचाद्‌ `` २५६ यान, सीताजीका पृथियी-ग्रवेश, ७-कालनेमिका कपट, इज्ुमानजीद्वारा रामचन्द्रजीका माताको उपदेश नल डसका बच, लक्ष्मणजीका सचेत होना -काठका आगमन, लक्ष्मणजीका और रावणका कुस्भकणको जयाना "” २६५ | परित्याग और उनका खर्गगमन *** <-कुम्भकर्म-्घघ `°" “भभ ° २७० | ६-महाप्रयाण *** =e चित्र-सूची -शमचतुए र्‌ - ३अ्रीसीताराम ( , ) भ्र ४१ ७ आया सोता 27 -समजरालु (सादा)... ३०३ | ८ डा जी क्षता जब ता (खुनहरी) ३६० ३६५” ३७२ ३७८ १५१ २०३ २३३ ३२६ & श्रौसीतारामाभ्यां नमः & RS I ad अध्यात्मरासायण हिन्दी-अनुवादसहित मायातीतं माधवमार्थ जगदादिं, मानातीतं मोहविनाशं छुनिवन्धम्‌ । योगिध्येयं योगविधानं परिपूर्ण, बन्दे रामं रखितलोकं रमणीयम्‌ ॥ w 38 अध्यात्मरामायण फाहातत्न्यु — ee रामं विरवम्य वन्दे रामं वन्दे रथूदहमू । रामं विर वन्दे रासं इवासारं भजे ॥ अस्य ग्रागंशुतर्च्यूते रम्यं रामायणामृतम्‌ । ैहणातेवितं वन्दे त॑ शिवं सोमरूविणम्‌ ॥ तब्निदानन्दसन्दाह भाकिगूतिविमूषणम्‌ । पर्णानन्दमहं वन्दे तहुरुं करं स्यम्‌ ॥ अञ्ञानष्यान्तसहर्ली ज्ञानालोकावलातिती | चन्द्रचृडवचश्च्द्रचन्द्रकेयं विराजते ॥ अम्रमेयत्रयातीतनिर्मल्ज्ञानमूर्तये | | जो प्रत्यक्षादि प्रमाणोसे परे, त्रिगुणातीत, मलहीन, : ज्ञानखरूप और मन, वाणी आदिके अविषय हैं उन मनोगिरां विदूराय दक्षिणामूतेये नमः ॥ १॥ हो र्‌ | दक्षिणामूर्ति भगवान्‌ (सदाशिव) को नमस्कार है ॥१॥ तूत उवाच श्रीसूतजी बोले-एक समय योगिराज नारदजी कदाचिन्नारदों योगी पराचुग्रहवाञ्छया | | दूसरोंपर प र ल्यि समख लोकोमें विचरते पर्यटन्सकलाहोकान्सयलोकम्ुपागमत्‌ ॥ २॥ | 5२ कर्म पहुंचे ॥ २॥ वहाँ गतिमान वेदोंसे A | घिरे हुए, अपनी वालसूयके समान प्रभासे समाभवंन- तत्न इषा मूर्तिमद्धि बछन्दों भि। परिवो्ितम्‌ । बालाकेग्रभया सम्यग्भासयन्तं सभागृहम्‌॥ ३॥ मार्कण्डयादिमुनिभिः स्तूयमानं दुहुः । सार्थैगोचरज्ञानं सरखत्या समन्वितम्‌ ॥ ४॥ को पूर्णतया देदीप्यमान करते हुए, मार्कण्डेय आदि मुनिजनोसे धारम्वार स्तुति किये जाते हुए, सम्पूर्ण पदार्थेका ज्ञान रखनेवाले ओर भक्तोंको इच्छित फल देने- वाळे सरस्त्रतीथुक्त जगत्पति ब्रह्माजीको देखकर मुनि- चतुश्च जगन्षाच भक्तानाष्ट उपर । श्रेष्ट नारदजीने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और प्रणम्य दण्डबद्भक्त्या तुष्टाव मुनिपुद्ठवः ॥ ५ ॥ | अक्तिभावसे स्तुति की ॥ ३-५ ॥ मन्तु्टस्त मुनि प्राह खमम्भू्मेप्णवोत्तमम्‌ | तत्र खयम्भू त्रह्माजीने प्रसन्न होकर वेष्णवाग्रणी कि प्रप्ट॒कामस्त्यमसि तहदिष्यामि ते मुने || ६॥ | शैनारदजौसे कहा-“सुने | तुम क्या पूछना चाहते है हो १ मैं तुमसे वह संत्र कहूँगा” ॥ ६ ॥ ब्रह्माजीके है ~ CO इत्याकण्य वचस्तस्य युनिब्रह्माणमत्रवीत्‌ । ये बचन सुनकर नारदजीने उनसे कहा, “हे देवश्रेष्ठ ! त््रत्तः श्रुत मया सत्र पूर्व मेव शुभाशुभम्‌ ॥ ७ ॥ | झुमाशुभ कर्मोका वर्णन तो मैं आपसे पहले ही सुन . 1 1, चुका हूँ । अब मुझे एक ही बात और सुननी है; इंदानीमकमेवास्ति श्रोतत्य सुरसचम। । यदि मुझपर आपकी कृपा है तो गोपनीय होनेपर भी तद्रहस्यमपि त्रहि यदि तेऽलुग्रहो मयि || ८ ॥ | बह सुनाइये ॥ ७-८ | अब घोर कल्युगके आनेपर मा | अध्यात्मरामायण मनष्य पण्यक्रम छोड़ देंगे और सत्सगापणसे विशुग्य में सत्ययार्तापराङः ॥९॥ होकर दराचारम प्रवृत्त हा जायेंग ॥ ? | व दूसरी- दुराचाररताः सर्वे सत्यवातापराड्युखा! | की निन्दामे ततर रहेंगे, दूसरोंके धनकी इच्छा करेंगे परापवादनिरता! परद्रन्याभिलापिंण! | । प्रखीमें चित्त छगावेंगे और परायी हिंसा करेंगे ॥१ | प्राप्त कलियुगे घोरे नराः पृण्यविचजिता। मूढ़ | आत्मबुद्धि करेगे, शात्र आर ई्चरसे परस्रीसक्तमनसः परहिंसापरायणाः ॥१०॥ | वी कि डी हि हा शक और ३ देहात्मदृष्टयो मूढा नास्तिकाः पशुबुद्धयः । वे कामके गुलाम होकर खाके भक्त और गाता-पिनाक मातापितृकृतद्वेषा! ख्रीदेवाः कामकिङ्कराः ॥११॥ ; द्रोही बनेंगे॥ ११ ॥ nl लोमनी ब्र अन्त विम्ना ठोभग्रहग्रस्ता वेदविक्रयजीविनः ओर वेद वेचकर अपनी आजीविक्रा चछानवाूे होंगे, {¢ न वे धनॉपाजनके लिये ही बिधाभ्यास करेन आर घनाजंनाथमभ्यस्तविद्या मदविमोहिताः ॥१२॥ (विद्या तथा त्राद्ाणत्यके) मदमे उनात हो जाय त्यक्तखजातिकमीणः प्रायशः परवश्चकाः। ;॥ १२॥ क्षत्रिय और मेश्यगग भी खधर्मको स्यागने- क्षत्रियाश्व तथा वैश्याः खधर्भत्यायशीलिनः॥१३। गाठे तथा अपने जाति-कर्मॉको छोड़कर आयः दूसरों ठगनेवाले ही होंग || १३ || इसी प्रकार जो गट वहच्छद्राथ्र ये केषिह्ञा्णाचारतत्पराः होंगे वे भी ब्राह्मगोंके आचारमें तत्पर हो जायेंगे खियश्च प्रायशी भ्रष्टा 'भनेवज्ञाननिभया! ॥१४॥ | तथा खियाँ प्रायः भ्र्टाचारिणी और अपने पतिका ण्यो भविष्यः अपमान करनेम निडर होगा ॥ १४ ॥ निस्मन्देह से वशुरद्राहका रण्या भाविष्यान्त न सशयः अपने सास-ससरोंसे दर करेंगी । उन नर-वश्चियोका, एतेषां नष्टुद्धीनां परलोक! कथं भवेत्‌ ॥१५॥ ` परलोक किस प्रकार सुथांगा ?॥| १५. ॥ म चिन्तासे इति चिन्ताहुल चित्त जायते मम सन्ततस्‌। । मेरा चित्त निरन्तर व्याकुळ रहता है । जिस सुगम घृपाये no इनका परलोक सुधर सवता हो बह अ लघूपायेन येनेपां परलोकमतिर्भयेत्‌। | तका परलीका सुधर सकता हो बह आप ० | मुझे वतलाइ्ये, क्योंकि आप सभी. कुछ जानते तड़प य्यपारुयाहि सव वात्ते यतो भवान्‌ ॥१६॥ | है? | १६ ॥ } इतयृपेर्वाक्यमाकर्ण्यं अत्युवाचास्दुजासनः | देवर्षि नारदजीके ये वचन सनकर कमलासन साधु पृष्टं त्वया साधो बक्ष्ये तच्छण साद्रम्‌॥ १७॥ बह्माजी वोडे--“हे साधा ! तुमने बहुत अच्छी बात पुरा ब्रि हे । में उसे वतलाता हैं, तम श्रद्धा पुक्‌ सुरा त्रिपुरहस्तार पावती भक्तवत्सला । सुनो ॥ १७॥ “पूर्वकालमें भक्तत्रत्सछः पाचेती- आरामतस्व जिज्ञासुः पच्छ विनयान्विता ॥१८।| | जीने श्रीराम-तत्तकी जिङ्ञासासे त्रिपुर-बिनाशक मियाये गिरिशस्तस्थे गूढे व्याख्यातवान्स्बयसा | तान शंकरसे विनयपूर्वक प्रश्न किया था || १८॥ तब अपनी प्रियासे श्रीमहादेवजीन जिस गढ़ रहस्य ण्‌ पुराणोत्तममध्यात्मरामायणमिति स्थृतम्‌ ॥१९॥ | चन किया था वह उत्तम पुराण अध्याक्मरामायणके तत्पावेती जगद्धात्री पूजायित्वा दिवानिश््‌। | नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १९॥ अब जगजननी पार्वती- _ आडोचयन्ती स्थानन्दमधा तिष्ठति साम्प्रतम]२०] | जी उसका पूजन कर रात-दिन उसीका मनन करती प्रचरिष्यति तहोंके प्राष्यच्शबशाचदा। । 00१, पश रहती हैं ॥२०॥ जिस समय प्राणियोंके सौभाग्यसे उसका छोकमें प्रचार होगा उस तस्याध्ययनमात्रेण जना यास्यान्ति सद्गातस्‌॥२१॥ समय उसके अध्ययनमात्रसे लोग शभगति प्राप्त करेंगे माहात्म्य `` . य (म ४५ ५९१०७ शय me नर त्य ॥०-याााा 2...“ «५५४५/४८४५/८१/४१४/१/१११८४/५५४९१५८४/४६८४४४७०%६/६/४७/$४४४७४७॥४४४४७४४४५४४४५४४७७४७॥७/४४ही ७ तावद्विजृम्भते पापं बरह्महत्यापुरःसरम्‌। . ॥२१॥ संसारमें अह्म-हृत्यादि पाप . तभीतक याबजगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२२॥ | रंगे जवतक अध्यात्मरामायणका प्राहुमीव नहीं i -. ५ _ होगा ॥ २२॥ कलियुगका महान्‌ उत्साह तभीतक तावरकलिमहोत्साहो निःशङ्कं सम्प्रवत , जज साई! निश्श सभवत | | लिःशंक रहेगा जबतक संसारमें अध्यात्मरामायण- "ताबद्यमभटाः शूराः सश्वरिष्यान्ति निर्भयाः | |तमीतक निर्भय विचरते रहेंगे जबतक जगतमें यावज्ञगति नाध्यात्मरामायणमुदे प्यूति ॥२४।। अध्यात्मरामायण प्रकट नहीं होगी ॥ २४॥ और © मिं र तावत्सर्वाणि राणि वियन्ते परस्परस्‌ ॥२५॥ | पप शाखे पर्पर विवाद तमीतक रहेगा तथा ी -.* व महापुरुपोंको भी भगवान्‌ रामका खरूप तमीतक तावत्स्वरूप रामस्थ दुर्वाथ महतामपि। | दुर्वोध रहेगा जवतक संसारमें अध्यात्मरामायणका यावज्ञगति नाष्यात्मरामायणद्चुदेष्यति ॥२६॥ ` प्रकाश नहीं होगा ॥ २५-२६ | अध्यात्मरामायणसड्डीर्तनश्रवणादिजम्‌ । । “हे निशेष ! मैं अध्यात्मरामायणके कीर्तन और फलं बहु न शक्रोमि कात्स्येन मुनिसत्तम ॥२७॥ | शे दोनेवाळे फलका पूर्णतया वर्णन नहीं कर व क | सकता, तथापि हे अनघ ! मैं तुम्हें उसका थोड़ा-सा तथाप तस्य माहात्म्य वक्ष्य किथित्तवानध! ! माहात्म्य सुनाता हुँ । इसे पूर्वकाठमें मुझसे दिवजीने कहा शृणु चित्तं समाधाय शिवनोक्त पुरा मम ॥२८॥ था; तुम सावधान होकर सुनो--॥२७-२८॥ जो पुरुष Re : अध्यात्मरामायणका एक अथवा आधा इछोक भी मक्ति- : णतः इलोकं इलो का धमेत्र ब र तातससालाल तकल राक | पूर्वक पढ़ता है वह तरक्षण पापमुक्त हों जाता है ॥२९॥ यः पठेद्धक्तिसंयुक्तः स पापान्दुच्यते क्षणात्‌॥२९। जो इस अध्यात्मरामायणको नित्यप्रति अनन्य बुद्धिसे यस्तु प्रत्यहमध्यात्सरामायणमनन्यधीः। | भक्तिपूर्वक यथाशक्ति सुनाता है. वह जीवन्मुक्त ~= A ~ हे॥३०॥ हे सुने ! जो पुरुष आलस्य छोड- यथाशक्ति वदङ्घकत्या स जीवन्मुक्त उच्यते ॥३०॥| है । | छः डे ५" ३०१ कर भक्तिभावसे प्रतिदिन अध्यात्मरामायणका पूजन यो भक्त्याचेयतेऽध्यात्मरामायणमतन्छ्ित। करता हे उसे अश्वमेधयज्चका फळ मिळता है ॥३१॥ दिनेदिनञ्यमेधस्य फलं तस्य भवेन्मुने ॥२१॥ | जो मनुष्य दूसरोसे अनियमपूर्वक अनादरसे भी यच्च्छयापि योउ्ध्यात्मरामायणमनादरात्‌। | अत्यात्मरामायण श्रवण करता है बह भी पातकसे Pe | छूट जाता है ॥ ३२॥ जो कोई अध्यात्मरामायणके अन्यतः शृणुया्म्यः सोऽपि युच्येत पातकात्‌ है निकट जाकर उसे नमस्कार करता है वह समस्त नमस्करोति योऽध्यात्मरामायणमदूरतः। | देवताओंकी पूजाका फछ पाता है--इसमें सन्देह सर्वदेवार्चनफलं स ग्रामोति न संशयः॥३३॥ | नहीं ॥ ३३॥ / हिलित्वा पुस्तकेऽध्यात्मरामायणमशेपतः । “जो पुरुष ण्या स्पू ताह यो दद्याद्रामभक्तेभ्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥३४॥ ठिखकर राम-मक्तोंको देता है. उसे जो पुण्य होता hl थ >> > 1 उसका फळ सुनो ॥३४॥ उसे वह फळ मिलता है अधीते च बेंदेइ शास्रेष व्याकर च । जो वेदोंके पढ़नेसे और शाखोंकी व्याख्या करनेसे यत्फलं दुर्लभ लोके तत्फलं तस्य ई भी संसारे दुरम है | ३५ ॥ जो ने रां एकादशी दिनेऽभ्यात्मरामायणद्चपोपितः । | भक्त एकादशीको उपवास करके समामे साम यो रामभक्तः सदासि व्याकरोति नरोत्तमः ॥३६॥ | रामायणका व्याख्या करता है, हे. वेष्णवश्रेष्ठ ' उस न अध्यात्मरामायण ———— अ soe - तस्य पुण्यफलं क्ष्ये शशु वेष्णवसत्तम । पुण्यका फळ बतळाता हूँ, सुनो । उसे एक-एक अक्षर , मेमें के पुरश्ररणका फल मिळता हैं तग हं भवेत ॥३७॥ | के पढ्ने गायत्रीक छु i अलबर ठ तीरा प ॥३६-३७॥ जो पुरुष रामनत्रमीके दिन निराहार उपासन्त कत्वा श्रीरामनबमीदिने |. | एहकर और फिर रात्रिको जागरण कर अनन्य बुद्धि- रात्री जागरितोऽध्यारमरामायण मनन्यथा। से अध्यात्मरामायणको पढ़ता या सुनता है, अब मैं य पठेच्छणुयाद्वापि तस्य पुण्यं बदाम्यहम्‌ ॥२८॥ | उसका पुण्य वतळाता हुँ ॥३८॥ कुरुक्षेत्रादि सम्पू कुरक्षत्रादिनिखिलपुण्यतीर्थेष्वनेकशः । | पवित्र तीर्थम सर्वग्रस्त सूर्यग्रहणके समय अनेकों वार्‌ आत्मतुल्यं घनं दयंग्रहणे सर्वतोमुखे ॥३९॥ | न्यासजीके समान आग अपने बराबर धन देनसे विधि 2 >> जो पल होता है उसे बही फळ मिलता है; इसमें विप्रेभ्यो व्यासतुल्पेस्यों दत्ता यरफङम्ुते | । कोई सन्देह नहीं, यह सर्वा सत्य हैं, सर्वया सत्य तत्फलं सम्भवेत्तस्य सत्यं सत्यं न संशय! ॥४०॥ ' है ॥२९-४९०॥ जो मनुष्य अदर्निश परसत्रचिने यो गायते इुदाऽध्यात्मरामायणमहरनिशम्‌। . अध्यात्मरामायणका गान करता है उसकी आजञाकी आज्ञां तस्य गतीक्षन्ते देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥४१॥ | इ्रादि देवगण प्रतीक्षा किया करते हैं ॥४१॥ दा ` अध्यात्मरामायणका निस्यप्रति नियमपूर्वक पाठ करने- पठन्प्र्यहमध्यात्मरामायणमजचुग्रतः | ह कर्म करता है बह करे से मनुष्य जो कुछ पृण्य-्कम करता हे वह करोइ- यद्यत्करोति तत्कर्म ततः कोटिशुणं भवेत्‌ ॥४२॥ ` गुना हो जाता है ॥४२॥ vere rtp Po ळक केक केळकर कन पर कमक कनक तत्र भौरामहूदयं यः पठेस्सुसमाहितः। “इस (अध्यात्मरामायण)मेंसे जो पुरुष स्न समाहित RR +. eis किक होकर हदपक करत ह बह ब्रदाहन्या स अज्ञश्लोडपि पूतात्मा त्रिभिरेव दिनै भवेत्‌ ॥४३॥ शक पाठ करता ६ बह असहत्यारा भी हो तो भी तीन दिनमें ही पवित्र हो जाता है ॥४३॥ श्रीरामहृदर्य यस्तु हनूमतिमान्तिके । जो पुरुप हनुमानजीकी प्रतिमाके समीप प्रतिदिन त्रि! पठेखत्यई मौनी स संवेष्सितभाग्भवेत्‌॥|४४॥ तीत वार गौन होकर श्रीरामहदसका पाठ करता : है वह समस्त इच्छित फल प्राप्त करता है ॥४४॥ ® =) क यदि र ~ ड क hd पठन्‌ शरीरामहृदयं तुलस्यश्चत्थयोयदि। : और यदि कोई पुरुष तुळसी या पीपठके निकट श्रीराम- त्यक्षं प्रङु्वीत ब्रह्मह्यानिवर्तनस्‌॥४५॥ ˆ १ भ तो बह एक-एक अदरपर (अपन) । अह्हत्या (जेसे पार्पो) को दूर कर देता है ॥४५॥ श्रीरामगीतासाहात्म्यं कृत्खं जानाति शङ्करः । । हे मुने ! श्रीरामगीताका माहात्म्य पूरा-पृरा तो € Pa ~ «~ टो ~ ~ ` तदथ गिरिजा वेत्ति तदर्थ वेदम्यहं सुने ॥४६॥ श्रीमहादेवजी ही जानते हैं; उनसे आधा पार्वतीजी तत्ते किव्ित्मवश््यामि कत्सं बर्न न शक्यते। । जानती हैं और उनसे भी आधा मैं जानता हें ॥४६॥ जञात्वा तत्षणाहठोकचिद सो उसे पूरा कह भी नहीं सकता, उसमेंसे थोडा-सा उज्हाला वत्षणाछ्ोकथिचश्चद्धिवाप्लुयात्‌।४७। | तुम्हें सुनाता हैं जिसके जाननेमात्रसे चित्त तत्या श्रीरामगीता यत्पापं न नाशयति नारद । | छद्ग हो जाता है ॥४७॥ हे नारद ! जिस पापको तन्न नश्यति तीर्थादौ लोके कापि कदाचन । | किसी. पवार नहीं किया वह संसारमें कभी 2४ लोके केसी ती भी नष्ट | कता. 2 तञ्च पश्याम्यह लोके मार्गमाणोऽपि सर्वदा ॥४८॥ रे भा नष्ट नहीं हो सकता, मैं सदा ।मेणोपनिषतिसि हि हंढनेपर भी उस पापको नहीं देख पाता ॥४८॥ --रायणापानपात्सिन्धुधुन्मथ्योत्पादितां सुदा । | जिस गीतागृतको भगवान्‌ रामने उपनिपत्सागरका > माहात्म्य | मः क कक लक्ष्मणायापिंतां गीतासुधां पीत्वाऽमरो भवेत्‌ ४९ कर निंकाळा और फिर बडी प्रसजतासे ळदमण- जमदसिंसुतः पूर्व कार्तवीर्यवधेच्छया । | जौको दिया ( मतुष्यको चाहिये कि ) उसका पान कि पी करके अमर हो जाय ॥ ४९ ॥ पूर्वेकालमें सहस्रा- घनुविद्यामभ्यसितु महेशस्थान्तिके वसन्‌ ॥५०॥ | जनके वधकी इच्छासे जमदपक्‍्लिनन्दन परशुराम- अधीयमानां पार्वत्या रामगीतां प्रयत्नतः जी धनुर्विद्याका अभ्यास करनेके लिये श्रीमहादेवजीके पास रहते थे ॥५०॥ उस समय रामगीताका अध्ययन श्रत्वा गू त्वा गृहात्वाउच्शु पठन्नारायणकलामगात।।५ १। करती हुई पार्वतीजीसे इ्से यलपूर्वक सुनकर और ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृति यदि वाञ्छति। | तुरन्त ही हृदयंगम कर इसका पाठ करते-करते बे रामगीतां मासमात्रं पठिता इच्यते नरः ॥५२॥ | शगारायणकी कार्प हो गये | ५१ ॥ यदि कोई पुरुष ब्रह्महत्या आदि घोर पापौसे मुक्त होना चाहे दुष्प्रतिग्रहदुर्भोज्यदुरालापादिसम्भवम्‌ । | तो केवळ एकमास रामगीताका पाठ करनेसे छूट पापं यत्तत्कीतेनेन रामगीता विनाशयेत्‌ ॥५३॥ | सकता है ॥५२॥ बुरे दान, निषिद्ध भोजन और ~ TR खोटी बोळचाळ आदिसे जो पाप होता है उसे रामगीता शालग्रामांशलाग्र च तुलस्यश्वत्थसानधा |. पाठमात्रसे नष्ट कर देती है ॥५३॥ जो पुरुष शालग्राम यतीनां पुरतस्तद्कद्रामगीतां पठेत यः॥५४॥ | शिळाके आगे, तुलसी या पीपछके पास अथवा यति- तर RP जनोंके सामने रामगीताका पाठ करता है उसे वह sf ह (केलयास काया है न गोचरप॥५५॥ फळ मिता है जो वाणीका भी विषय नहीं है रामगीतां पठन्मक्त्या यः श्राद्धे भोजयेद्द्विजान्‌ । | ॥५४-५५॥ जो मनुष्य श्राद्वमे रामगीताका भक्तिपूर्वक -तस्प ते पितरः सर्वे यान्ति विष्णोः परं पदम्‌ ॥५६॥| पाठ करके ब्राह्मणोंको भोजन कराता है उसके वे RP ~ समस्त पितृगण भगवान्‌ बिष्णुके परम धामको जाते एकादइयां निराहारो नियतो द्वादशीदिने । हैं ॥५६॥ जो पुरुष एकादशीके दिन निराहार और खिस्वागस्त्यतरोमूले रामगीतां पठेत्तु यः। | जितेन्द्रिय रहकर द्वादशीको हय वृक्षके नीचे बैठ- क्षार सर्वदेचे गमगीताका पाठ करता हे वह साक्षात्‌ रामरूप स एव राघवः साक्षात्सवेदेवेश्व पूज्यते ॥५७॥ ही है उसकी समस्त देवगण पूजा करते हैं ॥५७॥ बिना दानं विना ध्यानं विना तीथोचगाहनस्‌। | रामगीताका पाठ करनेसे मनुष्य बिना किसी दान, ly [$ 860 + ी के ही अक्षय फल पाता है रामगीतां नरो$धीत्य तदन मेत ॥५८॥ हे नारद ! और अधिक क्या कहा जाय जो बहुना किमिहोक्तेन भृण नारद तरवतः। | वास्तविक बात है बह सुन--श्रुति, स्मृति, पुराण और ्रृतिस्म्ृतिपुराणेतिहासागमशताने च। | इतिहास आदि सैकड़ों शार श्रीअध्यात्मरामायणकी अईन्ति नारपमध्यात्मरामायणकलामपि ॥५९॥ | एक तुच्छ कलाके समान भी नहीं है” ॥५९॥ अध्यात्मरामचरितस्य मुनीश्वराय यह अध्यात्मरामायणका माद्दाल्य श्रीब्रह्माजीने माहात्म्यमेतदुदितं कमठासनन । मुनिराज नारदसे कहा है । इसे जो मनुष्य श्रद्वा- यः भ्रड्ठया पठति वा शणुयात्स मर्यः पूर्वक पढ़ता या झुनता है वह देवताओंसे पूजित प्रा्नोति विष्णुपदवी सुरपूज्यमान। ॥६०॥ होकर श्रीविष्णभगवानका पद प्राप्त करता है ॥६०॥ —— TT - इति श्रीत्रह्माण्डपुराणे उत्तरखण्डेऽच्यात्मरामायणः , माहात्यं सम्पूर्णम्‌ — POO हरक इह अ कव 69228 : TOE SSRN SET र BERGE श्रीसीतारासाभ्यां नमः कालकाण्डु अध्यात्मरामायण दर्पकदर्पचोर॑ श्रीजानकीजीवनमानतो5स्मि ॥ आलोक्य यस्यातिळलामलीलां सद्भाग्यभाजो पितरौ कृताथौं । तमर्भकं ला ह. (९५६ ७००८२ “ee ३, ऱ amas Tr De hse 97१६० De ५०१ ८ ९ ८३५ 9:3५ ५ 5 ४४% Os १७-००: छ OT) DDE 41:79 ९०79 ८४ DEB नू ७2222 22222 2022 22222 2272 72 /2762222222226 a ० Sr Na हा (8४1 Da BOS 2 ४2५ 2220 ANAS ८7:70 2:20 AAS Eas DOSS 24005 255 2S DIC DCIS DO CC CDS SOC DC DC ACD 22227 /222%/ “027 / “0 77 720 27/2०/7072 / 72277//2>72 “2227 27* 27% “2272/ 74227 22 70/742 72 77% DE SENG 20८१० 72222 22 / / 1 Ci) Cc CG १६७७ ५ ६०5 १९७ 9७ १६४८७ २९७६ ०६९०७ ४ ६४०७ १९७६ NE eG * सदाप्रसन्न रास eR १४, 1 ५, | ¢ Ce PR VV SET NT IM ST ३ ६ द a उर्‌ी 3+ se रकि प्र ड ९9 ह ग - ~ SS 1] वि टी पु क) f 27 «० 7 « 4 ४, न ~ बढ CN KT ih by 1 er क, ७. ४ wie १००६००० wits easing ५२००४००७११-३०९७५८०७५३००७६-००क+कम्क००कबमते/क री ऋरकोपविरोणेरेन कर्नल Noh Viruses uit विलय ललन 1) स्वयंज्योतिरनन्त आदः | त्ते परानुअह एप रामः॥ कचिमो RN हनाया च £] क ळा मायातन चव सोऽयं परात्मा पुरुपः पुराणः एक चि ( अ० रा० बाल० € 198 ) ॐ अध्यात्मरामायण बालकाण्ड र प्रथम सग रामहदय यः पृथ्वीभरवारणाय दिविजैः | जिन चिन्मय अविनाशी प्रभुने प्रथिवीका भार संप्रायितशिन्मयः उतारनेके लिये देवताओंकी प्रार्थनासे प्रथिबीतळपर संजातः पृथिवीतले रविङ्कुले | सूर्यबंशमें माया-मानवरूपसे अवतार ल्या और जो , मायामचुष्योऽव्ययः । (| राक्षसोंके समूहको मारकर तथा संसारमें अपनी पाप निश्रक्क॑ हतराक्षसः एुनरगादू | विनाशिनी अविचल कीर्ति स्थापितकर पुनः अपने आद्य , , लिखमाच खरा ब्रह्मस्वरूपमें लीन हो गये उन श्रीजानकीवछभका मैं कीर्ति पापहरां मघाय जगता हि भजन करता हूँ ॥१॥ जो विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और! त जानकीशं भजे॥१॥ ल्य आदिके एकमात्र कारण हैं, मायाके आश्रय होकर विश्वोडूवर्यितिल्यादिपु हेतुमेकं भी मायातीत हैं, अचिन्त्यखरूप हैं, आनन्दधन हैं, मायाश्रयं विगतमायमचिन्त्यमूतिम । | उपाधिकृत दोषोंसे रहित हैं, तथा खर्यप्रकाशखरूप आनन्दसान्द्रममरं निजवोधरूप॑ हैं उन तत्त्ववेत्ता श्रीसीतापतिको मैं नमस्कार सीतापतिं विदिततत्वमहं नमामि ॥ २ ॥ | करता हूँ ॥२॥ पठन्ति ये नित्यमनन्यचेतसः जो लोग इस सर्व-पुराण-सम्मत पवित्र अध्यात्म शृण्वन्ति चाष्यात्मिकसंज्ञितं शुभम्‌ । रामायणका एकाग्र-चित्तसे नित्य पाठ करते हैं और रामायणं सर्वपुराणसंमतं जो इसे सुनते हैं बे पापरहित होकर श्रीहरिको ही निर्धूतपापा हरिमेच यान्ति ते॥ ३॥ प्राप्त करते हैं ॥ ३॥ यदि कोई संसार-बन्धन- अध्यात्मरामायणमेव नित्यं | से मुक्त होना चाहता हो तो वह अघ्यात्मरामायणका पठेद्यदीच्छेद्ववषन्थमुक्तिम्‌ । ही नित्य पाठ करे | जो कोई मनुष्य इसका नित्य गवां सहस्रायुतकोटिदानात्‌ श्रवण करता है वह लाखों करोड Me फळ फूलं ठमेदयः शृणुयात्स नित्यस्‌ ॥ ४ ॥ | प्रात करता है ॥४॥ श्रीसंकररूप पर्वेतसे निकली हुई पुरारिगिरिसंभूता श्रीरामार्णवसंगता । रामरूप समुद्रमें मिलनेवाली यह अध्यात्मरामायण- अध्यात्मरामगङ्गेयं पुनाति भुवनत्रयम ॥। ५॥ | रूपिणी गंगा त्रिळोकीको पवित्र कर रही है ॥५॥| ४ अध्यात्मरामायण [ सर्गै १ oor तारम ु्न पिनक क्क्दमाहमक््छ्कव्य्क Rnd दक्कक् T केलासाग्रे कदाविद्गविशतविमले | | एक समय केलाशपर्वतके शिखरपर सैकर्शे सूयक मन्दिरे रत्नपीठे | समान प्रकादामान झुश्र भवनमें रनसिंहासनपर संविष्ठं ध्याननिष्ठ त्रिनयनमभयं वि घ्यानावस्थित बैठे हुए, सिद्-सगह-सेवित, नित्यनिर्भय, देवी , सेवित सिद्धसंथः । | सर्वपापापहारी आनन्दकन्द देवदेव भगवान्‌ त्रिनयनसे देवी वामाङ्कसस्या पार्वती मक्तिनग | उनके बामाहुमें. विराजमान श्रीगिरिराजकुगारी राहे देवमीशं सकलमलहरं | पार्वतीने भक्तिभावे नत्रतापूर्वेक ये याय बाक्यमानन्दकन्दम्‌॥ ६॥ | कहे ॥ ६ ॥ पार्वत्युवाच श्रीपार्चतीजी चोली-हे देव ! ह जगनिवास ! आपको नमोऽस्तु ते देव जगन्निवास | नमस्कार है; आप सबके अन्तःकरणोंके साक्षी और सर्चीत्महक त्वं परमेश्वरोऽसि । | परमेश्वर हैं । में आपसे अ्रीपुरुपोत्तम भगवानका पृच्छामि तखं पुरुषोत्तमस्य | सनातन-तत्त पूछना चाहती हूँ क्योंकि आप भी सनातनं त्यं च सनातनोऽसि ॥ ७॥ | सनातन हैं ॥७॥ महाजुभावठोग जो अनन्त गोपनीय गोप्यं यदत्यन्तमनन्यवाच्यं ' विषय होता हैं तथा अन्य किसीसे करन योग्य नहीं वदन्ति भक्तेषु महानुभावाः । होता उसे भी अपने भक्तजनोंस कह देते हैँ | छे देव ! तदप्यहोऽहं तव देव भक्ता मैं भी आपका भक्त हूं. सुभे आप अयन्त प्रिय हैं । प्रियोऽसि मे त्वं बद यत्तु एम्‌ ॥ ८ ॥ | व्य मैंने जो उठ पूछा है बह वर्णन कीजिये॥८॥ ज्ञानं स्विज्ञानमथाहुभक्ति- ' जिस जनके द्वारा मल्य संसार-समुझ्से पार हे जाते वैराग्ययुक्तं च मितं विभाखत्‌ । ` हैं उस भक्ति और वेराग्यसे (रण प्रकाशनय ` आव्मञ्ञानका वणंत आप वितानसदित इस प्रकार खत्प यथा i न शब्दोमिं कीजिये जिससे में सी होनिपर भी आपके न्यच प्र रहस्य नयन | मं एक परम युध्य रहस आपसे ऑर पूती औरामच के खिल लोकसारे वारजाक्ष । ! हु, कृपया आप पहले उसे ही वर्णन करें | यह तो भक्तिईंहा नौर्भवति प्ररि ; प्रसिद्ध ही हे कि अखिल-लोक-सार श्रीरामचन्द्रजीका नामिचात प्रसिद्धा ॥०॥ बिशुद्ध भक्ति संसार-सागरकों तरनेके लिये तुद्द नौका भक्तिः निदा कक : है ॥१०॥ संसारसे मुक्त होनेके लिये भक्ति हीं पसिद्ध तथापि "हयव किञ्चित्‌ । ' उपाय है उससे श्रेष्ट और कोई भो साधन नहीं है विमेचुमहेखमलोक्तिमिस्लय | तथापि आप अपने विशुद्ध वचनोले मेरे हृदयका वदन्ति रामं परमेकमार्च ॥११॥ | संशय-ग्रन्धिका छेदन कीजिये ॥ ११॥ प्रमाद निरसमायाशुणसंग्रबाइ्‌ । | रदित सिद्धगण रामचन््रजीको परम अद्वितीय, भजन्ति चाहनिंशमप्रमत्ता सबके आदिकारण ओर प्रकृतिके गुण-प्रबाहसे परं पदं यान्ति तथैव सिद्धा त परे वतलाते हैं तथा चे अहर्निश उनका भजन ददन्ति करो द्धः ॥१२॥ | करके परमपद भी प्राप्त करते हैं ॥१२॥ परन्तु कोई- रामः कोई कहते हैं कि राम परब्रह्म होनेपर भी अपना जानाति स ए परेण | मायासे आइत हो जानेके कारण अपने आत्मसरूपको सम्बोधितो बेद परार क नहीं जानते थे । इसलिये अन्य (बशिष्टादि) के उपदेश- १६ परास्मतस्वय ॥१३॥ | से उन्होंने आत्मतत्तको जाना॥१३॥ (अतः मैं पूछती सगे १] | बालकाण्ड | प्‌ Ce] २०९०७ ee vue fi "४४४५४५४४१४ ४४७ शलक ७७४७७ FOSS 29098 ७८०९ ७ ७७४. ४७ ७९४४७७७ १५७ ७२७७७७ FANN ७७१७ NAN Le Ur कीचा यदि स्म जानाति कुतो विलापः | हैं कि) यदि वे आत्मतच््रको जानते थे, तो उन परमात्माने सीताङृतेऽनेन कृतः परेण। | सौताके ल्यि इतना विलाप क्यों किया? और यदि उन्हे जानाति नेयं यदि केन सेव्यः । आत्मज्ञान नहीं था, तो वे अन्य सामान्य जीवोंके समान _ समो हि सर्वेरपि जीवजातेः ॥१४॥ | ही हुए; फिर उनका भजन क्यों किया जाना चाहिये ! अत्रोचरं किं विदितं भवद्धि- | इस विपरयमें आपका क्या विचार है सो ऐसे वाक्योंमें सतदूत्नत मे संशयभेदि वाक्यम्‌ ॥१५॥ | कहिये जिससे मेरा सन्देह निृत्त हो जाय ॥१४-१५॥ श्रीमहादेष उवाच ; श्रीमदादेचजी चोले-देवि | तुम धन्य हो, तुम सि परात्मनस्त्व । परमात्माकी परम भक्त हो, जो तुम्हें रामका तत्त्व घन्यासि भक्तासि परार | जाननेकी इच्छा हुई है । इससे पूर्व, इस परमगूढ पज्छातुपिच्छा शे पमिचोदितो रद जि 1 । रृष्टत्यका वर्णन करनेके लिये मुझसे और किसीने नहीं . एरा न फेनाऱ्याभचादताऱ्ह । कहा ॥१६॥ आज तुमने मुझसे भक्तिपूर्वक प्रश्न किया बकं रहस्ये परमं निगूढम्‌ ॥१६॥ | है इसलिये में श्ररघुनाथजीकी वन्दनाकर तुम्हरे प्रश्नका त््रयाऽ्य भवत्या परिनोदितोऽह | उत्तर देता हूँ । श्रीरामचन्द्रजी निःसन्देह प्रकृतिसे वक्ष्ये नमस्कृत्य रघूत्तमं ते) | परे, परमात्मा, अनादि, आनन्दघन, अद्वितीय और रामः परात्मा प्रकृतेरनादिः | पुरुषोत्तम हैं ॥१७॥ जो अपनी मायासे ही इस सम्पूर्ण रानन्द एकः पुरुपोत्तमों द्वि ॥१७॥ « जगतका रचकर इसके बाहर-मीतर सव ओर आकाराके ख़मायया क्रत्स्नमिई हि सृष्ठा | समान व्याप्त हैं तथा जो आत्मारूपसे सरके अन्तः" नभोवदन्तर्वरिरास्यितो यः। ¦ करणमे स्थित हुए अपनी मायासे इरा विश्वको परि- मर्ीन्तरस्रोऽपि निगूद आत्मा ! चालित कर रहे हैं ॥१८॥ चुम्बकके निकट होनेसे मामिदं बिच ।१८॥ ¦ जिसप्रकार जड लोहेमें गति उत्पन्न हो जाती है उसी ~ खमायया टा चष्ट `” ` प्रकार जिनकी सन्तिधिमात्रसे यह विश्व सदा सब ओर जगन्ते नित्य पारता अमानत ` अमता रहना है उन परमात्मा रामको, जिनका यतप्रन्निधी झुम्बकलोहबद्धि | | हृदय आत्माके अज्ञानसे ढॅका हुआ है वे मूइजन एतत जानन्ति वरिमूढडवित्ता! । नही जान सकते ॥ १९॥ थे मूढ़ उन मायातीत म्वाविद्यया संत्रतमानसा ये ॥१९॥ शझुद्ध-बुद्ध परमात्मामें भी अपने अज्ञानको आरोपित स्वाभञानमप्यात्माने शुद्धबुद्धेः ; करते हैं अर्थात्‌ उन्हें भी अपने समान ही अज्ञानी खारोपयन्तीह निरस्तमाये | मानते हैं, तथा वे सढ बसना म आसक्त (खले संसारममानुसरन्ति त र * बाळे पामर जीवः वहः रो रह - | ` पुव्रांदिसक्ता! 'पुर्कपुक्ता: ॥२०॥ ` चक्रमे ही पदे रहते है ॥२ ० चे अज्ञजन अपने गलेमें पडे जानान्ति नेत्र हृदय स्थितं थे ' हुए कण्ठेकों न जाननेके समान अपने ही हृदयमें सित , परमात्मा रामको नहीं जानते ( इसीलिये उनमें चामीकर कण्ठगत यथाञ्ञाः | ' अज्ञानादिका आरोप करते हैं) । वासवमे तो यधाध्प्रकाशों न तु विश्वत रवा जिस प्रकार सूर्यम कमी अन्धकार नहीं रहता उसी ज्योविःखखभावे परमेश्वरे तथा। : प्रकार प्रश्‍त्यादिसे अतीत, विश्वद्ध-विज्ञानधन, ज्योतिः निशुदविज्ानषन्‌ रघुत्तमः । स्वरूव, परणेशर परमार्मा रापण मी अविद्या नहीं, रह उविश्वा कर्थ स्यात्परतः परात्मनि ॥२१॥ ¦ सकती ॥२१॥ और जिस प्रकार चक्कर छगाते समय भथा हि घाक्ष्गा भ्रमता शुद्टादिकं | मनुष्यक्रो ने्रोके घूमनेसे गृह आदि, भी घूमते हुए प्रतीत विमश्टच्टे्रमतीव.. धब्यते। | होतेहे उसी प्रकार छोग अपने देह और इन्द्रियरूप कर्ताके er भी ६ अध्यात्मरामायण जज देहेन्द्रियकर्तुरात्मनः कृतं परे$व्यस्थ जनो विम्युक्नति ॥२२॥ नाहो न रात्रिः सवितुर्यथा भवेत्‌ अरकाशरूपाच्यभिचारतः क्कचित्‌ | ज्ञानं तथाऽज्ञानमिदं द्रयं हरो रामे कथं खाति शुद्धचिदने ॥२३॥ तसात्परानन्दमये रघूत्तम विज्ञानरूपे हि न विद्यते तमः । अज्ञानसाक्षिण्यरविन्दरोचने मायाश्रयत्वान्न हि मोहकारणम्‌ ॥२४॥ अत्र ते कथयिष्यामि रहस्यमपि दुलभम्‌ । सीताराममरुत्प्रनुसंवादं मोक्षसाधनस्‌ ॥२५॥ पुरा रामायणे रामो रावणं देवकण्टकस्‌ | हृत्वा रणे रणश्लाघी सपृत्रबलबाहनस्‌ ॥२६॥ सीतया सह सुग्रीवलक्षमणास्यां समन्वितः । अयोष्यामगमद्रामो हनूमत्ममुखदतः ॥२७॥ अभिषिक्तः परिवृतो वसिष्ठायेमैहात्ममिः । सिंहासने समासीनः कोटिद्र्यसमम्रभः ॥२८॥ दृष्टा तदा हनूमन्तं प्राञ्ञालें पुरतः स्थितम्‌ । कृतकायं निराकाङ्क ज्ञानापेक्षं महामतिम्‌ ॥२९॥ रामः सीताश्चुवाचेदं बूहि तत्त्वं हनूमते । निष्करमषोऽयं ज्ञानस पात्रं नो नित्यभक्तिमान्‌३० तथेति जानकी ग्राह तरवं रामस्य निश्चितम्‌ । हनूसते प्रपन्नाय सीता खोकंविमोहिनी ॥३१॥ तथैव रामं विद्धि परं ब्रह्म सचिदानन्दमद्भयम्‌ । सर्योपाथिविनि्चुक्तं सत्तामात्रमगोचरम्‌॥२२॥ आनन्दं निर्मल शान्तं निर्विकार निरञ्जनम्‌ । स्ेच्यापिनमात्मारन स्वप्रकाशमकर्मषस्‌॥२२॥ मां विद्धि मूलप्रकृति सर्गस्थित्यन्तकारिणीम्‌ । ` तस्य सन्निधिमात्रेण सृजामीदमतन्द्रिता ॥३४॥ — [सर्ग १ किये इए कोका आत्मामें आरोप करके मोहित हो जाते हैं ॥२२॥ प्रकाश-रूपताका कमी व्यभिचार न होनेसे जिस प्रकार सूर्यमें रात-दिनका भेद नहीं होता--वह सर्वदा एक समान प्रकाशमान रहता हे--उसी प्रक्रार शुद्धचेतनधन भगवान्‌ राममें ज्ञान और अज्ञान दोनों कैसे रह सकते हैं ! ॥२३॥ अतएव परानन्द्स्वरूप विज्ञानघन अकज्ञान-साक्षी कमलनयन भगवान राममें अज्ञानका लेश भी नहीं है क्योंकि वे मायाके अधिष्ठान हैं इसलिये वह उन्हें मोहित नहीं कर सकती ॥२४॥ हे पार्वति ! इस विपयमें मैं तुम्हें सीता, राग और हनुमानुजीका मोक्षका साधन- रूप संवाद झुनांता हूँ जो अत्यन्त गोपनीय और परम दुर्म है ॥२५॥ पूर्वकालमें रामावतारके समय जब युद्धप्रिय शरीरामचन्द्रजी देवताओंके कण्टकरूप रावणको संतान, सेना और वाहनोंके सहित युद्धमें मारकर सीता, सुग्रीव और छक्ष्मणके सहित हनुमान्‌ आदि वानरोंसे घिरे हुए अयोध्यापुरीमे आये ॥ २६-२७ ॥ और वहाँ आकर, राज्याभिषेक होनेपर वसिष्ठ आदि महात्माओंसे धिर कर करोड़ों सूर्योकी प्रभा धारणकर जव सिंहासनपर विराजमान इए ॥२८॥ उस समय कृतकृत्य और भोगेच्छारहित महांमंति हनुमानजीको ज्ञानाभिळाषासे अपने सम्मुख हाथ जोडे खड़े देखकर ्रीरामचन्द्रजीने सीताजीसे ऐसा कहा-“सीते ! यह हनुमान्‌ हम दोनोंमें अत्यन्त भक्ति रखता है, इसलिये यह निष्पाप है और ज्ञानका सुयोग्य पात्र है। अतः तुम इसे मेरे तत्त्वका उपदेश करो” || २९-३० | 'तब छोक-विमोहिनी जनकनन्दिनी सीताजी श्रीरामचन्द्रजीसे 'बहुत अच्छा' कह शरणागत हनुमानको भगवान्‌ रामका निश्चित तत्त्व बताने छगी।३ ! सीताजीने कहा-“वत्स हनुम'न्‌ ! तुम रामको साक्षात्‌ अद्वितीय सचिदानन्दधन परब्रह्म समझो; ये निःसन्देह समस्त उपाधियोंसे रहित, सत्तामात्र, इन्द्रियोंके अविषय, आनन्दघन, निर्मल, शान्त, निर्विकार, निरञ्जन, सर्व- व्यापक, खयंप्रकाइ और पापहीन परमात्मा ही हैं ॥२२-३३॥ और मुझे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और अन्त करनेवाली मूलप्रकृति जानो । मैं ही निराळस्य होकर इनकी सन्िधिमात्रसे इस विश्वकी रचना किया सगे १] ॒ ` बालकाण्ड ७ तत्सान्निध्यान्मया सृष्ट तसखिन्नारोप्यतेञ्युवै!! करती हूँ ॥३४॥ तो भी इनकी सनिधिमात्रसे की हुई अयोध्यानगरे जन्म रघुबंशेजतिनिर्मले ॥३५॥॥ | मेरी रचनाको बुद्धिहीन लोग इनमें आरोपित कर वेते हैं। अतएव,अयोष्यापुरीमें अत्यन्त पवित्र इनका जन्म विश्वामित्रसहायत्वं मखसंरक्षणं ततः । पप रघुकुलमें इनका लेना ॥ २५॥ फिर विश्वामित्रजीकी सहायता करना, अहल्याशापशमनं चापभङ्गो महेशितुः 1३६) | उनके यज्ञकी रक्षा करना, अहल्याको शाप- एरंमत्पाणिग्रहणं पश्चाद्धागवस्थ मदक्षयः मुक्त करना, श्रीमहादेवजीके धनुषको तोड़ना ` अयोध्यानगरे वासो मया द्ादशवार्षिकः॥३७॥ | ॥ २ * | तसश्चात्‌ मेरा पाणिग्रहण करना, परशुराम- जीका गर्व-खण्डन करना तथा बारह वर्षतक मेरे दण्डकारण्यगसच विराधवध एव, च । साथ अयोष्यापुरीमें रहना || ३७॥ फिर दण्डकारण्यमें मायामारीचमरणं मायांसीताहृतिस्तथा | जाना, विराधका वध करना, 'माया-मृगरूप मारीचका जटायुषो मोक्षलाभः कबन्धस्य 'तयैच न्च मारा जाना, मायामयो सीताका हरा जाना ॥ ३८ ॥ तदनन्तर जटायु और कबन्धका मुक्त होना, शबरीद्वारा शवया+ [विण समागमः ॥ शष पूजन पश्नात्सुग्रीवेण समागमः ॥२९॥ भगवान्‌का पूजित होना और सुग्रीवसे मित्रता होना वालिनथ वधः पश्चात्सीतान्वेषणमेव च। ˆ ।॥३९॥ फिर बालिका बध करना, सीताजीकी सेतुवन्थश्न जलधौ लंकायाश्च निरोधनम्‌ ॥४०॥ खोज कराना, समुद्रका पुछ बॅधवाना और लङ्कापुरीको hn a लेन छै oc पुत्रोंके है रावणस्य चथा युद्ध सपुत्रस्य दुरात्मनः धेर लेना ॥ ॥ तथा पुत्रोंके सहित दुरात्मा रावण क्रो थुद्धमं मारना एवं विमीपणको उङ्काका राज्य देकर “विभीषणे राज्यदानं पुष्पकेण मया सह ॥४१॥ पुष्पक-विमानद्वारा मेरे साथ अयोध्या , लौट आना, अयोध्यागमर्न पश्चाद्राज्ये रामाभिपेचनम्‌ | फिर श्रीरामजीका राज्यपदपर अभिषिक्त होना-- इत्यादि समस्त कर्म यद्यपि मेरे ही किये इए हैं तो भी एवमादीनि कर्माणि मयेवाचरितान्यर्षि । अज्ञानी लोग उन्हें इन निर्विकार सर्वात्मा भगवान्‌ राममें आरोपयन्ति रामेऽस्मिन्निविकारेऽखिलात्मेनि ४२ | आरोपित करते हैं॥ ४१-४२ ॥ ये राम तो ( वास्तव- रामों न गच्छति न तिष्ठति नाइुशोच- में) न चलते हैं, न ठहरते हल शोक करते हैं, ते किश्चित। इच्छा करते हैं, न त्यागते हैं ओर न कोई अन्य क्रिया त्याकाहते त्यजति नो न करो! व! ही करते हैं। ये आनन्दखरूप, अविचल और परिणाम- आनन्दमूतिरचलः परिणामहीनो हीन हैं, केवल मायाके गुणोंसे व्याप्त होनेके कारण ही सायागुणाननुगतो हि तथा विभाति।४३॥ , थे वैसे प्रतीत होते हैं। ४३ ॥ ततो रामः खयं ग्राह हनूमन्तञ्चपस्ितस्‌। ˆ तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने सम्मुख खड़े हुए पवन- पुत्र हनुमान्‌से खयं कहा---मैं तुम्हें आत्मा, अनात्मा पूणु तत्त्व प्रवक्ष्यामि ह्यात्मानात्मपरात्मनास्‌ ४४ और परात्माका तत्त्व बताता हूँ, (सावधान होकर) सुनो ॥ ४४ ॥ जलाशयमें आकाशके तीन भेद स्पष्ट आकाशस्य यथा मेदखिविधो इश्यते महान्‌ । | दिखायी देते हैं-एक महाकाश, दूसरा जलाव- च्छिन आकाश और तीसरा प्रतिबिम्बाकाश । जैसे आकाशके ये तीन बड़े-बड़े भेद दिखायी देते हैं प्रतिविम्धाख्यमपर दृश्यते त्रिविधं नभः॥४५)॥ ॥ ४५ उसी . प्रकार चेतन भी तीन प्रकारका RS जलाशये महाकाशस्तदवच्छि्न एव हि १, जो सर्वत्र व्याप्त है । २, जो केवल जलाशयमें ही परिमित है । ३, जो अळमें प्रतिविम्बित है । _______________ 6 ८ अँध्यात्मरामायणँ [ सगे १ च्छ ~ ¢ बुद्यचच्छिन्नचेतन्यमेकं पूर्णमथापरम्‌ | है---एक तो वुद्धववच्छिन्न चेतन (जो बुद्धिमें व्याप्त द्यवा हि हे है), दूसरा जो सर्वत्र परिपूर्ण है और तीसरा जो चुद्धि- आमासस्त्वपरं बिम्बभूतमेव॑ त्रिधा चितिः॥४६॥ | मे प्रतिविम्बित होता है---जिसको आभासचेतन कहते > करत्वमविच्छिन्नेंडविकारिपि हैं ॥ ४६ || इनमेंसे केवळ आभास-चेतनके सहित साभासबुदवेः कपृत्वमविच्छिन्नेऽः । [| बुद्धिमें ही कर्तुत्व है अर्थात्‌ चिदामासके सहित बुद्धि जीवर बु करती है । किन्तु अन्नजन भ्रान्तिवदा साक्षिण्यारोप्यते रन्त्या जीवरवं च तथाउबुषे। ४७ निरचन्छिन, lo दी आलम कत्तत्व और द्विरविद्याकार्यमुच्यते जीवत्वका आरोप करते हैं अर्थात्‌ उस ही कर्ता-मोक्ता आमातस्छ स्पा ३ ' मान लेते हैं ॥ ०७ ॥ (हमने जिसे जीव कहा है उसमें ) आमास-चेतन तो मिथ्या है ( क्योंकि समीं आमास मिथ्या. ही हुआ, करते हैं ) । चुद्धि अविद्याका काय है ओर परत्रस परमात्मा वाम्तत्रमं विच्छेदरहित है अतः उसका बिच्छेद भी विकल्पे तस्वमस्यादिवाक्येथ सामासस्याहमस्तथा॥४९॥| ही माना हुआ हैं ॥ ४८ ॥ (इती प्रकार उपाधियोंका हि , . , हि चाध करते हुए) साभास अहंझूप अतच्छिन्न चेतन ऐक्यज्ञानं यदोत्पन्नं महावाक्येन चात्मनोः। | (जीव) की 'तत्तमसि' (त. बह है) आदि महा- तदाऽविद्ा सकाश नशते न संशय: |५०॥| “दर इणे वेतन (र के साथ एकता हु चतळायी जाती है ॥४९॥ जब महावावयद्वारा (३स- न रे न । प्रकार) जीवात्मा और परमात्माकी एकताका ज्ञान एताव सङ्कक्ता सङ्कावायापपधते। | उत्पन हो जाता है उस समय अपने कार्योसदित | अविद्या नष्ट हो ही जाती है--इसमे कोई सन्देह | नहीं ॥ ५० ॥ मेरा भक्त इस उपयुक्त तत्वको समग्र- नज्ञान न च मोक्ष) स्यात्तवा जन्मशतरपि।।५१॥ | कर मेरे खरूपको प्राप्त होनेका पात्र हो जाता हैं पर | जो लोग मेरी भक्तिकों छोड़कर झासरूप गेम पडे अविच्छिन्नं तु तद्ञह्म विच्छेदस्तु विकत्पत! ४८ अविच्छिन्नस्य पूर्णेन एकत्वं प्रतिपाद्यते । मद्धक्तिविधुखानां हि शात्नगर्तेषु घुझताम्‌। इदं रहस्यं हृदयं ममात्मनो । भटकते रहते हैं उन्हें सो जन्मतक भी न तो ज्ञान कद 1, होता हैँ और न मोक्ष ही प्राप्त होता है ॥ ५१॥ ३ मयच साक्षात्काथेत तवानघ | | अनघ ! यह परम रहस्य मुझ आत्मरूप रामका मद्भक्तिहीनाय शठाय न त्वया हृदय हैं; और साक्षात्‌ मेन ही तुम्हें मुनाया हे | यदि तुम्हें इन्द्रलोकके राज्यस भी अधिक सम्पत्ति मिले तो दातव्यमन्द्रादपि राज्यतो5थिकम ॥५२॥ | मी तुम इसे मेरी भक्तिसे हीन किसी दुष्ट पुरुपको | मत सुनाना” ॥ ५२ ॥ श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेचजी वोले-हे देवि ! मेने तुम्हें यह अत्यन्त एतत्तेऽभिहितं देवि श्रीरामहृदयं मया। | गोपनीयः हदयहारी, परम पवित्र और पापनाझक दार सार-सप्रह साक्षात्‌ श्रीरामचन्द्रजीका कहा साक्षाद्रामेण कथितं सर्ववेदान्तसंग्रहम्‌ | है । जो कोई इसे भक्तिपूर्वक पढ़ता है हा य! पठेत्सतत तं भक्त्या स युक्तो नात्र संशयः ॥५४॥ निस्सन्देह मुक्त हो जाता है || ५४ ॥ इसके पठन- नया वहुजन्माजितान्यपि। | मात्रसे अनेक जन्मोंके सज्ञित त्रह्महत्यादि समख पाप च्त्यव ने सन्देही रामस्य वचनं यथा ॥५५॥ | निस्सन्देद नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि श्रीरामके वचन बालकाण्ड ९ ho 4०१ eT २ योऽतित्रष्टोऽतिपापी परघनपरदा- रेषु नित्योद्यतो वा बह्मप्नमातापितृषधनिरतो योभिवृर्दापकारी । यः सपूज्याभिरामं पठति च हुदय॑ रामचन्द्रस्य भक्त्या थोगीन्दररप्यलम्यं पदमिह लभते सवद्‌चे! [aN स्तेयी nnn 0४४४४४७ ४४१७७.” दिसना ऐसे ही हैं ॥ ५५॥ जो कोई अत्यन्त भ्रष्ट, अतिशय पापी, परधन और परख्ियोमें सदा प्रवृत्त रहनेबाळा, चोर, ब्रह्म-हत्यारा, माता-पिताका बध करनेमें ल्या हुआ और योगिजनोंका अहित करनेवाला मनुष्य भी श्रीरामचन्द्रजीका पूजनकर इस रामहद्यका भक्तिपूर्वक पाठ करता है वह समस्त देवताओंके पूज्य उस परमपदको स. पूज्यम्‌ ॥५६॥ | प्राप्त होता हे जो योगिराजोंको भी परम दुळेम है ॥५६॥ CC 2 ७-4० इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे औरामहदयं नाम प्रथमः सगः ॥ १॥ ~ सर्ग | घ्विताय सग भारपीडिता पृथिवीका ब्रह्मादि देवताओंके पास जाना और भगवानका उनकी प्राथनासे प्रकट होकर उन्हें धेय बेंघाना । पार्वत्युवाच धन्यास्म्यनुग्रहीतास्मि कृतार्थास्मि जगत्मभो। विच्छिन्नो मेडतिसन्देहग्रन्थिमवदनुग्रहात्‌॥ १॥ लन्‍्मुखाहइलितं रामतस्वामृतरसायनम्‌ | पिवन्त्या मे मनो देव न तृप्यति भवापहमस्‌ | २ ॥ श्रीरामस्य कथा त्वत्तः श्रुता संक्षेपतो मया । इदानीं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण स्फुटाक्षरम्‌।। रे | श्रीमहादेव उवाच शृणु देवि भ्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं महत्‌ । 'अध्यात्मरामचरितं रामेणोक्तं पुरा मम॥ ४॥ तद्य कथयिप्यामि शृणु तापत्रयापहम्‌। यच्छृत्वा युच्यते जन्तुरक्षानोत्थमहाभयातू । प्राप्नोति परमामद्धि दीर्घायु! पुत्रसन्ततिस्‌॥ ५॥ भूमिर्भारेण मञ्चा दशवदनसुखा- शेपरक्षोगणानां घृत्वा गोरूपमादौ दिविजशुनिजनेः साकमन्जासनस्य। क पार्वतीजी बोलीं-हे जगतठ्ममो | आपकी कृपासे अनुगृहीत होकर मैं धन्य और कृतकृत्य हो गयी तथा मेरी कठिन सन्देहग्रन्थि टूट गयी ॥ १ ॥ हे देव ! आपके सुखसे चूते हुए भवभयहारी रामतत्त्वरूप अमृतमय रसायनका पान करते-करते मेरा मन तृप्त नहीं होता ॥ २॥ मैंने आपके मुखसे श्रीरामचन्द्र- जीकी कथा संक्षेपसे सुनी । अब मैं उसे स्पष्ट शब्दोंमें विस्तारपूर्वक छुना चाहती हूँ ॥ ३ ॥ श्रीमहादेवजी बोळे-हे देवि ! सुनो, मैं तुम्हें गुग्मसे भी गुझ महान्‌ अध्यात्मरामायण सुनाता हूँ जो पहले मुझे श्रीरामचन्द्रजीने ही सुनायी थी ॥ ४ ॥ अब मैं तुम्हें वह तापत्रयहारिणी अध्यात्मरामायण सुनाता हूँ, सावधान होकर सुनो । इसके सुननेसे जीव अज्ञन- जन्य महाभयसे छूट जाता है और परम ऐश्वय, दीर्ध आयु तथा पुत्र-पीत्रादि प्राप्त करता है ॥ ५ ॥ एक बार रावण आदि राक्षसौके भारसे व्यथित हो प्रथिवी गोका रूप धारणकर देवता और मुनि- जनोंके सहित श्रीत्रह्माजीके छोकको गयी। वहाँ पहुँच- कर उसने रोते हुए, अपनेपर पड़ा हुआ सारा दुःख १७ अध्यात्मरामायण [ सर्ग २ १७९ २७७७-१७ ३४७००९ ७५७९७४७७२० सनक ९ की दक ५० कक >डधज नजर eu ब्रह्माजीसे कहा । तब ब्रह्मार्जाने एक मुह॒र्ततक व्यान हो अपने मनमें उसकी ठुःख-निवृत्तिका सम्पूर्ण उपाय जान ल्या क्योंकि वे सर्वान्तर्यामी हें | ६ | तथश्चात बहाँसे समस्त देवताओंक सहित श्रत्रद्माजी प्रथिवीकों साथ लेकर क्षीरसागरके तटपर गये और बहाँ उन्होंने अत्यन्त निर्मळ आनन्दाश्रुओंसे परित हो अमि लोकान्तर्यीमी, अजर, सर्वज्ञ, भगवान्‌ हरियाँ अति निर | भक्तियुक्त गद्द-त्राणीसे श्रुतिसिद्र ब्रिमळ पदों और पुराणोक्त सोज्रोंद्रारा स्तुति की | ७॥ तत्र सदन्नं देदीप्यमान सूथाकि समान प्रभागार्ण भगवान्‌ हरि ( अपने तेजसे ) सव दिद्याओकें अन्यकारकों दुर करते इए पूर्व-दिशामें प्रकट हुए ॥८॥ पुण्य- हीन पुरुषोके लिये अत्यन्त दुर्दशर्नाथ भगवान हरिको ( उनके अमित तेजके कारण ) अग्राजीने भी बड़ी कठिनतासे देख पाया | इन््रनीळगणिके समान उनका तेजोमय दयाम वर्ण था, मुखपर गधुर मुसकान थी और कमलके समान विश्ञाड और गनोंहर नेत्र थे ॥९॥ ये किरीट, हार, केर, छुण्झछ और कटक आदि आभूषणोंसे सुशोमित तथा शवल और कोस्तुभमणिकी प्रभासे युक्त भे॥ १० || उन्हें स्नुति करते हुए सनकादि पार्द चारों ओरसे घेरे हुए घे और उचकी शक्त, चक्र, गदा, पदूम नथा बनमाठाने अपू ६ 'गत्वा ठोक रुदन्ती व्यसनमुपगतं ह्मणे प्राह सवं ह्ला ध्यात्वा मुहूर्त सकलमपि हृदा- $वेदशेषात्मकत्वात ॥ ६ ॥ तस्मारक्षीरसश्चद्रतीरमगमद्‌ राथ देयैवतो देव्या चाखिललोकहत्थमजर सर्वज्मीशण॑ हरि! असौषीचछरतिसिद्धतिमलपदैः सोत्रैः पुराणो दवैः क्त्या गद्गदया गिरातिविमलै- रानन्दवाप्पैईतः ॥ ७॥ पतः स्फुर्सहसांशुसहससब्शप्रमः । आविरासीद्वरि प्राच्यां दिशो व्यपनयंसमः ।।८॥ कर्षविदृच्टवालजज्ला दुर्दरशमकृतात्मनामू । इन्द्रनीलग्रतीकाशं खतास पञ्चलोचनस्‌ ॥९॥ किरीटहारकेयूरदुण्डहैः कटकादिमिः । विभाजमान श्रोबत्सकस्तुभप्रमयान्वितम॥१०॥ द्धिः सनाय पार्दै परिवेष्टितम्‌ । ` श्हृवकमदापद्मवनमाठाविराजितम्‌ ॥११ खर्णयश्ञोपवीतेन खर्णवर्णाम्वरेण च | भिया भूम्या च सहितं गरुहोपरि संखितम ॥ १२॥ हग़दया वाचा सोतुं समुपचक्रमे ॥१३॥ वक्षोवाच शोभा हो रही थी ॥ ११ || बे सुनहरा बहोत और पीताग्बरसे सुशोभित एवं लक्ष्मी और भूमिके सहित गरुढपर विराजमान ये | (उनकी ऐसी दिव्य छविको देखकर ) पितामह अद्याजी ह्मे गड़दकप्ट हो स्तुति करने रगे ॥ १२-१३ ॥ मह्याजी चोले-हे देव ! कर्म-पाशसे मुक्त होनेके लिये सुमुक्षुजन अपने प्राण, बुद्धि, इन्द्रिय और मनसे जिनका नित्य चिन्तन करते हैं आपके उन अरणारकिन्दो- को मैं नमस्कार करता हैँ ॥ १४॥| आप अपनी ्रियुणमयी मायाका आश्रय कर के ही इस जगतूकी उत्पत्ति, पाळन और ल्य करते हैं; किन्त ज्ञनानन्दसरूप आप इससे स्मि नहीं होते ॥ १५॥ हे भगवन्‌ ! आपके बिमळ यशमें सदा प्रेम रखनेबाले भक्तोंका अन्तःकरण जैसा शुद्ध होता है वैसी शुद्धि मलिन अन्त:करणवाळे पुरुप दान और अध्ययन आदि झुभ कर्मोसे नहीं प्राप्त कर सकते || १६ ॥ अतः भक्त मुनि- नतोऽसि ते पदं देव प्राणबुद्धीन्दरियात्माभि! । यचिन्छते कमपाशादूधृदि नित्य बदवक्भिः।१४॥ मायया गुणमय्या तव॑ सूजसवसि छुम्पसि । जगत्तेन न ते लेप आनन्दाबुभवात्मनः । १ ५ तथा शुद्धिन दुष्टानां दानाध्ययनकमीमि! । उदात्ता ते यशसि सदा मक्तिमता यथा ॥ १६ सभे २] बालकाण्ड ११ TTT TS अतस्रवाङ्प्रिमें द्ष्थ्रित्तदोपापनुत्तये । सद्योऽन्तहदये नित्यं गुनिभिः सात्वतेइतः ॥१७॥ बह्मा; खाथसिद्धयथमसाभिःपूवसेवितः अपरोक्षानुभूत्यथं ज्ञानिभिह्देदि भावितः ॥१८॥ तवाड्प्रिपूजानिमोल्यतुठसीमाठया विभो। स्पधते वक्षसि पर्द लब्ध्वापि श्री: सपल्रिवत्‌ ॥१९॥ अतर्त्वत्पाद भक्तेषु तव भक्तिः श्रियोऽधिका। मक्तिमेवामिवाञ्छन्ति त्वङ्कक्ता।सारवेदिन।२०। ' अतस्त्वत्पादकमले भक्तिरेव सदाऽस्तु मे । संसारामयतप्तानां भेषजं भक्तिरेव ते ॥२१॥ इति घुवन्ते ब्रह्माणं बभाषे भगवान्‌ हारिः । “कि करोमीति त वेधाः प्रत्युवाचातिहर्षितः ॥२२॥ भगवन्‌ रांवणो नाम पोलस्त्यतनयो महान्‌ । राक्षसानामधिपतिमेद्तवरद्ितः ॥२३॥ त्रिलोकीं लोकपालाश्च वाधते विश्ववाधकः । माञुपेण मृतिस्तस्य मया कल्याण कल्पिता ॥ अतस्त्वं माजुपो भूत्वा जहि देवरिपु प्रभो ॥२४॥ श्रीभगवानुवाच De he कइयपस्य बरो दत्तसपसा तोषितेन मे॥२५॥ “याचितः पुत्रभावाय तथेत्यङ्गीकृतं मया । स इदानीं दशरथो भूत्वा तिष्ठति भूतले ॥२६॥ तस्याहं पुत्रतामेत्य कौसल्यायां शुभे दिने । चतुर्थात्मानमेवाहं सृजामीतरयोः एथक्‌ ॥२७॥ योगमायापि सीतेति जनकस्य शृहे तदा । उत्पर्स्यते तया सार्धे सर्वे सम्पादयाम्यहम्‌ ॥ जन जिनका निरन्तर अपने हृदयमें ध्यान करते हैं ऐसे आपके चरण-कमलोंका आज मैंने अपने अन्तःकरणके दोषोंका तत्क्षण नाश करनेके लिये दर्शन किया है ॥ १७ ॥ आपके इन चरण-कमलोंका पहले भी हम ब्रह्मा आदि देवगणने अपनी सार्थ-सिद्विके लिये सेवन किया है और ज्ञानी सुनिजनोंने अपरोक्षानुभवके ल्यि अपने हृदयमें निरन्तर ध्यान किया है ॥ १८॥ हे विमो ! लक्ष्मीजी आपके वक्षःस्थल्में स्थान पाकर भी आपकी चरणपूजाके समय चढ़ी हुई तुळसीकी मालासे सौतकी तरह डाह करती हैं ॥ १९ ॥ आपके चरण-कमळोंमें ग्रेम रखनेवाळे भक्तोंमे आपका प्रेम छक्ष्मीजीसे भी बढ़कर है | इसलिये आपके सारग्राही भक्तजन केवळ आपकी भक्तिकी ही इच्छा करते हैं ॥ २०॥ अतएव हे देव ! आपके चरण-कमळोंमें मेरी सर्वदा भक्ति रहे क्योंकि संसार-रोगके रोगियोंके लिये आपकी भक्ति ही एकमात्र औषध है ॥ २१ ॥ इस प्रकार स्तुति करते हुए ब्रह्मासे भगवान्‌ हरिने कहा, “मैं तुम्हारा क्या कार्य कख?” तब ब्रह्माने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे कहा || २२ ॥ “भगवन्‌ | पुलस्त्य- नन्दन विश्रवाका पुत्र रावण राक्षसोंका राजा है । बह मेरे वरके प्रभावसे अत्यन्त अभिमानी हो गया है ॥२३॥ वह सम्पूर्णं विश्वका बाधक तीनों छोकों और लोक- पालेको पीड़ा पहुँचाता है | हे कल्याणरूप ! मैंने उसकी मृत्यु मनुष्यके हाथ रखी हे | इसलिये हे प्रभो! आप मनुष्य-रूप धारणकर उस देवशन्नुका बध कीजिये” ॥२४॥ श्रीभगवान बोळे-मैंने कश्यपकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर उन्हें वर दिया था । उन्होंने मुझसे पुत्ररूपसे उत्पन्न होनेकी प्रार्थना की थी, तब मैंने 'बहुत अच्छा? कह उसे खीकार कर लिया था । इस समय वे प्रथिवीपर राजा दशरथ होकर विद्यमान हैं।।२५-२६॥उन्हींके यहाँ पुत्ररूपसे प्रथक-प्रथक चार अंशोंमें प्रकट होकर मैं शुम दिनमें कौशल्याके और अन्य दो माताओंके गमसे जन्म दँगा॥ २७ ॥ उसी समय मेरी योगमाया भी जनकजीके घरमें सीतारूपसे उत्पन्न होगी; उसको साथ लेकर मैं तुम्हारा सम्पूर्ण कार्य सिद्ध करूँगा । ऐसा कह भगवान्‌ विष्णु अन्तर्धान हो गये; तब ब्र्माजीने इतयुक्त्याऽन्तरदथे विष्णुरजक्या देवानथाजवीत॥२८!॥ देवताओंसे कहा ॥ २८॥ ११ अध्यात्मरामायण [ सभ ३ बोवा ब्रह्माजी भान न रुम मञ्च । अविष्यति दि अवतार लेंगे | | तुम छोग भी सव अपने-अपने विध्यर्मानुपकपेणे भविष्यति रथोः इले ॥२९॥ Me उनको तमा तक रवि यूथ सृज्यं सऽपि वानरेष्वंशसम्मवाच्‌ | भगवान्‌ भूलोकमें रहें तबतक उनकी सहायता करते विष्णो सहायं रुतं यांवत्खास्याति भूतले ॥३०॥ रहो ॥२९-२०॥ इस प्रकार देवताओंको आज्ञा दे इति देवान्समादिश्य समाश्वास्य च मेदिनीम्‌। और पृथिबौको ढाढस बेधा ब्रह्माजी अपने ठोके $ ययो बरह्मा स्वमवर्न विज्वरः सुखमाखिता ॥३ १॥ | चे गये और बहा निश्चिन्त होकर एलमूर्वक रहने देवाश्च सेवे हरिरुवघारिणः लगे ॥ ३१ || इधर समश्च देवगण पर्वत और बक्षीस खिताः संहायार्थमितक्षतो हरे! । लड़नेवाले महाबल्यान्‌ वानरोंका रूप धारण कर महाबलाः प्वतशवक्षयो धिनः भगत्रानुकी सहायताके लिये उनका प्रतीक्षा करते रतीक्षमाणा मगवन्तमीश्वरम्‌ ॥१२॥| इए जहाँ-तहाँ रहने छगे ॥ १२ ॥ कटक .. इति श्रीमदथ्यात्मरामायणे उमामहेरवरसंवादे बालकाण्डे द्वितीयः सगः | २॥ तृतीय सर्ग भगवानका जन्म और वाळलीला श्रीमहाद्व उवाच | श्रीमहादेवजी चोळे-एक चार सवाळलोकप्रपिद्ध अंथ राजा दशरथ! श्रीमान्सत्यपरायणः। | सत्परायण श्रीमान्‌ अयोष्यापति वारर महाराज अयोध्याधिपतिवीरः सर्वलोकेषु विश्चतः ॥ १॥।| दरपन पुत्रके न न जो: 5:खित हो अपने तोऽन पीडितो गरो कुलक आचाय गुरुवर वशिष्ठजीको बुला उन्हें प्रणाम कर ' व्नपत्यत्वदुःसेन | शि । | इस प्रकार कहा ॥ १-२ ॥ “वामन्‌ ! यह वताऱ्ये पति = सङ्ठाचायमभिवाचेदंमन्रवीत्‌॥ २॥ | कि त पुटक्षणोसे सम्पन्न पुत्र किस ग्रकार हो स्थामिन्युत्राः कथं मे स्थुः सर्वलक्षणलक्षिताः) सकते हैं क्योंकि विना पुत्रके यह सम्पूर्ण राज्य मुझे ` पुत्रहीनस्य मे राज्यं सर्वे दुःखाय करपते ॥३॥ | दुःखरूप हो रहा है? ॥ ३ ॥ ततोब्जवीद्वसिष्ठर भविष्यन्ति सुतास्तव । तच राजा दडारथसे वशिष्ठजीने कहा-“तुम्हारे चत्वार सत्चसम्पन्ना लोकपाला इतरापरा; ॥ 9॥ | साक्षात. दसरे छोकपालेंके समान अत्यन्त सामर्थ्यवान्‌ सानी चार पुत्र होंगे ॥ ४ | तुम शान्ताके पति तपोधन hi म्यङ्ग तपोधनम्‌ । = | क्रष्पश्वंग* को घुलाकर शोत्र ही हमें साथ लेकर _ अस्माभिः सहितः सुतरकामा्ट शीप्रमाचर ॥ ५॥ | पत्ेष्टियज्ञका चाय | यका भ्न करो ५॥ | करो” |] ५॥ सर रे ] टाटा VV 1 VV TTT धालेकाण्डं १३ तथेति मुनिमानीय मन्त्रिभिः सहित! शुंचिः । यकम संमारेसे पनिभिंवीतकरमषेंः ॥६॥ श्रद्यया हूयमानेञ्यो तप्तजाम्बूनदप्रभः । पसं स्वणपात्रस्थ शृहैत्वोवाच हव्यवाट ॥७॥ गृहाण पायसं दिव्य पुत्रीयं देवनिमितम्‌ । लप्स्यसे परमात्मानं पुत्रत्वेन न संशयः॥ ८॥ इत्युक्त्वा पायसं दर्वा राशे सोऽन्तदेघेऽनलः। चभन्दे सनिशादूली राजा लब्धमनोरथः ॥ ९। व॑सिष्ठण्यभृङ्गास्यामलुज्ञातो ददौ हृविः । कोसल्याये सफेकेय्ये अ्ैमर्ध प्रयत्नतः ॥१०॥ ततः सुमित्रा संप्राप्ता जग ध्लु। पौत्रि चरुम्‌ । -) कोसल्या तु स्वमागाधें ददौ तस्ये मुदान्विता । ११) कैकेयी च स्वभागार्ध ददौ प्रीतिसंमन्बितां । उपशुज्य चरं सर्वाः त्रियो गर्भसमन्विताः ॥१२॥ देवता इंचं रेजुस्ताः खभासा राजमन्दिरे । दशमे मासि कौसल्या सुपुवे पुत्रमद्भुतम ॥१३॥ मधुमासे सिते पक्षे नवम्यां कर्कटे थुभे । पुनर्वस्तरक्षपहिते उच्चस्थे ग्रहपश्वके॥१४॥ मेपं पूषणि संग्रांप्ते पुष्पत्रष्टिसमाङुले । ` आविरासीजजगन्नाथः परमात्मा सनातनः ॥१५॥ नीलोत्पलदलइ्याम! पीतवासाश्चतुर्शुजः । ४८१८४/४०% ४-५९५०४५० ५.७० वन ५०६०५ ७७.०९७ ०७.७९ ७५९ ७०९७१४. ५७० ९१७७ ७७४७0. ४.१/०७ ५८९५ ७३ ७९.०८ ७ ९.० ७.४ ७७० ७.० ४७७७०७७६७० ५०५ ७७७७७०. ७७७७ ४७० व कर कक कक कक का राजाने “बहुंत अच्छा” कह मुमिधर ऋष्यश्रंगकी - बुलाया और मन्त्रियोंके सहित पबित्र होकर निष्पाप सुनिजनोंकी सहांयतांसे यङ्गानुष्टांन आरम्भ किया ॥ ६ || यज्ञानुष्ठानके समय अभिमें श्रद्धापूर्वक आहुति देनेपर तप्त सुवणके समानं दीतिमान्‌ हव्यवाहन भंगबरान्‌ अग्नि एक स्वर्णपात्रमें पायस लेकर प्रकट हुए और बोळे ॥ ७॥ “हे राजन्‌ ! यह देवताओंकी बनायी हुई पुत्र- प्रदायिनी दिव्य पायस (खीर) ढो । इसके द्वारा तुम निस्सन्देह साक्षात्‌ परमात्माको पुत्ररूपसे प्राप्त करोगे” ॥ ८ ॥ अप्निदेव ऐसा कहकर और वह खीर राजाको देकर अन्तर्धान हो गये । तदनन्तर राजाने सफल-मनोरथ हो मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ और क्र्ष्यश्वक्ुकी चरण-वन्दना की और उन दोनोंकी आज्ञासे बड़ी सावधानीके साथ वह हवि महारानी कोसल्या और कैकेयीमें आधी-आधी बॉट दी॥ ९-१० ॥ तद॑नन्तर उस पुत्र देनेवाले चरुको ढेनेकी इच्छासे सुमित्राजी भी वहाँ आ पहुँचीं। इसपर कौसल्याजीने प्रसन्नतापूर्वक अपने भागमेंसे आधा उन्हें दे दिया ॥११॥ तथा कैकेयीने भी ग्रीतिपूर्वेकं अपने भागमेंसे आधा सुसित्राको दिया । इस प्रकार उस हृविको खाकर सभी रानियाँ गर्भवती हो गयीं ॥ १२ ॥ वे तीनों रानियाँ उस राजमवनमें अपनी कान्तिसे देवताओंके समांन शोभा पाने छगीं। फिरं दरवा महीना लगनेपर कोसल्याने एक अदूभुत बाळकको जन्म दिया ॥ १३ ॥ चैत्रमासके झुक्-पक्षकी नवमीके दिन कर्क-छग्नमे पुनर्वसु-नक्षत्रके समयं जब कि पाँच ग्रह उच्च स्थानमें तथा सूर्यं मेषराशिपर थे तब (मध्याह-काल्मे)सनांतन परमात्मा जगन्नाथका आंविभीव हुआ । उस समय आकाश दिव्य पुष्पोंकी वर्षे पूर्ण हो गया ॥ १४-१५ ॥ जो नीछकमळदळके समान शयामवर्ण हैं, पीताम्बर पहिने हुए हैं और चार मुजाएँ जलजारुणनेत्रान्तः स्फुरत्कुण्डंल्मण्डितः॥१६॥ | धारण किये हैं तथा जिनके नेत्रोंके भीतरका भाग अरुण fe मुनियोनि अद्वनरेश रोमपादसे कहा, यदि वाढबहाचारी ऋप्यश्गको यहाँ खियाँ छाचें तो सृष्टि हो । राजाने इसके किये घेउयाओंको नियुक्त किया । उनमेंसे एक ्रह्मचारीका वेष बनाकर उन्ह मोहित कर ले आयी । उनके अङ्गदेशमें आते ही पुष्कळ वर्षां हो गयी । राजाने उनका ऐसा को गोट दे दिया था। ` ' अद्भुत प्रभाव देखकर उन्हें अपनी कन्या षान्ता विवा दीं । कहीं-कहीं ऐसा भी कहा जाता है कि यह शान्तां महारांज दृशरथकी पुत्री थी और इन्होंने इसे अपने भिन्न रोमपाद- ded cd १ क. -. ६ तः १४ | अध्यात्मरामायण [सर्ग ३ ROSES दिये लि लि सफप्फय सहया ह आटहलोचिकेद लीक पश अमर pep pNP भा ती कमछके समान शोभायमान है, कानोंमें कान्तिमान्‌ कुणडल सुशोमित हैं ॥ १६॥ हजारों सूर्योके समान जिनका प्रकाश है, जिनके शिरपर प्रकाशमान मुकुट और धुँधुराली अळकें हैं,हाथोमे दां, चक्र,गदा और पदम तथा अलुग्रह्ज्यहत्स्थेन्दुस्चकसितचन्द्रिक! । गमे बैजयन्ती-माठा विराजमान हैं ॥ १७॥ जिनके पंविशालोत्पललोचनः मुख-कमछपर हदयस अनुप्रहरूप चन्द्रमा सूचना करुणारससम्पूणविशालात्परलॉचनः । देनेवाळी सुसकानरूप चन्द्रिका छिटक रही हैं, जिनके iy = ws ल करुणा-रस-पूर्ण नयन कमलदछके समान बिद्याळ ई गीवर कप $ } ~» र क स > श्रीवत्सहारकेयूरचूपुरादिविभूषण ॥१८॥ | «जो श्रीवत्स, हार, केयर और नू पुर आदि आभूप्रणोमि विभूपित हैं ॥ १ ८॥ पुत्ररूपसे प्रकट हुए उन परमाःमाको! देखकर कोसल्याने विस्मयसे व्याङुळ हो,नेत्रेम आनन्दाथु- हर्षाश्षपूर्णनयना नत्वा प्राक्ञलिरखवीत्‌ ॥१९॥ | भर, हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए कहा ॥१९॥ कोतल्योवाच श्रीकोसल्याजी बोलीं-है देवदेव ! आपको > _ नमस्कार है; हे शंख-चक्र-गदा-धर ! आप अच्युत आर शङ्कचक्रमदा »: -_ देवदेव नमस्वेञ्स्तु शङ्कचक्रगदाधर । अनन्त परमात्मा हैँ तथा सर्वत्र पूर्ण पुरुपीत्तम £ ॥२०॥ = ७__ ७ वेदवार्द _ आ. ~ . रि परमात्माऽ्च्युतोऽनन्तः पूर्णस्त्यं पुरुपोत्तसः॥।२०॥ | वेदवादागण आपको मन और वाणी आदिके अविपय शि व तथा इन्द्रियोंसे अतीत सत्तामात्र और एकमात्र शानः चदन्त्यगो दूचादीनामतीरिद्रियस्‌ खप न १. कक मक वदन्लनाचर वाचा उद्धाद न । | सर्प बताते हैं ॥ २१॥ आप ही अपनी मायाके त्वां वेदवादिनः सत्तामात्रं ज्ञानिकविग्रहम्‌ ॥२१॥| | आश्चयसे सत्व, रज और तम-उन तीनों युणोसे युक्त ` _ विक सिहर होकर इस विश्वकी रचना, पाठन और संहार करते ६ त्वयमेव मायया विखे सुजस्यवसि हंसि च । {तथापि बाखत्रमे आप सदा निर्मळ तुराय पदम सस्वादिशुगसंयुकतसतुर्यं एवामलः सदा ॥२२॥ | सित हे ॥ २२ ॥ आप कत्ता नही टे तयापि करते-से ne ¢ _+ a हर प्रतीत होते हैं, चलते नहीं हे फिर भी चठतें-से माळूम कराषीव न कता त्वं गच्छसाव ने गच्छसि । | पडते हैं, न सुनते हुए भी सुनते-से दिन्या देते ह | और न देखकर भा देखते हुए-से ग्रतीत होते हैं ॥२३॥ भृणोषि न शृणोषीव पश्यसीव न पश्यति ॥२३॥ | दि है 1 | भगवती श्रुति भी कहती है कि आप प्राण और मनसे अग्राणा बना; शुद्ध इत्यादि श्ातिरत्रवीतू | , रहित तथा शुद्र' हैं 1 आप समस्त प्राणियों रामान- | भावसे स्थित हैँ, तथापि जिनका अन्तःकरण अज्ञानान्ध- कारसे टेका हुआ हैं उन्हें आप दिखायी नहीं देते, अज्ञानध्वान्तचिचानां व्यक्त एव सुमेधसाम्‌। | आपका साक्षात्कार सुबुद्धि पुरुपोंको ही होता हैं । दि हे भगवन्‌ | आपके उदरमें अनेकों ब्रह्माण्ड परमाणओंके जठरे तब इञयन्ते बह्माण्डाः परमाणवः ॥२५॥ | ` र याक क परमाणवः ॥२५॥ | समान दिखलायी देते हैं तथापि “आपने मेरे पेटसे त्ये ममोदरसम्थूत इति लोकान्बिडम्वसे। | जन्म छिया’ ऐसा जो आप ठेगोंमें प्रकट कर रहे हैं जय इससे मैंने आज आपकी भक्त-वत्सल्ता देख ली || २४-- सक्तेषु पारवश्यं ते इष्टं मेद्य रघू Pe त दष्ट म्य रघूत्तम ॥२६॥ | २६ ॥ हे प्रभो ! मैं आपकी मायासे मोहित होकर ५ कह > र-सागरमें ० ~ ऱ संसारसागरे मधा पतिपुत्रधनादिपु | स्स डूवी हुई पति, पुत्र और धन आदिके रमें पड रही थी; आज परम सोमाग्यवश आपके भमामि मायया तेज्यय पादमूल लोकी दारणे व्ह तेऽ्य मुपागता ॥२७॥| चरण-कमलोकी शरणमे आयी हँ ॥ २७॥ हे देव! सहत्तार्कम्रतीफ्राशः किरीटी कुश्वितालकः । शहुचक्रगदापद्मवनमालाविराजितः ॥१७॥ दृष्टा तं परमात्मानं कौसल्या विसयाकुला । समः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्नपि न लक्ष्यसे ॥२४॥ सर्ग ३] | बालकाण्ड १५ य्य्म््ण्य्ण्य्य्ण्प्प्प्ण्प्प्प्प्ण्प्प्प्क्फ्क्क्क्क्स्ट्--2222222---------.---...................... देव रवडूपमेतन्मे सदा तिष्ठतु मानसे । | आपकी यह मनोहर मूर्ति सदा मेरे हृदयमें विराजमान आइणोतु न मां माया तव विश्वविभोहिनी ॥२८ रहे और आपकी विश्व-विमोहिनी माया मुझे न व्यापे ह ठु व है विश्ववि [॥२ढा,२८॥ हे विश्वात्मन्‌ । अपने इस अलौकिक रूपका उपसहर विश्वात्मन्नदो रूपमलोकिकम्‌ |. | उपसंहार कीजिये और परम आनन्ददायक सुकोमळ ' 0 ह र बालरूप धारण कीजिये जिसके अति सुखद आलिंगन शेयख महानन्द | द्‌ हि हे ५ वालभात्र इुकामलम्‌ ॥ और सम्भाषणादिसे मैं घोर अज्ञानान्धकारकों पार कर * ललितालिङ्गनालापैसरिष्याम्युत्कटं तमः ॥२९॥॥ जाऊँगी ॥ २९॥ श्रीमगवानुवाच हे श्रीभगवान बोळे-हे मातः | आप जो-जो चाहती दिए | रर हैं वही हो, उसके विरुद्ध कुछ भी न हो । पूर्वकाठमें यद्यादृष्ट तवास्त्यस्व तत्तद्धवतु नान्यथा ॥३०॥ | मुझसे पुथिवीका भार उतारनेके लिये ब्रह्माने प्रार्थना अहं तु ब्रह्मणा पूर्वं भूमेभारापनुत्तये । की थी, अतः रावणादि निशाचरोंको मारनेके लिये ही _ मैने मनुष्यरूपसे अवतार लिया है ॥ २०-३१ ॥ हे ण्‌ हर $ a ्राथितो गा र | हन्तु माजुपत्वयुपागतः ॥२१॥ अनिन्दिते | दशरथजीके सहित तुमने भी मुझे पुत्ररूप- त्वया दशरथेनाहं तपसाऽऽराधितः पुरा। से प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्या करते हुए मेरी आराधना मत्युत्रत्वाभिकाद्विण्या तथा कृतमनिन्दिते ॥३२॥ कौ भी । उसीको मैंने इस समय प्रकट होकर पूर्ण शि किया है ॥३२॥ तुमने अपनी पूर्व तपस्याके फलसे ही रुपमेतत्तया दृष्ट प्राक्तनं तपसः फलम्‌ । मेरा यह दिव्य रूप देखा है | मेरा दर्शन मोक्ष-पद ` महदशनं विमोक्षाय करपते हन्यदुलेभम्‌ ॥३३॥| देनेवाला ता पुण्यहीन जनोंके लिये इसका दर्शन “ सैवादमावयोर्यस्तु पेर अत्यन्त दुछेम है ॥१३॥ जो व्यक्ति हमारे इस संवादको सादना ठ्ठा शृशुयादपि । पढ़ेगा या सुनेगा वह मेरी सारूप्य मुक्ति (समानरूपता) स याति मम सारूप्य मरणे मत्स्मृतिं र भेत्‌ ॥३४॥॥ प्राप्त करेगा और मरणकालमें उसे मेरा स्मरण रहेगा ३४॥ इत्युक्तवा मातरं रामो वालो भूत्वा रुरोद ह । मातासे इस प्रकार कह भगवान्‌ बाळरूप होकर वाठत्वेडपीर र _ = __ „| रोने लगे | उनका वाळरूप भी इन्द्रनीलमणिके समान तवेऽपीन्द्रनीलामो विशालाक्षोऽतिसुन्दरः ३५ यामव, बड़े-बड़े नेत्रोंबाळा और अति हुन्दर था वालारुणप्रतीकाशो लालिताखिललोकपः । ॥२५॥ वह प्रभातकालीन बालमूर्यके समान अरुण- हि ज्योतिर्मय था । भगवानूने अवतरित होकर उस अथ राजा दशरथः शरुत्वा पुत्रोद्भवोत्सवम्‌ । सुमनोहर बाळरूपसे सभी छोकपाछोको परम आनन्दित TR TR = कर दिया । तत्पश्चात्‌ जब महाराज दशारथजीने पुत्रोत्पत्ति- आनन्दाणचमग्नोऽसावाययो शुरुणा सह ॥२६॥ का झुभ समाचार सुना तो वे मानो आनन्दः समु दब रामं राजीवपत्राक्षं दृष्टा हर्पाश्रुसंप्लतः । गये और गुरु बरिष्ठजीके साथ राजभवनमें आये ॥३६॥ .. 6 वहाँ आकर कमलनयन रामको देखकर वे आनन्दाश्रुओं- गुरुणा जातकर्माणि कर्तैव्यानि चकार सः ॥३७॥ हे पूर्ण हो गये और गुरुजीद्वारा उनके जातकर्म आदि. ज्य द आवश्यक संस्कार कराये ॥३७॥ तदनन्तर कमळनयनी ककल ल bn कलक | कैकेयीसे भरतका जन्म हुआ और सुमित्रासे पूर्णचन्द्रके सुमित्रायां यमा जाता पूर्णन्दुसच्शानना ॥२८॥ | समान मुखवाले दो यमज नाक उत्पन्न इर ॥३५। गेभ्यो मुद जे उस समय महाराज दशरथने अति उत्साहपूवेक सहलो तदा ग्रामसहखाणि माझणमभ्या मुदा ददू! इ ग्राम, बहुत-सा सुवर्ण, अनेक रत्न, नाना प्रकारके वस्न सुवर्णानि च रत्तानि वासांसि सुरभीः शुभाः ॥२९॥| और छुमठक्षणोंवाळी अनेकों गोए ब्राह्मणोंको दी ॥३९॥ wet eons nore eee ns er eee a ws ww पट कट चा >। rue व घट चट यस्मिन्‌ रमन्ते युनयो विधययाऽ्ञानाविष्लष । तं गुरः ग्राह रामेति रमणाद्राम इत्यपि ॥४० भरणाङ्करतो नाम लक्ष्मणं लक्षणान्वितम्‌ | श्रुतं शत्रुहन्तारमेवे गुरुरभाषत ॥४१॥ लक्ष्मणो रामचन्द्रेण शत्रुभो भरतेन च । इल्द्रीभूय चरन्तौ तौ पायसांशानुसारतः ॥४२॥ रामस्तु लक्ष्मणेनाथ विचरन्वाङलीरया । ` इमग्ामास पितरो चेष्टितैप्घरभापिते! ॥४२॥ भाले स्वर्णमयाश्वत्थपर्णसुक्ताफलप्रमम्‌। कण्ठे रल्लमणित्रातमध्यद्वीपिनखाञ्चितम्‌ ॥४४॥ व [५ कर्णयोः सर्णसम्पन्नरत्राचुनसटालकम्‌ । शिञ्ानमणिमञ्जीरकरिद्ाङ्गदैतस्‌ ॥४५॥ स्मितवक्त्रारपदशनमिन्द्रनीलमणित्रमम्‌ | अङ्गणे रिङ्गमाणं तं तर्णकाननु सर्वतः ॥४६॥ दृष्टा दशरथो राजा कोसल्या मुझुदे तदा । सोक्ष्यमाणो दशरथो राममेहीति चासकृत्‌ ॥४७॥ आह्वयत्यतिहषेण प्रेम्णा नायाति लीलया | आनयेति च कोसल्यामाइ सा सस्मिता सुतम्‌।४८। धावत्मपि न शक्रोति स्पष्ट योगिसनोगतिम्‌। ग्हसन्खयमायाति कदमाङ्कितपाणिना ॥४९॥ किखिद्गृहीत्वा कवलं पुनरेव पलायते । कौसल्या जननी तस्य मासि माति प्रडुर्वती ॥ ५०) वायतताति विचित्राणि समछङ्कृत्य राधचम्न्‌ । ` अध्यात्सरामायण ror क set sre ed ee ~ विज्ञानके द्वारा अज्ञानके नष्ट हो जानेपर मुनिजन जिनमें रमण करते हैं अथवा जो अपनी झुन्दर्तास भक्त- जनोंके चित्तोंकी रमाते (आनन्दमग्न करत ) ह. उनका नाम गुरु वशिष्टजीने राम' रखा ॥४०॥ इसा प्रकार गुरुजीचे, संसारका पोषण वरनचाळा हानस दुसर पत्रका नाम भरता, समस्त सुल्यण-समग्पत्त हानिस तीसरेका नाम 'लक्ष्मण' और दाच्आका घातक टोन चौथे पत्रका नाम शत्रन्ना रखा ॥४१॥ कोसल्या और कैकेयीके दिये हुए पायसशिकि अनुसार लद््मशर्जी रामचन्द्रजीके और इात्रप्रजी भरतजीक जाडोदार टकर रहने ढगे ॥ ४२॥ लक्ष्मणजीके साथ विचरते इए श्रीरामचन्द्रजी अपनी बाळ-्छीलाओआं, चफ्ताओं आर मोळी-भाळी वातोंसि माता-पिताकी आनन्दित कान छगं ॥ ४३ ॥ जिसके छळाटपर मोतियोंसे सजाया हुआ द्रेटाप्प- मान सुवर्णमय अझ्चत्थपत्र ( पीपलका पत्ता ) तथा गलेमें रत्न और मणिसमृहके साथ वीच-वीचर्म व्याधनल सजाकर शुँधी हई छड़ियाँ सुशोगित हैं ॥ 9४ ॥ कानोमें अर्जुनवृक्षके कचे पलोके समान रजदित . ुवर्णके आभूषण लटक रहे हैं, तथा जो घनकारते हुए मणिमय नूपुर सुवर्णमेखळा और वाञुनन्दरस विभूषित हैं ॥ ४५ उस इन्द्रनीळमणिकी-सी आभावाळे तथा स्वल्प दाँतोंसे युक्त मुसकाते हुए सुखवाल चालकका राजभवरनच ऑगनमें वछडेके पीछे-पीछे सव ओर बाल्गतिसे दीदने देख महाराज दशरथ और माता कोसल्या अति आनन्दित होते थे जिस समय महाराज भोजन करने बैठते तो राम ! आ' पेसा कह-कहकर अति हर्य और अमपूर्वक उन्ह वारम्वार घुलात। जब झेल लगे रहनेके कारण वे न आते तो वे कोसल्यासे इसे पकड़ छा! ऐसा कहकर उन्हें ढनेके डिये कहते । किन्तु जो योगिनो चित्तके एकमात्र आश्रय हैं ऐसे पृत्र॒को कोसल्याजी हसकर दोइती हुई भी न पकड पाती । (उस समय माताको थकी देखकर ) वे खयं ही कौचमें सने हुए हार्थोसे हॅसते-हँसते वहाँ आ जाते और एक-आध मास खाकर हो फिर भाग जाते ॥ ४६-४९ ॥ माता कोसल्या रामको भली प्रकार वस्ताभूपण पहिनाकर प्रतिमास व्यञ्जन वनातीं और वर्ष छगनेपर पूआ, सर्ग ३] . बालकाण्ड १७ ०-५-2. ४-५-५ RRR अपूपान्मोदकान्कुर्वा कर्णशण्कुलिकातथा। | ढडडू, पूरी, कचौड़ी आदि विविध व्यञ्जन बनाकर 4 FN (३ आ हि ! कर्णपूरांश्व विविधान वषेवद्धी च वायनम्‌ ॥५१॥ | (्ह्ण-मोजनादि) द्वारा उत्सव मनाती थीं | ५०-५१॥ - गृहकृत्य तया त्यक्तं तस्य चापल्यकारणात्‌। रामकी चपलताके कारण कोसल्याने धरका काम NL 6, ८ पास गये ॥ ५२॥ और कहा---“माता | मुझे कुछ है मीजन देहि मे मातने शरुतं कार्यसक्तया। | खनेकों दे ।” किन्तु काममें लगी होनेसे तने न ` ततः क्रोधेन भाण्डानि ठगुडेनाहनत्तदा ॥५१॥ सुना । तब क्रोधित होकर उन्होंने डण्डेसे सब शिक्यसं पातयामास गव्यं च नवनीतकम्‌ | | ऽग फोड डाले | १३ ॥ तथा छौकेपर रखे हुए Re गोरस और माखनको गिरा लिया और उसे तथा लक्ष्मणाय ददौ रामो भरताय यथाक्रमम्‌ ॥५४।।| वहाँ रखे इए समस्त दूध-दहीको भी क्रमशः लक्ष्मण, शङडुघ्ाय ददो पश्चाद्दधि द्ग्धं तथेब च ¦ भरत और शत्रुघवको बॉट दिया | तब रसोइ्येने जाकर .. .. . र माता कोसल्यासे कहा । वह हँसती हुई पकडनेको सूदन कार्थेत सान हास्य कृत्वा प्रधावांत ॥९५॥ दोड़ीं ॥ ५४-५५ || माताको आती देखकर घे सब आंगतां तां विलोक्याथ ततः सर्वेः पलायितम्‌। i भाग गये । माता कौसल्या भी उनके पीछे कन्तु पग- गो कौसल्या घावमानापि प्रस्खलन्ती पदे पदे ॥५६॥ | ५. hes हि hi ड कहा इ रघुनाथं करे धृत्वा किञ्चिन्नोवाच भामिनी । | भी नहीं । उस समय रामजी बाल्मावसे धीरे- _ ब्राङभावं समाश्रित्य मन्दं मन्दं रुरोद ह ॥५७॥ | शरे रोने को ॥ ५७॥ तब न सबको भयभीत _ i देखकर माताने उन्हें बड़े प्रेमसे हृदय छगाकर ते सर्वे लालिता मात्रा गाढमािङ्गथ यल्तः। प्यार किया । इस प्रकार जगदानन्दकारक आनन्द- एचमानन्दसन्दोहजगदानन्दकारकः ॥५८॥।| थन भगवान्‌ राम मायामय बाळरूप धारणकर राज- ९ दम्पति दशरथ और कोसल्याको आनन्दित करने मायावालवपुरत्वा रमयासात दम्पती । लगे । तदुपरान्त कुछ काळ बीतनेपर उन चारों अथ कालेन ते सर्वे कोमारं प्रतिपेदिरे ॥५९॥। | भाइयोंने कोमार-अवस्थामें प्रवेश किया ॥-५८-५९ ॥ उपनीता वसिप्ठेन सर्वविद्याविशारदा! । तब वसिष्ठजीने उनका उपनयन-संस्कार ~ ह I वर किया और छीछासे ही नररूप धारण करनेवाले धजु्येदे च निरताः सर्वशास्रार्थवेदिनः ॥६०॥ सम्पूर्ण छोकोंके स्वामी (चारों भाई) समस्त ९ ५ शाख्नोंक्रा मर्म जाननेवाले तथा धनुर्वेद आदि _ बभूदुजगता नाथा लाल्या नररापंणः | सम्पूर्ण विद्याओके पारगामी हो गये। उन सब लक्ष्मणस्तु सदा राममनुगच्छति दरम्‌ ॥६१॥ भाइयोंमें लक्ष्मणजी सेव्य-सेवक-मावसे आदरपूर्वक सदा रामचन्द्रजीका अनुगमन करते थे और उसी सेव्यपेवकभावेन श्लो भरतं तथा। प्रकार इत्रुप्रजी सदा भरतजीकी सेवामें उपस्थित रहते थे । भगवान्‌ राम नित्यप्रति छक्ष्मणजीके सहित रामश्चापधरो नित्यं तूर्णावाणान्तितः ब्र्चः ॥६२॥ | नुप, बाण और तरकर धारणकर धोडेपर सवार हो मृगयाके लिये वनको जाते और वहाँ दुष्ट ` | मृगोंको मारकर उन सबको पिताजीके अर्पण हुत्वा दुष्टमगान्सवोन्पित्रे सवे ` न्यवेदयत्‌ ॥६२। कर देते ॥ ६०-६३ || प्रातःकाळ उठकर खान 3, अश्वारूढो वनं याति सृगयाये सलक्ष्मणः । ि ब्र १८ अध्यात्मरामायण , [सर्ग ४ IIT कि नस स् सम स भाप पसससप्प््न्न्न्प्प्प्स्प्प्स्स्सस्स्स्स्प्स््स्स्र sar प्रातरुत्थाय सुखात! पितरावभित्राद्य च्च | करनेके अनन्तर घे माता-पिताको ग्रणाम करते और Ls © मद नम्रतापूवक नगर-निवासियोक्रे समस्त काये जु (णि सर्वाणि करोति विनयान्वित/॥९४॥ फिर नम्रः सगरः य पोरकायाणि सर्वाणि करोति विनयान्वितः।६ करते ॥ ६9 ॥ पिर भाइयोंसहित भोजन करके बन्धुभिः सहितो नित्यं थकता हुनिमिरन्बहम्‌। . नित्यप्रति मुनिजनोसे धर्मशाल्रोंका मर्म सुनते और धर्मशास्तरहसानि शृणोति व्याकरोति च ॥६५॥ | दयं भी उनकी व्याख्या करते ॥ ६० ॥ एवं परात्मा मनुजावतारो इस प्रकार अविकारी और परिणामहीन परमात्मा मनुष्यलोकानचुसृत्य सर्थम्‌। मनुष्यावतार लेकर मनुष्योंके आचरणका अनुगमन चक्रेऽविकारी परिणामहानो करते इए समस्त कार्य किये; पर विचार करके देखा Da हन विचार्यमाणे न करोति किश्वित्‌।९६॥ जाय तो वे कुछ भी नहीं करते ॥ ६६॥ इतिं आमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे वाळकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥ 6 चतुर्थ सर्ग चिश्वामिचजीका आगमन; राम और लक्ष्मणका उनके साथ जाना और तारकाका चध करना | श्रीमहादेव उवाच श्रीमदादेवजी वोळे--एक चार अग्निके समान तेजखी | महर्षि विश्वामित्र परमात्माको अपनी ही मायासे रामरूपमें कदाचित्काशिकोऽभ्यागादयोध्यां ज्वलनप्रभः । | प्रकट हुए जान उनके दर्शन करनेके छिये अवोध्या- द्र रामं परात्मानं जातं ज्ञात्वा खमायया ॥ १॥ | परमं आये ॥ १ ॥ उन्हें देखते ही महाराज दशरथ है हे तुरन्त उठ खड हुए और बसिष्टजीके सहित आगे दृष्टा दशरथो राजा ग्रत्युत्थायाचिरेण तु । आकर उनका खागत किया और यथाविधि पूजन वसिष्ठेन समागम्य पूजयित्वा यथाविधि ॥ २॥ | तया अभिवादन कर राजाने भक्ति-विनम्र-चित्तसे हाथ जोड़कर मुनिसे कहा--“हे झुनीन्द्र ! आपके अभिवाद्य मुनि राजा प्राञ्जलिमैक्तिनम्रघीः | आभागमनसे आज मैं कृतकृत्य हो गया ॥ २-३ ॥ कृताथोऽसि मुनीन्द्राह वदागमनकारणात्‌॥ ३॥ | जिस घरें आप-जैसे महालुभाव पधारते हैं उसमे है े है सभी सम्पत्तियाँ आ जाती हैं | अब आप यह चताइये त्वाद्वेधा यद्गृह यान्ति तत्रवायान्ति संपद | कि आपका शुभागमन किसलिये हुआ हैं. ! में आपसे मल पिच याशा सत्य कहता हूँ, में आपकी आज्ञाका पालन अवश्य यदथमागतोऽसि त्वं ब्रहि व र र द्‌ से त्यं बूहि सत्यं करोमि वत्‌ ॥ ४॥ |.” ॥ ४) विश्वामित्रोऽपि तं ग्रीतः ग्रत्युवाच महामतिः | तत्र महामति विश्वामित्रजीने उनसे कहा--“जब कभी अहं पथे संग्रात्ते ष्ठा यष्टु सुरान्पितृन्‌ ॥ ५॥ | पकाल उपस्थित हुआ देखकर मैं देव और पितृगणों- _ er के लिये यजन करना आरम्भ करता हैँ री यदाऽरमे तदा दैत्या विघ्नं कुर्वन्ति नित्यञ्ञः। करना आरम्भ करता हूँ तो सदा ही व हि है मारीच, सुबाहु और उनके अन्यान्य अनुयायी दैत्यगण माराचथ सुबाहुआपर चालुचरास्याः॥ ६॥ | उसमें विन्न डाळ देते हैं ॥ ५-६ ॥ अतएव उनका सगे ४] बालकाण्ड अतस्तयोवेधार्थाय ज्येष्ठं रामं प्रयच्छ मे । लक्ष्मणेन सह त्रा तब श्रेयो भविष्यति | ७॥ चसिष्ठेन सहामन्त्य दीयतां यदि रोचते । तच्छ गुरुभेकान्ते राजा चिन्तापरायणः ॥ ८। कि करोमि गुरो रामं त्यक्तुं नोत्सहते मनः । वहुवर्षसहस्रान्ते कटेनोत्पादिताः सुताः ॥ ९॥ चत्ारोऽमरतुल्यास्ते तेपां रामोऽतिवछुभः । रामरित्वतो गच्छति चेन्न जीवामि कथञ्चन ॥१०। प्रत्याख्यातो यदि मुनि! शापं दास्यत्यसंशयः। कथं भेयो भवेन्म्यमसर्यं चापि न स्पृशेत्‌ ॥११॥ वासिष्ठ उवाच i] राजन्देवशुह्यं गोपनीय प्रयत्नतः | रामो न माञुपो जात? परमात्मा सनातनः ॥१२॥ भूमेभारावताराय ब्रह्मणा प्रार्थितः पुरा । स एव जातो भवने कौसल्यायां तवानघ ॥१३॥ त्वं तु प्रजापतिः पूर्वे कदयपो ब्रह्मणः सुतः । कोसल्या चादितिदेवमाता पूर्वे यशखिनी । भवन्तो तप उग्रं घे तेपाथे बहुवत्सरम्‌ ॥१४) अग्राम्यविषयों विष्णुपूजाध्यानेकतत्परों | तदा ग्रसन्नो मगवान्बरदो भक्तवत्सलः ॥१५॥ वृणीष्त्र वरमित्युक्ते त्वं भे पुत्रो भवामर । इति त्वया याचितोऽसौ भगवान्भूतमावनः॥ १६) तथेत्युत्रत्वाऽञ्य पुत्रस्ते जातो रामः स एव हि) शेषस्तु लक्ष्मणो राजन्‌ राममेतान््रपद्यत ॥१७॥ जातौ भरतशतुधी शङ्खचके गदाभृतः । "४४४८४८ ४८५८७ १८९७०५७. जल, वध करनेके लिये तुम अपने बड़े पुत्र रामको भाई लक्ष्मणके सहित मुझे दो, इससे तुम्हारा भी परम कल्याण होगा ॥७॥ इस विषयमें वसिष्ठजीसे सम्मति करके यदि तुम्हारी इच्छा हो तो तुम सन्न दोनों कुमारोंको दे दो ।” तब राजाने चिन्ताकुछ होकर एकान्तमं गुरुजीसे पूछा ॥ ८ ॥ “हे गुरो ! सहस्तों वर्ष बीतनेपर बड़े कष्टसे मुझे ये देवताओंके सद्दा चार पुत्र मिले हें | इनमें राम मुझे बहुत ही प्रिय है, सो अब मैं क्या करूँ ! मेरा चित्त तो रामको छोड़नेके जिये तैयार नहीं है। यदि राम यहाँसे चछा जायगा तो मैं किसी प्रकार भी जी नहीं सकूँगा ॥ ९-१० ॥ परन्तु यदि मैं सूखा जवाब दूँ तो यह निश्चय है कि मुनि मुझे शाप दे देंगे | अतः अब यह बताइये कि मेरा हित किस प्रकार हो और मैं असत्य-भाषणसे भी कैसे बचूँ ?” | ११॥ वसिष्ठजी बोळे-राजन्‌ ! यह देवताओंकी गुह्य लीछा सुनो, इसे किसी प्रकार प्रकट न होने देना चाहिये । ये राम मनुष्य नहीं हैं साक्षात्‌ पुराण-पुरुष परमात्मा ही ( अपनी मायासे ) इस रूपमें प्रकट हुए हैं ॥ १२॥ हे अनघ ! पूर्वकाल्में एथिवीका भार उतारनेके लिये ब्रह्माजीने भगवानूसे प्रार्थना की थी, उसे पूर्ण करनेके लिये उन परमेश्वरे तुम्हारे यहाँ कोसल्या- के गर्मसे जन्म लिया है ॥ १९ ॥ पूर्वे जन्ममें तुम ब्रह्माजीके पुत्र प्रजापति कश्यप थे और यशखिनी कौसल्या देवमाता अदिति थीं । उस समय तुम दोनोंने बहुत वर्षांतक ग्राम्य-विषयोंसे रहित और एकमात्र भगवान्‌ विष्णुकी पूजामें तत्पर रहकर बडा उम्र तप किया | तब काळान्तरमें भक्तवत्सल बरदायक भगवानने तुम दोनोंपर प्रसन्न होकर कहा कि वर माँगो' तो तुमने ( भगवानूसे) यही माँगा कि हे निरञ्जन ! आप हमारे पुत्र हों! तब भूतभावन भगवानने कहा कि ऐसा ही हो |! इसलिये वे ही विष्णु भगवान्‌ इस समय रामरूपसे तुम्हारे पुत्र हुए हैं. और ( उनकी सेवा करनेके लिये) शेषजी छक्ष्मणकें रूपमें प्रकट होकर उनके अनुयायी हुए हैं ॥ १४--१७॥ भगवान्‌ गदाधरके राङ्क और चक्रने भरत और शत्रुभ्के रूपसे अवतार छिया है तथा योगमाया जनक- योगमायापि सीतेति जाता जनकनन्दिनी ॥१८॥| | दुळारी सीताजी होकर प्रकट हुई है ॥ १८॥ इस . ए CEN र. शि सस २० अध्यात्मरामायण reer ate क ७०00७60 क क ७ ४ ७० ४४ ७४०५४ 3 wv vrei eit ४“ ee समय विश्वामित्रजी रामसे साताका संयोग करानेके लिये ही आये हैं । हे राजन ! यह रहस्य अत्यन्त गुद्य ह. दतद्युहतमं राजन्न वक्तव्य कदाचन ॥|१९॥ | (से कमी प्रकाशित मत करना ॥ १९ ॥ ( अव सम्पूर्ण कऱे र सक | रहस्य तुमको माळम हो गया है) इसळिये अब तुम प्रसन- प्रीतेन मनसा पूजयित्वाऽथ कोशिकम्‌। जन न जका हि क चित्तसे श्रीविश्वामित्रजीका सत्कार करके लक्ष्मीपति ग्रेपपख रमानार्थ राघर्ष सहलक्ष्मणस्‌ ॥२०॥ | श्रीरघुनाथजीको ठक्षमणसहित इनके साथ भेज दो॥२ || विश्वामित्रोऽपि रामाय तां योजयितुमागतः। वसिष्ठेनेवमुक्तर्तु राजा दशरथस्तदा | वसिष्टजीके इस प्रकार कहनेपर राजा दवारथने उस ` जेने रि | समय अपनेको कृतकृत्य माना और असन्न-चित्तसे कृतकृत्यमिवात्मानं मेने प्रमुदितान्वर! ॥२१॥ , आदरपूर्वक है राम ! हे राम! हे लक्ष्मण ? ऐसा आहूय रामरामेति रृक्ष्मणेति च सादरम्‌ । | कहकर पुकारा तथा उन दोनों माइयकि आनपर उन्ह रे ५ कं है | हृदयसे लगाकर ओर दिर सूँ घकर अ्रीविश्वामित्रजीक। आंलड्भचव यूध्ल्यवप्नाय कीशकाय समपंयत॥२२॥ सौंप दिया ॥ २१-२२॥ तत्र अति प्रतापी भगवान क वरन अत्यन्त ऱ यक आदा ड र ततोऽतिद्ृ्टो मगवान्विश्वामित्रः प्रतापवान । | विश्वामित्रजीने उन्हें यन्त ग्रसन्षतापषेक आझीबाद दि _ | देकर सम्मानित किया ओर फिर धनुष, तरकरा, चाण आशीमिरमिनन्धाथ आयता रामलक्ष्मणों ॥२३॥ | एवं खड्ग आदिसे सुसजित होकर अपने पास आये हुए हीला चापतूर्गी | राम और छक्मणको साथ छेकर वहांसि चळ पडे | वां च ~ गनि भति > शा शारखखाणखद्धथरा यया! : थोड़ी दूर जानेपर विश्वामित्रजीने भक्तिपूर्वक रामको किश्चिद्वशसतिक्रम्य राममाहूय भक्तितः ॥२४॥ ' बुढाया और उन्हें देव-निर्मित बला और अतिवळा ददौ वलां । विदे हे देवनिर्मिते । नामकी ऐसी दो विद्याए दी, जिनके अहण करने- दी नल चातिवलां विच ॐ दुर्वाननित | ,से ही खुवा और दुर्वळता आदिकी वाधा नहीं ययाग्रहणसात्रण छ्षुतक्षामांद न जायते ॥९५ ; होती ॥ २३-२५ ॥ | तत उत्तीर्य गड्डा ते ताटकावनमागमन्‌ । ! तदनन्तर गङ्गाजीको पार कर वे ताटकावनमें आये; विश्वार | सत्यप । तब विश्वामित्रजीने तत्यपराक्रमी रामसे कहा ॥ २६ || विदव्ासत्रस्तदा आह रास सत्यपराक्रमम्‌ ॥२९॥ , “यहां एक ताटका नामकी इच्छानुसार रूप धारण अत्रास्ति ताटका नाम राक्षसी कामरूपिणी । । करनेवाली राक्षसी रहती हैँ जो इस प्रदेशके समला हि 1 निवासियोंको अत्यन्त कष्ट पहुँचाती है, तुम बिना कुछ वाधते लोकमखिलं जहि तामविचारयन्‌ ॥२७॥ | सोच-विचार किये उसे मार डालो || २७॥ तब येति , रघुनाथजीने “बहुत अच्छां कह धनुपपर प्रत्यन्ना तथात घहुरादाय सगुण रघुनन्दनः । चढ़ाकर ठंकार किया, जिसके शब्दसे बह सम्पूर्ण रमकरोतेन वन गुञ्जायमान हो गया | २८॥ उस शब्दको च अन्दनाबरयद्वनम्‌॥२८॥ | चुनकर घोररूपिणी ताटका उसे सहन न कर सकने- तच्छूत्वाञ्सहमाना सा ताटका घोररूपिणी । | के कारण ्रषसे पागल होकर मेघके समान रामको व डता है ओर दोड़ी ॥ २९ ॥ भगवान्‌ रामने तुरन्त ही उसके क्रीवंतभाच्छता राममभिदुद्राव मधवत्‌ ॥२९॥ | वक्षःखल्मे एक वाण मारा, जिससे वह घोर राक्षसी तामेकेन शरेणाशु ताडयामास वक्षासि । बहुत-सा रुधिर उगळती हुई उस बनमें गिर पड़ी ॥३०॥ विद शं फिर शापवश पिशाचताको प्राप्त हुई वह ताटका पपात विपिने घोरा वसन्ती रुधिरं वहु ॥३०॥ | श्रीरामचन्द्रजीकी पासे शापमुक्त होकर एक सर्वौलद्भार- ए सभ ५ ] बालकाण्ड, ` २१ ततो5तिसुन्दरी यक्षी सर्वाभरणभूषिता | विभूषिता परम सुन्द्री यक्षिणी हो गयी तथा रामचन्दर- शापात्पिशाचतां ग्राप्त मुक्ता रामप्रसादतः ॥३१॥ | जीकी परिक्रमा करके उन्हें प्रणामकर उनकी आज्ञासे नत्वा रामं परिक्रम्य गता रामाज्ञया दिवम्‌ ॥३२॥ | खर्गळोकको चली गयी ॥३१-३२ || तब मुनिवर ततो&तिहृ्ट परिरभ्य रामं विश्वामित्रजीने अति हर्षित होकर रामजीका आलिंगन , मूधन्यवप्ाय विचिन्त्य किखितू । | किया और उनका शिर सूँबकर कुछ सोच-विचारकर सपास्रजाल सरहस्मन्त्र रहस्य और मन्त्रादिके सहित समस्त अख-शख्न ग्रीत्याऽभिरामाय ददो मुनीन्द्रः ॥३३॥ | ग्रीतिपूर्वक अभिराम रामको दिये ॥ २३ ॥ , ————— > इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥४॥ FN KR पञ्चम सगे मारीच और झुबाहुका दमन तथा अहल्योद्धार श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेबजी बोळे--हे पार्वति ! तदुपरान्त विश्वामित्र 3 __ _ जीके सहित बे दोनों भाई एक रात मुनिजनसंङुछित तत्र कामाश्रमं रम्य कानन मुनिसडुले | अति सुन्दर उस कामाश्रम नामक वनमें रहकर प्रातः- -' उपित्वा रजर्नामेकां प्रभाते प्रखिताः शनेः ॥ १ ॥ | काळ होते ही धीरेधीरे वहाँसे चले ॥१॥ तब थे सिद्धाश्रम गताः सर्वे सिद्धचारणसेवि सब सिद्ध और चारणोंसे सेवित सिद्धाश्रमपर आये। सिद्धाअस रि सब चारणसानतय्‌ वहाँके रहनेवाले सुनिजनोने विश्वामित्रजीकी आज्ञासे 'विश्वासित्रेण संदिश मुनयस्तन्निवासिनः ॥ २॥ | शौप्रतापूर्वक राम और छक्ष्मणका बड़ा सत्कार किया । पूजां 0 तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने विश्वामित्रजीसे कहा-“हे जांच महतीं चक्र रामलक्ष्मणयोद्वुतम्‌। च RP मुने ! आप दीक्षामें स्थित दोइये॥ २-३ ॥ और हे श्रीरामः कौशिक गाह सुने दीक्षं प्रविश्यताम्‌ २ | महामाग! हमें केवळ यह दिखा दीजिये कि वे राक्षसाधम दर्शयख महाभाग कुतस्त राक्षसाधमौ । | कहाँ हैं १? तब सुनिवरने बहुत अच्छा! कहकर तथेत्युक्त्वा मुनिर्य्ुमारेभे शुनिभिः सह ॥ ४॥।| अन्य सुनियोके साथ यज्ञ करना आरम्भ कर दिया |॥४॥ मध्याहे ददृशाते तौ राक्षसौ कामरूपिणों । मध्याहके समय मारीच और सुबाहु नामक वे ew on दोनों कामरूपी राक्षस रक्त और अखियोंकी वर्षा ~ वपन्ता ॥। ॥ हु ~ मारीचश्च झुबाइश पनत रचिराखिनी + | करते दिखायी दिये | ५॥ बुद्धिमान रामने भी दो रामाऽप घजुरादाय हो वाणो सन्दधे सुधीः । बाण लेकर धनुषपर चढ़ाये और कर्णपर्यन्त खींच- » सज तयो! कर अलग-अछ्ग उन दोनों राक्षसोंकी ओर आकर्णान्त समाङृष्य विससर्ज तयोः पथक्‌ ॥ ६॥ कह ॥६॥ उनमेंसे एक बाणने मारीचको तयोरेकस्तु मारीचं आमषञ्छतयोजनम्‌ । | आकाझमें घुमाते हुए सौ योजनकी दूरीपर समुद्रम i गे आश्ये-सा हो गया > ७ गिरा दिया | यह एक बडा ही आश्चर्ये-सा हो पातयामास जलधो तदद्भुतमिवाभवत्‌ | ७॥ ॥ ७ ॥ दूसरे अश्रिमय बाणने कषणम खुवाइको द्विवीयोडपमिमयो वाणः सुवाहुमजयत्क्षणात्‌ । | भस्म कर डाळ तथा जो उनके अन्यान्य अनुयायी थे अपरे लक्ष्मणनाशु हतासदजुयायिन! ॥ ८ ॥, उन सबको तुरन्त ही लक्ष्मणजीने मार डाळा ॥८॥ २२ च II ७४७ ७०७७७७० ४ पुष्पौवेराकिरल्देया राघत्रं सहलक्ष्मणमू । देवदुन्दुभयों नेदुस्तुष्टवाः सिद्धचारणा। ॥ ९ विश्वामित्रस्तु संपूज्य पूजाह रघुनन्दनस्‌ । क्षे निवेदय चालिङ्गच भक्त्या वाष्पाङुलेक्षणः १० भोजयित्वा सह भ्रात्रा रामं पक्कफलादिभिः। पुराणवाकयेमंधुरेनिनाय दिवसत्रयस्‌॥११॥ चतुथेऽहनि संप्रासे कौश्चिको राममत्रत्रीत्‌ । राम राम महायज्ञं द्रं गच्छामहे वयम्‌ ॥१२॥ विदेइराजनगरे जनकस्य महात्मन? । ` तत्र महेश्वरं चापपस्ति न्यस्तं पिनाकिना ॥१३॥ द्रक्ष्यसि लं महासर्वं पूज्यसे जनकेन च । इत्युकत्वा घुनियिस्तास्यां ययो गङ्गातमीपगम्‌ १४ गौतमस्याश्रमं पुण्य यत्राहरयाख्िता तप! । दिच्यपुष्पफलोपेतपादपैः Loo पारेवा्टतम्‌ ॥१५॥ मृभपक्षिगणैहीनं नानाजन्तुबिव्ितम्‌ । दष्ट्रोयाच मुनि श्रीमान्‌ रामो राजीवलोचनः ॥१६॥ कस्येतदाश्रमपदं भाति भाखच्छुभं महत्‌ । पत्रपुष्पफलेयुक्त जन्तुभिः परिषर्जितम ॥१७॥ चेतो भगवन्‌ बूहि तस्वतः ॥१८॥ विथामित्र उवाच आह्वादयति मे शृणु राम पुरा वृत्तं गोतमो लोकविश्रतः । सर्यधर्समृतां श्रेष्ठछपसाराधयन्‌ हरिम्‌ ॥१९॥ तसै ब्रह्मा ददौ कन्यामहरयां लोकसुन्दरीय । ब्रह्मवर्येण सन्तुष्टः शु्रूषणपरायणाम्‌ ॥२०॥ तया सार्धमिददावातसी द्लौतमस्तपतां वरः | शक्रस्तु तां धपेयितुमन्तरं प्रपसुरन्महम्‌ ॥२१॥ अध्यात्मरामायण NOU LLY LU ६०७० न ६४ ४8 क ७७१७०७० UMM ven उस समय देवताओंने छक्ष्मणजीके सहित श्रीरघुनाथजीपर फर वरसाये और देवदुन्दुमि आदि बाजोंका घोष किया तथा सिद्ध और चारणगण उनकी स्तुति करने लगे | ९॥ विश्वामित्रजीने पूजनीय रघुनाथजीका भली प्रकार पूजन क्रिया और उन्हं गोद हे नेत्रोमें भक्तिपूर्वक प्रेमाश्न भरकर गले लगा लिए, ॥ १० ॥ फिर भाई रक्ष्मणक्रे सहित रामको पके फछ: आदि खिलाकर पुराण और इतिहासादिकी मधुर कथाएं सुनाते हुए तीन दिन ब्रिताये ॥ ११ ॥ चोथा दिन आनेपर विश्वामित्रजीने रामसे कहा-“हे राम | महात्मा जनकजीका बड़ा भारी यज्ञ देखनेके छिये हम- लोग जनकपुर चलेंगे । वहाँ श्रौमद्यादेवजीका धरोहरके रूपमें रखा हुआ एक वडा भारी धष है ॥१२-१३॥ उस सुदृढ धनुपको तुम देखोगे और महाराज जनक तुम्हारा भली प्रकार सत्कार करेंगे ।” विश्वामित्र- जी इस प्रकार कह मुनियोको और राम-छक्ष्मणको साथ छे गङ्गाजीके निकट सनिश्रेष्ठ गौतमजीके उस पवित्र आश्रमपर आये जो दिव्य और पवित्र फल वाढे वृक्षोंसे घिरा हुआ था आर जहाँ अहल्या तप - कर रही थी ॥ १४-१५ ॥ कमलनयन श्रीमान्‌ रामजीने उस आश्रमको मृग, पक्षी तथा नाना प्रकारके जीबोंसे रहित देख मुनिवर कोशिकसे कहा || १६॥ “यह पत्र, पुष्प और फळ आदिसे सम्पन्न तथा जोवशून्य महान्‌ आश्रम जो बड़ा सुन्दर, रमणीय और पवित्र दीख पडता है, किसका है ! भगवन्‌ ! इसे देखकर मेरा चित्त अति आहादित हो रहा है; आप इसका सव वृत्तान्त यथावत्‌ कहिये ॥ १७-१८ ॥ श्रोविश्वामि्जी चोले-हे राम | इस आश्रमका पूर्व-वृत्तान्त सुनो | पहले इस आश्रममें जगद्विख्यात धार्मिक-श्रेष्ठ मुनिवर गोतमजी तपश्याद्वारा श्रीहरिकी आराधना करते इए रहते थे॥ १९॥ उनके ब्रह्मचयसे सन्तुष्ट होकर भगवान्‌ त्र्माजीने उनकी सेवाके लिये उन्हें अहल्या नामकी एक लोक-पुन्दरी सेवा-परायणा कन्या दी ॥ २० ॥ और तापसम्रबर गोतमजी उस अहल्याके साथ यहाँ रहने लगे, इधर देवराज इन्द्र अहल्याके रूप-लावण्यपर मुग्ध होकर नित्य- प्रति उसके साथ रमण करनेका अवसर देखने लगे ॥२१]] सर्ग५] कदाविन्युनिवेषेण गोतमे निर्गते ग्रहात । . बालकाण्ड IIIT TTI काययम SS SS) ere कक काकाजी ४ ४४ ७८ ७५९४५ ४४१४ ७ ४४५०७५० ७७८७७४४०७० ७४७७१७४४०७ २३ एक दिन मुनिवर गोतमके बाहर चळे जानेपर धर्पयित्वाऽथ निरगास्वरितं सुनिरप्यगात्‌ ॥२२॥ | वद गोतमके खूपसे अहल्याके साथ रमण कर ष्ट्रा यान्तं खरूपेण झुनिः परमकोपनः । | मच्छ कस्त्वं दुष्टात्मन्मम रूपघरोऽधमः ॥२३॥ सत्यं ब्रृहि न चेहुस्म करिष्यामि न संशयः । सोऽब्रवीददेवराजोऽहं पाहि मां कामकिङ्करम्‌॥२४॥ कृतं जुगुप्सितं कमे मया ङुत्सितचेतसा । गोतमः ऋधताम्राक्षः शशाप दिविजाधिपम्‌।२५॥ योनिलम्पट दुष्टात्मन्सहसभगवान्भव । शप्त्वा तं देवराजानं प्रविश्य खाश्रमं दुतम!२६॥ दृष्टाव्हल्यां वेपमानां प्राञ्जलिं गोतमोऽश्रवीत्‌। ` दुरे त्व तिष्ठ दुईंचे श्षिलायामाश्रमे मम ॥२७॥ निराहारा दिवारात्रं तपः परममाखिता। . आतपानिलवर्षादिसहिण्णुः परमेश्वरम्‌ ॥२८॥ घ्यायन्ती राममेकाग्रमनसा हृदि सोखितम्‌ । नानाजन्तुविहीनोऽयमाश्रमो मे भविष्यति ॥२९॥ एवं वर्षसहस्रेषु ह्यनेकेषु गतेषु च। रामो दाशरथिः श्रीमानागमिण्यति साचुज॥।३०॥ . यदा त्वदाश्रयशिलां पादाभ्यामाक्रमिष्यति। तदेव धूतपापा त्वं रामं संपूज्य भक्तितः॥३१॥ परिक्रम्य नमस्कृत्य स्तुत्वा शापाद्विमोक्ष्यसे । पूर्वचन्मम शुश्रूषां करिष्यसि यथासुखम्‌ ॥३२॥ इत्युकत्वा गोतमः प्रागाद्विमवन्तं नगोत्तमम्‌ | तदाचहल्या भूतानामदृश्या खाश्रमे शुभे ॥३२॥ तब पादरजःस्पर्श काहते पवनाशना । आस्तेऽद्यापि रघुश्रेष्ठ तपा दुष्करमाखिता॥२४॥ पावयख् मुनेमायोमहरुयां घ्रह्मणः सुताम्‌ । इत्युबत्वा राघवं हस्त ग्रहीत्वा युनिएुङ्गवः ॥३५॥ जल्दीसे वहाँसे चलता बना, इसी समय सुनि भी वहाँ लौट आये ॥ २२॥ उसै अपना रूप धारण कर वहाँसे जाते देख गौतम सुनिने अत्यन्त कुपित होकर पूछा--*रे दुष्टात्मा ! रे अधम ! मेरे रूपको धारण करनेवाला तू कौन है? ॥|२३॥ सच-सच बता, नहीं तो मैं तुझे अभी भस्म कर दूँगा--इसमें सन्देह न करना ।” तब वह बोळा--“भगवनू ! मैं कामके वशीभूत देवराज इन्द्र हूँ, मेरी रक्षा कीजिये ॥ २४ ॥ मुझ पापात्माने बड़ा घृणित कार्य किया है।” तब गोतमने क्रोधसे आँखें छाछ कर देवराजको शाप दिया ॥ २५ ॥ “हे दुष्टात्मन्‌ | तू योनि-छम्पट है इसलिये तेरे शरीरमें सहस्र भग हो जायें ।” इस प्रकार देवराजको शाप देकर सुनिने अपने आश्रममें प्रवेश किया तो देखा कि अहल्या भयसे काँपती हुई हाथ जोड़े खड़ी है । उसे देखकर गीतमने कहा--“हे दुष्टे ! त. मेरे आश्रममें शिलामे निवास कर ॥२६-२७॥ यहाँ तु निराहार रहकर धूप, वायु और वषी आदिको सहन करती हुई दिन-रात तपस्या कर और एकाग्रचित्तसे हृदयमें विराजमान परमात्मा रामका ध्यान कर । अवसे यह मेरा आश्रम विविध प्रकारके जीव-जन्तुओं- से रहित हो जायगा ॥ २८-२९ || इसी प्रकार कई हजार वर्ष बीत जानेपर यहाँ दररथ-नन्दन श्रीराम- चन्द्रजी भाई छक्ष्मणके साथ आयेंगे ॥ ३० ॥ जिस समय वे तेरी आश्रयभूत शिळापर अपने दोनों चरण रखेंगे उसी समय तू पाप-सुक्त हो जायगी, तथा भक्तिपूर्वक शरीरामचन्द्रजीका पूजन कर उनकी परिक्रमा और नमस्कारपूर्वक स्तुति कर शापसे छूट जायगी और फिर पूर्ववत मेरी सुखपूर्वक सेवा करने लगेगी” ॥ ३१-३२ ॥ ऐसा कहकर महर्षि गोतम पर्वेतश्रेष्ठ हिंमाळयपर चळे गये । हे रघुश्रेष्ठ ! उसी दिनसे यह अहल्या वायु-भक्षण करती हुई कठोर तपस्यामें स्थित हो आपके चरण-रजके स्पर्शेकी कामनासे आजतक प्राणियोंसे अछक्षिता रहकर अपने झुम आश्रममें रहती है ॥ २३-३४ ॥ हे राम ! अब तुम ब्रह्माजीकी पुत्री गौतम-पत्नी अहल्याका उद्धार करो । मुनिवर विश्वामित्रजीने ऐसा कह रघुनाथजीका i TT तकभयण्यानक््यन्धयेकयाक्म कलक केक क ककत वि २४ अध्यात्मरामायण र [सग ५ दर्शयामास चाहल्यामुग्रेण तपसा स्थिताम्‌ । हाथ पकड उन्हें उम्र तपमे स्थित अहल्या दिखलाया । तब श्रीशमचन्द्रजीने अपने चरणसे रामः शिलां पदा सपृष्ठा तां चापश्यत्तपोधनामू ३६ | उत्त शिछाको स्पर्शकर तपस्थिनी अहल्याको देखा TN हर 3 देखकर - गच > ईः छः ननाम राधबोघ्हल्यां रामोऽहमिति चाजबीत्‌। |!| २५४३६ | उसे देखकर भगवान्‌ रामेन स राम हूं | ऐसा कहकर प्रणाम किया । ततो दृष्टा रघुश्रेष्ठ पीतकोशेयवाससम्‌ ॥२७॥ | तव अहल्याने रेशमा पीताम्बर धारण बिन [ज शङ्कचक्रगदापङ्कजधारि | श्रीरघुनाथजीको देखा ॥ १७ ॥ उनकी चारा भुजार्थम चहज , उक र कै व्य | शंख, चक्र, गदा और पढम सुझोमित थे, कन्येपर धलुवोणधर रामं लक्ष्मणेन समन्वितम्‌ ॥२८॥ धनुप-वाण विराजमान थे तथा साथमें श्रीट्रमणर्जी थे स्मितवक्त्र॑ पद्मनेत्रं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्‌। | ॥ ३८॥ उनका मुख मुसकान-युक्त, नेत्र कमलदळकरे तट | चोतयन्तं दिशो द समान और वक्षः्खल श्रीवत्सादमे सुशोभिन था | नीलमाणिक्यसङ्काश घोतयन्व दिशा दश ।।३१॥ अपने नीठमणि-सद्श श्याग विद्रे थे दा दृष्टा रामं रमानाथं हर्पविस्फारितेक्षणा। ।! दिशाओंको प्रकाशित कर रहें थे ॥ ३९, ॥ रमानाथ संपूज्य विधिवद्रासमध्यादिभिरनिन्दिता | | तब उन्हें साक्षात्‌ श्रीनारायण जान उस अनिन्दितान हि सर ५ | श्रीरामचन्द्रको देखकर अहृत्याक्रे नेत्र हसे गवळ गये गोतसस्य वचः सस्या जात्या नारायणं वरम्‌ ४ ० | और उसे मुनिवर गतमके वामो स्मरण हो आया । मिस चर | अर्ध्यादिसे उनका विश्रित्रत्‌ पूजन किया ओर नत्नोंमें दपाशुज॒लनेत्रान्ता दण्डवत्मणिपत्य सा ॥४१। | आनन्दाश्रु भर साझा दण्डवत्‌ प्रणाम क्रिया उत्थाय च पुनदृष्टा रामं राजीवलोचनम्‌ । | ॥ ४०-३१ ॥ फिर खडी होकर बह कमलनयन भगवान्‌ - मर मद > । रामको देख संवागसे पुलकित हा गदहदवाणीस उनकी पुलाङ्कितसर्वाङ्ञा गिरा गद्गवदयैलत ॥४२॥ : स्तुति करने छगी॥ १२॥ जह्ल्यावाच अहल्या बोली-हे जगन्तित्रास ! आपके चरण- अहो कृतार्थोऽस्मि जगन्निवास ते । कमलोंके रजःकणका स्पर्श कर आज में कृतार्थे हो गयी । पादान्जसंलग्ररजःकणादहम्‌ । | अहो !( बड़े माग्यकी बात हैं कि ) आपके जिन पादार- स्पृशासि यत्पद्मजशङ्करादिभिः | विन्दोंका ब्रह्मा और शंकर आदि एकाप्र-निचसे सर्वदा cs ~ ¢ भी ने ग न्तन भाज घ र्दी हि विम्ृग्यते रन्धितमानसे। सदा ॥४३॥ | अडुसन्यान किया करते ६ ड का आज में स्प अहो विचित्र तव राम चेष्टितं । कर र्हा हू ॥| ३३ ॥ हु राम 5 आपका लोलाए है घडी मनुष्यभावेन विमोहित जगत्‌ | विचित्र हैं, आपके मानुप-भावसे सम्पूर्ण जगत मोहित चठस्यजस चरणादिवर्जित। | हो रहा है । आप पूर्णानन्दमय आर अति मायावी हैं; सम्पूर्ण आनन्दमयोञतिमायिक!॥।४४॥ | कि चरणादिहीन होकर भा आप निरन्तर चळे यत्पादपङ्क जपरागपवित्र गात्रा | रहते हे ॥ ४४ ॥ जिनके चरण-कमछके परागत पवित्र भागीरथी भवविरिञ्चिुखान्पुनाति। इई श्रीगज्ञाजी शिव ओर ब्रह्मा आदि जगदांखरोको भी साक्षात्स एव मम इग्विपयो यदास्ते पवित्र करती हैं, आज साक्षात वे हो मेरे नेत्रोंके विपय कै वर्षयते मम पुराकृतभागधेयम्‌ ।।४५॥॥) दो रहे ह मैं अपने पूर्वकत पुण्यकर्मोका किस प्रकार मत्यवतारे मनुजाकृतिं हरि वर्णन करू ? ॥ ४५ ॥ जिन्होंने परम सुन्दर मानव- रामाभिधेयं रमणीयदेहिनम्‌ । देहसे मर्त्येलोकमें अवतार लिया है, मैं उन धनुपधारी थडुधरं पश्मविशाललोचन कमलदल-लोचन भगवान्‌ रामको सर्वदा भजती हैं भजाम नत्य न परान्भजिष्ये ॥४६॥ | और किसीको भी नहीं भजना चाहती | ४६॥ Re eo ८ - सर्ग५] बालकाण्ड २५ TTT ४८४८४४ नर ७८४५४४/४४४७०४८४४ ४४० ४ Ue ७८६७१७ ४... NG कर करे ७७ १७७ एड ० ६७ Ur UN ४११४१४ ४४ ५८७४० (८८४ कर SAP SAN ५००० ६४ VF ६.2 ६० २०९० ९.८ ६.७ ५३ ६.४ १.२७ NON Ape Me ७७०१०० णक कर पेट चर. यत्पादपङ्कजरजः श्रतिभिविमृग्यं जिनके चरण-कमळोंकी रजको श्रति भी ढँढ़ती रहती यन्वाभिपङ्गजभवः कमलासनश्च । है, जिनकी नाभिसे उत्पन्न हुए कमळसे ब्रह्माजी प्रकट 2 > ~ तथा जिनके नामामृतके भगवान्‌, यन्नामसाररसिको भगवान्पुरारि- $५ द मृतके भगवान्‌ शंकर रसिक हैं ५ ह वि उन श्रीरामचन्ह्रजीका मैं अपने हृदयमें अहर्निश ध्यान सतं रामचन्द्रमानिश हृदि भावयामि।४७1। करती हूँ ॥ ४७॥ जिनके अवतार-चरित्रोंका नारदादि यस्यावतारचरितानि विरिश्विलोकि देव्पिंगण, ब्रह्मा और महादेव आदि देवेश्वरगण तथा गायन्ति नारदयुखा मवपद्मजाद्याः। | गेति जिनके कुचमण्डळ भीगे हुए हैं वे व र सरखतीजी भी ब्रह्मरोकमें निरन्तर गान किया करती वागीश्वरी च तमह शरणं प्रपद्ये ॥४८॥ | पुरुष परमात्मा रामने संसारपर परम अनुग्रह करनेके लिये सोऽयं परात्मा पुरुपः पुराण खयंप्रकादा, हा अनन्त ओर सवके आदिकारण देति हर भी यह जगन्मोहन मायामय रूप धारण किया है प्क सन तरनन्त आद्या | . ॥ ४९ || जो अकेले ही संसारकी उत्पत्ति, स्थिति मायातचु लोकविमोहनीयां और नाइके लिये अपनी मायाके गुणोंका आश्रयकर धत्ते परानुग्रह एप राम ॥४९॥ | ब्रह्मा, विष्ण और महादेव नामक विभिन्न रूप धारण अये हि विश्वोद्भवसंयमाना- करते हैं वे स्वतन्त्र और परिपूर्ण आत्मा आप ही हें ॥५०॥ मेकः स्वमायाशुणब्रिम्बितो यः] | है राम | आपके जिन चरण-कमर्लाको श्रीलक्ष्मीजी . ~ । अपने वक्षःस्थळपर रखकर बड़े प्रेमसे लाड लड़ाती हैं, विरिश्भिविष्ण्वीञ्वरनाम भेदान्‌ | जिन्होंने पूर्वकाळमें (बलि-वन्धनके समय) एक ही धत्त स्वतन्त्रः परिपूर्ण आत्मा ॥५०॥। , पगमे सम्पूर्ण त्रिलोकी माप छी थी तथा अभिमान नमोऽस्तु ते राम तवाङाप्रप्ज हीन सुनिजन जिनका निरन्तर ध्यान किया करते हैं श्रिया शृतं वक्षासे लाएितं ग्रियात्‌। | उन आपके चरण-कमलळोंको मैं नमस्कार करती हूँ ॥५१॥ - आक्रान्तमेकन जगत्रयं पुरा | हे प्रमो! आप ही जगत॒के आदिकारण, आप ही जगत- पशा के और आप ही उसके आश्रय हैं, तथापि आप | ध्येय मुनीन्ट्राभमानर्वाजित। ॥५१॥ ¦ समस्त प्राणियोसे पृथक हैं और अद्वितीय पसझरूपसे जगतामाद्भूतस्त्व जगत्त जगदाश्रयः । प्रकाशमान हैं ॥ ५२ ॥ हे राम | आप ओंक्रारके वाच्य सर्वभूतेष्वसंयुक्त एको भाति भवान्परः ॥५२॥, हैं तथा आप ही वार्णाकं अगोचर परम पुरुप हैं । हे >, 8 ह प्रभो ! चाच्य-त्राचक ( शाब्द-अथे ) भेदसे आप ही आकारवाच्यस्त्व राम वाचासावपयः पुमाच्‌ | सम्पूर्ण जगत-रूप हैं ॥५४३ || हे राम | आप अकेठे घाच्यवाचकभेदेन भवानेव जगन्मयः॥५१॥ | ही वहु-रूपमयी मायाके आश्रयसे काय, कारण, । कत्तल, फल और साधनादिके भेदसे अनेक रूपोंमें कार्यकारणकर्दृत्यफठसाधनभेदत । | भासमान हो रहे हैं ॥ ५४ ॥ आपकी मायासे जिनकी एको विभासि राम त मायया वहुरूपया ॥।५४॥ बुद्धि मोहित हो रही है वे लोग आपका वास्तविक रूप त्वन्मायामोहितधियस्त्वां न जानन्ति तत्वतः। | नहीं जान सकते । आप मायापति परमेथरको वे मूह | जन साधारण मनुष्य समझते हैं ॥ ५ आप आकाशक मानुप त्वाभमन्यत्व मायन प्रमश्वर्स्‌ 1५५।॥ | समान वाहर-भीतर सब ओर विराजमान, निर्मळ, आकाशवस्वय सवत्र बाहिरन्वगताञ्मल! । असंग, अचळ, नित्य, शुद्र, घुद्ध, सत्यखरूप और अव्यय असन्नों ह्यचलो नित्यः शुद्धो बुद्धः सदव्यय!॥५६॥ | हैं ॥ ५६ ॥ हे विभो ! मैं मूढ और अज्ञानी खी-जाति दे २६ अध्यात्मरामायण [सम्‌ ५ RRR पाप २ ११्२१?१२९११्य११म्पपनन्साव्नययन्न्न्यन्य Tees eR ७७ + क UU FUN pe up (००.७७ ७७७ ४०% ६०७ कटरे नाक peter हभ हनुका १७ ४५ व २४ एक ०९ कर चली ४० केके 0 कट टे प पेशीवर १7 ~ योपिन्सूढाव्हमश्ञा ते तचच जाने कथं विभो । | भला आपके तरको वया जान्‌, ¦ अतः हे राम । मे RR ह ल अनन्यभावसे आपको सैकड़ों बार केवळ नमस्कार हा देव में यत्र त्रापि स्थिताया अपि सर्वदा । | सर्वदा आपके चरण-कमलोंमें मेरी आसक्तिपूर्णे भत्ति बनी रहे ॥ ५८ ॥ हे पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार त्वत्पादकमरु सक्ता भाक्तरव सदाऽस्तु मे टी है; हे भक्तवत्सल ! आपको नमस्कार दै; दे हपीदेदा नमस्त पुरुपाभ्यक्ष चमरत भक्तवत्सल । | आपको नमस्कार हैं; है नारायण ! आपका बारम्बार _ os व नमस्कार है ॥ ५९ ॥ जो संसारके एकमात्र भय दुर रायण बी गेडों hn oh] hr नमस्तेऽस्तु हृषीकेश चारायण नमोऽस्तु ते |५९॥ करनेवारे हैं, करोड़ों खर्योके समान प्रकाशमान ह भवभयहरमेकं भानुकोटिग्रकाश कर-कमळोंमें धनुप और चाण धारण किये हैं, इयाम PE ° । मेघक्रे समान आभावाळे हैं, हुवणके समान पीत बस शरचाप कालम गस | 3 7 ४. मिन ह करेहतशरचा। वादमासय्‌। | धारण किये हैं, रत्न-जटित कुण्डलम सुदामित हैं, तथा कनङरुचिरवस्र रतवत्कुण्डलात्मं जिनके कमळ-दळके समान अति सुन्दर विश्याल नेत्र कमलविशदनेत्रं साजुजं राममीडे ॥६०॥ | ६ गा गासन उस मापी में खुनि स्तुत्वेवं पुरुष साक्षाद्राघव॑ पुरतः स्थितम्‌। | इस प्रकार सम्मुख खडे हुए साक्षात्‌ परमपुरुष श्री- खुनाथजीका स्तुति,परिक्रमा आर बन्दना कर वह उनकी शु कम्य प्रणस्याह साज्युज्ञाता यया पतियू 1६१) | आज्ञा छे शीघ्र ही अपने पनिकें पास चली गयी ॥६१॥ अहल्यया कृतं स्तोत्रं यः पठेङ्कक्तिसंयुतः | जो पुरुप अहल्याके किये हुए इस सत्रको भक्ति- स शुच्यतेऽखिलुः पापः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥६२॥ | पतक पदता हे वह समस्त पापाचे मुक्त हकर परतरः | पढको ग्राप्त कर रेता है ॥ ६२ ॥ जो वन्ध्या की भी पत्राद्यथ पठेद्धवत्या राम हां थ उङ्क ह द निधाय च । रामचन्द्रनाका हदवय धारणकार पत्रका कामचामे संवत्सरण लभत वन्ध्या आप सुपुत्रकम्‌ ॥६२॥ | इसका भक्तिपूर्वक पाठ करे तो एक वर्षमे ही उसे श्रेष्ठ सबोन्कासानवासोति रामचन्द्रप्रसादतः ॥६४। | पत्र प्राप्त हो सकता हैँ तथा श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे ब्रह्मन्न युरुतल्पमोऽपि पुरुपः उसकी समस्त कामनार पूर्ण हो जाती हैं ॥ ६३- स्तेयी सुरापोऽपि वा ६४ ॥ ब्राह्मगका बच करनेवाला, गरु-सीस भाग करनेवाला, चोर, मद्यप, माता-पिता और भाईकी हिंसा करनेबाला तथा निरन्तर भोगासक्त रहनेवाला पुरुप भी यदि अपने हृदयम विराजमान श्रीरघुनाथजीका भक्तिपूर्वक नित्य स्मरण करता है और उनका ध्यान सातृआतृविहिपरकोऽपि सततं भोगिकवद्धातुर! । नित्यं सतोत्रमिदं जपन्‌ रघुपतिं षि भक्त्या हदिस सरन्‌ करते हुए इस स्तोत्रका पाठ करता हैं तो मक्त हो घ्यायन्युक्तिमुपेति कि पुनरसो जाता है; फिर खबर्म-परायण पुरुपोंकी तो बात ही खाचारयुक्तो नरः॥६५॥।| क्या है ? ॥ ६५॥ हि ब र अ vcs इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे वाल्काण्डे अहल्योद्धरणं नाम पञ्चमः सरी: | ५ || ESS संगे ६] ` बालकाण्ड ` २७ धजुर्भड़ और बिवाह । ' ` सत उवाच विश्वामित्रोऽथ त प्राह राघवं सहळक्ष्मणम्‌ । x "गच्छामो वत्स मिथिलां जनकेनाभिपालिताम्‌ ।१। इष्ट्वा क्रतुवरं पश्चादयोध्यां गन्तुमहसि । इत्युक्त्वा प्रययो गड्भामुचतुं सहराघवः । तरिमन्काले नाविकेन निषिद्धो रघुनन्दनः ॥ २॥ नाविक उवाच क्षालयामि तव पादपङ्कज नाथ दारुद्पदोः किमन्तरम्‌ । माचुपीकरणचू्णमस्ति ते सूतजी बोले--तदनन्तर विश्वामित्रजीने लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीसे कहा, “वत्स ! अब हम महाराज जनकसे पाछित मिथिलापुरीको चळेगे.॥ १ ॥ वहाँ यज्ञोत्सव देखकर फिर तुम अयोध्यापुरीको लौट सकते हो |” ऐसा कह वे रघुनाथजीके साथ गंगाजी" पार करनेके लिये तटपर आये, तब नाविकने रंघुनाथजीको नावपर चढ्नेसे रोक दिया ॥ २॥ नाविक बोला-हे नाथ | यह बात प्रसिद्ध है कि आपके चरणोंमें कोई मनुष्य बना देनेवाछा चूर्ण है । ( ओपने अभी शिळाको खी बना दिया, फिर ) शिला और काष्टमें मेद ही क्‍या है £ अतः नौकापर चढ़ाने से पूर्वे मैं आपके चरणकमलोंको धोऊँगा || ३ ॥ पादयोरिति कथा प्रथीयसी ॥ ३ इस प्रकार आपके चरणोंको मळरहित करके मैं ee पादाम्बुजं ते विमलं हि कृत्वा पश्चात्परं तीरमहं नयामि । नोवेत्तरी सद्यवती मलेन स्याचेद्विभो विद्धि कुटुम्बहानिः ॥४॥ क्षारित NN ® # इत्युक्त्वा [पादो परं तीरं ततो गता! । कौशिको रघुनाथेन सहितो मिथिलां ययो ॥ ५॥ विदेहस्य पुरं प्रातक्रॅपिवाटं समावेशत्‌ । ग्रापं कोशिकमाकर्ण्य जनकोऽतिम्ुदान्ितः॥ ६॥ पूजाद्रव्याणि संगृह्य सोपाध्यायः समाययो । _ दण्डव्रणिपत्याथ पूजयामास कोशिकस्‌॥ ७॥ पप्रच्छ राघवौ दृष्टा सर्वलक्षणसंयुतो । द्योतयन्तौ दिशः सर्वाथन्द्र-र्याविवापरौ ॥ ८॥ कस्येतो नरशादूलौ पुत्रौ देवसुतोपमो । मनःप्रीतिकरौ मेऽ्य नरनारायणाबि ॥ ९॥ प्रत्युवाच मुनिः श्रीतो हपयच्‌ जनक तदा आपको श्रीगङ्गाजीके उस पार छे. चछ गा । नहीं तो, हे विमो ! आपके चरण-रजके स्पर्शसे यदि मेरी नौका युवती हो गयी तो मेरे कुटुम्बकी आजीविका ही मारी जायगी ॥ ४॥ ऐसा कह केवटने उनके चरण धोये और फिर गद्गाजीके पार ले गया । बहाँसे राम. और लक्ष्मणके सहित श्रीविश्वामित्रजी मिथिलापुरी- को चळे | ५॥ प्रातःकाळ होते ही बे विदेहनगरमें पहुँचकर ऋषियोंके निवास-स्यानमें ठहर गये | उसी समय, चिश्वासित्रजीके आगमनकी सूचना पाकर जनकजी अत्यन्त ग्रसन्नता-पूर्वक पूजन-सामग्री लिये अपने पुरोहिंतके साथ वहाँ आये, और साष्टांग दण्डवत्‌ कर उन्होंने मुनिवर कोशिककी पूजा की ॥ ६-७॥ फिर साक्षात्‌ दूसरे सूर्य और चन्द्रमाके समान अपने तेज- से सम्पूर्ण दिशाओंको देदीप्यमान करते हुए उन सर्व-लक्षण-सग्पन्न रघुकुमारोंको देखकर पूछा--- ॥ ८॥ “ये देवपुत्रोके समान दो नरझादूंछ किसके पुत्र हैं; .ये मेरे हृदयमें इस समय नर और नारायणके समान प्रीति उत्पन्न करते हैं? ॥ ९ ॥ तब मुनिवर विश्वामित्रजीने महाराज जनकको पुत्रा दशरथस्येता भ्रातरा रामलक्ष्मणौ ॥१०॥ | आनन्दित करते हुए प्रसन्नतापूर्वक कहा---“थे दोनों नाणी कट कशाला पटापटा यया श्ट अध्यात्मरामायण [ सर्ग ६ oe 1 1 99 9 9 न 0 कन मक ७७७०९ ७७१७१७१७१४ e गक मससंरकषणार्थाय मयानीतो पितुः पुरात्‌ | | माई राम और ठकाण वोदाळ-नरया ढी पुत्र हैं॥ १०॥ में इन्दे अपने यज्ञा शक्षाके ख्रि आगच्छन्‌ रावो मार्गे ताटकां विसघातिवीम्‌ ११) नासे & आया था | मां आते समय गेरी शरेणैकेन हतवाभ्रोदितो मेऽतिविक्रमः। |प्ररणासे इन अति पारम ख़ुनाथ्जीने एक ही , A याणसे विश्ववातिगी नाढकाको मार डाला, फिर मे वतो मगर गला मम यजञनिहिसकान्‌ ॥! आ रे पहुँचवर मेरा यह विश्वम करनेबादे तुवाइ आदि सुवाहुमरमुखान्हत्वा भारीच सागरेऽक्षिपत्‌। | एक्षसोकरो मार डाला, ता गारक मु प ततो गडातरे पण्ये रो , दिया । तदनन्तर ये गंगानटपर सहापि गोते टे पुण्ये ॥१३॥ ` तो गङ्गा ! गपपा डभय॥ १२) एनीत आश्रमम आये और को शिळारपमे खित (१. हक च pe ~ क Pe यत्वा तव शलाख्या यातमस्य वधू। स्थिता) | गोतम-प्वीको देख अपने चणका स्पर्म ५ रूपिणी प्यरूप वना दिया ॥ ११-११ ॥ अहण्यावे पादपङ्कणसंस्पर्शात्कृता म्‌ ॥१४॥ | उसे सदुष्यरूप बना दिया ॥ ११-१४ ॥ अहन्यावा देखकर शामबीने उसे नमस्कार दिया फिर उससे इष्टाळल्यां नमस्कृत्य तया सम्यक्रपूजितः |! | नह प्रकार पूजा ग्रहगाकर इम समव तग्हार यहा इदानी कडुकामस्ते गृहे माहेशरं घु: ॥१५! शका षडप देरे लि आये हैं ॥ १५ ॥ हमे जित रमिः सर्ंटमिललुशभवे। | पुना है उस अमुक तुझार का बडा पूजा शिजते राजाबः सवद्टमित्यनुशुशरुवे। ' होता हओर सब राजा ढोग उसे देख गये है । अतः है अहो दर्शय राजेन्द्र सैवं चाएमबुत्तममु॥ | / आप मर्का कह उत छह हे PU दिखा दीजिये, क्योकि ये उमे देगा शत्र ही अपने दष्टराऽयोध्यां जिगसिपु! वितरं दृ्ठामच्छात ॥१६ | गाता-पितासे मिढनेके लिये अयोध्या जाना चाहते 1१६ क्त इनिना राजा पूजाहबितिपूजया। | मुनिवर विद्या, दजा कपर गत गज पूजयामास धर्यज्ञो विधिद्टरेन कर्मणा ॥ | जनकने राम और हक्मणकों पूजनीय नगद उनकी ततः संस्पेपयामास सन्तिं बुद्धिमततरम | विधिपूर्वक पूजा का ॥ १७ ॥ फिर अपने तुद्िमान जवळ उवाच मन्त्रीको यह कहकर भेजा कि तुम यात्र हा विश्ेशचापं रामः श्रौबि्वेशषरका धनुष शार रागचळजीको शीघ्रमानय | रामाय दर्शय ॥१८॥| दिजाबो॥ १८॥ जि ha A ५, aN क _ ततो गते सन्त्रिवरे राजा फोशिकमबर्बीत | मन्त्रके चदे जानेपर राजाने श्राविामित्रजसे _ कहा, “यदि रामचन्द्र 5 5 यदि रामो धुवा कोटचामारोपयेदुणम्‌ ॥१९॥| ट * पदि रची उस भतु उठाकर उरक इम्‌ ॥१९ कोटियोपर रोंदा चढ़ा देंगे तो निश्चय मे उन्हें ही तदा मयाळऱ्मजा सांता दीयते राषबाय हि। जे ए सीता ह ग । त विमित कि ओर देखते हुए मुसकाकर कहा--- तयेति फोशिकोऽप्याह रामं संवीक्ष्य ससितम्‌।२०| "ठक है ॥ १९-२० ॥ राजन! आप दा शीरं दय चापाऱ्यंरासायामिततेजसे | | दे मै भठुय अमित तेन खुनाथाको दिखाइये ।” मुनीश्वरके ऐसा कहते हो बड़े बहवान एव हुवाति भोनीश आगताथापवाहकाः ॥२१॥) पाँच हजार धनुप-याहक उस घनुप-ओेटकों लेकर वहाँ चापं गृहीत्वा वलिनः पञ्चसाहस्रसङ्कथक्ाः | ॥ आ पहुँचे । उस धनुपमे सैकड़ों धिया वेगी हुई थीं पण्टाशततभायुक्त 4 जन दिभूषितग् र | परटाशतसमायुक्त मणिवज़ ॥२२॥ | ॥ २१-२२ तत्र रामदाम श्रेष्ठ उन मनि | पथा वह हीरे और मणि आदि रहोते सुसजित था सर्ग ६] TT —— दशयामास रामाय मन्त्री मन्त्रयतां वर! । दृष्टा रामः अहशत्मा बध्वा परिकरं इढम्‌ ॥२३॥ ` गृहीत्वा वामहस्तेन छीलया तोलयन्‌ धनुः । आरोपयामास युणं पदयत्खखिलराजसु ॥२४॥ इपदाकर्पयामास पाणिना दक्षिणेन स! । वमञ्जाखिलहत्सारो दिशः शब्देन पूरयन्‌ ॥२५॥ दिशश्च विदिशयैव खर्ग मर्त रसातलम्‌ । तदद्भुतमभूत्तत्र देवानां दिवि पश्यताम्‌ ॥२६॥ आच्छादयन्तः कुसुमैदेवाः स्तुतिभिरीडिरे। देवदुन्दुभयो नेदुनेनृतुश्चाप्सरोगणाः ॥२७॥ द्विधा ममं घनुर्ष्रा राजाऽऽलिङ्कच रषद्वहम्‌। विखय लेमिरे सीतामातरोऽन्तःपुराजिरे ॥२८॥ बालकाण्ड २९ रामको वह धनुष दिखाया । प्रसनचित्त श्रीराम- जीने उसे देखते ही इढ़तासे कमर कसकर उस धनुषको खेळ करते हुए वाँये हाथसे उठाकर | थाम लिया और सब राजाओंके देखते-देखते उसपर रोंदा चढ़ा दिया ॥ २३-२४ || फिर सबके हृदय- सबेस्व भगवान्‌ रामने अपने दाये हाथसे उस धनुपको थोड़ा-सा खींचा और दो दिशाओंको गुज्ञायमान करते हुए तोड़ डाला ॥ २५॥ दिशा, विदिशा, खगे- छोक, मर्त्यछोक और रसातळ आदि समस्त पातालोंमें बह शब्द गूज उठा । खर्गलोकसे देवगणोंके देखते- देखते यह एक बड़ा आश्चर्य-सा हो गया ॥ २६॥ देवताओंने पुष्प बरसाकर भगवानको ढँक दिया और दुन्दुभी आदि बाजे बजाते हुए उनकी स्तुति की तथा अप्सरार बृत्य करने छगीं ॥ २७॥। धनुषके दो खण्ड हुए देख महाराज जनकने रघुनाथजीका आलिट्गन किया और अन्तःपुरके आँगनमें लित सीताजीकी माताएँ अत्यन्त विस्मित हुई ॥२८॥ तत्पश्चात्‌ सर्वाळंकारविभूषिता, सुवर्ण- वर्णा श्रीसीताजी अपने दाहिने हाथमें सुवर्णमयी माळा लिये मन्द-मन्द मुसकाती हुई वहाँ आयीं ॥ २९ ॥ वे मुक्ताहार, कर्णफूळ और झमझमाते.हुए पायजेब आदि आभूपणोसे विभूषिता थीं तथा शरीरमें अति उत्तम साड़ी पहिने हुए थीं जिसमेंसे उनके पीन-पयोधर झलक रहे थे ॥ ३० ॥ La Nhe ~ सीता खर्णमयीं मालां गृहीत्वा दक्षिण करें। _ सितवकत्रा खर्णवर्णा सर्वाभरणभूषिता ॥२९॥ . युक्ताहारेः कर्णपत्रैः कणच्चरणनुपुरा । दुकूरुपरिसंवीता चस्नान्तर्व्यज्ितस्तनी॥३०॥ सीताजी नम्नतापूर्वक मुसकाते हुए वह जयमाल रामचन्द्रजीके उपर डालकर प्रसन्न हुई । उस समय श्रीरामचन्द्रजीके सवीळंकारविभूषित सुवन- मोहन रूपको झरोखोंमेंसे देखकर समस्त रानियाँ अति आनन्दित हुई । फिर सर्वेशाखन्ञ महाराज जनकने मुनिवर विश्वामित्रजीसे कहा। २१-२२ ॥ “मुनिवर कोडिकजी ! आप तुरन्त ही महाराज दशरथके पास पत्र भेजिये; वे कुभारोंके विवाहोत्सबके लिये शीघ्र ही पुत्र, महिषियों और मन्त्रियोंके साथ यहाँ पधारें:।” तब विश्वामित्रजीने बहुत अच्छा' कह झीध्रगामी दूतोंकी भेजा ॥ २३-२४ ॥ रामस्योपरि निक्षिप्य सयमाना अरुदं ययो । ततो सुञ्ुदिरे सवें राजदाराः खरङ्कृतम्‌ ॥३१॥ यत्राक्षजालरन््रेस्यो दृष्टा लोकविमोहनम्‌ । ` ततोब्जत्रीन्यानि राजा सर्वशास्रविशारदः ॥३२॥ भो कौशिक सुनिश्रेष्ठ पत्र अपय सर्वरम्‌। राजा दशरथः शीघ्रमागच्छतु सपुत्रकः ॥३२॥ विवाहार्थ कुमाराणां सदारः सहमन्त्रिमिः । तथेति प्रेपयामास दूतांस्त्वरितविक्रमान्‌ ॥३४॥ ते गत्वा राजशार्दूलं रामश्रेयो न्यवेदयन्‌ । त्वा रामङृतं राजा हर्षेण महताप्हुतः ॥३५॥ दूतोंने जाकर राजशादूंळ दशरथसे रामका कुशल- क्षेम कहा । उनसे रामचन्द्रजीके अदूभुत कृत्यका वृत्तान्त सुनकर महाराज परमानन्दमें डूब गये ॥ ३५॥ ^ RN) न © ३० अध्यात्मरामायण [ सगे ६ मिथिलागमनार्थाय त्वस्यामास मन्त्रिण!. | फिर अपने निलु चेमे छि ला म्त्रयारः हाथा, वाड, रथ आर र ~ ~ . क ग्‌ व्र र | करते हुए म (८ कहा हि f 3 हि र गच्छन्तु मिथिला सर्वे जाईवरथपत्तय ॥२६॥ पदातियोके सहित सब्र छोग मििछापुरीको चते रथमानय मे शीघ्रं गच्छाम्यद्यव मा चिरम्‌। ॥ १६॥ मेरा रथ भी तुरन्त ले आओ, देरी न करो, बसिठ्ठस्त्रग्रतो यातु सदारः सहितोञमिमिः॥३७॥ | में भी आज हो. चढेगा | अशियॉके सहित मेरे गुरु ल ` मनिश्रेष्ट भगवान्‌ चसिटरजी रामकी मातारऑफां ढेकर $ भग शुरु। iw , «, ३ १७ डी राजमा समादाय इनि भगवान्‌ र| | सबसे आगे चढे (0 इस प्रकार सबका कू च करा एक; एवं प्रस्थाप्य सकलं राजपिविंपुर्ल रथम्‌॥३८॥। विज्ञाळ रपर आरढ हो राजर्पि ददारथजी बदू दल- महत्या सेनया सार्धमारुद्य स्वरितो ययो । | वलके सहिन शांब्रतापूर्वक मिथिलापुरको चे । । राघव भ्रत्वा S , ' रघकुळ-तिछक दरारवजीका आय हुए मुन महाराज गत राघव श्रुत्वा राजा हपंसमाकुछ। ॥३९॥, < - > 0. प्रत्युज्जगाम जनकः शतानन्दपुरांधसा | हमे गये और उन पूजनीय राजाका यथोचित रात्रिम यथोक्तपूजया पूज्यं पूजयामास सत्कृतम्‌ ॥४०॥ ¦ सत्कार कर पूजन विया ॥ ३७-४० ॥ तदनन्तर सेना ववन्दे चरणौ पि : रक्ष्णके सहित रामजीने पितादे चरणोंम प्रणाम रामस्ठु उकमर्णनाशु ववन्द चरणा पितुः! दिला; तब राजा ददारथने प्रसन्न होकर रामे ततो हुटो दशरथो रामं घचनमत्रबीत्‌ ॥४१॥« कद्दा--॥ ४१ ॥ “राम आज बड़े भाग्यम्‌ में तुम्हारा पे मि ; भें ! विकसित कमळके समान गल देख गणा हें; गनिदर- दिश्या पश्यामि ते राम मुखं फुछ्ठाम्बुजोपमम्‌ । ` विकसित मठके समान गुल देख मत ह; मुनितर भरनग्रहात्सर्वे सम्पन्न मम शो भनम्‌ ॥४२॥ वी अनुग्रहसे सत्र प्रकार मरा कल्याण हा एका” इंदाडुादाउ सत्न मम शालिनस्‌ १०२ | ४२॥ ऐसा कह ये इनदं पुनः पुनः स्टयमे इत्युक्त्याऽऽप्राय मूर्थानमालिङ्गय च पुन! पुन! । रगा और उनका मलक सूख भवयत हापसे होंग महताळविशे ब्ह्नन्द गतो यथा ॥8३॥ अ जलने उसे र आर _ 31 अ महाराज जनकेन उन्हे रानियों और राजडुमारोके शोभन सवेभोगाळ सदारः ससुतः सुखो ॥४४॥; मह्मं सुख-पूर्वक उददराया ॥ ४९ ee 8 छा नननमनननमानअनत आज्ञा आाडू 5: झ:::5:::ंि)्:)ै्ि पद: ग्य/। गए: पट I Te न ` ततः शुभे दिने उने हुते रघूत्तमम्‌ | , पिर झुम दिनमे झुम महर्च और त्याके समय आनयामास धाज्ञो रामं सञ्रातृकं तदा ॥४५॥ १. जनक्जीन भाइयोसधित राम इुटाया हे 111 1 9७।॥ ओर एक स्शोनासम्पन्न विलीण रतस्तम्भसुविस्तारे सुविताने सुतोरणे। | मण्डपममें जिसमें रहजदित स्तम्भ, सुन्दर विदान, मण्डपे सर्वशोभावय मुक्तापुष्पफलान्विते ॥४६॥! मनोहर मोतियोंकी झालर तथा मतिं पुष्प और २ _ व । फ टगे हुए थे, तथा जो सवर्ण-मपण-मपित बेद- द्धिः सुसम्बाधे जाक्षगः सर्णभपिते! ए 4, उवणे-भूपण-भपित्त बेद वदावः सुसस्वाघ ब्राह्मण! स्वर्णभू[पत! | | पाठी ब्राह्मणोसे खचाखच भरा हुआ था और सुन्दर सुवासनीभिः परितो निष्ककण्टीमिराइते ॥ ४७ | व धारणं किये निप्ककण्ठा (सुद्दागिन ) नारियोसे मेरीटुनदुभिनिषोवेगी वर _ समाकुछ था, श्रीरामचन्द्रजाकों एक दिन्य-रल-जटित "र 8] गतिवुल्ल | समाकुल । सुवर्ण-सिंहासनपर बैठाया । उस समय भेरी और दिव्यरल्लाञ्चिते खणपीटे राम न्यवेशयत्‌ |॥४८॥ | दुन्दुभि आदि चराजों तथा नृत्य और गान आदिका वसिष्ठ कौशिक चैव शतानन्दः पुरोहितः । । पल, कोटाहृड हो रहा था ॥ ४६-१८ ॥ यथाक्रमं पजमिर यायो तब पुरोहित शतानन्दने श्रीवसिष्ठ और विझामित्रजी- म पूजायत्वा रामस्योभयपाइनेयोः ॥४९॥ | का क्रमशः पूजनकर उनको रामचन्द्रजीके दोनों ओर सर्ग ६ ] 'वालकाण्ट' | , ३१ w ITER ITE SSCS SSSI ४८१४८ UO NPA INNA NNN NNT ANN ७८४८१४४४०५ AAAS SSNS स्थापयित्वा स तत्रामि ज्यालयित्वा यथाविधि। | बैठा दिया । फिर वहाँ विधिपूर्वक अग्नि प्रज्वलित सीतामानीय शोभाढ्यां नानारत्लविभ्ूषिताम्‌।५०।| कौ गयौ तथा नानारह-विभूषिता सीताको साथ | NN लेकर महारानीसहित महाराज जनकजी कमलनयन सभाया जनक; भरायाद्राम राजीवलोचनम्‌ । | रामजीके पास आये और विधिपूर्वक उनके चरण पादौ प्रक्षाल्य विधिवत्तदपो मूध्न्येथारयत्‌ ॥५१॥| धोकर अपने शिरपर भरणोदक खखा ॥ ४९-५१ ८ नस जिसे शिव, ब्रह्मा और अन्यान्य मुनिजन भी सदा धता मान शर्वेण ब्रह्मण $ ग वि प दता भूवन शवण अह्मणा निभि सदा । [अपने मस्तकपर धारण करते हैं। फिर सीता- ततः साता कर इत्वा साक्षतोदकपूचकम्‌॥५२॥ | जीका हाथ पकड़कर उसे जल और चावळ-सहित रामाय प्रददौ परीत्या पाणिग्रहविधानतः पाणिम्रहणकी विधिसे प्रीतिपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीके कर-कंमळोंमे दे दिया और कहा--“हे रघुश्रेष्ठ ! मैं साता कमठपत्राक्षा स्वणंयुक्तादिभापिता ॥५२॥ | तुवर्ण और मुक्ता आदिसे विभूषिता अपनी पुत्र दीयते मे सुता तुस्यं प्रीतो भव रघूत्तम। | कमळ-छोचना सीता आपको सौंपता हूँ, आप प्रसन्न ~ a n न होइये ।” इस प्रकार सीताजीको प्रसन्नतापूर्वेक इति गरीतिन मनसा सीतां रामकरेऽपयन्‌ ॥५४॥ IS कर-कमलोमें सौंपकर जनकजी मुमोद जनको लक्ष्मी क्षीराब्धिरिचि विष्णवे । | ऐसे आनन्दमम्त हो गये जैसे क्षीरसागर श्रीविष्णु उमिलां चौरसी कन्यां लक्ष्म + भगवानके करकमळोंमें लक्ष्मीको सौंपकर हुआ था । कन्या ण हने iy ~ ओरसी है सका 1 हक््मगाय ददा श्या ७ पिर उन्होंने प्रसनतापूर्वक अपनी औरसी कन्या उर्मिला तथव श्रतिकीतिं च माण्डवीं भ्रातकन्यके | ¦; छक्ष्मणजीको विवाह दी ॥ ५२-५५ ॥ तथा अपने भरताय ददांवकां शत्र॒प्नायापरां ददौ ॥५६॥ | भाईकी पुत्रियाँ माण्डवी और भुतिकीति क्रमशः भरत , ण र शत्रुघको दीं ॥ ५६ ॥ इस प्रकार सुछक्षण- चत्वास दारसम्पन्चा आतरः शुभरुद्षणाः सग्पन्न चारों भाई पत्नियोंके सहित साक्षात्‌ दूसरे छोक- विरेजुः प्रभया सर्वे लोकपाला इवापरे ॥५७॥ पाछोंके समान अपने प्रकाशसे सुशोभित हुए ॥ ५७.॥ ततोऽप्रवी्सिष्ठाय विइवामित्राय मेथिः । तदनन्तर, मिथिछापति महाराज जनकने, पुत्री जनकः स्वसुतोदन्त॑ नारदेनामिभाषितम्‌॥५८॥ | जानकीको विषये देवर्षि नारदने जो कुछ कहा था An 6 | वह सब वृत्तान्त वसिष्ठ ओर विश्वामित्रजीको सुनाया यज्ञभूमिविशुद्भयथ कपतो लाइलेन मे! |॥ ५८ || वे वोठे--“एक बार मैं यक्षभूमिकी शुद्धिके सीतामखात्समत्पत्ना कन्यका शुभलक्षणा ॥५९॥ | लिये हळ जोत रहा था, उसी समय मेरे हलके सीता वितास । (अग्रमाग) से यह झुसळक्षणा कन्या प्रकट हुई ॥ ५९ ॥ तामद्राक्षमह ग्रात्या पुत्रकाभावभावतास्‌ समय मैंने इसे देखा और इसमें मुझे पुत्नीवत्‌ अर्पिता प्रियमार्याये शरबन्द्रनिभानना ॥६०॥ | प्राति हुई, इसलिये मैंने इस चन्द्रमुखीको अपनी प्रिय- एकदा नारदोऽभ्यामाद्विविक्ते मयि संख्ति। । पत्नीको सौंप दिया ॥६०॥ एक दिन जब मैं रणयन्महतीं वीणां ५ ह. एकान्तमें बैठा हुआ था मेरे पास महर्षि नारदजी अपनी णयन्महतीं बीणां गायत्नाराय्ण विश्वम्‌ ॥६१॥ | न नामकी वीणा बजाते और सर्वव्यापक श्रीहरि- पूजितः सुखमासीनो माझुवाच सुखान्वितः । का गुण गाते हुए आये ॥ ६१ ॥ मेरे पूजा-सत्कारादि बोळे, णुष दयकारणम्‌ ॥६२॥ | कर चुकनेपर्‌ . वे सुखपूवेक बैठकर मुझसे बोळे, शशु पचन बुत ताण्ड ध #ाजन्‌ ! -अपने कल्याणका कारणख्प यह परम शुद्ध परमात्मा हुपीकेशो भक्तालुग्रहकाम्यया। | वचन 'सुनो--॥ ६२॥ परमात्मा हृषीकेश मक्तोपर देवकार्यार्थसिद्वर्थ रावणस्य वधाय च ॥६३॥ | कृपा, देवताओंकी कार्यसिद्धि और . राबणका बध ३९ . . अध्यात्मरामायण | [सर्ग ६ ४०४४४४४0४१ RRS eer oer or RTT Te दरम्यान Tr कक जज व कर ७५ करक जज क पट कत कलक कलक ८ ९८०९० ७९ पल चर ७२४० ४८ ७७७७ ७४ णक ७ ह १70 ४७0 क करनेके = ९ तभ जातो राम इति ख्यातो मायामानुपवेपचक्‌ । के लिये माया-मानवरूपसे अवतीर्ण होकर 'राम' _ 0 $ परमे नामसे विख्यात दण हैं | वे परमेश्वर अपने चार भूर 1 परमंश्वरः ।।६४।। है ४ _ 1 आस्त दाशरयिभूत्वा चतुर्था परमेश्वरः ॥६ अंशोंसे दशरथको पुत्र हकर अयाष्याम रहत हे योगमायाऽपि सीतेति जाता वै तव वेश्मनि। ॥ ६३-६४ ॥ और इधर योगमायान तुम्हारे यहाँ ~ = = जन र अ ढ़ र्क अतस्त्वं राघवायेव देहि सीतां ग्रय्ततः ॥६५॥ | सीताको रूपसे जन्म लिया हे. । अतः तुम प्र यवक _ 0 , इस सीताका पाणिग्रहण रघुनाथजीके साथ ही करन नान्येस्यः पू्मार्यपा रामस्य परमात्मनः । और किसीसे नही-क्योकि यह पेसे दो परमार इत्युकत्वा प्रययो देवगतिं देवश्ुनिस्तदा ॥६६॥ | रामकी ही भार्या हे ।” ऐसा कहकर देवर्षि नारदर्जा गसे क = है पता विष्णो्े एमी विभाव्यते आकाइा-मागसे चले गये | ६५-६९ ॥ नबस इस फेदारस्थ जना पाता विष्योर्लहमीविशान्यते । सीताको मैं विष्णु भगवानकी भार्या र्ष्मा हीं समझता कर्थ मया राघवाय दीयते जानकी शुभा ॥६७॥ | हूँ | फिर यह सोचते हुए कि 'शुमलक्षणा जानकी- इति चिस्तासमाविष्ठ कार्यमेकमचिन्तयम्‌ | |को किस प्रकार खुनावर्जाको हूँ मैने एक युक्ति मत्पितामहगेहे तु न्यासभूतमिदं घुः ॥६८॥ | विचारी । पूर्वकाहों श्रीमदादेवरजीने निमुासुको भस्म कि | करनेके अनन्तर यह धनुष मेरे दादाके वहाँ धराहर्के ईश्वरेण पुरा पि पुरदाहाद नन्तरस्‌ । | हुपमें रकखा था मने यह सोचकर कि 'सीताके पाणि- धनुरेतत्पणं कायामिति चिन्त्य कृतं तथा॥६९॥ | ग्रहणके लिये सबके गर्वेनाशक इस घनुपकों ही पण षि उषां बाज हिय? वेसा हो किया। हे सीतापाणिग्रहार्थाय सर्वेपां माननाशनम्‌॥ | (तो) बनाना चाहिये वेसा हो किया। ह त्र 113 >०1-3०..५ मुनिश्रेष्ठ आपकी कृपासे यहाँ कमलनयन रामजी त्वत्मसादान्सुनिश्रेष्ठ रामो राजीवलोचनः ॥७०॥ | चन देखने आ गये; इससे गेरा मनोरथ सिद हो आगतोध् भरर फलितो मे मनोरथः । | गया। हे राम! आज मेरा जन्म सफळ हो गया जो ~ e 1 मैं ने देदी ही नाके साः अद्य मे सफछं जन्म राम त्वां सह सीतया ॥७१॥ | १ सनन सनान ददायमान आर बनाके साथ एक आसनपर त्रिराजमान आपको देख रहा हुँ | एकासनर्स्थ पश्यामि भ्राजमान रवि यथा । प्रभो ! आपके चरणोदकको सिरपर धारण करके ही त्वत्पादास्बुधरो ब्रह्मा सृष्टिचक्रमबतेक। ॥७२॥| त्रह्माजी सृष्टिन्चक्रके प्रवर्तक हुए हैं || ६७-७२ ॥ वलठिस्त्वत्पादसलिलं शत्वाऽभूदििजाथिपः मे वोद प्रतापसे बलिकों इन्ट-पद प्राह _ , _ हुआ हे और आपकी ही चरण-घूलिके स्पदासे अहल्या त्वत्पादपांसुसंस्पशादहल्या भर्तृशापतः॥७ जि पलक पी सच न वि बडो कल ॥७३॥ | तुरन्त पतिके शापसे मुक्त हो गयी | आपसे बढ़कर एव {चा न्‌एुक्ता का परवतताञधरक्षता।७४। हमारा रक्षक और कोन है ? | ७३-७४ ॥ जिनके यत्पादपङ्कजपरागसुरागयोशि- चरण-कमलू-परागके रसिक, काल-चक्रकों जीतनेवाळे वृन्दैजित भवभयं जितकालचक्रे! । नगान संसार्मयको भो पा टिया हैं तथा दतत क जनको ताम-कीत्तिनमें लगे रहकर देवगण दुःख और यज्नामकीतेनपरा जितदुः गत हेते ई न रा अतदशाका |झोकको जीत देते हैं, उन आपको मैं निरन्तर शरण वास्तसंव शरण सतत प्रप्य ॥७५॥ | प्रहण करता हूँ ” ॥ ७०५ ॥ स साया चूप! प्रादाद्राघवाय महात्मने | महात्मा रघुनाथर्जाकी इस प्रकार स्तुतिकर महाराज नारा | कोटिशतं रथानामयुतं तदा ॥७६॥ | जनकने उन्हें दहेजमें सो करोड़ दीनार (सुवर्णमुद्रा), | श्वाना "नड यादाइजानां पदशत त्था | ` | ददा हजार रथ, दरा हजार .घोडे, छः सौं हाथी, एक पत्ताना लक्षमक तु दासीनां त्रिशतं ददो 11७७1 | छाख पदाति और तीन सौ दासियाँ दीं ॥ ७६-७७ ॥ रे | | शि न क सर्गे७] -. |. बालकाण्ड ३३ दिव्याम्वराणि हारा मुक्तारत्रमयोज्ज्बलानू । | तथा सीताजीको भी पुत्रीवत्सळ जनकजीने अनेकों साताय जनफः ग्रादात्ी त्या दुहितृवत्सलठ। ॥७८॥ य वख तथा मोती और रह-जटित उज्ज्वल हार ये चसिष्ठादीन्सुसंपूज्य भरतं लक्ष्मणं तथा। देये ॥ ७८ ॥ तदनन्तर उन्होंने वसिष्ठादिकी पूजा पूजाथत्व फिर भरत, लक्ष्मण, रात्रुघ्त और राजा ददारथका } 1 यथान्यायं तथा दशरथ नृपम्‌ ॥७९॥ | धन-दानादिसे यथोचित सत्कार कर रुभे महाराज “अंसापयामास नृपो राजानं रघुसत्तमम। | दशरथो विदा किया । फिर माताओने रोती हुई सीताको सीतामालिङ्गच रुदतीं मातरः साश्रुलोचनाः।८०॥| गळे छगा नेत्रोमे जल भरकर कहा--1॥ ७९-८० ॥ ्श्रूशुश्रपणपरा चित्यं राममचुत्रता । न द सेवा व हुई सदा रामचन्द्रजी- ¦ की अनुगामिनी रह पातिब्रत-धमंका अवरूग्बन कर पातमत्ययुपाठरूय तए वर्स यथासुखम्‌ ॥(८१॥, सुखपूर्वक रहना” ॥ ८१॥ तदनन्तर रघुकुछतिलक प्रयाणकाले ... रघुनन्दन श्रीरघुनाथजीके कूच करते समय भेरी, मृदङ्ग, आनक भेरीसृदङ्गानकतयघोपः। । ओर तुयं आदि वाओंका घोष आकाइमें देवताओंके स़र्वासि भेरीघनतूर्यशब्देः ' बजाये हुए भेरी और तुयं आदिके घनधोर शब्दसे संमूच्छितो भूतभयङ्करोऽभूत ॥८२॥ | मिल्कर प्राणियोंको भय उपजानेवाला हुआ ॥ ८२ | इति श्रोमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे _ बाळकाण्डे पष्टः सर्गः ।।६।। Pr Nr iTS Rm 0 सप्तम सग परशुरामजीसे भेंट सूत उवाच सूतजी बोले--श्रीरामचन्द्रजीके मिथिलापुरीसे तीन अथ गच्छति श्रीरामे मैथिलाद्योजनत्रयभ्‌ 1. | पोजन चले जानेपर नृपश्रेष्ठ दशरथजीने अत्यन्त घोर निमित्तान्यतिधाराणि ददर्शी ° अपशकुन देखे ॥ १॥ तब उन्होंने बसिष्ठजीको. एनामत्तान्यतिघाराण ददश नृपसचमः॥ १॥ प्रणाम करके पूछा --“े मुनिश्रेष्ठ | कया कारण है नत्वा वसिष्ठं प्रच्छ किमिद चुनिषुङ्गव । कि चारों ओर भयङ्कर अपशकुन दिखायी दे रहे निमित्तानीह ध्व्यन्ते विषमाणि समन्ततः ॥ २॥ | हैं ?” ॥ २॥ : वसिष्टस्तमथ प्राह भयमागामि सूच्यते । बसिष्ठजीने कहा--“इन अपशङुनोसे किसी पनरण्यभयं तेड्य शीघ्रमेव भविष्यति| ३॥| आगामी भयकी सूचना होती है, किन्तु ( साथ ही ~ . यह भी सूचित होता है कि ) फिर शीघ्र ही अभय मृगाः प्रदाथण यान्ति पश्य त्वा शुभद्चकाः। | पराप्त होगा ॥३॥ क्योंकि देखो तुम्हारी दायीं तेचं वदतस्तस्य बया घोरतरोऽनिरः ॥ ४॥| ओर शुम-्सूचक मृगगण जा रहे हैं ।” बसिष्ठजीके श्रक्षपि सर्वेपां पांसुवृष्टाभिरदे हते ही बड़ा प्रचण्ड वायु चलने लगा ॥ ४ ॥ मुप्णश्क्ष॑पि सर्वेपां पांसुबवष्टिमिररदयन्‌। |ऐसा क ग छठ ` जन्ददर्शाग्रे वेजोराशिमपरि रु | उसने धूलि बरसाकर सबके नेत्रोंको मूद दिया । इसी कोटिख्रयप्रतीकाश विश्त्पुञ्ञसमग्रभस्‌ । तेजःपु् उपस्थित हुआ है ॥ ५ ॥ फिर उन्होंने करोड़ों तेजोराशिं ददाथ जामदगर्थ अतापवान्‌ ॥ ६॥ | सूर्योके समान तेजखी, विद्युत:पुक्षके समान प्रभा- i ६७ ५ 0 ३४ अध्यात्म्राम्नायण [ सम्‌ ७ ७० ५२५५ बल ७० ९) MANA Tw ५. ७०६ ७4 ७4 १४ ७४ ७७४ ७४३४ 'जीलमेषनिभ ग्रां जटामुण्डलमप्हितम्‌ | सम्पन्न महाप्रतापी, तेजोराशि, नीलमेधकी-सी आमा- SS HS १, 17101 80 te TS ढे उनतकाय, जटा-जटधारी हाथमे धनुष और परु घनु।परशुपाणि च साक्षात्कालमिवान्तकमू्‌ ॥७॥ | (६), प्रगियोंकी नाश करनेवाले, साक्षात काळके 60 ५ ५ 8 ~ 6 समान परशुरामज़ीकों आते देखा ॥ ६-७॥ 200 212 दा आनम्‌ । देखा क्रि कार्तवीर्यका वध करनेवाळे और गर्छे माप्त दशरथस्याभ्र कालमृत्यामवापरम्‌॥ ८॥ | क्षत्रियांका मानमदन करनेवाले परशुरामजी जो दुसर ` ` | यमराजके समान हं महाराज दशरथके पास खड़े है ॥८॥ Fs तु इष्ट्वा भयसन्त्रस्तो राजा दशरथस्तदा । उस समय महाराज दरारथ उन्हें देखते ही भयभीत DS हो गये और अर्ध्यादिसे उनकी पूजा करना भूलकर अध्याद्शूजा विस्तृत वाहि त्राहीति चारीत्‌ ९॥ पक्षा करो, रक्षा वारो”-ऐेसा कहकर पुकारने पे ५ >। ' | छगे ॥९॥ ओर दण्दबत प्रणाग करके घोटे-- द हपत्यायपत्याह इत्र्थे मयच्छ से। म्चे पुत्रके प्रार्णाका दान दीजिये | शत बुवन्त राजाचमनाइत्य तमस | १०।| इस प्रकार प्राथना करते इए राजाको आर | उवाच निष्ठुर वाक्य क्रोधाठाचलितेन्द्रिय! । भी ध्यान न देकर उन्होंने ऋषसे याहु हो कठार हे वाणीसे रघृत्तम श्रीरामचन्द्रजीसे कद्दा--- “अरे क्षत्रिया- त्व रास इति तान्ना से चरात क्षात्रयाधम ॥११॥ | घम | ठ मेरे ही समान दाम नामसे विख्यात होकर इन्दरयुङ प्रयच्छाशु यदि त्य क्षत्रियोऽसि चे | पृथिवीमं विचरता हैं ॥ १७-११ ॥ सो यदि त्‌ वास्तव क्षत्रिय हे तो मेरे साथ इन्दयुद्र कर; एक_ पुराण जजर चाप भडकत्वा त्ये कत्थसे युधा ॥ ९ २॥ पुराने जीण-शीण धनुपकों तोड़कर व्यथ ही अपनी असिंमस्तु वैष्णवे चाप आरोपयसि चेद्‌ गुणम्‌। | प्रशांसा कर रहा है? ॥ १२॥ अरे रुन! तदा बुद्ध त्यया सार्धं करोमि रघुवंशज ||! | यदि त इस मेणाय श्रसुपपर रोंदा चढ़ा देगा तो मै साथ युद्ध करूगा | १२॥ नहीं ता, में अमी नो चेत्सर्वान्हनिण्यामि क्त्रियान्तक्रोह्यहम । सबको मार डागा व्योकि क्षत्रियोंका अन्त करना तो इति हुवति वे तरिमश्चचाठ वसुधा भृञ्ञस्‌ ॥१४॥ | मेरा काम ही है।” परचुरामजीके ऐसा कहनेपर पृथिवी बारम्बार कॉपने छगी॥ १४ ॥ और सबके अन्धकारा चभूवाथ्‌ सूवपामाप चक्षुपाम | नेत्रेके सामने अन्धकार छा गया । रामी दाशरांथेवीरो वीहष्य त॑ भार्गवं रुपा १५|| तव दशरृथ-नन्दन वीरवर रामने परशुरामजीकी ओर रोपपू्वक देखते हुए उनके हाथसे धनुष छीन लिया और उसपर अनायास हां रादा चढ़ाकर अपने तरकशसे बाण” तूणीराद्वाणमादाय संधायाकृष्य वीर्यवान्‌ ॥१६॥ | निकाल्कूर उसपर रकल और उसे खींचकर भरगुनन्दून | परथुरामजीसे कहा--अह्मन्‌ ! मेरी ब्रात सुनो, मेरा उत्राच भार्गवे राम शृणु ब्रह्मन्वचो मम । बाण अमोध है--यह व्यर्थ नहीं जाता । इसके डिये शीघ्र ही छक्ष्यृ दिखाओ ॥ १५-१७ ॥ (अपने पुण्यसे ठुल्य दय वाणस्य द्यमोथो मम सायकः । १७) जीते हुए ) लोक अथवा अपने चरणे ये छोकान्यादयुर्ग वापि बदू शीघ्र ममाज्गा। | रे मेरी आह्ासे श्र हाँ किसी एकको बताओ | (उसको इस बाणसे बेध डुट्गा ) अब अय ठाक, परा बाथ त्यया गन्तु न शक्यते | १८॥ तुम इस लीक या परलोके कही नहीं जा सकते ॥ १८ घचुराच्छिय तड्सादारोप्य गुणमखसा | संग ७] ५७४ का कप जानन चा ४ ७ TTR कोण्ड एंव त्व हि ग्रंकर्तन्य वेद शीघ्र मंमाञयी । एन वर्द्ति श्रीरमि भागेवों विकृताननः ॥१९॥ संखरन्पूधदत्तान्तामेदे वचनमत्रवीत्‌। «रम राम महावाहो जाने त्वाँ परमेश्वरम ॥२०॥ पुराणपुरुष॑ विष्णुं जगत्सशेलयोद्धवमू । गधयितमञ्जस न+ तो नट ततः प्रसक्ञा देवेशः शङ्कचक्रगदाधरः । उपाच मां रंघुभ्रेष्ठ प्रसनंमुखंपडूजः ॥२३॥ श्रीयगवानुवाच उत्तिं तपसो बरह्म॑न्फालिंतं तें तंपो महत्‌ - गोदरे युक्तत्वं जदि दव्यपुक्षवम कार्तवीर्य पिठृहणं यदंथ तपसः श्रमः । तेतर्सि!सप्क्रेत्व॑स्त्व॑ हत्वां क्षत्रिय मण्डलम्‌ ॥९५॥ कृत्स्ना भूमि करयपाय दस्मा शान्तिमुपावह | तासे दाशरथिभूर्वां रामो5हम॑व्ययं) ॥२९॥ उत्पत्स्यै परया शक्त्या तदा द्रक्ष्यसि मां वतः | मत्तजः पनरादास्ये त्वयि दत्त मया पुरा ॥२७॥ तदा तंपश्चरछकि ति त्व ब्रह्मणो दम | ७० ७९ ७८०१७१ ७३ ७४ ६७ ७४९४९४६०९८ ४४ ६९/७५/६०६५ ६० ३४ ७ ६७ ४० ३७९७० ७७७४ 20.70. ७७० ४१७४७० ४४७ WU NA LU PUN ४८४० ४८४७-४४-०७ अब तुम्हारे साथ मेरा जो कुछ कतव्य हैं वह तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही बताओ ।” रामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर भगु-नन्दन परझुरांम- जीका मुंख मलिन हो गया ॥ १९ ॥ फिर उन्होंने पूर्व- वृत्तान्तको स्मरण कर यह कहा--“हे राम | हे राम ! हे महाबाहो | मैंने आप परमेश्वरको जान लिया ॥२०॥ आप साक्षात्‌'संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और ग्र्यके परम पवित्र चक्रतीरथमें , पहुँचा और वहाँ प्रति- दिन अनन्यमावसे तपस्या करते हुए मैंने परमात्मा नारायण भगवान्‌ विष्णको प्रसन्न किया ॥ २१-२२ ॥ हे रघुश्रेष्ठ | उस समय शाह्व-चक्र- गदाधारी प्रसन्नवदन देवेश्वर बिष्णनें मुझसे प्रस होकर कहा ॥ २३. श्रीभगवान्‌ बोळे-हे ब्रह्मन | तपस्या . छोड़कर खड़े हो, तुम्हारा महान्‌ तप सफळ हो गया । तुम मेरे चिदंशसे युक्त होकर, जिसके, .ळिये ,यह तपस्या करनेका कष्ट उठाया है उस पितृघाती हैहय- श्रेष्ठ कार्तवीर्यैका वध करो और फिरे इक्कीस बार समस्त, क्षत्रियोंकी मारकर || २४-२५ ।। सम्पूर्ण ` पुथिवी कर्यपर्जीको दे शान्ति लाभ करो। मैं अविनाशी . परमात्मा , त्रेतायुगे .. दररथके . , यह राम' नामसे जन्म दूँगा । उस समय मेरी परमशक्ति | (सीता) के सहित तुम मझे देंखोगे । तब (पहले) इस समय तुम्हें दिया हुआ अपना तेज मैं फिर ग्रहण कर छुँगा || २६-२७ || तबसें तुमः तपस्यां करते हुए पान्त-पर्यन्त _पृथिवीमें रष्टोगे । ऐसा, :कहकूर भगवान्‌ विष्ण अन्तर्धान हो गये; और मैंने जैसा „ˆ इत्युकत्वान्तदधे देवस्तथा सर्वे कृत मया ॥२८॥ | उन्होंने कहा था वैसा ही किया ॥ २८॥ यं एवं बिष्णस्त्व रामं जातांश त्रह्ंणाथितः मयि स्थित तु समत्तेजस्त्रयेव पुनराहुतम्‌ ॥२९॥ आ अंचे में सफले जन्म प्रतीर्तेडिसि मर प्रभो । र दिर म् प्रदे: पारगी मतः ॥३०॥ त्वयि जन्मार्दिपड्भावा न संन्ततीनिसभंवा: | हे राम ) आप वही विष्णु हैं ।. अह्ाकी प्राथनासे पने जन्म लिया है । आपका जो तेज मुझमें स्थित वह आंज आपने फिर ले लिया ॥ २९ ॥ हे प्रमो.] res प्रकृतिसे भी परे माने गये हैं ॥ ३० ॥ ऑपमें अज्ञान" जन्य जन्मादि छः. माव-विकार नहीं, हैं तथा आप पकारो पूणस गमनादि ॥२१॥ गोगटे रहित निर्विकार और पूण है॥३१॥ ३६ यथा जले फेनजाएं धूमो वही तथा त्वयि । त्वदाधारा सद्विपया माया कार्य सूजत्यहो ॥३२॥ यावन्मायाबृता लोकास्तावसां न विजानते । अविचारितसिद्वैवाऽविद्या विद्याविरोधिनी ॥३३॥ अविद्याकृतदेहादिसङ्घाते प्रतिविम्त्रिता । चिच्छक्तिजीबलोकेऽस्मिन्‌ जीव इत्पमिधीयते।२४। यावदेहमन/प्राणबुद्धधादिघामिमानवान्‌ | तावत्कतृत्मभोकुत्वसुखदुःखादि भाग्भवेत्‌ ॥३५॥ आत्मनः संसृतिर्नास्ति बुद्वेक्षानं न जात्विति । अविषेकादूहय॑ डा संसारीति प्रवर्तते ॥१६॥ जडस्य चित्समांयोगाचिस्ं भूयाचितेस्तथा । जडसङ्गा्डत्वं हि जलाग्नथोर्मेलनं यथा ॥३७॥ यावच्त्पादभक्तानां सङ्गसोख्यं न विन्दति । तावत्ससारदुःखोघान्न निव्तेन्नरः सदा॥३८॥ तत्सङ्करुूधया भक्त्या यदा त्वां सञ्चुपासते । तदा माया शनैर्याति तानवं प्रतिपद्यते ॥३९। ततस्त्वज्ज्ञानसम्पन्नः सद्गुरुस्तेन लभ्यते । वाक्यज्ञानं गुरोलेब्ध्वा त्वस्प्रसादाहियुच्यते ॥४०॥ तसाचडद्धक्तिहीनानां कर्पकोटिशतेरपि । न पुक्तिशज्का विज्ञानशङ्क्गा नेव सुखं तथा ॥४१॥ अतस्त्वत्पादयुगले भक्तिर्मे जन्मजन्मनि । साखद्भक्तिमतां सङ्गोऽविद्या याभ्यां विनश्यति ॥ ठोके त्वद्धक्तिनिरवास्त्वद्वमामृतवर्षिण! | ~ पुनन्ति लोकमखिल किं पुनः खकुलोड्भवान्‌॥ ४३।' अध्यात्मरामायण IIT कका तसन्रुनक्क्मकम्प्कगनुमुकत् ६३७५९%१ ६० ६४ ७४ वह ५० ७३९० ६०१० क० बढ़ + ७०० 20०७ TT ७४ 0७४७ के [ सगे ७ अहो ! जळके फेन-समूह और अझिके धृएँके समान आपके आश्रित और आपहीको विपय करनेवाली माया नाना प्रकारके विचित्र कार्योकी रचना करती है ॥ ३२ || मनुष्य जवतक मायासे आबृत रहते हैं तबतक आपको नहीं जान सकते । विद्याकी विरोधिनी यह अविद्या जवतक विचार नहीं किया जाता तमी तक रहती है ॥ ३३ ॥ अविद्याजन्य देहादि संघातम्‌” प्रतिविम्वित हुई चित-ाक्ति ही इस जीव-छोकमें जीव! कहलाती है ॥ ३४ ॥ यह जीव जवतक देह, मन, प्राण और बुद्धि आदिमें अभिमान करता है तमीतक कतृत्व, भोक्तृत्व ओर सुख-दुःखादिको भोगता है ॥ ३५ ॥ वास्तवमें आत्मामें जन्म-मरणादि संसार किसी भी अवस्थामें नहीं है और बुद्धिमें कमी ज्ञान- शक्ति नहीं है । अविवेकसे इन दोनोंको मिलाकर जीव “संसारी हूँ ऐसा मानकर कर्ममें प्रवृत्त हो जाता है || ३६॥ जळ और अग्निका मेळ होनेसे जैसे जलमें उष्णता और अग्निमें झान्तता उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार जड (बुद्धि) का चेतन (आत्मा) से संयोग होनेसे उसमें चेतनता और चेतन आत्मा-_ का जड-बुद्धिसे संयोग होनेसे उसमें (कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि) जडता प्रकट हो जाती है ॥३७॥ हे राम ! जबतक सचुष्य आपके चरण-कमळोंक्रे भक्तोंका संगसुख निरन्तर अनुभव नहीं करता तबतक संसारके दुःख- समूहसे पार नहीं होता ॥ ३८ || जब बह भक्तजनों- के सहसे प्राप्त हुई भक्तिद्वारा आपकी उपासना करता है तब आपकी माया रानेः-शनैः चली जाती है और वह क्षीण होने लगती है || ३९ ॥ फिर उस साधकको आपके ज्ञानसे सम्पन्न सद्गुरुकी प्राप्ति होती है और उन सदूगुरुदेवसे महावाक्यका बोध पाकर वह आपकी कृपासे मुक्त हो जाता है ॥ ४० | अतः आपकी भक्तिसे शून्य पुरुषोंको सौ करोड़ कल्पोंमें ˆ भी मुक्ति अथवा ब्रह्मज्ञान प्राप्त होनेकी सम्भावना नहीं | है और इसीलिये उन्हें वास्तविक सुख मिलनेकी भी सम्भावना नहीं हैं ॥ 9१ ॥ अतः मैं यही चाहता हूँ कि जन्म-जन्मान्तरमें आपके चरण-युगछमें मेरी भक्ति हो और मुझे आपके भक्तोंका सङ्ग मिले क्योंकि इन्हीं दोनों साधनोंसे अविद्याका नाश होता है | ४२ ॥ संसारमें आपकी. भक्तिमें तत्पर और भगवद्धर्म-रूप अमृत- क्री वर्षा करनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण छोकको पवित्र बालकाण्ड | ३७ Ce i CO क क्यक्‌ है ` नमोऽस्तु जगतां नाथ नमस्ते भक्तिभावन। | कर देते हैं, फिर वे अपने कुल्पें उत्पन्न हुए पुरुषोको .. | पवित्र कर देतेहैं, इसमें तो कहना ही क्या है! ॥४३॥ नमः कारुणिकानन्त रामचन्द्र रे । | रुणिकानन्त रामचन्द्र नमोडस्तु त128॥ ह जगन्नाथ ! आपको नमस्कार है । हे भक्तिमावन ! देव यद्यत्कृतं पुण्यं मया लोकजिगीपया । | आपको नमस्कार है। हे करुणामय ! हे अनन्त ! मु आपको नमस्कार है । हे रामचन्द्र | आपको बारम्बार तत्स्च तव वाणाय भूयाद्वाम नमोऽस्तु ते ॥४५॥ | नमस्कार है ॥ ४४ ॥ हे देव ! मैंने पुण्यलोक-प्राततिके तः प्रसन्नो भगवान्‌ श्रीरामः करणामया।।.. | |.) उ हों। हे राम किये हैं वे सत्र आपके इस है दत वाणके उक्ष्य हों । हे राम आपको नमस्कार है” ।४५॥। प्रसञ्ञोऽसि तव ब्रह्मन्यत्ते मनसि बतेते।॥ ४६। तव करुणामय भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रने प्रसन्न होकर ' _ , ५ कहा--“हे ब्रह्मन्‌ ! मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारे हृदयमें जो-जो दासे तदखिल कामं मा छुरुष्वात्र संशयम्‌। | क्षामनाएँ हैं उन समाको मैं पूर्ण करूँगा, इसमें सन्देह ततः प्रीतेन मनसा भारीवों राममजगीत्‌ ॥ ४७) | न करना ।” तव परझरामजीने प्रसन-चित्त होकर ह _ न रामसे कहा-1 ४६-४७ || “हे मधुसूदन राम ! यदि यदि मेश्लुग्रहो राम तवास्ति मधुस्रदून । । आपकी मेरे ऊपर कृपा हैतो मुझे सदा आपके भक्तोका सङ्गकतसङ्गसत्रतपदे दढा भक्ति! सदास्तुमे॥४८॥ संग रदे और आपके चरण-कमलेंमे मेरी छु भक्त हो ॥ ४८॥ तथा कोई भक्तिहीन पुरुष भी यदि स्तोत्रमेतत्पठेधस्तु भक्तिहीनोऽपि सर्वदा इस स्तोत्रका पाठ करे तो उसे सर्वदा आपकी भक्ति टे. PT ~ ~ मिले अन्तमें की स्वद्भक्तिस्तस विज्ञान प्यादन्ते स्तिस्तव॥॥४९॥ | (९५ जर शान प्रत हो तया अन्तमं आपकी समति "तंथेति शाघत्रेणोक्तः परिक्रम्य प्रणम्य तम्‌ । तदनन्तर रघुनाथजीके ऐसा ही हो' इस प्रकार ह महेन्द्रा कहनेप्र परशुरामजीने उनकी परिक्रमा कर उन्हें प्रणाम [तर तदयुज्ञात हू मन्म गात्‌ | uw कहे गे पूजितस्तदचुज्ञातो महेन्द्राचलमन्वगात्‌ ॥५०॥ | या और उनसे जिर हो उनकी आहाते महेन किक ७ 1 | चे o राजा दशरथों हुए। राम सतमिवायतस्‌ | पवतपर चले गये कि ७० ॥ राजा दशरथने रामको 2... 2 - - , मानों मृत्युसे छोटे हुए समश्च अत्यन्त हृषसे आलिद्गवालिङ्गघ हर्षण नत्राभ्यांजलमुत्यूजत!५१ बारम्बार आलिंगन किया और नेत्रोसे आनन्दाश्रुओं- > ी की वर्षा करने ळगे ॥ ५१ ॥ तदनन्तर वे सब प्रसन- $ सन $ . न ww ततः अतिन मनसा खखबित्तः पुर यमौ । चित्तसे अपनी अयोध्यापुरीम आये । वहाँ पहुंचकर रामलक्ष्मणशमरुप्तमरता देवसमिता।। | राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रु अपनी अपन पति TR फिरे रत्नि साथ देवताओंके समान अपने अपने महळोमे रमण - सासा मार्यांधुपादाय रेभिर सवस्मन्दिरे (५२! | न को || ५२॥ सीताके सहित ऑरामचन्द्जी "्ातापिठम्यं सहो रामः सीतातमन्वितः । | अपने माता-पिताओंका आनन्द हते इर इस प्रकार दर्गा लद रमण करने ळो जैसे बैडुण्ठ-छोकमें भगवान्‌ बिष्णु रसे वेकुण्ठभवने श्रिया सह यथा हरिः ॥५३॥ | ह्ह्मीजीके साथ विहार करते हैं ॥ ५३ ॥ युधाजिन्नाम केकेयीआता भरतमातुलः | इसी समय कैकेयीके भाई भरतजीके मामा » = 4 ग्रीतिसं . भरतव ीतिपूर्वक अपने यहाँ ळे जानेके गच्छत्सराज्य॑ प्रीतिसंयुतः ॥५४॥ युधाजित्‌ भरतको प्र भरत नेतुपाग डतर ड लिये आये ॥ ५४ ॥ शत्रुदभन महाराज दशारथने भी भ्रपयामास भरत राजा स्मेहसमान्वतः । श्रुधाजितका सत्कार कर उनके स्नेहवश भरत शत्रु चापि संपूज्य युधाजितमरिन्दमः और झत्रुँ्तकों उनके साथ मेज दिया ॥ ५५ ॥. ३८ _ अरध्यीत्मरामायण रे [स ननन न पुकतक+ रन कन शत क नस ० न+कण्पनक कम _ भक्त का घ० का कक कष्कन्क मन] मरण-त०क+का कक कर कण कन्फत रन कट सनु त फट कनक 7: कक का कम कक कतफतफ- कम कक क- मम क-उमकणकल्फ० कम पक+ कम क् ७० २७ ४० २८ ५० ६.७ ७७७० ६७ ७० ०५७ ७० ४९७७४४ ०५४९३ ३ ७३१५ ६४ ७०९० ९४ ९०४५ ९१ ७४ ४४ ४ ४८९७४७ ४७७ ७४९७७ ७४९७ ७४७00 घट १४ ४४७0 ४४४४४४१0१४१५४"४४१४४४१४ सुक्क कौरसेल्यो शुशम देवी रामणे सह सोतंया । | तदुपरान्त देवा. कीत्य रम औरं सौताके' संहितं मातेव पौलोम्या श्या शक्रेण शोभना ॥५६॥ | इस प्रकार छशीमित इर जैसे पुलोमें-पुत्री शची और इन्द्रके सहित देवमाता अदिति शोभायमान ताकत irr होती हैं ॥ ५६ ॥ जिनके गुणगर्ग तर्या औदिं सरवडे सहच लोकपालोंम प्रसि हैं, जिनकी कीति संम्पूर्ण छोकोंमें शरीरमा सीतिंयास्तेखिलजंननिंकेरां^ गायी जाती है, जो सारे मनुष्योके आनन्द-समूहका . -नन्द्सन्दोईसूतिः। [| ूति हैं, जो निय, शामाधोम,' निर्विकार, अनन्तः नित्यश्चीनिविकारो निरवधिबिभवो' . | वभव, और सदा मातीत होकेरे भी माया कीक रो मं नित्यमांयानिरासों अनुसरण करते हुए सदा मचुष्यके समान प्रतीत होते मायाकायानुसारी संनुजं इवं सदा हैं वे अखिलेश्वर भगवान्‌ राम सीताजौके साय साकेत भाति देवोऽसिलेशः॥|५७॥ | (-अयीध्यां ) धांमेमें विरजनं लगे ॥ ५७॥ १ «1 रु इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेस्वरसंबरादि बॉलंकाणेडे सप्तम: सः || ७॥' snes समापमिदै बालकाण्डम्‌ श्रीसीतारासाभ्यां नमः अध्यात्मरामायण अयोध्याकाण्ड iF ल, ९ 2 ५ ५- टे कट, _ र हि है... दत ves ७ ०. AP Cr orp fo cE TIER ENA कल्चर १. ३१८ ब. ह क आ पयार “जाड Ba “> . gor, MAM SO ST reer Teen Nr NN FTF TRICE DNR PNR TINS tt rr न्या ८८०० Veer ee oe आ ३४८ 47५०, roa ४५ 9 / / / / / / ¢ है / / शर रट 9 र , / ४ / / एस्ष्ट्रप्पऽ कफ फक PR क राणा र रारा र लारा NN १ क. क. य. क. ह या भी नव हळ. जळ SR Bene nar चाच Sm मनन पयला mae मनात Me Mime माज Mee pe Ce dm ee “जाम. “me pees कक Mme अमान “व ~ ~ = cf न ३ De ee we ee le) च र “वाळ » हे. ng CG (बजा च. ल मड कक a पे का ये आए. Ig आल री irr egg cr ear, Nee RE, TT डू [urasrintinnpineo in som mene H "*२५५५००--२१५५७०७४०७०+७ ४७ verve ५०५०-०० ० “०६५.. टा ‘te ८ हि SN SE SO SU CE वावी) “जो, >. विद, नम. आवि, “लीक, कवी, र्बके,. की | टिक यय बडा आड बही > ९४४१५१९०९११७९४१०४७५७०९९२४१९९४० क 21० ४। ७९ ) ४४७००००. Rn oe, ~ ~ ents at = Cn “धमीक, मका. क ई | - रा (का _ ॥/ i ई E _ ऱ्या ji | 6) E i) NE i वूड १ Ce a SC $ धमप > यक्त ४ * ee न १७ * शी TIES ` कथं मामिच्छसे ₹ roe SI SAH सन्‍र२४+क 999 कक +++ ०९०९ ५: रव 39 अध्यात्मरामायण Pr odode—- अ्योच्माकाण्ड हि TT आओ र प्रथम सगं भगवान्‌ रामके पास नारदजीका आना | श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेचजी बोले-हे पार्वति ! एक दिन जब एकदा सुखमासीन रामं स्वान्तःपुराजिरे । सर्वीलङ्कारविभूपित औरामचन्द्रजी अपने अन्तःपुरके सर्वाभरणसंपन्न आँगनमें एक रत्रसिंहासनपर सुखपूर्वक बैठे हुए थे मरणसंपन्नं र्रसिंहासने स्थितम्‌॥ १॥। | | १ || तथा जिस समय नीलेत्पलदर्श्याम कौस्तुम- “नीलोत्पलदलब्याम कास्तुभामुक्तकन्थरम्‌ । | मणिमण्डित उन रघुनाथजीपर श्रीसीताजी रत्तदण्डः आरळ ळी सीतया रनदण्डेन चामरेणाथ वीजितम्‌॥ २॥ | युक्त चंवर इला रही थीं ॥ २॥ और वे आदरपूर्वक दिये हुए ताम्बूल-चवणादिसे आनन्दित हो रहे थे उसी विनादयन्त ताम्यूलचनणादाभराद्रा | ` वं पद्म हे प्‌ समय उन्हें देखनेके लिये देवर्षि नारदजी आकारासे नारदाऽवतरष्रप्डुमस्बरायन्र राघवः ॥ २॥ | उतरे ॥ २॥ जुद्ध स्फटिक मणिके समान खच्छ और शुद्वस्फटिकसङ्काशः शरच्चन्द्र इधामलः | शरचन्द्रके समान निर्मळ दिव्यमूर्ति श्रीनारदजीको $ दृष्ट्या सहसोत्थाय रामः पर न जाहिः। | ढसा उठ खडे हुए और सीताजीके सहित प्रेम और त हदसा सहसात्याय रामन मात्या इताजाठ | | अत्तिपूर्वक हाथ जोड़कर परथिवीपर शिर रखकर उन्हे ननाम शिरसा भूमी सीतया सह भक्तिमान्‌ ॥ ५ । | प्रणाम किया ॥ ४-५॥ उचाच नारदं रामः प्रीत्या परमया युत)। । फिर भगवान्‌ रामने परम प्रीतिपूर्वक नारदजीसे संसारिणां अनितर शकता ® कहा--“हे मुनिश्रेष्ठ ! हम-जैसे विषयासक्त संसारी ससाणा युनिश्वष्ठ हुलभ तव दशनम्‌ | मनुष्योंके लिये आपका दशन अत्यन्त हुळम है | हे अस्माकं विपयासक्तचेतसां . नितरां सुने॥ ६ ॥ | मुने ! आज अपने पूर्वजन्म-कृत एण्य-पुञ्जके उदय होनेसे काच पूर्वजन्मकत >: ही मझे आपका दर्शन हुआ है, क्योंकि हे सुने ! अवाप्त -में पवेजन्मद्षतपुण्यमहांदयः । पुण्योदय होनेपर संसारी पुरुपको भी सत्संग प्राप्त हो संसारिणापि हि मुने रुभ्यते सत्समागमः ॥ ७॥ | जाता है ॥ ६-७॥ अतः हे मुनीश्वर | आज आपके 0 थोंऽरि क्व दर्शनसे ही में कृताथ हों गया, अब मुझे आपका क्या अतस्त्वदशनादेव कृतार्थोऽस्मि सुर्नाश्वर | कार्य करना होगा सो कहिये, उसे मैं (इस समय) कि कायं ते मया काय व्रहि तत्करवाणि भो॥ ८॥ | पूण करूँ ॥ ८॥ ४२ SS 0 ~ क. ५ तब नारदजीने भक्तवळाळ भगवान रामसे त St त्सल | तब नारद Spe अथ तं नारदोऽप्याइ राव भक्तवत्सलम्‌ कहा-- हि राम ! आप सामान्य मनुष्यकि- किं मोहयसि मां राम वाकयेलोंकाचुसारिमिः ॥९॥ | ३ इन वाक्योंसे गुम्ने क्यों मोडित कर 1 पसायहमिति प्रोक्ते सत्यमे विभो ॥९॥ हे विभो! आपने जो यह कडा कि संसायहमिति प्रोक्त सत्यमेतत्वया विमो | सरी हैं! सो ठीक दी है, बाकि ससूर्ण सागको जगतामादिभूता या सा माया शृहिणी तव ॥१०॥ | जो आदि-कारण है वह मावा. आपकी गृहिणी है लत्सनिकर्षाज्जायस्ते तस्यां जज्यादयः प्रजाः | |॥ १०॥ हे प्रभो) आपकी सन्रिविमात्रमे ही उस ~ ~ मायाये ब्रा आदि सब प्रजा? उत्पन्न होती हिं, बह त्वदाज्ञया सदा भाति माया या ब्रियुणास्मिका।११॥ सत्व-रज-तमोमयी ज्रिगुणाम्मिका माया सदा आपके पतेऽजसं शुङकृष्णरोहिताः सर्वदा प्रजाः । | आश्रित होकर हा भासमान होती है नमा खुणानुरूप गकयमहागेदे | शुन, छोहित और वृर्णा प्रजा ऊपन्न करती टे । इस लोकत्रय गृहस्थस्वमुदाहतः ॥१२॥ ब्लोका-रूप महायु आप सथ कार गये ॥११- त्व विष्णुजनिकी लक्ष्मी: शिवस्त्वं जानकी शिवा । ' १२॥ आप भगवान विष्णु हैं और जानकोजी छी हैं; PR SP ! आप दिव ऐं और जानकी पावती हि; आप बरमा रहम त्वे जानका वाणी सर्यस्त्व जानका प्रभा।१२। £ और जानकीजी सररवनी है नथा आप सर्यदेव हैं सवान्‌ शशाङ्कः सीता तु रोहिणी शुभलक्षणा । ` और जानकी प्रभा ह. ॥ १३॥ आप चन्रमा शक्रस्त्वमेच पौलोमी सीता स्पाहाऽनरो भवान्‌ ॥ ¦ ¦ । हैं, शुभरक्षणा सीताजी रोहिणी दिई आप रन्द्र हि ' और सीता पुलोग-वल्या शाची हँ तथा आप अशि य॒मस्त्वं काठरूपथ सीता संयमिनी प्रभो। हैं और सीताजी खादा हैं ॥ १४॥ हें प्रभो! नि्नेतिस्त्व॑ जगन्नाथ तामसी जानकी शुभा॥१५॥ ^ (कक कार्य वम ६ सर माता ` संयमिनी हैं, है जगनाथ ! आप निति है. आर राम त्वमेव वरुणो भार्गवी जानकी शुभा । . जानकीजी तामसी हैँ ॥ १५॥ हे राम ! आप वरुण वायुस्त्वं राम सीता तु सदागतिरितीरिता ॥१६॥ | ६. शौर उमटक्षणा जानकी भगु-कन्या वारुणो ह रस्त वा सर्वसंपत्मकी | आप वादु हैं तथा सीनाजी सदागति हँ॥ १६॥ द राम सीता सवसंपलकीर्तिता। । हे राम! आप कुबेर हैं और सानाजी उनकी सब | सम्पत्ति हैं तथा आप लोकमंहारकार स्थ हैं और रुद्राणी जानकी परोक्ता रुद्रस्त्वं ले ७! .. री विश र र्ड कार्डस ठाकनाशकृत १७ ताजा राणा कहलाती हैं ॥ १७॥ है राघव ! ठोके खीवाचकं यावत्तत्स जानकी शुभा |, निःसन्देह संसारगें जो कुट्ट पुरुषवाचक है वह सव र त ट्र | हुँ आ खावाचेक का सेब जानका काजा ह: अतः पुन्नामवाचर्क यावत्तत्सर्व त्वं हि राघव ॥१८॥ | ^ र सीवाचक सत्र श्रीजानकीर्णी हैं; अ त्वदामासोदिताज्ञानमव्याकृतमितीर्यते । | = ताक काता है, उससे ग तस्मान्महांस्ततः सननं लिज्ठं सर्वात्मक ततः ॥२०॥ | प डी य १ नर गा इम अहङ्कार बुद्धि पश्चप्ाणेनदर्याणि च। | बुद्धि, पञपराण और दश इन्दरियों--इनके समूहो लिज्ञमित्युच्यते प्राजैजन्ममृत्युसुखादिमत्‌ ॥२१॥ मयि मृतु और सुदि र [$ क ७. «७ ह ° र * ह्‌ ग्ग वि अवाच्यानाधवियेव कारणोपाधिरुच्यते ॥२२ | जीव नमसे विख्यात है | अनिर्वचनीय और अनादि ९ ५ | है देव ! त्रिळोकोर्मे आप दोनोसे अतिरिक्त और कुछ . तस्माह्लोकत्रये देव युवाभ्यां नास्ति किश्वन | १९॥ | भी नहीं है ॥ १८-१९ ॥ आपके आमाससे प्रकट ` क सर्ग १] अयोध्याकाण्ड . | ४३ TTT I ५४ ६० ४४९४ २० ४४०७५४४ ४४ ७७७३४ NIN NPN ८९ ७४५९७४ ७४७५१४० १५४ १८४४४४ ४४ ३४१७ UU ९० ७४४ UNS ७.० ७७९० UU UNS rN दकया स्थूलं तूक्ष्म कारणाख्यमुपाधित्रितयं चितेः । | अविद्या ही (इस जीवकी ) कारणउपाधि कही जाती एवैविद्िशो जीवः स्याट्वियक्तः परमेश्‍वर है ॥ २२ ॥ शुद्ध चेतनकी स्थूळ, सूक्ष्म और कारण- र जीवः स्याद्वियुक्तः परमेश्वरः ॥२३॥ | ३ तीन .उपाधियाँ हैं । इन उपाधियोंसे युक्त जाग्रत्स्वमसुपुप्त्याख्या संसृतियी प्रवर्तते । द वह जीव कहता है और इससे रहित होनेसे , परमेश्वर कहा जाता हे || २३ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! जाग्रत्‌, तस्या विलक्षणः साक्षी चिन्मात्ररतवं रघूचम॥२४। | प्न और सुषृप्ति-ऐसी जो तीन प्रकारकी सृष्टि है उससे त्त एव जगज्जातं त्वयि सर्व ग्रतिष्ठितस्‌ । | आप विलक्षण हैं और उसके चेतनमात्र साक्षी हैं ॥२४॥ क 5 ७ | यह सम्पूर्ण जगत्‌ आपहीसे उत्पन्न हुआ है, आपही- स्वय्येच ठोयते कृत्स तस्माचचं सवेकारणम्‌ ॥२५॥ | में स्थित है और आपहीमें छीन होता है । इसळिये हिमिवास्मान जीव व आप ही सबके कारण हैं ॥ २५ ॥ रज्जुमें सर्प-भ्रमके रज़ावहिमिवात्मान जीवं ज्ञात्वा भयं भवेत्‌ । | समान अपनेको जीव गाननेसे मनुष्यको भय प्रात्माइमिति ज्ञात्वा भयदुःसैविंमुच्यते ॥२६॥ | होता है पर वही जव यह समझ हेता है कि मैं चिन्मत्रज्योतिपा सवीः सर्गदेहेप ` परमात्मा हुँ' तो सम्पूर्ण भय और दुःखोंसे छूट जाता न्मात्रज्योतिपा सवाः सबेदेहेपु बुद्धघ/। हे ॥२६ ॥ क्योंकि चिन्मात्र ज्योतिखरूप आप ही त्वया यस्मात्प्रकादयन्ते सर्वस्यात्मा ततो भवान्‌ ॥ : सवके शरीरोंमेंखित होकर उनकी बुद्धियोंको प्रकाशित TR ! कर रहे है. इसलिये आप ही सबके आत्मा हैं ॥२७॥ अज्ञानान्न्यस्यते सवे त्वयि रजो शुजङ्गवत्‌ । , रज्जुमें सर्प-प्रमके समान अज्ञानसे ही आपमें सम्पूर्ण त्वज्ज्ञानाहीयते सः $ सदार | जगतकी कल्पना की जाती है सो आपका ज्ञान होनेसे ज्ज्ञानाछ स्माज्ज्ञान सदाभ्यसेत्‌ ।२८।' दि 2 . छज्जानाछीयते सम तस्माज्ज्ञानं सद सेत्‌ | बह सब लीन हो जाती है। सुतरं मह॒ष्यको सदा हे स्वत्पादभरि विज्ञान भवति | ज्ञानका हिये ॥२८॥ आपके चरण- वत्पादभक्तियुक्तानां विज्ञानं मवति क्रमात्‌ । । शनक अन्यास करना चा ज ठ जता व ३ कक ह ! कमलोंकी भक्तिसे युक्त पुरुपोंको ही क्रमशः ज्ञानकी तस्माचद्धक्तियुक्ता ये मुक्तिभाजस्त एव हि ॥२९॥ ¦ प्राप्ति होती है, अतः जो पुरुप आपकी भक्तिसे युक्त अह लवद्भक्तमक्तानां ! च किङरः | हें वे ही वास्तवमें मुक्तिके पात्र हैं ॥२९॥ हे प्रमो ! अह तव. तद्धक्ताना च कहर! । | मैं आपके भक्तोंके भक्त और उनके भी भक्तोंका दास अतो मामचुगृहीण्य सोहयस्व न मां प्रभो ॥३०॥ ; हूँ; अतः आप मुझे मोहित न कर मुझपर अनुग्रह गेत्पन्ने ~ ` कीजिये ॥२०॥ हे प्रभो ! आपके नामिकमल्से उत्पन त्वन्नाभिकमलोलपन्नो ब्रह्मा मे जनकः प्रभो । हुए ब्रह्माजी मेरे पिता हैं, अतः में आपका पौत्र हूँ ! अतस्तवाहं पात्रोऽर्मि मत्तं मां पाहि राघव ॥३१॥। हे राघव ! आप मुझ भक्तकी रक्षा कीजिये” ॥३१॥ . इत्युकत्वा वहुशो नत्वा स्वानन्दाश्चुपरिप्छतः । । इस प्रकार कहकर और वारम्वार प्रणाम कर i , गा नोदितोऽरम्यहय्‌ ॥३२। | श्रीनारदजीने नेत्रोमें आनन्दाश्रु भरकर कहा--“हे उवाच वचन राम रसया नदताजरननह | रघुश्रेष्ठ ! मुझे ब्रह्माजीने आपके पास भेजा है; आपका रावणस्य वघाथीय जातोऽसि रघुसत्तम। ; अवतार रावणका वथ करनेके लिये हुआ है, किन्तु | अब पिता दशरथ आपको राज्यशासनके लिये अभिषिक्त | करनेवाले हैं ॥२२-२२॥ हे राम ! यदि राज्याभिषिक्त यदि राज्याभिसंसक्तो रावणं न हनिष्यसि । , हो जानेपर आप राबणको न मरेंगे तो प्रथिबीका RD र भार उतारनेके लिये जो आपने प्रतिज्ञा की थी उसका प्रतिज्ञा ते कृता राम भूभारहरणाय वे ॥३४॥ क्या होगा ? ॥३४॥ अतः हे राजेन्द्र | आप उसे सत्य तत्सत्यं कुरु राजेन्द्र सत्यसंधस्त्वमेव हि । कीजिये क्योंकि आप सत्य-प्रतिज्ञ ही है ।” इदानीं राज्यरक्षार्थ पिता त्वामभिपेक्ष्यति ॥३ ३ | ल्या [ संग २ छे ता , अध्यात्मरासाथण 1111 तान न्ती ४ ASST , , ति क के सुनकर मचर ने मसका- चैतदवदितं र ५॥ |. नोरदजीके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द् जीने मुसका- श्रुत्वैतद्वदित रामो नारदं प्राह सस्मितम्‌ ॥ रे कर कहा ॥३५॥ “नारदजी ! झुनिये, क्या कोई शरण नारद मे किश्चिद्विधते5विदितं क्कचित्‌ | ऐसी बात भी है जिसे म न जानता दड मैन RE] नर e ळे क्छ CN मै निर हृ पूर्ण तया च यत्पर करिष्ये तन्न संशय! ॥२१६॥ | पहले जो कु प्रतिज्ञा की हे वह आओ कस क ५ है | करूँगा ॥२६॥ किन्तु काढक्रमसे जिन-जिनका प्रारव्ध किन्तु कालालुरोधेन तत्तत्परारब्धसक्षयात्‌ । हाण होता जायगा उन-उन देत्योंको ही मारकर म क्रम हरिष्ये सर्वेभूभारं क्रमेणासुरमण्डलस्‌ २७ पुथिवीका भार उतारूँगा ॥९७॥ ` राबणका वथ करने रावणस्य विनाशार्थ रो गन्ता दण्डकानंनम्‌ । | के लिये मैं कळ दण्डकारण्यको जाऊगा और वह. ह ~ दह वर्ष सुनिवेप धारण कर: रहूँगा ॥ ३८ ॥ उस चतुर्दश समास्तत्र ह्यपित्वा मुनिवेषश्धक्‌॥रे८॥ चोद सीता रके भिमसे में कुटुम्बके सहित नष्ट सीतामिपेण त॑ दुष्ट सकुलं नाशयाम्यहम्‌ । | कर ढूँगा।” एवं रामे प्रतिज्ञाते नारदः अप्ठमोद ह ॥३९॥ | रामचन्द्रजीके इस प्रकार प्रतिज्ञा करनेपर नारदजी , अति प्रसन्न इए ॥३९॥ तदनन्तर उन्हाने रामजीकी ्रदषिपत्रयं कत्वा दण्डवखणिपत्य तस्‌ | | == परिक्रमाएँ की और उन्‍हें दण्डवता कर उनकी अनुज्ञातश्च रामेण ययो देवगतिं मुनिः ॥४०॥ | आज्ञा छे आकाइा-मार्गसे देवलोकको चळे गये ॥४०॥ संवादं पठति शृणोति संस्मरेद्वा जो मनुष्य नारद और रामचन्द्रजीके इस संवादको यो नित्यं शुनिवररामयोः स भक्त्या। | नित्य भक्तिपूर्वक पढ़ता, सुनता या स्मरण करता है . च [1 ~ ~ ¢ | शोके न र > संग्राप्नोत्यमरसुदुर्लभ. विमोक्ष चह वैराग्यपूर्वक क्रमशः देवताओंकों दुम केवल्य केवरयं विरतिपुर/सरं॑ क्रमेण ॥४१॥ | मोक्षपद प्राप्त कर छेता है ॥४१॥ ००-८७.“ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्‍वरसंवादे अयोध्याकाण्डे प्रथमः सग: | १ ॥ —— OO (3 ढे इ र हिताय सग राज्याभिषेककी तेयारी तथा घसिष्ठजी और रघुनाथजीका संचाद्‌ । श्रीमहादेव उवाच | श्रीसहादेवज्ञी वोले-एक दिन एकान्तमें बैठे हुए अथ राजा दशरथः कदाचिद्रहसि स्थितः। |राजा दशरथने अपने इुळपुरोहित बसिष्ठजोको बुलाकर कहा॥ १॥ “भगवन्‌ | सभी पुरवासी! शास्रज्ञ, ~ Ly मळ ° वासष्ठ स्मङलाचायमाहयेदमभाषत ॥ १॥ बड़े-बूढ़े और मन्त्रिजन रामकी विशेषतया वारम्वार भगवन्‌ राममखिलाः प्रशंसन्ति मुहुसहुः । प्रशंसा किया करते हैं ॥२॥ इसलिये हे मुनिश्रेष्ठ ! मेरा पौराश्च निगमा बद्धा मन्त्रिणश्च विशेषतः ॥ २॥ | विचार है कि मैं अपने सर्वेगुणसम्पन्न ज्येष्ट पुत्र कमट- ततः सर्वगुणोपेतं रामं राजीवलोचनम । |" रामको राज्यपदपर अभिपिक्त कर दू क्योंकि मै षठ राज्येऽभषेक्षामि वृद्धोऽपि अव वृद्ध हो गया हूँ ॥२॥ इस समय भरत ात्रुघके ज्यष्ठ राज्य अषेहयामि इद्धाऽद शुनिपुज्गघ॥। २॥ | साथ अपने मामाके यहाँ मिलने गया है, तथापि मैं भरतो मातुळं इष्टं शतः शनुञ्संयुतः । कळ शीघ्र ही रामका राज्याभिषेक करना चाहता हूँ | ` अभिषेष्षरे : न इस विपयमें आप भी. अपनी सम्मति दे दीजिये ||४॥ अभिपेकष्य थ एवाशु भव सम्मात ८ द सम्भाराः पन्न प्छ 1४) हे 4 | आप अभिषेककी सामग्री एकत्रित न के सन्जय राचवस्‌ । | करांश्ये और रघुनाथजीके पास जाकर उनको यथोचित उच्छोयन्ता पताकाश्च चानाचणाः समन्ततः-॥५॥। | सम्मतिःदीजिये। इस समय नगरमे सब ओर रंग-विरंगी सर्ग २] अयोध्याक्राण्ड . | सर] ________असेष्यक्रण ५ ~ तोरणानि विचित्राणि सर्णशुक्तामंयानि बै। झण्डियाँ लगायी जानी चाहिये ॥५)] तथा चित्र-विचित्र . wy आहूय मन्तरं राजा समन्त मन्तरिसत्तमस्‌ ॥ ६॥ | उर मोतियोके तोरण (झालर ) बाँथे जाने न मय्‌ चाहिये।” उसी समय राजाने मन्त्रश्रेष्ठ सुमन्त्रकौ आशज्ञापयति यद्यत्त्वां मुनिस्तत्तत्ससानय । | घुळाकर आज्ञा द्री कि मैं कछ रघुनायजीको युवराज- यौवराज्येड्मिपेक्ष्यामि इतोभूते रधुनन्दनम्‌॥ ७॥ | रपर अभिषिक्त करेगा; उसके ठ्य मुनिवर वसिष्ठजी ५ . | जो-जो सामग्री बताएँ वह सब एकत्रित करो ॥६-७॥ तथेति हपात्स सुनि कि करोमीत्यमापत | _राजा दशरथसे 'बहुत अच्छा' कह छुमनने हप तमुवाच महातेजा वसिष्ठो ज्ञानिनां घरः॥ ८॥ | a स कहा कि भें क्या करूं... तब _ _ वि ज्ञानियोमें श्रेष्ठ महातेज वसिष्ठजीने उससे कहा-॥८॥ $ “यच फर $ [4 रोळहं श प्रभाते मध्यकक्षे पका खर्णभूपिताः | | “कढ प्रातःकाळ मध्यदवारपर सुवर्ण-भूषण-भूषित सोलह तिषएन्तु पोडश गजः स्वणरत्रादिभूपित। ॥ ९॥ ¦ कन्याएं खड़ी रहनी चाहिये; तथा. सुवर्ण और रत्र चतुर्दन्‍्तः समायातु ऐरावतझुळोळूवः । “दिये विमृषित ऐराबतके कुठ्मे उत्पन्न एक चार दतो दकः पूर्ण | | - वाढा हाथी रहना चाहिये, नाना तीथॉके जलसे नानावीर्थोदकेः पूणा स्वर्णकुम्भाः सहस: 1१० पूर्ण हजारों सुवर्ण-कळ्श मँगवाये जायँ ॥ ९-१०॥ मु 4 या Le ही सयाप्यन्तां नव येयाघ्रचर्माणि त्रीणि चानय । तीत नन व्याप्र-चर्म लाकर रक्खो और मुक्ता- _ ., ५ ~ , मणि-सुशोमित रल्लदण्डयुक्त एक श्वेत छत्र छओ ॥ ११॥ श्व तच्छन्र > रलदण ण अनेकों wy बेतच्छत्रं रल्लदण्डंबुक्तामणिविराजितम्‌ ॥११॥ ' अनेको दिव्य मालाएं , दिव्य वज और दिव्य आभूषण दिव्यमास्पानि वस्त्राणे दिव्यान्याभरणानि च। ` छाकर रखे जाने चाहिये तथा अभिपेक-स्थानपर भली अनयः सर मद । प्रकार किये हुए अनेकों मुनिजन हाथमें कुशा मुनयः सत्क्ृतास्त्र तिष्ठन्तु कुशपाणयः ॥१२॥ ¦ ^ सान रहे अनेकों पा व ठु हि क डिये हुए उपस्थित रहें ॥ १२॥ अनेकों नर्तकियों, वतक्या वारमुख्याश्च गायका चेणुकासथा । ' मुख्य-मुख्य वारांगनाएँ, गायक, वेणुबादक तथा कुशळ नानावादित्रकुशला बादयन्तु नृपाज्ञणे ॥१३॥ | वाजे बजानेवाले महाराज दशरथके ऑगनमें गाना- इस्त्यञ्वरथपादाता बहिएि | गणाना करें ॥ १३॥ अभिपेक-स्थानके वाहर हाथी, दसत्यश्वरपरादाता घ रस्त साइधा' | घोडे, रथ और पदाति यह चतुरंगिणी सेना असखर-राख- नगर यानि तिष्टन्ति देवतायतनानि च॥१४॥; से सुसजित होकर खड़ी रहे । नगरमें जितने देवाळय बु प्रथर्ततां पूजा नानावलिभिरावृता । | हैं उन सबमें नाना प्रकारकी वलि-सामग्रीसे देवोंकी ब | पूजा की जाय तथा राजालोग शीघ्र ही नाना प्रकार- राजानः शीघ्रमायान्तु नानोपायनपाणयः ॥ १५) क मेटे ढेकर आवे? ॥ १४-१५॥ इत्यादिइय मुनि। श्रीमान्‌ सुमन्त्रं नृपमन्त्रिणमू । | . राजमन्त्री सुमन्त्रको इस प्रकार आज्ञा दे. श्रीमान्‌ स्यं जगाम भवनं रायवस्यातिशोभनम्‌ ॥१६॥ | वसना खयं औरपुनाथजीके परम इनदर मह ' गये ॥ १६॥ मुनिश्रे-्ठ वसिष्ठजीने रथपर चढ़कर र्थमारुय भगवान्सिष्ठो उनससमः । | रघुनायजीके-महल्की तीन पैरियॉँ पार की और फिर त्रीणि कक्षाण्यतिक्रम्य रथातिक्षतिमवातरत्‌ 1१७) | पृथिबीपर उतर पडे |. १७ || तदनन्तर आचार्य होनेके अन्तः प्रविद्य भवन स्वाचार्यत्वादवारितः। ` | कारण बिना रोक-ठोकके ये भीतर चळे गये | उस ५ * ~ वको , रामचन्द्रं गी तुरन्त गुरु मस्त : N९८ | समय गुरुजीको आये “देख रामचन्द्र पागतमाज्ञाय रामस्तं कृताञ्ञालिः॥१८॥ | हाथ जोड़कर खड़े हो गये और भक्तिपूर्वक दण्डवत- प्रत्युद्वम्य नमस्कृत्य दण्डवङ्काक्तेसंयुतः। . . प्रणाम क्विया। उसी समय सीताजी सुवर्णके पातम स्वर्णपात्र पानीयमानिनायाछु जानकी ॥१९॥ जल: ले आयां ॥ १८-१६ || ४६ ` ` अध्यात्मरामायण [सगे २ रल्लासने समावेश्य पादो प्रक्षाल्य भक्तितः तब रघुनाथजीने गुरुजीकों रहर्सिदासनपर बैठा- उनके चरण धोये ओर सीताजाके सहित उस तदपः शिरसा इत्वा सीतया सह राघव ॥२०॥ | ,जोदककों भक्तिपूर्वक अपने शिरपर रखकर कद्ा- धन्योऽस्मीत्यम्वीद्रामस्तव पादाम्बुधारणात्‌ | | “हवे मुने ! आपके चरणोदकाको धारण कर आज मैं व्र कृतकृत्य हो गया । भगवान्‌ रागके इस प्रकार कान- श्रीरामेणेवमुक्तस्तु ग्रहसन्मुनिरत्रवीत्‌ ॥२१॥ | ८. मुनिवर बसिए्टने हसकर कदा ॥ २०-२१ ॥ धे त्वत्पादसलिलं इत्वा धन्योष्भूद्विरिजापातिः राम | आपके पादोदकको गग्नकपर धारण कर पावेनी- र्थहतादयुभ बऊुभ भगवान्‌ दाकर घन्यचन्य हा गध सचा मर ब्रह्मापि मत्पिता ते हि पादती १॥२२॥ | हा ब्रह्माजी भी आपके पादतोर्थका सेवन करनेसे ही इदानीं भाषसे यक्ष लोकानामुपदेशकृत्‌ । निष्पाप हो गये है ॥ २२ ॥ इस समय केबल संसारको! । यह उपदेश करनेके लिये ही कि गुरे साथ किस पक जानामि त्वां परात्मानं लक्ष्म्या संजातमी स्व रग्‌ २४६ प्रसार व्यदार करना चादिय आप इस प्रकार देवकार्याथसिद्धयर्थ भक्तानां भक्तिसिद्धये । सम्मापण कर रहे हैं। मे गली प्रकार जानना हूँ थाय जाव ॥२शा आप टक्ष्मीके सहित प्रकट हुए साक्षात फमास्मा विश] रावणस्य वधाथांय जात जानाम राघव ;86ै॥ २३१॥ ह राघत्र म जानता आपन दवताळका तथापि देवकाय थे गुझ्न॑ नोद्‌धाटयाम्पहम्‌ । कार्य सिद्ध करनेके लिये, भक्तांची महि सफल करनेमे । जज यथा स्वै मायया सर्व करोपि घुनन्दून ॥२५॥ लिय और रावणका वध चारच” लिप दो अवतार निया शिया ॥ २४ ॥ तथापि देवताओंकी काय-सिद्विके खिय तथवालावंधास्य5ह शष्यस्त्व भुरुरण्यहमू | | में इस गुप्त रहत्यका प्रकट नहीं करता] है रयुसम्दरन * RP तणा नि जिस प्रकार मावाक आशम्रयने आप सत्र काय करें गुरुगुरुणां त्वं देव पितृणां तव॑ पितामहः ॥२६॥ | गुरुगुरुणां स्व दे पितृ सव॑ पितामहः ॥२६॥ | उसी प्रकार मे भी “तुग दिष्य हो और में गुर ई उर अन्तयीमी जगद्यात्रावाहकस्त्वमगोचरः । | सम्बन्धक अनुकूल व्यव्रहार करूँगा । किन्तु है देख शुद्धसस्वमयं देई इसा स्वाधीनसम्मवम्‌ ॥२७॥ | गख तौ आप टी गुरुओके शुरु और पिगगोकि FA s (भी पितामह हैं ॥२०--२६॥ आप अन्तयां, मनुष्य इव लोकेऽस्मिन्‌ भासि त्वं योगमायया । ' जगद्ववहारके प्रवर्तन और मनवागीके अविऽम हैं; आर स्वेच्छासे यह शुद्ध सलवमय दारीर धारण कर इस पोरोहित्यमहं जाने विग > | हेत्यमह जाने विगह्मे दृष्यजीवनमू ॥२८॥ | छोकमं अपनी थोंगमायासे मनप्यक्रे समान प्रतीन होते । हें: इह्वाकूणा इल रामः परमात्मा जानिष्यते । हैं | में यह जानता हुँ कि पुरोदिताई अति निन्दनीय इति ज्ञातं मया पूर्व जह्मणा कथित पुरा ॥२९॥ | ९ पित जीविका है ॥ २७-२८ ॥| तो भी जब पृचेकाळम ब्रह्माजीक्र कहनेसे भभ यह माळम एभा कि तताऱ्हमाशया राम तव सम्बन्धकाह्ुया । | इव्वाकुवंशमें परमात्मा राम अवतार लेंगे || २० || तत्र अकष गर्हितमपि तवाचार्यत्वसिद्धये ॥३०॥ ` दे राम ! आपसे सम्बन्ध जोइनेकी इच्छास आपका | आचार्य पदको भो मैने ततो मनोरथो मेञ्य फलितो रघुनन्दन। |+. ठिथे इस निनदाय पदको भी गै | सकार कर लिया || ३० ॥ हे रघुनन्दन ! आज मेरी त्वदधीना महामाया सर्वलोकैकमोहिनी ॥३१। | इच्छा पूर्ण हो गयी । अब यदि आप गुरुऋूणसे उक्षण होना च मां यथा मोह्येन्नेव तथा कुरु रघूदह। दते हे तो इहे यदी दौजिये कि आपके अधीन रहनेवाली आपकी सर्वेलोकविमोहिनी | गुरुनिष्कृतिकामस्त्व यदि देखेतदेव मे ॥३२॥ | महामाया मुझे मोहित न करे ॥ ११-१२॥ हे सगे २] . अयोध्याकाण्ड ४७ 0 उमा मनाया चयावत कम मपतशकू'घ-२+ पकक कक फक कारपनपा ७ ७ छ कक क ७ र फ क ऋक ७ ७ RRR ्रसङ्गातसर्वमप्युक्तं न वाच्यं कुत्रचिन्मया । राज्ञा दशरथेनाहं प्रेपितोऽस्मि रघूडह ॥३३॥ .त्वामामन्त्रयितुं राज्ये श्वोऽभिपेक्षयति राघव । रघुश्रेष्ठ ! इस समय प्रसंगवश मैने ये सब बातें आपसे कह दी हैं, मै ऐसा और कहीं भी न कहूँगा | हे राघव | महाराज दशरथने इस बातकी सूचना देनेके लिये कि कळ वे आपको राजपदपर अभिषिक्त करेंगे- अद्य त्वं सीतया सार्धद्चुपवासं यथाविधि ॥३४॥ | मुशे आपके पास भेजा है । आज आप सीताके सहित कृत्वा शुचिभूमिशायी भव राम जितेन्द्रियः । विधिपूर्वक उपवास और शुद्धता तथा इन्द्रियजयपूर्वक पृथिवीपर शयन करें । अब मैं राजाके पास जाता हूँ, गच्छामि राजसान्निध्यं रव तु प्रात्गमिष्यसि आप कळ प्रातःकाल वहाँ पधारे”। ३३-३५ ॥, इत्युकत्वा रथमारुक्च ययौ राजशुरुदुतम्‌ । रामोऽपि लक्ष्मणं इष्ट्वा प्रहसन्निदमन्रवीत्‌ ॥३६॥ सौमित्रे यौवराज्ये मे श्वोऽभिपेको भविष्यति । निमित्तमात्रमेवाह कती भोक्ता त्वमेव हि ॥३७॥ मम स्वं हि वहिःश्रणो नात्र कार्या विचारणा । ऐसा कह राजपुरोहित वसिष्ठजी रथपर चढ़कर । तुरन्त ही चले गये । तब रामचन्द्रजीने लह्ष्मणजीकी ओर देखकर हँसते इए कहा--॥१६॥ “हे सुमित्रानन्दन | कळ मेरा युवराज-पदपर अभिषेक होगा, सो में तो केवळ निमित्तमात्र ही होऊँगा, उसके कर्ता-भोक्ता तो तुम्हीं होगे ॥ ३७॥ क्योंकि मेरे बाह्यग्राण तो तुम्हीं हो--इसमें कोई विशेष सोच- विचारकी आवश्यकता नहीं है |” तदनन्तर वसिष्ठजी ततो वसिष्टेन यथा भाषितं तत्तथाकरोत्‌ ॥३८॥ | जैसा कह गये थे रघुनाथजौने वैसा ही किया ॥३८॥ - वसिष्ठोऽपि नृपं गत्या कृतं सर्व न्यवेदयत्‌ । इधर वसिष्ठजीने भी राजा दशरथके पास आकर जो कुछ किया था सो सव सुना दिया । जिस समय वसिष्टस्य पुरो राज्ञा दुक्तं रामाभिपेचनम्‌ ॥२९॥ | महाराज दशरथ वसिष्ठजीसे रामचन्द्रजीके अभिषेकके यदा तंदेव नगरे धुत्वा कश्चित्युमान्‌ जगी । विपयमें कह रहे थे उसी समय किसी पुरुषने यह समाचार सुनकर सम्पूर्ण नगरमें सुना दिया और कौसल्यायै राममात्रे सुमित्रायै तथैव च ॥४०॥ | राममाता कौसल्या तथा सुमित्राको भी यह सूचना श्रुत्वा ते हर्षसम्पूर्णे ददतुहारमुत्तममू । दे दी ॥ ३९-४० ॥ उन दोनोंने सुनते ही अति हर्ष- पूर्ण हो उसे एक अयुतम हार दिया । तदुपरान्त तस्मे ततः प्रीतमनाः कौसल्या पुत्रवत्सला ॥४१॥ | एत्रव्सठा कोसल्याने रामचन्द्जीकी इ्टसिदविके लक्ष्मी पर्यचरंदेवी रामस्यार्थभ्रसिद्धये । सत्यवादी दशरथः करोत्येव प्रतिश्रुतम्‌ ॥४२॥ कंकेयीवदग! किन्तु कामुकः कि करिष्यति । इति व्याकुलाचित्ता सा दुर्गा देवीमपूजयत्‌ ॥४३॥ एतस्मिनन्तरे देवा देवी वाणीमचोदयच्‌ । गच्छ देति शवो लोकमयोध्यायां प्रयलतः॥४४॥ रांमामिपेकतिधार्थ यतस्व ब्रह्मवाक्यतः । लक्ष्मीदेबीका पूजन किया राजा दशरथ सत्य- वादी हैं और उनके विषयमें यह प्रसिद्ध है कि वे अपनी प्रतिज्ञाका पालन करते हैं ॥ ४१--४२॥ किन्तु वे कामी और कैकेयीके वशीमूत हैं; ऐसी अवस्थामें क्या वे इस प्रतिज्ञाको पूर्ण कर सकेंगे £ इस प्रकारकी चिन्तासे व्याकुल होकर वह दुर्गीदेवीका पूजन करने लगी ॥ 9३ | इसी समय देवताओंने सरस्वतीदेबीसे . आग्रह किया कि “हे देवि! तुम थुक्तिपूवंक भूलोकर्मे अयोध्यापुरीमें जाओ ॥ ४४ ॥ और वहाँ ब्र्माजीकी आज्ञासे रामचन्द्रजीके राज्याभिषेकमें वित्न . उपस्थित Peg + के है ९०३, १, 0. har - oe oer ण ण NONI १५५४९४१ 00 Duane झट अध्यात्मरामायण [सर्ग २ ree Re करा*मकक त कलकल ns vant Se उकत्थ 5०नम््क््न यमु ४९५९ ३९०७ ४९५३ ४३४६७ ६४९ देह १४६४ ७ ३" तती नाव्य ग . 2०४० , गे । प्रथम तो तुम मन्थरामे प्रवेश करना और पिर रन्धरां प्रविशास्वादों कैकेयीं च ततः परस्‌ ॥४५॥। | करो । प्रथम त तुम मम्धर मन्थरा श्रविशस्वाद हि ` | कैक्रेयीमें ॥ ४५ ॥ है छुमे ! इस प्रकार वित्न उपस्थित ततो. विभ्े सञ्चत्पन्ने पुनरेहि दिये शुभे । हो जानेपर तुम फिर खगलेककों छट आना |” इसपर करे प्रविर सरस्वतीने बहुत अच्छा! कदकर बसा ही किया और थत्वा तथा चके म्रविवशाथ मन्यरास्‌ ॥३ ३ प्रथम मन्थरामे प्रवेश किया ॥ १६ ॥ सापि कुब्जा त्रिवक्रा तु प्रासादाग्रमथारुहृत्‌ । | व तीन रा देह बा इर he महन ! र परितो ह ९ अट्टालिकापर चढी और उसने देखा दि नगर सत्र चतः समलडकुतस ॥४७॥ | दि >. हि नगर पारिता इवा स हि तस | ओरसे सजाया गया हैं ॥ ४७ ॥ उसमें नाना प्रकारक नानातोरणसम्बाध पताकाभेरलडकृतस। | बन्दनवारें बँथी हुई हैं, चित्रविचित्र पताकाएं सुझोमित सर्वोत्तवसमायुक्त विस्मिता पुनरागमत्‌॥४८॥ , हो रहा ह और सत्र आर उत्सव ह स्ह | चः शि दि । देखकर वह अत्यन्त विक्रिमिता हो. नीचे उतर आयी धात्री पग्रच्छ मातः कि नगर ससलडकृतम्‌ | ` | १८॥ और धायसे पृछा--तैंया ! आज नगर नानोत्सवसमायुक्ता कौसल्या चातिहर्षिता ॥४९॥ | क्यों सजाया गया है और महारानी झोस्या भी ति विश्रमस्येभ्यो वस्राणि विविधानि च । । नाना प्रकारसे उत्सव मनाती हुई आयन्त हपपूचदा ००७ ' ज्राह्मणोंको विविध बसाभूपण वयो दे रही हैं 0 तंत्र तामुवाच तदा धात्री रामचन्द्रामिपेचनम्‌ ॥५०॥ | धायने उससे कहा--"कल श्रीरामजीका रम्या CR AVN + च [Sh ५ ; पेक हे , ह्सीछिय आज मव 5 पर नग श्वो सविष्यति तेना सर्वतोऽछङङतं पुरमू । | भिपेफ दोगाः इसीलियि आज सत्र शोर नगर 181 ह ; सजाया गया हे | यह सुनते हो. उसन तुरन्त तच्छूत्वा त्वरित गत्वा केकेयीं बाक्यमम्नवीत॥५१॥ ह केक्रयीके पास जाकर कटा ॥ ४९-७१ ॥ ५ मर ¢ : विशाळाक्षी कैकेयी उस समय एकाला पेग पर्यकस्थां विशालाश्षीमिकान्ते पथवस्थिताम्‌। शाठाक्षी दाया उस समय एकान्त प बेडी थी, उससे मन्थरा चोली अघि अभागिनि मटे! किं शेपे दुर्भगे मूढे महदूयसुपस्थितस्‌ ॥५२॥ केसे सो रही दो, तुम्हारे लिथे घडा भाग मदद वा No AN 1 उपस्थित १3 दर प्रे रे ममः छः ऱ्य खगा t मम्‌ न जानीपेऽतिसौन्दर्यमानिनी मत्तगामिनी ॥५३॥ उपरि इया हैं ॥ ५३ ॥ हे मनवालो चाकी : त अपना सुन्दरताका बड़ा घमण्द है हसीहिय तम किसी रामस्यातुग्रहाद्राञ। श्ोऽभिपेको भत्रिष्यतिं। बातका पता ही नह रहना ॥ ५३ ॥ देणो, मदाराज- की कृपासे वळ रामका राम्याभिपेका हनिवान्य है |" तच्छत्वा सहसोत्थाय कैकेयी प्रियवादिनी ॥५४॥ : _ यह सुनकर प्रियवादिन कैकेयी सहना उठ साई 2 1. 6 । हई ॥ ५४ ॥ और उसे अति दिव्य रकजटित सुबर्ण- तस्य दव्य ददा स्वणनपुर रत्लभ्रापंतस्‌ | ! नूपुर देकर कहा, “अरा ! यह तो बड़े आनन्दका [on पस्थाने किमिति मे कथ्यते भयमागतम्‌ ॥५५॥ | बात है, इसमें त. संकट उपस्थित दुधा कैसे बनवाली हि | | है १ ॥ ५७५] राम तो भरतक्री अपेक्षा नेर अधिक भरताद्रधिको रामः प्रियक्ृन्से प्रियंवदः । | प्रिय करनेवाला और मधुरभापी है, बह तो कोसल्या कोसरयां मां समं पश्यन्‌ सदा शुश्रूपते हि माम्‌ ५६ | पथा एने समान भावसे देखता हुआ सदा हां मेरी सेवा । किया करता है ॥ ५८६ || अरा म 1त यह तो RN क व... . क | र 1 १ अरा मूसे त यह ने रामाळूय किसापक्ष तब सूढे वदसत भे। बता कि तुझ रामसे क्या भव उपस्थित हुआ हे ?" (र ह aR + तच्छृत्वा विपसादाथ इन्ज्ोऽ्कारणवेरिणी ॥५७॥ : यह सुनकर विना कारण वैर करनेवाली मन्दा शृणु मद्वचनं, देवि यथार्थे ते मह्यम्‌ । , । विपाद करने लगी ॥ ५७॥।. और बोल, “देवि ! सम २] Np rus TPN 7-४-५ ४-H FANN TTS gt _ अयोध्याकाण्ड ` | ४९' rr 2 युदय तवां तोषयन्‌ सदा राजा प्रियचांक्यानि भाषते ।५८ मेरी बांत सुनो, वास्तवमें तुम्हारे लिये अंडा संकट उपस्थित हुआ है । राजा तुम्हें सन्तुष्ट करनेके लिये फासुकाऽतथ्ययादा च त्वा परिते | करते खै कई दी हि त्वां वाचा परितोपयन्‌ ही सदा चिकनी-चुपड़ी बातें बना दिया करते हैं काये करोति तस्या वे राममातुः सुपुष्कलम्‌ ॥५९।॥। ॥ ५८॥ घे बडे कामी और मिथ्यावादी हैं; तुम्हें मनस्पेतन्निधायेव प्रेपयामास ते झुतम्‌। |" केवळ वातोसे ही वहळाकर रामकौ माताका ही पूरा-पूरा कार्य किया करते हैं ॥ ५९ ॥ अपने भरत मातुठकुळे भषयामास साजुजमू ॥६०॥ | मनमें यही ठानकर उन्होंने छोटे भाई इत्नप्रके सहित सुमित्रायाः समीचीनं भविष्यति न संशयः | | उरे एत्र भरतको निहाळ भेज दिया है ॥ ६० ॥ A आ = | इसमें सुमित्राके लिये तो निस्सन्देह सब कुछ ठीक ही लक्ष्मणो राममन्वेति राज्य सोऽनुभत्रिष्यति॥६१। होगा, क्योंकि लक्ष्मण रामके अनुगामी हैं इसलिये वे भरतो राघवस्याग्रे किङ्करो वा भविष्यति । तो राज्य ही भोगेंगे ॥ ६१ ॥ किन्तु भरतको या तो नगराखाेी | रामका दास होकर रहना पड़ेगा या उन्हें शीघ्र ही वार्यत वा नगरार हाप्यत्रशचरात्‌॥६२॥ नगरसे निकाल दिया जायगा अथवा उनका प्राणाघात त्व तु दासाव कासल्या नित्य परिचरिष्यसि। | किया जायगा ॥ ६२ || और तुम्हें दासीके समान सदा जोऽपि मरणं श्रेयो यर ' कोसल्याकी सेवा करनी पड़ेगी | इस प्रकार सौतसे ततोऽपि मरणं श्रेयो यत्सपरन्याः पराभवः ॥६२॥ अपमानित होकर रहनेकी अपेक्षा तो मरना ही अच्छा अतः शीघ्र यतस्वाद्य भरतस्याभिषेचने । है ॥ ६३ || इसलिये अब तुम शीघ्र ही मरतके राज्याभिपेक और रामके चोदह वर्षतक वनवासके रामस्य वनवासार्थं वर्षाणि नव पञ्च च ॥६४॥ ¦ लिये प्रयत्न करो ॥ ६४ ॥ हे रानी ! ऐसा होनेपर ततो रूढोऽभये पुत्रस्तव राज्ञि भविष्यति । , तुम्हारे पुत्र भरत निर्भय और निष्कण्टक हो जायेगे। i ee इसके लिये मैंने जो पहलेसे ही सोच रक्खा है वह उपायं ते प्रवक्ष्यामि पूवेदेब सुनिथितम्‌॥६५॥। | उपाय तुम्हें बताती हूँ ॥ ६५॥ पूर्वकाले देवासुर- पुरा देवासुरे युद्धे राजा दशरथः स्वयम्‌ । संग्रामके समय खयं इन्द्रने' धनुधर महारथी राजा इन्द्रेण याचितो धन्वी सहायार्थं महारथः ॥६६॥ | पशये सहायताके लिव मर्था कौ थी॥ ३६ ॥ A रे सुमखि ! उस समय सेनाके सहित बे तुम्हें साथ जगाम सेनया साथ त्यया सह शुभानने। | लेकर वहाँ गये थे । जिस स समय भ पर महाराज > गान असेः सह धान्विनः दशरथ राक्ष युद्ध करनेमं निमम्न-थे उस समय युद्धं ्रयेतस्तस्य रासः सह धान्यनः ॥६७॥ उनके सी रथकी धुरीकी कौल निकलकर गिर तदाक्षकोलो न्यपतच्छिन्नस्तस्य न बेद सः । गयी, तब अत्यन्त घैर्यपूर्वक तुमने अपना का हे 9 9. _ ७-६८ ले तु हसतं समावेडय कीलरन्प्रेजतिवैयेतः ॥६८॥ कोडे चिव सणा दिया कक तुम बहुत स्थितवत्यसितापाङ्गि. पतिप्राणपरीप्सया। . . | देरतक इसी स्थितिमें रही । तदनन्तर तर समल को पर खा ततो हत्वाऽसरान्स्वान्‌ ददर्श त्वामरिन्दमः ॥६९॥ ए उ दख उन्‍हें. अति आश्रय परमं ठेमे स्वामालिङएय युदान्वितः । | आश्चर्य हुआ और अति सने तुम्हें गळे ps वृणीष्व यतते CR वे बोले--“मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ, तुम्हें ज पन पत्ते मनति बान्छितं परदारूयहय्‌ 9० इच्छा हो सो माँग लो ॥ ७० ॥ इस समय तुम. दा वर घरहये वृणीष्य .त्वमेवं राजाऽवदत्स्वयस्‌। ` माँग सकती हो ।” राजाके इस प्रकार कहनेपर तुमने त्वयोक्तो वरदो राजन्यदि दत्तं परदवयम्‌॥७१॥। | कहा--“राजन्‌ ! यदि आपः प्रसनतापूर्वैक मुझे दो 8 अध्यात्म्रामायण ¢ [सग २ त्वय्येव तिष्ठतु चिरं न्यातभूतं ममानघ । यदा मेऽवसरो भूयात्तदा देहि बरडयस्‌ ॥७२। तथेत्युक्त्वा स्वयं राजा मन्दिरं ब्रज सुव्रते । त्वत्त शरुतं मया पू्ेमिदानीं स्ट्रतिमागतम्‌ ॥७३॥ अतः शीघ्र प्रविश्याध क्रोधागारं रुषान्विता । विश्रुच्य सर्वाभरणे सर्वतो विनिकीर्य च। भूमावेव शयाना त्वं तृष्णीसातिष्ठ भामिनि ॥७४॥ यावत्सत्य॑ प्रतिज्ञाय राजाऽभीष्टं करोति ते । श्रुत्वा त्रिवक्रयोक्त तत्तदा केकयनन्दिनी ।॥७५॥ तथ्यमेवाखिलं सेने दुःसज्ञाहितविभ्रमा | तामाह कैकेयी दुष्टा कुतस्ते बुद्धिरीदृशी ॥७६॥ एवं त्वां बुद्धिसम्पन्ना न जाने वक्रसुन्दरि । भरतो यदि राजा मे भविष्यति सुतः प्रियः ॥७७॥ ग्रामात्‌ शतत प्रदास्यामि मम त्वं प्राणवकछ भा | ह्युक्त्वा कोपभवनं रविश्य सहसा रुपा ॥७८॥ विशुच्य सर्वामरणं परिकीर्य समन्ततः । भूमी शयाना मलिना मलिनाम्बरधारिणी ॥७९॥ परवाच शुणु मे कुब्जे यावद्रामो वनं ब्रजेत्‌ । ग्राणांस्त्यक्ष्ये5थ वा वक्रे शयिष्ये तावदेव हि॥८ ०1 निश्चयं कुरु कल्याणि कल्याणं ते भविष्यति । इत्युकत्वा प्रययौ कुब्जा गृह साऽपि तथाऽकरोत्‌ ॥ धीरोऽत्यन्तदयान्वितोऽपि सुगुणा- चारान्वितो वाञ्थवां वीतिज्ञो विधिवाददोशिकपरो | विद्याविवेफो5थवा | Cinna बर देना चाहते हैं ॥ ७१ ॥ तो हे अनघ ! मेरी यह धरोहर बहुत समयतक आप ही रखिये, जिस समय इनका अवसर आवे उस समय आप ये दोनों बरं मुझे दे दीजियेगा” || ७२ || तब राजाने “बहुत अच्छा' कहकर तुमसे कहा है सुत्रते ! अव धर चलो |! महारानीजी ! यह सम्पूर्ण वृत्तान्त पहले तुम्होंसें, मैंने सुना था, इस समय मुझे यह स्मरण हो आया है ॥ ७३ ॥ अतः हे भामिनि ! अब तुम शीत्र ही रोप- पूर्वक कोपभवनमें जाओ और अपने समस्त आमूपण उतारकर इधर-उधर बखेर दो तथा जबतक सत्य रतिश्चापूर्क राजा तुम्हारा अमीष्ट कार्य करनेको तत्पर न हों तत्रतक चुपचाप परथिवीपर पड़ी रहो ।” त्रिवक्रा मन्यराकी ये बातें सुनकर दुःसंगत्रश बुद्धि भ्रष्ट हो जानेके कारण दुष्टा केकेयीने उस समय उसका कथन सर्वथा ठीक मान लिया और उससे कहा---तुझमें ऐसी बुद्धि कहाँसे आ गयी! ॥७४--- ७६॥ अरी श्राँकी सुन्दरी ! में तुझे इतनी बुद्धिमती नहीं जानती थी ! यदि मेरा ग्रिय पुत्र भरत राजा हो गया तो मैं तुझे सो गाँव दूँगी; त. तो मुझे प्राणोंके समान प्यारी है ।” ऐसा कहकर केकेयीने रोपपूर्वक कोप- भवनमें प्रवेश किया || ७७-७८ ॥ और अपने सत्र वल्लाभूपण उतारकर इधर-उधर वखेर दिये तथा मेटे- कुचले बज्न पहनकर अति मलिन दामे प्रथिवामें पडकर बोली, “अरी कुब्जे ! सुन, जदतक राम वनको न जायेगे, प्राण भले ही छूट जायें, मैं इसी प्रकार पड़ी रहूँगी ” || ७९-८०॥ तव कुब्जा यह समझाकर कि हि कल्याणि | तुम निःसन्देह ऐसा ही करना, इससे अवश्य तुम्हारा कल्याण होगा'--अपने घर चली गयी और कैकेयीने मी वैसा ही किया | ८१॥ सच है, कोई पुरुष अत्यन्त धैर्यवान्‌, दयालु, सद्गुणी, सदाचारी, नीतिज्ञ, कर्तव्यनिष्ठ और गुरुका भक्त, अथवा विद्या-विवेक-सम्पन्न भी क्यों न हो यदि निरन्तर अत्यन्त पाप-चुद्धि दुष्ट पुरुषोका संग करेगा तो अवश्य ही क्रमशः उन्हींकी सगे] अयोध्या ` ५१ ] अयोध्याकाण्डः ` 7 प दुश्टनामतिपापभाविताधियां ` | बुद्धिसे प्रभावित .होकर उन्हींके समान हो जायगा सङ्गं सदा चेहूजे- पका ह सदूबुद्धया परिभाषितो ब्रजति तत्‌ ॥८२॥ इसलिये सदा ही दुष्ट पुरुषोंका संग छोड़ना साम्यं क्रमेण स्फुटस्‌ ॥८२॥ | चाहिये, क्योंकि दुःसंगते पुरुष इस राजकन्या अतः सङ्गः परित्याज्यो दुष्टानां सर्षेदैव हि । ( कैकेयी ) के समान ही पुरुघार्थच्युत हो (सन्नी च्यवते स्वार्थायथेयं राजकन्यका ॥८३॥ | जाता है॥ ८३॥ — BROOD इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे द्वितीयः सगः ॥ २ ॥ Ln Dnt 3 तृतीय सै केके प कप क. राजा दशरथका ककेयीको बर देना 1 i i ep NN NL, ws श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेचजी बोळे-तदनन्तर महाराज दशरथने व _ रामचन्द्रजीके अभ्युदयके लिये प्रजावर्ग और मन्त्रियोंको ततो दशरथो राजा रामाम्ुदयकारणात्‌ । | (माइळिक योने लिये) आज्ञा देकर आनक आदिश्य सन्तरिप्रकृतीः सानन्दो शृहमाविशत्‌॥१॥ | अपने रनिवासमें प्रवेश किया ॥ १॥ वहाँ अपनी - तत्नादृष्टा प्रियां राजा किमेतदिति विद्दल! । प्रिया कैकेयीको न देखकर वे अत्यन्त विद्वळ उदरं तरयः प्रविष्टे यि शो होकर मन-ही-मन कहने ढगे, क्या कारण है, जो या पुरा मन्दिर तस्याः प्रचिष्ट मयिशोभना ॥ २ ॥ पहले अपने महळमें घुसते ही सदा हँसती हुई हसन्ती माप्त॒पायाति सा किं नैवाद्य इझ्यते । | मेरे सामने आती थी बह सुसुखी आज दिखायी ही इत्यास्मन्येव सरि न नहीं दे रही है £ अपने चित्तमें अत्यन्त दुःख मानकर त्यात्मन्येव संचिन्त्य मनसाऽतिविदूयता ॥ ३ ॥ | इनी प्रकार सोचतेसोचते ॥ २-३ ॥ उन्होंने पप्रच्छ दासी निकरं कुतो वः खामिनी शुभा ! दासियेसि पूळा-'आज तुम्हारी शुभलक्षणा खामिनी I 8 कहाँ है £ वह प्रियदर्शना प्रिया आज पूर्ववत्‌ मेरे नायाति मां यथापूव मत्मिया प्रियद्शना ॥ ४ ॥ | सामते क्यों नहों आती ? ॥ ४ ॥ ता उच्चः क्रोधमवर्न प्रविष्टा नेव विद्महे । दासियोंने कहा-“देव | कारण तो माम नहीं, | तत्र देव तवं गत्वा निथेतुमईि किन्तु आज वे कोप-भवनमें गयी हुई हैं; आप स्वयं ब w , कारणं तत्र देव त्वं गत्वा निथेतुमहसि ॥ ५॥ | द जाकर सत्र हाळ जान छौजिये ? ॥ ५॥ इत्युक्तो मयसम्त्रस्तो राजा तस्याः समीपगः । दासियोंके इस प्रकार कहनेपर राजा भयभीत होकर हट Kegs £ ¢ ~ उसके पास गये और वहाँ बैठकर उसके शरीरपर शनदेह स्पृशन्वे ॥६॥ क उपविश्य शनदेंह सप्शन्त पाणिचाघ्रवीत्‌ ।। ६। धॉटे-धीरे हाथ परते इए बोळे--॥ ६ ॥ “अथि भीर ! किं दोपे यसुधाएठे पर्यङ्कादीन्‌ विहाय च । आज पलंग आदिको छोड़कर इस प्रकार प्रथिवीपर ; खेदयसे भीर यतो मां नावभाषसे ॥ ७॥ | क्यों पडी हो? तुम हमसे कुछ बोलती नहीं हो, . मां ल खेदयसे भीर इससे हमें बड़ा खेद हो रहा है ॥ ७॥ समस्त डर लि च अहङ्कारं परित्यज्य भूमो मलिनवाससा । | बद्धाभूपण छोड़कर तुम मलिन बल पहने हुए पथिवी- ' किमर्थ ब्रूहि सकल विधासे तर वाञ्छितम्‌ ॥ ८ पर क्यों पड़ी हो १ तुम्हारी जो इच्छा हो सो कहो, रि 1 मैट tsi ts MRL I ष्र rrr को वा तबाहितं कर्ता नारी वा पुरुषोऽपि वा । स मे दण्डचश्च वध्यश्च मविष्यति न संशयः ॥ ९ ॥ रूह देवि यथा मीतिरतद्वश्यं ममाग्रतः । तदिदानीं सायिष्ये सुदुर्छभमपि क्षणात्‌ ॥१० ॥ जानासि सं मम खानतं मियं मां खबरे खितस्‌। तथापि मां खेदयसे वृथा तब परिश्रमः ॥११॥| रूहि के धनिनं कया दरिद्रं ते ्रियङ्करम्‌ । धनिनं क्षणमात्रेण निर्धनं च तवाहितस्‌॥ १२॥ रूह कं वा वधिष्यामि वधाहों वा विमोक्ष्यते । किमत्र बहुनोक्तेन प्राणान्दास्थामि ते प्रिये ॥१३॥ मम ग्राणास्रियतरो रामो राजीवलोचनः । तस्योपरि शपे ब्रूहि त्वद्धित तत्करोम्यहस्‌ ॥१४॥ इति बुवाणं राजानं शपन्तं राघवोपरि | अध्यात्मरामायण ` ere जज जलता चल 3 >> samemaneananrnrreenannenapmmsrd nes NS hanson PN [संग ३ NSIS pantera orp ०$००क०ककन्यननकन्कन्यनकरध मैं सब पूर्ण करूँगा ॥ ८ ॥ तुम्हारा अनिष्ट करनेवाला कौन हे ? वह खी हो अथवा पुरुप अवश्य मरें दण्डका पात्र होगा । यही नहीं, उसका वध्र भी किया जा सकता है ॥९॥ द्वे देवि ! जिस प्रकार तुम्हारा प्रसन्नता हो वह मुझसे अवश्य कहो | वह काये अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी मैं इसी समय एक क्षणमे' ही पूरा कर दूँगा ॥ १० ॥ तुम मेरे हृदयको जानती ही हो, मैं तुम्हारा अत्यन्त प्रिय और तुम्हारे बर्शीमूत हैं। फिर भी तुम मुझे खिन्न करती हो ? ठग्हारा यह परिश्रम व्यर्थ है॥ ११॥ चताओ, तुम्हारा प्रिय करनेवाले किस कंगाळको में धनी कर दूँ अथवा तुम्हारे अग्रियकारी किस धनपतिको एक क्षणमें ही कंगाल बना दूँ £ ॥ १२ || बताओ, किस अवध्यको मार डाळे और किस वध्यकों छोड़ दूँ ? हे प्रिय ! इस विपयमें और अधिक क्या कहूँ, में तुम्हे अपने प्राण भी दे सकता हुँ ॥ १३॥ कमळ-नयन राम मुझे प्राणोसे भी अधिक प्रिय हैं । में उन्हींकी शपथ करके कहता हूँ कि तुम्हें जो कुछ प्रिय हो मैं वही करूँगा” | १४ ॥._ महाराज दशरथके रामकी सोगन्ध खाकर इस प्रकार शनैविसृज्य नेत्रे सा राजानं अत्यभाषत ॥१५॥ | he केकेयीने धौरे-धौरे अपने आँसू पोंडकर , ; राजासे कहा--!| १५॥ “राजन्‌ ! यदि आप सत्य- यदि सत्पिङगोऽसि शपथ इरुपे यदि । `प्रति हैं और शपव मी करते हैं तो यांत्र ही मैं जो याच्ञां मे सफलां कतुं शीघमेव त्वमईसि ॥१६॥ कुछ माँगूँ उसे सफळ कर देना चाहिये॥ १६॥ पूर्व देवासुरे युद्वे मया त्व 'परिरक्षितः । | तदा वरद्वयं दत्तं त्वया मे तुष्टचेतसा॥१७॥ तद्द्वयं न्यासभूतं मे स्थापित तवयि सुब्रत । तत्रैकेन परेणाशु भरतं भे प्रियं सुतम्‌ ॥१८] ूर्वकालमें देवासुर-संग्राममें मेने आपकी रक्षा की थी उस समय प्रसन्न होकर आपने मुझे दो बर देनेको कहा था ॥ १७॥ हे सुव्रत ! मैंने वे दोनों वर आपके पास धरोहरके रूपमे रख दिये थे । अब उनमेंसे एक बरसे तो तुरन्त ही मेरे प्रिय पुत्र भरतको इस एकत्रित की हुई सामग्रीसे युवराज-पदपर अभिपिक्त कीजिये एभिः संभृतसंभारेयोवराज्येडमिपेचय । | और दूसरेसे तुरन्त ही राम दण्डक-वनको चळे जाये अपरेण वरेणाशु रामो गच्छतु दण्डकान्‌ ॥ १९॥ | | १८-१९॥ वहाँ श्रीमान्‌ रामको जटा-वल्कलादि “वेषः औ कू धारण कर कन्द-मूल-फळ खाते हुए सुनिवेपसे चौदह यातवषधरर ऑमाद जटावल्कठयूपणः | | वर्षतक रहना चाहिये || २०॥ उसके पश्चात्‌ अपनी चतुदेश समास्तत्र कन्दमूलफलाशनः ॥२०]| | इच्छासे चाहे वे अयोध्ये लौट आवें अथवा वनहोमें पुनरायातु तस्यान्ते वने चा तिष्ठतु खयम्‌ । रहें किन्तु कमळनयन राम कळ सवेरे ही अवश्य | यी वनको चळे जायें ॥२१॥ यदि इसमें कुछ देरी > भाते गच्छतु वनं रामो राजीवछोचन॥२१॥ | होगी तो आपके सामने ही मैं अपने प्राण छोड गी । संगे३] . अयोध्याकाण्ड. .. ५३ यदि किश्चिडिलम्बेत म्राणांस्त्यकष्येतवाग्रतः। | आप अपनी प्रतिज्ञा सत्य कीजिये, मेरा प्रिय कार्य बस भव सत्यप्रतिशञस्त्वमेतदेव मम प्रियम॥२२॥ | यही है” ॥ २२ ॥ ह्य थे +» च य , शुरयेतददारुणं वाक्यं केकेय्या रोमहर्षणम्‌ । कैकेयीके ऐसे रोमाज्ञकारी कठोर वचन . सुनकर °C ५ निपपात महीपालो वजाहत इवाचलः ॥२३॥ | “ज दशरथ वज़ाहत परवेतके समान गिर शत इवाचहः ॥२२। पड़े ॥ २२ ॥ तत्पश्चात्‌ धीरे-धीरे नेत्र खोलकर अति शनेरुन्मील्य नयने विसृज्य परया मिया। | भयपूर्वक आँसू पोंछे और मन-ही-मन कहने छगे-- ५ मद , मैंने यह कोई दुःखम्न देखा है या मेरे चित्तको भ्रम दुःखमो वा मया इष्टो थवा चित्तविश्रमः॥२४। | छ नया हे ? ॥२४॥ | इत्यालोक्य पुरः पत्ती व्याघ्रीमिव पुरः खिताम्‌। | इसी सय अपने सामने सिंहिनीके समान बैठी + ~ ७ हुई रानी = रको देखकर कहने लगे---“हे भद्रे || क प्र णोंके किमिदं भापसे भद्रे मम प्राणहरं वचः ॥२५॥ | मेरे प्राणोंको हरनेबाळे तुम ये क्या वचन बोळ रही राम! कमपराधं ते कृतवान्कमलेक्षणः । हो £ ॥२५॥ कमलनयन रामने तुम्हारा क्या न्वर्णयरय निः अपराध किया है ? तुम तो अहर्निश मेरे सामने ममाय राघवयुणान्वणयस्याचश झुभाच्‌ | ।२६।। ; रामके शुभ गुण गाया करती थी ॥२६॥ तुम तो कौसल्यां मां समं पञ्यन्‌ शुश्रुपां कुरुते सदा। पहले कहा करती थी कि “राम मुझे और कोसल्याको ५५ 6. ., - समान जानकर सदा ही मेरी सेवा किया करते हैं |! इति इुबन्ती त्वं पूवेमिदानीं भापसेऽन्यथा 1२७1 | फिर इस समय तुम यह उल्टी बात कैसे कह रही राय॑ मयात ३ हो £ ॥२७॥ तुम अपने पुत्रके लिये राज्य ले छो, राज्य गृहाण उन्नाय रामासु मन्दिरे । किन्तु रामको घर ही रहने दो । हे वामे | तुम सुझपर अलुगृद्वीष्व मां वामे रामान्नास्ति भयं तव ॥२८॥ ' कृपा करो, रामसे तुम्हें कोई भय न करना | चाहिये” ॥ २८॥ इत्युक्त्वाउशुपरीताक्ष! पादयोनिपपात ह। ' ऐसा कहकर महाराज दशरथ नेत्रोंमें जळ भरकर केकेयी प्रत्युवाचेदं साऽपि रक्तान्तलोचना॥२९॥ | केकेयीके चरणोंमें गिर पड़े | तव उस कैकेयीने आँखे जेनर कि सव॑ आन्तोऽति उच नेऽन्यथा | ¦ लट करके यों कहा--॥ २९॥ “राजेन्द्र ! क्या राजन्द्राक त्व ग्रान्ताशस उक्त तङ्गापसंऽन्यथा। ; तुम्हारी बुद्धिम भ्रम हो गया है जो अपने कथनके मिथ्या करोपि चेत्खीयं भापितं चरको भवेत्‌।३०॥ विपरीत बोळ रहे हो; याद रखो, यदि तुमने अपनी चने न गच्छे्दि रामचन्द्रः | प्रतिज्ञा भंग कर दी तो तुम्हें नरक भोगना पड़ेगा ग्रभातकालेऽजिनचीरयुक्तः । !॥ ३० ॥ सुनो, यदि कळ प्रातःकाल ही मृगचमे और रिष्ये पुरतस्तवाइम्‌ ॥३१॥ | 3 „ फासी उगाने न ` सर गि 'मितीह के हय्‌॥२॥. जाऊँगी ॥ २१॥ तुम संसारमें सभी सभाओंमें भै त्य जिद ह R | सत्यप्रतिज्ञ है” ऐसा कहकर लोगोंको घोखेमें डाला विडम्वसे सर्वेसभान्तरेष । करते हो, अब तुम रामकी शपथ करके की हुई रामोपरि स्वं शपथ च कृत्वा | प्रतिज्ञाको भी तोड़ रहे हो, अतः तुम्हें नरकमें. जाना मिथ्याप्रतिज्ञो नरकं प्रयाहि॥३२॥ | पड़ेगा” ॥ ३२॥ ' इत्युक्तः प्रियया दीनो म्नो दुःखार्णवे नृपः। अपनी प्रियाके ऐसे कठोर वचन सुनकर महाराज मूच्छितः पतितो भूमौ विसंज्ञो सृतको यथा ॥३३॥ | दहारथ दुःख-समुद्रमें इनकर बड़े व्याकुल हो गये; अध्यात्मरामायण [संगे ३ SSS aoa | | ORR nr कयकृ 2७७ ७४फेकी शह ढ र ने मृतकके मूर्छित मे | सज्ञाशून्य एवं रात्रिर्गता तस्य दुःखात्संवत्सरोपमा । और गृतकके समान मूर्छित और संज्ञाशन्य होकर _ पूथिवीपर गिर पडे ॥ २३ ॥ इस प्रकार अत्यन्त दुःख- अरुणोदयकाले तु वन्दिनो गायका जगुः ॥३४॥ | छ कारण उनकी वह रात्रि एक वर्षके समान वीती । । इधर सूर्योदय होते ही गायक और बन्दीजन स्तुति- गान करने ढगे ॥ ३४ ॥ किन्तु कैकेयीने अत्यन्त ततः ग्रभातसमये मभ्यकक्षम्ुपस्थिताः ॥३॥ ¦ रोपमें भरकर उन सबको उसी समय रोक दिया ~ 3 , | तदनन्तर प्रातःकाल होनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य; ब्राह्मणा! कषत्रिया वेश्या ऋषयः कऱ्यकासतथा। । ऋषिगण, कन्याएं, दिव्य उत्र और चँबर तथा हाथी और छत्रं च चामरं दिव्यं गजो वाजी तथैव च ॥२६॥ ' घोडे आदि सभी अभिपेकोपयोगी वस्तुएँ मध्य-द्वारपर र , उपस्थित की गयीं ॥ २५-२६ ॥ इनके अतिरिक्त अन्याश्च वारसुख्या याः पारजानपदासथा। : वर्सिप्रजीका आज्ञानुसार सुख्य-सुख्य वारांगनाएँ तथा वसिष्ठेन यथा55ज्ञप्त तत्सर्व तत्र संखितस्‌ ॥२७॥ पुरवासी और जनपदवासी भी वहाँ उपसत हो इ ' गये ॥ २७॥ उस रात खरी, वाळक ओर वृद्ध किसी- दियो वालाशच बद्धा रत्र निद्रा न लेभिरे । को मी नींद नहीं आयी । सभीको यही चटपटी छगी कयामहे रामं पी जे ट. रही कि हम रेशमी पीताम्बर पहने भगवान्‌ रामको कदा द्रक्ष्पामहे रामं पीतकाशेयवाससम्‌ ॥३८ द? ६2 जो समल आमूपणोंसे सुसजित, सर्वाभरणसम्पन्नं किरीटकटकोज्ज्यलम्‌। ' उज्ज्वल किरीट और कटक पहने हुए हैं तथा कौस्तुम- 3 RN + , मणिसे विभूषित और सैकड़ों कामदेवोंके समान कोस्तुभासरणं यामं कन्दषशतसुन्द्रम्‌ ।।३९॥ | सुन्दर सयामी हे एवं कषण समन ळण अभिषिक्तं समायातं गजारुढं सिताननस्‌। ' जीने जिनके उपर खेत छत्र ऊगायां हुआ है ऐसे श्री- _ , हमं ~ ' रामको राज्याभिपेकके अनन्तर मन्द मुसकानके श्वेतच्छत्रधर तत्र लक्ष्मण रक्षणान्वतम्‌ ॥४० lt सहित हाथीपर चढ़कर आते इए हम कव देखेंगे! रासं कदा वा द्रक्ष्यामः प्रभातं वा कदा सवेत्‌ । पह मङ्गल््रमात कव होगा ? इस प्रकार समी शिका ~ ' पुरवासियोंक्रा चित्त अति उत्कण्ठित हो रहा इत्युरसुकधियः सर्वे वभूवुः पुरवासिनः ॥४१॥ दा ॥ ३९-०१ ॥ निवारयित्वा ताव्‌ सर्वान्केकेयी रोपमाखिता | तेदानीमुत्यितो राजा किमर्थ चेति चिन्तयन्‌। इसी समय मन्त्रिवर सुमन्त्र यह सोचकर कि > ' महाराज अभीतक कैसे नहीं उठे' धीरेसे जहाँ राजा ; } तिष्ठते ॥४२॥ के र पंचका उन्होंने उ सम वायायत्र ता छते ॥ 9२९ ` दशरथ थे वहाँ गये ॥ ४२॥ वहाँ पहुँचकर उन्ह वयन्‌ जयशब्देन प्रणमन्शिरसा नृपस्‌। . जय-जयकार कर राजाको शिर झुकाकर प्रणाम किया OE | और उन्हें अत्यन्त खिन्न देखकर कैकेयीसे पूछा-- अतिखिन्नं नप दृष्टा केकेयी समपृच्छत ।४३॥ ¦ टच्च ॥ ४३ ॥ “देवि कैकेयि ! आपका अभ्युदय हो, कहिये आज महाराज अनभने कैसे दिखायी देते हैं!” इसपर कैकेयीने कहा--'।'आज महाराजको रात्रि- में विल्कुळ नींद नहीं आयी || ४४ || रात्रिमर रामका राम रामेति रामेति राममेवाजुचिन्तयन्‌। | चिन्तन करते इए 'राम राम रामः ही रटते रहे हैं । प्रजागरेण वै राजा ह्यखख इव लक्ष्यते। | शकार जागते रहनेके कारण ही राजा कुछ | क्स अस्वस्थ दिखायी देते हैं। महाराज रामको देखना _ रामपानय शीघ्र खं राजा द्रष्टुमिहेच्छति ॥४५॥ | चाहते हैं, इसलिये तुम शीघ्र ही उन्हें लिया लाओ”।४५। देवि केकेयि वर्धस्व किं राजा इश्यतेड्त्यथा । तमाह केकेयी राजा रात्रौ निद्रां न लब्धवान्‌॥४ ४॥ oo on intone RON समश] .. अय्रोष्याकाण्ड ५५ IIe nnn ४४४४५ ५५४४८५९ ove ~ पुसन्त उवाच. सुमन्त्र बोले-हे भामिनि ! महाराजकी आज्ञा अश्रुत्वा राजवचनं कर्थ गच्छामि भामिनि । पाये बिना मैं कैसे जा सकता हूँ ! मन्त्रीका यह वचन हि ~ सुनकर महाराज बोढे---॥9 ६॥ “सुमन्त्र ! मैं मनोहर- तच्छूत्वा मन्त्रिणो वाक्यं राजा मंन्त्रिणमत्रवीत४६ दू रामको देखूँगा। तुम उन्हें शीघ्र ही छे आओ |? सुमन्त्र रामं द्रक्ष्यामि शीघ्रमानय सुन्दरम्‌ । राजाके ऐसा कहते ही सुमन्त्र तुरन्त रामके महलको इत्युक्तस्त्वरितं गत्वा सुमन्त्रो राममन्दिरम्‌॥४७।॥| गये ॥ ४७॥ और बिना रोक-टोकके तुरन्त भीतर रितः प्रविशेड्यं त्वरितं जाकर रामसे कहा--“कमर-नयन राम ! तुम्हारा अनारितः मविष्ोऽयं त्वरितं राममभयीत्‌। | कल्याण हो, तुम शीघ्र ही मेरे साथ पिताजीके शीघ्रमागच्छ भद्रं ते राम राजीवठोचन ॥४८॥ | धर चलो, महाराज तुम्हें देखना चाहते हैं |” यह पितुर्गेहं मया सार्धे राजा त्वां ्रष्डुमिच्छति। | ऽते दौ राम चकित-से होकर तुरन्त ही रथपरं _ _ चढ़कर चले ॥ ४८-४९ ॥ सारथी औरं लक्ष्मणके इत्युक्तां रथमारुद्य सम्भ्रमात्वरितो थयो ॥४९॥ | सहित भगवान्‌ रामने मध्यद्वारपर विराजमान रामः सारथिना साधे लक्ष्मणेन समन्वितः | | वसिष्ठादि गुरुजनोंका केवळ दर्शनमात्रसे ही सत्कार - ल 3 ह कर जल्दीसे पिताजीके पास पहुँच उनके मध्यकक्षे वसिष्ठादीन्‌ पश्यन्नेष त्वरान्वित! ॥५०॥ | घरणोमे प्रणाम किया | उस समय रामको गले पितुः समीप सङ्गम्य ननाम चरणौ पितुः। | ल्गानेके ल्यि ज्यों ही उठकर महाराज दशरथने राममालिक्षितु राजा समुत्याय ससम्भ्रमः ॥५१॥ | आवेगके साथ हाथ बढ़ाये वि वे चह दुःखपूर्वक बाहू प्रसाय रामेति दुःखान्मध्ये पपातह। |^ राग डे र पडे तज हाहेति रामस शीघरमारि रामचन्द्रजीने हाहाकार करते इए अति शीघ्रतसि उन्हे "हाहेति रामस्तं शीघ्रमालिरूग्याड न्यवेशयत्‌।५२॥| गळे लगाकर अपनी गोदे बैठा लिया | ५०-७२ ॥ राजानं मूच्छित दृष्टा चुक्रशुः सर्वयोपितः । महाराजको मूर्च्छित देखकर रनिवासकी समस्त | किमर्थ रोदनमिति वरि न महिलाएं रोने लगीं। तब यह सोचकर कि “यह किमर्थ रोदनमिति बरसिष्ठोऽपि समाविशत्‌ ॥५३। रुदन क्यों हो रहा है ? वहाँ वसिष्टजी भी चले आये रामः पप्रच्छ किमिदं राज्ञो दुःखस्य कारणम्‌। |॥ ५३ ॥ भगवान्‌ रामने कैकेयीसे पूछा---/महाराजके { पृच्छति रामे सा कैकेयी इस दुःखका क्या कारण है!” उनके इसप्रकार एवं पृच्छति रामे सा केकेयी राममत्रवीत्‌ ॥५४॥ पूछनेपर कैकेयी बोली--॥५9॥ “हे राम | महाराजके त्वमेव कारणं झत्र राज्ञो दुःखोपशान्तये। | इस दुःखके कारण तुम्ही हो; तुम्हे. उनके दुःखके कस्य प्रिय कायं करना श्त्कार्य ₹ वपं नपते । | शान्त करनेके ल्यि उनका कुछ किश्चित्कार्य त्वया राम कतेव्य नृपतेहिंतम्‌ ॥५५। होगा ॥ ५५ ॥ ठम सयति हो, महाराजको मी कुरु सत्यप्रतिज्ञस्त्यं राजानं सत्यवादिनम्‌। | सत्यवादी बनाओ । उन्होंने प्रसन्न होकर मुझे दो वर ४ दत्तं दिये हैं ॥ ५६॥ किन्तु उनकी सफलता तुम्हारे राज्ञा वरद्वयं दत्तं मम सन्तुष्टचेतसा ॥५६॥ हो अधीन ह । महाराजको तो तुमसे कहनेमें संकोच त्वदधीन तु तत्सव वक्ष तवां लज्जते नृपप। | माम होता है; किन्तु तुम्हें सत्यपारामें बये हुए अपने _ ५ ०. पिताजीकी अवश्य रक्षा करनी चाहिये ॥ ५७ || सत्यपाशेन सम्बद्ध पितरं त्रातुमईसि॥५७॥ क्योंकि पत्रः शब्दका अभिप्राय ही यह है कि पिता- पुत्रशव्देन चैतद्धि नरकात्त्रायते पिता । | की नरकसे रक्षा की जाय ।” रामस्तयोदितं शरुत्वा शलेनाभिहतों यथा ॥५८॥| कैकेयीकी ये बातें सुनकर रामने मानों धे विद्ध व्यथितः केकेयी आह कि मामेवं ग्रभापसे । | इएके समान च्ययित होकर कहा--“पातः ! आज meg ६३, ५६ अध्यात्मरामायण [सर्ग ३ SSIS IIE TTI pra रमुहपकल्‍प्फक०क-्एल्‍१>०पण्पकप्कम्फनसग्प्ठ ir Yprper eer का पा ner Pre मनन्यमकन्यामा नम णन सनक पक" eperndtrp ur) SSN PNAS 2४0४० Peake त्रे जीवितं दास्ये पियं विपु्वणम्‌ ॥५९॥ | इससे ऐसी बाते क्यों करती हो ? पिताजीके डिये मैं '.__ जीवन दे सकता हुँ, भयंकर विष पी सकता हूँ॥ ५८- सीतां लक्यऽय कोसरया राज्यं चापि त्यजाम्यहम्‌ ८९॥ और सीता, कसल्या तथा र्यो भी छोड़ अनाजप्ोडपि कुरुते पितुः कार्य स उत्तमः ॥६०॥ | सकता हूँ । जो पतर पताका आत्ञाके बिना ही उनका | न ५ , | अभी काय करता हे वह उत्तम है ॥६०॥ ! है और जो कहनेपर भी नहीं करता वट पुत्र तौ । विष्टाके समान हैं॥ ६१ ॥ अतः पितीने मेर (क 4 [a भै क क Ey क. क्ट रे अतः करोमि तत्सर्वे यन्मामाह पिता मम । | ल्यि'जो कुळ आज्ञा की हैं उसे में अवर पूर्ण । सयं करोम्येव रासो दिनाभिभाषते ॥६२॥ ' करूँगा, यह सर्वथा सत्य है; राम एक मुखसे दो बात इति रामप्रतिशञां सा श्रुत्वा वक्तुं प्रचक्रमे । ' राम्रा ऐसी प्रतिज्ञा सुनकर कैकेयीन इस प्रकार रामत्वदभिपेकार्थं संभाराः संभृता ये ॥६३॥ कहना आरम्भ किया, “हे राग ¦ दग्रे अभिपेकरके वरे भरतोऽवक्यमभिपेच्यः प्रियो मम | लिये जो कुछ सामग्री एकत्रित की गयी है ॥ ६३ ॥ च्या शिया मम उसके द्वारा निश्चय ही मरे प्रिय पुत्र भरनक्रा अभियेक्र अपरेण वरेणा चीरवासा जटाधरः ॥६४॥ होना चाहिये | (यहां गेरा प्रथम वर है) | दूसरे उक्तोऽपि कुरुते नैव स पुत्रों मल उच्यते ॥६१॥ चनं प्रयाहि शीध्रं स्वमथैव पितुराज्ञया | वरके अनुसार पिताकी आहात आज तरन्त दी तुम शं नपम वल्कर-्बस और जटा धारणक वनका जाओ और चहुदश समास्तत्र वस इुन्यन्नमोजनः ॥६५) वहाँ मुनिजनोचित भोजन करते हुए चोद ब. _ ° श्र | तक र्‌ , _ ना एतदेव पितुस्तेऽ्य कार्य स कतुमहेसि | क रही ॥ ६४-६० ॥ बस, तुम्हारे पिनाका यही राजा तु ठजते बक त्यामेवं रघुनन्दन ॥६६॥ इन त्र तरातारो तुमसे कहनेमं संकोच करते है” ॥६६्‌॥ ~ श्रीराम उवाच श्रीरामचन्द्रजी वोले-माता ! भरत आनन्दसे या च्य [| ७ ~ F भोग अ त्न ff > र (11 [| < किन्तु राजा न वक्तीह मां न जानेर कारणम्‌ [६७ महाराज भुसे क्यों नहीं कहते? ॥ ६७॥ | च्य हि क .] ~ | . . हे उत्वतद्रासचचन इष्ट राम इरः खितसूं। ' रामके ये बचन सुनकर और उन्हे अपने सामने आह राजा दशरथो दुःखितो दुःखितं वच! ॥६८॥ , वेठे देखकर दुःखातुर महाराज दशरथने उस प्रकार स्नीजित॑ आन्तहृदयञचत्मार्गपरिवतिनम्‌ । | अति दुःखमरे वचन कहे ॥ ६८ ॥ “राम ! मुझ छौ- निगृक्ष मां गहाणेढ॑ राज्य पाय परवशा; भ्रान्तचित्त, कुमागेनामी पापात्माको बोधकर ' J १ दु 1 पापात्माका दाधक श्च मा शहाणे राज्यं पापं न तद्धवेत ॥६९॥ | हरये इससे हे कोई पाप न खण ६९ एवं चेदनृत॑ नेव मां स्पृरोद्रधुनन्दन । , है रघुनन्दन ! ऐसा होनेपर मुझे भी असत्य स्पर्श न hn रे १) कह राजा दशाः ऱ्य hn रत्युकतवा हुःससन्तपो विलाप नृपलदा ॥७०॥ | ५ वन त र न होकर हा राम हा जगन्ना ७० | हा राम ; हा जंगनाय ! मां विद्य कथ बो वि ळय | गरणे | मुझे छोर तुम घोर ज काना त सारजापन गन्तुमहसि ॥७१॥ | कैसे उचित समझ रहे हो” ॥ ७१ | विदुल्य सम णो सरोद ह। | ऐसा कहकर उन्होंने रामको गछे ढगा लिया औरे राम; वतुः सजलूपाणिना ॥७२॥ | जी खोलकर रोने छे | तब रामने हाथम जल लेकर सर्ग ३] TTT IIT SS १४१४४५ SNe NN ७४८७४४४७४७ ७९ ७४४१३४४ ७४४ केली आश्वासयामास नृपं शनेः स नथकोविद! । किमत्र दुःखेन बिभो राज्यं शासतु मेऽनुजः॥७२॥। अहं परतिज्ञां निस्तीर्य पुनर्यास्थामि ते पुरम्‌ । -राज्यार्कोटियुणं सौख्यं मम राजन्वने सतः।७४। त्वस्सत्यपाठनं देवकार्यं चापि भविष्यति । कैकेय्याश्च प्रियो राजन्वनवासो महाशुणः॥७५॥ इदानीं गन्तुमिच्छामि व्येतु मातुश्च हृज्ज्बरः | सम्माराश्रोपहीयन्तामभिपेकार्थमाहुताः ॥७६॥ मातरं च समाश्वास्य अनुनीय च जानकीम्‌ । आगत्य पादो वन्दित्वा तब यासे सुखं वनम्‌॥।७७॥ इत्युक्त्या तु परिक्रम्य मातरं दरष्डमाययो । कौसर्याऽपि हरेः पूजां कुरुते रामकारणात्‌ ॥७८॥ होमं च कारयामास ब्राह्मणेभ्यो ददौ धनम्‌ । च्यायते विष्णुमेकाग्रमनसा मोनमाखिता ॥७९॥ अन्तःखमेकं घनचित्म्रकाशं निरसतसर्वातिशयसख्रूपम्‌ । बिष्णुं सदानन्द्मयं हृदव्जे अयोभ्याकोण्डे पिताके आँसू पोंछे ॥ ७२ || और नीतिकुदाल रामजीने धीरे-धीरे उन्हें ढाढस बँधाया | वे कहने लगे--“प्रभो ! यदि मेरे छोटे भाई भरत राज्यशासन करें तो इसमें दुःखकी क्या बात है १॥ ७३ ॥ मैं मी इस प्रतिज्ञाका पाळन कर फिर आपके पास अयोध्या लोट ही . आउंगा । और हे राजन्‌ ! बनमें रहनेसे तो मुझे राज्यसे भी करोड़ गुना सुख होगा | ७४ ॥ इसमें ` आपके सत्यकी रक्षा होगी, देवताओंका कार्य सिद्ध होगा और कैकेयीका भी हित होगा; अतः हे राजन्‌ ! चनवासमें सब प्रकार महान्‌ गुण है ॥ ७५॥ अब मैं शीघ्र ही जाना चाहता हुँ; माता कैकेयीकी हार्दिक व्यथा शान्त हो । अभिषेकके लिये एकत्रित की हुई यह सामग्री अळा रख दी जाय ॥ ७६॥ माता कोसल्याको सान्त्वना देकर और जानकीको समझा- बुझाकर मैं अभी आता हुँ और आपके चरणोंकी वन्दना- कर आनन्दपूर्वक वनको. जाता हँ” ॥ ७७ ॥ ऐसा कहं उन्होंने पिताकी परिक्रमा की और मातासे मिलनेके लिये आये | इस समय माता कौसल्या रामके मंगलके लिये श्रीविष्णुभगवानकी पूजा कर रही थीं || ७८ ॥ उन्होंने कुछ पहले हवन कराके ब्राह्मणों को बहुत-सा धन दिया था और इस समय वह मौन | घारणकर एकाग्रचित्तसे श्रीविष्णुभगवानका ध्यान कर रही थीं ॥ ७९ ॥ अपने हृदयमें अन्तर्यामी, चिद्धन- खरूप, तेजोमय, निरतिशायस्वरूप, सदानन्दमय भगवान्‌ विष्णुका ध्यान करती रहनेके कारण उन्होंने श्रीरामचन्द्र- सा भावयन्ती न ददर्श रामम्‌ ॥८०॥ | जीको नहीं देख पाया ॥ ८० ॥ OO इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे तृतीयः सगः ॥ ३॥ ष्ट्र ` अध्यात्मरामायण [सर्ग ४ चतुर्थ स्‌ ¢ चतुर्थ सग भगवाम्‌ रामका मातासे विदा होना तथा सीता और छक्ष्मणक्के सहित वनगमनकी तेयारी करना! ५०८४५५४७१० ९०५३ ७०५७ ६४/७३६००००३५/ १०९ ०० प प जे कट १३ कर श्रीमहादेव उवाच . श्रीमहादेवजी योरे-हे पार्वती ! तब महारानी देख मपूर्यक a \ 0 3. सुमित्राने रामको देखकर सम्श्रमपूवेक मद्दारानी | सत्र सस्र गिसल ~ ~ ततः सुमित्रा इनं रामं राज्ञं ससम्भ्रमा | कोसल्याको चेत कराकर बताया कि राम खे हुए कौसल्यां बोधयामास रामोऽयं सञ्चुपस्थितः॥। १॥ | हैं ॥ १ ॥ रामका नाम सुनते ही उनको बहिर हुई शृत्वैच रामनामैषा वहिडरिप्रवाहिता । | और उन्होंने विशाळनयन रामकों देख गटे टगाकर + ~ [a क ोदमें र घे तथा उनका शिर मेघ कर 7 राम॑ इष्टा विशाठाक्षमाठिडग्याडे न्यवेशयत्‌॥र॥ | वे बैठा लिया | २॥ तथा उनका शरिर मे य र्थ गात्रं नीलोत्पलच्छ उनके नौल-कमल-सददा श्याम दारारपर हाथ पेरा और मूध्ल्यंदप्राय पस्पशे गात्रं नीलोत्पलच्छवि । | कहा--“बेटा, भूख गी होगा कुळ मिन अङ्क्ष पुत्रेति च प्राह मिष्टमन्नं क्षुघादितः॥ ३॥ | खाले” | ३ ॥| राम! प्राह न मे मातर्मोजनावसरः कुतः । । रामजी वोले-“माता ! मुझे भोजन करनेका समय दण्डकागमने शीघ्रं मम कालोऽध्य निश्चितः ॥ ४.॥ | नहीं है क्योंकि आज मेरे ढिये यह समय आंत्र हँ ¢ | जानेफे ने टु ल्यि श्रित त्‌ किय र F ग्‌ हट % कैकेयीबरदानेन सत्यसन्धः पिता मम। | (डकारण्य जानेके डिये निश्चित किया गया है ॥ eh मेरे सत्यप्रतिङ्ञ पिताजीने माता कैकेबीको वर देकर सरताय ददौ राज्यं ममाप्यारण्यशुत्तमम्‌॥ ५॥ मरतको राज्य और मुझे अति द्य _ | ड ते उत्तम वनवास दिय चतुदश समास्तत्र ह्यपि है ४ मनिवेपते चे डी एदश सम क ता निवेपषट्‌ | = है ॥०॥ वहाँ घुनिवेषसे चौदह वर्प रहकर म चीत हो आगमिष्ये पुनः शीध न चिन्तां कर्तुमईसि ॥ ६॥ | रट आउँगा; आप किसी प्रकारका चिन्ता न करें! |]६॥ तच्छूत्वा सहसो दिया मूच्छिता पुनरुस्थिता। | अचानक ऐसी वात सुनकर माता कौसल्या दुसे आह रामं सुदुःखार्ता दुः्खसागरसम्छृता ॥ ७॥ ¦ अचेत हो गयी और फिर चेत होनेपर दु:ःख-सागरगे ~ ४ ८ ! उछलती-हूबर्ती दुःखातुर होकर रामसे कहने लगा || ७॥ याद राम वन सत्य यास 1६ हि £ SR नाणा चनेन सामाप | ' “राम | यदि सचमुच ही तुम बनको जाते हो तो मुझे त्वद्विहीना क्षणाद्ध वा जीवितं धारये कथम्‌। ८ ॥ । भी सथ छे चलो; तुम्हारे विना में आधे क्षण भी कैसे > 06 , , ~ ~ रह सकती हुँ £ ॥ ८॥ जिस प्रकार गो अपरे यथा गोबालकं वत्सं त्यक्र | १ “रया अपन "न दं त्रा तिश इत्रचित्‌ । | अत्पवयस्क वछड़ेको छोड़कर अन्यत्र नहीं रह सकती तर्थव त्वां न शक्रोमि त्यक्त प्राणासियं सुतस्‌ ॥९॥| | उसी प्रकार में भी तुझ अपने प्राणप्रिय पुत्रको नहीं हाउ छोड़ सकती ॥ ९॥ यदि राजा भरतसे प्रसन्न हैं तो भरताय प्रसन्नश्चद्राज्य प्रयच्छतु उन्‍हें i र्‌ः अह ता द्राज्य राजा प्रयच्छतु | उन्हें राज्य भले ही दें परन्तु तुझ प्रियपुत्रको वनवासकी किमर्थे बनवासाय त्वामाज्ञापयति म्रियम॥१०॥ | आज्ञा क्यों देते ह? ॥ १० ॥ कैकेयीक्रो धर देकर कैकेय्या वरदो राजा सर्वस्न वा प्रयच्छतु । Ri कि सर्य दे डालें, ( इसमें कोई ~ आपत्ति न्द ) किन्तु तुमने राजा अधवा केकेयीका त्वया किसपराद्ध हि केकेय्या वा नृपस्य वा ॥११॥ | क्या बिगाड़ा है 1 ११॥ हे राम ! जिस प्रकार पिता पिता गुरुयंथा राम तवाहमधिका ततः । | 3 हरे गर है ! मरे कि मैं भी तो उनसे अधिक व व री तुम्हारी गुरु हूँ ! यदि पिताने तुमसे बन जानेको कहा पत्रा बनं गन्हुं वारयेयमहं सुतस्‌ ॥१२॥ | है तो मे तुम्हे रोकती हूँ ॥ १२॥ यदि मेरे वाक्यका र सग ४ ] अयोध्याकाण्ड ५९ 9 ™ 9819 TTT ०८ ७५५४४४७ NINN ७४८ ७-४ ANAS NNSA ५१७ ६५:४० ४०२७३ ७८७७ १ ४.० १० घट wp ee (७८ ७ ७७८ Ie Uw wi 1 यदि गच्छसि मद्दाक्यपमुछ॒ड्ध्य नृपवाक्यतः |. | उछद्दन कर तुम राजाकी आज्ञासे. वनको चलें तदा प्राणान्परित्यज्य गच्छामि जाओगे तो मैं अपना प्राण छोड़कर यमएुरको चली रेत्यज यमसादनम्‌ ।१२। | न” ॥ १३॥ लक्ष्मणोऽपि ततः धरुत्वा कोसल्यावचनं रुपा। तव लक्ष्मणने भी कोसल्याके वचन सुनकर रामजी- , ~ की ओर देखकर रोषसे त्रिलोकीको दग्ध करते डुए-से उवाच र | वाच राघव वीक्ष्य दहन्निव जगत्त्रयम्‌ ॥१४॥ | वहा] १९॥ “मैं उन्मत्त, श्रान्तचित्त और कैकेयीके उन्मत्तं भ्रान्तमनर्स कैकेयीवशवतिनम्‌ | बशवर्ती राजा दशरथको बाँधकर भरतको उनके सहायक द्धा निहन्मि भरतं तहन्धूर | | मामा आदिके सहित मार डाढेंगा ॥ १५॥ आज़ डा नह हि हि धून्मातुलानपि ॥१५। सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध करनेवाले काछानलके संमानः अध्य पश्यन्तु मे शोये लोकान्प्रदहतः पुरा । '! मेरे पौरुषकों पहले वे सव लोग देख ळें । हे शत्रुदमन. " राम त्वमामिपेकाय कुरु यत्नरमरिन्दम ॥१६॥ | राम | आप अभिपेककी तैयारी कीजिये ॥१६॥ उसमें परर तत्र निहन्यां विकारि विन्न उपस्थित करनेवाळोको मैं हाथमें धनुष-वाण घहुप्पाणिरहं तत्र निहन्यां विश्तकारिणः। | लेकर मार डाढ़ेंगा ।” इति बुचन्त सौमित्रिमालिङ्ग्य रघुनन्दनः ॥ १७॥ ठक्मणजीके इस प्रकार कहनेपर रघुनाथजीने उन्हें > ~~ * लगाकर i रघुश्रेष्ठ he शूरोऽसि रघु्ाईळ भमात्यन्तहिते सतः। | लि जगावर कहा ॥ १७॥ है ख्रेष्ठा ठप बे a ५ 2 ' शूरवीर और मेरे परम हितकारी हो । तुम जो कुछ जानामि सर्च ते सत्यं किन्तु तत्समयो नहि १८1 ` कहते हो वह मैं सत्र सत्य मानता हूँ, किन्तु यह उसका यादिदं इस्यते सर्वे राज्यं देहादिकं च यत्‌ |, समय नहीं है ॥ १८॥ यह जो कुछ राज्य और देह दि सत्यं भवेत्तत्र आयासः सफलश्च ते ॥१९॥ | आदि दिखायी देता है बह सब यदि सत्य होता तो चाद सत्य भव i ; अवदय तुम्हारा परिश्रम सफल होता॥ १९ ॥ किन्तु भोगा मेघवितानखविधुक्लेसेव चञ्चलाः । . ये भोग तो मेघरूपी वितानमें चमकती हुई बिजलीके आधुर'्यपिसन्तपरे ' समान चन्नछ हैं और आयु अश्निमें तपाये हुए हस्रजलबिन्दुबतू ॥२०॥ , ोहेपर पड़ी हुई जठकी बूँदके समान क्षणिक है॥ २० ॥ यथा व्यालगरुखोऽपि भेको दंशानपेक्षते। | जिस ग्रकार सर्पके मु हमें पड़ा हुआ भी मेंढक मो ठः ~ लोको भोगानशाश्रवान्‌ २१. गाठा र्ता है उसी प्रकार लोग कालरूप सपे ग्रस्त था काळाहिना ग्रलो लोको भोगानशाश्ववान्‌ २१, .. भो अनित्य भोगोंको चाहते रहते हैं ॥२१॥ कैसा करोति दुःखेन हि कमतन्त | आश्चर्य है कि शरीरके मोगोंके लिये ही गहु रात- शुरीरमोमार्थमहर्निश. नर). ¦! दिन अति कष्ट सहकर नाना प्रकारकी क्रियाएं करता > रर गाए | रद्दता है । यदि यह समझ ळे कि शारीर आत्मासे भिन देहस्तु मिन्रः पुरुपात्समीश्यते है तो फिर भला पुरुष कैसे किसी भोगको भोग सकता को वात्र भोग! पुरुपेण शुज्यते॥२२॥ | है ! ॥ २२॥ पिता, माता, 2 भाई, खरी be बन्धु दारवनध्नादिसङ्गमः ; बान्धवोंका संयोग प्याऊपर एकत्रित हुए जीवी अथवा पिद्मासुत्राठदारनन्नगादस ल । | नदी-प्रवाहसे इकट्टी हुई छकडियोंके समान चञ्चल प्रपायामिव जन्वूनां नद्या काष्ठीषवचल! ॥२३॥ | ३ | २१॥ यह निरसन्देह दिखायी पड़ता है कि छायेव लक्ष्मीश्चला प्रतीता | छक्ष्मी छायाके समान चछ्छ, यौवन जळ-तरंगके समान तारुण्यमम्वूमिवदधुवं च्‌। अनित्य है, खी-सुख स्वभके समान मिथ्या और आयु स्वभोपमं ख्रीसुखमागुरल्यं अत्यन्त अल्प है तथापि प्राणियोंका इनमें कितना तथापि जन्तोरमिमान एपः ॥२४।॥ | अभिमान है! ॥२४ | यह संसार सदा रोगादि-संकुळ ६० अध्यात्मरामायण [ सर्ग ४ een SRST मन re PCP vey arn TTR sere 7 | नया खप्न और गरखव-तगरके समान बिया ह मूढ- : रोगादिसङ्कला ` तथा खप्न और गन्धर्वत्नगरकी २ ५ पूढे. संसृतिः खप्तसदशी सदा रोगादिसङ्कुला । जन हा इको सय गना इसका अहण करे गस्थर्बनगरभख्या गृहलतामसुवर्तते ॥२५॥ | ह २५॥ नित्य तूर्यके उदय और अन्न होनेसे आयुष्यं क्षीयते यसादादित्यस्य मतागपेः। | आयु क्षीण हो रहो है तथा नित्य ही दूसरोंकी इष्टाडन्येपां जरामृत्यू कथञ्चननव बुध्यते ॥२६॥ | इद्रावखा और शतु होती देखी जाती है तो मां दिवसः सैव रात्रिरित्येव मूढ पुरुषको किसी प्रकार चेत नहीं होना हर्ष, च हा ल त्त व सू । | नित्यप्रनि उसी प्रकार दिन और रात होते ह किन्तु? भोगानलुपतत्येव कालमेगं न पश्यति॥२७॥। मति पुरुष भोगेंके पीछे ही ढोडला है, कालो अतिक्षणं क्षरत्येतदायुरामघटाम्बुबत्‌। ' गतिको नहीं देखता ॥ २७॥ करे बर्गे भरे दृष्ट रो ; । जके यु ग्रतियण तीण हो रहो हे अ सपत्ना इव रोगौधा शरीरं प्रहरन्त्यहों ॥२८॥ | जस्को समान आयु ग्रतिक्षण क्षीण हा सही है आर र नेप्रते | रोग-्समूह शत्रुओके समान शरीरको तुळाये दाटते जरा ज्याधीब डर जन्नत | हैं ॥ २८ ॥ वृद्राबस्या सिंदिनीके समान उराती हूर मृत्युः सहेव यात्येष समयं सम्म्रतीक्षते ॥२९॥ | सामने खडी है और यह मृयू मी उसके साथ ही देहेऽहंभावमापक्षो राजाह लोकविश्रुतः । ' चण्ती हुई (अन्त) समयका प्रतीक्षा कर रह है ॥२९॥ त्यखिन ; कृमिषिदभससंज्रिते ॥३०॥ | किन्तु देहमें आ-मावना करनेबाठा जीव एस कृमि का जन्तु ध ० ¦ डू ey हति मु मन्तुः कमिविद्‌मसर् ॥२०॥ ड और भव्मरुप दारीरक ही पी खारि राजा त्वगस्थिमांसविण्मूत्ररेतोरक्तादिसंयुत! | हुँ' ऐसा मानता है ॥ ३० || है हत््मण ! तुम दुद विकारी परिणामी च देह आत्मा कथं वद ॥३१॥ | सोचकर बताओ कि जिसके आश्रयसे तुम संसारको - यमास्थाय मर्बोहोक दग्धुमिच्छति लक्षण । | करना चाहते छ वह खचा, अमि, मांस, विश्व देहाभिमानिनः सर्वे दोषाः आ रमन्ति | मूत्र, शुक्र और रुप्रिर आदिसे बना हुआ विकारी और दुहामिमानिनः सव दोषा! आदुर्भबन्ति हि ॥१२) | परिणामी देह आला किस प्रकार हो सवता है ! हे देहोऽहमिति या बुद्विरिविद्ा सा प्रकीतिता। भाई! इस देहामिमानसे युक्त पुहुपमे हो सम्पूर्ण दोप हे देहश्रिदात्मेति वुद्विविधेति भर्ण्य प्रकट हुआ करते हैं ॥२१-३२॥ ' देद हुँ ' इस नाह दहा भण | हि SO 0 ४९४ इर र शालि वुद्धिविधेति भ्‌ यत्‌ | रे रे | बुद्धिका नाम ही अविद्या ग और म देए नहीं, चैतन- अव्या संसृतहतुर्षिद्या तस्या निवर्तिका। ; आम्मा हूँ! इसोको विद्या कहते हैं ॥ २२ ॥ अविद्या तस्मात? सदा कार्यो विद्याभ्यासे मुयक्षाभिः | | उन्ममरणरूप संसारकी कारण है और विद्या उसको न । निवृत्त करनेवाळी है; अतः मोश्न-झामियोंक्रों सदा कामक्राधादयस्तत्र शत्रवः शत्रुस्दन ॥३४॥ | $ अतः मोक्ष-कागिंयोकी स तत्रापि कध एवालं मोक्षविज्ञाय सर्वदा | vr विद्योपार्जनका प्रय करना चाहिये | हे शत्रदमन ! काम-क्रोध आदि इस साधनमें विन्न करनेवाले शत्र सळ, £ हैं ॥ ३ उनमें भी मोक्षम विन्न उपस्थित करनेके येनाविष्ट: पुमान्हन्ति पित्ादुहृतसखीन्‌॥३५॥ य ॥ ३४ ॥ उनमें भी म्म विज्ञ उपस्थित नेक व | लेये तो एकमात्र क्रोध ही पर्याप्त है, जिसका आवेश ऋधमूलो मनस्ताप! क्रोधः संसारवन्धनम । होनेसे पुरुष पिता, माता, मुद्‌ और बन्धुओंका भी वध धर्मक्षयकरः क्रोधस्तस्मात्कोध परित्यज ॥३६| | कर डालता दै ३५॥ मनके सन्तापका मूछ क्रोध है और क्रोध ही संसारका बन्धन तथा धर्मका . क्रोध एव पहान्‌ श्त्या वैतरणी नदी | | क्षय करनेवाढा है। इसलिये तुग ओको छोड़ सन्तोषो नन्दनवनं शान्तिर हि कामधुक्‌ ॥१७॥ | दो ॥ ३६॥ यह क्रोध महान्‌ शत्रु है, तृष्णा बैतरणी तस्मात्थान्ति भञस्ताद्य शत्रुरेचं भवेन्न ते । ह है शत सदव र शान्ति ही कामधेनु ~ विद ३७॥ इसलिये तुम शान्ति धारण करो, इससे 2 यमन्‌ $ क हि गीधरूप॑ शारः ४१ ९ दहाख्पमन्ाणबुड्यादिभ्यो विलक्षणः ॥३८॥ | ( क्रोषरुपी ) मुका तुमपर प्रभाव न होगा | आत्मा सर्ग ४ ] ROR So NNN NN Nn आत्मा शुद्ध! स्पयेज्योतिरविकारी निराकृतिः। | देह, इन्द्रिय, मन, प्राण और बुद्धि आदिसे पृथक्‌ तथा यादे न्तव नात्मनो विदुः ॥९९॥ | उदे लयंमकार अविकारी और निराकार है । जब तावत्सा रदः यैः पीडचन्ते मत्यस॑ ई तक मनुष्य देह, इन्द्रिय और प्राण -आदिसे आत्माकी तसंसारदुःखौ यैः पीडयन्ते मृत्युसंयुताः। | भिन्नता नहीं जानते तबतक वे मृत्युपाशमें बँधकर तसमासं सदा भित्नमात्मान हृदि भावय ॥४०॥ | सांसारिक हुःशतमहसे पौडित होते रे हे! [4 धादिश्यों वि त्मानं हद भाषय ४० | चये तुम सर्वदा अपने हदये बुद्धि आदिसे आत्मा | स्यो बहि; सर्वमनुवर्तख मा खिदः | | को भिन्न बहु करो, इस सम्पूर्ण बाह्य व्यवहारका का _ अलुः रो; और घुल अथवा दुःखरूप जैसा प्रारब्ध मुज्ञ्मार्धमखिल॑ सुखं वा दुःखमेव वा ॥४१॥ | ¬ ड र शकि सुखं वा दुःसमेव वा ॥४१॥ | हो उसको भोगते हुए चित्तमें खेद न मानो प्रयाहपतित कार्य कुर्वन्नपि न लिप्यसे। |॥ २८-४१॥ हे रघुपुत्र ! वाहरसे ( इन्दि आदिं- हे सर्वत्र क त द्वारा ) कतृ त्व प्रकट करते हुए जो काये प्रारब्धवश वाह्ये सवत्र करत्वमावहनषषि राघव ॥४२९॥ | उपस्थित हो उसे करते रहनेसे भी तुम ,बन्धनमें नहीं अन्तःभुद्ध्खभावस्तवं लिप्यसे न च कर्मभिः । पडोगे ॥४२॥ भीतरसे राग-देषरहित और शुद्धखभाव 111. ब रहनेके कारण तुम कर्मोंसे लिप्त न होगे । मेरे इस सम्पूर्ण संसारदु/खैरखिलेवाध्यसे न कदाचन | ऐसा करनेसे तुम सम्पूर्ण सांसारिक दुःखोंसे कमी त्य RR त बाधित न होगे । हे मातः ! तुम भी मेरे इस कथनपर समागमं प्रतीक्षख न दुःखैः पीड्यसे चिरसू। | मिठनेकी प्रतीक्षा करती रहना । तुम्हे अधिक कार SRR कमारी तविं वा दुःख न होगा । कर्मबन्थनमें बवे हुए जीबोंका सदा न सदेकत्र संवासः कमेमागरोचुवातेनास 11४५) एक ही साथ रददना-सहना नहीं हुआ करता | ४५॥ यथा ग्रवाहपतितइवानां सरितां तथा । जैसे नदीके प्रवाहमे पढ़कर बहती डर डॉगियाँ त सदा साथ-साथ ही नहीं चलती । माता यह चदिह चतुर्दशसमा सहया क्षणाद्धमिव जायते। 1४६॥ | वर्षकी अवधि आधे क्षणके समान बीत जायगी, आप हा _ , अब दुःखको दूर करके हमें वन जानेकी अनुमति एवं चेत्सुखसंवासो भविष्यति वने मम ((४७॥ सकँगा"। ४६-४७ || अयोध्याकाण्ड -६१ इत्युक्त्वा दण्डवन्मातुः पादयोरपतचिरय । ऐसा कह श्रीरामचन्द्रजी बहुत देरतक दण्डके समान माताके चरणोंमें पड़े रहे । तदनन्तर माताने उन्हें, उठाकर गोदमें बैठा छिया और आशीवाद ह | देकर उनकी प्रशंसा की ॥ ४८॥ वे बोलीं-“तुम्हारे ` सें देवा। सगन्थती ्रह्मचिष्णुद्षिवादयः। । चलते, बैठते अथवा सोते समय गन्धर्वो-सहित त्ह्मा, ५ विन्त निद्र विष्णु और शिव आदिक सम्पूण देवगण तुम्हारी रक्षन्तु त्यां सदा यान्तं तिष्ठन्तं निद्रया युतम॥४९॥ ३. रक्षा करें? ॥ ४९॥ ~ ह “. [मक ने ति प्रस्थापयामास समालिङ्य पुनः पुनः । इस प्रकार बारम्बार हृदयसे ठाकर माताने रा हि | विदा किया । तब लक्ष्मणजीने भी. रामजीसे आँखेंमें आनन्दाश्रु भरकर गद्गद वाणीसे कहा- हि राम } आपने मेरा आन्तरिक सन्दे दूर कर दिया; अव मैं । उरथाप्याङ्के समावेध्य आशीर्मिरभ्यनन्द्यत्‌)४८॥ लक्ष्मणोडपि तदा रामं नस्वा ह्पाशुगह़दः ॥५०॥ आह राम ममान्कशः संशयोजय त्वया हृतः । अध्याया ले तयास ६२ अध्यात्मरामायण [सग ४ ध्यान mem 2000200 ९९ 2७0 ode कक ०१० ७० ७७९० ५१६४ ७ ४४९९ १० १० डक डक pS तिक, 1५ ३॥ | आपकी सेवा करनेके छिये आपके पौछे-पीछे चग, मे ॥[५१॥ | आपकी सेवा करने गाप ह; यास्यामि पृष्ठतो राम सेवां क्तु तदादिश ॥५१ आप इसके लये आज्ञा दौजिये ॥ ५०-५ ॥ है अजुग्रह्वीष्व मां राम नोचेत्माणांस्त्यजाम्यहम्‌ । | प्रभो ! आप सुझपर षा कीजिये, नहीं तो में प्राण । छोड़ दूँगा ।” तब रघुनाथजीने भी छन्मणसे कहा-- तथेति राधवोऽप्याह लक्ष्मणं याहि माचिरम]५२॥/ बहुत अच्छा, चळे देरी न करो! ॥ ५९ ॥ प्रतस्थे तां समाधातुं गतः सीतापतिविशु; । ¦ तदनन्तर सीतापति भगवान, राम तर्क $ पतिमाेः ५ । समझानेके लिये चळे और अपने महऊम पहुंच तब आगतं पतिमालेव्य सीता सुसितभापिणी ॥५३॥ . मन्द-सुसकानपूर्वक वोलनेवाठी श्रौसीता जीने पनिद देः 1. नमे जळ वेकार शमिपवेक स्वर्णपात्रथसाठठे! पादौ म्रक्षाल्य भक्तितः , आते देख एक सुबर्ण-पातमें जळ देकर भिद दे शिका उनके चरण धोये और खामीकी ओर देखते हुए प्रच्छ पतिमालोक्य देव कि सेनया विना ॥५४॥ ; पूछा--“देव | इस समय सेनाक बिना ही आप फेस आगतोऽसि गतः कुत्र श्रेतच्छत्रं ते कुतः । ` आये हैँ? आप प्रातःकाळ कहाँ गये स! आपका ते किरीटादिवि ` खेत छत्र कहाँ है? बाजोका बजना गया बन्द हो गया वादित्राणि न वाधन्ते किरीटादि विवजित। ॥५५॥ है और आप किरीटादि राजोचित भागूपर्णोने रहित सामन्तराजसहितः सम्भ्रमान्नागतोऽसि किम्‌ । को है | ॥ ५३-५७॥ आप मन्त्री आर राजाओेकि सहित वडे ठाट-बाटसे क्यों नहीं आय १ इति स सीतया एष्टो राम! ससितमत्रचीत्‌ ॥५६॥ सीताजीके इस प्रकार पू्ननेपर ओरामचस्द्र्जाने ५, न दण्डकारण्यका सम्पूर्ण राज्य दिया है, अंतः है अतसत्पारनाथाय शीघ्र यास्यामि भामिनि ।५७। भामिनि ! में शप्र ही उसका प्रवन्ध करनेके अदैव यास्यामि चनं त्य तु श्रशूसमीपगा । ' ल्यि वहाँ जाऊंगा | ५७॥ मैं आज हा बनको जा , ५ दिनो , रहा हूं; तुम अपना सासुक पास जावर उनकी सेवा शुभूषां कुरु मे सातुने मिथ्याबादिनो वयम्‌ ॥५८॥ जुश्रपामे रहो । में घठ नहीं बोळा" ॥ ०८ ॥ इति मुवन्तं श्रीरामं सीता मौताउत्रवीहचः । रामचन्द्रजीके इस प्रकार कपनेपर सीताजाने भयभीत किनर्थ बनराज्यं ते पित्रा दत्त महात्मना (५९॥ . होकर कंहा--“आपके गद्या पिताजीने आपको शता : चनका राज्य क्यों दिया है ?? | ७९] R ha = र] ने र ट्‌ तामाह रामः पेकेव्ये राजा प्रीतो बरं ददो । त _रामचन्दजीने उनसे कहा--*हे अनघे ! भरताय ददो राज्य वनवासं समानचे ॥६०॥|। od प्रसन्नतापूरवै वैकेयीको चर देकर भरतको ५ हे | राज्य और मुझे वनवास दिया हैं ॥६०॥ देवी २ चतुदश समास्तत्र यासो मे किर याचितः | | इङ्गय र ती हे साम कल याचत | । कैकेयीने मेरे लिये चोदह वर्षतक चनें रहना मोंगा था, तया दव्या ददा राजा सत्यवादी दयापरः ॥६ १॥ | सो सृत्यवादी दयाळु महाराजने देना खीकार कर का क श्या | लिया है ॥ ६१ ॥ अतः है भामिनि ! में शीघ्र ही वहाँ अतः शीघ्र गमिष्यामि मा बि्नं कुरु भाषिनि ¦ _ ५ ¬ ह 7 ` म यामह चहा , डरे न भाच | जाऊंगा, दुम इसमें किसी प्रकारका विश्वच खड़ा न इत्वा तद्रामवचन जानकी प्रीतिसंयुता ॥६२॥ | करना |” रामचन्द्रजाके ऐसे बचन सुनकर सीताजीने ळय ~ . य इ ! षूः वैक कहां. डा w अहमग्रे गमिष्यामि घनं पश्ा्तमेष्यसि। | ७ कहा-- पहले में बनको जाऊंगी उसके , पीछे आप आना । हे राघव | मुझे छोड़कर आपको इत्याह गर + | . i A] cl] इलाह मा विना गन्तु तव राघव नोचितम्‌ ॥६३॥ ¦ वनमे जाना उचित नहीं है” ॥ ६२-६३ ॥ ऊ ~ 3 सर्ग ४] अयोध्याकाण्ड क्श TTT प Sr: क्का ` तामाह राघवः प्रीत: स्वप्रियां प्रियवादिनीम | hE रघुनाथजीने प्रसन्न होकर अपनी. प्रिया" CN प्रियवादिनी जानकीसे कहा---“मैं तुम्हें अनेकों व्याघ्रादि कर्थं चनं तवां नेष्येऽहं बहुव्याघ्रसूग ३ से मं डे अनन न "ह बहुन्याघररू कब ॥६४॥ वन्य-प्युअ पूर्ण बनमें कैसे साथ ले चढेँ ॥ ६४ || राक्षसा घोररूपाअ सन्ति मानुपभोजिनः । . | वहाँ मनुष्योंको खानेवाळे भयंकर राक्षस रहते हैं और सिंहव्याप्रवराह्यथ सञ्चरन्ति समन्ततः ॥६५॥ | सव ओर सिंह, नयप्र तया शकर आदि हिंल-जीव ८ ५ हैं फिरते हैं ॥ ६५ || हे सुन्दर कमरवाळी | वहाँ भोजन- कैट्वस्लफलमूलानि भोजनाथ सुमध्यमे। | के लिये कडुए और खट्टे फल-मूछादि ही मिळते हैं; अपूपानि व्यञ्जनानि विदन्ते न | किसी प्रकारके पूर आदि व्यञ्जन वहाँ कमी नहीं | हे 1 कदाचन ॥३६॥ मिलते ॥ ६६ ॥ हे सुन्दरि ! वे फळ भी सदा नहीं काले काले फलं वाऽपि विद्यते कुत्र सुन्दरि । मिलते, किंसी-किसी समय कहीं मिलते हैं । उस वनमें ख्य काँटोंसे © मागो न इयते कापि शर्कराकण्टकान्वितः ॥६७॥ | री कहीं तो धूलि और कॉटसे ढके रहनेके कारण माग । शिह्लदृशादिभि' मी दिखायी नहीं देता ॥ ६७॥ वह दण्डकारण्य गुहागहरसम्वार्घ गदिभियुतम्‌। । ऐसे ही अनेकों दोषोंसे भरा हुआ है । उसमें अनेकों * Ce ne, on गुफाएँ ओर गडढे हैं तथा बह झिड्डी और डॉसोसे भरा एवं बहुविधं दोषं वनं दण्डकसंज्ञितम्‌ ॥६८॥। ¦ | ९ ९ ड़ द्‌ वि दुण्डकर्सशितय्‌ ॥६ ' हुआ है ॥ ६८॥ ऐसे वनमें शीत, वायु और घाम पादचारेण गन्तव्यं शीतवातातपादिमत्‌। ' आदिके समय भी पैदल ही चढना पडता है । मुझे सन्देह राक्षसादीन्पने इष्द्वा जीवितं हास्यसेऽचिरात्‌।६९। है कि तुम वनमें राक्षसादिकी भयंकर मूर्ति देखकर Ne तुरन्त ही प्राणत्याग कर बैठोगी ॥ ६९ ॥ इसलिये हे तसाकदे शृहे तिष्ठ शीघ्र दरक्ष्यसि मां पुनः । | भद्रे! ठम धर ही रहो, मुझे शौत्रही फिर देख पाओगी ।” शि रामस्य वचनं श्रुत्वा सीता टुःखसमन्बिता ॥७०॥ | रामके ये वचन सुनकर सीताने दुःखातुर होकर _ केश्चित्वो पसमरि कुछ क्रोधसे ओंठ केपाते हुए कहा--“मुझ पतित्रता प्रत्युवाच स्फुरइयन्रा केञश्चिरकापसमाच्चता। | धर्मपलीको आप घर क्यों छोड़ना चाहते हैं? कथं मामिच्छसे त्यकुं धर्मपत्नीं पतित्रताम्‌ ॥७१॥ | ॥ ७०-७१॥ आप धर्मज्ञ और दयाळ है फिर RR कर , | अपनी अनन्यभक्ता और दोषहीना मुझ पत्नीको क्यों त्वदनन्यामदाया मां धमशोडसि दयापरः | | छोड़ते हैं ? हे राम ! बनमें भी आपके पास रहते हुए त्वत्समीपे स्थितां राम को वा मां धर्षयेदने ॥७२॥। | मेरा कोई क्या बिगाड सकता है१॥ ७२॥ जो फलमूला दि ~ भी फल-मूलादि आपके खानेसे बचेंगे वे ही मेरे लादिक . यद्यचव थुक्तावश्ेपितस्‌ । | अगृतके समान होंगे । उनसे सनतषट होकर मैं ` तंदेवासृततुल्य॑ भे तेन तुष्टा रमाम्यहस्‌॥७३॥ | आनन्दपूर्वक रहूँगी | ७३ ॥ इसमें कोई सन्दे नही वचि रन्त्यामे कणा: ; कि आपके साथ विचरते हुए मेरे लिये कुश-कास ओर | त्वया सह चरन्या म शाः काशाच कट का: | कण्टकादि भी लोके समान होंगे || ७४ ॥ मैं आपको -पुष्पासरणतुल्या मे भविष्यन्ति नं संशयः ॥७४॥ | किसी प्रकारका कष्ट न दूँगी, बल्कि आपके कार्यमें RE जक 0 सहायिका होऊँगी । बाल्यावस्थामें एक ज्योतिषूशाखर- अहं सां छशये नैव भवेयं कायेसाधिनी । विशारद महात्माने मुझे देखकर कहा था कि त अपने बाल्ये मां वीक्ष्य कथ्षिटै ज्योंतिःशास्रविशारद? ॥ | पतिके साथ बनमें रहेगी । उन ब्राह्मण महोदयका Ne - ति वाक्य, सत्य हो, मैं अवश्य आपके साथ वनमें ्राह ते विपिने वासः पत्या सह भविष्यति । | धं || ७५-७६॥ एक बात और कहती हूँ, उसे सत्यवादी द्विजो भूयाद्गमिष्यामि स्वया सह॥७६। | घुनकर आप मुझे बनको छे चलिये। आपने बहुत-से [सर्ग ४ IIIS कक क कय कय कक क कायक मडकी क-न {५-० ककी >> dnd be अन्यत्किश्रित्मवश््यामि शुत्या मां नय काननम्‌। | ब्राह्मणोंके मुखसे बहुत-सी रामायणे सुनी होंगी ॥ ७७॥ रासायणानि बहुशः शुतानि बहुमिद्धिजे! ॥७७॥ | बताइये, इनमेंसे किसमें भी क्या सीताके विना रामजी सीतां विना वनं रामो गतः किं इत्राबिद्व । | परको गये हैं ! अतः मैं आपकी पूर्णतया सहायिका यि हे च | होकर अवश्य आपके साथ चढेंगी ॥७८॥ यदि गा + ~ Ye hs ~ = अतस्त्वया गमिष्यामि स्था सत्सहायिनी। ।७८॥ आप मुद्दे छोड़कर चळे जायेंगे तो में अमी आपके यदि गच्छसि मां स्यवस्वा प्राणांस्त्यक्ष्यामि तेऽग्रतः) सामने ही अपने प्राण छोड दूँगी ।” इति तं निश्चय ज्ञात्वा सीताया रघुनन्दनः ॥७९।| | तव रघुनाथजीने सीताका ऐसा दृढ़ निश्चय देखकर अब्रवीदेषि गच्छ स्वं वनं शीघं मया सह। | कडाला “देवि! तुम शीघ्र ही मेरे साथ बनको चठो; ये | ¢ 1 1 ७ री ये च हार आदि सम्पूण आभूषण बसिष्टजीकी खी अरुन्धती- अरुन्धत्ये प्रयच्छाशु हारानाभरणानि च ॥८० ||: कि ल र्र थ हारानामरणाचे च ॥८० || को दे दो | ७९-८० ॥ हम अपना सम्पूर्ण धन ब्राह्मणों- ब्राह्मणस्यो धनं सव दर्वा गच्छामहे वनम्‌ । को देकर बनको चलेंगे !” इत्युक्त्वा लक्ष्मणेनाशु द्विजानाहूय भक्तितः ।८१।| ऐसा कह भगवान्‌ रामने छक्ष्मणजीद्वारा भक्ति- ददौ गवां बृन्द्शतं धनानि पूर्वक त्राह्मणोंको बुलबाया ॥ ८१ || और उन रघुकुळकेतु बद्ञागि दिव्यानि विभूषणानि । भगवान्‌ रामने प्रसनतापूर्वक सैकड़ों गोओके झुण्ड, कुटुम्ववद्भयः श्रुतशीलवङ्कयो बहुत-सा धन, दिव्य व्र और आभूषण कुदृम्बी तथा शुदा द्विजेभ्यो रघुवंशकेतु! ॥८२॥| पिन और शोळसम्पन्न बराह्मणोको दिये ॥ ८२॥ अरुन्धलै ददौ सीता दुर्यान्पाभरणानि च | | सौताजीने अपने मुख्य-मुल्य आभूषण अरुन्धतीजीको च च रे दिये तथा i सेवकोक ह बहतः रामो मातुः सेयकेम्यो ददौ घनमतेकधा ॥८३॥ दे दिये तथा अपनी माताके सेवकोंको भी रामने बहुत- सा धन दिया ॥ ८३ ॥ इसी प्रकार अपने अन्तःपुर- ६४ अध्यात्मरामायण स्वकार नि fe ~ RN | कनो परासि तरचा, जरणा न्या सवकेम्यसथेच च! वासा सेवकों, पुरवासियों, देशवासियों तथा ब्राहणोंको परिजावपदन्यवि बाह्मणस्यः सहस्रशः ॥८४॥ | मी उन्होंने वहुत-सा धन दिया ॥ ८४ ॥ लक्ष्मणोऽपि सुमित्रा तु कौसल्यायै समर्पयत्‌ । | घर श्रीरक्ष्मणजीने भौ अपनी माता सुमित्राको घरुष्पाणिः समागत्य रामस्यागरे व्यवस्थितः टया कोसल्याजीको सौंप दिया और आप हाथमें धनुष रामः सीता लक्ष्मण जग्पुः सर्वे नृपालयम्‌ ॥८६॥ श रमे सामने आकर खड़े हो गये । तदनन्तर राम, लक्ष्मण ओर सीता सव महाराज ददारथके पास श्रीरामः सह आव णी | चे हे ८५८ ६॥ सहल्षों कामदेचोंके समान सुन्दर इयाम पौरान्‌ जानपदान्कुतूहठच्श! शरीरवा भगवान्‌ राम सीता ओर छोटे भाइ लक्ष्मणके गनद सहित अपनी कान्तिसे दशों दिशाओंको प्रकाशित जाय झाप | करते हुए धीरे-धीरे राजमार्गसे चळे | उस समय जो झा दिशी भासयन | पुरवासी और जनपदवासी लोग कुतहल्वश आनन्दमयी न्वा इ सयन्‌ इृष्टिसे उनकी ओर देख रहे थे उनके देखते हुए और 15खिलजगत्‌ अपने चरण-स्पशसे सम्पूर्ण संसारको पवित्र करते आपाल्य तत्पितुः ॥८७॥ | हुए वे अपने पिताके घर पहुँचे || ८७॥ HR OE इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥ os अयोध्याकाण्ड न्स्य्लस्व्सय्स्प्स्प्स्स्प्य्स्य्च्च्य्ल्व्ल्ल्य्ट्व्व्ल्य्ट्ल्य्य्््ट्य्ल््स्ल्य्य्य्स्प्स्ल्स्ल्ल्ट्ल्ल्ल्व्स्ल्ल्ट्ट्ल्ज्ज्जजज्लललनि++>.ब.................ु]....त..ह....]...0...0ह0त... पञ्चम सर्ग भगवानका वनगमन श्रीमहादेव उवाच आयान्तं नागरा दृष्टा मार्गे रामं सजानकिस । लक्ष्मणेन समं वीक्ष्य ऊचुः सर्वे परस्परम्‌ ॥ १॥ ` कैकेय्या वरदानादि शरुत्वा दुःखसमाइताः । वत राजा दशरथः सत्यसन्धं ग्रियं सुतम्‌ ॥ २॥ ख्रीहेतोरत्यजस्कामी तस्य सत्यवता ङुतः । केकेयी घा कथं दुष्टा रामं सत्यं ग्रियङ्करम्‌॥ ३॥ दिवासथामास कथं क्ररकमीऽतिमूढधीः | हे जना नात्र वस्तव्यं गच्छामोऽद्यैव काननम्‌ ॥४॥ यत्र रामः सभार्यश्च सानुजो गन्तुमिच्छति । पश्यन्तु जानकीं सर्वे पादचारेण गच्छतीम्‌ ५॥ पुंभिः कदाचिद्इटा वा जानकी लोकसुन्दरी । “साऽपि पादेन गच्छन्ती जनसद्देष्वनाइता ॥ ६॥ रामोऽपि पादचारेण गजाश्रादिविवार्जितः । गच्छति द्रक्ष्यय विभ सवलोकेकसुन्दरम्‌॥ ७॥ राक्षसी केकेयीनाम्री जाता सर्वविनाशिनी । रामस्यापि भवेद्दू।खं सीतायाः पादयानतः॥ ८ ॥ ~ की. (० जक बलवाल्वाधरवात्र पुप्रयत्ता हि दुर्षरु इति दुःखाकुले इन्दे साधूनां मुनिपुद्धब। ॥ ९॥ अत्रवीद्वामदेयोऽथ साधूनां सङ्घमध्यगः > १ माचुशाचथ राम वा साता वा वच्मि तत्व॒त4॥१०॥ एप रामः परां विष्णुरादनारायण, स्थृत, एपा सा जानकी लक्ष्मीयांगमाथेति विश्वुता ॥ १ १॥ असो शेपस्तमन्वेति लक्ष्मणाख्यश्च साम्म्तम्‌। एप... मायाणुणैयुक्तसत्तदाकारवानिव ॥१२॥ एप एव रजोयुक्तो ब्रह्माऽभूद्विश्वभावनः । १४१४४ १४७४४ ४८ १५४४४४४ ४५ ७४ Ee ६८५५ UP ६०५३ ७५७७४ ७४९७७७५ Uo ७७७ NNN श्रीमहादेवजी बोले-जानकी और लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीको मार्गमे आते देख और कैकेयीके वरदानादिका समाचार सुन समस्त नगरवासी दुःखातुर होकर आपसमें कहने लगे-“हाय ! कामबश राजा दशरथने अपने सत्यपरायण प्रिय पुत्रको ख्रीवे कहनेसे क्यों छोड़ दिया ? उसकी सत्यता कहाँ चली गयी ? और दुष्टा कैकेयीने मी सत्यवादी और ग्रियकारी रामको क्यों वनवास दिया? बह ऐसी क्रूरकर्मा और हतबुद्धि क्यों हो गयी ! भाइयो | अब हमें यहाँ न रहना चाहिये; हम भी आज ही वनको चलेंगे, जहाँ स्री और छोटे भाईके सहित श्रीराम जाना चाहते हैं । देखो तो, आज जानकीजी पैदल चढ रही हैं ॥ १-५॥ हाय! जिस त्रिळोकछुन्द्री | जानकीको पहले कभी किसी पुरुषने शायद ही देखा हो. वही आज बिना किसी परदेके जनसमूहमें पैदल चल | रही हैं ॥ ६ ॥ भाइयो ! इन सवेलोकेकसुन्दर भगवान्‌ रामकी ओर भी देखो; ये भी आज बिना हाथी-धोडेके पैदल ही जा रहे हैं || ७ ॥ यह कैकेयी- | नामकी राक्षसी सबका नाश करनेके ल्यि उत्पन्न. हुई है | भाई | इन सीताजीके पेदछ चळनेसे रामजीको भी तो बड़ा दुःख होता होगा ॥ ८॥ किन्तु किया क्‍या जाय ? इसमें दैव ही प्रबल है, पुरुषका प्रयत्न सवथा | असमर्थ है । इस प्रकार साघु-समाजको दुःखातुर देख मुनिवर चामदेव उनके बीचमें आकर क॑हने छगे---“मैं ऑपॅ- छोगोंको वास्तविक बात “बताता हूँ, आप इन रास और सीताके लिये किसी प्रकारकी चिन्ता न करें ॥ ९-१० ॥ ये राम आदिनारायण भगवान्‌ विष्णु हैं और ये जानकीजी योगमाया नामसे विख्यात श्रीलक्ष्मीजी हैं || ११ ॥ इस समय जो लक्ष्मण नाम धारणकर इनका अचुगमन कर रहे हैं ये शेषजी हैं । ये पुरुषोत्तम भगवान्‌ ही मायाके गुणोंसे युक्त होकर विभिन्न आकारवाळे-से प्रतीत हुआ करते हैं ॥ १२ ॥ ' रजोगुणसे युक्त होकर ये ही विश्वरचयिता ब्रह्माजी | सरवाविष्टसथा विष्णुखिजगठ्मतिपालकः ॥१३॥ | हुए हैं. और सत्तगुणविशिष्ट होनेपर ये ही त्रिळोवी- ६ TR gg, FN ६६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५ एप रुद्रसतामसोऽन्ते जगत्मठयकारणम्‌ । | रक्षक भगवान्‌ विष्णु होते हैं ॥ १३॥ तथा कल्पान्त- , ५७ ' में तमोगुणका आश्रय कर ये ही जगतका प्रळय एप सत्यः पुरा भूत्वा भक्त वेवखत मनुम !। १४॥ । करनेवाले रुद्र होते हैं । पूर्वकम इन्हीं रघुनाथर्जाने नाव्यारोप्य लयस्यान्ते पालयामास राघयः। | मह्यरूप होकर अपने भक्त वयस्वत मुक नामे _ 3 बैठाकर प्रल्यकालके समय उनकी रक्षा की थी | समुद्रमथने पूर्वे मन्द्रे सुतलं गते॥१५॥ : समुद्र-मन्यनके समय, जव मन्दराचळ we ¢ Cn वि लोककी जा री छ्ग १2-१८ | तंत्र इन्हीं अधारपत्खपष्ठेअंट्र कूमरूपा रघूत्तमः | , गो जाने ए हा |) हि ॥। है 1 न्ह | , _ _ : रघुनाथजीने कूमंरूप हकर उस अपना पठिपर शरण मही रसातळं याता प्रझये सकरोऽभवत्‌॥१६॥ ¦ किया था। ग्रखयकालमे जत्र पृथिवी रसातलको चर्छा > ee pe गो ये शकररूप हुए ॥ १६॥ आर उस यामास दंष्ट्रे तां क्षोणीं रघुनन्दनः । 1 व तारयामास ददा ता झापा रनन्द ' पूथिवीको अपनी दाढोंपर उठा लिया | इसी प्रकार नारसिंह वः कृत्वा प्रहादवरदः पुरा ॥१७ ` एक वार ग्रहादको वर देनेके ल्यि इन्होंने नृसिहरूप 3 ५ रे धारण किया ॥ १७॥ और तीनों लोकोंकि कण्दकारूप त्रलाक्यकण्टक रक्ष! पारयामास तनख! । «` PO रे ह की शिक दैत्यराज हिरण्यकशिपुकों अपने नखेंसि फाड डाला । पुत्रराज्य हृतं दृष्टा ह्यादित्या याचितः पुरा ॥१८॥ एक बार, अपने पुत्र इन्द्रका राज्य गया हुआ वामनत्वसुपागम्य याच्ञया 'चाहरत्युनः | देख जब अदितिने इनसे प्राथना की ॥ १८ ॥ सत्र कि त. इन्होंने वामनरूप धारणकर याचना करके उगे किर दुष्टक्षात्रेयभूमारनिवृतये सागतोऽभवत्‌॥१९॥ होटा ल्या इन्दीने प्रशित्रीके भारय दृष्ट क्षत्रिय स एव जगतां नाथ इदानीं रासतां गतः । गणोंको नष्ट करनेके लिये झयुपृत्र परथुरामका रप ¢ ON NA का की बारण किया था] १ ९, ॥ ने हां जगाम भु इस यमय णार्द ध्यत्ति ॥२० ० राप दीनि रक्षांसि कोटिशो निहनिष्यति ॥२०॥ रामरुपसे प्रकट हुए हैं; अब ये रावण आदि. बर सानुपेणेब मरणं तस्य दष्टं दुरात्मनः। राक्षसोंका वध करेंगे ॥ २० ॥ उस दुराग्माऊी मृत्यु राज्ञा दशरथेनापि तपसाऽऽराधितो हरिः ॥२१॥ ¦ "ठु दाष ही वढा हे । महाराज ददारथने (अपने है , पृत्रजन्मम ) तपत्याद्वारा भगवान्‌ विष्णुका इसलिये पुच्रतवाकाङ्कया विष्णोसदा पुत्रो$भवद्धरि! । आराधना की थी कि वे उनके यहाँ पुअरस्यसे स एव विष्णुः श्रीरामो रावणादिबधाय हि ॥२२॥ अवतार ळे; इसलिये भगवान्‌ इनके पुत्र हुए हँ । कशा विष्ण भगवान्‌ ही श्रीरामचन्द्रजी हैं। अत्र ये गल्ताञ्यव वन रामा लक्ष्मणेत्त सहायवान । ' रावणके वधके लिये आज ही वुक्ष्मणसहित वनको एषा सीता हरेरमाया सृष्टिखित्यन्तकारिणी ॥२३॥ . | ये साताम जगतजी उमर, स्थिति और राजा वा केकेयी वापि कि प्रच्य करनेवाली साक्षात्‌ भगवानकी माया हैं ॥२१- शजावा वाप नात्र कारणमपण्वाप | ' २३ || इनके चन-गमनमं राजा या कैकेयी अमात्र पूर्वेचुनारद। ग्राह भूभारहरणाय च॥२१४॥ ' मौ कारण नहीं हैं । कळ ही इनसे नारदजीने प्दिवी- का भार उतारनेके लिये प्राथना की थी ॥ २ रामोऽप्याह स्वयं साक्षाच्छूयो गमिष्याम्यहं वनम्‌ |! उस समय खयं रामने भी उनसे यही कहा था कि अतो रामं समुदिश्य चिन्तां त्यजत बाहिशाः।२५।| कल मैं वनको जाऊँगा । अतः भोले भाझ्यो ! आप- लोग रामके लिये कोई चिन्ता न करें ॥ २० रामरामेति ये नित्यं जपन्ति कर ॥ त्य जपन्त महुजा शुवि | | संसारमें जो लोग नित्य प्रति 'राम-राम' जपा करते _ तेषां मृत्युभयादीनि त भवन्ति कदाचन ॥२६॥ | हे उनकी भी किसी समय मृलुके भय आदि नहीं सर्गे५ ] os ००००२००. का पुनस्तस्थ रामस्य टुःखशङ्ा महात्मन! । रामनाश्नैव मुक्ति: स्यात्कलौ नान्येन केनचित्‌।२७, मायामाचुपरूपेण विडम्बयति लोककृत्‌ | भक्तानां भजनार्थाय रावणस्य वधाय च ॥२८॥ राजञञ्चाभीएसिद््चर्थं मानुष वपुराश्रितः । इत्युक्त्वा विररामाथ वामदेवो महाझुनिः ॥२९॥ थुत्वा तेऽपि द्विजाः सर्वे रामं ज्ञात्वा हरिं विभुस्‌ । जहुहृत्संशयग्रनिथि राममेवान्बचिन्तयन्‌॥२०॥ य इदं चिन्तयेन्नित्यं रहस्य रामसीतयोः । तस्य रामे दढा भक्तिर्भवेद्वज्ञानपूविका ॥३१॥ रहस्यं गोपनीयं यो यूयं वे राघवाम्रियाः । :-इत्युकत्वा प्रययो विग्रस्तेऽपि रामं परं विदुः ॥३२॥ ततो रामः समाविश्य पिठगेहमवारितः । सालुजः सीतया गत्वा कैकेयीमिदमन्रवीत्‌ ॥२३॥ आगताः स्मो वयं मातस्रयस्ते सम्मतं चनम्‌ । गन्तु कृतघियः शाप्रमाज्ञापयतु नः पिता ॥३४॥ इत्युक्ता सहसोत्थाय चीराणि प्रददो स्व॒यम्‌। रामाय ठक्ष्मणायाथ सीताये च एथक पथक ।३५। / रामस्तु वद्षाप्पुत्युज्य वन्यचीराणि पर्यधात्‌ । ` लक्ष्मणोऽपि तथा चक्रे सीता तन्न विजानती ।३६। हस्ते गृहीत्वा रामख एज्या मुखमेक्षत । रामो ग्रहीत्वा तचीरमंशुके पर्यवेश्यत्‌ ॥३७॥ तदुदृष्टा रुरुहुः सर्वे राजदाराः समन्ततः । बसिष्ठस्तु तदाकर्ण्य रुदितं भस्संयन्‌ रुपा ॥३८॥ अयोध्याकाण्ड Ce weve होते ॥ २६॥ फिर उन महात्मा रामके लिये तो दुःखकी शंका ही कैसे हो सकती है ! कल्यिगमें तो एकमात्र राम-नामसे ही मुक्ति हो सकती है. और किसी उपायसे नहीं ॥ २७॥ ये जगत्कर्ता प्रभु भक्तोंकी गुण-कौर्तनका सुयोग देनेके ल्यि और रावणको मारनेके लिये ही मायामानुषरूपसे संसारमें लीळा कर रहे हें ॥ २८॥ इसके सिवा राजा दशरथकी मनोरथ-सिद्धिके लिये भी इन्होंने यह मनुष्य-शरीर धारण किया है।” ऐसा कह महामुनि वामदेवजी मौन हो गये ॥ २९॥ यह सुन वहाँ एकत्रित हुए सब द्विजगणोंनि भी भगवान्‌ रामको सर्वव्यापक श्रीविष्णु भगवान्‌ जाना और वे अपने हृदयका संशय छोड़कर श्री- रामचन्द्रजीका ही स्मरण करने छगे | २०॥ 'जो पुरुष नित्यप्रति राम और सीताके इस रहस्यका मनन करेगा, उसकी भगवान्‌ राममें विज्ञानके सहित दढ. | भक्ति हो जायगी ॥ ३१ ॥ आप सब लोग रामके परम प्रिय हैं अतः इस रहस्यको सदा गुप्त रक्‍खे ।' ऐसा कह विप्रवर वामदेवजी वहाँसे चले गये और परजनोंने भी जाना कि राम परमात्मा हैं ॥ २२॥ तदनन्तर रामजीने बिना किसी रोक-ठोकके पिताके महळमें प्रवेश किया और लक्ष्मण तथा सीताके सहित वहाँ पहुँचकर कैकेयीसे कहा-॥ ३३ ॥ “माताजी ! आपके कथनानुसार हम तीनों बनको जानेके लिये तैयार होकर आ गये हैं; अब शीघ्र ही पिताजी हमें आज्ञा दे? ॥ ३४ ॥ रामके ऐसा कहनेपर कैकेयीने सहसा उठकर स्वयं ही राम, लक्ष्मण और सीताको अळग-अळग वल्कल-वबर दिये ॥ ३५ || तब रामचन्द्रजीने अपने राजोचित बोको उतारकर बनवासियोंकेसे वस्न धारण किये; छक्ष्मणजीने भी ऐसा ही किया किन्तु सीताजी उन्हें पहनना नहीं जानती थीं ॥ २६ ॥ अतः उन वर्खोंको हाथमें लेकर वे छज्जापूवंक रामजीकी ओर देखने छगीं । तब रामचन्द्रजीने उस चीरको लेकर सीताजीके बख्नोपर ही लपेट दिया ॥ ३७॥ यह देखकर रनिवासकी समी खियाँ रोने लगीं | तव वसिष्ठजीने उनके रोनेका शब्द सुनकर क्रोधित हो कैकेयीको डॉटते इए कहा--“अयि दुःशीले.। - ६&& . . - ._ | , ह अध्यात्मरामायण [सर्ग ५ SNPS PINES OF ७ आउटटपकीनड परी NN Ss a0 nse ०५ Beruf फुन कसम इन कुककण्क कम क कक न फुन कम क-क पहन कनकम्कंप्फमकरक “फर्क ककभ कम इनक पं न नरक इइ२७+क+“क पका कक प्कपककक “एम क1२*१+७०कमकाफमक पक» कस क>णफ-कपकप्कण्क,कष्क कन्फन्कनकुण्कभकान कम कब्कम्काककभ नमन प्धकनक कप पाज १४५७०७०५५८ ९०५४५ ४० ७५१५७४५४५७ ७४९ १४१७४३ न्क ६५०६५ ९७/ ८? ७३ ७७५७०७७, ७४४५१७५, tid ककमी ग्राह. दुवृत्ते राम एव त्वया वृत! । | तने तो. केवळ रामके बन -जानेका ही घर माँगा है न १ फिर त. साताको भी बनके वख कैसे देती है ? चंनवासाय दुष्टत्वं सीताये किं प्रयच्छसि ॥३९॥ ॥ ३८-३९ || यदि पतिव्रता सीता भत्तिवदा राम Pid यदि रामं समन्वेति सीता भक्त्या पतित्रत्ता | साथ जाना चाहती हे तो बह समख आमूपयोंसे बिभूषित और दिव्य वख धारण किये हुए ही जाय णभूपिता ॥४०॥ दिड्याम्वरधरा नस्य सर्वापरणभूपता ॥ ४० ॥ तथा नित्यप्रति रामके वनवास-दुःखको द्रु रमयत्वाचश राम , वनदुःखानिवारिणी | करती हुई उनको आनन्दित करें । राजा दशरथाऽप्याह सुमन्त्र रथमानय ॥४१॥ | तव महाराज दशरथने सुमन्त्रस कद्ा-“सुमन्त्र ! तुम रथ ळे आओ | ४१ ॥ चनवासियोकि प्रिय य || ह्य ग च्छन्‌ $ । | ड ° व क we « रथमारक्ष गंच्छन्ठु वनं वनचरग्निया | [म आदि रथपर चढ़कर हाँ वनको जायेंगे "ठसा इत्युकत्वा रामप्रारोक्य सीतां चेव सलक्ष्मणम्‌।४२॥ कह थे सीता और मणके सहित रामक देख- दुःखान्षिपतितो भूमौ रुरोदाश्रुपरिप्लुतत | कर हु जते पिपर गिर पढ़े मर अधि ऑनू विश 6 ५ भरकर रोन छग | तब रामजाके देखते-देखते गन हा ञ झरा ह्‌ सात 3 ' है का क + क . [रां रथ सीता शीघ्र रामस्य पश्यतः ॥४३॥ सीताजी रथपर चट || ४२-४३ ॥ फिर रामचन्द्र राम! प्रदक्षिणं कृत्वा पितरं रथमारुहत्‌ | पिताक परिक्रमा कर रथासद हुए और उनके पाहे छम! खडूयुगल घचुस्तृणायुग तथा॥।४४॥ , द खङ्ग तथा दा पनुप आर तरकश लेकर छ्मणर्जा । सवार इए आर सारथासे रथ हाकनको कहा । तत्र गृहीतया रथमारक्च नोद्यामास सारथिम्‌। ` नजा दथ कहने लगे--सुमन्त्र ! ठरो, ठरो! तिष्ठ वि हुमन्याते राजा दशरथोडजबीत्‌ ॥४५॥ ' ॥ १४-४५ ॥ किन्तु रामचन्द्रजीन “चलो, चलो! ~ कहकर शौत्रता करनेको कहा | इसल्यि सुमन्त्रने रथ गच्छ गच्छेति रामेण नोदितोऽचोदयद्रथम्‌। रामे द्र गे राजा he , द्य स्‌ हॉक दिया । रामके दर निकल जानपर महाराज दुर गत राजा भूच्छितः प्रापतद्धुवि ॥४६।॥ ` म्न होकर पथित्रीपर गिर पड़े | ४६ ॥ तदनन्तर पोरास्तु वालवृद्राश्र वृद्धा ब्राह्मणसत्तमाः | समस्त पुरवासा, वाठक-इंद्ध आर बयावन् मुनिगण हे राम . ठहरो, मन जाओ' इस प्रकार चिछ्ठाते इए तिष्ठ तिष्ठेति रामेति कोशन नव ! ठ तिष्ठ कोशन्तो रथमन्वयुः ॥४७॥ र॒थके पीछे-पीठे चळे ४७ | राजाराद्त्या सुचिर मानयन्तु ग्रह प्रति| . राजा दशरथ वहत देरतक रोते रहे, किर उन्होंने कसिल्याया राममातुरित्याह पारचारकान्‌ ॥४८)| अपने सतरकसि कहा--"मुझ रामकी माता कोसल्याके किञ्चित्कालं भवेत्तत्र जीवनं दुःखितस्य मे | घर छे चलो | 9८ ॥ Fi बदा रहकर कु काळ जीना हो सकत हेत हे अत ऊध्व न जीवामि चिरं रामं विना कृतः ॥४९॥, „=. ८ पेता कस रामसे रहित होकर अब मैं अधिक काळ जीवित नहीं रह सकृ गा” ॥४९॥ तता यूह ग्रविश्यव कासल्याया! पपात ह | तब कांसल्याके घर पहंचते दा राजा अचंत हाकर अच्ठतथ चिराडुच्या तष्णीमेवाचतसखिवान्‌।५०। | एथिवीपर गिर पडे; फिर बहुत देर पीछे चेत होनेपर व चुपचाप वठ रह | ५० || राद्वस्तु तमसातीरं भत्वा तत्रावसत्सुखी । इधर श्रारामचन््रजी तमसा-नदीके तटपर पहुँचकर जल प्राशय निराहारो इक्षमूरेंऽखपद्विभः ॥५१॥ | वहाँ सुखपूर्षक रहे ओर रात्रिके समय विना कछ रतया सह धमात्मा धनुग्पाणिस्तु लक्ष्मण: आहार किये केवळ जळ पीकर सौताजीके सहित गाळयामास घर्षः सुमन्त्रेण समन्वितः॥५२॥ इक्षके नाचे सो गये.। तथा पुमन्त्रके सहित धर्मात्मा व... सर्वे समागत्य खितासस्याविदूरतः । शक्ता रामं पुरं नेतुं नोचेह्रच्छामहे वनम ॥५३॥ इति निश्रयमाज्ञाय तेषां रामोऽतिविखितः । . नाहं. गच्छामि. नगरमेते वे. केशभागिनः ॥५४॥ भविष्यन्तीति निश्चित्य सुमन्त्रमिदमन्रवीत्‌ । इदानीमेव गच्छामः सुमन्त्र रथमानय ॥५५॥ इत्याज्ञप्तः सुमन्त्रोऽपि रथं वाहेरयोजयत्‌ । आरुद्य रामः सीता च लक्ष्मणोऽपि ययुद्व॑ तम्‌ ।५६। अयोध्याभिमुखं गत्वा किश्विद्द्रं ततो ययुः। तेऽपि राममदष्टेब ग्रातरुत्थाय दुःखिताः ॥५७॥ रथनेमिगतं मार्ग पश्यतत पुरं ययुः । इ. . १, >) हृदि रामं ससीतं ते ध्यायन्तस्तस्थुरन्वहम्‌ ॥५८॥ सुमन्त्रोऽपि रथं शीघ्रं नोदयामास सादरम्‌ । अयोध्याकाएंडं ६६ छक्ष्मणजी धनुप लेकर उनकी रक्षा करते रहे || ५१- ५२ ॥ उनके पास ही समस्त पुरवासी आकर ठहर गये । उन्होने निश्चय किया कि हम या तो रामको | अयोध्या 'छोठा छे चलेंगे, नहीं तो हम भी इनके साथ वनको ही चले जायँगे ॥ ५३ || रामचन्द्रजीको उनके इस निश्चयका पता चलनेपर अति विस्मय हुआ और उन्होंने यह सोचकर कि मैं तो अयोध्याको लेट्टँगा नहीं, ये व्यर्थे वनमें छेश भोगेंगे, झुमन्त्रको बुलाकर कहा--“सुमन्त्र, तुम रथ ले आओ, हम अमी चलेंगे! ॥ ५३-५७ | रामकी ऐसी आज्ञा होनेपर झुमन्त्रने रथमें, धोड़े जोत दिये तब राम, लक्ष्मण और सीता उसपर चढ़कर शीघ्रतासे चले ॥ ५६ ॥ उन्होंने अपना रथ कुछ दूर अयोध्याकी ओर ले जाकर फिर बनकी ओर बढ़ाया । प्रातःकाळ होनेपर पुरवासियोंने उठकर जब रामको न.देखा तो वे अत्यन्त दुःखी हुए ॥ ५७॥ . और रथके पहियोंकी लीकके मार्गको देखते इए वे अयोध्यापुरी लौट आये तथा प्रतिदिन हृदयमें राम और सीताका ध्यान करते इए वहाँ रहने लगे ॥ ५८॥ इधर सुमन्त्रने भी शीघ्र ही आदरपूर्वक अपना रथ बढ़ाया । तव सीताके सहित श्रीरामचन्द्रजी विस्तृत | | | स्फीतान्‌ जनपदान्पञ्यन्‌ रामः सीतासमन्वितः॥ | दको देखते इए शवगवेरधुरके पास गंगाजीके तटपर गङ्गातीरं समागच्छचछृङ्गवेराबिदूरतः । गङ्गां दृष्टा नमस्कृत्य खात्वा सानन्दमानसः।६०। झिंझपाब्वक्षसूके स॒ निषसाद रघूत्तमः । ततो गुहो जनैः कुत्वा रामागममहोस्सबस्‌ ॥६१॥ | सखायं खामिनं दरं हयंचूर्णं समापतत्‌ । फलानि मधुपृष्पादि गृहीत्वा भक्तिसंयुतः ॥६२॥ रामस्ाग्रे विनिक्षिप्य दण्डवत्मापतद्भुवि । गुहस॒त्याप्य तं तूर्ण राघवः परिषखजे ॥६३॥ संपृष्टकुशलों रामं शुहः' प्राक्नलिखिबीत्‌ | थन्योव्हमद्य मे जन्म नेपादं लोकपावन ॥६४॥ बभूव . परमानन्दः स्वा तेऽङ्गं रघूत्तम ।. . .. पहुँचे । गंगाजीको देखकर उन्होंने प्रसन-चित्तसे । नमस्कार करके खान किया ॥ ५९-६० || और फिर | रघुश्रेष्ठ रामजी झिंडापा (सीसमके) ब्रुक्षकी छायामें | बैंठे । इसी समय निषादराज शुहने छोगोंके मुखसे | रामजीके आनेका मंगळसमाचार सुना ॥ ६१ ॥ यह सुनते ही वह तुरन्त अपने एकमात्र सखा और | स्वामी श्रीरघुनाथजीको देखनेके लिये प्रसन्न-चित्तसे । भक्तिपूर्वक फळ, शहद और पुष्पादि लेकर वहाँ आया ॥ ६२॥ और वह मेंटकी सामग्री रामके आगे डाळकर दण्डके समान प्रथिवीपर गिर पड़ा । तव श्रीरघुनाथजीने उसे तुरन्त ही उठाकर गळे लगा छिया ॥ ६३ ॥ तदुपरान्त रामजीके कुझल पूछनेपर गुहने हाथ जोड़कर कहा--“हे लोकपावन ! मैं धन्य हूँ, आज मेरा निषाद-जातिमें जन्म लेना सफल हो गया ॥ ६४ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! आपके अंगसंगसे मुझे परम आनन्द प्राप्त Ap सही कई, - ७० ________ पल (हक या आम] HN हे । हे रघुबर ! आपके दासका यह नैपाद- हष पादराज्यमे Da किङ्करस्य i ण] हुआ है । है रघुवर « अ _ 5 , नेषादराज्यसेतचे 1 रघूत्तम ॥६ राज्य आपहीका है इसलिये हे रघुनाथर्जी ! आप यहाँ त्वदधीनं वसनमत्र पालयाखाव्‌ रघू | रहकर हमलोगोंका रक्षा हक । चढिये नगरमं आगच्छ यामो नगरं पावनं इरुमे ग्रम ॥६६॥ | पारकर मेरा धर पवित्र कीजिये ॥ ६५-६६ ॥ ह ९ _ भगवन्‌ ! आपके ल्थि मैने जो कुछ फल-मूठादि गृहाण फरमूहानि सदे सञ्चितानि में । रि किये हैं उन्हें खोकार बलिये । दे षट ५ अलुगृहीष्य भगवन्‌ दासस्तेऽहं सुरोत्तम ॥६७॥ | मै आपका दास हूँ, आप मुझपर कपा कीजिये ॥ ६७ ॥ रामस्तमाह सुग्रीतो वचनं शृणु मेसखें। | तब रामचन्दरनीने अति प्रसन्न होकर उससे क इयामि शृ ५ णि | “मित्र | सुनो, में चौदह वर्षतक किसी घर या गांवमं न वेक्ष्यामि गृह ग्रामं नव वपाण पश्च च ॥६८॥ | नहीं जा सकता ॥६८॥ और न किसी आरके दत्तमन्येन नो शुख फरुपूलादि किश्चच। ' दिये हुए पुलमूढादि ही खासकता हूँ । मित्र! तुम्हारा | यह सम्पूण राज्य मेरा ही हे आर तुम भी मर अत्यन्त ! प्रिय सखा हो” ॥ ६९ ॥ बठक्षीर॑ समानाय्य जटायुकुठमाद्रात | | तदनन्तर रघुनायजीन वटका दूध मेंगाकर लक्ष्मणके ववस्थ लक्ष्मगनाथ सहितो रघुनन्दनः ॥७०॥ ` सहित मळी प्रकार सेबारकर टाय बाँध ॥ ७०॥ जलुमात तु सम्प्राश्य सीतया सह राघचः | | ल्क्ष्मणजीने कुश और पत्तोंकी एक शस्या चना दो, आस्तृतं झुशपर्णाचैः शयनं लक्ष्मणेन हि ॥७१॥ | उसपर केवळ जल पीकर सीताके सहित श्रंरघुनाथजी राज्यं समैतचे सव त्वं सखा मे5तिवहुभः ॥६९॥ उबास तत्र नगरपरसादाग्रे यथा पुरा । विराजमान इए और पहले जिस प्रकार अयोव्यापुरी- ष्वाप तत्र पैदेशा पर्यङ्क इव संस्कृत ॥७२॥ के गह जनकनम्द्िनीके सहित एजित पपर ततोऽविदूरे परिगृह्य चापं पोढते थे उसी प्रकार सो गये ॥ ७१-७२ ॥ उनके सव्ाणतूशीरधचुः स रुक्ष्मणः। : पास हौ धुप, वाण और तरका खिये हुए श्रीलक्षमणजी रक्ष॒ रामं परितो विपश्यन्‌ ' धनुपधारी गुहके सहित धनुष चढ़ाकर इधर-उधर € गुहेन सार्थं सशरासनेन॥७२॥ : देखते इए श्रोरामचन्दजीकी रखबाढी करने छ ॥ ७३ ॥ इति श्रोमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे पञ्चमः सगे: ॥५॥ SWNT षष्ठ सर्ग गंगीत्तरण तथा भरद्वाज और बाल्पीकिजीसे भेंट | श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेवजी बोले-है पार्वति ! उस समय रामजी- ५ सुं रामं समालोक्य गुहः सोऽश्रुपरिप्छुतः । को सोते देख गुहने ऑँखेमिं आँसू भरकर ५ न नम्रतापूवंक लक्ष्मणजीसे कहा--- भाई ! देखते हो, लक्ष्मण आह विनयाद्‌ आतः पश्यसि राघवम्‌ १॥ जो रघुनाथजी पे म चर विने शयानं इुशपत्रोधसंस्तरे सी परित गे पत्रात MR युक्त सुवर्ण-निर्मित पलंगपर पोढते ये वे ही आज , शेते स्व्णपयङ्क स्तास्तीर्णे भवनोत्तमे ॥ २॥ | सीताजीके सहित कुद और पत्तोंकी साथरीपर पडे समें ६ ] सेद] ` अयोध्या ७१ ` अयोध्याकाण्ड ७१ “क केकेयी रामदुःखस्य कारणं विधिना कृता । इए हैं ॥ १-२॥ विधाताने रामजीके इस दुःखका ~ वि कारण कैकेयीको बना दिया । मन्थराकी वुद्धिपर विश्वास मन्थराबुद्धिमाखाय केके राबुद्धिमाखाय केकेयी पापमाचरत्‌॥ ३॥ | करके वैकेयीने यह बड़ा पापका काम किया !”॥ ३ ॥ तच्छुत्वा लक्ष्मण! प्राह सखे शृणु वचो मम। यह सुनकर छक्ष्मणजीने कहा-“भाई ! मेरी बात ९ सुनो; किसीके दुःख अथवा सुखका कारण ट्सरा कौन कः कस्य हेतुदुःखस्य कश हेतुः सुखस्य वा ॥४॥ >, व सपिता हे देह 'खयोः ॥ ५ है ? अर्थात्‌ कोई भी नहीं है । मनुष्यका पूर्वकृत कर्म खपूवाजितंकमैंच कारणं सुखदुःखयोः ॥५॥ | ही उसके सुख अथवा दुःबका कारण होता है।।४-५॥ सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता सुख और हुःखका देनेवाळा कोई और नहीं है; 'कोई अन्य os 3 परो ददातीति इुडबुद्धिरेषा । अन्य सुख-दुःख देता है? यह समझना कुलुद्धि है । अहं करोमीति वृथाऽभिमानः मैं करता हूँ? यह वृथा अभिमान है, क्‍योंकि लोग अपने-अपने कर्मोकी डोरीमें बँधे इए हैं ॥ ६ || यह स्वकमेस्रत्रग्रथितो हि लोकः ॥ ६॥ | मनुष्य स्वयं ही एथकू-परथक्‌ आचरण करके उसके सुहन्मित्रार्युदासीनद्वेष्यमध्यथवान्धवाः । | असार इय्‌, मित्र, शत्रु, उदासीन, ष्य, मध्यस्थ ५ A । ओर बन्धु आदिकी कल्पना कर लेता है ॥७॥ स्वयभेवाचरन्कर्म तथा तत्र विभाव्यते ॥ ७॥ | अतः मनुष्यको चाहिये कि प्रारब्धानुसार सुख या सुखं वा यदि वा दुःखं स्वकर्मबशगो नरः। | दुःख जो कुछ भी जैसे-जैसे प्राप्त हो उसे वैसे ही भोगते यदयदयथागतं तत्तद्‌ क्वा स्मस्थमना भवेत्‌॥ ८ ॥| डर सदा प्रसनचित्त रहे ॥ ८॥ हमें न तो भोगों- भे भोगागमे भे भोगविवर्यने । | की प्राप्तिकी इच्छा है और न उन्हें त्यागनेकी | भोग व न में भोगागस वाञ्छा न न भागाववअन | आयें या न आयें हम भोगोंके अधीन नहीं हैं ॥९॥ आगच्छत्वथ मागच्छत्वभोगवशगो भवेत्‌॥ ९॥ | जिस देश अथवा जिस काळ्में जिस-किसीके दारा झुम यसिन देशे च काले च यसाद्वा येन केन वा। | अथवा अशम कर्म किया जाता है, उसेनिस्सन्देह उसी , : करे सज्यं न्यथा॥१०॥ | कर भोगना पड़ता है ।। १० ॥ अतः झुभ अथवा कृत शुभाझुभ कम भोज्य ततत्र नान्यथा १० | अञ्च कर्मफठके उदय होनेपर हर्प अथवा दुःख अलं ह्षेविपादाभ्यां शुभाशुभफलोदये । । मानना व्यर्थ है, क्योंकि विधाताकी गतिका देवता अथवा विधात्रा विहितं यचचत्तदलडध्यं सुरातुरेः ॥११॥ | दैत्य कोई भी उड न सकता । 0 220 स मनुष्य सदा ही सुख और दु:खसे धरा रहता ह क्योंकि सबेदा सुखदुःखाभ्यां नरः प्रत्यवरुध्यते | | प्य-शरीर पाप और पुण्यके मेळे उत्पन होनेके शरीरं पुण्यपापाम्याश्चत्पन्नं सुखदुःखवत्‌ ॥१२॥ | कारण सुख-हुःखमय ही है ॥ १२॥ सुखके पीछे सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखस्‌। | दुःख और दुःखके पीछे सुख आता है। ये दोनों ही -_ ५ दिन और रात्रिके समान जीवोंसे अनुछद्नीय हैं ॥१३॥, / द्यमेतद्धि जन्तूनामलङ्घ्यं दिनरात्रिवत्‌ ॥१२॥ सखे भीतर दुः और दुःखके मीतर सुख सर्वदा सुखमध्ये ससितं दुःखं दुःखमध्ये खितं सुखम्‌। | वर्तमान रहता है | ये दोनों ही जळ और कीचड़के ` द्वयमन्योन्यसंयुक्तं ग्रोच्यते जलपङ्कबत्‌ ॥१४॥ | समान आपसमें मिळे इए रहते हैं ॥ १४ ॥ इसलिये तस्माद्वेर्येण विद्वांस इष्टानिष्टोपपत्तिएु। | विद्वान्‌ छोग “सब कुछ माया ही है? इस भावनाके कारण इष्ट या अनिष्टकी ग्रासिमें धैय रखकर हर्ष या न इष्यन्ति न सुझन्ति स्वे मायेति भावनात्‌ ॥ १५ जोक नहीं मानते ” ॥ १५॥ गुहलक्ष्मणयोरेबं भाषतोरविमलं नभः | | गुह और ढक्ष्मणके इस प्रकार बातचीत करते- बभूव रामः सलिलं स्पृ प्रातः समाहितः ॥१६॥ ¦ करते आकाइमें उजाळा हो गया. | तव रामचन्द्रजीने न्य ह हि ~ १४ f | ~ खामिव्‌ रामः समागत्य वनाद्वहिरवखितः RET RIE ५०४८७७९४४७ उवाच शौधं सुच्ढांनावमानयमे सखे। | श्रुत्वा रामस्य वचनं निपादाधिपतिर्गुहः ॥१७॥ ¦ खयमेव इढां नावमानिनाय सुलक्षणाम्‌ | स्वामिन्नारह्यतां नोकां सीतया लक्ष्मणेन च १८॥ वाहये ज्ञातिभिः सार्थमहमेच समाहितः । तथेति राघवः सीतामारोप्य शुभलक्षणाम्‌ ॥१९॥ , गुहस्प हस्तावालम्ब्य स्वयं चारेहदच्युतः । आयुधादीत्‌ समारोप्य लक्ष्मणो5्प्यारुरोह च।२०। शुदस्तान्वाहयामास ज्ञातिभिः सहितः स्वयम्‌ । गङ्गामध्ये गता गङ्गां प्रार्थयामास जानकी ॥२१॥ देवि शङ्गे नसरतुस्यं निश्त्ता वनवासतः । रामेण सहिताहं त्यां लक्ष्मणेन च पूजये ॥२२॥ 0 भो. आ At इत्युकत्वा परकूल ता शनरुत्ताये जग्मतुः ॥२३॥ गुहोऽपि राघवं प्राह गमिष्यामि त्वया सह | अचुज्ञां देहि राजेन्द्र नो चेत्मराणांर्त्यजाम्यहम्‌ | २४। शृत्वा नैपादिवचनं श्रीरामस्तमथान्रवीत्‌ । चतुर्दश समाः स्थित्वा दण्डके पुनरप्यहम्‌ ॥२५॥ आयास्याम्युदितं सत्यं नासत्यं रामभापितम्‌ | इत्युकत्वाऽऽलिङ्ण्य तं भक्त समाश्वास्य पुनः पुनः| निवर्तयामास शुहं सोऽपि कुच्छाचयी गृहम्‌ ॥२७॥' ततो रामस्तु वैदेशा लक्ष्मणेन समन्वित: ॥२८॥ सरड्ाजाश्रमपदं गत्वा वहिरुपस्थितः । तत्रैके वडुकं दृष्टा रामः प्राह च हे वटो ॥२९॥ ' रामो दाशरथिः सीतालक्ष्मणास्यां समन्बितः। | nO | शी + आस्ते वहिवनस्येति द्युच्यतां गुनिसनिधो ।।३०॥ | तच्छुत्वा सहसा गरवा पादयोः पतितो यमुने! । i t ड़ अध्यात्मरामायण TTT rep un sonra aN [ सगे ६. s+ soanere ४९ सावधानतापूर्वक आचमन कर प्रातःक्रिपा की ॥१%॥ और बोळे-(मित्र ! शत्र ही मेरे छिय एक सुद नीका खाओ ।” रामके ये वचन सुनकर निपादेराज गुह् खर्य ही एक सुलक्षण-सम्पनन सुद नौका छे आये और ब्ोळे-खामिन ! सीता और ढकमणके सहित नावपर चहिये ॥ १७-१८ ॥ अपने जाति-नाटियोके साय ॐ खर्य इसे साह्रधानतापूर्ववा चलाऊेगा । तव रखुनाथ- जीने बहुत अच्छा का प्रथम घुभरक्षणा सीलाजी- को उसपर चढ़ाया | १७ ॥ विंग युका हाथ पकड कर श्रीअच्युत भगवान, र्घुनाथमा स्वयं चढे | तदनन्तर अपने आयुधादिकों रख श्रीकक्ष्मगर्जी नोका- रूढ हुए | २० ॥ तब गुहने अपने जानि-भारयेकि सहिन स्वयं नौका चढायी | जिस समय नाव गशके चामे पहुची नब जानकीजाने गद्गाजीसे प्रार्थना छ-॥ २१ ॥ "दे गले ! में तुमः प्रणाग वरती है। वनवाससे टोटमेपर में राम और छत्ष्मणके सहिन तुगारी पजा करूंगी | इस प्रकार प्रार्थना करनेके पश्चात थे झनेः-दानें: पार उतरकर आगे चळने लग ॥ २२-२३ ॥ तव गटर श्रीरघुनाथजीस कहा हे रमेन्ट | म भी आपने. साथ ही चढेगा; आप मझे आता दीजिये, नहीं मो में प्राण छोड दे गा ` ॥ २४ ॥ [] शौ पश्त्गी निपादपुत्रके वचन सुनकर ऑरामचस्धजीने उनसे कहा-में चौदह वर्ष दण्दकारण्यमें गहकर यहाँ हिर आऊेंगा । में जो कुछ कहना हे सय ही बढ़ता हैँ रामकी बात कभी मिथ्या नहीं दो सकती ।" ऐसा कह रामजीने भक्त गुहकों टाइस बेंधा उसे वारम्दार गले छगाकर बिदा किया | तब निपाटराज गुह बदी कठिनतासे घर छोटे || २५-२७ || तदनन्तर जानकी और छद्नाणके सहित श्रौरामचस्त्र- ' जी भरहाज मुनिके आश्रमक्रे पास पहुंचकर बाहर ख हो गये । वहाँ एक त्रक्चारीको देखकर श्रोरामनन्द्रजीने कहा--हे बटो ! सुनिवरसे जाकर याहो कि दशरथका पुत्र राम सीता और छत्मणके सहित आश्रमके बाहर खड़ा है” || २८-१० ॥ रघुनाथजीका यह कथन सुनकर अद्चारमे तुरन्त ही मुनिवरके पास जाकर उनके चरणोंमे शिर ॥३१॥ | रखकर कहा---भगवन्‌ ! पत्नी और होटे भाईके सहित सर्ग ६] सगे अेयोध्याकाद . छ७रे अयोध्याकाण्ड 5 ७३ eT LTRs pinpn सभार्यः साचुजः श्रीमानाह मां देवसलिभः । ह रामचंन्द आये हैं और आश्रमके बाहर. खड़े .। उन देवतुल्य श्रीरामजीने मुझसे कहा है कि मुनिवर भरद्वाजाय झुनये ज्ञापयख यथोचितम्‌ ॥३२॥ भरद्वाजको इसकी यथायोग्य सूचना दो” || ३१-३२ ॥ तच्छूत्बा सहसोत्थाय भरद्वाजो मुनीशवर! । ` यह झुनकर मुनिनाथ भरद्वाज,सहसा उठ खड़े हुए © वि गृहीस्वार्ध्ये च पार्थ च रामसामीप्यमाययो ॥१३॥ | और अर्थ पायादि लेकर रामके पास आये॥ २३ ॥ 7 | रामको देखकर उन्होंने लक्ष्मणजीसहित उनकी नियमा- दृष्टा राम यथान्यायं पूजयित्वा सलक्ष्मणम्‌ । | नुसार पूजा की और कहा--“हे राम ! हे कमलनयन ~ R ३ | गी रण-रजसे \ - आह मे पर्णशालां भो राम राजीवलोचन ॥३४॥ | है इन ! आइये, अपनी चरण-रजसे रणा | को पवित्र कीजिये ।” ऐसा कह बे सीताजीके सहित. आगच्छ पादरजसा पुनीहि रघुनन्दन । दोनों रघुकुमारोंको अपनी कुटियामें छे आये ॥ ३४- h भक्तिपूर्व पूर इत्युक्त्योरजमानीय सीतया सह राघवौ ॥३५॥ | २५॥ और फिर उनका भक्तिपूर्वक पूजन कर मली प्रकार हि हि आतिथ्य-सत्कार किया तदनन्तर मुनिवर बोले---“राम ! भक्त्या पुनः पूजाथत्या चकारातिथ्यद्ुतमय्‌। | आज आपके समागमसे मेरी तपस्या पूर्ण हो गयी ॥३६॥ अद्याहं तपसः पारं गतोऽसि तव सङ्गमात्‌ ॥३६॥ | दे रघुनन्दन ! मैं आपका भूत और भविष्यतः सम्पण राम तवोदनतं भृत वि वृत्तान्त जानता हूँ । मैं यह भी जानता हूँ कि आप ज्ञात राम तवोदन्तं भूतं चागामिकं च यत्‌ |. | साक्षात्‌ परमात्मा हैं और कार्यकी सिद्धिके छिये ही जानामि त्वां परात्मानं मायया कार्यमाहुपस्‌।३७। | मायासे मलुष्यरूप हुए हैं ॥ ३७ ॥ पूर्वकालमे त्रह्माके र मबतीणोषसि प्रार्थितो प्रार्थना करनेसे जिसलिये आपने अवतार लिया है, यदर्थमवरतीणो्सि ता नह्माणा झरा | ' जिसलिये आपको वनवास हुआ है और जो कुछ आप यदर्थ बनवासस्ते यत्करिष्यासि घे पुरः॥२८॥ आगे करेंगे वह सत्र, आपकी उपासनाद्वारा प्राप्त जानामि ज्ञानस्टयाई जातया त्वदुपासनात्‌ । | इई ज्ञान-्श्सि मैं जानता हूँ । हे रघुश्रेष्ठ ! आपसे मै ; परं त्यां कि वक्षे कृताथ अधिक क्या कहूँ? मैं तो कृतोथे हो गया," जो इतः पर त्वा कि वक्ष्ये कृताथाऽह रघूत्तम ॥३९॥ | आज ग्रकृतिसे परे साक्षाद पुरुषोत्तम आप ककुत्थर यस्त्वां पव्यामि काकुत्स पुरुष प्रकृतेः परम्‌ । | नन्दनको देख रहा हूँ ।” रामत्तमभिवाद्याह सीतालक्ष्मणसंयुतः ॥४०॥ | तत्र सीता और लक्षमणके सहित श्रीरामचन्द्रजीने , उन्हें प्रणाम करके कहा-॥ ३८-४० ॥ "ब्रह्मन्‌ | हम अजुग्राह्यास्त्वया त्रह्मन्वरय क्षत्रियवान्धवा! । | क्षत्रिय-कुछोत्पन्न हैं; अतः आपकी कृपाके पात्र हैं” इस प्रकार परस्पर एक दूसरेसे कहनेके उपरान्त वे मुनिके यहाँ ठहर गये ॥ ४१ ॥ जा प्रातरुत्थाय यमुनामुत्तीय मुनिदारकेः । प्रातःकाळ जागनेपर श्रीरघुनाथजी मुनिकुमारोंकी $ डोंगीपर चढ़कर यमुनाके पार हुए और ताइवेन मुनिना इृष्टमार्गेण राघवः ॥४२॥ | बनायी हई र ए और द विव हठ ५ मुनिवरके बताये हुए मार्गसे चित्रकूठ-पर्वतकी . ओरं प्रययी चित्रकूटाद्रि वाल्मीकेयत्र चाश्रमः । | चळे जहाँ वाल्मीकिजीका आश्रम था । उस ऋषिः गत्वा रामोऽथ वास्मीकेराश्रम ऋपिसङ्करुम्‌॥४३। गणोंसे मरे हुए, नाना शग और पक्षियोंसे समाकुछ नानामृगद्विजाकरीण रि तथा स्वेदा फल्-पुष्पादिसे परिपूर्ण वाल्मीकिजीके ०७७ नित्यदुःपफलाझुल्म । आश्रममें जाकर श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि मुनिश्रेष्ठ तत्न दया समासीनं वादमीकिं ग्रुनिसत्तमम्‌ ॥४४॥ | बाल्मीकिजी बैठे हुए है ॥४२-४४॥ तब श्रीरामचन्रजीने १९ इतिसम्भाष्यतेऽन्योन्यश्चुपित्वा घुनिसन्निधो।४१। CSO ७४ ज ननाम शिरसा रामो लक्ष्मणेन च सीतया । इष्टा रामं रमानाथं वारमीकिछोकसुन्दरस्‌ ॥४५॥ जानकीलह्मणोपेतं जटापुकुटसण्डितमू । कन्दर्पसड्शाकार॑ कमनीयाम्बुजेक्षणम्‌ ।४६॥ इष्ट्वेव सहसोत्तथो विस्मयानिमिपेक्षणः । आलिङ्ग्य परमानन्दं रामं दूर्षाथुलोचन! ॥४७॥ पूजयित्वा जगतपूउयं सक्त्या्घ्यादिभिराइतः । फलमूलैः स सधुरेमोजायित्वा च ठाठित! ॥४८॥ AYN राघव? प्राज्ञारिः प्राह वार्मीकिं विनयान्वितः | अध्यात्मरीमायण [ सर्ग ६ TAN FIN ७७% टक ४७७७७ SOFAS SUNN Ns लक्ष्मण और सीताके सहित उन्हें शिर झुकाकर प्रणाम किया । तव श्रीवाल्मीकिजीने सुन्दर कमळके समान ेत्रबाळे, कामदेवकी-सी आकृतिबाले, जटा-मुकुटधारी, त्रिलोकमोहन छक्ष्मीपति श्रीरामचन्द्रजीको सीता और लक्ष्मणके सहित देखा ॥ ४५-०६॥ उन्हें देखते ही श्रीवाल्मीकिजी सहसा उठ खर हुए, उनके नेत्र आश्चर्यसे निमेपशून्य हो गये औं उन्होंने नेत्नोमें आनन्दाश्रु भर परमानन्दस्वरूप श्री रामचन्द्रजीका आछिंगन किया ॥ ३७॥ तथा अति भक्तिमावसे जगत्पूज्य भगवान्‌ रामकी अध्योदिसे सादर पूजा कर उन्हें मीठे-मीठे फल-मूछादि खिलाकर उनका लालन किया ॥ ४८ | तब श्रीरघुनाथजीने अति नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर श्रीवाल्मीकिजीसे कहा--“हम पिताजीकी आज्ञा पितुराज्ञां परस्त्य दण्डफानागता वयम्‌ ॥४९॥ | मान कर दण्डकयनमें आये हैं ॥ ४९॥ आप है 4 भवन्तो यदि जानन्ति किं वक्ष्यामो5त्र कारणम्‌ | । सव कुछ जानते ही है, फिर हम आपको इसका कारण क्या बताएँ £ अब आप मुझे कोई ऐसा यत्न मे सुखबासाय भवेत्खानं वदस्व तत्‌ ॥५०॥ | सान बताइये जहाँ मैं सुखपूर्वक रह सकूँ ॥ ५०॥ सीतया सहितः कालं किथित्तत्र नयाम्यहम्‌ । इत्युक्तो राधवेणासी युनि? सस्मितमत्रवीत्‌ ।५१॥ रमेव सर्वलोकानां निवासस्यानशुत्तमम्‌ | आपके बताये इए उस खानमे में सीताके साथ रहकर कुछ समय विताऊंगा |” रघुनाथजोके इस प्रकार कहनेपर मुनिवरने मुसका- कर कहा--। ५१ ॥ “हे राम ! सम्पूर्ण प्राणियोंके आप ही एकमात्र उत्तम निचास-खान हैं और संत्र जीव तवापि सर्वभूतानि निवाससदनानि हि ॥५२॥ | भी आपके निवासन्गृह दै. ॥ ५२ ॥ हे रघुनन्दन ! एवं साधारणं स्थानभुक्त ते रघुनन्दन । सीतया साहितस्येति तदृक्ष्यामि रघुश्रेष्ठ यत्ते नियतमन्दिरम्‌ | शान्तानां समदषटीनामदवेषणां च जन्तुषु । इस प्रकार यह मैंने आपका साधारण निवास-स्थान बताया, परन्तु आपने विशेषरूपसे सीताके सहित विशेष॑ पृच्छतस्तव ॥५३॥ | अपने रहनेका खान पूछा है इसलिये हे रघुशरे्ट ! अब मैं आपका जो निश्चित गृह है वह बताता हूँ । जो शान्त, समदशी और सम्पूर्ण जीवोके प्रति द्वेषहीन. हें तथा अहर्निश आपका ही सजन करते हैं उनका हदय तवामेच भजतां नित्यं हृदयं तेऽथिमन्दिरम्‌ ॥५४॥ | आपका प्रधान निवास-खान है ॥ ५३-५४ ॥ जो धर्मीथर्मान्परित्यज्य त्वामेष भजतोऽनि्षम्‌। सीतया सह ते राम तस्य हुत्सुखसन्दिरम्‌ ॥५५॥ सन्मन्त्रजापको थस्तु त्वाभेव शरणं गतः । निईन्हो निःस्पृहस्य हदयं ते सुमन्दिरिय ॥५६॥ ` निरहकारिणः शान्ता ये रामद्वेपवर्जिताः । धर्म और अधर्म दोनोंको छोड़कर निरन्तर आपका ही भजन करता है, हे राम | उसके हृदय-सन्दिरमें सीताके सहित आप सुखपूर्वक रहते हैं ॥ ५५॥ जो आपहीके मन्त्रका जाप करता है," आपहीकी झरणमें रहता है तथा इन्द्रहीन और निःस्पृह है उसका हृदय आपका सुन्दर मन्दिर है || ५६ ॥ जो अहंकारशून्य, शान्तस्वभाव, राग-द्वेष-रह्ित और ग्ृत्पिण्ड, पत्थर 0 व्हि , संग ६] अयोध्याकाण्ड ७५ DR en NNN Ne ee sano NN समलोष्टाइमकनकासेपां ते हृदयं गृहम्‌ ॥५७॥। | तथा घुवर्णमें समान दृष्टि रखनेवाले हैं, उनका हृदय तयि दचमनोबुद्धियः सन्तुष्टः आपका घर है॥ ५७॥ जो तुम्हीमें मन और बुद्धि- है द पाडत पन्तुटट सदा भवे को छगाकर सदा सन्तुष्ट रहता है और अपने समस्त त्वाय सन्त्यक्तकमां यस्तन्मनस्ते शुभं शृहम्‌॥५८॥| कर्मोको तुम्हारे ही अर्पण कर देता है उसका मन ही यो द्वेष्मि प्राप्य मिय आण्य न हष्यति । आपका शुम गृह है ॥ ५८ ॥ जो अग्रियको पाकर २८. त हेप नहीं करता और प्रियको पाकर हर्षित नहीं होता ४ सेचे मायेति निश्चित्य त्वां भजेत्तन्मनो ग्रहम्‌ ।५९) | तथा 'यह सम्पूर्ण प्रपञ्च मायामात्र है? ऐसा निश्चय गो देहे पषयति नात्म कर सदा आपका भजन करता है उसका मन ही पड्भाबादिविकारान्यो पश्यति नात्मनि। आपका घर है॥ ५९ ॥ जो ( सत्ता, जन्म लेना, क्षत्तर्‌ सुखं भयं दुःखं प्राणबुद्भयो निरीक्षते ॥६ ०॥ ना बदढना, क्षीण होना और नष्ट होना इन ) छः सारधर्मेनि _ मु रोंको शरीरमें ही देखता है, आत्मामें नहीं; तथा संसारधंमेनि्ुक्तस्तस्य ते मानसं गृह्‌ ॥६१॥ | हुवा, तपा, हुल, दुःख और भय आदिको प्राण और पश्यन्ति ये सर्वेगुहाशयस्थं बुद्धिके ही धर्म मानता है और खयं सांसारिक धर्मासे त्वां चिद्नं सत्यमनन्तमेकम्‌ । | य रहता है उसका चित्त आपका निज गृह है ॥ ६०-६१ ॥ जो लोग चिद्घन, सत्यखरूप, अनन्त, अलेपकं सर्वगतं वरेण्यं एक, निर्लेप, सर्वगत और स्तुत्य आप परमेश्वरको तेवां हृदव्जे सह सीतया वस॥६२॥ | समल अन्तःकरणोमे विराजमान देखते है, हे राम ! हदच्जे सह १२ | जनने हृदय-कमळ्में आप सीताजीके सहित निवास ' निरन्तराभ्यासच्ढीकृतात्मनां कीजिये | ६२ ॥ निरन्तर अभ्यास करनेसे जिनका हृदय त्वत्पादसेवापरिनिष्ठितानाम्‌ । | सिर हो गया है, जो सवदा आपकी चरण-सेबामें ढगे त्वज्नामकीत्यी हतकल्मपाणां रहते हैं तथा आपके नाम-संकी्तनसे जिनके पाप नष्ट , हो गये हैं उनके हृदय-कमळमें सीताके सहित आपका सीतासमेतस्य गृहं हुदव्जे ॥६३॥ | निवास-गृह है ॥ ६३॥ हे राम ! जिसके प्रभावसे बर्ण्यते १ मैंने ब्रह्मर्षि-पद प्राप्त किया है, आपके उस नामकी एं राम त्वन्नाममहिमा वर्ण्यते केन वा कथस्‌ । महिमा कोई किस प्रकार वन कर सकता है यत्मभावादह राम अक्षार्पित्वमवाप्तवान्‌ ॥६४॥। | ॥ ६४ ॥ पूर्वकाल्में मैं किरातोंके साथ रहता था और ५ कि रातेप वि केरातेः सह वर्धित! | उन्हींके साथ रहकर बड़ा हुआ मेरी मैं निरन्तर शूद्रके जह इर र दि ह्‌ आचरणोंमें रत रहता था, मेरी द्विजातीयता केवळ जन्ममात्रद्दिजत्व॑ मे शूद्राचाररतः सदा ।॥।६५ | जन्ममात्रकी थी || ६५॥ मुझ अजितेन्द्रियके शद्ग र ~ _ ४3 |; ए वहतः पुत्र द्रायां वहवः पुत्रा उत्पन्ना मेऽजितात्मनः |. | के गर्भसे वतसे पत्र उत्पन्न हुए। उस समय थोरे चौरोऽहमभर | चोरोंके समागमसे में भी पक्का चोर हो गया था ॥ ६६॥ ततश्चरिथ सङ्गम्य ऽहमभव पुरा ॥६६॥ , जाके अन्तकर्ता कारके समान मैं सदा धनुष-बाण फचरो नितं जी > रण रहता था । एक दिन एक घोर वनमें धनुवाणधरों जीचानामन्तकोपस! । धारण किये रहः थ १ घदुवाणधरा निल काकण मैंने साक्षात्‌ सप्तषियोंको जाते देखा | वे अपनी प्रभासे एकदा मुनय! सप्त दृष्टा महति कानने॥६७॥ | अशनि और सूर्यके समान प्रकाशमान थे । उनके 0 ह. ननेकी ने ५ ४ सम्पूर्ण वल्लादि छीननेकी इच्छासे मैं लोभके वश होकर याधान्मया प्रकाशन्ता ज्यलनाकसमप्रभाः । क उनके पीछे दौड़ा और बोछा--ठहरो, ठरो ।' तब तानन्वधावं लोभेन तेपां सर्वपरिच्छदान्‌ ॥६८॥ | मुनौश्वरोंने मेरी ओर देखकर पूछा--“हे ह्रिजाधम | शय्या ४ ७६ अध्यात्मरामायण [सर्ग ६ ROS I ETI ISITE ER eee ee त्र retort err ५ १2 ७७७१०९७१७९ इल tiated कनकन्र रक कक ७९० ४४७ ७४ ७४४४७४१५७४ ४७ ४४१४४ गी $ तिष्ठ ति? क्यों आ रहा हैं !” ॥ ६७-६९ ॥ मैंने व्रद्धा--है अहीतुकामस्तत्राह दि दिति चाजबस्‌ | पछा ! मेरे वह भूले. पुमा दृष्टा मां मुनयो5एच्छन्किमायासि द्विजांघम 4९% | 3 अतः उनमे पोणाई बळ छेके मिवे आरा अहं तानब्रमं किन्चिदादातुं गनिसत्तमाः | | हैं ॥ ७०॥ उन्कींका पाटन-पोपण करनेके ठ्य म रादयः सन्ति वहवो मे घश्षक्षिताः ॥७०।॥| | बन-पर्वतादियें तमना फिरता हूँ ।” तब उन गुनीश्वरोने वी या i कपल । । मुझसे निर्भयतापूर्वक का “अच्छा, एक बार छू तेषां संरक्षणाथांय चरामि गिरिकानने अपने किय पास जाकर रसे अडा-अलग ततो मामूचुरव्यग्रा! पृच्छ गरवा कुडम्वकप!७१॥ | (६ [मैं प्रतिदिन जो पाप-्स'ल्य करता हूँ उसके यो यो मया प्रतिदिनं क्रियते पापसश्चयः। | आप लोग भी भागी हैं या नही ! ॥ ७१-७२ ॥ इत्र यूयं तद्भागिन! किंवा नेति वेति एथक्शथक्‌॥७२॥ क as कि की ठक सा न Aw हम यहां रहेंगे ।” एन अच्छ [ॐ र दयं खास्यामहे ताबदागामिष्यासे निश्यः । | आया और जिस प्रकार मुनीश्वरोन मुझसे कहा था मैंने तथेत्युक्त्वा गृहं गत्वा मुनिभियदुदीरितम्‌ ॥७३॥ ` अपने पुत्र-म्ना आदिते पृछा । दे रभे ! तव ये अपृच्छं पुत्रदारादींस्तेरुक्तोव्ह रघूत्तम । ' बोले, “बह पाप तो सब्र तुको देगा; हम तो उसमे पापं तवैव तत्त्व व तु फलभागिनः ॥७४॥ मात इर फल (वन आदि) को ही मोगा ॥७३- Am 6 ७४॥ यह सुनकर सुझे अति वैराग्य हुआ ओर में विचार तच्छत्वा जातानेवदो विचायं पुनरागमम | करता हुआ, जहाँ करुणासे परिपूर्ण दढयवाळे गरर मे, मुनयो यत्र तिष्ठन्ति करुणापूर्णमानसाः ॥७५॥ | वहाँ आया ॥७७॥ तव उन मुनोखरोके दर्शनाचे ही मुर्नानां दर्शनादेव शद्धान्त/करणो5भवस । | मेरा अन्तःकरण खुद दो गया ओर मैं धुप आदिको । । फॅककर दण्डके समान परथ्वोपर गिर पड़ा ॥ ७६ ॥| धनुरादीन्परित्यज्य दण्डवत्पातितोऽस्म्यहम्‌।७६। | हे मुनिश्रेष्गग ! इस पाप-सगह्में पदे हुए गेरी रक्षध्यं मां सुनिश्रेष्ठा गच्छन्तं निरयाणबम्‌ | | आप रक्षा जिस नड निन हुए ए a पनित Oe , | अपन सामन पढ़ा देख वे सुनिश्र् सुने बालि द पातत ट मासूडुडानसत्तमाः ॥७७ , | ५, | “खडा हो, खडा हो, तेरा सत्मंग सर उडाचष्ठाचए भद्र त सफल! सत्समागमः । ' हो गया है; नेरा अवय कल्याण होगा | हम तुझे उपदेकष्यामहे तुभ्यं किञ्चित्तव मोक्ष्यसे । ` पीडा उपदेश करते दं उससे त मुक्त हो जायगा ।" + > CR | तब उन्होन आपसम मिलकर यह विचार किया कि परस्परं समालोच्य हुृत्तोऽयं द्विजाधमः ॥७८॥ पलि गाया लकार यह वचार कया । है कि । यद्यपि यह ब्राह्मणाथ्म अत्यन्त दुराचारी होनेसे श्रेष्ठ उपक्ष्य एव सदूवृत्तसतथापि शरण गतः | ` पुरुषोंके लिये उपेक्षाका हो पात्र है तथापि अत्र यह रक्षणीयः प्रयत्नेंन मोक्षमार्गापदेशतः ॥७९॥ ¦ दारणमं आ गया है, इसलिये मोक्ष-मागेके उपदेशद्वारा हि ते नाम ब्य ० इसकी यनपूचक रक्षा करनी ही चाहिये ॥ ७८-७९ | इत्युक्त्वा राम ते नाम व्यत्यस्ताक्षरपूवंक ' कद _ रो | कत क्रय स | हे राम ! ऐसा विचारकर उन्होंने आपके नामाक्षरोंकों एकाग्रमनसाश्वेध मरेति जप सर्दा ॥८०॥ ' उल्टा करके मुझसे कहा “न इसी स्थानपर रहकर आगच्छामः पुनर्यावत्तावदुक्त सदा जप | ' एकाग्र-चित्तसे सदा 'मरान्मरा' जपा कर ॥८०॥ _ , _ ! जवतक हम फिर लोटकर आयें तबतक त सर्वदा इत्युकत्वा प्रयथुः सर्वे धुनयो दिव्यदर्शनाः ॥८१॥ : अ टे दिएं ; तेसथा. दन्य ।८१॥ | हमारे कथनानुसार इसका जाप कर ।” ऐसा कहकर “ह. सथापादष्ट पसथाऽकरवमञ्जसा। वे सब दिव्य-दर्शन सुनीशवर चळे गये ॥ ८१ ॥ तय जपनेकाग्रमनसा वाह्यं विस्टृतवानहम्‌ ॥८२॥ : उन्होंने मुझे जैसा उपदेश दिया था मैंने टोक वैसा ही सर्ग ६] अयोध्याकाण्ड - १9७ eons iiarnprongrpr 0 TTR Note toa एवं बहुतिथे काले भते निश्चलरूपिण! । सर्वसङ्कविहीनस्य वरमीकोऽथून्ममोपरि ॥८३॥ ततो युगसहस्रान्ते ऋषयः पुनरागमन्‌। ` म्रामूचुनिंष्कमंखेति तच्छुत्वा तूर्णीमुत्यितः ॥८४॥ चल्मीकानिगतथाई नीहारादिव भास्कर! । सामप्याहुर्युनिगणा वारमीकिस्त्वं मुनीर ॥८५)) चरमीकात्सम्मवो यसाद्विती यं जन्म तेऽभचत्‌ । इत्युक्त्वा ते ययुर्दिव्ययतिं रघुकुलोत्तम ॥८६॥ अहं ते राम नाम्नश्च प्रमावादीहशोऽमचम्‌ । अद्य साक्षारप्रपञ्यामि ससीतं रक्षमणेन च ॥८७ रामं राजीवपत्राकषं त्वां मुक्ती नात्र संशयः । आगच्छ राम भद ते खलं पे दर्वीयाम्यहस्‌ ।८८॥ एवश्ुकत्वा पुनिः श्रीमांछ€मणेन समन्वितः शिष्य) परिवृतो गत्वा मध्ये प्चतगढ़यो। ॥८ तत्र शालां सुचिस्तीणां कारयामास वासभूः । प्राक्पश्चिमं दक्षिणोदक्‌ शोभनं मन्दिरिद्दयम्‌ ॥९०। जानक्या सहितो रामो लक्ष्मणेन समन्वितः । तत्र ते देवसदृशा झवसन्‌ भवनोत्तमे ॥९१॥ वाल्मीकिना तत्र सुपूजितोऽर्य ' रामः ससीतः सह लक्ष्मणेन । ` देवेभ्रुनीन्द्रेः सहितो शुदाऽऽ्त सगे यथा देवपतिः स शाच्या ॥९२॥ दक क्या याय ३७९७८७ | हा क कीक या किया । इस प्रकार निरन्तर एकाम्र-चित्तसे जप करते- करते मुझे बाह्य ज्ञान नहीं रहा॥ ८२ ॥ इस तरह बहुत समयतक निश्चलतापूर्वंक रहनेसे ` मुझ सर्व-सङ्ग- विहीनके ऊपर बल्मीक (मिट्टीका ढेर) बन गया ॥८१॥ तदनन्तर, एक हजार युग बीतनेपर वे ऋषीशर फिर लोटे और मुझसे कहा--'निकछ आओ यह सुनकर मैं तुरन्त खडा हो गया ॥८४॥ और जिस प्रकार कुहरे- को पार करके सूर्य निकल आता है उसी प्रकार मैं वल्मीकसे निकल आया । तब मुनिगणने मुझसे कहा “हे सुनिवर ! तुम वाल्मीकि हो | ८५ ॥ इस समय तुम वल्मीकऐे निकले हो, इसलिये तुम्हारा यह दूसरा जन्म हुआ है ।” हे रघुश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर वे दिव्यळोकको चले गये ॥ ८६॥ हे राम ! आपके नामके प्रभावसे में ऐसा हो गया जो आज सीता और छक्ष्मणके सहित साक्षात्‌ आप कमळनयनको. देख रहा हूँ । अहा ! मैं निस्सन्देह मुक्त हो गया । हे राम ! आपका मंगळ हो, आइये मैं आपको रहनेके लिये स्थान दिखळाता हूँ” ।॥।८७-८८॥ ऐसा कह शिष्योसे धिरे हुए श्रीमान्‌ मुनिवर वाल्मीकिजीने लक्ष्मणक्रे सहित गंगा ओर पवतके बीचके स्थलमें जाकर वहाँ भगवान्‌ रामके रहनेकें लिये एक सुविशाळ शाळा बनवायी, उसमें एक पूर्व- पश्चिम और दूसरा उत्तर-दक्षिण ऐसे दो सुन्दर घर बनाये गये ॥ ८९-९० ॥ उस भव्य भवनमें जानकीके सहित श्रीराम' और लक्ष्मण देवताओंके समान रहने लगे ॥ ९१ ॥ श्रीवाल्मीकिजीसे भली प्रकार सम्मान पाकर देवता और सुनिजनोंके सहित श्रीरामचन्द्रजी वहा सीता और लक्ष्मणके साथ इस प्रकार प्रसन्नतापू्वक रहने ढगे जैसे खगेलोकमें शाचीके साथ देवराज इन्द्र रहते हैं ॥ ९२॥ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेथरसंवादे . : अयोध्याकाण्डे पष्ठः सगः ॥ ६॥ . ७८ अध्यात्मरामायण ` [सर्ग७ 8286888588. __.___070ण0?०0१०?)?११प०प३प१पप१?१प३१?2१8प१0१ण१णणणणणपणणणाण्णणण्यणययणणयातयणाण्ययाणनाऱान ० ५०६/९१०+/६०६२५७० १८४६४) तुरः ` प्यार nd 0००५०५०७०५३६५६२६/७२६३६३५५७६०९५६०६/७/९५६/४२५/९१४२६४७४५४४४७ सप्तम सगे सुमन्मका प्रत्यागमन, राजा दशरथका खर्गवास तथा भरतजीका ननिद्दाळसे आना और वस्िएजीके आदेशसे पिताका अन्त्येष्टिसंस्कार करना । श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेवजी चोले-इधर सायंकाळके समय ~ षया दिनान्त रवि १ वख्रसे सुख दॉपकर नेन्नोंमे जल भरै हुए" मन्त्रोऽपि तदाऽ्योच्यां दिनान्ते प्रविवेश ह। | उमन्नने भी बसे मु ए ननाम ता द. झप पि तदाज्योध्यां दि व , अयोध्यापुरीमे प्रवेश किया ॥ १ ।। रथका बाहर ही चख्रेण मुखमाच्छाच पाष्पाइलितलोचन: ॥ १ ॥ | दाकर वे राजाको देखनेके लिये अन्तःपुरमे गये बहिरेव रथं स्थाप्य राजानं द्रष्टमाययों | और जय-शब्दसे उनकी स्तुतिकर उन्हें प्रणाम जयशब्देन राजानं स्तुत्वा त॑ प्रणनाम ह॥२॥ | किया ॥२॥ । ततो राजा नमन्तं तं सुमन्त्रं विहलोज्ववीत । राजाने सुमन्त्रको नमस्कार करते देख दःखसे सुमन्त्र रामः त्रसते सीतया लक्ष्मणेन च ॥ ३॥ | व्या होकर कहा. “छन्त! सांता और उक्षण सहित राम कहाँ हैं ! ॥ ३ ॥ तुमने रामको कडं कुत्र त्यक्तस्त्वया रामः कि मां पापिनमघर्वात्‌। | छोड़ा है ? उन्होंने मुझ पापीके लिये क्या कदा ! सीता वा लक्ष्मणो वाऽपि निर्दयं मां किमन्रयीत्‌ ४ | तथा सीता और लक्मणने भी मुझ निर्दयाके लिये हा राम हा गुणनिधे हा साते म्रिययादिनी । | गा है! ॥ ४॥ हा राम ! हा गुणनिधे ! हा कि यु दना प्रिय-बादिनि सीते ! क्या तुम मुझको दृःग्व-समुटगें दब ~ दुःखाणेवे निम मां ग्रियमाणं न पश्यासि ॥ ५॥ इबकर मरते हुए नहीं देखते हो?” ॥ ५॥ विठप्येवं चिरं राजा निमग्नो दुःखसागरे । इस प्रकार बहुत देरतक विलाप करके राजा दुःखब- एवं मन्त्री रुदन्त तं ग्राजझञलिवीक्यमन्नवीत्‌ ॥ ६॥ | ससे इव गये । महाराजको इस प्रकार रोते देख 1 0 1” मन्त्रीने हाथ जोड़कर कदा--॥ ६ ॥ “महाराज ¦ रामः सीता च सोमित्रिमया नीता रथेन ते । मैं राम, सीता ओर लक्ष्णकों आपके रथमं बैठाकर छे शृङ्गवेरपुराभ्याशे गङ्गाकूले व्यवास्थिताः ॥ ७ || | गया पाचे श्वंगवेरपुरके पास गंगाजीके किनारे का ~ जाकर टिके ॥ ७॥ वहां निपादराज गुद दु फल ुहेन कन्चिदानात रठसूलादकच यत्‌। | मूळादि छे आया, किन्त रागजीने उन्हें ग्रहण नहीं स्पृष्ट्वा हस्तेन सम्प्रीत्या नाग्रहीद्विससजे तत्‌॥८॥ | किया, केवळ प्रातिपूर्वक हाथसे छूकर ही छोड बटक्षीरे समानाय्य गुहेन रघुनन्दनः । a ८॥ न चर श्रीरघुनाथजीने गुदसे घटका हैं घ मॅंगवाकर अपनी जटाओंका मुकुट बनाया और जटामुकुटमाबद्धय मामाह चुपते स्वयम्‌ ॥ ९॥ ¦ फिर वे खयं मुझसे बोले | ९॥ “सुमन | महाराज- सुमन्त्र जरि राजानं शोकस्तेउस्तु न मत्कृते । [से कहना वे हमारे लिये शोक न करें; हमें वनमें साकेतादधिक सौर्यं विपिने नो भविष्यति 1१० | “से भी अधिक सुख प्राप्त होगा ॥ ट ॥ मातासे 11. ., . ., ह भी मेरा प्रणाम कहकर कहना कि मेरेल्यि शोक मातुमे बन्दन ब्रूहि शोक त्यजतु मत्कृते | करना छोड़ दें । महाराज वृद्ध और शोकाकुल हैं, आश्वासयतु राजानं इद्धं शोकपरिप्छुतम्‌ ॥११॥ | ९९ भली प्रकार ढॉंढ्स वंधाना”॥ ११ ॥ हे नृपश्रेष्ठ ! ५ ५ तदनन्तर नेत्रोंमें जल भरकर कुछ-कुछ रामकी ओर साता चाक्षपराताक्षी मामाह नुपसत्तम। (देखते हुए सताने दुःखसे गदगद-कण्ठ हो ~दुखमङ्गदया वाचा रामं किश्चिदवेक्षती ॥१२॥ ' मुझसे कहा--॥ १२॥ “दोनों सासुओंके चरण- सभ ७] ` अयोध्याकाण्ड ` ७९ TTT TTT १७४४५८१४४८५५/४0 ४ ० ४४५४४५ ४८ ७४१५१० ३. ७७१ ७००७१ ७५० ६४ ४७० ७४ YY ९५५० ५० ७४९ ७४७४ ४४ ९ ४४ ७०९० ० ६१ ९४४४०६०७१९ SLY ४ ९०६७५४७९७९. UY NNSA SC ONAN साष्टाई म्रणिपातं भे ब्रूहि श््रवोः पदाम्बुजे । इति प्ररुदती सीता गता किश्विदवाड्युखी ॥१३॥ ततस्तेऽश्रपरीताक्षा नावमारुरुहुस्तदा । यावद्वङ्गां समुत्तीये गतास्तावद्हं खितः ॥१४॥ तृतो दुःखेन महता पुनरेवाहमागतः । ततो रुदन्ती कौसल्या राजानमिदमन्रबीत्‌ ॥१५॥ केकेय्ये ग्रियभायायै प्रसन्नो दत्तवान्वरम्‌ । तवं राज्यं देहि तस्यैव मत्पुत्रः किं विवासितः ।१६। कृत्वा त्वमेव तत्सर्वमिदानीं किं चु रोदिषि । कोसल्यावचनं श्रुत्वा क्षते स्पृष्ट इवागिना ॥१७॥ पुनः शोकाश्चपूर्णाक्षः कोसर्यामिदमन्रनीत्‌ । दुःखेन म्रियमाणं मां किं पुनदुःखयस्यलम्‌ ॥१८॥ इदानीमेव मे प्राणा उत्क्रमिष्यन्ति निश्चयः “शप्तोडह वाह्यभावेन केमचिन्छुनिना पुरा ॥१९॥ पुराहं योवने इप्तश्रापवाणधरो निशि । अचरं मृगयासक्तो नद्यास्तीरे महावने ॥२०॥ त्रार्घरात्रसमये अनिः कथरित्तृपार्दितः । पिपासा दितयोः पित्रोर्ेलमानेतुशुद्यतः । अपूरयञ्जले कुम्भं तदा शब्दो5मवन्महान्‌ ॥२१॥ गजः पिति पानीयमिति मत्वा महानिशि । वाणं घद्ुपि सन्धाय शन्दयेधिनमक्षिपस्‌ ॥२२॥ हा हतोऽसीति तत्राभूच्छन्दो मानुपस्रचकः | कस्यापि न कृतो दोपो मया केन हतो विधे ॥२३॥ प्रतीक्षते मां माता च पिता च जरकाइक्षया। न / भयसन्त्रस्तस्ततो5हं पौरुषं वचः ॥२४॥ नेसत थ तत्पाश्वं खामिन्‌ दशरथोडस्म्यहसू | अजारते या विद्वख्नातुमहसि मां गुने ॥२५॥ १ कमलॉमें ' मेरा साष्टांग प्रणाम कहना ।” ऐसा कह कुछ शिर झुकाकर रोती हुई वे बहाँसे चली गयीं ॥ १३ ॥ इसके पीछे बे सब नेन्नोंमें जल भरे हुए नाव- पर चढ़े । जबतक बे गङ्गाजीको पांर कर उस पोर पहुँचे तबतक मैं वहीं खड़ा रहा ॥ १४ || फिर वहाँ- से चलकर बड़े दुःखसे मैं यहाँ पहुँचा हूँ ।? तब कोसल्याने रोते हुए राजासे इस प्रकार कहा-- ॥ १५॥ “राजन्‌ | आपने यदि प्रसन्न होकर अपनी प्रिया कैकेयीको वर दिया तो मळे ही आपने उसीके पुत्रको राज्य दिया होता, किन्तु मेरे .पुत्रको- देशः निकाला क्यों दिया ? ॥ १६॥ और अपने आप ही यह सारी करतत करके अब आप रोते क्यों हैं !” कोसल्याके ये वचन सुनकर मद्दाराजको ऐसीं वेदना हुई मानो घावमें अझिका स्पर्श हो गया हो ॥ १७॥. तब महाराजने नेत्रोमें शोकाश्रु भरकर कौसल्यासे कहा--“में तो आप ही दुःखसे मर रहा हुँ, पिरे इस प्रकार मुझे और दुःख क्यों देती हो ? इससे कयां लाभ है १ ॥ १८ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि मेरे प्राण. अमी निकलनेबाठे हैं । पूर्वकालमें मेरी मूर्खताके कारण मुझे एक सुनीश्वरने शाप दिया था |. १९॥ (वह कथा इस प्रकार है--) पहले एक बार में युबाबस्थाके मदसे उन्मत्त हुआ मृगयामें आसक्त होकर रात्रिके समय धनुप और वाण लिये एक घोर वनमें नदीके किनारे घूम रहा था ॥ २० ॥ उस आधी रातके समय किन्हां प्यासे मुनीश्ररने अपने तृषित माता- पिताके निमित्त जल ले जानेके लिये जलमें घडा डुबोया; उस समय उसका महान्‌ शब्द हुआ ॥ २१॥ तब यह सोचकर कि इस घोर रात्रिमें कोई हाथी जल पी रहा है मैंने अपने धनुषपर शब्दवेधी बाण चढ़ा- कर छोड़ा ॥ २२ ॥ वहाँपर मनुष्यकी सूचना देनेबाळा यह शब्द हुआ हाय! में मारा गया ! हे विधे ! मैंने तो किसीका भी कोई अपराध नहीं.किया था, फिर मुझपर यह वार किसने किया £ ॥ २३॥ हाय! मेरे माता-पिता भी जळकी आकांक्षासे मेरी बाट देख रहे होंगे ।! यह मातुभ-बचन सुनकर मैं अत्यन्त भयभीत. हुआ और धौरेसे उनके पास जाकर बोडा--“प्रभो | मैं दशरथ हूँ, मैने ही अनजानमें यह वाण छोड़ा है; हे मुने ! आप मेरी. रक्षा कीजिये” ॥ २४-२५. ८० अध्यात्मरामायण [ सगे ७ SIS छह पट टी थी थी वि 7 या टू ैौैहएएगएए De hms ह. कल ४ १ हर ल क pn क... ७०६७७००७७७ १४ oe 7 १४५. ae MTN SANNA हकक INN 4५०१ NINN | ध्त्सा कहकर ग गंरगदलाएट हा उुनली वरणे इत्युकत्वा पादयोस्तस्य पतितो गटदाक्षरः । । निर्म भैपीर्नूपसत्तम (गिर पढ़ा) तव उन गनीबरण मंगल कटा तदा मामाह स घुनिमों २ ॥२६॥ | «न्ष ! उरो मत ॥ २६॥ तग जात्या ना! ब्रह्महत्या स्तेन त्वां वैक्योऽहं तपसि स्थितः । | छगेगी, क्योंकि में तपस्यामे लगा इआ वश्य | मर माता-पिता भूख और प्यासमे व्याकुळ दए मेरी बाद पितरौ मां मरते क्षु्ृदश्यां परिपीडिता ॥२७॥ | न होंगे ॥ २७॥ इसलिये अब बिना कुळ सोर तयोस्त्वश्ुदकं देहि शीध्रमेवाविचारयन्‌ । विचार किये यात्र दी तुग उके जल दे आज, ना तो यदि मेरे पिता दापित हा गये ता तुगा मन्म थ न चेखां भस्मसाळुर्यात्पिता मे यदि कुप्यति॥२८॥ नाशन || २८॥ उन जल देकर और नमस्कार सार ह जले दत्त्वा तु ता नत्वा कृत सवं चिवेदय | अपना सारा कलय सुना दना | ज ध्यान दाट देणार : हो रही है, तुम मेरे झर्गगोसे दाण निकाल दो, अंतर शल्यमुद्धर मे देहात्माणांस्त्यक्ष्यासि पीडित॥२९॥ म प्राण छोड गाव २०॥ | इत्युक्तो युनिना शीघ्रे वाणमुत्पास्य देहतः सजरं कलश इत्वा गतोऽहं यत्र दम्पती ॥३०॥ | तण निकाल दिया और जलका पढ़ा देका का । उनके माता-पिता ये वहाँ गया॥ १० ॥ उगा दमय अतिशद्वावन्धवशो क्षुत्पिपासारदिती निशि । ` वे इस प्रकार चिल्लामे व्याइूळ हो गः भे. हम आषम्म नायाति सहिरं गुद पुत्र: कि वाऽत्र कारणम्‌॥३१॥, देह और आसाम साचार है नया बसल्या फी है निक इही शोच्यो दटपरियीहित हो रहे हैं; क्या वारण दकि एस रडिके न अवन्यगतिकी इद्धो शोच्यो ठृदपरिपीडितो। ' हमारा पुत्र अमीतक जळ देकर नही ह क सा उ मकान आवागुपेक्षते किं वा भक्तिमानावयो: सुतः॥३२॥ ' और कोई सहारा नहीं हैं, दभ गुद, दलाय अप = he ४१, ३०-२० 700 oon te yee “दुनिक्े ऐसा कामेपर मेने तुरन्त दी उनके दार] व वव , ... प्याससे व्याकुळ हैं। क्या कारण हैं चि देसी इतिचिन्ताव्याकुली तो मत्पादन्यासजं घ्वानिम्‌। अबखामें हमारा पिदृमक्त पत्र एग उप कर रा ~ ~ है ! इसी समय मेरे एक सदिद सुनळ पिलाने थुत्वा आह पितापुत्र किं विलम्बः कृतस्त्वया। ३ हे। कव पद सुनकर पिताने पृछा---बेंटा : आज तुमने रतना देगी केसे की ! देद्यावयोः सुपानीय पिव त्वमपि पुत्रक । ॥ ३१-३३ ॥ छाओ. झार ही हमें पिद जद इत्येवे ठपतोभीत्या सकाशमगमं शनेः ॥३४॥ पिलाओ और तुम भी पिओ ।" उनके टस प्रकार काणे ` पर म डरतल-दरत भारस उन पास गया ॥ ६४ || आर र ~ प्रणिपत्याह 5३. ह त = Deh = रि पादयोः प्रणिपत्याहमन्रवं विनयान्वितः । ` उनके चरणोमें रणाम करके अति नताय या में आपका पुत्र नही ह बल्कि अयोम्याका राजा नाह पुत्रस्त्वयोध्याया राजादशरथोऽस्म्थहम्‌।३५। है हे | हयर टडारथ है ॥ २७ ॥ न पापा पृगयाकी आगमि . पापोऽह सृगयासक्तो रात्रो मृगविहिसक! |... कारण रात्रिकेसमय पश्मुओंका बघ करता दिडता था | जलावतारादूद्रे$ह स्थित्वा जलगत॑ ध्वनिम्‌ ।३६। | यद्यपि में उस समय जलके तर्ये हर था किन्नु h रि वर्धा हनिक कारण जला हुए टाळकी सुनवार हिला भुत्वाहं शव्दवेधित्वादेके वाणमथात्यजस्‌ | | मृग समझकर उसे मारनेके लिये गने एका घाण होड इतोऽसीति ध्वनि शुत्वा सयात्तत्राहमागत) | ३७॥ दिसा! पर जब मैने यह शब्द सुना कि ~~ नु ; यी डरता हुआ वहाँ आया ॥ ३६-३७ जटा विक्की FR ये पतितं इश्वाहं झुनिदारकम्‌। | ६र जब मैंने एक मुनिबुमारको जि भीतो गृहीत्वा वत्पादो रक्षरक्षेति चाब्रवम्‌ ॥३८॥ | देखा तो भयसे उसके चरण पकड रिपि सगे ७] अयोध्याकाण्ड ८१ TST TTT rem ees very किन क SOS डफ कटी ee ms Seems see ees oo ७७७७ ७७० ०७ ७००० कटक कलक टक जय कमा ननममआआ ४८७० SONA NN ९, ससिपीरिति मां प्राह बह्महत्याभयं न ते । करो, रक्षा करो! ऐसा कहने ल्गा॥ ३८ || तब उन्होंने es Ne मुझसे कहा--“डरो मत, तुम्हें ब्रह्महत्पाका भय नहीं मात्पत्राः स्वा वि iS ! >. पत्रोः सलिलं दरवा नत्वा प्रार्थय जीवितम्‌।३९। है । मेरे माता-पिताको जरू देकर उन्हें प्रणाम कर इत्युक्तो भुनिना तेन ह्यागतो सुनिहिसकः । जीवनदान मागो” ॥ ३९ ॥ मुनिङ्गुमारके ऐसा 11 + ... कहनेपर यह मुनिहिंसक आपके पास आया है । रक्षता मादयायुक्ता युवा है शरणागतम्‌ ॥४०॥ | आप दोनों बड़े दयाशील हैं, मैं आपकी शरण आया हुँ, आप मेरी रक्षा करें! || ४० ॥ इति भुत्वा तु दुःखाता विलप्य वहु शोच्य तम्‌ | “यह सुनकर वे दुःखात होकर उसके लिये पतितो नो सुतो यत्र नय तत्राविलम्बयन्‌ ॥४ १॥ | अत्यन्त शोक करते और रोते हुए परदिवीपर गिर पड़े ee . आर बोरे--"जहाँ हमारा घेटा है, हमें तुरन्त ही ततो नाता सुतो यत्र मया ताइद्धदम्पती। | हाँ छे चले” ॥ ४१॥ तव, जहाँ वह छडका पड़ा स्पृष्टा सुतं ती हस्ताभ्यां वहुशों5थ विलेपतु॥४२॥ | था वही उन बृद्भ-दग्पतिको में छे गया और वे उसे ~ + हायोंसे स्पश कर अत्यन्त विलाप करने लगे ॥४२॥ हास केन्दुमाने | गा उनउत्रत्यनाचताय्‌ चे हा पुत्र ! हा पुत्र !' कहकर रोते हुए बोठे--“वेटा ! जरु देहीति पुन्नेति किमथ न ददास्यलम्‌ ॥४३॥ | हमें जल दो, हमें जळ दो | आज जल क्यों नहीं तो मामूचतुः शीघ्र चितिं > | देते हो !” ॥ ३ ॥ फिर उन्होंने मुझसे कहा--- ततो मामृत्रतुः शीघ्रं चितिं रचय भूपते। | को दो!” ॥ ४३ ड ब र्‌ हः कि लक है भर | "राजन्‌ ! शीघ्र हौ चिता बनाओ ।” मैने तुरन्त ही मया तदच रचिता चितिस्तत निवेशिता! | वहा चिता बना दी । तय वे तीनों उसपर चढ़ गये 2 = ~ पा पी.) शत ७ ~ ~ Ls प्रयस्तत्रा मिरुन्य्टो दर्घास्त त्रिदिव ययुः ॥४४॥ | ओर अशि ळगानेपर उसमें भस्म होकर छगलोकको $ पप्य भविप्यरि । चळ गये ॥ ४४॥ उस समय वृद्ध पितान मुझसे तत्र डड. पता आह प्मप्यत् भावण्यास । : कहा--तुरहारे लिये भी ऐसा ही होगा, तुम भी मेरे पुत्रशोकेन मरणं प्राप्स्यसे वचनान्मम ॥४५॥ | वतनसे पतन्न-शोकसे ही मरोगे” ॥ ४५॥ स इदानीं मम प्राप्तः शापकालोऽनिवारितः । बही अनिवार्य शापकाळ इस समय उपस्थित हुआ po आळ. डे TS कहकर = पज दशर थ्‌ न्यान क करू ; इत्युक्त्वा विललापाथ राजा शोकसमाकुलः ॥४६॥. ५ । ' ऐसा कार राजा दशरन अत्यन्त शोकाङु सीते | दोर विलाप करने लग-॥ ४६॥ “हा पुत्र राम! हा हा राम शुत्र हा सीत दा लक्ष्मण युणाकर || साते! हा गुणावर लक्ष्मण ! तुग्हारे वियोगसे मैं कैकेयीसे त्वद्वियामादह ग्राप्त मृत्यु केकेयिसम्भवमू ॥४७॥ | उपस्थित की हुई मृत्युको प्राप्त हो रहा हुँ” ॥ ४७॥ 1 बदले दशरथः प्रार्णास्त्यकत्या दियं गतः | |. इसप्रकार कहते हुए महाराज दशरथ प्राण त्याग- 1 Ce = ~ < कौसर थान्या राजयोवितः 19 ८ रे ९ हकक च? गये । उस समय कोसल्या, परया च सुमित्रा च तथान्या राजयो पितः [४८ ता और अन्यान्य रानियो छाती पीठ पीकर रोने चुक्रुशत्र विलेपुश्च उरस्ताडनपूर्वकम | | और विछाप करने टर्गी । आकार नपर वहाँ > क | मन्त्रियोंक सहित रनिवर बसिष्टजी आये॥ ४ < वसिष्ठ: प्रयया तत्र प्रातर्मस्त्रिमिराइतः ॥४९॥ | ४९,॥ और राजा दशषरथके शवको एक तैल-पूर्ण | . घेग शौत्र ही तेलद्रोण्यां दशरथ क्षिप्ता दृतानथात्नत्रीत्‌ । | नोकामे रखबाकर तो बोढे--- तुमछाग शत्र हो शि है | 1 | घोटोपर चढ़कर युवाजितकी राजधानीको जाओ || ००॥ त्राते भरतः श्रीमाञ्छद्ुध्नसदितः प्रशु। । । हैं। उनसे मेरी आङ्गासे जाकर इस प्रकार कहना ११ 7 अध्यात्मरामायण उच्यतां भरतः शौध्रमागच्छेति ममाज्ञया ॥५१॥ अयोध्यां प्रति राजानं ककेयी चापि पश्यतु । इत्युक्तास्त्वरितं दृता गत्वा मरतमातुरुम्‌ ॥५२॥ युधाजितं प्रणम्योचुर्भरतं सालुजं प्रति । चसिएस्त्वाऽब्रवीद्राजन्‌ भरतः सानुजः प्रभू! ।५३! शीधमागच्छतु पुरीमयोध्यामविचारयन्‌ | इत्याज्ञपोऽथ भरतस्त्वरितं भयविहल। ॥५४॥ आययौ गुरुणादिः सह दूतेस्तु सानुजः । राज्ञो वा राववश्यापि हुः खं किश्चिदुपाथितम्‌ ।५५। इति चिन्तापरो मार्गे चिन्तयन्नगरं ययौ । नगरं अप्टलक्ष्मीक जनसम्बाधवार्जितम ॥५६॥ उत्सवैश परित्यक्तं दृष्टा चिन्तापरोऽभवत्‌ । प्रविश्य राजभवन राजरक्षमीविवजितम्‌ ॥५७॥ अप्यत्केकेयी तत्र एकामेवासने खिताम । ननाम शिरसा पादो मातुरभक्तिसमन्वितः ॥५८॥ आगतं भरतं इष्द्या केकेयी प्रेमसम्भ्रमात्‌ । उत्थायालिङइग्य रभसा खाङ्कमारोप्य संस्थिता ५९ मृध्ल्येवप्राय पप्रच्छ कुशलं खकुरुस सा | पिता मे कुशली भ्राता माता च शुभलक्षणा ॥६०॥ दिएया त्यमद्य कुशली मया इष्टोऽसि पुत्रक | इति एषः स भरतो मात्रा चिन्ताऽऽङु न्द्रियः ।६१। दूयमानेन मनसा मातरं सभपच्छत | मातः पिता मे इुत्रासे एका त्वमिह सं स्थिता ॥६२॥ त्वया विना न मे तात! कदाचिद्रहसि स्मितः | इदानीं इश्यते नेव झुत्र तिष्ठति मे वद ॥६२॥ अदृष्ट पितरं भेज्य भयं दुःखं च जायते | अथाह फेकेग्री पुत्रं किं दुःखेन तवानघ ॥६७॥ या यतिधमशालानामश्रमेधादियाजिनाम्‌ । [ सर्ग ७ कि भरत झीत्र ही अयोध्यापुरीम आदर महाराज ¢ ** १ दशरथ और वेकेयॉका दर्शन कर | we दसिष्टजीके इस प्रकार काएसंपर दलाने सरन आकर भरतके मामा सुधानित आर छाट नार दात; सहित मरतवा प्रणाम पुनर बसिष्टर्जीने आपके छिय यः दननप्नके सहित महाराज भरत दुर्य ही विना, आगा-पीछा सोचे अयोष्यापरीस ये आधे आज्ञा सुनकर श्रीभरनजी भवस व्यास ही गुरु्जीके आदेदासे छोटे नागे. सित 7 Rt ° ह य ज > 160 कि! f + त्िट ४२०१ ३ डः i ५ क re ~ 5 आच नश, के] और यह सोचकर कि अत्रय हॉ मणाराज या श्रीरघुनायनीपर कोट घोर संकट उपनत शशा ही | ५१-५७ ॥| मागमे मन-्हीनान चिन्ता वागन नगरमे पहुँचे | दद्दा उन्यॉने देखा कि. नगर शोभाहीन, जनसमहसे रहित ते उसन शि रहा है । यह देखबार थे अत्यन्त चिस्दिस पप | गह- भवनन जाकर देखा नो बह राजल: मीन रन्य हा रहा है आर वहां अवेळी कवेल एक आसनप ईडी हू a पि हू हे। माताका देवार उन्होंने भ्िधलक परम: चरणोंमे शिर रखकर प्रणाम क्रिया [| ०६-०८ | भरतर्जाको आये देख माता वोगेयीने उनो शेम चश झीघ्रतासे उठाकर टढय लगाया और अपची गोरे येठा लिया ॥ ५००॥ फिर उनका हिर गेघयर अपने कुलका दुद्यछ परी | बर कलीम पिला, ना भाई और चझुमलरणा माता पुगल्रच ही न लू = = विवि eu क ॥ ६९॥ बटा . झाज त्र नाग्यन सेने मुझे सफ्शल देख पाया हे |" मातादे इस प्रकार एन्‍नपर भरतजीन सिम्ताइल- क होकर दःखी चित्तसे मानासे फ्ा--म मा कहाँ हैं जी तुम बहो अन्ती चढा हो! ॥५ ६-६ } ~ क मॉ. तुम्हारे विना नो पिताजी एकाननमे काश नह रहते किन्तु इस समय वे दिखायी नदी देते, सो बताः तो कहाँ है? ॥ ६३ ॥ पिताजीको न देखनेसे आज मुझे अत्यन्त भय और दःख हो रहा हे!" तब कोकेयीने कहा “हे अनघ ! तग्हारे लिये दःख- की क्या वात हैं? | ६४॥ है पिउबत्सल ! अस्वमेधादि सगे ७] अयोध्याकाण्ड ८३ 5 RRR १0१0४४४१०९ ४१५१ ५५ ७२८९० ७०4३७ ५ ७ ६७००९७ re ९७७० ७7 एकल ६० ७७१७१७७ ४४८ ५८७८ ४७९९०७० कोकम ४४४४४५४४४१ ४ ५ ४८४९४८४ ७५४४९४ ४४९४१० ७८ ४४९४४४ ७९०१०९५ १५१५९०९०१०” Upp ppt rp १) #० 1 तां गति गतवानच पिता ते पितूवत्सळ ॥६५।। | यज्ञ करनेवाले धर्मपरायण पुरुषोंकी जो गति होती है | उसीको आज तुम्हारे पिता भी प्राप्त हुए है” ॥६५॥ > नपा तच्छुत्वा निपपातोच्या भरतः शोकविद्दल! । यह छुनते ही भरत शोकाकुल होकर पृथिवीमें हा तात क गतोऽसि स्व सयकस्वा मां इजिनाणीये३& | गिर पदे; और वोठे--“हा तात ! हा तात | मुझे हर न दुःख-समुद्रमे छोड़कर आप कहाँ चळे गये ? | ६६ || ,'असेमप्यैव रामाय राज्ञे मां छ गतोऽसि भोः। हाय ! महाराज रामको मुझे सौंपे बिना ही आप कहाँ विकावा यू चले गये ?” इस प्रकार विलाप करते और बियुरे शत विलापत उच्च पातत युक्तमूधेजमू ।।६७॥ | हुए: केशोंसे प्रथिषीपर पडे अपने पुत्रको उठाकर उत्थाप्यामूज्य नयने कैकेयी धुतरमन्रचीत्‌ । | “ने उसके आँसू पोंछकर कहा--“वेटा | धीरज पर | रखे; तुम्हारा कल्याण हो । मैने ठुम्हारे लिये सब कुछ समाश्वासाहे सटर ते सतर सम्पादेत मया ॥६८ || | ठीक कर लिया है” ॥ ६७-६८ ॥ तामाइ भरतस्तातो म्रियमाणः किमञवीत्‌ । | तव भरतजीने पृछा--“मरते समय महाराजने क्या केकेयी , जत कहा था ?” इसपर कैकेयीदेवीने निर्भय होकर भरत- तमाह ५०७) देवी भरतं भयवर्जिता॥३९॥ जीसे कहा--1|६९॥ “वे 'हा राम! हा राम | हा हा राम राम सीतेति लक्ष्मणेति पुनः पुनः । सीते! हा लक्ष्मग।' इस प्रकार बहुत समयतक बारम्बार विलाप करते हुए अपना ( शरीर ) त्यागकर स्वको विलपन्नेव सुचिरं देई त्यक्त्वा दिवं ययो ॥७०॥ ये है? ॥७०॥ तामाह भरतो हेऽम्व रामः सन्निहितो न किम्‌ । तव भरतजीने पूछा--“माता ! तो क्या उसे समय _ राम, सीता और लक्ष्मण भी उनके पास नहीं थे! तदानीं लक्ष्मणो वापि सीता वा कुत्र ते गता ७१ बे तीनों उस समय कहाँ गये थे ?” ॥७१॥ न कैकेय्युवाच कैकेग्री बोळी-तुग्हारे पिताने रामको युबराज 5 वनानेकी तैयारी की थी, उस समय तुम्हें राज्य वराज्या त्रात सम्भ्रमः १ | a व्र उसमें $ रामस्य यावराज्याथ पत्रात व अमः कत दिलानेके लिये मैने उसमें विष्म खड़ा कर दिया ॥७२॥ तव राज्यप्रदानाय तदाऽह विधमाचरम्‌ ॥७२॥ | म ५ ८५ 0 _ >. पूर्वकालमें एक बार प्रसन्न होकर राजाने मुझे दो वर राज्ञा दत्तं हि मे पूर्व वरदेन वरदयस्। ।देनेको कहा था। इस समय उनमेंसे एकके दारा याचितं तदिदानी मे तयोरेकेन तेऽखिलम्‌ ॥७३॥ | कैसे तुम्हारे छिये सम्पूर्ण राज्य और दुसरेसे रामके राज्य रामस्य चेकेन घनवासो सुनिब्रतम्‌। | लिये मुनिव्नरतपूर्वक्ष बनवास माँग लिया। इसलिये मुत! सत्यपरो राजा राज्यं दत्वा तवेच हि ॥७४॥ तुम्हारे पिता सत्यसंध महाराज दशरथने तुम्हें ही राज्य । देकर रामको वनमें भेज दिया । पातिःत्यका पालन के क कप त्र ~ त्र ४ | ह दे है है है | राम सम्सपयामास वसल पता तन । करनेवाली सीता मी रामके साथ ही वनमें चली गयीं [ hd व्रत्य $ ७५ a ~ साता दा राम दातमतहुाता ॥०४ , ॥७३-७७॥ तथा लक्ष्मण भी श्रातृस्नह प्रकट करते सौश्ात्र दशेयन्राममनुयातो5पि लक्ष्मण! । हुए रामके अनुगामी हुए। इस प्रकार इन सबके वनको चनं गतेषु सर्वेषु राजा तानेत्र चिन्तयन्‌ ॥७६॥ । चे जानेपर उन्हीका स्मरण करते हुए और राम) ~ ? करके विलाप करते इए दृपश्रेष्ट महारा अलपद रामरामेति ममार शपसतन्तम! ! |राम! करके विछाप करते इए 5 हे ति मातीच श्रत्वा वज्ञाइत इब द्रमः ॥७७॥ | सरीर छोड़ दिया । माताके ये बचन छुनकर भरत इति मातुवचः शुर्वा चज़ाहत इष द्रुमः बज़ाहत शृक्षके समान अचेत होकर प्रथिवीपर पपात भूमी निःसंज्ञस्तं इष्द्या दुःखिता तदा। | गिर पडे । SSS RE TO TITS STS Le I कि तब उन्हें ऐसी दझामें देख वेकयान द खित कर केयी पुनरप्याह वत्स शोकेन किं तब ॥७८॥ | क! हम शोक वयो. करते राज्ये महति सम्पाते दुःखस्यावसरः इतः | हो ! ॥७६-७८॥ ऐसे महान, रा कौ पान 1 र हःखका कारण ही कहाँ रह जाता गाताका इति इंबन्तीमालोक्य मातर परह ॥9९॥ | हस प्रकार कहती देख भरतजीने धिम जडत! असम्भाष्या पाप म घोरे त्वं भवेघातना । | से कहा-॥ ७९ ॥ “भरा प्रपिनती | ते घ ~ करनेयोग्य नही हे ! अरी घर्‌ ! न अपन पतिका पापे त्वदर्भजातोव्हं पापवानस्मि साम्प्रतम्‌ । | इत्या करनेबाली है! अरी पाये ! हेरे गर्भसे उत्पन $ तो में भी प्रत्यक्ष है महापापी ह | सि पे ढु आ. इति ८० | होनेके कारण अब [म अहमग्ि प्रवेक्ष्या्स विष वा भक्षयाम्यहम्‌ ॥८०]॥ | में या तो अगि प्रवेश कर जाउँगा या रिय खा दगा खङ्गेन वाथ चात्मानं हत्वा यामि यमक्षयस्‌। ।॥८९॥ अध्या खना आत्मधात करके यमठेककां चढा जाउँगा । हे भेकघातिनि ! हे दुष्टे 1 त भी भर्तघातिनि दुटटे त्वं इम्भीपाकं गमिष्यसि ॥८१॥ | कुम्मीपाकनरकगें पेग” ॥८१॥ es उ इति निस्य कैकेयीं कोसल्याभवनं ययो । । क्ैकेयीकों इस प्रकार डों्कर ते कौसन्याकि घर साऽपि तं भरतं दष्ट्वा मुक्तकण्ठा रुरोद ह ॥८२॥ गये । भरतको देखते ही माता कासल्या मुक्तकण्ठस पादयोः पतितस्तस्या भरतो पे तदाऽरुदत्‌ | रोने लगी ॥८२॥ तव भरतर्जा भा उनके चरणोम पडकर रेने लगे । उन्हे गे ठगावर ९ चिन्तासे ) मढा आलिङय भरतं साध्वी राममाता यशखिनी। |1- ज्य र नाना वीसन्याे कृशाऽतिदीनवद्ना साशुनेत्रेदमत्रवीत्‌ ॥८३॥। | ls be ho) | Fe i त्र सवयि गते दूरमेये सर्वमभूदिदम्‌ । Se ai 3 ददम | बाहर चळे जानसे जॉ-ज्ञो अनथ हुए ६. अपना नाता- उत्त मात्रा श्रुतं स्वे त्वया ते माठ्चेष्टितम्‌ ॥८४। मे चुन टी पुत्रः सभार्यो वनमेव यातः वे सव करतूत ठुमनं उसके सुस इने स ' सलक्ष्मणो मे रघुरामचन्द्रः। | भीर मेरा पुत्र रघुश्रेष्ट रामचन्द्र अपनी पह चीराम्वरो वद्धजटाकलापः । सीता और लक्षमणके सहित चीर-वस धारण कर आर सन्त्यज्य मां दु:खसमुद्रमम्ाम्‌ ॥८५॥ | जटाजट वपक रे दुःख-समुह्में दुवोकर धनको हा राम हा मे रघुवंशनाथ चला गया ॥८०॥ हा राम ! हा मेरे रघुवंदाशिरोमणि ! जातोऽसि मे त्व परतः परात्मा। | आप साक्षात्‌ परम पुरुष परमात्माने मरे गभर जन्म तथापि दुःखं न जहाति मां वे लिया, तयापि दुःसने मेरा पड़ा नहीं। हाडा । इससे ह. ne | 1 द $९ बिघिषलीयानिति मे मनीषा ।।८६॥ ' मेरा विचार है. कि विधाता ही बलवान द” ॥८६॥ स एवं भरतो वीक्ष्य विलपन्तीं भृशं शुचा । | भरतजीने उन्हें इस प्रकार शोकसे आयन्त विद्यप करती देख उनके चरण पकड़कर कहा--“माता ! पाद शृहीतवा प्राहेदं र हेदे शृणु मातवंचों मम ॥८७॥ | मेरी बात सुनो-॥ ८७ ॥ कौकेयीने श्रीरामचन्दर्जाके कैकेय्या यत्कृतं कर्म रामराज्याभिपेचने । | राज्याभिपेकके समय जो कुछ करतत की ह. अथ्वा हि ' उसने और भी जो कोई कार्य किया है उसे यदि भे अन्यदा गि हदि दि | य | i यदि जानामि सा मया नोदिता यदि।८८। | जानता होऊ अथवा उसमें मेरी सम्मति हो ॥८८॥ पापं मेज्स्तु तदा माततरक्षहत्याशतो्धवस्‌ । | तो दे गातः ! मुझे सो अलहत्याओंका पाप उगे | अथवा अरुन्धतीके सहित श्रीवसिष्ठजीको खडगसे ड्गसे हरवा वसिष्ठं सङ्गेन अरुन्धत्या समान्वितम्‌ ॥८९॥ | मारनेसे जो पाप होता है वही पाप सुझे भी उगे । अयोध्याकाण्ड. <५ भूयातत्यापमखिलं मम जानामि यदहम्‌ । | इस प्रकार शपथ करके भरतजी रो उठे ॥८९-९०॥ तयच शपथ कृत्या सरोद भरतस्तदा ॥९०) | तव कोसल्याने उने दयसे लगाकर कहा-“बेठा ! कोसल्या तमथालिड्ग्य पुत्र जानामि मा शुचः । करे क जानती हूँ, तुम किसी प्रकारकी चिन्ता ~ S ¢ t | एतसिन्नन्तरे श्वर हि न तर झुत्वा भरतस्य समागमसू ॥९१॥ | इसी समय भरतजीका आना झुनकर मन्त्रियोके असष्ठी मन्त्रिभिः साध प्रयथो राजमन्दिरस्‌। । सहित वसिष्ठजी राजमवनमें आये और भरतको रोते दं परत द वि | देखकर आदरपूर्वक बोले---1९१-९२॥ “महाराज दन्ते मरतं दृष्टा वसिष्ठ: प्राह सादरम्‌ ॥९२॥ ¦ दशरथ इद्र, ज्ञानी और सत्य-पराक्रमी ये । वे मलुष्य- वृद्धा राजा दशरथो ज्ञानी सत्यपराक्रमः। | अन्मके समरन सुख भोगकर, बहुत-सी दक्षिणाके 1 अ 1 | सहित अश्वमेधादि य्ञोदवारा भगवान्‌का यजन कर शुक्त्या मत्यसुखं सर्भामिष्टा बिपुलदक्षिणेः ॥९३॥ और रामचन्दके रुपमें साक्षात विष्णुभगवानको पनर अश्रमेधादिभिनशर्लब्ध्या रामं सुतं हरिम्‌। 111: अन्तम स्वगेलोकमें जाकर देवराज इन्दरक व कर री आधे आसनके अविकारी हुए हैं. ॥ ९३-९४ ॥ अन्ते जगाम त्रिदिवं देवेन्द्राद्वासिनं प्रभुः ॥९४॥ ' वे सवया अशोचनीय और मोक्षके पात्र हैं, उनके ल्यि तं शोचसि इंथव त्वमशोच्ये मोशभाजनसू । 5४ ६ शोक करते हो; देखो, आत्मा तो नित्य, आत्मा नित्योडन्ययः शुध जन्मनाशादिववित!॥ | अविनाशी, शुद्ध और जन्म-नाझादिसे रहित है ॥९०॥ त्मा नित्योध्व्ययः शुद्धो जन्मनाशादियाजित)। | अर शरीर जड, अत्यन्त अपवित्र और नाशवान्‌ है । शुरीरं जडमतर्थमपवित्रं विनश्वरमू । | इस प्रकार विचार करनेपर शोकके डिये कोई खान "विचार्यैमाणे शे | नहीं रह जाता ॥ ९६॥ यदि कोई पिता था एत्र मर टं 1 ण श बका 7 शा $ वि , हि पाणे शोकस्य नावकाशः कथश्वन ॥९६॥ | जाना है तो मूहजन ही उसके लिये छाती पोठकर पिता वा तनयो याऽपि यदि मृत्युवशं गतः | | रोते हैं ॥ ९७॥ किन्तु, इस असार संसारमें यदि ~ | ज्ञानियोंको किसीसे वियोग होता है तो वह उनके मूढास्तमुशो चन्ति स्वात्मताडन ॥९७॥ | -- = शूढास्तबङुशाच ही ताडनपूर्वकपू ॥ 3७ , लिये वैराग्यका कारण होता है और सुख तथा शान्तिका निःसारे खठ संसारे वियोगो ज्ञानिनां यदा । विस्तार करता है ॥ ९८ ॥ यदि किसीने इस छोकमें वदराग्यहेतु द ` जन्म लिया है तो मृत्यु भी अवश्य ही उसके साथ छगी म्व १स गान्तसार्य CAL > इराग्यह हि शान्तिसाख्ये तनोति च। ९८ ` हुई है। अतः जन्म शेनेवाळीके लिये मृत्यु सादा जन्मवात्यदि लोके5स्मिसर्दि तं सत्युरन्यगात्‌। | अनिवार्य है ॥ ९९॥ अपने कर्मीनुसार ही सब तस्मादपरिदार्यों5य मृत्युजन्मवर्तां सदा ॥९९॥ प्राणियोंक्रे जन्म-मरण होते हैं. यह जानकर भी देखो त 0____6 = मूढ़लोग अपने वन्घु-वान्धबोके लिये कैसे शोक करते ।.खकर्मवणतः सवेजन्तूनां प्रभवाष्यया | | हैं॥ १०० ॥ करोड़ों ब्रह्माण्ड नष्ट हो गये, अनेकों विजानन्नप्यविद्वान्यः कथे शोचति वान्धवान्‌ १००, स्या बीत गयी, ये सम्पूर्ण समुद्र एक दिन सूख जायेगे, ॥ ३ वय 3 यर , फिर इस क्षणिक जीवनमें भला क्या आस्था की जाय£ ्रह्मण्डकोटयो नष्टाः सृष्टयो बहुशो गताः । हि इत ५ _ | ॥ १०१॥ यह आयु हिलते हुए पत्तेकी नोकपर शुष्यन्ति सागरा! सर्वे केवाऱ्या क्षणजीविते । १०१) | टकती हुई जल्की बदके समान क्षणभंगुर है, चलपत्रान्तलम़ाम्युविन्दुवत्थषणभडु असमय ही छोड़कर चली जाती है; उसका तुम क्या माम्युनिन्टुवरचा मड विश्वास करते हो?! ॥१०२॥ इस जीवात्माने आयुस्त्यजत्यवेलायां कसत्र म्रत्ययस्तव ।१०२। | अपने पूर्वदेह-कृत कमसे यह शरीर धारण किया है देही प्राक्तनदेद्दोत्थकर्मणा देहवान्पुन । और फिर इस देहके कर्मोसे यह और शरीर धारण र र ८६ अध्यात्मरामायण | [सभ ७ यान्या SOP ONT Foro TORTI oR TTR RTC IEC TT RIT क आयक ७० कक ७७ ७०७७१ ७०२ ०७० पणर तदेहोत्येन च पुनरेवं देहः सदात्मनः । १०३ | करेगा | इसी प्रकार थत्माक्रों सदा पुन है देहकी Ane तेन्‌ "| प्राप्ति होती रहती हें ॥ १०३ ॥ मनुध्य जिस प्रकार फ़ गू व ५५ = पि क क शॉ यथा सात नेजा वासो र्गा न पुराने बल्चोंकों उतारकर फिर गये चश पहन “मा है तथा जीण परित्यज्य देही देह पुननंबम्‌ ।१०४। | उसी प्रकार देहधारी जीव पुराने दाररको छोडकर भजत्येव सदा तत्र शोकस्यावसरः कुतः । नवीन शरीर धारण कर रा हे | अतः इसमे झोकका ~ _ 6-५ वया कारण हैं ! क्योंकि आम्मा तो न वामा मरता है; हक © | स द 2, 25 £ आत्मा न म्रियत जातु जायते चवथे |! न जन्मता ह आर न बढ़ता ही हे ॥ १०५०-१०५ ॥ पड्भावरहितोऽनन्तः सत्यप्रज्ञानविग्रह। । वह पइ-भाव-विकारोंस रहित, अनन्त, सबित्क्षरूप, आनन्दरूपो बुद्धवादिसाक्षी लयविवर्नितः ।१०६) | आनन्दरूप, बुद्धि आदिका सादी और अविनादा ६ . न ॥ १०६ ॥ वह परात्मा एक, अद्वितीय आर सममावमे एक एव परो ह्यात्मा हद्वितीयः समः स्थितः । | श्चित हे । इस प्रकार तुम आमाका दड ज्ञान प्राए कर इत्यात्मानं इढं जञात्वा त्यकत्वा शोक कुरु क्रियाम्‌ । शोकरहित दी समख कार्य करों ॥ १०७॥ हे छुछनन्दन भरत ! अपन पिताका दारीर तेलक नावमंस Ne oie भ [oe ण्या! पितुदेदश्चुद्त्य सचिव! ~ _ ५४5 ण्ड याः उद्र 1 साच सह! निकालकर मन्त्रियों और हम संव छषियोंकि साथ कृत्य कुरु यथान्यायमस्पाभिः कुलनन्दन ।१०८। | उसका विश्विपूर्वक अन्लेषटि-मस्क्ार करों ॥ १०८ ॥ इति सम्बोधितः साक्षादुरुणा भरतस्तदा । तव गुरुजीके इस प्रकार समद्ानेपर मरत विसृज्याज्ञानजं शोक चक्रे स विधिवर्क्रियाम्‌ १०९) जीने अज्ञानजन्य चोकको शेरकर राजाका ब्रिकरितरत पुरुणोक्तप्रकारेण आहितामेर्यथाविधि । से अटि क्या | र | युरुमाक ना चाह ५ पित्त Oe स: S हैत्रीका अन्तिम संस्कार करना चाहिय स्त्य स्‌ पुद विदन कमणा (११०) | उसो प्रकार विधिपूर्वक पिताके देका धामामुकृूठ एकादशेऽह्नि माहे बराह्मणान्वेदपारगा्‌। | संस्कार कराकर ॥ ११०॥ पिर एकादशाह आनिपर पोजयामास विधित्रच्छतशोऽथ सहस्रशः ।१११। | ऐकडोंहजारों वेदज्ञ आह्यणोंकों मिव्रिबत्‌ भोजन aS CR) ~ च्य ° 999 तथं पनाक उद्देश्य वाष्मगको दिश्य पितरं तत्र ब्रह्मणेभ्यो धनं बहु | || 1१६ ॥ तथा पिनाक उदये आलोक | वेइत-सा घन, हजारों गोट, अनेका गोव आर रन तथा (दो गवां सहस्नाणि ग्रामान्‌ रत्ाम्वराणि च।११२। बखादि दिये ॥ ११२ ॥ अवसत्स्पगृहे तत्र राममेवानुचिन्तयच्‌ । फिर श्रीरामचन्द्रजीका हू स्मरण करते हुए बे गुरु बसिएेन सह भ्रात्रा मन्त्रिमि? परिवारितः ।११३। वसिष्ठजी, भाई दात्रुभ और मन्त्रियोंके साथ अपने घरमे [मिऽरण्यं प्रयाते सह जनकसुता- | रहने लगे || ११३ ॥ घरमे रहते हुए में मन-हाी-मन सोचा करते थे कि जनकनन्दिनां महारानों सीना ओर लक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथर्जीके भयंकर वनगे चळे जानेसे माता केकेयी अपने दर्शनमात्रस ही राक्षसीके लक्ष्मणाभ्यां सुघोरं गाता मे राक्षसीव प्रदहति हृदयं रश >> प च्छाम्यारण्यमद्य समति न स्यः । समान मरे दयम दाह उत्पन्न करती ह | अतः अब तरस में निस्सन्देह शौध्र ही सत्र राज-पाट छोड़कर बनको . ., द्रेताऱ्पास राज्य जाऊँगा ओर मधुर गुसकानसे जिनका म़खारविन्द गम सोतासमेत सितरुचिरमुखं अति शोभित हो रहा है उन राम और सीताकी नित्य- नित्यमेवानुसेवे ॥११४॥। | प्रति सेवा करूँगा! ॥ ११४॥ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे सप्तमः सगः ॥ ७॥ RE Sogn सर्ग ८ ] अयोध्याकाण्ड ` ८७ TD कटक्न्टचट अष्टम सर्ग भरतजीका चनको प्रस्थान, मार्गमे शुह और भरद्वाजजीसे मेंट तथा चित्रक्ूटदशन । श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेवजी घोले-हे पार्वति ! एक दिन षष्ठ युनिमिः सार्ध मन्त्रिभिः परिवारितः । गुनीधरोंके सहित मन्त्रियोंसे घिरे हुए भगवान्‌ वसिष्ट- "राज्ञः सभां देव RR जी देवसमाके सदरा राजसमामें आये || १॥ वहाँ ' पञ्चः सभा वश ४/%७७७७४ ॥ १ ॥ | दूसरे ्रह्माजीके समान आसनपर विराजमान श्रीबसिष्ठ- तत्नासने समासीनश्वतुसुख इवापरः | जीने भाई इतरुन्रके सहित भरतजीको घुळाकर आसन- आनीय भरते तश्र उपशय सहालुजस्‌ ॥२॥ 5 ३ यमि कर भरतजीसे अतवीदवचनं देशकालोचितमरिन इस प्रकार देदक!ळोचित बावयोंम कहा -''वत्स ! तुम्हारे श्चन शकारगाचतया सन्द तय | पिताके कथनानुसार आज हम तुम्हें राजपदपर अभिषिक्त वत्स राज्येडभिपेक्ष्यामस्त्यामद्य पितृशासनात्‌।२। | करेंगे ॥ ३ ॥ हे पुरुपश्रेष्ठ | कैकेयीने तुम्हारे लिये कैकेय्या याचितं राज्यं त्वदर्थे पुरुपर्पभ । राजा दशरथसे राज्य माँगा था । राजा सत्यपरायण थे, सत्यसन्धो दशरथः प्ररि 2 इसलिये प्रतिज्ञा करनेके कारण उन्होंने उसे दे दिया भे है या दशरथः शता द्दा कठ ॥४॥ | ४॥ अतः मुनिजनोंद्वारा मन्त्रोश्वारपूर्वक आज अभिपेको भवत्यद्य मुनिभिमेन्त्रपूर्वकम्‌ । | तुम्हारा अभिपेक होना चाहिये ।” तच्छत्वा मरतोऽप्याह मम राज्येन किं सुने ॥ ५ | | यह छुनकर भरतजी बोढे--- है मुनिनाथ ! राज्यसे > 5 ह मेरा क्‍या प्रयोजन हे ? | ५॥ महाराज राम ही श्रृ Ci रा ¢ र ५ बळ - रामां राजाधराजश्व चय तस्यव किडूरा! । राजाविराज हैं, हम तो उन्हींके दास हैं । कळ प्रातः- श्वःप्रभाते गमिष्यामो राममानेतुमझसा || ६॥| काळ रामजीको छानेके ल्यि हम शीघ्र ही बनको अहं यथे मातर कैकेयी राक्षसी बि जायेंगे || ६ ॥ मैं, आप सबलोग और राक्षसी कैकेयी- अहे यूयं मातर केकेयी राक्षसी विना। | सिता अन्य सब माताएँ--ये समी बनको हनिप्याम्यधुनेयाह केकेयी माठृगन्धिनीस्‌ | ७॥ चलेंगे | मैं क्या करूँ ¦ मैं तो इस नाममात्रकी माता ~ 42 8 3 । केकेयीको अमी मार डालता, किन्तु श्रीरघुनाथजी मुझ किर श्रेष्ठ खीहन्तारं सहिष ब (1. 03 किन्तु मा नो रघु; खाहम्तार सहिस्यत । | ख्ी-हत्यारेको क्षमा न करेंगे | अतः कुछ भी हो, कळ ` तच्छवोभूते गमिष्यामि पाद चारेण दण्डकाब्‌।८।। . प्रातःकाल होते ही,आप लोग चळे या न चळे, तो शुन हेतस्तण _ । के सहिन पैदल ही दण्डकारण्यको जाऊंगा । हे मुने । शत्रुभसहितस्तूर्ण यूयमायात् घान वा। ` ज प्रकार रामजी गये हैं उसी प्रकार जबतक .,रामो यथा बने यातस्तथाऽहं वरकलाम्बर! ॥ ९॥ रामचन्द्रजी न लोटेंगे तबतक मैं भी, शु्के सहित : 6 १ शज्नन्नसहितों मने वर्कळ-वश्ञ और जटाजूट घारणकर कन्द-मूछ- फलमूडकृताहारः शाहभसाहेता गुन | ' फळादिका भोजन करूँगा और पएथिबीपर शयन अ ह क. हक w भूमिशायी जटाधारी यावद्रासो निवतते ॥१०॥ करूँगा” ॥ ७-१०॥ NN 7, इति निश्चित्य भरतस्तुण्णीमेवावतस्थिवान्‌ | , ऐसा निश्चयकर भरतजी मौन हो गये । तब सब- लोग प्रसन्न होकर ' साधु-साधु? कहकर उनकी साधुसाधथ्विति त॑ सर्वे प्रशशंसुसुदान्विता। ॥११॥। | प्रशंसा करने छगे ॥ ११ ॥ ततः प्रभाते भरतं गच्छन्तं ससैनिकाः । | तदनन्तर प्रातःकाङ होनेपर भरतजीके कूच करते अनुजग्युः सुमन्त्रेण नोदिताः साश्चकुल्लरा॥॥ १ २॥ | समय हाथी ऑर धोड़ोंके सहित समस्त दैनिक सुमन्ज- | ८८ अध्यात्मरामायण [सर्ग ८ bese सर ९०7५५१०५०५ ON i 0p जा: :) 7 3 चचचिच| CT SNe prt capa ४४४ i कौसल्याद्या राजदारा बसिएप्रमुखा द्विजाः । | की प्रेरणासे उनके साथ चळे ॥ १२ ॥ कौसल्या आदि महारानियाँ तथा वसिष्ठ आदि द्विजगण प्रथिवाको ५ ४. Uf वि 0 ५ | ना छादयन्तो थुव सब एतः पाश्चतोऽग्रतः ॥१३॥ ' आच्छादन कर उनके भाछ और इपर यवा शृङ्गवेरपुरं गत्वा गङ्गाकूले समन्ततः। | योग्य रौतिसे चलने ढा] १६ ॥ इस प्रकार शेरपुर i | वह सता झत्रन्नकी प्ररणास गंगातट । पर जह-तहा ठहर गया ॥ १४० ॥ आगते भरते श्रुत्वा गुह। शङ्कितमानसः। . ! भरतका आगमन सुन गुहकों यह शांका हुई है| सेना लकर आय हैं अतः ये रामक अनजान: महत्या सेनया साधमागतों भरतः किल ॥१५॥ ` +९ १ सा त लास श ल हि अन i । में उनका कोड अनिष्ट करनेके लिय न जाने हों ! गुर पाप कते न वा याति रामस्याविदितात्मनः। '! उनके पास जाकर उनका मर्म जानना चाहिये । यदि ग वे भे हीं पार चले जाये उनका भाव ठोक हो नत्र ता वे गत्वा तदूधदय जय याद शुद्धस्तारष्यात ॥१६॥ दत शच याद शद्धस्तार ६ | १०-१६ | नहीं तो ( इसके विपरीत उपाय करना गङ्गा नाचत्समाकष्य नावास्तष्ठन्तु सायुधाः पड़ेया अतः ) मेरे जातिवाळे धरातल छेक सावधानी ज्ञातयो मे समायत्ता; पर्यन्तः र्वतो दिशम्‌ । 1१७॥ से सव ओर चोकस रहे आर सत्र नावोका लवकर गंगाक बाचिम खड़ी कर द ॥ १७॥ इति सवान्समादिइ्य गुहो भरतमागत! | | इस प्रकार सबको आज्ञा दे गुद् नाना प्रकारकी उपायनानि संशुह्य विविधानि बहून्यपि ॥१८॥ | वतःस भट लेकर अपने व्रहुत-से हथियारतन्द जानिः माइयाक साथ भरतजाके पास आया | बहा उनके मामु प्रयया ज्ञातिभिः / शातामः साथ बहुभिविविधायुधे सत्र सामध्रा रखकर इधर-उतर दसत हुए उसने निवेद्यापायनान्यग्रे भरतस्य समन्तत। ॥१९ | देखा कि मेघस्याम भरत चौर-बस और जटाजूट धारण इषया भरतमासान सानुज सह मन्त्रिभिः । किये मन्क्रियोंके साथ बैठे हैं ॥ १८-२० ॥ थे राम- चीराम्बरं घनइयामं जटामुकुटधारिणम्‌ ॥२०॥ हीका स्मरण कर रहे ह आर 'राम-नाम' का ही जप रामभेवाचुशोचन्तं रा । र रहें हैं। यह देखकर उसने परधिमपर दिए सुशान्त रापरामात चादिनम। रखकर भरतजीको प्रणाम किया और बोला प ननाम शिरसा भूमो गुहो5हमित्ति चामबीत्‌॥२१॥ : गुह हैं! ॥ २१ ॥ शमसत्थाप्य भरता गाढमाठेडण्य सादरम्‌ । भरतजीन उसे शीघ्र ही उठाकर आदरपूर्वक गाढ एष्ट्यानामयसन्यग्रः सखायमिदमत्रबीतू ॥२२॥ किन किया और प्रसनखतसे उसकी इल पृछ कर उससे सखा-भावसे इस प्रकार बाद्े--॥| २२ ॥ आतर राषवणात्र समेतः समवास्थतः | | "या ! तुम यहाँ श्रीरामचन्दरजीके साथ रहे थे झर रामणाठाज्ञतः साद्रनयनेनामलात्मना ॥२३॥ निमेल्य श्रौरामने नेत्रोमें जळ भरकर तुम्हारा चन्यांजप्त कृतकृत्योसि यक्तया परिभाषित; | आलिंगन किया था ॥ २३ ॥ तुमसे सीता और झच्मण- सहित कमळ-नयन रामने वार्तालाप की अतः तुम रामा राजावपत्राक्षा लक्ष्मणेन च सीतया | ।२४॥ | धन्य हो, तुग्हारा जीवन सफल्हे | २९० ॥ हे सतत ! यत्र रासस्त्वया दृष्टस्तत्र मां नय सुत्रत। तुमने श्रीरामचन्द्रजीको जहाँ देखा था गहा वही ले सतया सहितो यत्र सुपतस्तदर्शयस्व मे ॥२५॥ | चलो; जहाँ वे सीताको सहित सोये थे वह खान सदे दिखाओ ॥ २५॥ तुम रागके ग्र त्व रामस्य प्रेयतमी भक्तिमानसि भाग्यव | तुम रागक प्रियतम सखा और कमाना भा यवान | 1 भाग्यवानू भक्त हो । इस प्रकार पनः-पुन रामका शव ससत्य संस्मृत्य रामं साश्रुविहोचनः ॥२६॥ | स्मरण करनेसे भरतजीके नेन्नोंमें जल भर आया ॥२६॥ ee ~ I oe प स्प सर्ग ८ ] . अयोध्याकाण्ड ८९ गुहेन सहितस्तत्र यत्र रामः स्थितो निशि । इस प्रकार विरहव्याकुल हुए वे गृहके साथ उस य॒यौ दद्य शयनखरं कुदासमास्पृत्तम ॥२७॥ नपर पहुँचे जहाँ रात्रिके समय श्रीरामने निवास सीताऽऽभरणसंरमस्र्णिन्दुभिरचितम्‌ । 1 था। वहाँ जाकर उन्होंने उस कुशा बिछे हुए रायन-स्थानको देखा।| २७॥ वह सीताजीके आभूषणों-' दुःससन्तप्तहृदयो भरतः पर्यदेवयत्‌ ॥२८॥ | से झडे हुए सुवर्णकणोसे सुशोभित था | उसे देखकर ' अहो$तिसुकुमारी या सीता जनकनन्दिनी । आसादे रक्षपर्यैक्कू कोमलास्तरणे शुभे ॥२९॥ रामेण सहिता शेते सा कथं कुशविष्टरे । सोता रामेण सहिता दुभ्खेन मम दोपतः ॥३०॥ मरतजीका हृदय दुःखसे भर आया और बे इस प्रकार विलाप करने छगे-।| २८ ॥ “अहो ! जो अति सुकुमारी जनकदुरारी सीता राजमहल्में कोमळ बिछौनेसे युक्त अति सुन्दर रल्रपर्यकपर श्रीरघुनाथजीके साथ शयन किया करती थीं बे ही मेरे दोपसे श्रीरामचन्द्रजीके साथ इस कुशाओंकी साथरीपर किस प्रकार केरापूवेक सोती धिछूमा जातोऽस्मि केकेश्यां पापराशिसमानत! | | दोंगी 7॥ २९-३०॥ मुझे धिक्कार है ! जो मैं मूर्तिमान मनिमित्तमिद॑ केश रामस्य परमात्मनः ॥३१॥ अहोऽतिसफलं जन्म लक्ष्मणस्य महात्मन! । राममेव सदान्वेति वनस्थमपि हृष्टधीः ॥३२९॥ अहं रामस्य दासा ये तेपां दासस्य किङ्करः । यदि स्यां सफलं जन्म मम भूयान्न संशयः ॥३३॥ आतजौनासि यदि तत्कथ यस्व ममाखिलम्‌। यत्र तिष्टति तत्राहं गच्छाम्यानेतुमञ्ञसा ॥३४॥ गुददस्तं शुद्भहृदयं ज्ञात्वा सस्तेहमन्रवीत्‌ | देव त्वमेव धन्योऽसि यस्य ते भक्तिरीदृशी ॥३५॥ रामे राजीवपत्राक्ष सीतायां लक्ष्मणे तथा । चित्रकटाद्रिनिकरे मन्दाकिन्यविदूरतः ॥३६॥ - भ्ुनीनामाश्रमपदे रामस्तिष्ठति साइुजः । ' जानक्या सहितो नन्दात्सुखमारते किल प्रश्च।२७। तत्र गच्छामह शीघ्र गङ्कां ततुमिहाईसि । इत्युकत्वा रितं गत्वा नावः पञ्चशतानि इ॥३९८। समानयत्ससैन्यस्य ततु गङ्गां महानदीम्‌ । स्वयमवातिनायेका राजनावं गुहस्तदा ॥३९॥ आरोप्य भरतं तत्र शतध राममातरम्‌। पापपुञ्जके समान कैकेयीके गर्मसे उत्पन्न हुआ हूँ । हाय ! मेरेलिये ही परमात्मा रामको यह छेश उठाना ' पड़ा !! [| ३१ || अहा ! महात्मा लक्ष्मणका जन्म अत्यन्त सफल है जो भगवान्‌ रामके बनमें रहते समय भी सदा प्रसन्नमनसे उन्हींका अनुसरण करते हैं ॥३२॥ जो लोग रामके दास हैं उनके दार्साका दास भी यदि मैं हो जाऊ तो मेरा जन्म सफळ हो जाय--इसमें सन्देह नहीं ॥ ३३ ॥ भाई ! यदि तुम्हें माळूम हो तो मुझे यह सब्र बताओ कि राम कहाँ हैं ? वे जहाँ कहीं भी होंगे, मैं उन्हें तुरन्त लानेके लिये वहीं जाऊँगा” ॥३४॥ गुहने उनका चित्त शुद्ध देखकर स्नेहपूर्वक कहा--“स्वामिन्‌ ! आपकी कमलनयन राम, सीता और लक्ष्मणमें ऐसी बिशुद्ध भक्ति है, अतः आप ही, धन्य हैं | छोटे भाई लक्ष्मणके सहित रामचन्द्र चित्रकूट-पर्वतके पास मन्दाकिनी नदीके समीपं मुनियोंके आश्रममें रहते हैं | वहाँ जानकीके सहित भगवान्‌ राम आनन्द और सुखपूर्वक विराजमान हैं ॥३५--३७॥ चलिये, शीघ्र ही दमछोग वहाँ चले | पहछे आपलोग यहाँ गंगाजी पार कर ले ।” ऐसा कहकर उसने तुरन्त ही सेनाके सहित भरतजीको गंगाजीसे पार करनेके लिये पाँच सौ नावें मँगवायी और स्वयं एक राजनौका ठे आया ॥ ३८-३९ ॥ उसमें भरत, र्न, रामकी माता कोसल्या और वसिप्ठजीको चढ़ाया तथा एक दूसरी नावमें केकेयो आदि अन्य पसिएं च तथान्यत्र ककेयी चान्ययोपितः ॥४०॥ | राजमहिळाओंको सवार किया ॥४०॥ तीर्त्वा गङ्गां ययी शीघ्र भरडाजाश्चमं प्रति। १२ इस प्रकार शीघ्रही गंगाजीको पार कर ने भरद्वाज ५ ९० ध्यात्मरामायण | [सर्ग ८ य न rrr प्च रे खथाप्य महातैन्यं भरतः साजुजो ययौ ॥४१॥ | मुनिके आश्रमकी ओर चले । वहाँ अपनी महान्‌ ति न्स ~ सेनाको आश्रमसे दूर छोड़कर भाई चत्रु्रके सहित भरत- आश्रमे दुनिसासीनं ज्वलन्तमिव पावकम्‌ । जी आश्रमपर गये ॥४१॥ और प्रज्वलित अझ्िके समान ' दृष्टा ननाम भरतः साष्टाङ्गमतिभक्तितः ॥४२॥ तेजस्वी मुनिवर भरद्वाजको आश्रममें बैंठे देख उन्हें अति भक्तिपूर्वक साष्टांग प्रणाम किया॥ ४२ ॥ मुनीश्वरको जब माद्म हुआ कि वे दररयनरनड- 4 मरत हैं तो उन्होंने प्रीतिपूवेक उनकी पूजा की और उन्हें जटा-वल्कलादि धारण किये देख कुशढ-प्रश्नके , ee दिक । अनन्तर पूछा-॥४३॥ “भाई मरत ! राज्य-शासन राज्यं प्रशासतस्तेञ्य किमेतद्दर्कलादिकस्‌ करते हुए तुमने आज यह वल्कळादि कँसे धारण आगतोऽसि किमर्थ त्वं विपिनं मुनिसेबितय्‌ ॥। ४४1 कर ल्यि और इस सुनिजनसेवित तपोवनमे तुम किसलियि आये हो ?” ॥४४॥ भरद्वाजवचः कुत्वा भरतः साश्ुलोचनः। | मरदवजके ये इचन इनर भरतने तने नेम कि $ जानाति भगवन्‌ सर्वभृताञ्चयखितः ॥४५॥ | भरकर कहा “भगवन्‌ ! आप सब जानते है, क्योंकि स्व ज्ञानास भ षि सेषथूठाशया द आप सर्वान्तर्यामी हैं ॥४५॥ फिर भी आप जो पूछ रहे तथापि पृच्छसे किञ्चितदचुग्रह एव में। | है बह मेरे उपर आपकी कुछ कृपा ही है । वौकेयीने कैकेव्या यत्कृतं कर्म रामराज्यविधातनम्‌ ॥४६॥ | श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिपेकमे वित्न उपस्थित करने- SS Ae । वाला और वनवासादि-विपयक जो कुछ कार्य किया है, ५००७ भा नोह जानान कश्चन । हे मुनिश्रेष्ट | आपके चरणोंकी साक्षी करके कहता सवत्पादयुरणं मेऽ््य प्रमाणं सुनिसत्तम (1४७1 | हूँ मुझे उसके विपयमें कुछ भी पता नहीं था” ॥४६-४७॥ ` उन्होंने © = चरणः इत्युकत्वा पादयुगल गने! स्पृष्द्वाउड्चमानस; । | ऐसा कह उन्होने अति आत्तचित्त हो मुनिके चरणः ७. 2. युगल पकड़कर कहा---"“मिगवन्‌ ! आप स्वयं जान शातुमहास सा दव शुद्धो वाड्युद्ध एव वा ॥४८॥ | सकते हैं कि मे दोप हर या निर्दोप ॥४८॥ हे मम राज्येन किं स्वामिन्‌ रामे तिष्ठति राजनि। | त्वामिन्‌ ! महाराज रामके रहते हुए मुझे राज्यसे क्या Ae प्रयोजन है ? हे मुनिश्रेष्ट ! में तो सदासे ही श्रीराम- कङ्कर S न्ट्र्स | ब ~ ~ a “कप दे शान रामचन्द्रस्य शाश्वतः ॥ ४९) | नरका दास हूँ ॥१९॥ अतः हे मुनिनाय ! मैं औ- अतो गला बरुनिश्रेष्ठ रामस्य चरणान्तिके । (| रामचन्द्रजीके पास जाकर उनके चरण-कमलोंमें पइ- ~ कर यह सारी राजपाटकी सामग्री उन्हें यहीं सौंप पनित राज्यसम्भारान्‌ समप्यत्रैव राघवम्‌।५०॥| ५ व हि दि सय्य॑त्रेंव राबवस्‌|।५०। दूगा ॥५०॥ तथा वसिष्ट आदि पुरजन और जनपद अभिषेक्ष्ये वसिष्ठादयः पौरजानपदैः सह । वासियोंके साथ मिळ्कर उनका राज्याभिपेक कर NN RR अयोध्या ले जाऊँगा और अति तुच्छ दासके समान - वष्यऽयाष्या रमानाथ दासः सेवे RI ७ i न जाय दासः सवञवनाचवत्‌।११॥ उन छक्ष्मीपतिकी सेवा करूँगा” ॥५१॥ RR, र ~ ~ इत्युदीरितमाकण्यं भरतस्य वचो जनिः । मुनीश्वरने भरतके ये उद्गार सुनकर उन्हें हदयसे ~ ~ ल्यि विस्मयपर्वैक र कौ आलिडएय मूषा प्रशशंस सविस्मय/॥५२॥| उगा लिया और विस्मयपूर्वक शिर सूँघकर उन ५ प्रशंसा करने लगे |।५२॥ वे बोखे-“बेटा ! अपने ज्ञान- वत्स ज्ञात पुरपृतद्धाविष्य ज्ञानचक्षुषा । चक्षुओंसे मैंने पहले ही ये होनेवाळी वातें जान ली | हि थीं। तुम शोक न करो; तुम तो लक्ष्मणकी अपेक्षा भी मा झुचस्त्व परा भक्त! श्रीराम लक्ष्मणादपि ॥५३॥| रामके परम भक्त हो ॥५३॥ हे अनघ ! में सेनाके ज्ञात्वा दाशरथि प्रीत्या पूजयामास मौनिराट्‌ । पप्रच्छ कुशल दृष्ट्या जटावरकलधारिणम्‌ ॥४२॥ अयोध्याकाण्ड ९१ ~ आतिथ्यं कतुमिच्छामि ससैन्यस्य तवानघ । अद्य भुक्त्वा ससेन्यस्त्व थो गन्ता रामसन्निधिम्‌॥ ha यथाऽऽज्ञापयति भवांस्तथेति भरंतोऽत्रवीत्‌ । न्ोडवाजस्त्यपः ष्ट्रा मोनी होमग्रहे खितः ॥५५॥ दूष्यो कामदुघां कामवर्षिंणी कामदो मुनिः। असृजर्कामधुक्‌ सवे यथाकाममलोकिकम्‌ ॥५६॥ भरतस्य ससेन्यस्य यथेष्टं च मनोरथम्‌ । यथा ववर्ष सकल वृप्तोखे सर्वसैनिकाः ॥५७॥ वसिष्ठ पूजयित्वाग्रे शाखद्टेन कर्मणा । पश्मात्ससैन्य भरतं तर्षयामास योगिराद ॥५८॥ | उपित्वा दिनमेकं तु आश्रमे स्वगसन्निमे । अभिवाद्य पुनः प्रातर्भरद्दाजं सहानुजः । भरतस्तु कृताचुज्ञः प्रययों रामसन्निधिम्‌ ॥५९॥ चित्रकूटमञुमनाप्य दूरे संस्थाप्य सैनिकान्‌ । रामसंदशनाकाङ्की प्रयया भरतः खयम्‌ ॥६०॥ शुतरुप्नेन सुमन्त्रेण शुहेन च परन्तपः । तपखिमण्डलं सव विचिन्वाना न्यवतंत ॥६१॥ अच्प्दया रामभवनमएच्छडपिमण्डलम्‌ । 9 इतरास्ते सीतया साथ लक्ष्मणेन रवूत्तमः ॥६२॥ | ऊचुर गिरेः पश्नाहज्ञाया उत्तरे तटे । विविक्तं रामसदनं रम्यं काननमण्डितस्‌ ॥६३॥ सफेराम्रपनसेः कदलीखण्डसंबृतम्‌ । चम्पकैः फोधिदारेश पुत्नागदिपुलेसथा ॥६४॥ ` एवं दर्शितमालोक्य सुनिभिर्भरतोञ्यतः । इर्पाद्ययो रघुश्रेष्ठमवन मन्त्रिणा सह ॥६५॥ सहित तुम्हारा आतिथ्य-्सत्कार करना चाहता हूँ । आज सेनासहित तुम यहीं भोजन करो, कळ रामके | पास जाना” ॥५४॥ भरतजीने कहा--“आपकी जेसी आज्ञा होगी, वही होगा ।” तब मुनिवर भरद्वाज आचमन कर मौन होकर यज्ञशालामें बेठे ॥५५॥ वहाँ बैठकर उन कामग्रद मुनीश्वरने समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेबाळी कामधेनु- का स्मरण किया । तब उस कामभेनुने इच्छानुसार सम्पूर्ण अलौकिक भोग प्रस्तुत कर दिये ॥ ५६॥ उसने सेनाके सहित भरतजीक सम्पूर्ण मनोरथोंको इस प्रकार पूर्ण किया जिससे वे समस्त सैनिक सन्तुष्ट हो गये ॥५७॥ फिर उन योगिराजने शाख्ानुकूल प्रथम वसिष्ठजीकी पूजा की और तदनन्तर सेनाके सहित भरतजीको तृप्त किया ॥५८॥ इस प्रकार उस स्वग-सद्श आश्रममें एक दिन रहकर ग्रातःकाळ मुनिवरको प्रणाम कर उनकी आज्ञा ले भाईके सहित भरतजी रामचन्द्रजीके पास चळे ॥५९॥ चित्रकूटके निकट पहुँचनेपर उन्होंने सैनिकोंको दूर खड़ा कर दिया ओर स्वयं राम-दशंनकी छारसासे आगे बढ़े ॥६०॥ परंतप भरतजी शत्रुध्त, सुमन्त्र और गुहके साथ समस्त तपस्तियोंके आश्रमोंमें खोजते-खोजते फिर आये ॥६१॥ किन्तु उन्हें श्रीरामचन्द्रजीकी कुटी कहीं न मिली । तत्र उन्होंने ऋषि-मण्डळीसे पृछा--- “सीता और छक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथजी कहाँ रहते हैं £? ॥६२॥ उन्होंने कहा--“सामनेवाले पर्वतके उस ओर श्रीमन्दाकिनीके उत्तरीय तटपर वना- वलीसे सुशोभित रामकी परम रमणीक एकान्त छुटी है ॥६१॥ वह फलयुक्त आम्रवृक्ष, पनस और कदळी- खण्ड ( केलेकी क्यारियों ) से घिरी हुई है | तथा उसके चारों ओर बहुत-से चम्पक, कोविदार और पुन्नाग आदिके भी वृक्ष सुशोभित हैं” ॥६४॥ मुनियों- के इस प्रकार बतलानेपर भरतजी प्रसन्नतापूर्यक मन्त्रियों- क्रो साथ ले सबसे आगे रघुनाथजीके निवास-स्थान- को चले ॥६५॥ आगे बढ्नेपर उन्होंने दूरहीसे रामका TR A कटा वी. पं Cu ee *५ १. OT ७९ (५ OO, ९२ अध्यात्मरामायणे [सग ९ RROD ODDS i pr PROD RRR Or र रनपपरकमकमपनयनदनयमहमककरमकनयवयपनपमक लक TITS ०५०९० ६४०५//५०%१६० 2%०३९/४४४०२० ५ ददश दूरादतिभासुरं शुभं मुनिजनसेवित अति सुन्दर और भासमान सुन्दर रामस गेहं अनिडन्दसेवितम | | भवन देखा । जिसमें इश्वी शाखापर वन्कड- ृक्षाग्रसंलग्मसुवर्कला जिनं बस्न और मृगचर्म टँग इए थे और श्रीरामचन्द्रजीके रामाभिरामं भरतः सहाबुजः ॥६६॥ ' वास करनेके कारण जो परम रमणीक था ॥ ६६ ॥ EFS इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डेऽएमः सगः ॥ ८ ॥ — Eee —— नवम सर्ग भगवान्‌ राम और भरतका मिळन, भरतजीका अयोध्यापुरीको खौटना और श्रीरामचन्द्रजीका अजिमुनिके आश्रमपर जाना । -रीमहादेव उवाच । श्रीमहादेवजी घोळे-हे पार्मति ! तदनन्तर 6 ५ ॥ीभरतजी अति भम्न मनसे सोता और रामके चरण- अथ गत्वाऽऽश्रमपद्समीपं भरतो मुदा। | शररतजौ अति मझ मनसे सं "१ चरण ५ न्ति द चिहोंसे सुशोभित आश्रमक्रे समीप अति सुन्दर और पत्रित्र सोतारामपदेयुक्त पवित्रमतिशोभनम ॥ १॥। . `. | उन्होंने सत्र ओर भगवान श्त स्लम पहुच ॥ १ ॥ वहा उन्हान सव ओर भगवान्‌ स तत्र वजाडुशवारिजाशित- कत रामचन्द्रके चज्ज,भं कुरा, कमळ ओर ध्वजा आदिके चिद्वसि ध्वजादिचिद्वानि पदानि सर्वतः । | सुशोभित तथा पूथिवीके लिये अति मंगठमय 'चरण-चिद्ठ 1 1 ददर्श रामस इनोऽतिमङ्गला- देखे। उन्हें देखकर भाई शत्रभके सहिन वे उस चरण- न्येष्टयत्पाद्रजःसु सालुज; ॥ २ ॥ | रजमें छोटने लगे॥ २॥ और मन-हो-मन कहने छो--- अहो सुधन्योऽहममूनि राम- “अहो | में परम धन्य हैँ, जो आज श्रौरामचन्द्रजीके दि पादारविन्दाझतभूतलाने । ।उन चरणारबिन्दोंके चिह्ठासे सुशोभित भूमिको देख पञ्यामि यत्पाद्रजो विसृग्यं रहा हूँ जिनकी रजको ब्रह्मा आदि देवगण और सम्पूर्ण ब्रह्मादिदचेः श्रृतिमिश्च नित्यम्‌ ॥ ३ ॥ | श्रुतियाँ मी सदा खोजती रहती है! ॥ ३ ॥ इत्यड्ुतप्रेमरसा प्छुताशयो इस प्रकार जिनका हृदय अद्भुत प्रेमरससे भरा हुआ विगाढचेता रघुनाथभावने। | है, मन रघुनाथजीकी भातनामें इवा हुआ हे तथा आनन्दुजाश्रु्पितस्तनान्तरः वक्षःस्थळ आनन्दाश्रुओंसे भोगा हुआ है वे भरतजी- LN शनेरवापाश्रमसन्निधिं हरेः ॥ ४। धीरे-धीरे श्रीहरिके आश्रमके निकट पहुँचे | ४ ॥| बहाँ स तत्र दृष्टा रघुनाथमाखित उन्होंने दूर्वा-दलके समान श्याम-दारीर और विशाळ- र्वा दरुश्यामलमायतेक्षणम्‌ । नयन श्रीरघुनाथजीको वेठे हुए देखा, जो जठाओं- जटाकिरीटं नववल्कलाम्वर का मुकुट और नवीन वल्कल-बलल धारण किये रसन्नवक्त्रं तरुणा तिम्‌ थे तथा प्रसन्नवदन और नवीन सूर्यके समान प्रभायुक्त विलोकयन्त न स्गारणदयुतिय्‌ ॥ ५ ॥ | ॥५॥ एवं जो शुभलक्षणा श्रीजनक-नन्दिनीकी ओर न्त जनकात्मजा शुभां निहार रहे थे तथा श्रोरृक्ष्मणजी जिनके चरणकमलोंकी सोमित्रिणा सेवितपादपडूजमू । सेवा कर रहे थे | उन्हें देखते ही श्रीमरतजीने दौड़कर t+ सर्ग ९] अयोध्याकाण्ड ९३ NNN A AAA NTR 0७७ 6 Ne NNN NN तदाभिदुद्राव रघूत्तमं शुचा ANNAN 2६४९७४”. हर्ष और शोकयुक्त होकर तुरन्त उनके चरण-युगल हर्पाच तर्पादयुगं त्वराग्रहीत्‌ ॥६॥ | पकड़ लिये ॥ ६ ॥ वड़ी भुजाओंवाळे श्रीरामचन्द्रजीने रामस्तमाकृष्य सुदीर्घवाहु- .. दोम्या परिष्वज्य सिविश्चतेत्रजैः । यारि संन्सवशयत्‌ पुनः पुनः संपरिषखजे विश्वः ॥७॥ अथ ता मातरः सवी? समाजग्ुस्त्वराऽन्विताः। अपनी दोनों वाहुओंसे उन्हें उठाकर आरिङ्गन किया और उन्हें गोदमें बेठाकर अपने आँसुओंसे सीचते हुए बारम्बार हृदय रुगाया ॥ ७॥ फिर प्यासी गोएँ जिस प्रकार जलकी ओर दोडती है उसी प्रकार कौसल्या आदि समस्त माताएँ रघुनाथजीको देखनेके लिये बड़ी शीघ्रतासे चली || ८॥ रामजीने अपनी माताको देखते राघवं द्रष्डुकामास्तास्ट्पाती गोयेथा जलम्‌॥ ८॥ | ही शीघ्रतासे उठकर उनका चरण-वन्दन किया और रासः खमातरं वीक्ष्य दुतमुत्थाय पादयोः । चवन्दे साश्चु सा पुत्रमालिब्ग्यातीव दुःखिता प्रको इतराश्च तथा नत्वा जननी रघुनन्दनः । उन्होंने अत्यन्त दुःखसे नेत्रोंमें जल भरकर हृदयसे लगाया ॥ ९॥ फिर श्रीरघुनाथजीने उसी प्रकार अन्य माताओंको भी प्रणाम किया । तदनन्तर, मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीको आते देख ॥ १०॥ - ततः समागतं दृष्टा वसिष्ठ चुनिषुङ्गवम्‌ ॥१०॥ | उन्हे साष्टांग प्रणामकर बारम्बार कहने छगे भैं धन्य साष्टाङ्गं प्रणिपत्याह धन्याऽस्मीति पुनः पुन! । यथाईमुपवेदयाद सवीनेव रघूद्वहः ॥११॥ पिता मे कुशली किं वा मां किमाहातिदुःखितः | चसिष्टस्तप्ुवाचेदं पिता ते रघुनन्दन ॥१२॥ त्वद्वियोगामितप्तात्मा त्वामेव परिचिन्तयन्‌ | रामरामेति सीतेति एक्ष्मणेति ममार ह॥१२॥ श्रुत्वा तत्कर्णञ्चूलाभं शुरोवेचनमञ्जसा | हूँ, मैं घन्य हूँ ! | फिर श्रीरघुनाथजीने सबको यथायोग्य बैठाकर र ११॥ “कहिये, हमारे पिताजी कुशळसे हैं? उन्होंने मेरे बियोगसे अत्यन्त दुःखातुर होकर मेरेख्यि क्या आज्ञा दी है ?” तब बसिष्ठजीने कहा- “हे रघुनन्दन ! तुम्हारे पिताने तुम्हारे वियोगसे अति सन्तप्त होकर 'दे राम ! हे राम हे सीते! हे लक्ष्मण !' इस प्रकार तुम्हारा ही चिन्तन करते हुए अपने प्राण छोड़ दिये” ॥ १२-१३ ॥ कानोंमें शलके समान ळानेवाछे गुरुके इन वचनों- को सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण “हाय ! हम मारे गये हा हतोऽस्मीति पतितो रुदन्‌ रामः सलक्ष्मणः ४ इस प्रकार रोते इए सहसा गिर पड़े ॥ १४ ॥ तब ततो5नुरुरुदुः सवो मातरश्च तथापरे। समस्त माताएँ और अन्यान्य समी उपस्थित छोग रोने लगे | श्रीरामचन्द्रजी बारम्बार कहने लगे--/हा हा तात मां परित्यज्य क गतोऽसि घृणाकर॥।१५॥ | तात ! हे दयामय ! आप मुझे छोड़कर कहाँ अनाथो5स्मि महावाहो मां को वा लालयेदित! | चले गये ॥ १५॥ हे महाबाहो ! मैं अनाथ हो गया; अब मुझे कौन लाड छड़ावेगा |” फिर इसी प्रकार सीता च लक्ष्मणसव विठेपतुरतो शृशम्‌ ॥१६॥ | सीता और लक्ष्मण भी बहुत विलाप करने छगे ॥ १६॥ वसिष्ठः शान्तवचने। शमयामास तां शुचम्‌ । ततो मन्दाकिनीं गत्वा खात्वा ते ्वातकल्मपाः। १७) शान्त राज्षे ददुर्जलं तत्र सर्वे ते जलकाड्लिणे। पिण्डानिरवीपयाभास रामो ठक्ष्मणसंयुतः ॥१८॥ तब वसिष्ठजीने शान्तिमय वाक्योसे वह शोक किया और फिर सब छोग मन्दाकिनीपर जाकर ज्ञान करके पवित्र हुए | १७॥ वहाँ सबने जलाकांक्षी महाराज दरारथको जळाञ्जछि दी तथा लक्ष्मणजीके सहित श्रीरामचन्द्रजीने पिण्डदान किया ॥ १८ ॥ जो | हद YN [भ्र 1] ९४ अध्यात्मरामायण [ सम्‌ ९ SE इङ्गदीफरुपिण्याकरचितान्मधुसम्प्हुताच्‌ । | हमारा अन्न है बही हमारे पितरोंकों प्रिय होगा, यही ७ दि स्पृतिकी आज्ञा है! ऐसा कह उन्होंने इंगुदी फलके वये यदन्ञाः पितरस्तदन्नाः स्सृतिनोदिताः ॥१९॥ | पिण्ड बना उनपर मधु डाळ्कर उन्हें दान किया दः्खाश्चपूणाक्षः पुनः खात्वा गृहं पौ ॥ १९॥ फिर नेन्रोंमें शोकाश्र भरे इए थे पुनः 'खाश्चपूरणाक्षः पुनः खात्वा गृह ययो । र ट र्ते हद र कड | ख्ानकर आश्रममें आये | इसी प्रकार और सब भी बहुत सर्वे रुदित्वा सुचिरं खात्या जम्मुखदाश्रमम्‌ ॥९०। देरतक रोकर अन्तमें खान करके आश्रमको छोटे २०] न भू तिस्तु दिवसे सर्वे उपवासं प्रचक्रिरि। | उस दिन सबने उपवास किया | दूसरे दिन, ' रिले सार RR | मन्दाकिनीके निर्मळ जल्में खान कर भरतजीने ततः परेथुर्विमठे खात्वा मन्दाकिनीजले ॥२१॥ | आश्रममें बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर उपविष्टं समागम्य भरतो राममन्रवीत्‌। | कहा--“हेराम। हे राम ! हे महामाग! आप अपना । अभिषेक कीजिये ॥ २१-२२ ॥ यह पतृक राज्य रास वं मामा सात्मानमभिषेचय ॥२२॥ । आपहीका है, आप इसका पालन करें । आप हमारे राज्यं पालय पिञ्य ते ज्येष्ठस्त्व मे पेता तथा | . बडे भाई हैं, अतः पितृतुल्य हें । महाराज ! अजाका क्षत्रियाणामयं धर्मों यत्प्रजापरिपारनम्‌ ॥२३॥ | पाढन करना यही क्षत्रियोंक्ा मुख्य ञो | व है |॥ २३ || अतः आप नाना ग्रकारके यज्ञांसे यजन इष्टा यशैबेहुविधे! पृश्रानुत्पाध तन्तवे। । करके फिर वॅशवृद्धिके छिये पुत्र उत्पन्न कर उसे राज्ये पत्रं समारोप्य गमिष्यसि ततो वनस्‌ ॥२४॥ | बड़े होनेपर ) राजसिंहासनपर बैठाकर तव बनको + 1. जाये ॥ २४ ॥ हे प्रमो | अमी चनवासका समय नहीं इदानीं बनवासस्य कालो नेव प्रसीद मे । | है, आप मुझपर प्रसन्न होइये | मेरी माताका जो कुछ मातुमे दषं किव्चित्स्मतु नाहीसि पाहि नः।२५॥ अपराध है उसे भूल जाइये और हमारी रक्षा कौजिये” + कि 1॥ २५॥ ऐसा कहकर उन्होंने भाईके चरणोंको भक्ति- इत्युकत्वा चरणो आतुः शिरस्याधाय भाक्तितः । । पूर्वक अपने मस्तकपर रख ल्या और श्रीरामचन्द्रजीके रामस्य पुरतः साक्षाइण्डवत्पतितो श्वि ॥२६॥ | सम्मुख दण्डके समान प्रथिबीपर गिर पड़े ॥२६॥ उत्थाप्य राघव! शीधरमारोप्याङ्केऽतिमक्तितः। | रामजीने भरतको शीघ्रतासे उठाकर अति प्रेमपूर्वक गीदमें च व नेत्रोंमें ७७७ क भीरे हि उवाच भरतं रामः खेहाईनयन! शनेः ॥२७॥ | गं बैठा लिया ओर त्रो प्रेमाु भरकर घीरे-चीरे वरस 2 8 | उनसे कहने छगे--1|२७)। “भाई ! मैं जो णु वत्स प्रवक्ष्यामि त्वयोक्तं यत्तथेव तत्‌ । | कहता हूँ वह सुनो । तुम जो कुछ कहते हो सो किन्तु मामत्रबीत्तातों नव वर्षाणि पञ्च च ॥२८॥ | विल्कुळ ठोक है । किन्तु पिताजीने सुझे आज्ञा दी थी a 1 ~ | कि बोदह में ध्य ~ उपित्या दण्डकारण्ये पुरं पथास्समाविश। 5 किर अयोश्यामे $ भरतायेद राज्य द आना; इस समय यह सम्पूर्ण राज्य मैं भरतको देता इदानीं भरतायेद राज्य दत्त मयाखिलम्‌ ॥२९॥ | हूँ ॥ २८-२९ ॥ अतः स्पष्ट. ही पिताजीने यह राज्य ततः पित्रैव सुव्यक्त राज्यं दत्तं तैव हि) | की दिया है और पैसे ही मुझे उन्होंने . दण्डकारण्यका राज्य दिया है॥ ३०॥ इसलिये हम दण्डकारण्यराज्य मे दत्त पित्रा तथैष च ॥३०॥ | दोनोंको ही परयहपूर्वक पिताजीके वचनोंको सफळ करना अतः पितुर्वचः कार्यमावाभ्यासतियज्ञतः | | "दिये | जो मह॒ष्य अपने पिताके बचनोंका उछछन पितुः तन्त्रो कर खेच्छापूर्वक वरतता है वह जीता हुआ भी मृतक- त्रो यस्तु वर्तते ॥२१॥। के समान है और शरीर छोडनेपर नरककों जाता है । | | सभ्‌ ९ | अयोध्याकाण्ड ९५ TERS क र का कपप स सग्य्येामुअुताकु स जीवन्नेव सृतको देहान्ते निरयं ब्रजेत्‌ । अतः तुम राज्य-शासन करो, हम दण्डकवनकी रक्षा तसाद्राज्य प्रशाधि त्वं चयं दण्डकपारकाः।।३२॥ | करेंगे ॥ ३१-३२ | भरतस्त्वनवीद्राम कामुको मूढधीः पिता । तब भरतजीने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा--“यदि जितो आन्तहृद्य उन्मत्तो यदि यक्ष्यत पिताजीने कामी, मूढबुद्धि, खीके वशीभूत, भ्रान्तचित्त स्रीजितो भ्रान्तहदय उन्मत्तो यदि वक्ष्यति । और उन्मत्त होनेके कारण ऐसा कह भी दिया है तो भी ' 'तत्सत्यरि ५ हु न उसे सत्य न मानना चाहिये; जिस प्रकार बुद्विमान्‌ J तयभिति न ग्राह आन्तवाकय यथा सुधी; २३ लोग श्रान्त पुरुपोंके वाक्यका आदर नहीं करते॥२३॥ श्रीरामजी बोळे--पिताजीने ख्रीवश, कामवरा न स्लीजितः पिता ब्यान कामी नैव मूढधीः । | अथवा मूढ़बुद्धि होकर ऐसा नहीं कहा। उन सत्यवादीने - © ज्ञा अक पूर्व प्रतिश्चतं तस्य सत्यवादी ददा भयात्‌ ॥३४॥ अपनी पूर्व्रतिज्ञातसार ही प्रतिज्ञा-मंगके मयसे ये बर h दिये थे ॥ ३४ ॥ महान्‌ पृरुपोको असत्यसे नरककी असत्याद्गीतिरधिका महतां नरकादपि । अपेक्षा भी अधिक भय हुआ करता है | मैं मी ऐसा करोमीत्यहमप्येतरसत्यं तस्य प्रतिश्रुतम्‌ ॥३५॥। | दी करूँगा' यह कहकर उनसे सत्य-प्रतिज्ञा कर चुका : RR SE हुँ ॥ ३५ ॥ फिर, मैं रघुबंशमें जन्म लेकर अपना कथ वाक्यमह ङुयामसत्य राघवा हि सन्‌ । वचन कैसे उलट सकता हूँ ! इत्युदीरितमाकर्ण्य रामस्य भरतोऽब्रवीत्‌ ॥३६॥|| रामजीका ऐसा कथन सुनकर भरतजौ बोले-- | ॥३६॥ “हे सुत्रत | पिंताजीके कथनानुसार मैं तो आपके तथच चीरवसनो बने वत्स्यामि सुब्रत । _ समान चौदह वर्षतक वल्कल-वत्न धारणकर बनमें चतुर्दश समास्तव तु राज्यं कुरु यथासुखम्‌ ॥३७॥ | गा और आप सुखपूर्वक राज्य भोगिये” || ३७॥ श्रीराम उवाच श्रीराम उवाच | श्रीरामजी वोळे--पिताजीने तुमको यह राज्य और पित्रा दते तवेबंतद्राज्य मह्य वन ददा । मुझे बनवास दिया है | अब यदि मैं इसका उल्टा करूँ व्यत्ययं यद्यहं कुर्यीमसत्यं पूर्ववत्‌ खितम्‌ ॥३८ | तो असत्य अ्योतका-यों ही रहता है ॥ ३८॥ . भरत उवाच | भरतजी बोले--( अच्छा, यदि आप बनसे नहीं A 1113 लौटना चाहते तो मुझे आज्ञा दीजिये, जिससे) मैं भी अहमप्यागमिष्याम सव त्वा लक्षणों यथा | | जनमे आकर लक्ष्मणके समान ही आपकी सेवा करूं, नोचन्प्रायोपवेशेन त्यजाम्येतत्फलेवरम्‌ ॥३९॥ | नहीं तो मैं अन-जल छोड़कर इस शरीरको , इत्येवं निश्चयं कृत्वा दर्भानास्तार्य चातपे । | त्याग दूँगा ॥ ३९॥ अपना ऐसा निश्चय प्रकट कर भरतस्यापि निर्वन्ध दृष्टा रामोऽतिविस्मितः । | ठसा हठ देखकर श्रीरामचन्द्जीने अत्यन्त विस्मित हो नेत्रान्तसंज्ञां गुरवे चकार रघुनन्दनः ॥४१॥ | गुरु वसिष्ठजीको नेत्रोसे संकेत किया ॥ ४१॥ एकान्ते भरतं प्राह चसिष्ठो ज्ञानिनां वर! | तब ज्ञानियोमे श्रेष्ट बसिष्ठजीने भरतको एकान्तम » 36 त्सनिशि छे जाकर कहा, “वत्स मैं जो कहता हू यह सुनिश्चित वत्स गुहं शश्वद सम वाक्‍्यात्तुनिवितय ॥४२। गद्य रहस्यकी बात सुनो ।।४२। भगवान्‌ राम साक्षात्‌ रामो नारायणः साक्षाद्रक्षणा याचितः पुरा। नारायण हैं । पृचकालमें ब्रह्माजीके प्राथना करनेपर रावणस्य बघार्थाय जातो दशरथात्मजः ॥४३॥ उन्होंने रावणको मारनेके लिये दहारथके यहाँ पुन्न- RET 7१, ५६ ४४ » के १. ०५७१६ ३५ A ९६ SII कथयाम्य्‌ ०२ ७०००७६७७७० ७ ७७७७७७७७०४ nd य योगमायापि सीतेति जाता जनकनन्दिनी । शेपोऽपि लक्ष्मणो जातो राममन्वेति सर्वदा ।४४। रावणं हन्तुकामास्ते गमिष्यन्ति च संशयः। क्ेकेव्या वरदानादि यद्यनिषठुरमाषणम्‌ ॥४५॥ सर्व देवकृतं नोचेदेवं सा भाषयेत्कथम्‌ । तस्मास्यजाग्रह तात रामस्य विनिवतने ॥४६। निवपेख महासैन्यैर्मातूभिः सहितः पुरम्‌ । रावणं सकुलं हत्वा शीघ्रमेवागमिष्यति ॥४७॥ इति क्त्वा गुरोवाक्यं भरतो विस्मयान्वितः । गत्वा समीपं रामस्य विस्मयोत्फुलोचनः ॥४८॥ पादुके देहि राजेन्द्र राज्याय तब पूजिते । तयोः सेवां करोम्येच यावदागमनं तव ॥४९। इत्युक्त्वा पादुके दिव्ये योजयामास पादयो! | रामस्य ते ददौ रामो भरतायातिभक्तितः ॥५०॥ शृददीत्वा पादुके दिव्ये भरतो रलभूपिते । रामं पुनः परिक्रम्य प्रणनाम पुनः पुनः ॥५१॥ भरतः पुनराहेदं भक्त्या गदूदया शिरा | नवपञ्चसमान्ते तु प्रथमे दिवसे यदि ॥५२॥ नागामिष्यसि चेद्राम प्रविशामि महानलम्‌ | बाढमित्येव तं रामो भरतं संन्यचतेयत्‌ ॥५३॥ ससैन्यः सघसिष्ठ्च शत्रुभधसहितः सुधीः । मातृमिर्गन्त्रिमिः सार्धं गमनायोपचक्रमे ॥५४।। कैकेयी राममेकान्ते ख़बन्नेत्रजलाकुला। ग्राज्ञलिः ग्राह हे राम तव राज्यविधातनय्‌ ॥५५॥ कृतं सया दुष्टधिया मायामोहितचेतसा | क्षमस्व मम दोरात्म्यं क्षमासारा हि साधृवः।।५६॥ अध्यात्मरामायण कभ [ सगे ९ TTT ee खूपसे जन्म छिया है ॥४३॥ इसी प्रकार योगमाया- ने जनकनन्दिनी सीताको रूपसे अवतार छ्या हैं | और दोपजी टक्ष्मणके रूपसे उत्पन्न होकर उनका अनुगमन कर रहे हैं ॥४४॥ वे रावणको मारना चाहते हैं इसलिये निस्सन्देह बनको ही जायेंगे | वीकेया के जो कुछ भी वरदान आदि और निष्ठुर भाषण | आदि कार्य हैं वे सब देवताओंकी प्रेरणासे ही हुए हं i । | नहीं तो वह ऐसे वचन केसे बोल सकती थी £ इस- | लिये हे तात ! तुम रामको ढोटानेका आग्रह छोड़ दो . ॥९५--४६॥ और भाई यत्रुष्न तथा सेनाके सहित | अयोष्याको छीट चलो; राम मी कुळसहित रावणका | संहार करके वहाँ शीघ्र ही आ जायेगे? ४७|| | ¦ गुरुजीके ये वचन सुनकर भरतको अति विस्मय हुआ और उन्होंने आथर्यचकित होकर श्रीरामचन्द्र” जीके पास जाकर कहा-॥४८॥ “हे राजेन्द्र! आप | मुझे राज्य-शासनके लिये अपनी जगत्पूज्य चरण- पाहुकाएँ दीजिये । जबतक आप छौटेंगे तवतक में उन्हींकी सेवा करता रहेगा 1” ॥४९॥ ऐसा कह भरतजीने उन्हें उनके चरणोंमे दो दिव्य पादुकाएँ ( खड़ाऊँ ) पहना दी । श्रीरामचन्द्र जीने भरतका भक्ति-माब देखकर वे खड़ाऊ उन्हें दे दीं ॥५०॥ भरतजीने वे रत्नजटित दिव्य पादुकाएँ लेकर श्रीरामचन्द्रजीकी परिक्रमा की ओर उन्हें वारम्बार प्रणाम किया ॥०१॥ तदनुसार, वे भक्तिवश गदगढ-बराणीसे बोले, “हे राम ! यदि चोदह वर्षके व्यतीत होनेपर आप पहले दिन ही अयोध्या न पहुँचे तो में महान्‌ अशिमें प्रवेश कर जाऊँगा [” तब रामचन्द्रजीने बहुत अच्छा! कहे भरतजीको विदा किया ॥ ५२-५३ | तदुपरान्त बुद्धिमान्‌ भरतजीने सम्पूर्ण सेना, वसिष्ठ, शन्नुष्न, समस्त माताओं तथा मन्त्रियोंक्रे साथ चलनेकी तैयारी की ॥५४॥ इसी समय कोकेयीने एकान्त स्थानमें नेत्रोमें जळ भरकर हाथ जोइकर औरामचन्द्रजीसे कहौ-“हे राम ! मांयासे सुग्धचित्त हो जानेके कारण मुझ कुबुद्विने तुम्हारे राज्याभिपेकमें विध्न डाळ दिया सो तुम मेरी इस कुठिरुताको क्षमा करना क्योंकि साधुजन सर्वदा क्षमाशील ही होते हैं। ५५-५६ ॥ आप साक्षात्‌ सयैव प्रेरिता -\ | हे सगे ९] तवं साक्षाद्विषणुरव्यक्तः परमात्मा सनातनः! मायामानुपरुपेण मोहयस्यखिलं जगत्‌। त्वयैष म्रेरितो लोकः कुरुते साध्वसाधु वा ॥५७॥ त्वुद्धीनामिद विश्वमस्वतन्त्र करोति किम । की यथा कृत्रिमनतेक्यों रृत्यन्ति कुहकेच्छया ॥५८॥ त्वदधीना तथा माया तर्तकी बहुरूपिणी । त्वयैव ओरिताऊह च देवकार्यं करिष्यता ॥५९॥ पापि पापमनसा कर्माचरमरिन्दस । अद्य प्रतीतोऽसि मम्‌ देचानामप्यगोचरः ॥६०॥ पाहि विश्वेश्वरानन्त जगन्नाथ नमोऽस्तु ते। छिन्धि खेहमयं पाशं पुत्रवित्तादिगोचरम्‌ ॥६१॥ त्वज्ज्ञानानलखङ्गेन त्वामहं शरणं गता । कैकेय्या वचनं शरुत्वा रामः सस्मितमन्रवीत्‌ ॥६२। यदाह मां महाभागे नानृतं सत्यमेव तत्‌ । घाणी तव बकत्राद्विनियता ॥६३॥ देवकार्यार्थसिद्धधर्थमत्र दोपः कुतस्तव । गच्छ त्वं हृदि मां नित्यं भावयन्ती दिवानिशम्‌ ॥ सर्वत्र विगतखेहा मङ्गकत्या मोक्ष्यसेऽचिरात्‌ । ' अहं सर्वत्र समद्‌ द्वेष्यो वा प्रिय एवं वा ॥६५॥ नारित मे कटपकस्येव भजतोऽनुभजाम्यहम्‌ । मन्मायामोहितधियो मामम्ब मनुजाकृतिम्‌ 1६६) सुखदु/खा्यनुगत जानन्ति न तु तत्वतः । . दिष्टया मद्दोचरं ज्ञानशचुत्पन्नं ते भवापहस्‌ ॥६७ स्मरन्ती तिषठ भवने लिप्यसे न च कर्मभिः । अयोध्याकाण्ड . TITTIES TCU STATIS ड डा ToT न ५ मन प धन न Toe न ऊ 9» १४४०४ ४४८ ४ ४८९७४० ३४ ४४ ४४ ५० ७४८ ४० ९० २३ १७०९ ४८ ३४ ९.” ९०४० ९/ ५७० ७” ९ ७४ ४१% ७, ७ HLS १९०६१ १० ७४० ६०४... ms ९७ विष्णु भगवान्‌, अव्यक्त परमात्मा और सनातन पुरुष हैं । अपने मायामय मनुष्यरूपसे आप समस्त संसार- को मोहित कर रहे हैं। आपकी ही प्रेरणासे छोग झुम अथवा अश्रु कर्म करते हैं || ५७ || यह सम्पूर्ण विश्व आपहोके अधोन है, अखतन्त्र होनेके कारण यह खयं कुछ भी नहीं कर सकता; जिस प्रकार कृत्रिम नत्तकियाँ (कठपुतलियाँ) सूत्रधार ( बाजीगर ) की इच्छानुसार ही नाचती है॥ ५८॥ उसी प्रकार नाना आकार धारण करनेवाळी यह मायारूपिणी नटी ` आपहीके अधीन है । और हे शत्रुदमन ! देवताओंका कार्य सिद्ध करनेकी इच्छावाळे आपहीके द्वारा प्रेरित होकर सुझ पापिनीने अपनी दुष्टबुद्धिसि यह पापकर्म किया था । आज मैंने आपको जान छिया, आप देवताओं- के भी मन और वाणी आदिसे परे हैं ॥ ५९-६० ॥ हे विखेश्वर ! हे अनन्त ! आप मेरी रक्षा कीजिये । हे जगन्नाथ ! आपको नमस्कार है । हे प्रभो ! में आपकी शरण हूँ। आप अपने ज्ञानाग्निरूप खडगसे मेरे पुत्र और धन आदिके स्नेह-बन्धनको काट डाल्यि !” कैकेयीके ये बचन सुनकर औरामचन्द्रजीने सुसकरा- कर कहा--॥। ६१-६२ ॥ “हे महामागे | तुमने जो कुछ कहा है वह ठीक ही है, मिथ्या नहीं । मेरी प्रेरणासे ही देवताओंकी कार्यसिद्विके लिये तुम्हारे सुखसे वे शाब्द निकले थे । इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है | अब तुम जाओ; अहर्निश निरन्तर मेरी ही भावना करनेसे तुम सवेत्र स्मेहरहिंत होकर मेरी भक्तिद्वारा शोध्र ही सुक्त हो जाओंगी। मैं सवत्र समदशी हूँ, मेरा कोई भी प्रिय या अप्रिय नहीं है ॥ ६३-६५ ॥ मायावी पुरुष जिस प्रकार अपनी ही मायासे रचे पदार्थोमें राग-द्वेष नहीं करता उसी प्रकार मेरा भी किसीमें राग-द्ेष नहीं है । जो पुरुष जिस प्रकार मेरा भजन करता है मैं भी ' बैसे ही उसका ध्यान रखता हूँ | हे मातः ! मेरी मायासे मोहित हो- कर लोग मुझे सुख-दुःखके वशीभूत साधारण मनुष्य जानते हैं । वे मेरे वास्तविक खरूपको नहीं जानते । तुम्हारा बड़ा भाग्य है जो तुम्हे संसार-भयको दूर करनेवाला मेरा तत्तज्ञान उत्पन्न हुआ है ॥ ६६-६७ ॥ तुम मेरा स्मरण करती हुई घरहीमें रहो, इससे तुम कर्म-बन्धनमें नहीं- बँधोगी ।” इत्युक्ता सा परिक्रम्य रामं सानन्दविस्मया॥६८॥ प्रणम्य शतश्चो भूमौ ययौ गेहं सुदान्विता । भरतस्तु सहामात्यैर्मादृभि्ुरुणा सह ॥६९॥ अयोष्यामगमच्छीप्रं राममेवाजुचिन्तयत्‌ । पौरजानपदान्सर्वानयोष्यायाद्ुदारधीः ॥७०॥ स्थापयित्वा यथान्यायं नन्दिग्रामं ययो स्वयस्‌। तत्र सिंहासने नित्यं पादुके स्थाप्य भक्तितः ॥७१॥ पूजयित्वा यथा रामं गन्धपुष्पाक्षतादिभिः । राजोपचारेरखिलेः प्रत्यहं नियतत्रतः ॥७२॥ फलमूलाशनो दान्तो जटावल्कलघारकः । अघःशायी ब्रह्मचारी शत्रधसहितस्तदा ।|७३॥ राजकार्याणि सर्वाणि यावन्ति पृथिवीतले । तानि पादुकयोः सम्यङ्निवेदयति राघबः॥७४॥ गणयन्‌ दिवसानेच रामागमनकाङ्कया | स्थितो रामापितमनाः साक्षाहक्षमुनियथा ॥७५॥ रामस्तु चित्रकूटाद्रौ बसन्युनिभिराइतः । सीतया लक्ष्मणेनापि किञ्चित्काल्चुपावसत्‌ ॥७६॥ वागराश्च सदा यान्ति रामदर्शनलालसाः । चित्रकूटखितं ज्ञात्वा सीतया लक्ष्मणेन च ॥७७॥ दष्दवा तज्जनसम्वाधं रामस्तत्याज तं गिरिम्‌ । दण्डकारण्यगमने कार्यमप्युचिन्तयन्‌ ॥७८॥ अन्ययात्सीतया रत्रा झत्रेराश्मञ्चत्तमम्‌ । स्त्र सुखसंवासं जनसम्बाधवा्जितम ॥७९॥ गत्वा मुनिग्नुपासीनं भासयन्तं तपोवनम्‌ । दण्डवस्रणिपरयाह रामोऽहमभिषादये ।।८०॥। पितुराज्ञां पुरस्कृत्य दण्डकानहमागतः । वनवासमिपेणापि अन्योऽहं दर्शनात्तव ॥८१॥ ) अध्यात्मरामायण ~ [ सगे ९. रामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर कैकेयीने आनन्द और विस्मयपूर्वक रामकी परिक्रमा की और प्रथिवी- पर शिर रखकर उन्हें सैकड़ों वार प्रणाम ळर प्रसन्नता- पूर्वक अपने घरको चछी तथा भरतजी मन्त्रिण, माताओं और बसिष्ठजीके साथ श्रीरामचन्द्रजीका ही स्मरण करते हुए झीघ्रतासे अयोध्याको चले। ।. उदार-बुद्धि भरतजी समस्त पुरवासी और देश चासियोंको यथायोग्य अथोध्यापुरीमें बसाकर खयं नन्दिग्रामको चळे गये । वहाँ एक सिंहासनपर उन दोनों पाहुकाओंको रखकर वे श्रीरामचन्द्रजीके समान ही उनकी नित्यप्रति भक्तिपूर्वक गन्ध, पुप्प और अक्ष- तादि सम्पूर्ण राजोचित सामग्रीसे पूजा करने छगे। इस प्रकार भरतजी फल-मूळ खाते, इन्द्रिय-दमन करते, जटा ओर वल्कल धारण किये, पृथिवौपर शयन करते और ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए शत्रुघ्तके साथ रहने लगे॥ ६८-७३ ॥ पृथिवीके जितने राजकार्यं होते उन सबको वे रघुश्रेष्ठ ( भरतजी) पादुकाओंके सामने निवेदन कर दिया करते थे ॥ ७४ ॥ इस प्रकार रामचन्द्रजीके आगमनकी प्रतीक्षासे अत्रधिके दिन- गिनते इए वे राममें ही मन छगाकर साक्षात्‌ बरह्मर्पिके समान रहने लगे॥ ७५॥ इधर रामचन्द्रजीने भी मुनियोंते घिरे रहकर सीता और ठक्ष्मणके साथ चित्रकूट-पर्वतपर कुछ दिन विताये ॥ ७६॥ रामचन्द्रजीको सीता और टक्ष्मणके साथ चित्रकूटपर विराजमान सुनकर आसपासके नगर- निवासी उनके दर्शनोंकी इच्छासे सदैव आया करते थे ॥ ७७ || रामचन्द्रजीने उस भीड़-भाड़को देखकर और अपने दण्डकारण्यमें जानेके कार्यको भी बिचारकर उस पर्वतको छोड़ दिया || ७८ ॥ बहाँसे चलकर , वे सीता तथा लक्ष्मणके सहित अत्रि मुनिके अति उत्तम और जन-समूह-शून्य आश्रममें आये जो सब्र प्रकार पुखपूर्वक रहनेयोग्य था ॥'७९ ॥ वहाँ पहुँचनेपर उन्होंने अपने आश्रममें विराजमान और सम्पूर्ण तपोवनको प्रकाशित करते हुए मुनीश्वरके पास जा उन्हें दण्डवत-अणाम करके कहा---“ै राम आपका अभिवादन करता हूँ ॥ ८० ॥ मैं पिताकी आज्ञासे दण्डकारण्यमें आया हूँ | इस समय वनवासके ' मिससे भी आपका दर्शन कर मैं कृतार्थ हो गया । 7८१] सर्ग ९] अयोध्याकाण्ड ९९ RRR SASSO oon रत्वा रामस वचनं रामं ज्ञत्वा हरिं परम्‌ । पूजयामास विधिवद्भक्त्या परमया मुनि! ॥८२॥ चन्येः फः कुतातिथ्यमुपविष्ं रघूत्तमम्‌ । सीतां च लक्ष्मणं चेव सन्तुष्टो चाक्यमन्रनीत्‌ ॥८३॥ मार्या मेऽतीव संदद्धा हनद्वयेति विश्रुता । तपश्वरन्ती सुचिरं थमेज्ञा ध्ैवत्सला ॥८४॥ अन्तस्तिष्ठति तां सीता पश्यत्वरिनिपूदन । तथेति जानकीं प्राह रामो राजीवलोचनः ॥८५॥ गच्छ देची नमस्कृत्य शीध्रमेहि पुनः शुभे । तथेति रामवचनं सीता चापि तथाऽकरोत्‌ ॥८६॥ दण्डवत्पतितामग्र सीतां इष्ट्राऽतिदृष्टधीः । अनग्नयासमालिङ्य बर्से सीतेति साद्रम्‌॥८७। दिव्ये ददौ कुण्डले हे. निमिते विश्वकर्मणा । ` हुकले द्वे ददो तस निमठे भक्तिसंयुता ॥८८॥ अङ्करागं च सीताये ददौ दिव्यं शुभानना । न त्यक्ष्यतेऽङ्गरामेण शोभा त्वां कमछानने ॥८९॥ पातिव्रत्यं पुरस्क्रत्य राममन्वेहि जानकि | कुशली राघो यातु त्वया सह पुनस्‌ ॥९०॥ भोजयित्वा यथान्यायं रामं सीतासमन्तितम्‌ । ५ लक्षमणं च तदा रामं पुनः प्राह कृताञ्जलिः ॥९१॥ ५ राम त्वमेद भुवनानि विधाय तेपां संरक्षणाय सुरमानुपतियगादीचू । देहान्विभर्पि न च देहगुणोविलिप्त- रामचन्द्रजीके ये वचन सुन मुनीश्वरने उन्हें . साक्षात्‌ परब्रह्म जान उनकी अत्यन्त भक्तिपूर्वक विधिवत्‌ पूजा की ॥ ८२ ॥ फिर बन्य फलोंसे उनका आतिथ्य-सत्कार कर उन्होंने आसनपर विराजमान रघुनाथजी, महारानी सीता और छक्ष्मणजीसे प्रसन्नता- पूचक इस प्रकार कहा---॥ ८३ ॥ “मेरी भार्या अनसूया' नामसे विख्यात है, बह अति बृद्धा है, बहुत दिनोंसे तपस्या करती है, धर्मको जाननेबाली है और धर्ममें प्रेम रखनेवाली है ॥ ८४ ॥ इस समय वद्द छुटीके भीतर है । हे शत्रुदमन राम | सीता उससे मिल ले |” तब कमललोचन रामचन्द्रजीने बहुत अच्छा! कह जानकीजीसे कहा-।८५॥ “हे झुमे | जाओ तुम शीघ्र ही देवी अनसूयाजीको प्रणाम कर आओ!” सीताजीने 'वहुत अच्छा' कह रामचन्द्रजीकी आज्ञाका पालन किया ॥ ८६॥ अनसूयाजीने अपने सम्मुख सीताजीको दण्डके समान पड़ी देख अति हर्षित हो 'बेटी सीता ! ऐसा कहकर आदरपूर्वक आलिंगन किया और भक्तिसहित उन्हें विश्वकामीके बनाये हुए दो दिव्य कुण्डल और दो खच्छ रेशमी साड्या दी॥ ८७-८८ ॥ सुन्दर मुखवाळी अनसूयाजीने उन्हें दिव्य अंगराग भी दिया और कहा--“हे कमल्मुखि | इस अंगरागके ळगानेसे तेरे शरीरकी शोमा कभी कम न होगी ॥ ८९ ॥ हे जानकि ! तुम पातिव्रत्यका पालन करती हुई सदा रामकी ही अनुगामिनी रहना । रघुनायजी तुम्हारे साथ कुशल्पूवंक घर छोटे” ॥ ९०॥ फिर उन्होंने विधिपूवेक लक्षमण और सीताजीके सहित श्रीरामचन्द्रजी- को भोजन कराया । तत्पश्चात्‌ उन्होंने फिर श्रीरामजी- से हाथ जोड़कर कहा--॥। ९१॥ “हे राम ! इन सम्पूर्ण भुवनोंकी रचना करके आप ही इनकी रक्षाके लिये देवता, मनुष्य और तिर्यगादि योनियोंमें शरीर धारण करते हैं, तथापि देहके गुणोंसे आप लिप्त नहीं होते । सम्पूर्ण संसारको मोहित करनेबाळी माया मी आपसे स्त्वत्तो वि मेत्यखिलमोहकरी च माया॥९२॥| सदा डरती रहती है” ॥ ९२॥ इति औमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९॥ COSTS समाद्तमिदमयोध्याकाण्डस्‌ ND 4 अब श्रीसीतारासाभ्यां नसः ह क ९ न id '> 30340 क RN ANN RN {OS RYTON NN NON NNN) 1 २. शो की स्वा -) ~ 9१: २ ७४ वि रि क ~ ` Se TN ~ ke ~ हू क धर रु Ae अका कन्येला हि ति तन चो ~ भ्र ~ as क र. * _ 5५ er Se “ ५ _ 55८५ cay oe a - ee OC ७ हे A) Ne २ S Viren ys ११६ ~ ° च चर न * ६ १५ i = ee क या हि ~ CN Ce os श्रीराम-जटायु त क £ RRR मनन 5. we न 1 शु ददश ह! कणठप्राग दोनं त्वा राघवो त्द्‌ > तच्द्र डुश्खाश्र॒व्वतछोंचनः ॥ यी स्ताभ्यां संस्पृशन्‌ रामो हस्ताभ्य ) ( अ० रा० अर० ८ | ३० 3 अध्यात्मरामायण अ्रण्युकाएण्डु प्रथम सर्ग विराध-वच । श्रीयहादेव उवाच अथ तत्र दिनं स्थित्वा प्रभाते रघुनन्दनः । ` खात्वा मुनि समामन्त्य प्रयाणायोपचक्रमे ॥ १॥ मुने गच्छामहे सर्वे सुनिमण्डलमण्डितम्‌ । विपिनं दण्डकं यत्र त्वमाज्ञातुमिदाईसि।२॥ मार्गप्रदर्शनार्थाय शिष्यानाज्ञप्तुमहीसे । रुरा रामस्य वचनं प्रहस्यात्रिर्महायश्ा! । आह तत्र रघुश्रेष्ठ राम राम सुराश्रय॥ ३॥ सर्वस्य मागंद्र्टा त्वं तव को मार्गदर्शक! । तथापि दर्शयिष्यन्ति तव लोकाचुसारिणः ॥ ४॥ इति शिष्यान्समादिक्य स्वयं किञ्चित्तमन्वगात्‌। रामेण वारितः प्रीत्या अत्रिः स्वभवनं ययौ ॥ ५॥ क्रोशमात्रं ततो गत्वा ददर् महतीं नदीम्‌ । अत्रेः शिष्यानुवाचेदं रामो राजीवलोचनः ।। ६॥। नद्याः सन्तरणे कश्चिदुपायो बिद्यते न वा । चुस्ते विद्यते नोका सुरा रघुनन्दन ॥ ७॥ श्रीमहादेबजी बोले--है पार्वति ! उस. दिन अत्रि मुनिके आश्रममें ही रहकर दूसरे दिन प्रातःकाळ स्नान करनेके अनन्तर श्रीरघुनाथजीने मुनिवरकी सम्मतिसे चळनेकी तैयारी की || १ ॥ वे: बोले-“है सुने ! हम सब सुनिमण्डळीसे सुशोभित दण्डकारण्यको जाना चाहते हैँ, अतः आप हमें आज्ञा प्रदान कीजिये ॥२॥ और हमें मागे दिखानेके लिये कुछ शिष्योंको आज्ञा दीजिये ।” रामजीका यह कथन सुनकर मंहायशाखी अत्रि सुनि श्रीरघुनाथजीसे हसकर बोले--“हे राम ! हे देबताओंके आश्रयखरूप ! सबके मागदशक तो आप हैं, फिर आपका मागंदर्शक कौन बनेगा ? तथापि इस समय आप'ळोक-न्यवहारका अनुसरण कर रहे हैं | अतः मेरे शिष्यगण आपको मागे दिखानेके लिये जायँगे? ॥ ३-४॥ तदनन्तर शिषष्योंको आज्ञा दे ' मुनिवर अत्रि खयं भी कुछ दूरं रामचन्द्रजीके साथ गंये और फिर उनके ग्रीतिपूर्वक मना करनेपर अपने आश्रमको छौट आये ॥ ५॥ एक कोश जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने एक बहुत बड़ी नदी देखी । तब कमळनयन रघुनाथजीने अत्रिके शिष्योंसे इस प्रकार पूछा--॥ ६ ॥ “हे ब्रह्मचारियो ! नदीको पार करनेका कोई उपाय है या नहीं £” तब : शि्ष्योने कहा--“हे रघुनन्दन ! यहा एक सुदृढ़ ' नौका है ॥ ७॥ हम उसमें चढ़ाकर .आपको एक 1 t t ` राक्षसैयोररूपैश्च॒ सेवितं प्रविश्य विपिनं घोरं रामो लक्ष्मणमत्रवीत्‌॥११॥ *-.. १०४ तारयिष्यामहे युष्मान्वयमेव क्षणादिह | ततो नावि समारोप्य सीतां राघवलक्ष्मणो || ८॥ धषणात्सन्तारयामासुर्नदीं मुनिकुमारका! । रामाभिनन्दिताः सर्वे जग्सुत्रेरथाश्रमम्‌॥ ९॥ : तावेत्य विपिनं पोरं ्िह्लीङ्कारनादितम्‌ । नानासृगगणाकीणं सिंहच्याघ्रादिभीषणम्‌॥१०॥ रोमहर्षणम्‌ । इतः परं प्रयतेन गन्तव्यं सहितेन मे । धदुर्गुणेन संयोज्य शरानपि करे दधत्‌ ॥१२॥ अग्ने यास्याम्यहं पश्चाच्यमन्वेहि धनुर्धर! । आवयोमेध्यगा सीता मायेवात्मपरात्मनोः ॥१ १॥ चक्षुथारय सर्वत्र दृष्ट रक्षोमयं महत्‌ । विद्यते दण्डकारण्ये थुतपूर्वेमरिन्दम ॥१४॥ इत्येवं भाषमाणो तौ जग्मतुः सार्थयोजनम्‌ । तरेका पुष्करिण्यास्ते कण्हारकुुदोत्पलैः ॥१५॥ अम्बुजे? शीतलोदेन शोभमाना व्यच्श्यत । तत्समीपमथो गत्वा पीत्वा तत्सलिलं शुभम्‌।१६॥ उषुर्ते सलिलाम्याशे क्षणं छायायुपाश्रिता! । ततो दइशुरायान्तं महासश्यं भयानकम्‌ ॥१७॥ करालदंड्रवदनं भीषयन्तं स्वगजितेः । वामांसे न्यस्तशूलाग्रग्रथितानेकमानुपम्‌ ॥१८॥ सक्षयन्तं गजव्याप्रमहिषं वनगोचरम्‌ | ज्याऽऽरोपितं धुत्वा रामो लक्ष्मणमन्रवीत्‌ १९ पञ्य श्रातर्महाकायो राक्षसोऽयश्चुपागतः । आयात्यभिदठसं नोऽग्ने मीरुणां भयमावहन्‌ ॥२०) सज्जीकृतधतुसिष्ठ भा भैजैनकनन्दिनि | अध्यात्मरामायण I [ सर्ग १ क्षणमे ही नदीके उस पार पहुँचा दंगे |” तब झुनिं- कुमारोंने सीताके सहित राम और छक्ष्मणको नौकामें चढ़ाकर एक क्षणमात्रमें नदीके उस पार पहुँचा दिया | और फिर रामचन्द्रजी द्वारा प्रशासित हो अत्रि मुनिके आश्रमको लोट आये ॥ ८-९ ॥ ® तब वे झिल्लियोंकी झनकारसे गुञ्जायमान, विविध है वन्य पश्चुओसे पूर्ण और -सिंह-व्याप्र आदि हिंख पद्ञुओंसे भयानक एक घोर वनमें पहुँचे | १०॥ भयंकर रूपधारी राक्षसोंसे सेवित उस रोमाञ्चकारी घोर वनमें घुसकर श्रीरामचन्द्रजीने छक्ष्मणजीसे कहा-- ॥ ११॥ “यहाँसे तुम्हें बहुत सावधान होकर हमारे साथ चलना होगा । मैं धनुपपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर और हाथमें वाण लेकर आगे-आगे चलता हूँ और तुम धनुप धारण कर पीछे चलो, तथा जीव और परमात्माके चीचमें रहनेवाळी मायाके समान सीता हमारे बीचमें चलें || १२-१३॥ हे अरिन्दम | सव ओर सावधानीसे निगाह रक्खो | हमने पहले जैसा सुना था उसीके अनुसार इस दण्डकारण्यमें राक्षसोंका अत्यन्त . भय दिखायी देता है” ॥ १४॥ इस प्रकार आपसमें बातचीत करते वे डेढ़ योजन (छः कोश ) निकल गये । वहाँ कुमुद, कल्हार और कमळादिसे सुशोभित एक पुष्करिणी (तळाई) थी ॥ १५॥ वह कमळ्त्रन और शीतळ जलसे अति सुन्दर दीख पड़ती थी | उन्होंने उसके निकट जाकर उसका शीतर जल पान किया॥ १६॥ और कुछ देरके लिये जळके किनारे बृक्षकी छायामें बैठ गये | उसी समय उन्होंने एक महा बलवान्‌ और भयानक राक्षस आता देखा ॥ १७ ॥ उसका मुख तीक्ष्ण दाढोंसे पूर्ण था, वह अपनी गर्जनासे अत्यन्त भय उत्पन्न करता था और उसके ' बाँये कन्धेपर एक त्रिशूल रखा था जिसमें वहुत-से मनुष्य विंघे हुए थे॥ १८ || बह बहुत-से जंगळी हाथी, सिंह और भेंसोंको खाता हुआ आ रहा था। उसे देखकर श्रीरामचन्द्रजीने प्रत्यक्षा चढ़ाये हुए अपने धनुषको उठाकर लक्ष्मणजीसे कहा--॥ १९ ॥ “भाई! देखो, हमारे सामने यह भीरु पुरुषोंको डरानेवाला उग्ररूप महाकाय राक्षस आ रहा है || २०॥ तुम धनुषपर चाण चढ़ाकर सावधान हो जाओ; जानकि ! तुम डरना मत !” ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी घनुपपर सगे १] अरण्यकाण्ड १०५ 20९८0५७७.७१९९./९७७७४३ ७७५७७९६. _ इत्युक्त्वा वाणमादाय खितो रास इयाचल! ।२१। स तु दृष्ट्या रमानाथं लक्ष्मणं जानकीं तदा । अइहासं ततः कृत्वा भीषयन्निदमन्रवीत्‌ ॥२२॥ कुरै युवां बाणतूणीरजटावर्कलधारिणौ । सनिवेषधरो बालौ ख्रीसहायौ सुदुर्मदौ ॥२३॥ सुन्दरो घत भे वक्‍त्रप्रवि्टकवलोपमो । किमथेमागतो घोरं घनं व्यालनिषेवितम्‌ ॥२४॥ चत्वा रक्षोबचो रामः स्मयमान उवाच तम्‌ | अहं रामस्त्वयं आता लक्ष्मणो मम सम्मतः॥२५॥ एषा सीता मम प्राणवछसा वयमागताः । पिठृवाकं पुरस्कृत्य शिक्षणार्थं भवादृशाम्‌ ॥२६॥ श्रुत्वा तद्रांमगचनमइहासमथाकरोत्‌ । व्यादाय वकत वाहुभ्यां झूलमादाय सत्वरः॥२७। मां न जानासि राम त्वं पिराघं लोकविश्रुतम्‌ | jes ne ५०९०५ %२५०७०९/०५०७८+क- Ss वाण चढ़ा पर्वतके समान निश्चळ होकर खडे गये ॥ २१ | तदनन्तर उस राक्षसने राम, लक्ष्मण और जानकीजी- को देखकर बड़ा अट्टहास किया और सबको भयभीत करते हुए इस प्रकार कहा-- २२ ॥ “अरे बाळको ! बाण, तूणीर और जटा-बल्कळ आदि सुनिवेष धारण किये तुम कोन हो ? तुम्हारे साथमें एक खरी है और तुम बड़े मदोन्मत्त दिखायी देते हो | २२ ॥ तुम बड़े सुन्दर हो और मेरे मुखमें जानेवाले ग्रासके समान हो । हाय | सपोदिकोंसे पूर्ण इस घोर वनमें तुम किसल्यि आये हो £” ॥ २४॥ hn ह राक्षसके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उससे मुसकाकर कढा--“मेरा नाम राम है और .यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है ॥ २५ ॥ तथा यह रमंणी मेरी प्राणप्रिया सीता है । हम पिताकी आज्ञासे तुम-असोंको शिक्षा देनेके लिये इस बनमें आये हैं” ॥ २६॥ ' रामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर वह ठट्टा मारकर हँसने र्गा और उसने मुंह फेंछाकर तुरन्त ही अपने हाथोंमें त्रिशूल उठा लिया || २७ ॥ और बरोछा--“राम! क्या तुम मुझे नहीं जानते ? मैं जगत्रसिद्ध विराध नामक राक्षस हूँ । मेरे ही भयसे समस्त मुनिजन इस मङ्भयान्सुनयः सर्वे त्यक्त्या वनमितो गता$॥२८॥| इनको छोड़कर चळे गये हैं ॥ २८॥ यदि तुम्हे यदि जीवितुमिच्छाऽस्ति त्यकत्वा सीतां निरायुधी || जीनेकी इच्छा है तो सीताको छोड़कर बिना अख झोके भाग जाओ, नहीं तो मैं अमी तुम दोनोंको पलायत न चेच्छीप्रं भक्षयामि युवामहम्‌ ॥२९॥ | खा जाऊँगा” ॥ २९॥ इत्युकत्वा राक्षसः सीतामादातुमभिदुदरुवे । ऐसा कह वह राक्षस सौताजीको पकड़नेके लिये उनकी ओर दौड़ा । तब रामचन्द्रजीने हँसते इए रामश्चिच्छेद तद्वाइ शरेण प्रहसन्निव ॥३०॥ | अपने बाणसे उसकी भुजाएँ काट डाळी | ३०॥ ततः क्रोधपरीतात्मा व्यादाय विकटं मुखम्‌। राममभ्यद्रवद्रामशिच्छेद पदद्वयं विराधस्य तदद्भुतमिवाभवत्‌ ॥२२॥ ततः सर्प इवास्येन असितुं रासमापतत्‌ । ' ततोऽर्थचन्द्राकारेण वाणेनाख महच्छिरः ॥३३॥ इसपर वह अत्यन्त क्रोधसे सन्तत हो अपना विकराळ मुख फाड़कर रामचन्द्रजीकी ओर दोड़ा | तब . श्री- परिधावतः ॥ हे १॥। | रघुनाथजीने अपनी ओर आते हुए विराधके दोनों पैर काट डाले | यह बड़ा ही आश्चये-सा हो गया ॥ ३१-३२ ॥ तदनन्तर, सर्पके समान अपने मुखसे ही रामजीको निगळं जानेके लिये वह उनकी ओर बढ़ा । तब भगवान्‌ रामने एक अद्धेचन्दाकार वाणसे उसका महान्‌ शिर काट डाछा । तब वह रुधिरसे चिच्छेद ` रुघिरोवेण पपात भरणीतले। । छथपथ होकर तत्का एथिचीपर गिर पड़ा । इस प्रकार १४ १६ अध्यात्मरांमायणं [सर्ग १ ळूूळूळळळळूूळळवववव्व्व्््ल््््व्क्््क््व्व्क्््््प्टट्टयययप्वपय्य्पप्प्यययपप्पपप्प्य्प्यय्धय्या १ I ३००७४४ Ue ४४6 ७४० ७४७ ३ penser रअञअञअडःस+:स:,स:स:स,सरजसससससदसससकस4/ससऊससनसऊ>नसनसऊससससससस्‍्-ण्/णण्लूर- ततः सीता समालिझूय प्रशशंस रघूत्तमम्‌ ॥३४॥ | उसे मरा देख श्रीसीताजीने ररे भगवान्‌ रामका दम आउिंगनकर उनका भूरि-भूरि प्रशांसा की ॥३३-३४॥ ततो दुन्दुभयो नेदुदिवि देवगणेरिताः । उस समय आकाइामें देवगण दुन्दुमी बजाने को, अप्सराएँ प्रसन्नतापूर्वक नाचने छगीं और गन्धव 6 © ५ -नतुतुशाप्सरा दृष्टा जयुगेन्धवेकिच्नराः ॥र५॥ | किनरगण गाने छो | ३५॥ विराधकायादतिसुन्दराकृति- इसी समय विराधके मृत शरीरसे आकारत ट विभ्राजमानो विमलाम्परावृतः । सूर्यदेवके समान एक सुन्दर वखोसे सुशोभित ओर प्रतप्तचामीकरचारुभूषणो तपाये हुए सुवर्णालंकारोंसे सुसज्जित अति सुन्दर | पुरुष प्रकट हुआ ॥३६॥ उस पुरुषने शरणागत व्यदइ्यतागरे गगने रवियंथा ॥२६॥ | =. दुःख दूर करनेवाले, संसार-सागरसे पार प्रणम्य राम प्रणवातिहारिणं करनेवाले, दयामय श्रीरामचन्द्रजीको प्रसनचित्तसे प्रणाम सवश्रवाहपरस घुणाकरस्‌ | | कर उन प्रसन्नचित्त और शरणागतोके सकल दुःख दूर प्रणम्य भूयः प्रणनाम दण्डवत्‌. करनेवाले प्रभुको फिर भी दण्डके समान पुथिबीपर ग्रपन्नसवातिहरं प्रसन्नधीः ॥३७)।। | लोटकर बारम्बार प्रणाम किया ॥ ३७॥ विराध उवाचः चिराध बोला--हे कमल्दळलोचन श्रीराम ! में बिमलतेजोमय विद्याधर हूँ । मुझे पूर्वकालमें विना कारण ही क्रोध करनेवाले श्रीदुर्वासाजीने शाप दिया था सो आज आपने मुझे शाप-ुक्त कर दिया ॥ ३८॥ अब आप ऐसी कृपा करें जिससे मविष्यमें मुझे संसार" बन्धनको दूर करनेवाली आपके चरणारविन्दोंकी स्मृति सर्वदा बनी रहे, मेरी बाणी सर्वदा आपका सृतिः सदा मेऽस्तु मबोप्नान्तये । नामसंकीर्तन करती रहे, कान आपका कथामृत पान सन्नामसङ्कातेनमव वाणी करते रहें, हाथ आपके चरणकमलोंका पूजन करते करोतु मे कर्णपुटं स्वदीयस्‌॥३९॥ रहें और इसी प्रकार शिर आपके चरणयुगलोंमे प्रणाम श्रीराम राजीवदलायताक्ष विद्याधरोऽहं विमलम्रकाशः । दु्वांससाऽकारणकोपसूतिना शक्तः पुरा सोऽद्य विमोचितस्त्वया ।३८। इतः परं स्वञ्चरणारविन्द्योः . कथाडुतं पातु करयं ते करता रहे॥ ३९-४० ॥ हे विद्यु्धज्ञानस्वरूप भगवन्‌ ! पादारचिन्दाचनमेव ङुर्यात्‌। | आपको नमस्कार है। आप आत्मारूपसे सवे शिरथ ते पादथुगप्रणामं रमण करनेवाले होनेसे राम हैं, (अपनी मायाके सहित करोतु नित्यं भवदीयमेषम्‌ ॥४०॥।| विराजमान होनेसे युगलमूति) श्रीसीता-राम हैं और नमस्तुभ्यं भगवते विश्वुद्धज्ञानमूर्तये । | संसारके रचनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ ४१ ॥ आत्मारामाय रामाय सीतारामाय' वेधसे ॥४१॥ हे राम ! र क रारण हूँ, आप मेरी रक्षा द t सि अ्रष्ठ मैं देवलोकक अपन्न पाहि सां राम यास्यामि त्वदजुज्ञया । । हे रघुश्रेष्ठ | आपकी आज्ञसे मैं देवलोको न | है जा रहा हूँ; आप ऐसी कृपा कीजिये जिससे आपकी दचलाक रुभेष्ठ माया मां माइणोतु ते ॥४२॥ | माया मुने आच्छादित न करे || ४२॥ इति विज्ञापितस्े झो रघुनन्दनः पि वि ज्ञ पवे प्रसन्नो रघुन द्‌न | विराधके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर महामति श्री- ददा बरं तदा प्रीतो विराधाय महामतिः ॥४३॥ रघुनाथजीने उसे प्रसन्न होकर यह बर दिया--] ४३ ॥ सर्ग २] अरण्यकाण्ड 7 गच्छ विद्यापराशेषमायादोषगुणा जिताः त्वया मदशेनात्सद्यो मुक्तो ज्ञानवतां वर! ॥४४॥ मङ्भक्तिदूरुभा लोके जाता चेन्छुक्तेदा यतः। र अधसतव मक्तिसम्पन्नः परं याहि ममाज्ञया ॥४५॥ रामेण रक्षोनिधर्न सुघोरं शापादियुक्तिर्षरदानमेवस्‌ । विद्याधरत्वं पुनरेव लब्धं रामं गृणन्ञेति नरोऽलिलार्थान्‌॥४६॥ | “हे विद्याधर ! अब त्‌ जा । तूने मायाके सम्पूर्ण गुण- दोषोंको जीत लिया है । तू ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ है और मेरे दशनके प्रमाबसे तुरन्त सुक्त हो गया है॥ ४४ ॥ संसारमें मेरी भक्ति अत्यन्त दुम है, क्योंकि" वह उत्पन्न होती है तो अबश्य मुक्ति देनेवाली होती है । त्‌ मेरी भक्तिसे सम्पन्न है, इसलिये मेरी आज्ञासे तू परमधामको जा” ॥ ४9५ ॥ इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीद्वारा किये हुए इस भयं- . कर राक्षसके वध, उसके शापसे मुक्त होने, बरदान पाने और पुनः विद्याधरत्व ग्राप्त करनेके वृत्तान्तको जो पुरुष श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते हुए पढ़ता या सुनता है वह अवश्य सम्पूर्ण अभिळषित पदार्थको पाता है ॥ ४६॥ es इतिं श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे प्रथमः सर्गः || १॥ I) द्वितीय सगे शरभंग तथा सुतीक्ष्ण आदि सुनीशवरोसे भेंट । श्रीमहादेव उवाच बेराघे खमते रामो लक्ष्मणेन च सीतया । गाम शरभङ्गस्य पनं सर्वसुखावहम्‌ ॥ १॥ एरभङ्गस्ततो दृष्ट्या रामं सौमित्रिणा सह । आयान्तं सीतया सार्थ सम्म्रमादुत्थितः सुधीः ।२। अभिगम्य सुसम्पूञ्य विष्टरेपूपवेशयत्‌ | आतिथ्यमकरोत्तेपां कन्दसूलफलादिभिः ॥ रे ॥ प्रीत्याऽऽह शरभङ्गोऽपि रामं भक्तपरायणम्‌ । वहुकालमिंदैवासं तपसे कृतनिश्चयः ॥ ४ ॥ तव सन्दीनाकाङ्की राम त्यं परमेश्वरः | अद्य मत्तपसा सिद्धं यत्युण्यं बहु विधते । श्रीमहादेवजी जोले--हे पार्वति ! विराधके स्वग सिधारनेपर औराम'न्द्रजी लक्ष्मण और सीताजीके साथ शरभंग सुनिके सर्वसुखदायक तपोवनको गये ॥ १ ॥ मतिमान्‌ शरमंग श्रीरामचन्द्रजीको सीता और लक्ष्मणके सहित आते देख सहसा उठ खडे इए ॥ २॥ और आगे बढ़कर उनकी भली प्रकार पूजाकर उनको आसनपर बैठाया तथा कन्द-मूर-फछादिसे उनका आतिथ्य-्सत्कार किया ॥ ३॥ तदनन्तरं मुनिवर शारमंगने मक्तवत्सछ भगवान्‌ रामसे प्रीतिपूर्वक कहा- “मैं बहुत काळसे आपके दर्शनोंकी आकांक्षासे तपस्याका निश्चयकर यहीं रहता हूँ॥ ४ ॥ हे राम ! आप साक्षात्‌ परमात्मा हैं। मुझे तपस्याके द्वारा जो बहुत-सा पुण्य प्राप्त हुआ है बह सत्र आज आपको तत्स तव दास्यामि ततो मुर्ति बजाम्यहम्‌ ॥ ५ ॥| देकर मैं मोक्षपद प्रात कळशा ॥ १ समर्प्यं रामस्य महत्सुपुण्यः फूलं विरक्त! शरभङ्गयागा । ऐसा कह महाविरक्त मुनिवर झरमंग अपना महान्‌ पुण्य-फळ श्रीरामचन्कजीको समर्पण कर सीताके सहित _ a TN कि] , es ५३ SS | १०८ अध्यात्मरामायण [सर्ग २ भभ चितिं समारोहयदप्रमेयं | अप्रमेय भगवान्‌ रामको प्रणामकर सहसा चितापर चढ़ राग ससीतं सहसा ग्रणम्य॥ ६॥; गये ॥ ६॥ उस समय त मन-ही-मन र्न्तौ वशचिर ५ दर्बादछके समान स्यामवर्ण, कमलनयन, चौराम्वरधारी, खाद व, राममरोपत्स्थ स्निग्ध जटाजूटधारी श्रीरामचन्ट्रजीका सीता और ल दूवादढर्यामठमम्यमा इस्‌ ' ' लक्ष्मणके सहित बहुत देरतक ध्यान करते रहें ॥ ध्‌ | आ सहाय. सकष तम्‌॥७॥ ( फिर मन-ही-मन कहने लगे- 2“अहो ! स सामे को वा दयालुः स्पृतकामपेनु- श्रीरघुनाथजीकी छाइकर स्मरण करनंबालका कामनाओ- रन्यो जगत्यां रघुनायकादहो । स्मृतो मया नित्यमनन्यभाजा को इस प्रकार पूर्ण करनेवाला और कौन दयाळ है १ में अनन्य भावसे उनका नित्य स्मरण करता था । अनः ~ मेरे स्मरणको जानकर वे स्वयं ही चले आय ॥ ८॥ जञात्वा सृतिं मे स्वयमेव यातः ॥ < ॥ दशरथनन्दन भगवान राम ! मेरी ओर देखने रहिये, में पृझ्यत्बिदानीं देवेशो रामो दाशरथिः प्रश! | अपना झारीर जलाकर अब निष्पाप होकर ब्र्मळोकको दर्या स्वदेह गच्छामि बह्मलोकमकल्मपः | ९॥ जा रहा हृ ॥ ९॥ मेरे हृदयमें सदा अयोभ्यापति अयोष्याधिपतिर्मऽस्तु हृदये राघवः सदा । श्रीरामचन्द्रजी विराजमान रहे, जिनके वामांवमें मेघर्मे यद्दामाङ्के स्थिता सीता मेघस्येव तडिछता ॥ १ ०॥ व्रिजलीके समान श्रीसीताजी विराजमान हैं” ॥ १०॥ इति रामं चिरं ध्यात्वा इष्दवा च पुरतः स्थितम्‌| इस प्रकार रामचन्द्रजीका बहुत देरतक ध्यान र न पञ्चात्मकं वपः (११). करते इए तथा अपने सम्मुख विराजमान उनके दिव्य , ज्वाल्य सहसा वहि दध्या पञ्चात्मक वपः ।११। ' घरूपको देखते हुए मुनिवर झारभंगने अन्न प्रव्यल्त दिव्यदेइघरः साक्षादध्ययो लोकपते? पद्म | | र अपना पाञ्भोतिक शरीर जला डाला ॥१ १॥ नया | दिव्य देह घारणकर साक्षात्‌ ब्रह्ललोकको चळे गये । | ततो घुनिगणाः सर्वे दण्डकारण्यवासिन! | । तदनन्तर दण्डकारण्यबासी समन्त मुनिगण श्री- + क दर्शन © करनेके ~ स्यि शरभं उग आजम्मू राघव द्रष्टु शरमङ्कनिवेशनम्‌ ॥१२॥ | रघुनाथजीका दशन करनेके लिये शरभं मुनिके निसमह तं जानकीरामल | आश्रमपर आये ॥ १२॥ मुनि-समाजको देखकर च्ष्द्वा दानसमूं तं जान क्ष्मणाः । माया-मानव-रू श्रीराम, सीता और एक्मणने सहसा प्रणेशु; सहसा भूमो मायामानुपरापिणः ॥१२॥ | पुथिवीएर शिर रखकर उन्हें प्रणाम किया ॥ १३ ॥ आशीमिरमिनन्याथ राम सर्वहृदि स्थितम्‌ । | उन सुनौ्वरोंने सर्वान्तर्यामी भगवान्‌ रामका आशीर्वाद- { ऊचुः प्राञ्लयः सर्वे धनुर्वाणघरं हरिस्‌ ॥१४॥ | दारा अभिनन्दन किया और फिर वे भनुर्वाणधारी ५ ज | श्रोहरिसे हाथ जोड़कर बोढे--)| १४॥ “आपने शूममारावताराय जातोस ब्रह्मणार्थितः । ! ब्रह्माको प्राथनासे पृथिवीका भार उतारनेके लिगि जानीमस्त्वां हरि लक्ष्मी जानकीं लक्ष्मणं तथा।१५। अवतार छिया है । हम यह जानते हैं कि आप शेषांश शङ्कचक्रे दे भरतं सानुजं तथा । | जी श्रीहरि, जानकोजी रदी, क्मणी शेषनाग RR त | ओर भरत-इत्रुत्र भगवानके शंख और चक्र हैं । अतश्वादौ ऋषीणां तव दुःखं मोकुमिहाहीसे ॥१६॥ | „` =. है डम व हाहास ॥१९॥ | उसि आप यहाँ सबसे पहले ऋषियोंका दुःख दूर करें आगच्छ यासो मुनिसेवितानि | ॥ १५-१६ ॥ हे खुश्रेष्ट आह्ये, सीता और लक्ष्मण- ` चनानि सर्वाणि रघूत्तम क्रमात | ` सहित आप हमारे साथ क्रमशः मुनौखरोंके समल सर्ग २] अरण्यकाण्ड | १०९ NTS 70.7 TTT जि ४४४ ४८१ ८ (४८७०४८ ६७७०६/ ७४% १११६४५ ४४४४४ शी be eee, ४८९७ सर्य 00 क ककन्यामुकम्सयम्यमुकककय्र्कच्यक््कनुकनु ३८ ६. ७ ७१ ७८ ४४७७७ ४४७७७० ७५७४ ४७७७१५७४४७ ४० ७७४ करक NINN ०७०६ दृष्ट सुमित्राहुतजानकीभ्यां आश्रमोंको देखनेके लिये चलिये। ऐसा करनेसे तदा दया5स्मासु ठा भविष्यति ॥१७॥॥ आपको हमपर बड़ी दया आयेगी” ॥ १७ || इति विज्ञापितो रामः कृताञ्जलिपुटेविंशचः इस प्रकार हाथ जोड़कर निवेदन किये जानेपर जगास ग्रानाभिः साष द्रष्टु छुनिवनाचि स! ॥ १८॥ | भगवान राम मुनियोंके साथ उनके तपोचनोंको देखने- दुय तत्र पतितान्यनेकानि शिरांसि सः। | के लि चछे ॥ १८ ॥ वहाँ उन्होंने सव ओर वहुत-सौ / अस्थिभूतानि सर्वत्र रामो वचनमन्रवीत्‌ ॥१९॥ | खोपडिया पडी देखीं । उन्हें देखकर औररामचन्द्रजीने अस्थीनि केषामेतानि किमर्थ पतितानिवे । | 2 से पूछा-॥ १९॥ “ये हया. किनकी हैं ha CH Pa पोभू मेमें मे हृँ?” i तमूचुर्मुनयों राम ऋषीणां मस्तकानि हि ॥२०॥ | ^र शस तपोभ्मिमे कैसे पड़ी हैं?” तब झनीबरोे ~ , ~ ण्ह राम ! ये ऋषियोंके मस्तक हैं o राक्षसेभंश्षितानीश प्रमत्तानां समाधितः । हे समरथ ! इन्हें राक्षसोंने खा लिया है : he अन्तरायं मुनीनां ते पञ्यन्तोऽनुचरन्ति हि।२१॥ | समाविसे विरत हुए मुनौश्वरोंको मक्षण करनेके लिये शुत्वा वाकय सुनांना स भयदुन्यसमान्वतस्‌। | मोका देखते इए जहाँ-तहाँ घुमते रहते हैं? ॥ २१॥ ्रातजश्ञासकराद्रामा वथायाशषरक्षसाम्‌ ।॥२२॥। सुनियोंके ये भय और दीनतापूर्ण वचन सुनकर श्रीराम- पूज्यमानाः सदा तत्र घुनिभिवनवासिभिः । चन्द्रजीने समस्त राक्षसोंका वध करनेके लिये प्रतिज्ञा की जानक्या सहितो रामा लक्ष्मणेन समान्वितः ।२३॥| ॥ २२ ॥ इस प्रकार क्रमशः मुनीश्वरोके आश्रम देखते उचास कंतिचित्तत्र वर्षाणे रघुनन्दनः ! हुए श्रीरघुनाथजी बनवासी मुनियोंद्वारा नित्य पूजित हुए ` एवं क्रमेण संपश्यन्तृषीणामाश्रमान्तिञ्चुः ॥२४॥ ` सीता और छक्ष्मणके साथ वहाँ कुछ वर्ष रहे २३-२४।| । । सुतीकषणस्याश्रमं प्रागात्पमर्यातमृष्सिडकुलम । तदनन्तर वे सुविख्यात सुतीक्ष्ण मुनिके आश्रममें गये सर्वैहगुणसम्पद्न॑ सर्वकालसुखावहम्‌ ॥२५॥॥ | से घिरा इजा समल ऋतन गसि युक्त वि और सब समय सुखदायक था | २५॥ रामका आगमन सुन राममागतमाकण्य सुतीक्ष्ण स्वयमागतः | राम-मन्त्रके उपासक और अगस्त्यके शिष्य सुतीक्ष्ण उन्हें शिष्यो भेपासनतर छेनेके लिये स्वयं आगे आये और उनकी विधिवत्‌ अगस्त्यशिष्या रामस्य मन्त्रापासनतत्परः | , पूजा की । उस समय सुतीक्ष्णके नेत्र भक्तिवश भगव- विधिवत्पूजयामास भकत्युर्कण्डितलोचनः ॥२६।। दर्सनके छिये अति उतावळे हो रहे थे ॥ २६ ॥ सुतीक्ष्ण उवाच | सुतीक्ष्ण वोळे--हे अनन्त-युण अप्रमेय सीता- ले पते ! मैं आपका ही मन्त्र जपता हूँ । हे अभिराम त्वन्मन्त्रजाप्यहमनन्तशुणाप्रमय । राम ! आपके चरण संसार-सागरसे पार करनेके लिये सीतापते शिवबिरिञ्चिसमाश्रिताझये । | सुद्दढ पोत ( जहाज ) स्वरूप हैं; शिव और ब्रह्मा .] हह ० ] > oa | En सवेदा संसारसिन्धुतरणामलपोतपाद स्वेदा उनकी सेबा करते हँ । हे नाथ! में सबदा आपके दासोका दास हूँ ॥ २७ || आप समख संसार” रामामिराम सततत तव दासदासः ।२७ ८ उन्द्रयोक्े अविषय हैं, तथापि इस मळमूतरके पुतळे माम्य सर्वजगतामविगोचरस्स्व शरीरके मोह-पाशमें जिसका हृदय बँधा हुआ है ऐसे न्माय त्रशृहाः मझ दीनको अपनी ही मायासे मोहित होकर पुत्र- ५ स्वन्नायया दतक _ भे कलत्र और गृह आदिके अन्धकूपमें पड़ा देखकर आप मं निरीक्ष्प मलपुद्ठलपिण्डमोह- | स्वयं ही मुझे अपना पुण्य-दर्शन देनेके लिये पधारे पाशानुवद्वहृदयं खयमागतोऽसि ।२८॥ हैं | ॥ २८॥ आप समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराज” ११० _ अध्यात्मरामायण [सर्ग २ RRS OO PROS YR RT DRIP SER a oar penm grees CISC FSS IIUYY IY Swe 0100000000, ev य ~ तव॑ सर्वभूतहृदयेषु कृतालयोऽपि | मान हैं, तथापि जो लोग आपके मन्त्रजापसे चिमुख न्य विमुसेषु तनोषि माया हैं उन्हें आप अपनी मायासे मोहित करते हैं. और त्वन्मन्जजाप्यापेुखेड तना नाताल जो उस मन्त्रके जांपमें तत्पर है. उनका माया दूर सवन्मन्त्रसाथनपरेष्यपयाति माया हो जाती है । इस प्रकार राजाके समान आप सबको सेवानुरूपफलदो5सि यथा महीपः ।२९। | उनकी सेवाके अनुसार फळ देनेत्रालें ह ॥ २९, || हे इशा ! वास्तवमें एकमात्र आप ही इस विश्वका उत्पत्ति, ७८५-/५-१४-०५५१/ ७८६० ४-४-४४४९ dd विश्वस सृष्टियसंखितिदेतुरेक- |खिति और प्रल्यक्रे कारण हैं तथापिं छुचि स्त्वं मायया त्रिगुणया विधिरीशषिष्णू | पुरुपोंको त्रिगुणमयी मायाके कारण ब्रह्मा, विष्णु भासीश मोहितधियां विविधाकृतिस्त्व ¦ और महादेव आदि विविध कक भासते हैं; जिस _ के पात्रोंमें प्रतिविम्बित होनेसे सय १ पात्रगत १ ॥२०॥ प्रकार जळ - _ ~ यवि सलिल 1 धनेक रे ' अनेक होकर भासता हें ॥ २० || हे राम! आप अज्ञान- ग्रत्यक्षतो5्च भवतश्चरणारविन्द्‌ । से सर्वया परे हैँ । तथापि आपके चरणकरमढोंकों पश्यामि राम तमसः परतः स्थित । , ) प्रत्यक्ष देख रहा के ( इससे विदित होता ऐचरो पि । है कि) सबके साक्षी होनेसे आप असत्पुरुषोक्रों a ग्‌ S ~ इृग्रपतस्स्वमदतासवि हे ते अगोचर होकर भी जिनका चित्त आपके मन्त्रजापसे त्वन्मल्त्रपूतहुदयेषु सदा प्रसन्न ॥३ १॥ | जुद्ध हो गया है उनपर सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ ३१ ॥ oN न छ पने 5 T पश्यासि राम तव रूपमरूपिणोऽपि | हैं राम | आप ख्परहित हैं, तथापि अपने ही माया- ' विढम्बनकत समलुष्यवेष | । विलाससे धारण किये आपके मनोहर मनुप्य-व्ेप-धारी ५ बनते उनमे पा ! स्वरूपको मैं देख रहा हुँ । आपका यह रूप करोइ कन्दपकोटिसुभगं कमनीयचाप- | कामदेवोके समान कान्तिमान्‌ है और कमनीय घलुत्रीण बाणं दयाईरहृदयं स्मितचारुबकत्रम्‌।३२। ! धारण किये है । आपका हृदय दया तथा मुख मनोहर सुसकानयुक्त है ॥ २२ ॥ जो सीताजीसे युक्त _ सीतासमेतमजिनास्वस्मप्रशृष्यं | हैं, कृष्णमृगचर्म धारण किये हैं, सर्वया अजेय हैं सौमित्रिणा नियतसेवितपादपञ्चस्‌ । ` जिनके चरणकमल नित्य श्रीसुमित्रानन्दनसे सेवित नीलोत्पलद्चतिमनन्तशुणं ग्रश्ान्तं हे और जिनकी नीठकमलके समान आमा है उन | अनन्तशुणसम्पन्न झान्तमृ्ति सोभाग्यस्वरूप श्रीराम- तद्भागधेयमनिश प्रणमामि रामम्‌ ।२३। | चन्द्रजीको मै अहर्निश प्रणाम करता हँ ॥ ३३॥ जानन्तु राम तव रूपमशेषदेश- हे राम | न हक और की देर देश-काळ आदि हित समस्त उपाधियोंसे रहित और चिद्घन प्रकाशखरूप च्य य ह्य ~ + s ~ है ~ कालाइुपाधिरहित घनचित्मकाशम। जानते हैं, वे भळे ही वैसा ही जानें; किन्नु मेरे हृदयमें प्रयक्षतो5्य मम गोचरमेतदेंव । तो, आज जो प्रत्यक्षर्पसे मुझे दिखायी दे रहा दै, रूपं विभातु हृदये न परं विका्ले ।३४। | पढी रूप भासमान होता रहे । इसके अतिरिक्त मुझे हे ओर किसी रूप की इच्छा नहीं है ॥ ३४॥ इत्येवं स्तुवतस्तस्य रामः सासिमितमत्रवीत्‌ । सुतीक्षणके इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीरामचन्द्रजी- RR ने उनसे मुसकाकर कहा-“हे मुने ! मैं यह जानता थुने जानामिते चित्तं निभं महुपा द इपासनात्‌ ॥२५॥ | ह कि तुम्हारा चित्त मेरी उपासनासे निर्मल हो गया ` अतोऽहमागतो दु महते नान्यसाधनम्‌ । है ॥ १५॥ ओर तुम्हारा मेरे अतिरिक्त और कोई _ हे | साधन नहीं है, इसीलिये मैं तुम्हें देखनेके लिये आया मन्मन्तरोपासका लोके मामेव शरणं गताः ॥३६॥ हूँ । संसारमें जो लोग मेरे मनत्रकी उपासना करते हैं और सर्ग ३] | | अरण्यकाण्ड १११ च्स्य्य्स्स्म्स्स्प्स्स्प्प्य्य्स्प्म्प्प्प्प्स्प्प्प्प्य्प्प्प्ण्प्प्््प्न8्प्य्ल्््ण््प्प्ध्प्प्प्प््््य्प्प््प्प्य््प््ट्प्य्ल्य्प्प्प्च्प्य््य्य्ल्प्ल्ल््प्प््स्स्य्य्च्य्स्य्ट््न्च- (४००९-५७ ९०२५७ ५३५८ पक 3० ५० ४४९० ४० ७९ VO ४८७७ ७ ७४५७७ 0४ ६4० ७० ७३६० ७७४७७७७” ७.७० ४८७७ केक क” "५०५८१० ४० ५४४५० ५१०५८ ४०५८८९०९३५ ४५ ४८७८ ७८४५८७० ६०९०० ७.८ ७४९४७० ७.० ७७.० ६७७४४४७७७० ७.७९. ४४.७ १.१ र ६०. निरपेक्षा नान्यगतास्तेपां दश्योष्हमन्वहस्‌ । की ही शरणमें रहते हैं ॥ ३६ ॥ तथा नित्य निरपेक्ष तोत्रमेतत्पेर य र अनन्यगति रहते हैं, उन्हें. मैं नित्यप्रति दर्शन स्तात्रमतत्पठद्यस्तु त्वत्कृत lt र दि स्तु त्वत्कृत मखय सदा ॥२७॥ | दता हूँ । जो व्यक्ति तुम्हारे किये हुए इस मेरे प्रिय सङ्कत्तिमे भवेत्तस्य ज्ञानं च विमलं भवेत्‌ । | खोत्रका पाठ करता है ॥ २७॥ उसे मेरी झुद्ध प Ly ल मसोपासनदिन विमक्तों ९ भक्ति और निमछ ज्ञान प्राप्त होता है, तुम केवळ तवं ममोपासनादेव बिशरुक्तोऽसीह स्तः ॥रे८॥ | मेरी उपासनासे इस जीवितावस्थामें ही सब प्रकार टा | सुः देहान्ते मम सायुज्यं लप्स्यसे नात्र संशयः । क हो गये हो ॥३८॥ शरीर छूटनेपर तुम I शर निस्सन्देह मेरा सायुज्यपद प्राप्त करोगे । अब मैं तुम्हारे शुरु ते द्रष्टमिच्छामि ह्गस्त्य मानेनायकमू । | गुरु मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजीसे मिळना चाहता हुँ; मेरा किञ्चित्कालं तत्र वस्तुं भनो मे त्वरयत्यलम्‌ ॥३९॥ चित्त उनके पास कुछ दिन रहनेके लिये उतावळा हो रहा है” ॥ ३९॥ सुठीकणोऽपि तथत्याह श्वो गमिष्यसि राघव | सुर्तीक्णने कहा, “बहुत अच्छा, वहाँ कल चलिये । ~ य - ~ मैने भी मुनीश्वरको बहुत अहमप्यागमिष्यामि चिराद्द्टो महाशनिः ॥४०॥ है कक बहत दिन इए तब देखा या । अतः हे राघव ! मैं भी आपके साथ ही वहाँ चढ्/ँगा” अथ प्रभाते मुनिना समेतो ॥ ४० ॥ प्रातःकाल होनेपर सीता और छक्ष्मणके श्म : सहित श्रीरामचन्द्रजी सुतीक्ष्ण मुनिको लेकर अगस्त्यजी- रामः ? णन . र ससीत सह लक्ष्मन । | से वार्तालाप करनेके लिये उत्कण्ठित हो शनेः-शनेः अगस्त्यसम्भाषपणलालमानसः | उनके छोटे भाई ( अग्निजिल सुनि ) के आश्रमकी शनरगरत्याचुजमन्दिरं ययो ॥४ १॥ | ओर चळे ॥ ४१॥ TN इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे द्वितीयः सगेः ॥ २॥ ~ तृतीय सर्ग सुनिचर अगरुत्यजीसे भेंट 1 श्रीमहादेव उवाच | श्रीमदादेबजी बोछे--हे पार्वति ! उस दिन ~ i | मध्याहके समय श्रीरामचन्द्रजी झुतीकष्ण, सीता और अथ रामः सुतीकषणेन जानक्या लक्ष्मणेन च । | द्रके साथ अगस्त्य मुनिके छोटे भाई अश्निजिह अगर्त्यस्याचुजखानं मध्याह्ने समपद्यत ॥ १ ॥ | सुनिके आश्रममें पहुँचे ॥ १ ॥ उन्होंने उनकी भली तेन सम्पूजितः ~ प्रकार पूजा की फिर उनके दिये इए कन्द-मूछ-फल तेन सम्पूजितः सम्यग्शक्ता मूलफलादिकस्‌ । आदि खाकर, दूसरे दिन प्रातःकाल उठते ही अगस्त्य परेहुं! प्रातरुत्थाय जग्मुस्ते5्गस्त्यमण्डलम्‌॥ २ ॥ | मुनिके आश्रमको चले ॥ २ ॥ ' फेर मस्त ऋतुओंके फल और पुष्पोसे मृगगणेशुतम । वह आश्रम स से नानाहगगाड्वाद परिपूर्ण, विविध वन्य पञ्चओंसे सेवित तथा नाना प्रकार- पक्षिसहैश्व॒ विविधैर्नादितं नन्दनोपमम्‌॥ रे ॥ | के पक्षयो, शुज्ञायमान नन्दनवनके समान सुशोभित सर्वेतुफलपुष्पाळ्यं ore | ११३ अध्यात्मरामायणे [ सग ३ ne तानाम्‌ क करकर १७७७ केक ७७ करेकक& ककया कक पक का ब्रह्मर्पिमि्देवपिंसिः सेवितं ग्रुनिमन्दिरेः ! ` | घा ॥ ३॥ बह तरहर्षियो और देवपियोंसे सेवित था । ७: र कप ॥४॥ | तथा उसके चारों ओर उन ऋषियोंके आश्रम सुशोभित सतान्लरङ साकादनहाठकालनापरय्‌ | थे | इस प्रकार वह साक्षात्‌ दूसरे ब्रह्मलोके समान बहिरेवाश्रमस्याथ स्थित्वा रामोव्ञवीन्सुनिय्‌ । | जान पड़ता था ॥ ४॥ आश्रमके बाहर रहकर सुतीक्ष्ण गच्छ त्वं शीघ्रमागत मां निवेदय ॥ ५ ॥ | श्रीरामचन्द्रजीने सुतीक्ष्ण सुनिसे कहा-- है सुतीक्षण ! निवर्या प तुम शीघ्र ही मुनिवर अगस्त्यजीके पास जाकर उन्हें. वर्याय सीतया लक्ष्णेन च। | १ सहित मेरे आनेकी तह तीत , > _ ८ || सीता और लक्ष्मणके सहित मेरे आनेकी सूचना दो iY महाप्रसाद इत्युक्त्वा सुतीक्ष्णः प्रययो गुरो॥ ६॥ | सुतीदण 'बडी प्रसनताकी वात हैं ऐसा कह ` आश्रमं त्वरया तत्र ऋषिसङ्घसमाइृतस्‌। , शीघ्रतासे गुरुजीके आश्रमे गये । वहाँ जाकर सुतौक्ष्णने ॥ चिदोषतया वि = ; देखा कि मनिश्रेष्ट अगस्त्य मुनिमण्डळीसे--विरे उपविष्टं रामभक्तेविंशेषेण समायुतम्‌ ॥ ७॥ | राममतोसे । ६ और कया पे | राममक्तोसे घिरे हुए वैठे हैं और अत्यन्त भक्तिपूर्वक व्याख्यातराममन्त्रार्थ शिष्येम्यशातिमक्तितः। ' अपने शिष्योंकों राममन्त्रकी व्याख्या सुना रहे हैं | दष्ट्वागस्त्य मुनिश्रेष्ठ सतीक्ष्णः प्रययो मुनेः ॥८॥ | यह देखकर झुतीक्ष्ण उनके पास गये || ५-८ ॥ उन्हे पे ण विनयपूवेक दण्डवत-प्रणामकर छुबुद्धि सुतौक्ष्णने दण्डवत्मणिपत्याह विनयावनतः सुधीः ५ इड्न ( दग कि a न्य व | कहा--“ब्रह्मन्‌ ! दशरथकुमार श्रीराम सीता और रामो दाशरथित्रह्मन्‌ सीतया लक्ष्मणन च । । छक्ष्षणके साथ आपके दर्शनोंके छिये आये हैं और आगतो दर्शनार्थ ते बहिस्तिष्ठति साञ्जालिः ॥ ९ | , अज्ञजि बाँघे आश्रमके वाहर खड़े है” ॥ ९ ॥ अगस्त उवाच | अगस्त्यजी बोले-अत्स ! तुम्हारा कल्याण हो । _ a ~ | तुम शीघ्र ही मेरे हृदयस्थित भगवान्‌ रामको ले आओ | शोममानय यते रामं मम हदि स्थितस्‌। | उनके दर्शनोंकी इच्छासे उन्हींका ध्यान करता हुआ तमेव घ्यायमानोऽहं काङ्कमाणोऽत्र संस्थितः ।१०। ' यहाँ रहता हूँ ॥ १०॥ ऐसा कह वे शीघ्र ही इत्युकत्वा स्वयमुत्थाय मानिभिः सहितो डुतम्‌ । | मुनियोके साथ उठकर स्वयं श्रीरामचन्द्रजीके पास अभ्यगात्परया भक्त्या गत्वा राममथाबबीत्‌ ।११। आये और उनसे अत्यन्त भक्तिपूर्वक वोढे-॥ ११ ॥ श ~ “हे राम ! आइये, आपका कल्याण हो | आज बड़े गच्छ राम महर त देश्या तञ्च समागमः । | भाग्यसे आपका समागम हुआ है । आजका दिन प्रियातिथिसेम ग्राप्तोब्स्यद्च मे सफलं दिनम्‌ १२॥ | सफळ है, आज मुझे मेरे प्रिय अतिथि प्राप्त हुए है” ॥ १२॥ ha 2 [०२ क | ~ ha ~ रामोऽपि भुनिमायान्तं इष्टवा इर्षसमाङुलः। ' ुनाश्चरको आते देख श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और , सीतया लक्ष्मणेनापि दण्डवत्पातित्ो झुवि ॥१३॥ | सीता सहित एथिवीपर दण्डके समान लेट गये॥ १३॥ १ नेराडाममारि ब तब मुनिराजने तुरन्त ही रामको उठाकर प्रेमपूर्वक ह्ठतमुत्याप्य उानराङ्रासमाठिदण्य भक्तितः । | हृदयसे लगा ल्या और उनके शरीर-स्पर्शसे प्राप्त हुए तदात्रस्पर्वीजाह्ादसकन्नेत्रजलाङल]; ॥१४॥ | आनन्दसे उनके नेत्रोमे जल भर आया ॥ १४॥ युहीत्वा करमेकेन करेण रघुनन्दनम्‌ । तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी एक हाथसे श्रीरघुनाथ- जगाम खाश्रमं हृशे मनसा झुनिपुङ्गवः ॥१५॥ | जीका हाथ पकड़कर उन्हे प्रसनन-मनसे अपने आश्रममें क्या छे आये ॥ १५ || और उन्हें घुखपूर्वक आसनपर बैठाकर सुखापावष्ट सम्पूज्य पूजया a बी स्प सनि र बहुविसतरयू । | उनकी विधि-विधानसे बड़ी पूजा कौ तथा समयानुकूल सर्ग ३] सुखोपविष्टमेकान्ते रामं शशिनिभाननम्‌ । अरण्यकाण्ड पु TOTTI TST कळ क टी 0९९५७१४७४७ ७९०७७७७ ३.७ करक ० २ ४४५४४४४४४0 १ ४७0 oN NN CU LI ease ११२ क कटक कक कक कक MN इस प्रकार एकान्तमें सुखपूर्वक बैठे हुए चन्द्रवदन कृताञ्जलिरुवाचेदमगस्त्यो भगवानृषिः ॥ १७ ख भगवान्‌ अगस्त्य सुनिने हाथ जोडकर स्वदागमनभेवाह प्रतीक्षन्समवस्थितः । कहा-- १७॥ हे राम ! पूर्वकाळमें जिस समय क्षीरससुद्रके समीप ब्रह्माजीने आपसे भूमिका भार यहा क्षीरसमुद्रान्ते जह्मणा प्राथितः पुरा ॥१८॥ | उतारनेके लिये रावणका वध करनेकी प्रार्थना की थी, 'बूमेभौरापचुत््प्थ॑ रावणस्य वधाय च। तदादि दर्शनाकाङ्की तव राम तपश्वरन्‌। वसामि मुनिमिः साधं वामेव परिचिन्तयन्‌ १९॥। सृष्टेः प्रामेक एवासीनिविकरपोऽलुपाधिक। । तभीसे आपके दरॉनोंकी इच्छासे मैं तपस्या करता हुआ और आपहीका चिन्तन करता हुआ आपके आनेकी . प्रतीक्षामें यहाँ मुनियोंके साथ रहता हुँ ॥ १८-१९॥ सृष्टि- के आरम्भमें विकल्प और उपाधिसे रहित आप अकेले ही थे, (उस समय और कुछ भी नहीं था) । आपके आश्रय 1रहनेवाली तथा आपहीको विषय करनेवाली माया त्वदाश्रया त्वद्विपया माया ते शक्तिरुच्यते ॥२०॥ आपकी ही शक्ति कही जाती है ॥ २०॥ जिस त्वामेव निशुणं शक्तिराइणोति यदा तदा । | समय यह माया-शक्ति आप निर्गुणको हॅक लेती है उस समय वेदान्तनिष्ठ पुरुष इसे 'अव्याकृत' कहते हैं अव्याकृतमिति प्राहुर्वदान्तपरिनिष्ठिताः ॥२१॥ ॥२१॥ कोई इसे मूल्प्रकृति' कहते हैं और कोई माया; मूलप्रकृतिरित्येके प्राहुमयिति केचन । तथा यही अविद्या, संसृति और बन्धन आदि अनेक नामोंसे पुकारी जाती है ॥ २२ ॥ आपके द्वारा अविद्या संसृतिवन्ध इत्यादि वहुधोच्यते |२२॥ | क्षुभित होनेपर इस शक्तिसे महत्त्व उत्पन्न होता त्वया संक्षोभ्यमाणा सा महत्तच््व॑ प्रतयते । ˆ महत्तचादहड्जारस्त्वया सश्वोदितादभूत्‌ ॥२३॥ अहङ्कारो महत्तत्त्संब्वताख्रविधो5भवतू । सात्विको राजस्व तामसश्चेति भण्यते ॥२४॥ तामसात्तक्ष्मतन्मात्राण्यासन्‌ भूतान्यतः परम्‌ । स्थूलानि क्रमशो राम क्रमोत्तरशुणानि ह ॥२५॥ राजसानीर्द्रियाण्येव सार्विका देवता मनः । तेम्योड्मवत्सन्नरूप लिङ्ग सर्वगतं महत्‌ ॥२६॥ ततो विराद समुत्पन्न! स्थूराद्‌ भूतकदम्वकात्‌ | व्रिराजः पुरुपात्सव जगत्खावरजङ्गमम्‌ ॥२७॥ देवतियड्मनुष्याथ कालकर्मक्रमेण तु! त्वं रजोगुणतो ब्रक्षा जगतः सर्वकारणम्‌ ॥२८॥ सचाहि्णुस्त्वमेबाय पालकः सद्भिरुच्यते । ठये रुद्रसत्ममेवास्य त्वन्मायाशुणमेदतः ॥२९॥ 9७ और महत्तत्तसे आपहीकी प्रेरणासे अहंकार प्रकट हुआ है ॥ २३ ॥ महत्तत्वसे ओतप्रोत बह अहंकार तीन प्रकारका हुआ; जो सात्विक, राजस और तामस कहलाता है ॥ २४॥ हे राम! तामस अहंकारसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ हुई और इन सूक्ष्म तन्मात्राओंसे इनके गुणानुसार क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ये पाँच स्थूल भूत हुए॥ २५ ॥ राजस अहंकारसे दश इन्द्रियाँ और सात्विक अहंकारसे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवता तथा मन उत्पन्न हुए; और इन सबसे मिलकर समष्टि-सूक्ष्म-दारीररूप हिरण्यगर्म हुआ, जिसका दूसरा नाम सूत्रात्मा भी है ॥२६॥ फिर स्थूळ भूतसमूहसे विराट्‌ उत्पन्न हुआ तथा विराट पुरुषसे यह सम्पूर्ण स्थावर-जंगम संसार प्रकट हुआ ॥ २७॥ हे जगदीश्वर | कालक्रमसे आप ही देव, तिर्यक्‌ और मनुष्य आदि योनियोंमें प्रकट इए हैं । अपने मायिक गुणोंके भेदसे आप ही रजोगुणद्वारा जगत्कत्तौ ब्रह्माजी, सत्वगुणद्वारा जगतकी रक्षा करनेवाले विष्णु और तमोगुणसे उसका ल्य करनेवाले. भगवान्‌ रुद्र हुए हैं, ऐसा सत्पुरुष कहते हैं ॥ २८-२९॥ PIRI रर शा SN र्ग | ११४ अध्यात्मरामायण , [सगे ३ RT VT] NANA rw rw महा ड्विनैगुंणे र | बुद्धिके सत्त्व, रज और तम इन तीन जाग्रत्स्वम्मसुषुप्त्याख्या वृत्तयो दिजे 11 हेराम! बु १ वि तसमु दचया डाडमय गुणोंसे ही प्राणीकी क्रमशः जाग्रत, खप्त और सुषुप्ति तासां विलक्षणो राम त्व साक्षी चिन्मयोज्व्यय! ॥ > नन अवस्थार होती हैं, पर आप इन तीनोंसे सृष्टिलीलां यदा क्ुमीहसे रघुनन्दन । | सर्वा पथक्‌ इनके साक्षी, चित्खरूप और अविनाशी करोषि माया तवं तदा वे गुणवान | हैं ॥| ३० ॥ हे रघुनन्दन ! जिस समय आप संसार- अद्जीकरोषि सायां त्वं तदा वै गुणवानिव ॥३१॥ | या छलका विस्तार करना चाहते हैं उस संय राम माया द्विधा माति विधाउविधेति ते सदा । । मायाको अंगीकार कर गुणवानःसे हो जाते हैं॥३१॥ न व , | हे राम ! आपकी यह माया सदा विद्या और अविद्या मडचिमार्गनिरदा अविद्याबशवर्तिनः । । दो खूपसे भासती है । जो लोग प्रवृत्ति-मार्गमें ढगे निवृततिमार्गनिरता वेदान्तार्थविचारकाः ॥३२॥। | रहते हैं वे अविद्याके वशीभूत हैं और जो वेदान्तार्थका 1 ~ ~ ' विचार करनेवाले, निवृत्ति-परायण और आपकी भक्तिमें त्वङ्कात्त ? $ Ri मे जाते हैं । इनमेंसे जो त्वद्कक्तिनिरता ये चते वे विद्यामय? स्मृताः । | निरत हैं वे विद्वान्‌ समझे जाते हैं । इनमेंसे जो ` अविधावशगा ये तु नित्यं संसारिणश्च ते। ' अविद्याके चशीभूत हैं वे सदा जन्म-मरणरूप संसारम ~ Da ~ फ रहते हँ विद्याम्यासी र हुँ चे 4 त्यमुक्त क्त विद्याभ्यासरता येतु नित्यमुक्तास एव हि ॥३३॥ "तख्त और जो विद्याम्यासी हैं वे ही नित्य lp हैं ॥ ३२-३३ ॥| संसारमं जो लोग आपकी भक्तिमें खोके तबङ्कक्तिनिरतास्तवन्मन्त्रोपासकाश्चये। | तत्पर और आपहीके मन्त्रकी उपासना करनेवाले ~ {वित्ेषां नेतरेपां ' होते हैं उन्हींके अन्तःकरणमें विद्याका प्रादुमीव होता बिद्या आहु नेतरेपां कदाचन ॥३४॥ | नी नही ॥ ३४ ॥ अतः जो एप अतस्त्वद्कक्तिसम्पञ्ना युक्ता एव न संशयः । । आपकी भक्तिसे सम्पन्न हैं वे निस्सन्देह मुक्त ही हैं, _ , _ आपकी भक्तिरूप अमृतके बिना खप्रमें भी मोक्ष नहीं वद्भुकत्यमृतहीनानां मोक्षः स्वभे$पि नो जाको और क बहोरन सारं किम्चिहवीमि पे दि भेद हो सकता ॥ २५॥ हे राम! और अधिक क्या 'किंरास सारं गमि ते। | कहूँ! इस विपयमें जो सार वात है वह तुम्हें साधुस$ुतिरेवात्र मोधहेतुरुदाहृता ॥३६॥ | ताये देता हूँ--संसारमें साधुसंग ही मोक्षका सिंध वेपि मुख्य कारण कहा गया है॥३६॥ संसारम जो साधवः समाचित्ता ये निःस्पृहा । | छोग सम्पद्‌-विपद्में समान-चित्त, स्पृहारहित, पुत्र- दान्ताः परशान्तास्त्द्गक्ता निश्टत्ताखिङक्रामनाः ||| वित्तादिकी ईपणाओंसे रहित, इन्द्रियोंका दमन करने- ~ ; वाले, झान्तचित्त, आपके भक्त, सम्पूर्ण कामनाओंसे इष्गरासतिविपश्योध समाः सङ्गविवर्मेताः । | शन्य, इष्ट तया अनिष्टकी सिम समान रहनेवाले, संन्यस्ताखिलकर्माणः सर्वदा ब्रह्मतत्पराः ॥३८॥ | संगहीन, समस्त कर्मोका त्याग करनेवाले, सदा त्रह्म- Le ' परायण रहनेवाळे, यम आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा जो दिशुण प $ सन्तुष्ट * ~ रहनेवाले होते Ce जनाद तजा ॥ पेनकेनवित्‌ |; कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहनेवाले होते हैं वे ही सत्सङ्गमो भवेद्यहि त्वत्कथाश्रवणे रति ॥३९॥ ! साधु कहलाते हैं | जिस समय ऐसे साधु पुरुपोंका संग कासार .. होता है तो आपके कथा-श्रवणमें प्रेम हो जाता है समुदेति ततो | | सुद्‌ तरसा स्म सनातन इ । ॥ ३७-३९ || हे राम ! तदनन्तर आप सनातन पुरुपमें त्यद्धक्ताबुपपत्नाया विज्ञानं विपुलं स्फुटम्‌ ॥४०॥ | भक्ति हो जाती है, तथा आपकी भक्ति हो जानेपर उदेंति ग्रक्तिमागोप्यमाथश्रतुरसेवितः। | भगा स्ट तथा प्रडुर झन प्राप्त होता है । यही चतुर | Ae | जनसेवित सुंक्तिका आद्य मागे है। अतः हे राघव | ` पसमाद्वाववृ सड क्तस्त्वांय मे अमलक्षणा ॥९९॥ । आपमेमेरी सर्वदा ग्रेमछक्षणा भक्ति वनी रहे-और्‌ हेहरे | २०४४४४४४४४ ४४४श मश शी/ सगे २] अरण्यकाण्ड ११५ सदा भूयाद्वरे सद्ठस्त्द्धक्तेष विशेषतः । अद्य मे सफलं जन्म भवत्सन्द्शनादभूत्‌ ॥४२॥। अद्य मे क्रतवः सर्वे बभूवुः सफलाः प्रमो । दोतेकालं मया तहतमचन्सतिना तपः ।-.. तस्येह तपसो सम फळं: तव 'यदचेनम्‌॥।४३॥ सदा मे सीतया सार्थ हृदये वस' राघवः। गच्छतस्तिष्ठतो वापि स्मृंतिः स्यान्मे सदा त्वयि |] इतिः स्तुंत्वा रमानाथमगरत्यो युनिसत्तमः । ददौ चापं महेन्द्रेण रामार्थे खापितं पुरा ॥४५॥ अक्ष्यौ; बाणतूणीरोः खङ्गो रत्नविभूषितः । जहिं राघव भूभारभूतं राक्षसमण्डलम्‌ ॥४६॥ यद्थमंचतीणोऽसि मायया मचुजाकृतिः । इतो योजनयुग्मे तुः पुण्यकाननमण्डितः॥४\9॥ अरित पञ्चवटीनाञ्ना' आश्रमो गोतमीतटे । नेतव्यस्तत्र ते. कालः शेषो रधुकुलोद्दह ॥४८॥ मुझे अधिकतर आपके भक्तोंका संग ग्राप्त हो । हे नाथ ! आज आपके दरानोंसे मेरा जन्म सफल हो गया || 9०-४२ ॥ हे प्रभो ! आज मेरे सम्पूर्ण यज्ञ सफळ हो गये । मैंने बहुत समयसे अनन्य भावसे तपस्या की है ॥ हे सम. | आज जोमैंने:आपकी प्रत्यक्ष पूजा-की . यह उस तपस्याका ही फळ है ॥ ४२ ॥ हे राघव ! सीताकेंसहितं आप सर्वदा मेरे हृदयमें निवास करें; मुझे चलते-फिरते सदा. आपका स्मरण, बना रहे ॥9४ ॥ लक्ष्मीपति श्रीरघुनाथजीकी इस प्रकार स्तुति कर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजीनेः उन्हें पूर्वकाठमेंः रामहीके लिमेः इन्द्रका दिया हुआ धनुष, बाणासे भरे हुए कभी खाली न होनेवाले दो तरकरा तथा एक रल्रजटित खडग दिया औरं कहा--“हे राघव ! पृथिवीके भाररूप राक्षसो: का संहारः करो' ॥: ४५-४६ ॥. जिसके लिये. आपने माया-मानव-रूपसे अवतार लिया है. । यहाँसे दो योजनकौ दूरीपर गोतमी नदीके किनारे पवित्र बनसे सुशोभित एक. पञ्चवटी नामक, आश्रम है. । हे. रघुनाथ- . जी |: आप अपना शेष काळ वही व्यतीत. करें । हे. सत्पते ! वहीं रहकर आप देबताओंके बहुंत-से कार्य तत्रेव वहुकार्याणि: देवानां. कुरु सत्पते ॥४९॥ सिद्ध करें! ॥ ४७-४९॥ शरुत्वा तदागस्त्यसुभाषितं वच! स्तोत्रं च तर्वाथसमन्वितं चिश्चुः । मुनिं समाभाष्यः मुदान्वितो यया प्रदर्शित तदनन्तर सर्वज्ञ भगवान्‌ राम अगस्त्यजीका यह क ब्ध च] * De मनोहर भाषण और तच्वाथंगर्मित स्तोत्र सुन उनसे बातचीत करः प्रसनतापूर्वक्र- उनके दिखायेः इए मार्गमशेपविद्धरिः ।।५०॥ | मागसे चले. ॥, ५० ॥ — dere इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे . अरण्यकाण्डे तृतीयः सगः ॥ ३ ॥ ¢ ११६ १६ अधार अध्यात्मरामायण [सग ४ SS 0” पा क TTT चतुर्थं सर्ग पश्चवटीमें निवास और ळक्ष्मणजीको उपदेश | श्रीमहादेचजी बोले-दे पार्वति ! मागम आते ` जो ह हुए श्रीरामचन्द्रजीन पर्थत-रिग्बरक समान र मामे ब्रजन्ददशाथ शेलश्वद्धमिव खितम्‌। | द्ध जटालक देखा । उसे देखकर उनको i बुद्धं जटायुषं रामः किमेतदिति विखितः ॥१॥। | आश्चर्य हुआ कि 'यह क्या हैं ^ ॥ १॥ तव ये छि--“सामित्रे ! मरा घन लाओ । पुरान सान रसा 5 देखो, सामने यह राक्षस बैठा हैं; में ऋपियाँको भक्षण इत्याह लक्ष्मण रामो हनिष्याम्पुपिभक्षकप्‌ ॥२॥ | करनेवाले इस दृष्टका अमी मारे डालता हुँ” ॥ २ ॥ अभिहादेव उवाच तच्छ्रत्वा रामवचनं भृध्रराद्‌ भयपीडितः । रामका यह वचन सुन गुधराजने भयसे व्ययित ऐकर w RE ह कहा--“राम ! में तुग्हारद्वारा मारे जाने योग्य नही T प्रियसखा ॥रे। |... .. `. ° बघाहेऱ्हिन त साम पहुरतज् हुँ । में तुम्हारे पिताका प्रिय सखा जावु नामक गृ ९ ७ ev _ जटायुनीम सद्र ते शृध्रोऽहं प्रियकत्तव ॥४। | ह | तुम्हारा कल्याण हो, में तो तुम्हारा दितकार पञ्चवट्यामहं वत्स्ये तवैव ग्रियकाम्यया। | है| ३-९॥ तुम्हारी हो हित-कामनासे में परवद मृगयायां कदाचित्तु प्रयाते लक्ष्मणेडपि च ॥५॥ | ॐ । किसी समव जब आपके साथ ठक्ष्मणजी भं S | मृगयाके लिये वनम चळे जायेंगे तो में जनकनन्दिनं सीता जनककन्या मे रक्षितव्या प्रयत्ततः | | सांताजीकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करेगा |” गृध्रा त्वा तद्यरधवचनं रामः सल्तेहमत्रबीत्‌ ॥६॥ | ये तचत सुनकर भरामचन्टरजीन स्नेक कहा" गृध्र महाराज तथे शे म्रियम | | ॥५-६॥ “हृ ग्रघ्नराज महाराज ! ठाक है, इस पासदे साधु गृध्र महाराज तथेव कुरु मे प्रियम्‌ | वनमें ही रहते हुए आप सर्मापवर्ती होकर अवय हमार अत्रैव मे समीपसो नातिदूरे वने वसन्‌ ॥७॥ | हित-साधन कर" ॥ ७॥ इत्यामन्त्रितमालिङ्य ययी पञ्चवटीं प्रभु: । | इस प्रकार अपनी सम्मति दे भगवान्‌ राम जटायु लक्ष्मणेन सह भाजा सीतया रघुनन्दनः ॥८॥ । को डिंगनकर भाइ लक्ष्मण भोर गीताक सहित ~ A+ < | पञ्जवटाका गय ॥ < ॥ गातमाक तठपर पह चका गत्वा ते गांतमीतीरं पञ्चवट्यां सुविस्तरम्‌ | | उन्होंने बुद्धिमान लक्ष्मणजीसे पज्वदीमे एक विशाल कट मन्द्रे कारयामास लक्ष्मणेन सुबुद्धिना ॥९॥ | «नवायी ॥ ९ ॥ वहाँ वे सव गंगाके उसर तटपर वद्य तत्र ते न्यवसन्सर्वे गङ्गाया उत्तरे तटे। | पनस और आम्र आदि फल्ारे बृक्षोंमे युक्त एक रोग केदस्वपनसाम्रा।दफलबृ क्षसभ्ाकुल ॥१०॥ | रहित जन्य-शन्य ण्कान्त स्थानम दस गये | श्रारामचन्टर- विविक्त जनसम्बाधवजिते नीरुजखले। जो घुद्रिमान रक्ष्णके सहित जनकात्मजा सॉताका विनोदयन्‌ जनकजां लक्ष्मणेन विपशिता॥११॥|| मनोरजन करते हुए उस देवलोकके समान अध्युवास सुखं रामो देवलोक इघापरः। | उर नम दुसर इनद्रके समान सुखपूर्वक कन्दसूः गेनि ह RT अ ७ रहने ळ्गे । राम-सेगम जिनका चित्त लगा हं : कन्द्मूलफकादीनि रक्ष्मणोष्चुदिल तयोः ॥१२॥ | ३ ३ हनो मि मा आनीय प्रददौ रामसेवातत्परमानसः मे जी नित्यप्रति उन्हें कन्द-मूल-फ़ल लाकर ददौ रामसेवातत्परमानसः । देते ओर रात्रिके समय धनुप-ब्राण लेकर चारों ओर घडुबागवरा चित्य रात्रा जागा सवतः ॥१३॥ घूमकर रक्षा करते इए जागा करते।।१०-१३॥ वे सर्ग ४] खानं झुवन्त्यनुदिनं त्रयस्ते गौतमीजले। उभयोर्मध्यगा सीता इरुते च गमागमौ ॥१४॥ आनीय सलिलं नित्यं लक्ष्मण! प्रीतमानसः । है 'सेवृतेव्हरह! गीत्या एबमासन्‌ सुखं त्रयः ॥ १५॥ / एकदा लक्ष्मणो राममेकान्ते सयुपर्थितम्‌ । विनयावनतो भूत्या पप्नच्छ परमेश्वरस्‌ ॥१६॥ भगवन्‌ श्रोतुमिच्छामि मोक्षखेकान्तिकीं गतिम्‌ । त्वत्तः कमलपत्राक्ष सद्ठेपाइक्तुमद्देसि ॥१७॥ ज्ञानं विज्ञानसहितं भक्तिपैराग्यबंहितम्‌ । आचक्ष्व मे रघुभ्रेष्ठ वक्ता नान्योऽस्ति भूतले ॥ १८॥ शराम उवाच भृणु वक्ष्यामि ते वत्स गुह्याद्गुह्यतरं परम्‌ । ' _ यद्विज्ञाय नरो जह्यात्सद्यो पेकल्पि्क श्रमम्‌ ॥१९॥ आदौ मायाखरूपं ते वक्ष्यामि तदनन्तरम्‌ । ज्ञानस्य साधन पश्चाज्ज्ञानं विज्ञानसंयुतम्‌ ॥२०॥ ज्ञेयं च परमात्मानं यज्ज्ञात्वा मुच्यते मयात्‌ । अनात्मनि शरीरादावात्मबुद्विर्तु या भवेत्‌ ॥२१॥ सेव माया तयेवासो संसारः परिकल्प्यते । रुपे दवे निश्चिते पूर्वे मायाया; कुरूनन्दन ॥२२॥ ९ विक्षेपावरणे तत्र प्रथमं कल्पयेजगत्‌ । 7 लिङ्गा्न्नहमपयन्तं स्थूलय़क्ष्मावेभेदतः ॥२३॥ अपरं त्वखिलं ज्ञानरूपमादृत्य तिष्ठति । ` मायया कल्पित विश्वं परमात्मनि केवले ॥२४॥ रजौ भुजङ्गवद्‌ न्त्या विचारे नासि किञ्चन । शूयते इश्यते यद्यत्सर्ते वा नरैः सदा ॥२५॥ असदेव हि सत्सर्वं यथा स्वप्तमनोरथों । देह एव हि संसारशक्षमूलं इढं स्पृतम्‌ ॥२६॥ अरेण्यंकाणंडे ec wv eS र वीन ४श ७ ७४४७ फशी पेन नर फरक केक ७ ७७७७७००३०५ ७०७ कक क्य ११७ तीनों ही नित्यप्रति गौत॑मीमें स्नान किया करते थे | उस समय सीताजी उन दोनोंके ब्रीचमें रहकर आया-जाया करती थीं ॥ १४ ॥ छक्ष्मणजी प्रसनचित्तसे नित्यप्रति जळ छाकर भक्तिपूर्वक उनकी सेवा किया करते थे। इस प्रकार वे तीनों वहाँ सुखपूरबक रहने छगे॥१५॥॥ एक दिन लक्ष्मणजीने एकान्तमें वेठे हुए परमात्मा श्रीरामके पास जाकर नम्रतापूरवक पूछा-। १६॥ “भगवन्‌ ! मैं आपके मुखारविन्दसे मोक्षका अब्य- मिचारी निश्चित साधन सुनना चाहता हूँ; अतः हे कमलनयन ! आप उसका संक्षेपसे वर्णन कीजिये ॥ १७॥ हे रघुश्रेष्ठ ! आप मुझे भक्ति और वैराग्यसे सना हुआ विज्ञानयुक्त ज्ञान सुनाइये; संसारमें आपके अतिरिक्त इस विषयका सुनानेवाळा और कोई नहीं है ॥” ॥१८॥ श्रीरामजी बोळे--वत्स ! सुन, मैं तुझे गुह्यसे भी गुह्य परम रहस्य सुनाता हूँ जिसके जान छेनेपर मनुष्य तुरन्त ही विकल्पजनित ( संसाररूप ) भ्रमसे मुक्त हो जाता है ॥ १९ || प्रथम मैं तुमसे मायाका स्वरूप कहूँगा, तत्पश्चात्‌ ज्ञानका साधन बताउँगा और फिर विज्ञानके सहित ज्ञानका वर्णन करूँगा || २० ॥ इनके अतिरिक्त ज्ञेय परमात्माका भी स्वरूप बतलाऊंगा जिसके जान लेनेपर मनुष्य संसार-भयसे मुक्त हो जाता है । शरीरादि अनास्मपदार्थोमें जो आत्मबुद्धि होती है उसीको माया कहते हैँ । उसौके द्वारा इसं संसारकी कल्पना हुई है । हे कुलनन्दन ! मायाके . पहले-पहल दो रूप माने गये हैं ॥ २१-२२ ॥ एक विक्षेप, दूसरा आवरण | इनमेंसे पहली विक्षेप-शाक्ति ही महत्तत्वसे लेकर ब्रह्मातक समस्त संसारकी स्थूळ और सूक्ष्म भेदसे कल्पना करती है ॥ २३ || और दूसरी आवरण-शक्ति सम्पूर्ण ज्ञानको आवरण करके स्थित रहती है । यह सम्पूर्ण विश्व रुजुमें सर्प-्रमके समान जुद्ध परमात्मामें मायासे कल्पित है; विचार करनेपर यह कुछ भी नहीं ठहरता । मनुष्य जो कुछ सर्वदा सुनते, देखते और स्मरण करते हैं, वह सब स्वप्न और मनोरथोंके समान असत्य हैं। शरीर ही इस संसाररूप वृक्षको दृढ़ मूल है ॥ २४-२६ ॥ उसीके कारणं पुत्र: न्या वि ११८ अंध्यांत्मरामायेणं ॒ [सग ४ ५८५3 ५७ (3५3०-३९ ९५०७५ ७५+ज४/+७+७३-+७+९००९५+»१५-३७+३० तन्मूलः पुत्रदारादिबन्यः कि तेऽन्यथात्मनः।२७॥| कल्वादिका वन्थन है, नह तो आत्माका इनसे क्या. देहस्तु स्थूलभूतानां पश्च तल्मात्रपश्वकमू । | सम्बन्ध है ॥ २७ ॥ पाँच स्थूळ भूत, पन्न तन्मात्राएँ, ५ Ro हंकार, बुद्धि, दरा इन्द्रियोँ, चिदाभास, मन और मूळ- द्विथ्व इन्द्रियाणि. तथा. दश ॥२८॥ | अदर) दि दशान्या) न करत झाडून इन द प्रकृति इन सबके समूहको क्षेत्र समझना चाहिये; इसीको ~ CT ~~ विदामास नच सूख तरव दि इ | शरीर भी कहते हैं || २८-२९ ॥ निरामय परमात्मा- एतत्क्षत्रामात जय दह इत्याभधायते॥२९॥ रूप जीव इन सबसे पृथक हैं । अब में उस जीवको एतैरविलक्षणो जीचः परमात्मा निरामयः । | जाननेके कुछ साधन भी बताता हुँ (सावधान होकर) तर्य जीवस्य विज्ञान साधनान्यपि मे शृणु ॥३०॥ | तुनो ॥ २० ॥ जीवश्च परमात्मा च पर्यायी नात्र भेदधीः । जीव ओर परमात्मा यह पर्याय शब्द हैं--दोनोंका सानाभावसथा दम्भहिसादिपरिव्जेनस्‌ ॥३१॥| अभिप्राय एक ही है; अतः इसमें मेद-चुद्धि नही करनी शय्या चाहिये | अभिमानसे दूर रहना, .दम्भ और हिंसा पराक्षपाद्सहन॑ सवत्रावक्रता तथा। आदिका त्याग करना ॥ ३१ ॥ दूसरोंके क्रिये हुए मनोवाक्रायसङ्भकत्या सद्शुरोः परिसेवनम्‌ ॥३२॥| आक्षेपादिको सहन करना, सर्वत्र सरल भाव रखना, मन; , वचन ओर शरीरके द्वारा सच्ची भक्तिसे सदगुरुका सेवा बाह्यभ्यन्तरसं शुद्धिः खिरता सर्त्रियादिषु । करना ॥ २२ ॥ वाग्र और आन्तरिक बुद्धि रखना, मनोवाकायदण्डश्च विषयेषु निरीहता ॥३३॥ | सत्कर्मोगे तत्पर रहना, मन, वाणी और शरीरका संयम _ करना, विपयोंमें प्रवृत्त न होना ॥ ३३ || अहंकारशान्य . निरहङ्कारता जन्मजराचयाठोचनं तथा । रहना, जन्म, मृत्यु, रोग और बुढ़ापे आदिके कष्टोंका असक्तिः सखेहशून्यत्व पुत्रदारधनादिषु ॥३४॥। | विचार करना,पुत्र, त्री और धन आदिमं राग तथा खेह न षटनिष्टागमे नित्यं चित्तस्य समता तथा | | करना॥३४॥ इष्ट और अनिष्टो प्रात्तिमें चित्तको सदा समान रखना, मुझ सर्वात्मा राममें अनन्य बुद्धि रखना मयि सर्वात्मके रामे झनन्यविषया मतिः ॥३५॥ | ॥३५॥ जनसमूहसे शून्य पवित्र देशमें रहना, जनसम्वाधरहितुद्धदेशनिपेवणम्‌॒ । | संसारा छोगोंसे सर्वदा उदासीन रहना ॥ ३६ ॥ तै्जनसहै ; _ | आत्मज्ञानका सदा उद्योग करना तथा वेदान्तके अर्वका प्राहृतेजनसद्दथ्व हरतिः सर्वदा भवेत्‌ ॥२६॥ विचार करना--इन उक्त साधनोंसे तो ज्ञान ग्राप्त आत्मज्ञाने सदोद्योगो वेदान्तार्थावलोकनम्‌ । | होता है और इनके विपरीत आचरण करनेसे विपरीत उत्तरेतेभवेजज्ञानं विपरीतैविपर्ययः ॥३७॥॥ फळ (अज्ञान ) मिलता है ॥ ३७॥ वुद्धिम्राणमनोदेहाहकृतिभ्यो विलक्षणः | ' जिस शुद्ध ज्ञानसे ऐसा वोध होता है कि में बुद्धि, चिदात्माऽई नित्यजुद्धो बुद्ध एवेति निथयम॥३८। प्राण, मन, देह और अहंकार आदिसे विलक्षण नित्य किक वक शुद्ध चुद्ध चेतन आत्मा हूँ वही मेरे मतसे निश्चित ज्ञान यन जानन संवित्त तज्ज्ञानं निश्चितं च मे । है | जिस समय इसका साक्षात अनुभव होता है ~ . CEN ~ विज्ञान च तदवतत्साक्षादनुभवेधदा ॥३९॥ | उस समय इसीको विज्ञान कहते हैं ॥ ३८-३९ || आत्मा सर्वत्र पूर्ण, चिदानन्दस्वरूप, अविनाशी, बुद्धि आदि उपाधियोंसे शून्य तथा परिणामादि विकारोंसे 1४०॥ | रहित है || ४०॥ यह अपने प्रकाशसे देहः आदि क्‍ज५.-८::5..:::::::77:-::5 >>... _ - _ ण जज Cane आत्मा स्त्र पूर्णः स्थाचिदानन्दात्मकोडव्ययः | घुद्चाद्यपाधिरहितः परिणामादिवितः । Return DTD न Cop का य. ॅऑऑऑऑॅऑऑशासला सर्ग ४] स्वप्रकाशेनं देहादीन्‌ भासयत्ननपाऱतः 1 एक एवाद्वितीयश्च सत्यज्ञानादिलक्षणः ॥४१॥ असङ्गः सप्रभो द्रष्टा विज्ञानेनाबगम्यते । ` आचायेशाखरोपदेशादैक्यज्ञानं यदा भवेत्‌ ॥४२॥ आत्मनोजीवपरयोगूलाविद्या तंदेव हि । लीयते कार्यकरणेः सहैव परमात्मनि ॥४३॥ साअ्वस्था माक्तिरित्युक्ता झपचारोऽयमात्मानि । इदं मोक्षखरूपं ते कथितं. रघुनन्दन ॥४४॥ bn ज्ञानविज्ञानवेराग्यसहितं मे प्ररात्मनः । किन्त्ेतदु्ेमं मन्ये मद्भक्तिवि्युखात्मनाम 1 ४५॥ चक्षुष्मतामपि थथा रात्रो सम्यङ्‌ न इश्यते । पदं दीपसमेतानां दृश्यते सम्यगेव हि॥४६॥ एवं मद्भक्तियुक्तानामात्मा सम्यक्‌ प्रकाशते । Lo ToS मद्धक्तः कारण काश्चक्यास शयु तच्वत+ मङ्गक्तसङ्को मस्सेवा मद्धक्तानां निरन्तरम्‌ । 0 ३ 11:0५ एकादड्युपवासादि मम परवोजुभोदनम्‌॥४८)॥ | मेरे पर्व दिनोंको मनाना ॥ ४८) मेरी कथाके सुनते, मत्कथाश्रवणे पाठे व्याख्याने सर्वदा रतिः 1 अरण्यकाण्ड. ११९ उपाधियोंको प्रकाशित करता हुआ भी खयं आवरण- शून्य, एक, अद्वितीय और सत्य ज्ञान आदि छक्षणोंचाळा तथा संगरहित, खप्रकाश और सबका साक्षी है-ऐसा विज्ञानसे जाना जाता है । जिस समय मनुष्यको आचार्य और शात्रके उपदेशसे जीवात्मा और परमात्माकी एकताका ज्ञान होता है उसी समय मूळा अविद्या अपने कार्य और साधनोंके सहित परमात्मामें छीन हो जाती है॥ ४१-४२ ॥ अविद्याकी इस ल्यावस्थाको ही मोक्ष कहते हैं, आत्मामे यह (बन्ध और मोक्ष ) क्रेषळ उपचारमात्र है ( वास्तवमें आत्माकी बन्धावस्था और मुक्तावस्था नहीं है वह तो सदा ही मुक्त है ) हे रघुनन्दन | लक्ष्मण ! तुम्हें मैने यह ज्ञान, विज्ञान और चेराग्यके सहित परमात्मारूप अपना मोक्षखरूप सुनाया । किन्तु जो लोग मेरी भक्तिसे विमुख हैं उनके लिये मैं . इसे अत्यन्त दुळम मानता हँ ॥ ४४-४५ ॥ जिस प्रकार नेत्र होते हुए भी लोग रात्रिके समय अन्धकारमे भली प्रकार नहीं देख सकते, दीपक होनेपर उस समय मागं दिखायी देता है, उसी प्रकार मेरी भक्तिसे युक्त पुरुषोंको ही आत्माका सम्यक्‌ साक्षात्कार [४७ | दोता है । अब मैं अपनी भक्तिके कुछ बास्तविक उपाय बताता हुँ, साबधान होकर सुनो ॥ ४६-४७॥ “मेरे भक्तका संग करना, निरन्तर मेरी और मेरे भक्तोंकी सेवा करना, एकादशी आदिका ब्रत करना, पढ़ने और उसकी व्याख्या करनेमें सदा प्रेम क्ररना; मत्पूजापरिनिष्ठा च मस नामाुकीर्तनम्‌ ॥४९॥ | मेरी पूजामें तत्पर रहना, मेरा नाम-कौतेन करना एवं सततयुक्तानां भक्तिरन्यमिचारिणी । ॥ ४९ || इस प्रकार जो निरन्तंर,सुझरमे लगे रहते हैं उनकी मुझमें अविचळ भक्ति हो जाती डै।.फिर मयि सञ्जायते नित्यं ततः! किमवंशिष्यते ॥५०॥ | बाकी ही क्या रहता है! || ५० ॥ अतः ( यह निश्चित । बात है कि ) मेरी भक्तिसे युक्त पुरुषको ज्ञान, विज्ञान ~ [a ऱ्च || अतो मळ्ूक्तियुक्तस्य ज्ञान विज्ञानसंतर । और वैराग्य आदिकी शीघ्र प्राप्ति होती है और फिर आ 4 वैराग्यं च भवेच्छीधं ततो मुक्तिमवाप्रयात्‌॥५ १॥ | बहू मोक्ष प्राप्त कर छेता है ॥ ५१॥ इस प्रकार मैंने तुम्हारे प्रश्नानुसार यह-सम्पूर्ण रहस्य तुम्हें सुना दिया । जो व्यक्ति अपने चित्तकों इसमें अखिन्मनः समाधाय यसित्ठेत्स तु सुक्तिमाका५२॥ नाहित करके रहता है बह मोक्ष आपत कर छेता है न वक्तव्यमिदं यतान्मद्धक्तिविमुखाय हि ` | ॥ ५२१ अतः हे लकमण मेरी मिते विशु पष कथितं सर्वमेतत्ते तव प्रश्नानुसारतः; Ly १२० अध्यात्मरामायण [सम्‌ ५ मङ्कक्ताय प्रदातव्यमाहूयापि प्रयक्षतः॥५३॥ | इसे सावधानतापूवक न कहना चाहिये और मेरे भक्तोंको कान ळात) प्रयन्रपृचंक घछाकर भी त्यं श्रद्धाभक्तिसमन्वित! | | (इस प्रकारका मे य इदे ह पराश अ स यह रहस्य सुनाना चाहिये ॥ ४३ ॥ जॉ पुरुष इस अज्ञानपटलध्यान्तं विधूयपरिमुच्यते ॥५४॥ श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सदैव पढ़ेगा यह. अज्ञानान्यकार- २९ «हर हर्ट र ४८४५ AANA rte aE Fre भक्तानां मम योगिनां सुविमल- रूप परदेको हटावर मुक्त हो जायगा ॥ ०४ ॥ जो खान्तातिशान्तात्मनां पुरुप मेरी संबामे अनुरक्त-चित्त, निर्मठछदय, दाला मत्सेवाभिरवात्मनां च विमल- विमल्ज्ञानसग्पन और मेरे परम भक्त ग्रोगिजनोंका मंग ज्ञानात्मनां सर्वदा । अनन्य चुद्विसे सर्वदा उनकी सेवम नत्र र्कार सङ्गं य! कुरुते सदोद्यतमति- करता हैं, मुक्ति उसके सदैव करतलगत शती है स्तत्सेवनानन्यधी- और में सर्वदा उसकी दष्टिके सम्मुख विराजमान मोषस्य करे खितोऽहमनिशं रहता हूँ । इसके अतिरिक्त और किमी उपायमे मंग दृश्यों भवे नान्यथा॥५५॥ | दर्शन नही हो सकता ॥ ५० ॥ — dre इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे चतुर्थः सर्ग: ॥ ४ ॥ ९ पञ्चम सग शूर्पणखाको दण्ड, खर आदि राक्ष्तोक्ा वध्र और शूपणखाका रायणके पास जाना! श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेचजी बोले--६ं पार्वति ! उस समय उस ~ | घोर वनमें जनस्थानकी रहनेत्राली एक महावलयती व > ~ (९ । तस्मिन्‌ काठे महारण्ये राक्षसी कामरूपिणी | इच्छानुसार रूप धारण कानेवाली रक्षी वरमा करती चचार गहासच्चा जनस्याननिचासिनी ॥१॥ | थी | १॥ एक दिन पञवटीके पास गोतमी नदी एकदा गोतमीतीरे पञ्चवट्याः सम्रीपत! | | तीरिपर जगसति श्रीरामचन्द्रजीके पदा, वज्र और अदा आदिके चिद्वोसे युक्त चरण-चिहोंकों देखकर वह उनके पद्वज्नाइुशाहानि ; " र ाककांने पदानि जगतीपतेः ॥२॥ सोन्दयसे मोहित होकर कामासक्त हुई उन्हें देखनी- थ्ट्वा कामपरातात्मा पादसोन्द्यमोहिता। देखती धीरे-धीरे रघुनाथजीके आश्रममे चली आयो पश्यन्ती सा शनेरायाद्राघवस निवेशनम॥श॥ |! मड वहा आकर ने समान अति सुन्दर उक्ष्मापात श्रोरामचन्द्रजीको सौनाजीके साध मोडे तत्र सा त रमानाथं सीतया सह संखितम्‌ । | देखकर वह कामातुरा राक्षसौ रघुनाथजासे बोठी-- न्दं रामं इष्टा कामविमोहिता ॥8॥ | “तुम किसके पुत्र हो १ तुम्हारा क्या नाम है ? इस राक्षसी रां प्राह कस्य त क! किमाश्रमे । | आश्रमम जटा-वल्कलादि धारण कर्‌ क्यो रहते हो! यहाँ रहकर तुम क्या प्राप्त करना चाहते हो ? सा मझे चे ५ 5 9 ww ८ को जदाबल्कलाचे: साध्यं कि तेऽत्र भे वद ॥५॥ बताओ || ४-५ || में राश्चसराज महात्मा राणक Q सम्‌ ५ | अरण्यकाण्ड | 9२१ है. नय्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्प्प्स्य्प्क्य्प्प्य्य्क्प्प्क्य्य्प्प्प्प्प्प्प्फ्प्श्क्सस्स्ट्स---------.................... > [ ~ , अह शूपणखा नाम राक्षसा कामरूपिणी । वहिन कामरूपिणी राक्षसी शर्पणखा हूँ ॥ ६ ॥ मैं भगिनी राक्षसेन्द्रस्य रावणस्य महात्मनः ॥ ६॥ | अपने भाई खरके साथ इसी वनमें रहती हूँ । राजाने सरेण सहिता आघ्रा घसाम्यत्रेव कानने । |$ त अभिकार सप दिया है, अतः में मुनियोंक्रो खाती हुई यहाँ रद्दती हूँ ॥७॥ हे राज्ञा दृत्तं च मे सवे मुनिभक्षा वसाम्यहम्‌ ॥ ७॥ | वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! मैं तुम्हारे विषयमें जानना चाहती Ae SA 6 - , हूँ, अतः तुम मुझें अपना नाम-धाम आदि } ला छ वादतुमच्छाम वद से वदता वर | | बताओ । तब भगवानूने उससे कहा--- “मैं अयोध्या- तामाह रामनामाहमयोध्याधिपतेः सुतः ॥ ८॥ | पति राजा दशरथका राम नामक पुत्र हूँ ॥ ८॥ एपाभे सुन्दरी भार्या सीता जनकनन्दिनी । | पढ छरी मेरी भार्या जनकनन्दिनी सीता है तथा | न्ये कष्ण ऽ वह अति सुन्दर कुमार मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है स तु भ्राता कनीयान्मे रकषमणोऽतीव सुन्दर! ॥९॥ । ९ || हे त्रिझुवनसुन्दरि ! बताओ, मैं तुम्हारा क्या कि कृत्यं ते मया ब्रूहि कार्य स्ुवनसुन्दारि। | कार्य करूँ १” रामचन्द्रजीका यह वचन सुन- ~ Ar वज | if | इति रामवचः शुत्वा कामार्ता साऽब्रवीदिदस्‌|१०॥| कर कामातुर शर्पणखा वोली-॥ १० ॥ “राम ! चले एहि ड RR (किसी) गिरि-गुद्दामें चलकर मेरे साथ रमण करो। इस कामाताऽहं न शक्रोमि त्यक्तु त्वां कसलेक्षणम्‌।११। नहीं सकती” ॥ ११॥ रामः सीतां कटाक्षेण पर्यन्‌ ससितमन्रवीत्‌ । ¦ तब रामचन्द्रजीने नेत्रोंसे सीताजीकी ओर संकेत करके मुसंकाकर कहा--“हे छुन्दरि ! मेरी तो यह मंगलमयी भार्या जीवित है ॥ १२॥ इसके रहते इए तुम जन्मभर सौतकी डाहसे जळती हुई किस प्रकार सुखपूर्वक रह सकोगी ? बाहर मेरा अत्यन्त सुन्दर बहिरास्ते मम आता लक्ष्मणोऽतीब सुन्दरः ॥१३॥ | छोटा भाई लक्षमण विराजमान है ॥ १३ ॥ बह तुम्हारा , योग्य पति होगा, तुम उसीके साथ ( बन-पर्वतादिमें ) तग्राच्ुरूपो भविता पतिस्तेनंध सञ्चर । | बिहार करो ।” रामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर झुर्पणखाने लक्र्मणजीसे जाकर कहा-“हे सुन्दर ! तुम मेरे पति हो जाओ ॥ १४॥ तथा अपने भाईकी आतुराज्ञां पुरस्कृत्य सङ्गच्छायोऽद्य माचिरम्‌ । ' आज्ञा मानकर चले, आज हम और तुम परस्पर | संगमन करें, देरी न करो । ' उत्याइ राक्षसी घोरा लक्ष्मणं काममोहिता॥१५॥ | उस काममोहिता राक्षसीने जब लक्ष्मणजीसे इस प्रकार कहा ॥ १५ ॥ तो वे उससे बोले, तामाह लक्ष्मणः सास्ति दासोऽहं तख घीमतः। | “साध्वि ! मैं तो उन घुद्विमान्‌ भगवान्‌ रामका दास . , हूँ । मुझे अपना पति बनानेसे तुम्हें भी उनकी दासी दासी भविष्यसि त्वं तु ततो दुःखतरं चु किम्‌ । १६) | बनना पडेगा । तुम्हारे लिये इससे अधिक दुःखकी ५ मर और क्या बात होगी ! ॥ १६ ॥ तुम्हारा कल्याण हो, तमेव गच्छ भ्रं ते स तु राजाऽलिलेश्वरः। | तुम उन्हींके पास जाओ, वे महाराज सबके स्वामी हें |” यह सुनकर वह दुश्चित्ता राक्षसी फिर रघुनाथजीके पास आयी ॥ १७ ॥ और क्रोधपूवक भाया ममपा कल्याणी बिद्यते हनपायिनी ॥१२॥ तवं तु सापत्न्यदुःखेन कथं स्थास्यसि सुन्दरि । इत्युक्ता लक्ष्मणं ग्राह पतिर्म सव सुन्दर ॥१४॥ तच्छ्रत्वा पुनरप्यागाद्राधचं टृटमानसा॥।१७॥ १८ शी शि oe ५ १२२ अध्यात्मरामायण [ सग ५ RNR NRE सस का मे न | तुम बडे चश्लळचितत दो, मुझे क व स्थतः | बोली हे राम र है « २” कांधाद्राम किमर्थ मां आययस्यनवा | क्यों इधर-उधर घुमा रहें हा! म॑ अरमा तुम्हार सामने टा इदानीमेव तां सीतां भक्षयामि तवाग्रतः॥१८। ¦ इस सीताको खाये जाती हूँ” ॥ १८॥ | इत्युक्त्या विकटाकारा जानकीमनुधावति | । ऐसा कह वह विकट रूप धारण कर जानकार्जी- ~ ~ | की ओर दोडी | तब लक्षागर्जनि रामचन्टरजीकी आघ ज्ञया खङ्गमादाय परिगृह्य ताम्‌ ॥१९॥ | यान सा न ततां रामा ज्ञ द्‌ पु मू | से उसे पकड़कर बड़ी फुर्तीस खड्ग नेवार उरक नाक- र 4 ति क [a , < a » की | चिच्छेद नासां कणों च लक्ष्मणो लघुविक्रमः । ` कान काट डाळे | तदनन्तर वह धोर ब्द करती हुई | र रथ ठु जाकर रन र ततो योरध्वनिं कृत्या रुधिराक्तवषुद्ठुतम्‌॥२०॥ रुधिरमें लथपथ हो बड झीमश्तासे जाकर राती. और ग्रे परुपाक्षरा । कठोर शब्द करती सरके सामने गिर पर्दी । उसे ऋन्दमाना पपाताग्रे खरस्य परुपाक्ष देखकर तीक्षण ध्वनिंवाडे खरने कद्ा--- का क्या बात क्रमेच कारितासि त्व सत्यो ने तेरी यह ददा की है ? त बनला तो सही, वह केनेयं कारितासि त्व मृत्योव॑क्त्रालुवर्तिना । , दरे तेरी यह दह्या का ह त वतला ता सह क. मे तं वधिष्यामि पि क्षणात्‌॥२२॥ काठके समान भी बल बयो न ह, में उसे गमरे तमाह राक्षसी रामः साताउक्ष्मणसंयुतः। , तव राक्षसौ शर्षृणखाने उससे कदा-“यदा TS _ ते सीता और टक्ष्मणके सहित राम दण्ठकारण्यको दण्डके विमय नाते गोदावरीतटे ॥२२॥ निर्भय करता हुआ गोदावरीके तटपर रहता ऐ ॥२२॥ क$ 4, 3 घर De s 2 ~ ~ टत ०» ७ & oe सामेवं कुतवांस्तस्य आता तेनेव चोदितः। उसकी प्रेरणासे उसके भाई लक्ष्मणने मेरी यट गति ® a ° वीरो ~ NN को है यदि तुम बड़े कुलीन ओर ब होतं डन यदि तवं जातोऽसि वीरोऽसि जहि तौ रिषू।२४। "£ । ६ छम वडे इरन और वीर हो तो उन हि ॥॒ ' दोनों शत्रुओंकी मार डालो ॥२४॥ तुम उन he & ha = * किम क = = >. तयोस्तु रुधिरं पाखे भक्षयेतो सुदुर्मदौ । ' दोनों मदोन्मत्ता खा जाओ ओर में उन नो चेत्माणान्परित्यज्य यास्यामि यमसादनम्‌।२५| दोनोंका रुषिर पौजेंगी । नहीं तो अपने प्राणोको छोड़कर यमलोक चली जाऊँगा ॥ २५, ॥ तच्छुत्वा त्वरितं प्रागात्खरः क्रोधेन मूच्छितः । | श्पेणखाका यह कथन सुनकर खर क्रोधरो अधीर ` [oe « n } न्त्‌ युद्धके ये डे मक न रनवे, लेमे चहुदेश सहल्ाणि रक्षसां मीमकर्मणास्‌॥२६॥ | ही लह! र यि) चला और रामक मारनेके ल्म ha 6 + 1 बड पर दह सहल श्वस्‌ उनका स चोदयामास रामस्य समीपं वघकाङ्कया। 5 ॐ परेश चोदह सहल राक्षस उनके पार | भेजे । राक्षसराज खर, दूषण और निशिरा--ये सभी । नाना प्रकारके अञ्न-शा लेकर रामके पास आये | 1 [| foe ee खरथ्च त्रिरिराथैय दूषणश्चैव राक्षसः॥२७॥ सवे रामं यथुः शीध्रं नानाप्रहरणोद्यताः | ' उनका कोळाह सुन श्रीरामचन्दरजीने रुव्मणर्मासे शृत्वा कोलाहलं तेपां रामः सो मित्रिमन्नवीत्‌ ॥२८॥ | कहा-। २६-२८॥ “श्मण ! देखो, बड़ा कोलाहल शूयते विषुः शब्दों भूतमायान्ति राक्षसाः । | उगी पड रहा है, माम होता है निश्चय ही राक्षसगण भविष्यति मह्चुद्धं नूनमद्य सया सह॥/२९॥ | ^ अवसप आज मेरे साथ उनका घोर युद होगा मह , | ॥ २९ ॥ अतः हे महावळ ! तुम सीताको छेकर किसी साता नात्वा शुद्दा गत्वा तत्र तिष्ठ महावछ । | पर्वतकी कन्दरामें चळे जाओ । आज में इन समस ह व he ~ ॥ हन्छुमच्छाम्यह सवान्‌ राक्षसान्‌ घोररूपिण॥३ ०| घोररूप राक्षसोंका वध करना चाहता हैँ॥३०॥ अब कहद TT सगे ५] अरण्यकाण्ड TITTIES SSSI ४४४४४४४४४७ SNe SN eee CCU SCS nous ६३९० ६५ ५१९० er अत्र किञ्चिन्न वक्तव्यं शापितोऽसि ममोपरि । तुम्हें मेरी सोगन्द है, इस विपयमें तुम और कुछ न जे 3. 8 कहना ।” तब छक्ष्मणजी जो आज्ञा' कह सीताजीको तथेति सीतामादाय रुक्षमणो गह्वरं ययो॥३१॥ लेकर एक गिशिगुहामें चळे गये ॥ ११ || Ne ee ०. राम! परिकरं वद्धा धनुरादाय निष्ठुरम्‌ । तब शरामचन्द्रजीने अपनी कमर कसी और कठोर कप परोड्भचताञ्ञ! घनुष तथा दो अक्षय बाणवाळे तरकदा बाँधकर युद्धके धरा वक्षपशरा बद्वायत्ताऽमवत्म्रञ्चः ॥३२॥ हे सिल्क लिये तैयार हो गये ॥ ३२ ॥ तदनन्तर राक्षसगण वहाँ तत आगत्य रक्षांसि रामस्योपरि चिक्षिपुः । आकर रामके ऊपर नाना प्रकारके अल्न-दा्न, पत्यर आयुधानि विचित्राणि पापाणान्पादपानपि ॥३ श॥| और शक्षादिकौ वर्षा करने ळो॥ ३३ ॥ श्रीरामचन्द्र RR जीने एक क्षणमात्रमें छीछासे ही उन अख-शख्ादिको तानि चिच्छेद रामोऽपि लीलया तिलशः क्षणात्‌। | हिढ-तिळ करके काट डाला | फिर सहचों बाणोंसे ततो बाणसहस्रेण इत्वा तानू सर्षराक्षसान्‌ (॥४४॥ | उन सम्पूर्ण राक्षसोंकी मारकर खर, दूषण और त्रिशिरसं सैव दषणं च | त्रिशिराको भी मार डाला । इस प्रकार रघुबंशियोंमें खर '्ाशरस चव काया शि राक्षसस | | अ आरामचन्दरजीने आये पहरमें ही उन समस्त जघान ग्रहराधेंन सर्वानेव रघूत्तमः ॥३५॥| राक्षसोंका संहार कर दिया ॥ २४-२५॥ रुपमणो5पि शुहामध्यात्सीतामादाय राघवे। | तब ठवणजीने गुहामेंसे सोताजीको ठाकर ' १ ९ ~ | श्रीरधुनाथजीको सौंप दिया । उस समय सम्पूर्ण न्ट न्वश्षयम प्ययो ॥३६।। , ~ * -समप्य राक्षसान्दष्टा हता ३६ रक्षो मरे हुए देख वे बड़े विसित हुए ॥ ३६॥ सीता रामं समालिडर्य प्रसन्नछुखपङ्जां। | जनकनन्दिनी श्रीसीताजीने प्रसनसुखसे श्रीरामचन्दर- । जीका आछिंगन किया और उनके शरीरमें हुए घार्वोपर नि चाङ्गेषु ममार्ज जनकात्मजा ॥३७॥ | शल्ननगान 3 | हाथ फेरने रगा || ३७ ॥ साऽपि दुद्राव दृष्टा तान्हतान्‌ राक्षसपुङ्गवान्‌ । , उन सम्पूर्ण हक राक्षसोंको i देख राक्षस- नि 3... ~ राज रावणकी त्रहिन शूप॑णखा दोडती हुई लका- लड्डू कराशन्ता 1 न्धा। | < | | w रोती ९ ha गला सालक वि पादसनिया। २ में पहुँची और राजसभार्मे पहुँचकर रोती हुई रावणके रावणस्य पपातोव्यां भगिनी तस्य रक्षसः! | केके समीप पृथ्वीपर गिर पड़ी । अपनी बहिनको इस दृष्टा तां रायणः प्राह भगिनी भयविह्लाम्‌ ॥३९॥। | प्रकार भयभीत देखकर रावण बोळा-॥३८-३९॥ “अरी ` उत्तिष्ठोत्तिष्ठ बर्से स्व॑ थि मु वत्से! उठ, खड़ी हो | बता तो सही तुझे किसने विरूपा उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वससे स्वं बिरूपकरणं तद । किया है १ हे भद्रे ! यह इन्द्रका काम है, अथवा यम, कृतं शक्रेण घा भद्रे यमेन वरुणेन बा ॥४०॥ | वरुण और कुबेरमेसे किसीने किया है £ बता, एक ुमेरेणाथवा ब्रूहि मस्मीछुर्या क्षणेन तम्‌। | कषणे ही मैं उसे भस्म कर डाळंगा । 2 ° [11 बडे टी I द णखाने उससे कहा-“ तुम बड़े ही चेद त्वं प्रमत्तो विमूढधीः ॥४१॥| तब राक्षसा रह ' स्रीविजित! त्र लक्ष्यसे । ` | आसक्त, खीके वशीभूत और सब प्रकार नपुंसक- पानासक्तः ख्रीविजितः षण्ड! सवत्र लक्ष्यसे । जैरे लायी पते तुम्हारे चर (खुफिया चारचक्षुविहीनस्त्व कर्थं राजा भविष्यति ॥४२॥ | एछिस) रूप नेत्र नहीं है; फिर तुम राजा ह ५ १३५ अध्यात्मरामायण [सगं ५ कैसे रह सकोगे १॥ ४२॥ युद्भमें खर मारा गया तथा दूपण और त्रिदिरा आदि चोदह सहर मुख्य- चतुदश सहद्ताण राक्षसाना महात्मनाय्‌ ॥४३॥ मुख्य राक्षसोंको असुरशत्रु रामने एक क्षणमें ही निहतानि क्षणेनैव रामेणासुरशत्रुणा । मार डाळा और सारे जनस्थानको मुनीश्वरोंके लिये सवेथा निमय कर दिया | इतना उत्पात हो ज पुनः पर भी तुम्हें अभीतक कुछ पता ही नहीं है इसीलिय) न जानासि विसूढस्त्वमत एवं मयोच्यते ।।४४।। | मैं कहती हूँ कि तुम मूढ हो? ॥ 2३-99 ॥ खरश्च निहृतः सङ्कये दूषणस्रिशिरास्तथा । जनखानमशेपेण मुनीनां निर्भय कृतम्‌। रावण योळा--अरी त वता तो, वह राम कौन को वा रामः किमर्थ वा कथं तेनासुरा इताः । | है ! उसने किसलिये और किस प्रकार इन राक्षसों- भे तेपां मूठवा हद ५ को मारा £ त. सब बात विस्तारपूर्वक कह, में उसका सम्यकथय मे तेपां मूलबात॑ करोम्यहस्‌ ॥४५॥ | र कर डा ॥ ४५॥ शवण उवाच थो शूर्पणखा चोली---एक दिन जनस्थानसे मैं गोतमी- जनस्थानादह याता कदाचिट्गौतमीतटे । | के किनारे जा रही थी, वहाँ पूर्वकाल्मे मुनिजनोंसे नाम पुरा द्यानेजनाश्रया॥४६॥ | सेवित एक पञ्चवटी नामक आश्रम है ॥ ४६॥ उस तत्र पञ्चवटी व | आश्रममं मेने जटा-वल्कलादिसे सुशोभित धनुर्वाणधारी तत्राश्रर् सया इष्टा रामो राजोवठोचनः | | कमलनयन शोभाधाम रामको देखा ॥ ४७ ॥ धतुवाणधर! श्रोमान्‌ जरावर्कलसाण्डतः ॥४७॥ | उसका छोटा भाइ लक्ष्मण भी उसीके समान रूपवान कर्नायाननुजसस्य लक्ष्मणो5पि तथाविधः | है तथा उसकी विज्ञाललोचना भार्या भी रूपमें साक्षात लक्ष्मी-जेसी ४८ ॥ हे राजन्‌ ! देव तस मायां विश्वालाक्षी रूपिणी श्रीरिषापरा ॥४८॥, ५ सी ही हे ॥४८॥ हे राजन्‌ ! देव, गन्धे, नाग आर मनुप्य आदिमेंसे किसीकी भी ल्ली देवगन्धयनागाना मघुष्याणां तथाविधा। | ऐसा रूपवती न देखी है और न सुनी है । वह शुभ- न दान शुता राजन्यातयन्ती वनं शुमा ॥४९॥ | लक्षणा अपनी कान्तिसे सम्पूण वनको प्रकाशित कर आनंतुमहमुद्दुक्ता तां भायोथ तबानध | । रही थी॥ ४९॥ हे अनघ ! उसे तुम्हारी पत्नी बनाने- के लिये मैंने छानेका प्रयत्न किया था, इसीसे रामके लक्ष्मणा नाम तद्भधाता चिच्छेद मम चासकाम्‌।५० | भाई छक्ष्मणने मेरी नाक काठ डाली ॥५०॥ फिर कणा च नोदितस्तेन रासेण स महाबलः | रामकी प्रेरणासे महावली लक्ष्मणने मेरे कान भी काट तताऱ्हसातहुःखन रुदती खरमन्वगास्‌ ॥५१॥ | लिये । तव मैं अत्यन्त दुःखसे रोती हुई खरके पास सोऽपरिरामं समासाद्य दं राकषसमूथैः गयी | ५१॥ उसने भी अपने राक्षस-सेनापतियोंके थ तुरन्त जाकर रामसे युद्ध ठाना; किन्तु उस वळ- ततः क्षणन रामण तनव वरु्शाळना ॥५२॥ शाली रामने एक क्षणमें हीचे समल भीमविक्रम सर्वे तेन विल वै राक्षसा भीमविक्रमाः । राक्षस नष्ट कर दिये | हे प्रभो ! मुझे तो ऐसा माम याद रामो मनः कुयालेलोक्य निमिपार्थत ॥५३। होता है कि यदि रामके मतं आ जाय तो वह निस्सन्देह [५१ किक पु र [a मेषमें ही h भसीकर्यान्न सनदे इति भाति मम प्रभो | आधे निमेषमें ही सम्पूर्ण त्रिलोकीको भस्म कर सकता । किन्तु यदि उसकी त्री सीता तुम्हारी भार्या हो , € « Das “यदि सा तच मार्या स्यात्सफलं पव जीवतस्‌ ।५४। | जाय तो तुम्हारा जीवन सफळ हो जायगा॥ ५२-५४ || DS इज एक ० कश ---.. 3. SoS आळ... ६, ८ - सग ५ | सात) छ अर्थका १२५ es २५-०४ ८१०५ ०१०६००८८५, ल धा ४४४४४५८१५१ ४०९०६ 6५८९ FANON AI NINN 2६ PANNA ANIL NNN NN, अतो यतख राजेन्द्र यथा ते वल्लभा भवेत्‌ । अतः हे राजेनद्र ! तुम ऐसा प्रयत्न करो जिससे सम्पूर्ण a ~ 0 Os दि लोकोंमें एकमात्र सुन्दरी कमळनयनी सीता तुम्हारी ब क पड साता राजावपत्राक्षा सरयळोककसुन्दरा॥५५॥ प्राणप्रिया हो जाय || ५५॥ हे प्रभो ! तुम -रामके साक्षाद्रामस्य पुरतः खातु त्वंन क्षमः प्रभो । | सामने साक्षात्‌ न ठहर सकोगे, इसलिये उन मो गोवि त रघुश्रेष्को किसी प्रकार मायाजालसे मोहित कर तुम मायया मोहयित्वा तु प्राप्स्यसे तां रघूचसम्‌॥५६॥ उस्ते प्राप्त कर सकते हो ॥५६॥ शरुत्वा तत्सक्तवाक्येश्र दानमानादिमिसतथा । यह सुनकर राक्षसराज रावणने सुन्दर वाक्यों और आश्वास्य भगिनी राजा ग्रविवेश स्वर्क गृहम । | दान-मानादिसे वदिन शरर्पणखाको धैर्य बॅधाकर अपने तन्न चिन्तापरो भूत्वा निद्रा रात्रौ न लब्धवान्‌ ५७ | अन्तःपुरमें प्रवेश किया, किन्तु वहाँ चिन्ताके कारण एकेन रामेण कथं मञुष्य- उसे रात्रिको नींद नहीं आयी ॥५७]| वह सोचने लगा- मात्रेण नष्टः सवल! खरो मे । | वडे आश्चर्यकी बात है, अकेठे मनुष्यमात्र रघुवंशी | ये बलवीर्यदरप- रामने बळ-बीर्य और साहससम्पन्न मेरे भाई खरको दछ- शि तो दिनों बत राधवेण॥५८॥ | बल्के सहित कैसे मार डाला ! ॥ ५८॥ अथवा यह यद्वा न रामो मनुजः परेशो , राम मनुष्य नहीं ह साक्षात्‌ परमात्मने ही पूर्वकालमें मां हन्तुकामः सबलं बलोघेः || | की हई अह्माकी प्राथनासे मेरी बढ-वीय-सम्पन्न सेनाके सम्प्राथितोऽयं हृहिणेन पूर्व सहित मुझे मारनेके लिये इस समय रघुबंशमें मनुष्य- मतुष्यरूपो5्य रघोः कुळे्भूत्‌ 1५९) | रूपसे अवतार लिया है || ५९॥ किन्तु मुझे रामके चष्यो यदि स्यां परमात्मनाहं पास अवश्य चढना चाहिये, क्योंकि यदि उन परुमात्मा- बेकुण्ठराज्यंपरिपारयेहम्‌ । | द्वारा मैं मारा गया तव तो मैं वैङुण्ठका रँज्य भोगूँगा नो चेदिदं राक्षसराज्यमेव नहीं तो चिरकाळपर्यन्त राक्षसोंका राज्य तो भोगूँगा भोक्ष्ये चिरं राममतो ब्रजामि ॥६०॥। | ही’ ॥ ६० ॥ इत्थं विचिन्त्याखिटराक्षसेन्द्रो सम्पूर्ण राक्षसोंके स्वामी रावणने इस प्रकार बिचार- कर भगवान्‌ रामको साक्षात्‌ परमात्मा हरि जान- ७, ~ देत्व he - रि | राम लादता परमत हार, | कर यह निश्चय किया कि मैं विरोध-बुदिसे ही उनके विरोधवुद्धचेव हरिं प्रयामि पास जाउँगा क्योंकि मक्तिके द्वारा भगवान्‌ (मुझसे) हुते न भक्त्या भगवान्प्रसीदेत्‌ ॥६१॥ | शीघ्र प्रसन्न नहीं हो सकते । ६१॥ —§- Eo इति श्रीमदश्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे पञ्चमः सर्गः ।।५॥ dy ह ¢ १२६ ` अंध्यांत्मंरामायंणं [ सगं ६ रावणका मारीचके पास जाना | श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेचजी बोले--हे पार्वेति | रात्रिके समय चन्त , इस प्रकार विचारकर प्रातःकाल होनेपर रावण रमे विचन निशया ह निचित सथमाखितः | १॥ | सवार इआ और अपने मन-ही-मन एक कार्य निम य” रावणो नसा कायने न त्य बुद्धिमान्‌ ॥ कर वह समुद्रके दूसरे तठपर मारीचक्रे घर गया | *, ययो मारीचसदने परं पारघुदन्वतः । वहाँ मारीच सुनियोंके समान जटा-वल्कळादि धारण- मारीचस्तत्र मुनिवज्ञटापर्कलधारकः ॥२॥ कर प्राकृत गुणोंके प्रकाशक निर्गुण भगवानका ध्यान ४ 4 6 ७ नेनेप > ध्यायन्‌ हृदि परात्मानं निशुणं गुणभासकम्‌ । | कर रहा था । समाधि मंग होनेपर उसने रावणको समाविबिरमेऽपञ्यद्रावणं गृहमागतम्‌ ॥२॥ | अपने घर आया देखा ॥ १०३ ॥ दुतमुत्थाय चालिङ्ग्य पूजयित्वा यथाविधि । रावणको देखते ही वह शीघ्रतासे उठ खड़ा हुआ _ ,, oO और उससे गे मिलकर उसकी विधिपूर्वक पूजा की | कृतातिथ्यं सुखासीनं मारीचो वाक्यमन्रवीत्‌ | तथा आतिथ्य-स्कारके अनन्तर जब रावण स्वस्थ हो- कर बैठा तो मारीच उससे बोला-)॥ ४॥ “हे रावण ! दिति इस समय तुम अकेले ही रथमें वेठकर आये हो और चिन्तापर इवाभासि हृदि कायं विचिन्तयन्‌ ॥५॥ | तुम्हारा चित्त किसी कार्यके विचारमें चिन्ताम्रस्त-सा . Ae ~ प्रतीत होता है || ५॥ यदि गोपनीय न हो तो मुझे"! ब्रहि मे नहि गोप्यं चेत्करवाणि उ बृहि मे नहि गोप्यं चेत्करवाणि तव प्रियम्‌ । वह कार्य बताइये | हे राजेन्द | यदि उसके करनेमे न्याय्यं चेद्‌ बहि राजेन्द्र इजिन मां स्पृशेन्न हि॥६३॥| मुझे पाप न छगे और वह न्यायाजुकूछ हो तो कहो, मैं तुम्हारा वह प्रिय कार्य अवश्य करूँगा” | ६॥ रावण उवाच रावण बोळा--कहते हैं राजा दशरथ अयोध्यापुरी- असित राजा दशरथः साकेताधिपतिः किळ । | का अधिपति है, उसका ज्येष्ठ पुत्र सत्यपराक्रमी राम रामनामा सुतर्तस्य ज्येष्ठः सत्यपराक्रमः ॥७॥ | त्य सय प यक दयन ली विवासयासास सुतं वर्न वनजनप्रियम्‌ । प छ साहे पण सा हत सलल दिया है॥८॥ भार्या सहितं आता लक्ष्मणेन सपनि हि इस समय वह घोर दण्डकारण्यके पज्ञवटी नामक शुभ समर्णन समास्वतस ॥८॥ | आश्रममें रहता है । सुना है, उसकी भायी नर समागमनमेतत्ते रथेनेकेन रावण | NAN स॒ आले विपिने घोरे पश्चवटचाश्रमे शुमे। |नयना सीता त्रिलोकीको मोहित करनेवाली है तस्य मायो विशालाक्षी सीता लोकबिमोहिनी॥९॥| ॥ ९ | वह राम, मेरे बड़े पराक्रमी निरपराध राक्षसोंको रामो निरपराधान्मे राक्षसान्‌ भीमविक्रमान्‌। माई खरके सहित मारकर उस तपोवनमें निर्मयता- खरं च इत्वा विपिने सुखमास्तेऽतिनिर्भयः ॥१०॥ | एक वडे आनन्दसे रहता है ॥ १० ॥ मेरी वहिन सभिन्याः शर्पणखाया निर्दोपायाथ नासिकास) | रणे उसका इछ भी नहीं विगाहा था किन च्छेद दृष्टात्मा बने तिह्ति नि उस दुष्टने उसके नाक-कान काठ डाले और अब कणो चिच्छेद दुष्टात्मा वने तिष्ठति निर्भयः ॥११॥! निर्भयतापूर्वक उस-वनमें रहता है ॥११॥ इसलिये अब अतस्तया सहायेन गत्वा तत्माणवल्ठमाम्‌ | तुम्हारी सहायतासे में रामके तपोवनमें न रहनेपर ~ आनयिष्यामि विपिने रहिते राथवेण तास्‌ ॥१२॥ | उसकी प्राणप्रिया सीताको छे आना चाहता हूँ॥ १२॥ सर्ग ६] अरण्यकाण्ड १२७ त्व तु मायासृगो भूत्वा ह्याश्रमादपनेष्यसि |. | तुम मायासे ग्रगरूप दोकर राम और ढरक्ष्मणको राम च लक्ष्मणं चैव तदा सीतां हराम्यहम्‌ ॥१३॥ | आश्रमसे दूर ळे जाना । उसी समय मैं सीताको हर । छाऊँगा ॥ १३॥ इस प्रकार मेरी सहायता करके तुम वे तु तावस्सहाय से कृत्वा स्थास्यसि पूर्ववत्‌ । | फिर पूर्ववत्‌ अपने आश्रममें आ रहना । इ सें भाषमाणं तँ रावणं वीक्ष्य विस्मितः ॥१४।। | रावणको इस प्रकार कहते देख मारीचने विस्मित कॅनंदमुपदिष्ठ ते मूलधातकर वचः | | होकर कहा-- १४ ॥ “रावण ! ये सर्वनाश करने- स एव शदरर्वव्यश्न यस्त्वक्नाशं प्रतीक्षते ॥१५॥ | गौ वाते उन्हें किसने बतायी हैं : इस प्रकार जो र ; मद कोई तुम्हारा नाश करना चाहता है, निश्चय ही रामस्य पौरुष स्पा चित्तमधापिरावण। | "९5 हा है, निश्चय ही वह _ पट कप , । तुम्हारा शत्रु है और वध करने योग्य है ॥ १५ ॥ हे ऽपे | हा ऱ वााडप मा काशिकस्य यज्ञसरक्षणाय स! ॥१६॥॥ वण ! उनके बाल्यकालके पौरुपको याद करके, जब आगतास्त्वपुर्णेकेन पातयामास सागरे। | बे विश्वामित्रजीकी यज्ञरक्षाके छिये आये थे और योजनानां शर्त रामस्तदादि भयविहलः ॥१७॥ उन्होंने एक वाणसे ही मुझे सौ योजन दूर स्मृत्वा स्मृत्वा तदेवाहं रामं पञ्यामि स्वतः ॥ १८॥॥ सुद्रके तटपर फेंक दिया था, आजतक मेरा हृदय दण्डकेऽपि पुनरप्यह॑ वने ' भयसे व्याकुळ हो जाता है । वारम्बार उसी वातका पूर्ववेरमचुचिन्तयन्‌ हृदि। , स्मरण हो आनेसे मुझे सव ओर राम-ही-राम दिखछायी तीक्ष्णशृङ्गमृगरूपमेकदा ` देने छगते हैं ॥ १६-१८॥ एक दिन अपने पूर्वे- मादयौतरहभिरावृतोऽभ्ययास्‌ ॥१९॥ ' वैरका स्मरण कर मैं दण्डकारण्यमें मी अपने-जैसे ` राध॑ जनकजासमन्वितं ' बहुत-से मृगोंके साथ मिलकर एक तीखे सींगोंवाले लक्ष्मणेन सहितं त्वरान्वितः | | रगका रूप बनाकर गया था ॥ १९ ॥ जब मैं बड़ी आगतोऽहमथ इन्तुुद्यतो , फुतीसे सीता और छक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथजीको £] | ७ ७] ऐप ~ | इच्छासे ड उन्होंने मां विलोक्य शरमेकमक्षिपत्‌॥२०॥ ' मारनेकी इच्छासे आगे बढ़ा तो मुझे देखकर उन्होंने > A । केवळ एक वाण छोड़ दिया ॥ २० ॥ हे राक्षसेन्द्र ! तेन बेद्धहृदयाऽहसुद्ञ्रमन्‌ | उसासे मं की सेन्द्र पतितोऽरि _ ' उसीसे हृदय बिध जानेके कारण मैं भाकाशमं चक्कर राक्षसेन्द्र पतितोऽसि सागरे। ¦ हे तत्मरभृत्यहामिदे॑ समाश्रित! | काटता हुआ समुद्रमें आकर गिरा । तबसे मैं भयभीत शलहा ब भिद दतः ॥२१॥ | होकर इस पवित्र स्थानमें आश्रम बनाकर बड़ी सावधानीसे _ स्यानयाअतामद भयादतः । रहता हूँ ॥ २१ ॥ राज, रतन, रमणी और रथ आदि राममंत्र सतत वभाव | (भोग-सामग्रियोंके प्रथम अक्षर 'र' ) के कानोंमें पड़ते ही भीत भीत इव भोगराशितः। | मुझे ( रामकी याद आ जानेसे ) भय उत्पन्न हो जाता है, राजरतरमणीरथादिक . १ _ । इसलिये मैं भोग-ससुदायसे भयभीत होकर निरन्तर श्रोत्रयोयदि गतं भय भवेत्‌ ॥२१॥ ¦ शाम! का ही ध्यान करता रहता हुँ ॥ २२॥ “यहाँ ' राम आगत इहेति यङ्कया ' राम न आ गये हों! इस आशंकासे मैंने समस्त बाह्य वाह्मकार्यमपि सर्वसत्यजम्‌ । ' कार्य छोड़ दिये हैं । जिस समय मैं निद्राके वशीभूत निद्रया परिवृतो यदा खपे होकर सोता हूँ उस समय मनः ही-मन रामका ही राममेच मनसाऽलुचिन्तयन्‌ ॥२३॥ | स्मरण करता रहता हूँ॥ २३ ॥ इस प्रकार स्वप्तमें सम्तष्टिगतराघव तदा | देखे हुए आरघुनाथजीको जब निद्रा. टूटनेपर जागता बोधितो विगतानिद्र आखितः। ` हुँ तब मी नहीं भूलता | अतः है राव्रण! तुम भी १२८ अध्यात्मरामायण तङ्कवानपि विश्रुच्य चाग्नहं श्रीराधवसे हठ छोड़कर अपने घर चळे जाओ ॥ २४ ॥ राघ ग्रति गृह ग्रयाहि भोम।२४।| और चिरकाळसे बढे इए अपने राक्षसश रक्षा रक्ष राक्षसकुठ॑ चिरागतं करो | श्रीरामचन्द्रजौसे बैर न करो, उनका तो (बैर- तत्स्सृतो सकलमेव नश्यति । भावसे ) स्मरण करनेसे मी सर्वेस्व नष्ट हो जाता है | तब हितं वदतो मम भाषितं मैं तुम्हारे हितके लिये जो इ कहता हूँ वह मानो ] परिशृहाण परात्मनि राघवे ॥२५॥ | ठम परमात्मा श्रोरघुनायजीसे विरोध-बुद्धि छोड hl तज विरोधमतिं भज भक्तितः ओर भक्तिभावसे उनका भजन करो, क्योंकि शरामचनदर- परमकारुणिको रघुनन्दनः । जी बड़ दयाळु हे । मैंने सुनौखरांके मुखसे ये समी बाते अहमशेषमिद सुनिवाक्यतो- | सुनी हैं कि सत्ययुगमे ब्रह्माजीके प्राथना क्रनेपर ऽशुणवमादियुगे परमेश्‍वर! ॥२६॥ | परमात्मा श्रीहरिने कहा था कि तुम अपना मनोरथ ब्रह्मणाडथित उबाच तं हरि | बताओ, में उसे पूण करूगा । तब ब्रह्माजनि किं तवेप्सितमहं करवाणि तत्‌ । | भगवानसे कहा--“दे कमललोचन हरे ! आप मलुष्य- ्रह्मणोक्तमरबिन्द्लोचन । रूपसे पथिवीमें अवतार छीजिये और शीघ्र ही दशरथ- त्वं प्रयाहि सवि माजुषं वपुः । | नन्दन श्रीराम होकर देवद्रोही दशाननका वध कीजिये दशरथात्मज मावमञ्जसा ॥ २५-२७ || अतः तुम निश्चय मानो, राम मनुष्य जहि रिपुं दशकन्धरं हरे ॥२७॥ | नहीं हैं; वे साक्षात्‌ अन्यपुरुष श्रीनारायण हैं, मायासे अतो न मानुषो रामः साक्षान्नारायणोऽव्ययः । | मनुष्यरूप होकर वे निर्मयतापूर्वेक प्रथिवीका भारः मायामाचुषवेषेण वनं यातोऽतिनिर्भयः ॥२८॥ | उतारनेके लिये बनमें आये हैं । अतः हे तात ! तुम भूभारहरणार्थाय गच्छ तात गृहं सुखम्‌। | सुखपूर्वक घर लौट जाओ |? श्रुत्वा मारीचवचन रावणः प्रत्यभाषत ॥२९॥ मारीचके ये वचन सुनकर रावण वोळा-।२८-२९॥ परमात्मा यदा रामः प्रार्थितो ब्रह्मणा किल | “यदि ब्रह्माकी प्रार्थनासे परमात्मा ही राम होकर मां हन्तुं माइपो भूत्वा यत्रादिह समागतः ॥३०॥ | उःयरूपसे से प्रयत्नपूर्वक मारनेके ड्म यहाँ आये ~ ्शीसि हैं, तो वे शीघ्र ही अवश्य बैसा ही करेंगे, क्योंकि ईश्वर करिध्यत्यचिरादेच सत्यसहुल्प ईश्वरः । सत्य-संकल्प हैं । इसलिये मैं अवश्य यत्रपूर्वक र॒घुनाथ- अतो5ह यत्रतः सीतामानेष्याम्येव राघवात्‌ ॥ ३ १॥| जीके पाससे सीताको ले आऊँगा ॥ ३०-३१ || है वधे प्राप्त रणे बीर प्राप्स्यामि परमं पद्म्‌ | बीर ! यदि मैं युद्धमें उनके हाथसे मारा गया तो यदा रामं रणे हतवा सीतां प्राप्स्यामि निर्भय! 1३२॥ परमपद मात करूँगा और यदि मैने ही रामको तदु वि | रणक्षेत्रम मार डाळा तो निभेयतापूवबेक सीताको कड महाभाग वाचत्रखगरूपध्कू | | पाऊंगा || ३२ ॥ अतः हे महामाग | उठो और राम सलक्ष्मण शीधमाश्रमादातिदूरतः ॥११॥ | शीघ्र ही विचित्र मृगरूप धारण कर राम ओर आक्रम्य गच्छ त्वं शीरं सुख तिष्ठ यथा पुरा। . | लक्ष्मणको आश्रमसे अति दूर डे जाओ, फिर पूर्ववत 2 3. 1 | अपने आश्रममें आकर सुखपूर्वेक रहो । यदि मुझे अतः परं चेद्त्किश्रिद्धापसे माद्रिमीपण विज | निष्याम्यसिनाईर ङ हि भप स्‌॥३४॥ | भयभीत करनेके लिये अव और कुछ कहोगे तो निश्चय दचष्याम्यासिनाऽनेन स्वासत्रैव न संशयः । | मानो, मैं अभी इसी खड्गसे तुम्हें यही मार डाळेंगा |” सगे ७] अरण्यकाण्ड १२९ + TTT TITTIES mmm ०७७ दु __मारीचस्तद्वचः त्वा खरातमन्येवान्वचिन्तयत्‌।३५।| उसका यह कथन सुनकर मारीचने मन-ही-मन ~ यय ह सोचा--- ॥ ३३-३५ ॥ 'यदि श्रीरघुनाथजीने मुझे याद्‌ मा राघवा इन्यात्तदा युक्ती भवाणबात्‌। | मारा तो मैं संसार-सागरसे पार हो जाऊँगा और-जो मां हन्याधदि चेदृष्टस्तदा मे निरयो धुवम॥३६॥ | कही इस दुष्टने मुझे मार दिया तो निश्चय ही मुझे कि है नरकमें पड़ना होगा! || ३६ ॥ इस प्रकार श्रीरामके इति निश्चित सरण रामादुत्याय वेगत! | हाथसे ही अपना मरना निश्चय कर वह शीघ्रतासे उठा | ल र रा ^ + ha + ~ और रावणसें वोला--“हे राजन्‌ | हे प्रभो | मैं A अब्रवीद्रावणं पजन ड 1 1 अन्नवाद्रावण राजन्करोम्याज्ञों तव प्रभो ॥३७॥ | आपकी आज्ञा पालन करूँगा” | ३७॥ इत्युक्त्या रथमास्थाय गतो रामाश्रमं प्रति | ऐसा कद वह (रावणके) रथपर चढ़कर शुद्धजाम्वूनदप्रख्यो सृगोऽभूद्रौप्यबिन्दुकः ॥ ३८॥ श्रीरामचन्द्रके आश्रममें आया और चाँदीकी बूँदोके रलशृङ्गो मणिखुरो नीलरलाविलोचन! । सहित जुद्ध छुवरण-वण विचित्र शग-रूप धारण किया विद्ञस्पमो वि न रे ॥ ३८ ॥ उसके सींग रहमय, खुर मणिमय और नेत्र त्प्रभो विमुग्धायोी विचचार वनान्तर ॥३९॥ नीठरतरमय थे | इस प्रकार बिजलीकी-सी छटा और रामाश्रमपदस्यान्ते सीतादष्टिपथे चरन्‌॥४०॥ | मनोहर सुखबाछा वह मृग रामचन्द्रजीके आश्रमके पास क्षणं च धावत्यवतिष्ठते क्षणं सीताजीके सामने वनमें विचरने छगा ॥ २९-४०] किसी क्षण तो वह चौकडी मारने छगता और कमी मागत्य 3 , समीप कि पुनर्भवाइतः । पास आकर भयसे ठिठक जाता । इस प्रकार वह दुष्ट एवं स मसायाझगवंपरुपइक मायामृगरूप धारणकर सीताजीको मोहित करता चचार सीतां परिमोहयन्खल+॥४ १॥ | हुआ घूमने ल्गा ॥ ४१॥ -(&-०€8०-&>- इति औमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥ —Andehrei— ह सप्तम सग मारीचवध और सीताहरण 1 श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेबजी वोले--है पार्वति | इधर श्रीराम- A o नचन्द्रजीने भी राबणका सारा षड्यन्त्र जानकर एकान्तमें [ऽपि तर चेष्टितम्‌ । र्‌ अथ रामोऽपि तत्सचे ज्ञात्वा रावणचेष्टितम्‌ जन कहा--*हे संति ! मैं जो कुछ कहता उवाच सौतामेकान्ते शृणु जानकि मे वचः ॥ १ ॥ | हु बह सुनो ॥ ! ॥ हे शु ! रावण तुम्हारे पास रावणो भिक्षुरूपेण आगमिष्यति तेऽन्तिकम्‌। भिक्षुका रूप घारण कर आयेगा, अतः तुम अपने ही , Re ~ ह अपनी छायाको कुढीमें छोड़कर र 'स्थापयित्वोटजे विश ॥२॥ | समान आकृतिवाठ न त्व तु छाया त्वदाकारी खापायर " | अप्निमें प्रवेश कर जाओ, और मेरी आज्ञासे हाँ अगावरश्यरुपेण वर्ष तिष्ठ ममाक्षया | अदृश्यरूपसे एक वर्ष रहो । तदनन्तर, राबणके मारे रावणस्य बधान्ते मां पूर्ववत्माप्स्यसे छुमे ॥ हे ॥ | जानेपर तुम सुझे पूर्ववत्‌ पा छोगी” ॥ २-३ ॥ रामचन्द्र- श्रुत्वा रामोदितं वाक्य सापि तत्र तथाकरोत | | जीके वचन झुनकर सीताजीने भी वैसा ही किया । १७ १३० अध्यात्मरामायण | [सर्ग ७ ener CITT ITT नाम i = १७९७७ ७१७०१ क मटीय फोकट पडकी जल अटल यान वसमकरकाकनन gfe ef ee i a जरचय चर चाचा ag ५०१०५८४०५८६१ ६०५० ५०००५०५७०५ ४०४०० ७७५० ५४४४ ७४ ५० खाप्य खयमन्तदैयेऽनले ॥8॥ | वे मायामयी सीताको आहुर कुर्टामें छोइकर खर्य अशि | अन्तर्धान हो गर्यी ॥ ४ ॥ मायासीता तदाऽपश्यन्सृगं मायाविनिसितम्‌। तब उस मायासीताने मायामय मृगको देखकर विनयान्विता ॥ ५॥ | श्रीरामचन्द्रजीके पास आवर हँसते हुए बडा नम्नतासे हसन्ती राममभ्मेत्य प्रोवाच विनया चर | स अ य विकित पस्य राम सृ चित्रं कानकं रल्धूषितम्‌। |स॒ुवर्ण-ृग देखिये । अहो ! इसके झरीरमें कैसे अद्भुत विन्दु हैं और यह कैसी निभ॑यतास विचर रहा! ८००७४७७ चल ४४७ 0७ 0८0 ४४४४१४ मायासाठा बाहर विचित्रविन्दुमियुक्त॑ चरन्तमङतोभयम्‌। है हे प्रमो ! आप इसे वॉधकर मुझे छा दीनिय; यह वद्ध्वा देहि मम क्रीडामूगो भवतु सुन्दर! ॥ 5 ॥ | सुन्दर हरिण मेरा क्रीडामृग होने योग्य है? ॥६॥ तथेति धनुरादाय गच्छन्‌ लक्ष्मणमन्नवीत्‌ | | तब रामचन्द्रजाने बहुत अच्छा कह अपना धनुप ' उठा लिया और जाते समव ढक्ष्णजाते कहा-- रंक्ष स्वमतियलेन सीतां मत्माणबकछछमास्‌॥ ७ ॥ ` «ण! तुम प्राण-प्रिया सीताकी यत्नपूर्वीक देख-माठ मायिनः सन्ति विपिने राक्षसा घोरदशनाः । | करना ॥७॥ आजकल वनम बई मायार्वा भर्यकर विका घी रक्ष सीतामनिरि । रक्षस विचर रहे हैं । अतः तुम अनिन्दिता साध्वी अतोऽत्रावहितः साध्वी रक्ष सातारानान्दितास्‌ ८1 . सोताकी बहुत सावधान रहकर रक्षा करना” ॥ ८ ॥ | लक्ष्मणो राममाहेदं देवायं मृगरूपशुकू। ¦ तव व्वमणजीने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा--“देत्र | | यह मुगरूपधारी मारीच हे, इसमें सन्देह नहीं, मारावाऽ्च न सन्देह एवभूवा मृगः कुतः ॥ ९ ॥ | न्योकि भला मृग ऐसा कहाँ हो सकता है ?” ॥ ९ ॥ श्रीराम उवाच | श्रीसमचन्द्रजी चोले-यदि यह मारीच है तो, छत्दि मारीच एवायं तदा इन्मि नसंशयः | | ईसं सन्देह नही, में इसे अवऱ्य मार दंगा । और यदि मृग ही है तो सीताका मन रखनेके लिये ठे आउगा मृगशेदानयिष्यामि सौताविभ्रमहेतवे।| १ ०॥ | ॥ १०॥ मैं अमी जाकर बहुत रात्र ही इस मृगको गमिष्यामि सृर्ग वध्वा ह्यानायिष्यामि सत्वर! । | ववकार लिये आता हूँ, तवतक तुम सीताजीकी त्वं प्रयल्लेन सन्तिष्ठ सीतासंरक्षणोद्यतः॥११॥ । रखवाली करते हुए बहुत सावधान रहना ॥ ११ ॥ इत्युकत्वा प्रययौ रामो मायामृगमलुद्ुतः । | यह संसाररूपिणी जगन्मोहिनी माया जिनके आश्रित माया यदाश्रया लोकमोहिनी जगदाकृतिः॥ १ २॥ | दै पै रामचन्हजी ऐसा कह उस मायामृगे पीछे दोडते चले गये | १२॥ वे निर्विकार चिदात्मा और सर्व- निर्विकारश्रिदात्मापि पू्णोऽपि सृगमन्वगात्‌। | व्यापक होकर भी उस मृगके पीछे दोडे, इससे यह | सक्तादुकम्पी भगवानिति सत्य वचो हरि।।।१३॥ | वाक्य सर्वथा सत्य ही हे कि “भगवान्‌ हरि बड़े भक्त- ! वत्सल हैं ॥ १२ ॥ भगव कुळ जानते १ कतुं सोताम्रियाथांय जानन्नपि मगं बयो । त्सल हैं! || १२ ॥ भगवान्‌ सब कुछ जानते थे, तथापि सीताजीको प्रसन्न करनेके ल्मे वे मृगके पीछे गये। नहीं मृगेण वा खिया वापि कि कार्य परमात्मनः । क्या काम था £ वह मृग कमी तो पास ही दिखायी देने लगता, कभी एक क्षणमें ही दूर भागकर छिप कदाचिद्दश्यतेऽम्याशे क्षणं धावति लीयते र छप जाता द्‌ शष यिते॥१५॥ ॥१४-१५॥ और फिर बहुत दृरीपर दिखलायी देता । इस इयते च ततो द्रादेवं राममपाहरत्‌ | | प्रकार वह रामचन्द्रजीको वहुत दर छे गया । So | अरण्यकाण्ड , १३१ Nn NS 0४५४४५५४५४ कट UII IYI नु ४८५४४४४ ४८४ ४४४४४४४ YEG ७४९० ` तर ततो रामोऽपि विज्ञाय राक्षसोब्यमिति स्फुटम्‌ १६ विव्याध शरमादाय राक्षसं मृगरूपिणम्‌ । पपात रुथिराक्तासो मारीचः पूर्रूपक्‌॥१७॥ ह इतोऽसि महाबाहो त्राहि लक्ष्मण मां रतम्‌ | इत्युक्त्वा रामवद्ठाचा पपात' रुथिराशनः॥ १८॥ यन्नामाश्ञोऽपि भरणे स्मृत्वा तत्साम्यमाप्लुयात्‌ । किष्ठुताग्र हरिं पर्यंस्नेव निहतोऽसुरः॥१९॥ तददेहादुत्थितं तेजः सर्वठोकस्य पश्यतः । राममेपाविशदेवा विसयं परमं ययुः॥२०॥ कि कमं कृत्वा किं प्राप्त पातकी झुनिहिंसकः अथवा राघवस्यायं महिमा नात्र संशयः ॥२१॥ रामवाणेन संविद्धः पूर्वे राममलुस्मरन्‌ । `“ भयात्सर्वं परित्यज्य गृहवित्तादिक च यत्‌ ॥२२॥ हृदि रामं सदा ध्यात्वा निधूताशेपकरमष! । अन्ते रामेण निहृतः पश्यन्‌ राममवाप सः ॥२३॥ द्विजो वा राक्षसो वाऽपि पापी वा धामिकोऽपि वा त्यजन्कलेवरं रामं स्मृत्वा यान्ति परं पदम्‌ ॥२४॥ a हति hn तेऽन्योन्यमाभाष्य तततो देवा दिवं ययुः | रामस्तबचिन्तयासास ग्रियमाणोऽसुराधमः ॥२५॥ हा लक्ष्मणेति मद्ाक्यमनुकुर्बन्ममार किम्‌ | भुत्वा मद्वाक्यस शं वाक्यं सीताऽपि किं भवेत्‌ २६ इति चिन्तापरीतात्मा रामो दूराम्न्यवतेत । सीता तद्भापितं शुत्वा मारीचस्य दुरात्मनः मोवाऽतिदुः्खसंविग्ना लक्ष्मण त्विदमत्रवीत्‌ । तब रामुचन्द्रजीने यह निश्चयपूर्वक जानकर कि यह राक्षस ही है, उस मृगरूप राक्षसको एक बाण छीड़कर व्रीं डाछा ) वाणके ळते ही मारीच अपना ू्वेप्‌ धारणकर छोहू भरे मुखसे प्रथिबीपर गिर पडा ॥ १६-१७॥ वह रक्तपायी दैत्य रामकी-सी बोळीमें यह कहता हुआ कि हि महाबाहो लक्ष्मण | मैं मारा गया; मेरी शीघ्र ही रक्षा करो? पृथिवीपर गिरा ॥१८॥ .. मरण-समयमें जिनके नामका स्मरण करनेसे अन्न- जन भी जिनके समान हो जाते हैं उन्हीं हरिको देखते-देखते उन्हींके हाथसे मरे इए उस राक्षसके विषयमे तो कहना ही क्या है १॥ १९॥ उसके शरीरसे निकंछा हुआ तेज सबके देखते-देखते श्रीरामे ही समा गया, यह देखकर देवताओंको .बड़ा आश्मन हुआ ॥२०॥ वे कहने लगे---“अहो ! इस सुनिजनहिँसक पापी निशाचरेने कैसें-कैसे कुंकम किये और फिर कैंसी शुभ गति प्राप्त की | निस्सन्देह यह श्रीरघुनाथजीकी ही महिमा है॥ २१ ॥ रामके वाणसे वींधे जानेपर यह पहळेसे ही मयसे अपना संब गृह और धन आदि छोड रामचन्द्रजीके स्मरणमें लगा हुआ था ॥ २२ ॥ निरन्तर रामका ध्यान करनेसे इसके सारे पाप नष्टहो गये थे; तथा अन्तमें यह रामको देखते-देखते, उन्हीके हाथसे मारा मी गया; इसलिये इसने रामहीको प्राप्त कर लिया || २३. ॥ जो श्रीरामका स्मरण करते हुए शरीर छोडते हैं, ब्राह्मण हों या राक्षस, पापी हों या धार्मिक--परम पदको ही ग्राप्त होते है” ॥२४॥ परस्पर इस प्रकार कहते हुए फिर देवगण खगको चले गये । तब रामचन्द्रजी सोचने लगे कि इस अधम राक्षस- ने मरते संमय मेरी-सी बोळीमें हा लक्ष्मण ! कहकर प्राण क्यों छोड़े ! इन मेरे-से वाक्योंको सुनकर सीता" की क्या दशा होगी ? ॥ २५-२६.॥ इस प्रकार चिन्ता करते हुए राम बड़ी दूरसे लोटे । इधर सौताने दुरात्मा मारीचका वह शब्द पुनकर अत्यन्त भय और दुःखसे व्याकु हो छक्ष्मणसे यों काहा---“छक्ष्मण | तुम बहुत शीघ्र जाओ तुम्हारे गच्छ लक्ष्मण वेगेन आता तेऽ्सुरपीडितः ॥२८॥ | भाई राक्षसेसि कष्ट पा रहे हैं ॥ २७-२८ ॥ क्या 4 3 न क RENCE ही हा लक्ष्मणेति वचनं भ्रातुरते न शृणोषि किम्‌ । तामाह लक्ष्मणो देवि रामवाकयं न वद्धवेत्‌ ॥२९॥ यः कबचिदराक्षसो देवि त्रियमाणोज्जवीद्वच। । रामबैलोक्यमपि यः कद्धो नाशयति क्षणात्‌॥३०। स कर्थं दीनवचनं भापतेऽमरपूजितः | द्धा ठक्ष्मणमाठोक्‍्य सीता वाष्पविरोचना।३९। प्राह लक्ष्मण हुुद्धे आतु््यसनमिच्छसि । ्रेषितो सरतेनेव रामनाशाभिकाङ्किणा॥३२॥ मां नेतुमागतोऽसि त्वं रामनाश उपखिते । त प्रप्स्यसे तवं मामद्य पश्य प्राणांस्त्यजाम्यहम्‌॥ ने आानातीदशं रामस्त्वां भायाहरणोद्यतम्‌ । रामादन्यं न स्पृशामि तवां चा भरतमेव वा ॥३४॥ त्युक्त्वा वध्यमाना सा खबाहुभ्यां रुरोद ह । तच्छुत्वा लक्ष्मण; कणों पिधायातीव दुःखितः ५ ग्रामेय भापसे चण्डि चिक त्यां नाशमुपैष्यसि | इत्युकत्वा वनदेवीस्यः समर्प्यं जनकात्मजाम्‌ ।३६। ययो दु!खातिसंविशो राममेव शने शने? । ततोऽ्तरं समारोक्य रावणो भिश्चुवेष क्‌ ॥३७॥ सीतासमीपमगमत्स्फुरदण्डकमण्डछुः | सीता तमवलोक्याशु नत्वा सम्पूज्य भक्तितः | ३८। कन्द्मूलफलादीनि दकवा खागतसनवीत्‌ । धेने शङ्कव फलादीनि विश्रमख यथासुखम्‌।।३९॥ इदानीमेव भर्ता भे ह्यागमिष्यति ते प्रियम्‌ । करिष्यति विशेषेण तिष्ठ त्थं यदि रोचते ॥४०॥ अध्यात्मरामायण ७७४" Mowe ees NY RPDS CT ttt eae ७८ ५० md = [ सर्ग ७ apr लक्ष्मणजीने कहा--“देवि ! यह वाक्य श्रीराम- चन्द्रजीका नहीं है ॥ २९ ॥ किसी राक्षसने मरते-मरते ये बचन कहे हैं । जो रामजी क्रोधित होनेपर एक क्षणमें सम्पूर्ण त्रिलोकौक्रो भी नष्ट कर सकते। र ॥ ३०॥ वे देववन्दित प्रभु भला ऐसा दीन-बचन कैसे बोल सकते हैं ?? तव सीताजीने नेत्रेमें जळ भरकर करोधपूर्वक लक्ष्मगजीकी ओर देखते इए कहा--“र, लक्ष्मण! क्या तू अपने भाईको विपत्तिमं पड़े देखना चाहता है! अरे दुर्वुद्धें ! माळम होता है, तुझे रामका नाश चाहनेवाठे भरतने ही भेजा है ॥ ३१-३२ ॥ क्या तू रामके नष्ट हो जानेपर मुझे ले जानके लिये - ही आया है, किन्तु ठ मुझे पा न सकेगा । देख में अभी प्राण त्याग किये देती हुँ ॥ ३३ ॥ राम तुझे इस प्रकार स्रीहरणके लिये उच्यत नही जानते थे | रामके अतिरिक्त में भरत या तुझे किसीको भी नहीं. छू सकती” ॥ ३४॥ ऐसा कहकर वे अपनी भुजाओंसे छाती पीटती हुई रोने छगीं । उनके ऐसे कठोर शब्द सुन छक्ष्मणजीने अति दुःखित हो अपने दोनों कान मूँद ल्मे और कहा--“हे चण्डि ! तुम्हें धिक्कार है, तुम मुझे ऐसी वातं कह रही हो ! इससे तुम नए हो जाओगी |” ऐसा कह छक्ष्मणजी सीताको वनदेवियाँको सौंपकर दुःखसे अत्यन्त खिन्न हो धीरे-धीरे रामके पास चले | इसी समय सूना देखकर रावण भिक्षुका वेप बना दण्ड-कमण्डळु घुमाता हुआ सौताके पास आया । सीताने उसे देखकर तुरन्त ही प्रणाम किया और भक्तिपूर्वक उसका पूजन कर कन्द-मूल-फल आदि देकर सागत करते हुए कहा--“हे सुने ! ये फल आदि पाकर छुखपूर्वक विश्राम कीजिये । अभी थोड़ी देरमें ही मेरे पतिदेव आते होंगे । यदि आपकी इच्छा हो तो कुछ देर ठहरिये । वे आपका कुछ विशेष सत्कार कर सकेंगे” ॥ ३५-४० || सर्ग ७] जनन RRR sus सिक्षुरुवाच का त्वं कमलपत्राक्षिको वा भर्ता तवानघे । फकिमथमन्र ते वासो बने राक्षससेविते । रहि भद्रे ततः सर्वे खब॒त्तान्त निवेदये ॥४१॥ सीतोवाच अयोध्याधिपतिः श्रीमान्‌ राजा दशरथो महात्‌ । तस्य ज्येष्ठ! सुतो रामः सर्षलक्षणखक्षितः ॥४२॥ तस्याहं धर्मतः पत्नी सीता जनकनन्दिनी । तस्य भ्राता कनीयांथ लक्ष्मणो भ्रातूवत्सल। ।४३। पितुराज्ञां पुरस्कृत्य दण्डके वस्तुमागतः । चतुर्दश समास्तवां तु ज्ञातुमिच्छामि मे वद ॥४४॥ भिक्षुरुवाच पोलर्त्यतनयोऽहं तु रावणो राक्षसाधिपः । त्वत्कामपरितप्तोऽहं त्वां नेतुं पुरमागतः ॥४५॥ मुनिवेषेण रामेण किं करिष्यसि मां भज । अरण्यकाण्ड - ७० ६८९ २३६३ ७७९ १४ १४४ vs uLLe ~ व क कमवकन्युक रया न्य ५४८४-४८ ४८ ४४७० ५४४ « + ९०४०६ ६७ ६-५ ew "४४४० ४४४०९ ASS SAS IAI Ns VN दक नुक कर १३३ भिक्ष बोळा--हे कमललोचने ! तुम कोन हो ? तुम्हारे पति कोन हैं? हे अनवे | इस राक्षससेवित बनमें तुम क्यों रहती हो? हे कल्याणि ! ये सव बातें बताओ, तब मैं भी तुम्हें अपना सारा वृत्तान्त सुनाऊँगा ४ १॥ सीताजी चोळीं-हे भिक्षो ! श्रीमान्‌ महाराज दशरथ अयोध्याके राजा थे, उनके ज्येष्ठ पुत्र सर्व- सुलक्षणसम्पन्न राम हैं ॥ ४२॥ मैं जनकनन्दिनी सीता उन्हींकी धर्मपत्नी हुँ । उनका छोटा भाई लक्ष्मण है । वह अपने भाईका अत्यन्त स्नेही है ॥ ४३ ॥ ( हम दोनोंके साथ ) श्रीरामचन्द्रजी पिताकी आज्ञासे चौदह वर्ष दण्डकारण्यमें रहनेके लिये आये हैं । अब मैं तुम्हारे विषयमें जानना चाहती हूँ, तुम भी मुझे अपना परिचय दो ॥ ४४॥ भिक्षु बोला--मैं पुळस्त्यनन्दन विश्रवाका पुत्र राक्षसराज रावण हूँ । मैं तुम्हें पानेकी इच्छासे सन्तप्त था; अतः इस समय तुम्हें छे जानेके लिये यहाँ आया हूँ ॥ ४५॥ उस सुनिवेपधारी रामसे तुम्हें क्या मिटेगा । तुम मुझसे प्रेम करो और इन वनवासके दुःखोसे अङ्क्ष भोगान्मया साधं त्यज दुःखं चनोङ्कघम्‌४६| टकर मेरे साथ नाना प्रकारके भोग भोगो || ४६॥ श्रुत्वा तद्वचनं सीता भाता किञ्चिदुवाच तम्‌ । यद्येवं भाषसे मां त्वं नाशमेष्यसि राघवात्‌॥४७॥ आगमिष्यति रामोऽपि क्षणं तिष्ठ सहानुजः । मां को ध्पयितुं शक्तो हरेमायां शशो यथा॥४८॥ रामवाणेविभिन्नस्त्व॑ पतिष्यसि महीतले | उसके ये वचन सुनकर सौताजीने कुछ डरते इए उससे कहा--“यदि तू मुझसे ऐसी बात कहेगा तो रामचन्द्र्जी तुझे नष्ट कर देगे॥ ४७॥ जरा ठहर तो, भाईके सहित श्रीरामचन्द्रजी अभी आते होंगे ! मेरे साथ कौन बलात्कार कर सकता है ? क्या सिंह-पत्नी- के साथ खरहा भी बलप्रयोग कर सकता है! ॥ ४८ ॥ रामजीके वाणोंसे छिन्न-मिन्नं होकर तू अभी इति सीतावचः श्रुता रावणः ऋ्रोधमूच्छितः।।४९॥। प्रथिवीतळपर सोवेगा ।” सीताजीके ऐसे बचनं सुनकर स्वरूपं दर्शयामास महापवतसन्निभम्‌ । रावणने क्रोधाकुळ हो अपना महापर्वताकार रूप दिख- छाया, जिसके दश सुख और बीस भुजाएं थीं तथा दशास्यं विशतिभजं कालमेघसमझुतिम्‌ ॥५०॥ | जिसकी काळे मेके समान आमा थी | ४९-५० ॥ तदृदृष्टा बनदेव्यश्च भूतानि च वितत्रसुः । उस भयंकर रूपको देखकर वनदेवियाँ और वन्य जीव मयमीत हो गये । तब रावणने (सीताजीके पैरोंके नीचेकी) ततो विदार्य घरणी नखेरुदूधत्य बाहुभिः ॥५१॥ | प्रथिवीको नखोसे खोदकर%उन्हें अपने हाथोंसे उठा लिया > & वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड सग १३ में रावण कहता है कि एक बार मैंने पुग्जिकस्थळी नामकी अप्खराको आकारामार्गसे बह्माजीके पास जाते देखा । तब मैंने कामातुर हो उसे बळात्कारसे वख्हीन कर उसके साथ सम्भोग किया । जब उसने यह वात व्रह्माजीसे जाकर कही तो उन्होंने सुरे शाप दिया कि 'यदि तू आजसे किसी खत्रीसे बलात्कार । करेगा तो तेरे मस्तकके सौ इकडे हो जायेंगे ।! मालूम होता है उस शापके भयसे ही रावणने सीताजीको स्पर्श नहीं किया । किन्हीं-किन्ददींका मत है कि रावणको इसी प्रकारका शाप कुबेरपुत्र नलकूबरने दिया था। ee oo प १३४ अध्यात्मशमायंण [ सगे ७ NTF pm 0 YN तोलयित्वा रथे क्षिप्त्वा ययौ क्षिग्र विहायसा । | और रथो डाळकर तुरन्त आकाडामार्गसे चळ दिया | हा राम हा लक्ष्मणेति रुंद ती जनकात्मजा ॥५२॥ | उस समय सौताजी अति भयभीत होकर दौन- भयोद्वियमना दीना पश्यन्ती भुवमेव सा | दृष्टिसे पुथिवीकी ओर देखती हुईं हां राम! हा न्दतं दीन सीतायाः पक्षिसचमः।पहे। | ९९ ? ऐसा कहकर रोने छगों । सीताजीका वह तवा तत्कन्दितं दीनं सीतायाः पक्षिसत्तमः (५२ | नदन सुनकर तुरन्त ही तीखी चोंचवाळा पि जटायुरुत्थितः शीघ्र नगाग्रात्तीष्ष्णतुण्डकः । श्रेष्ट जटायु पहाइकी चोटीपरसे उठा । और बोठा-- तिष्ठ तिष्ठेति तं प्राह को गच्छति ममाग्रतः ॥५४॥ | “अरे ! ठहर, ठहर, यज्ञके मन्त्रपृत पुरोडादाका ठे जान-' ~ ९ चाले कुत्तेके समान मेरे सामन ही जगन्नाथ श्रीरघुनाथर्जी- युषित्वा थस्य य्‌ शुच्य छनादयात्‌ | न « =, क < ला ढाकनावस भाया शयाढनाळवात्‌ की मार्याको सूने तपोवनसे त कोन लिये जाता है १ शुनको मन्त्रपूतं त्ब॑ पुरोडाशमिवा घ्वरे ॥५५॥ ॥५१-५५॥ जटायुने ऐसा कहकर अपनी तीक्षण चोंचस ष > चू चा हा न न. . ~= इत्युकत्वा ता&णतुण्डन चूणयामास तद्र्थम्‌ | रावणके रथको चूर-चूर कर डाळा ओर अपन पत्रास वाहान्बिभेद पादाभ्यां चूर्णयामास तद्धछुः ॥५६॥ | घोड़ोंको मारकर उसके घजुपके टुकडे-टुकडे कर दिये ५६ .०५०-०-८७-० ४०१५२७००७१ ७७७० ७2७० क नुक ततः सीतां परित्यज्य रावणः खद्भमाददे । तत्र राबणने सीताजीको छोड़कर अपना खड्ग चिच्छेद पक्षो सामर्ष: पश्चिराजस्य धीमतः ॥५७॥ निकाला ओर झुझळाकर मतिमान्‌ जटायुक्रे पंख काट किश्चिच्छेपेण प्राणे ~ डाळे || ५७॥ पंख कट जानेसे पश्चिराज जटायु श्व णन | . _ , पपात किख्चिच्छेपेण आणेन झवि पक्षिराद अधमरे होकर पथिवीपर गिर पड़े । फिर तुरन्त ही रावण पुनरन्यरथेनाशु सीतामादाय रावणः ।।५८॥ | सीताजीको दूसरे रथपर चढाकर चलता चना ॥ ५८: क्रोशन्ती रामरामेति त्रातारं नाधिगच्छति | उस समय वह सीता किसी रक्षकको न देखकर वारम्वार रामको पुकारती हुई रो-रोकर कह रही थी--“हा राम ! हा जगन्नाथ ! कया आप मुझ रक्षसा नीयमानां स्वां भार्या मोचय राधव । दुःखिनीको नहीं देखते ! ॥ ५९ ॥ हे राघव ! आप- की मार्याको राक्षस लिये जाता है, आप छुड्डाइये । | हा महाभाग लक्ष्मण ! मुझ अपराधिनीकी रक्षा करो वाकूशरेण हतस्त्यं भे ध्चन्तुमहासि देवर । ॥ ६० ॥ हे देवर ! मैंने तुम्हें वाग्वाण मारे थे, तुम इत्येबं कोशमानां तां रामागमनशङ्कया ॥६१॥ | उ वेमा करना | सीताजीके इस प्रकार रुदन करने- से रामके आनेकी आशंका करता हुआ रावण उन्हें . जगाम वायुवेगेन सीतामादाय सत्वरः | लेकर वायुके समान अति तीन्र वेगसे चलने लगा | विहायसा नीयमाना सीतापश्पदधोमुखी ॥६२॥ | इस प्रकार आकाशमागसे जाते हुए नीचेकी ओर हि देखती हुई कमछानना सीताजीने एक पर्वत-शिखरपर पवताग्र सितान्पश्च वानरान्वारिजानना । पाँच वानरोंको बैठे देखा | यह देखकर उन्होंने अपने [NR ५ | उत्तरीयाधखण्डेन विम्यच्याभरंणादिकम्‌॥६३॥ | आभूषणादि उतारकर अपने दुपड के दुकडेमे बाघे द्व ओर यह कहकर कि रामको मेरा समाचार सुना देना' ततः समुद्रमुछरूव्य लङ्कां गत्वा स रावण; ॥६४॥ | तदनन्तर रावणने समुद्र पारकर लंकामे पहुँचकर हा राम हा जगन्नाथ मां न पश्यसि दु$खिताम्‌ ।५९। हा लक्ष्मण महामाग त्राहि मामपराधिनीस्‌ ॥६०॥ र सर्गे८ ] अरण्यकाण्ड | १३५ Sree स्वान्तःपुरे रहस्येतामशोकाविपिनेऽक्षिपत्‌ । | उन्हें अपने अन्तःपुरके एकान्त देश अशोकवनमें राक्षसीभिः परिशरतां माठृबुद्धयाऽन्वपालयत्‌ ।६५। | री और राक्षसियोंसे घेरे रखकर मातृबुद्धिसे उनकी कृशाऽतिदीना परिकर्मवर्जिता रक्षा करने लगा ॥६ १-६५॥ उस स्थानमें अति कृश और बे कि दीनवदना सीताजी सब प्रकारका श्वंगार छोड़कर दुःखके $ ष्य 5 ी दुःखेन शुष्यद्ददना$तिविह्ठळा । | कारण अति थुष्कवदन और विहूवळ होकर हा प राम रामेति विलप्यमाना राम | हा राम !' ऐसे विलाप करती हुई राक्षसोंके सीता स्थिता राक्षसदृन्दमध्ये ॥६६॥ | बीचमें रहने छगीं ॥ ६६॥ — tre इति शऔमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे सप्तमः सगः ॥७॥ अष्टम सर्ग सीताजीके वियोगमें भगवान रामका विलाप और जरायुसे भेंट । श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेवजी बोले--हे पार्वति ! इधर रामचन्द्र- रामो मायाविनं हत्वा राक्षस कामरूपिणम्‌ । जी जब कामरूपधारी मायावी राक्षसको मारकर अपने प्रते खाश्रमं गन्‍्तुं ततो दूराइदर्श तम्‌॥ १॥ | आश्रमपर चलनेको प्रस्तुत इए तो उन्होंने दूरसे ही आयान्तं लक्ष्मणं दीनं दुखेन परिशुष्यता । दीन और उदास मुखसे लक्ष्मणको आते देखा | तब महामति रघुनाथजी मन-ही-मन सोचने लगे ॥ १-२॥ 'लक्ष्मणको यह पता नहीं है कि मैंने मायामयी सीता लक्ष्मणस्तन्न जानाति मायासीतां मया कृताम्‌ । | बना दी है | मैं यह जानता हुँ तथापि छक्ष्मणसे यह ज्ञात्वाप्येनं वश्वयित्वा शोचामि प्राकृतो यथा ॥३ बात छिपाकर मैं साधारण मनुष्यके समान शोक ` यद्यहं विरतो सूत्वा तुप्णी स्थास्यामि मन्दिरे । कग (री न मं उह पालक ना अपनी छुटी- के जी ‘ore ब्रेठ गया तो इन कराड़ों राक्षसा नाशका उपाय तदा राक्षसकोटीनां वधोपायः कथं मेत ॥४॥ कैसे होगा! ४ ॥ यदि मैं उसके ववाह हो- यदि शोचामि तां दुःखसन्तप्तः कामुको यथा । | कर कामी पुरुषके समान शोक करूँगा तो क्रमशः „तदा क्रमेणानुचिन्वन्सीतां यास्येऽछुरालयस्‌। | सोताकी खोज करता हुआ राक्षसराज रावणके यहाँ. रावणं सडुरं हत्वा सीतामग्री खितां पुनः ॥ ५॥ | पहुँच जाऊँगा और उसे कुछसहित मारकर अपने मत स्थापितां नीला याताऽ्योष्यामतन्द्रितः। | आप ही अधमे स्थापित की इई सौताको उसमेंसे काळचा न्त ध्य जाऊगा = अह मततुप्यभातेन जातोऽसि मयः ॥६॥ निकालकर निर तरच भा या है यह, मै कुछ महुष्पमावमापत्न! किश्चित्काठं वसामि की | तमय प्रथिवीपर मलुप्य-भावसे ही रहूँगा । इससे मझ ततो मायामचुष्यस्य चरितं मेड्लुझण्बताम्‌ ॥ ७ ॥ | माया-मानवके चरित्रोंको खुननेवाठे भक्ति-परायण मुक्ति शयादग्रयासेन भक्तिमार्गानुवातिनास्‌| । एश अनायास ही मुक्ति हो जायगी । दि , १३९१४ १६ राघवथिन्तयामास खात्मन्येव महामतिः ॥ २॥ १३६ ४४४४४४४” निश्चित्येव तदा इष्ट्वा लक्ष्मणं वाक्यमत्रवीत्‌॥ ८ ॥ किमर्थमागतोऽसि त्वं सीतां त्यक्त्वा मम प्रियाम्‌ | नीता वा भक्षिता वापि राक्षसेजनकात्मजा ॥९॥॥ लक्ष्मण! ग्राञ्ञलिः ग्राह सीताया दुर्धेचो रुदन्‌ | हा लक्ष्मणेति वचनं राक्षसोक्तं श्तं तया ॥१०॥ त्वद्वाक्यसदृं शरुत्वा मां गच्छेति त्वराजवीत्‌ । रुदन्ती सा मया प्रोक्ता देवि राक्षसभाषितम्‌ । नेदं रामस्य वचनं खर्या भव शुचिसिते॥११॥ इत्येवं सान्त्विता साध्वी मया ग्रोवाच मां पुनः । यदुक्तं दुर्वचो राम न वाच्यं पुरतस्तव १२॥ कणो पिधाय निर्गत्य यातोऽहं तवां समीक्षितुम्‌ । रामस्तु लक्ष्मण ग्राह तथाऽप्यचुचितं कृतस्‌॥।१३॥ त्वया ख्रीमाषितं सत्यं कृत्वा त्यक्ता शुभानना । च ५ अध्यात्मरामायण श्रीरामचन्द्रजीने इसग्रकार निश्‍्चयकर छब्षमणजी- की ओर देखकर कहा--11५-८॥ “ढक्ष्मण ! तुम प्राण- प्रिया सौताको छोड़कर वसे चळे आये? अत्र राक्षसगण जनकनन्दिनी सीताको हर छे गये होंगे अथवा उन्हें खा गये होंगे” ॥ ९ | तव लक्ष्मणजीने हाथ जोड़कर रोते हुए सौताजुंके दुर्वाक्‍्य कह सुनाये । वे बोले---“आपके वाक्‍्यके समी, राक्षसके कहे हुए हा लक्ष्मण !' इस दाब्दको सुनकर/ सीताजीने अति आतुरतासे रोते हुए मुझसे कहा “फौरन जाओ! । तब मैंने उन्हें समझाया कि देवि | यह रघुनाथजीका वाक्य नहीं है, राक्षसका शब्द है, हे शुचिस्मिते ! तुम निश्चिन्त रहो ॥ १०-११॥ मेरे इस प्रकार ढाढस बँधानेपर भी साध्वी सीताजीने मुझसे जैसे दुर्वचन कहे हैं, हे रघुनाथजी ! वे आपके सामने कहने योग्य नहीं हैं | १२॥ अतः मैं कान मूँदकर वहासे आपको देखनेके लिये चला आया ।” इसपर श्रीरामचन्द्रजीने कहा--“छक्ष्मण ! ठीक है, तथापि तुमने उचित नहीं किया ॥ १३.॥ जो ख्री- की बातको सत्य मानकर शुभानना सीताको छोड़ नीता वा भक्षिता वाऽपि राक्षसैनात्र सशयः ॥१४॥ | दिया ! इसमें सन्दे नहीं अब राक्षसळोग या तो इति चिन्तापरो रामः खाश्रमं त्वरितो ययौ । तत्रादृष्टा जनकजां विललापातिदुशखितः ॥१५॥ हा परिये क गताऽसि त्वं नाति पूर्वबदाश्रमे । अथवा महिमोहार्थ लीलया क विलीयसे ॥१६॥ इत्याचिन्वन्वनं सर्वं नापश्यज्ञानकीं तदा । बनदेव्यः कुतः सीतां हुवन्तु मम बज्कभाम्‌ ॥१७॥ सृगाथ पक्षिणो वृक्षा दशेयन्तु मम म्रियाम्‌ । इत्येवं विखपन्नेव रामः सीतां न कुत्रचित्‌ ॥१८॥ (४ ५ ५ शड सवशः सवथा क्कापे चापश्यद्र्घुनन्दनः । | उन्हें हर ले गये होंगे या खा गये होगे” ॥ १४ || इस प्रकार चिन्ता करते हुए औरामचन्द्रजी वडी शीघ्रतासे अपने आश्रममें आये और वहाँ जानकीजीको न देखकर अति दुःखित होकर विलाप करने ळो- ॥ १५॥ हा प्रिये ! आज तुम पूर्ववत्‌ . आश्रममें दिखायी नहीं देती हो, सो कहाँ चली गयी हो? अथवा मुझे मोहित करनेके लिये विनोदसे ही. कहीं छिप रही हो !॥ १६॥ इस प्रकार विछाप करते हुए उन्होंने सारा वन छान डाळा किन्तु कहीं भी जानकीजीको न पाया | तब वे कहने छगे--“अयि वनदेवियो ! बताओ मेरी प्राण- वल्लभा सीता कहाँ है ! अरे मृग, पक्षी और वृक्षो ! तुम्हीं मेरी प्रियाको दिखाओ ।?॥ १७॥ इस प्रकार विलाप करते हुए सर्वज्ञ श्रीरघुनाथजीने सीताजीका कहीं कुछ भी पता न पाया ॥| १८ ॥ अहो ! भगवान्‌ रामने आनन्दस्वरूप होकर मी सीताजीके लिये शोक आनन्दाऽप्यन्यशाचचामचछोऽप्यनुधावति॥१९। किया, निश्चळ होनेपर भी उनकी खोजमें इधर-उधर सेट] अरण्यकाण्ड १३७ RII SITS SSSI iden oi Neo ४८१४ ४7 ४८४८ ९ ९४ ४७७० er न्स पकडा आ“ निर्ममो निरहङ्कारोऽप्यखण्डानन्दरूपवान्‌ । दोडते फिरे तथा ममता और अहंकारसे शून्य अखण्डा- मम जायेति न त नन्दस्वरूप होकर भी अत्यन्त दुःखित हो 'हे मेरी मम जायेति सीतेति बिललापातिदुशखितः ॥२०॥ प्रिये! हे सीते ? ऐसा कहकर विछाप किया ॥१९-२०॥, ५ र इस प्रकार मायाका अनुसरण करते हुए श्रीरघुनाथजी रे मायामजुचरक्षसक्तोरशपे रघूत्तमः । अनासक्त होते इए भी मूढ़ पुरुषोंक्रो आसक्त-से प्रतीत क्त इव मूढानां साति तत्विदं नहि ॥२१॥ | होते हैं किन तत्तज्ञानियोंको ऐसा श्रम नही हि होता॥ २१ ॥ एवं विचिन्वन्सकलं वनं रामः सलक्ष्मणः । इस प्रकार छक्ष्मणके सहित श्रीरामचनद्रजीने सम्पूर्ण बनमें सीताजीको ढूँढते-हँढते प्रथिवीपर टूटे रथ- छत्र, धनुष और कूवर पड़े देखे । उन्हें देखकर दृष्टा लक्ष्मणमाहेदं पश्य लक्ष्मण केनचित्‌ । | भगवान्‌ रामने लक्मणजासे कहा--“ढमण ! देखो यहाँ सीताजीको छे जाते इए किसी पुरुषको कोई अन्य व्यक्ति (युद्धे) जीतकर उन्हें हर के गया है” ॥२२-२३॥ भं रथं छत्रचापं कूबरं पतितं भुवि ॥२२॥ नीयमानां जनकजां तं जित्वान्यो जहार ताम्‌ ।२३। ततः कञ्चिद्ठुषो मागं गत्वा पर्षतसन्निभम््‌ । फिर कुछ दूर जानेपर एक पर्वेत-सदृश शरीरको रुधिराक्तवपुदेष्टा रामो वाक्यमथाश्रवीत्‌ ॥२४॥ | रुषिरसे छयपथ देखकर रामने कहा-॥ २४॥ ः > र. री 6 i! ग एप मै भक्षयित्वा तां जान धुभदर्शनाम्‌ । देखो, निस्सन्देह यही उस शुभदशना सीताको खाकर शेते बिनि अत्यन्त तूप्त हो यहाँ एकान्तमें सो रहा है; में इस विविद पद्य हन्मि निशाचरम्‌ निशाचरको अभी मारे डालता हूँ ॥ २० ॥ हे रघुश्रेष्ठ चापमानय शीघ्र भे बाण च रघुनन्दन । | छक््मण | शीघ्र ही मेरा धतुष-वाण छाओ ।” तच्छृत्वा रामवचनं जटायुः आह भीतवत्‌ ॥२९॥ | रामका यह कयन छुन जठायुने भयभीत होकर कि ५ न, कहा--॥ २६ || “मैं अपने ही कमसे मर रहा हूँ; मां न मारय भद्रं ते म्रियमाणं खकमेणा। | आपका कल्याण हो, आप मुझे न मारे । मैं जरु अह जटायुरे भारयाहारिणं समचुद्ठुत। ॥२७॥ | हूँ, मैंने आपकी भार्याको छे जानेवाले रावणका पीछा ५ , किया था । हे शत्रुदमन ! मेरा उससे घोर युद्ध हुआ रावणं तत्र युद्धं मे वभूवारिविमन । और मैंने उसके रथ, घोड़े और धनुष आदि मी काट । वख वाहान्‌ रथं चापं ठित्वाव्ह तेन घातितः ।२८। | डाळे, किन्तु अब मैं उसका धायळ किया हुआ पड़ा , ~ हूँ। हे जगन्नाथ ! आप मेरी ओर देखिये, मैं अब प्राण पतितोऽसि जगन्नाथ प्राणांस्त्य््यामि पश्य माम्‌ डना ही चाहता है” ॥ २७-२९॥ तच्छत्वा राघवो दीनं कण्ठग्राणं ददर्श ह । यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने (जटायुके पास जाकर) वि उसे कण्ठगतप्राण और अति दीन अवस्थामे देखा । ज्यास , १ ।३०] तब वे आँखेंगे आँसू भरकर उसपर हाथ पेरते इए हलाम्यांसंस्ृशन्‌ रामो हःखाइइतलोचनः २० बोडे--॥ ३०॥ “हि जटायो ! कहो, मेरी सुमुखी मेरे गे नीता शुभानना । | मायी सीताजीको कौन ठे गया है ! अहो | तुम चाला रहिम यकेन नीता श कार्यके लिये मारे गये | अतः अवइय ही. तुम मेरे प्रिय मत्कार्यार्थ हतोऽसि त्वमतो मे प्रियवान्धवः ।३१। ननु होर ॥३१॥ १३८ - ` अध्यात्मरामायण ` [सम्‌८ SSDS FTA SF See न टन चच जटायुः सञ्नया वाचा वक्त्राद्रक्त ससुदमन्‌ । जटायुने रक्त वमन करते हुए छड़खड़ाती बोरे _ RP कहा--“हे राम ! महापराक्रमी राक्षसराज रावा उवाच रावणो राम राक्षसो भीमविक्रमः ॥३२॥ मिथिलेशनन्दिनी सीताको दक्षिणी ओर छे गया है| आदाय मैथिलीं सीतां दक्षिणाभिशुखो ययौ । | और अधिक कहनेकी मुझमें शक्ति नहीं है । में अमं RP 3 मि तेऽग्रतः ॥ आपके सामने ही प्राण छोइना चाहता हूँ ॥३२-३३॥ . इतो वच्छ न भ शक्ति; प्राणास्त्यक्ष्याम तग्र "° | ह राम ! आज वडे भाग्यसे मेने मरते समय अ न हर दिया इष्टोऽसि रामत्वं म्रियमाणेन मेऽनघ । | देख पाया है । हे अनघ | आप मायामानवरूई का साक्षात्‌ परमात्मा विष्णु ही हैं ॥ ३४ ॥ हे रघुश्रेष्ट प्रमात्माशस वष्णुस्त्व मायामनुजरूपरक ।३४। चैते तो अन्त समय आपका दर्शन वरनेसे ही मै. सुक्त हो गया, तथापि आप मुझे अपन करकमढसि स्पर्श कीजिये । फिर में आपके परमपदको जाऊंगा” ॥ ३५॥ तथेति रामः पस्पर्श तदङ्गं पाणिना स्यन्‌ । - तब रामचन्द्रजीने सुसकाते इण्‌ बहुत अच्छा कि विधि कह उसका शरीर अपने करकमरोंसे छुआ | तदनन्तर ततः प्राणान्परित्यज्य जटायुः पतितो थांबे ॥२६॥ | जटायु प्राण छोड़कर पूथिवीपर गिर पडा ॥३६॥ रामसमनुशोचित्वा बन्धुवत्साशुलोचनः | रामचन्दरजीने नेत्रोमे जल भरकर उसके लिये अपने स्वजनके समान शोक करते हुए लक्ष्मणसे लक्कड़ियाँ | मँगवा उसका दाह-कर्म किया ॥२७॥ | अन्तकालेऽपि दृष्टा त्वां मुक्तोव्हं रघुसत्तम । हस्ताभ्यां स्पृश मां राम पुनर्यास्यामि ते पदम्‌ ॥ लक्ष्मणेन समानाय्य काष्ठानि प्रददाह तस्‌॥३७॥ 3 खात्वा दुःखेन रामोऽपि लक्ष्मणेन समन्वितः | | तत्पश्चात, रामजीने छक्ष्मणके सहित दुःखितचित्तसे हत्वा वने सृग तत्र मांसखण्डान्समन्ततः ॥२८॥ | स्नान किया और बनमें एक मृग मारकर घासप्र सव शाहले आक्षिपद्रामः पथक एथगनेकधा। । ओर अलग-अलग उसके अनेकों मांसखण्ड बखेर दिये । मक्षन्तु पक्षिणः सवे तृतो भवतु पक्षिराट्‌ ॥३९॥ | शे सत पकषिगण खार्य ऑर उनसे पक्षिराज जटायु गो प्त हो' ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी वोले-“जटायो ! इत्युकत्वा राघवः ग्राह जटायो गच्छ मत्पदस्‌। | तृप्त हों! ऐ घ , a तुम मेरे परमपदको जाओ और आज सबके देखते- ht Se दिव वि ५ क ततीऽनन्तरमेबासो दिव्यरूपधरः शुभः । वह तुरन्त ही सुन्दर दिव्य रूप धारण कर एक सूर्य- विमानवरमार्ह्य भास्वर भानुसान्रभस्‌ ॥४१॥ | सदृ प्रकाशमान विमानपर आरूढ हुआ ॥ ४१॥ शङ्खचक्रगदाप्किरीटवरभूषणेः | उस समय वह सुन्दर पीताम्बर धारण किये शंख, धोतयन्स्प्रकाशेन पीताम्वरधरोऽमलः ॥४२॥ | चक्रः गदा, पद्म और किरीट आदि श्रेष्ठ आभूषणोंके चतुर्भिः पार्पदर्वेष्णोस्ताब्शैरभिप्जितः सहित अपने प्रकारासे (सम्पूण दिशाओंको) प्रकाशित हभ है 1 दाप गाखारइरापपुजतः । कर रहा था ॥ ४२॥ वैसे ही वेष-भूषावाले चार स्तूयमानो योगिगणे राममाभाष्य सत्वर! | | विष्णु-पापंद उसकी सेवा कर रहे थे तथा योगिगण कवाजञलिपुटो भूत्वा तुष्टाय रघुनन्दनम्‌ ॥४३॥ उसकी स्तुति कर रहे थें। तदनन्तर वह हाथ जोड़कर श्री- इत शूला हुटाव रडुनन्दनस्‌॥४२ रघुनाथजीको सम्वोधन कर उनकी स्तुति करने छगा। ४३। जटायुरुवाच व वार दि जल जरायु बोला--'जो अगणित गुणशाली हैं, अप्रमेय अगणितगुणमप्रमेयमाचं द्र हैं, जगतूके आदिकारण हैं, तथा उसकी स्थिति और . सकरुजगतिस्थतिस॑यमादिहेतुस्‌ । ल्य आदिके हेतु हैं उन प्रम झान्त-स्वरूप परमात्मा सर्ग] अरण्यकाण्ड ` १३९ = ooo गे कर उपरमपरम परात्मभूतं सततमहं प्रणतोऽसि रामचन्द्रम्‌ ॥४४॥ निरवधिसुखमिन्दिराकटाक्ष क्षपितहुरेनद्रचतु्खादिदुःखम्‌ । नुरपरमनिशं नतोऽिम रामं परदमहं चरचापवाणहर्तम्‌ ॥४५॥ त्रिभुचनकमनी यरूपमीड्यं रविशतभासुरमीहितम्रदानस्‌ । शरणदमनिशं सुरागमूले कृतानिलयं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥४६॥ भपविपिनद्वाञ्चिनामधेयं भवस्ुखदेवतदेवतं दलुजपतिसहस्रकोटिनाशं रवितनयासदृशं हरिं अपने ॥४७॥ अविरतभवभाषनातिदूरं भवव्रिमुसमुनिभिः सदैव इञ्यम्‌ । भवजळथिसुतारणाङघ्रिपोतं शरणमहं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥४८)। मिरिशगिरिसुतामनोनिवास मिरिवरघारिणमीहिताभिरामम्‌ । सुरवरदलुजेन्द्रसेविताङ्‌प्ि सुरवरदं रघुनायकं प्रपधे॥४९॥ परधनपरदारवजितानां परमुणभूतिषु तुष्टमानसानाम्‌ । परहितनिरतात्मनां सुसेव्यं रघुवरमम्बुजलोचनं स्मितरुचिरविकासिताननाड्ञ- मतिसुरमं सुरराजनीलनीलम्‌ । सिवजलरुहचारुनेत्रशोभ रघुपतिमीशगुरोगुरुं. अपधे ॥५१॥ हरिकमलजशम्भुरुपभेदा- स्वमिह पिभासि गुणत्रयानुशत। । दयालुम्‌ । * प्रपद्ये ॥५०॥ श्रीरामचन्द्रजीकी मै निरन्तर बन्दना करता हूँ ॥ 9४ ॥ जो असीम आनन्दमय और श्रीकमछादेबीके कटाक्षके आश्रय हैं तथा जो ब्रह्मा ओर इन्द्र. आदि देवगणोंका दुःख दूर करनेवाले हैं उन धनुष-बाणघारी वरदायक नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीको मैं अहर्निश प्रणाम - करता हूँ ॥ ४५ ॥ जो त्रिळोकीमें सबसे अधिक रूपवान्‌ हैं, सबके स्तुत्य हैं, सैकड़ों सूयोके समान तेजस्वी हैं तथा वाञ्छित फल देनेवाले हैं उन शरणप्रद और रागाश्रित हृदयमें रहनेवाले श्रीरधुनाथजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ | ४६ ॥ जिनका नाम संसाररूप बनके लिये दावानलके समान है, जो महादेव आदि देवताओंके भी पूज्य देव हैं तथा जो करोड़ों दानवेन्द्रों- का दळून करनेवाले और श्रीयमुनाजीके समान श्याम- वणे हैं उन दयामय श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ ॥४७॥ जो संसारमें निरन्तर वासना रखनेबालोंसे अत्यन्त दूर हैं और संसारसे उपराम झुनिजनोंके सदेव इष्टिगोचर रहते हैं तथा जिनके चरणरूप पोत (जहाज ) संसार- सागरसे पार करनेवाले हैं उन रघुनाथजीकी मैं शरण लेता हुँ ॥ ४८॥ जो श्रीमहादेव और पार्वतीजीके मन-मन्दिरमें निवास करते हैं, जिनकी छीळाएं अति मनोहारिणी हैं तथा देव और असुरपतिगण जिनके चरण-कमलोंकी सेवा करते हैं उन गिरिवरधारी सुर- वंरदायक रघुनायककी में शरण लेता हूँ || ४९ ॥ जो प्रधन और परखीसे सदा दूर रहते हैं तथा पराये गुण और परायी विभूतिको देखकर प्रसन्न होते हैं उन निरन्तर परोपकार-परायण महात्माओसे सुसेबित कमळ- नयन श्रीरघुनाथजीकी में शरण लेता हुँ ॥ ५०॥ जिनका सुखकमछ मनोहर मुसकानसे सुशोभित हो रहा है, जो मक्तोंके लिये अति सुलभ हैं, जिनके शारीरकी कान्ति इन्द्रनीळमणिके समान सुन्दर नीलवण है; तथा जिनके मनोहर नेत्र शेत कमळको-सी शोभावाले हैं उन महादेवजीके परम गुरु श्रीरधुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ५१॥ हे प्रभो ! जलसे भरे इए पात्रोमें जैसे एक ही सूर्य प्रतिबिम्बित होता है वैसे ही संत्त, रज और तम-इन तीनों शुणोंकी इत्तिके कारण १४० अध्यात्मरामायण [ सर्ग ९ enero TIS TS, ` रविर्वि जलपूरितोदपात्रे- . |आप ही विष्णु ब्रह्मा और महादेवरूपसे मासित होते ST) हैं | हे ईश ! आप देवराज इन्द्रकी भी स्तुतिके पात्र प्यमरपतिस्तुतिपात्रमीशमीडे ॥५२॥ है, में आपको सति करता हैं. ॥ ५२॥ आपका दिव्य रतिपतिशतकोटिसन्दराजञ शरीर करोड़ों कामदेवोसे भी सुन्दर है, सैकड़ों मागो शतपथगोचरभावनाविद्रया । | हुए छोगोंसे आप अत्यन्त दूर हैं और योगिराजेे यतिपतिहृदये सदा विभातं हृदयमें आप सदा ही भासमान हैं । ऐसे आप गार्ह रघुपतिमातिहरं ग्रं प्रपद्ये ॥५२।। | प्रभु रघुपतिकी मैं शरण लेता हुँ? ॥ ५३॥ | इत्येवं स्तुवतस्तस्य प्रसन्नोऽभूद्रघूत्तमः । जटायुके इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीरघुनाथजी उवाच गच्छ भदरं ते मम विष्णोः परं पदम्‌ ॥५४॥ | उसपर प्रसन्न होकर वोले, “जटायो ! तुम्हारा कल्याण ति य इदं सोर लिखेद्ठा नियतः पठेत्‌ । हो तुम मेरे परमधाम विष्णुलोकको जाओ ॥ ५४ ॥ जो शात बड तान _ 2. पुरुप मेरे इस स्तोत्रको एकाग्रचित्तसे सुनता, लिखता स याति मम सारूप्य मरणे मत्स्व॒ति रमेत्‌ ॥५५॥ अथवा पढ़ता है वह मेरा सारूप्य-पद प्राप्त करता है इति राषवमाषितं तदा और मरते समय उसे मेरा स्मरण होता है” ॥५५॥ दुएवाच्‌ हृपसमाङुला हज! । पक्षिराज जटायुने रघुनाथजीका यह कथन बड़े हर्पसे रघुनन्दनसाम्यमास्थितः सुना और उन्होके समान रूप धारण कर व्रह्मा आदि प्रययो बअक्षसुपूजितं पदम्‌ ॥५६॥ | लोकपाळेसे पूजित परमधामको चला गया ॥ ५६॥ —? चल टी हु, > 1 यावदागमन तस्य तावद्रक्ष कलेवरम्‌ । उनके परमधामका! चली जायगी ॥ १० ॥ है राम ; गुरुजीके कथनानुसार में तभीसे आपका ध्यान करती इष्ट्रव राघव दुरच्या देह यास्यासे तत्पदम्‌ ॥१५॥ | हुई आपके आनेकी वाट देख रही थी । आज गुरुजी- | का वह वाक्य सफल हो गया ॥ १६॥ हे राम! ! आपका दर्शन तो मेरे गुरुदेवको भी नहीं हुआ | ्रतीक्ष्वागमनं तेऽद्य सफलं शुरुमाषितम्‌ ॥१६॥ ' फिर हे अप्रमेयात्मन्‌ ! में तो नीच-जातिमें उत्पन्न हुई है | एक गवारी नारी ही हूँ! मेरी तो वात हा क्या है ? तब सन्दर्शनं राम शुरुणामपि मे नहिं। ।॥ १७॥ जो आपके दासोंके दास हैं उनके भी जो उत्तरोत्तर सैकड़ों दासानुदास हैं में तो उनकी दासी योषिन्सूहाऽप्रमेयात्मन्‌ हीनजातिसमुद्धवा ॥१७॥ त च श ` | होनेकी भा अधिकारिणी नहा इ; फिर साक्षात आपका तव दासस्य दासानां शतसहथोत्तरस्य वा | दासी कहळानेका तो मेरा मुँह ही कहाँ है! ॥ १८॥ हे राम! आप तो मन या वाणीके विषय नहीं हैं फिर साक्षात्तवच [ह(१८] न जाने आज मुझे आपका दर्शन कैसे हो गया | हे कथं रामाच से दृ्स्त्वं सनोवागगोचरः देवेश्वर | में आपकी स्तुति करना नहीं जानती । अब SN 1 में क्या कर ग्रमो ! आप खयं ही (अपनी दयाछुता- . खोतु न जाने देवेश किं करोमि प्रसीद मे ॥१९॥ | से) मुझपर प्रसन्न होइये” ॥ १९ ॥ - राक्षसानां वधार्थाय ऋषीणां रक्षणाय च ॥१३॥ तयैवाकरवं राम सद्भयानैकपरायणा | दासीस नाविकारोऽर्ति कुतः . सर्ग १०] अरण्यकाण्ड १४७ श्रीराम उवांच पुस्त्वे ख्रीत्वे विशेषो वा जातिनामाश्रमादयः न कारणं मञ्जने भक्तिरेव हि कारणम्‌ ॥२०॥ यज्ञदानतपोभिवा वेदाध्ययनकमभिः | सतां सङ्जतिरेवात्र साधनं प्रथमं स्मृतम्‌ ॥२२॥ द्वितीयं मत्कथारापस्तृतीर्यं मद्गुणेरणम्‌ । व्याख्यातत्व मदवचसां चतुर्थ साधन मवेत्‌ ॥२३॥ आचार्योपासनं भद्रे मद्वुद्याऽमायया सदा । पञ्चमं पुण्यशीलत्वं यमादि नियमादि च ॥२४॥ निष्ठा मत्पूजने नित्यं पष्ठं साधनमीरितम्‌। मम मन्तोपासकत्वं साङ्गं सप्तममुच्यते ॥२५)। मङ्कक्तेष्वधिका पूजा सर्वभूतेषु मन्मतिः । वाद्यार्थेपु विरागित्वं शमादिसहितं तथा ॥२६॥ अष्टम नवमं तत््वविचारो मम भामिनि | एवं नवविधा भक्तिः साधनं यस्य कस्य वा ॥२७॥ सतियो वा पुरुषस्यापि तिर्यण्योनिगतस्य वा । भक्तिः सञ्जायते प्रेमलक्षणा शुभलक्षणे ॥२८॥ भक्तों सञ्जातमात्रायां मत्तत्वादुभवस्रदा । ममाजुभवसिद्धस्य मुक्तिस्तत्रेव जन्मनि ॥२९॥ स्यात्तस्मात्कारणं भक्तिमोक्षस्येति सुनिश्चितम्‌ । प्रथमं साधनं यस्य भवेत्तस्य क्रमेण तु ॥३०॥ भवेत्सवे ततो भक्तिमुक्तिरेय सुनिश्चितम्‌ । यस्मान्म्रक्तियुक्ता त्वं ततोऽहं त्वामुपस्थित १२१) इतो मदर्नान्मुक्तिसव नास्त्यत्र संशय! । यदि जानासि मे हि सीता कमललोचना ॥२२॥ कुत्रारते केन वा नीता प्रिया मे प्रियदर्शना ॥३२॥ वे दर्टमह शक्यो मद्धक्तिवेयुखे!ः सदा ॥२१॥ तस्माङ्कामिनि सङ्भेपाद्वकष्येऽह भक्तिसाधनम्‌ । श्रीरामचन्द्रजी बोले--पुरुपल-ख्रीत्वका भेद अथवा जाति, नाम और आश्रम--ये कोई भी मेरे भजन- के कारण नहीं हैं | उसका कारण तो एकमात्र मेरी भक्ति ही है ॥ २० ॥ जो मेरी भक्तिसे विमुख हैं वे यज्ञ, दान, तप अथवा वेदाध्ययन आदि किसी भी कर्मसे मुझे कभी नहीं देख सकते ॥२१॥ अतः हे भामिनि ! मैं संक्षेपसे अपनी भक्तिके साधनोंका वर्णन करता हूँ । उनमें पहला साधन तो सत्सङ्ग ही है ॥ २२ ॥ मेरे जन्म-कर्मोकी कथाका कीर्तन करना दूसरा साधन है, मेरे गुणोंकी चर्चा करना--यह तीसरा उपाय है और (गीता-उपनिषदादि ) मेरे वाक्योंकी व्याख्या करना उसका चौथा साधन है ॥ २३ ॥ हे मद्रे | अपने गुरुदेबकी निष्कपट होकर भगवदूबुद्धिसे सेवा करना पाँचवाँ, पवित्र खभाव, यम-नियमादिका पालन और मेरी पूजामें प्रेम होना छठा, तथा मेरे मन्त्रकी सांगोपांग उपासना करना सातवाँ साधन कहा जाता है ॥ २४-२५ ॥ मेरे भक्तोंकी मुझसे भी अधिक पूजा करना, समस्त प्राणियोंमें मेरी भावना करना, बाह्य पदार्थोमें आसक्त न होना और इाम-दमादि- ' सम्पन्न होना--यह मेरी भक्तिका आठ्वाँ साधन है तथा तत्त्व-विचार करना नवाँ है । हे भामिनि ! इस प्रकार यह नौ प्रकारकी भक्ति है। हे झुभ- लक्षणे ! जिस किसीमें ये साधन होते हैं वह खरी, पुरुष अथवा पशु-पक्षी आदि कोई भी क्यों न हो उसमें प्रेम- ळक्षणा-मक्तिका आविर्भाब हो ही जाता. है ॥ २६- २८॥ भक्तिको उत्पन्न होने मात्रसे ही मेरे खरूपका अनुभव हो जाता है और जिसे मेरा अनुभव हो जाता है उसकी उसी जन्ममें निस्सन्देह मुक्ति हो जाती है अतः यह सिद्ध हुआ कि मोक्षका कारण भक्ति ही है । (भक्तिके उपरोक्त नौ साधनोमेसे) जिसमें पहला साधन होता है उसमें क्रमशः ये समी आ जाते हैं । तब फिर उसे भक्ति तथा सुक्तिका प्राप्त होना निश्चित है । त मेरी भक्तिसे युक्त है इसीलिये मैं तेरे पास आया हूँ ॥ २९-३१ ॥ अब, मेरा दशन होनेसे तेरी मुक्ति हो ही जायगी--इसमें सन्देह नहीं । यदि तुझे पता हो तो बता इस ,समय कमललोचना सीता कहाँ है । मेरी प्रियदर्शना प्रियाको कौन ठे गया है? ॥ ३२-३३ ॥ १४८ अध्यात्मरामायण [ सगे १० RR "तहत ठ ञडआृझाटटटट 7: 5:57 7 7्पूपपपपाण 71 यदा RRR ४९७८ १४५१७ 20020०५” ४ 2 20 धट or ee कण जज ४७७४७ ४४७०७० iii हक शबर्युवाच शाचरी बोली--हे देव ! हे सवश ! हे विश्वमातन | देव जानासि सर्वज्ञ सवै त्वं विश्वमावन । | आप समी उड जानत द । तथापि हे प्रभो | लोका- चारका अनुसरण करते हुए यदि आप मुझसे पृष्ठते ह तथाऽपि छसे यन्मां लोकानञुृतः प्रभो ॥२४॥ तो इस समय सीताजी जहाँ हैं बह में आपको घतळाती ततोऽहमभिधास्यामि सीता यत्राधुना खिता। हँ । सीताजीको रावण हर ळे गया हे और इस समय रावणन हृता सीता रङ्कायां वतपेऽधुना ॥३५॥ | वे छङ्कामं हं॥ ३४-३५ ॥ ह राम । यहासि पास ह पुम्पा इतः समीपे रामास्ते पस्पानाम सरोवरम्‌ | नामका एक सरोवर है। उसके समीप ऋष्यमूक मका कष्यमूक्गिरिर्नाम तत्समीपे महानगः ॥३६॥ | एक बहुत वडा पवतर ९॥ बी अंतुटित पराक्रमी भनति सार्थ सुग्रीयो वानराधिपः । वानरराज सुग्रीव अपने भाई वाळीके भयसे सदा उरता चतु्भमन्त्रा मेः साधं सुग्रीवा वानराधिपः हआ अपने चार मन्त्रियोंके साथ रहता दै. । ऋषि-दापके भीतमीतः सदा यत्र तिष्ठत्यतुठविक्रमः ॥२० | अयसे वह स्थान तालीको लिये सर्वथा आगम्य है ~ ~ O वालिनश्च सयाद्श्रातुस्तदगम्यसृपभयात्‌ । हे प्रभो ! आप वहाँ जाइये आर उस सुग्रीचये मित्रता [a eo + ~ La [ क क वालिनस्तत्र गच्छ त्व तेन सख्य कुरु प्रभो ॥२८॥| कीजिये वह आपका सत्र काय सिद्ध करेगा ) हे Re > = न्दून | अव में आपके सामने ही अंगम प्रवेश सुग्रीवेण स सर्व ते कार्य सम्पादयिष्यति । रघुनन्दन ! अव में आपके सामने ही अश्रिमे ग्ब 8 2 | करूगी ॥ ३७-३९ ॥ हे राजिश्वर ! हे भगवन्‌ ! अहसर्ग्रि ग्रवेक्ष्यामि तवाग्रे रघुनन्दन ॥३९॥ हे राम ! जबतक मैं अपने शरीरकों जळाकर आप मुह॒ते तिष्ठ राजेन्द्र याबद्दग््वा कलेबरम्‌ । विण्णभगवानके परमधामको जाऊँ तबतक आप यास्यामि भगवन्‌ राम तव विष्णोः परं पदम्‌ ॥४०1| एक मुहं यहाँ और ठहरिये ॥ १० ॥ न इति रामं समामन्त्य प्रविवेश हुताशनम्‌ । श्रीरामचन्द्रजीके साथ इस प्रकार सम्भाषण करनेके, ्षणात्निपूय सकलमविद्याकृतवन्धनम्‌॥ | अनन्तर शरन अप्रिमें प्रवेश किया और एक क्षमे रामग्रसादाच्छवरी मोषं ग्रापातिदु्भम्‌॥४१॥| ~ प अविद्याजन्य चन्धनोँको नष्ट कर भगवान्‌ किं दुर्लभ जगन्नाथे श्रीरामे भक्तवत्सले) |.) | पल अति दुभ मोक्ष-पद प्राप्त किया न ॥ ४१॥ भक्तवत्सल जगन्नाथ श्रीरामके ग्रसन होनपर प्रसन्नेऽघमजन्माऽपि शवरी छुक्तिाप सा ॥४२॥ | संसारमे क्या दर्भ है । देखो, उनकी कासे नीच (5 [ ~ किं पुनत्रोह्नणा युख्याः पुण्या! श्रारामचिन्तकाः । | जातिमे उत्पन्न हुई शबरीने भी मोक्ष-पद प्राप्त कर मुक्त यान्तीति तड़्ाक्तेम्ाक्तेरय न संशय$॥४३॥ | लिया ॥ ४२ ॥ फिर श्रीरामका ध्यान करनेवाले पुण्य भक्तिमुक्तिविधायिनी भगवतः जन्मा ब्राह्मणादि यदि मुक्त हो जायें तो इसमें क्या श्रीरामचन्द्रस्य हे । आश्रय है ? निस्सन्देद, भगवान्‌ रामकी भक्ति हाँ लोकाः कामदुघाङ्घ्रिपक्षयुगलं मुक्ति है॥४२॥ अरे लोगो ! भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रकी भक्ति ही मोक्ष देनेबाली है । अतः कामधेचुरूप उनके चरण-{ गुगलोंकी अति उत्साहपूर्वक सेवा करो । हे घुद्विमान्‌ त्यकत्वा सदरे भुं । लोगो ! इन विविध विज्ञान-वार्ताओं और मन्त्र-चिल्ञार- राम झ्यामतडु खरारिहिदये को अलग रखकर तुरन्त ही श्रीशंकरके हृदयघाममें शोभा पानेवाळे इयामझारीर भगवान्‌ रामका भजन भान्ते भजध्य बुधा! ॥४४॥ | करो ॥ ४४ ॥ Mee Ren सेवध्वमत्युस्सुकाः । नानाज्ञानविशेषमन्त्रवितरति इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे दशमः सगः || १०॥ समाप्तमिदमरण्यकाण्डम्‌ । , | श्री सीतारासाभ्याँ नमः Mi च्यात्सराक्ाथण्‌ | 1 अध्यात्मरामाथ चु h HES कलला ) शि: ) |" किष्किन्काकाण्ड M यो वारिना ध्वस्तवल॑ सुकण्ठं न्ययोजयद्राजपदे कपीनाम्‌ । \ : 2 > य तं स्वीयसन्तापसुतप्तचित्त॑ श्रौजानकीजीवनमानतो5स्मि ॥ चचा SIRS Da दी रश; ~~ प | जी क क र ७-० 222 > टे ee टन र याट आए CE RE जा जाए: आह ME आए जाट TE जमा: पा: जा: जया जा. पथ: ट्र स्व च्य भाल पाकर "डॉन "दाल" भायदाहामन “च्याडीडीक”” पाभ मा पया पिक "आती "याड" 2 4 जया पडिक पभा "याक "ताक “पयाइह्ण भाप “रहर पातात पया CE चक्क अन्स्कय चयन च च्च Io bas ee es spare “ope Somes “eee “pris “ame ee SS Se Sm केया Ser mts Mapes erg Spee “ee “pees Me “ote? Meee Lee wi so Sapper Sige Same? ime Se “ogee “mi “hae pe rer र Ne Nest Spey AIA cp a pg जी पोन, बी. NED कि र्‌; 4! £} tb «fl शो Hy cis CU य र ए ¢ bh LAR MMI + 5 “य | है 3% F 3 : 4६ CEE TITS अ. २०० अ. > RT RRR RRR पक: जा रक 2 क 0200001000 क णा स्तन UR IR 17170 27542: 0552) विर प्री I PN La ज aes (च की कर Sms tuners nthe” तु is ८00 “0: दार शार त्त उ crema rae DN Re ie न ल ० Fade पॉ lt Ne ०23 EAA Ti है हज जे > न ० क t— HOON MNES ल ॥॥॥॥॥ दास-भक्त हनुमानजी MNES STN EEN [al eee eS ठा ( अ० रा० जिद्द । २८-२६) /, il 1 | ॥॥॥8॥॥11॥॥॥॥॥॥॥ ॥ | ॥ ॥ ॥ ||| CACAO i SM RR iQ ~= भ्र क्षणादेच महाकपिः ॥ (4 [ वी उत्पपात गिरेम छः गमोऽश लक्ष्मण: | ति तस्यारुरोह स्कन्घं र तथे ब 3५ अध्यात्मरामायण किष्किन्दाकाण्ह “eh श्रीमहादेव उवाच तत! सलक्ष्मणो रामः शनेः पम्पासरस्तटम्‌। आगत्य सरसां भ्रष्ठ ष्ट्रा विस्मयमाययो ॥ १॥ क्रोशमात्रं सुविस्तीणमगाधामलशम्वरम्‌ । उत्फुछाम्बुजकहारङुष्ुदोत्परुमण्डितम्‌ ॥ २॥ हंसकारण्डवाकीर्ण चक्रचाकादिशोभितम्‌ । जलङुक्कुटकोयष्टिकोश्चनादोपनादितम्‌ ॥ ३॥ नानापृष्पलताकीणं नानाफलसमाशइचतम्‌ । सतां मनःस्वच्छजलं पद्मकिञ्ञकवासितम्‌॥ ४ ॥ तत्रोपस्पृश्य सलिछं पीत्वा श्रमहरं विश्व! । सानुजः सरसस्तीरे शीतलेन पथा ययौ ॥ ५॥ कऋण्यमूकगिरे; पश्वे गच्छन्तौ रामलक्ष्मणौ । धनुवोणकरों दान्तौ जटावल्कलमण्डितो । पञ्यन्तौ विविधान्बक्षान्‌ गिरेः शोमां सुविक्रमो।$) सुग्रीबस्तु गिरेमूश्‍िनि चतुर्भिः सह वानरैः । श्रीमद्दादेबजी बोले-हे. पार्वति ! तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी ळक्ष्मणके सहित धीरे-धीरे पम्पासरके तटपर आये । उस सुन्दर सरोवरको देखकर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ || १ ॥ उसका विस्तार एक कोशका था और उसमें अति निर्मळ अगाध जल भरा हुआ था तथा सब ओर खिळे हुए कमळ, कहार, कुमुद और उत्पछ आदि सुशोभित हो रहे थे॥ २॥ उस सरोवरमें जहाँ-तहाँ हंस और कारण्डव आदि पक्षी बिहार कर रहे थे, चक्रवाकादि उसकी शोभा बढ़ा रहे थे और जल्कुक्कुट, कोयष्टि तथा क्रौंच आदि पक्षियोंके कलरवसे वह शब्दायमान हो रहा था || ३ ॥ वह चित्र-विचित्र पुष्प-लताओंसे परिपूर्ण और नाना प्रकारके फलवाले वृक्षोसे घिरा हुआ था तथा उसका कमळकेशरसे सुवासित जळ सज्जनोंके चित्तके समान खच्छ था | ४ ॥ वहाँ पहुँचनेपर छोटे भाई छक्ष्मणके सहित प्रभु रामने आचमनकर उस सरोवरका श्रमहारी शीतल जळ पीया और फिर उसके किनारे-किनारे शीतळ छायाथुक्त मागसे चलने लगे || ५॥ इस प्रकार जटा- वल्कळविभषित जितेन्द्रिय परम पराक्रमी राम और लक्ष्मण, जब हाथमें धनुष-वाण लिये बिविध इक्षो और पर्वतकी शोभाको निहारते हुए ऋष्यमूक पवेतकी वगछमें चल रहे थे ॥ ६॥ उस समय अपने चार मन्त्रियोंके सहित गिरि-शिखरपर बैठे इए सुग्रीबने उन्हें उधर '१५२ NNN अध्यात्मरामायण ene व व्व्य््ण्ण्प्प्प्प्प्य््््प्प्प्य्प्ण्प्प्प्यप्यय्यययय्प्ययण्य्ग्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य््य्य्य्या पपयणपपपटफइय्णययधा->८८५४४४४/८५४४/४८४४५५४४४४४४४"४०११४४४४१000 ७०७०५०५० ५७०५८ ५४ तव्ानक्यामककम्कम्यणृकत्ममयम्स्कायनुक [सभ १ Sanne खिसा दद तौ यान्तावारुरोह गिरे! शिरः॥ ७॥ | जाते देखा और वह सबसे ऊँचे शिखरपर चढ़ गया भयादाह हनूमन्तं को तो वीरवरो सखे । गच्छ जानीहि भद्रं ते बढ़भूत्वा द्विजाकृतिः ॥८॥ वालिनाप्रेषितो किंवा मां इन्तुं समुपागतों । ताभ्यां सम्मापणं कृत्वा जानीहि हृदयं तयो।॥९॥ यदि तो दुष्टहृदयौ संज्ञां छुरु कराग्रतः | विनयावनतो भूस्वा एवं जानीहि निश्चयस्‌ ॥१०॥ तथेति वद्रूपेण हनुमान्‌ सम्युपागतः । विनयावनतो भूत्वा रासं नत्वेद मन्वीत ॥११॥ को युबां पुरुपव्याधौ युवानो वीरसम्मतौ । दयोतयन्तौ दिशः सर्वाः प्रभया भास्कराविवा। १२॥ युवां त्रैलोक्यकताराविति माति सनो मम। युवा अधानपुरुषो जगद्धेतू जगन्मय ॥१३॥ मायया मानुपाकारो चरन्ताविब लीलया । भूभारहरणार्थाय भक्तानां पालनाय च ॥१४॥ अवतीर्णाविह परौ चरन्तौ क्षत्रियाक्ृती । जगत्सितिलयो सर्म लीलया कर्तम्॒धतों ॥१५॥ स्वतन्त्रौ प्रेरको सर्षहृदयस्थाविहेश्बरौ | नरनारायणौ ठोके चरन्ताबिति मे मतिः ॥१६॥ रामो लक्ष्मण प्राह पश्यैनं वडुरूपिणम्‌ । शब्दशास्रमशेषेण श्तं नूनमनेकधा॥१७॥ अनेन सापितं कृतसमं न किञ्चिदपशव्दितम्‌ । ततः ग्राह हनूमन्तं राघवो ज्ञानविग्रह।॥१८॥ अह दाशरथी रामस्खयं मे लक्ष्मणो5्लुजः । ॥ ७॥ फिर भयभीत होकर हचुमानजीसे बोछा--- “मित्र देखो, ये दो वीरवर कोन हैं | तुम्हारा कल्याण हो, तुम ब्राह्मण ब्रह्मचारीके वेपमें उनके पास जाकर यह माळम तो करो ॥ ८ ॥ तुम उनसे बात- चीत करके उनके यहाँ आनेका अभिप्राय मालूम करना । ऐसा न हो, वे बाळीके भेजनेसे मुझे मारनेके' लिये आ रहे हों ॥ ९ ॥ यदि तुम्हें उनका हृदय दृपित माळ्म हो तो अपनी अंगुळीसे मुझे संकेत कर देना । देखो, वड़े विनीत होकर यह सब भेद माम कर लेना ॥ १० ॥ . तव हनुमानजी सुग्रीवसे “जो आज्ञा' कह ब्रझचारीका वेप बनाकर रघुनाथजीके पास आये और बड़ी नम्रतासे उन्हें नमस्कार कर वोले--॥ ११॥ “हे पुरुषव्याघ्र] आप दोनों कोन हैं? आपकी युवावस्था है ओर आप बड़े वीर माळूम होते हे । अहो ! अपने शरीरकी कान्तिसे आपने समस्त दिशाओंकों सूर्यके समान प्रकाशमान कर रक्खा है || १२॥ मेरा मन तो यह कहता है कि आप दोनों त्रिलोकीके रचनेवाले संसारके कारणभूत जगन्मय प्रधान और पुरुष ही हैं ॥ १३॥ आप मानो- पुथिवीका भार उतारने और भक्तजनोंकी रक्षा करनेके लिये ही लीलावदा अपनी मायासे मनुष्यरूप धारण- कर विचर रहे हैं | १४ ॥ आप साक्षात्‌ परमात्मा ही क्षत्रियकुमारके रूपमें अत्तीर्ण होकर प्रथिवीपर घूम रहे हैं | आप लीलाहीसे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और ( दुष्टोंका ) नाश करनेमें तत्पर हैं ॥ १५ || मेरी वुद्धिमे तो यही आता है कि आप सबके हृदयमें विराजमान, सवके प्रेरक, परम सखतन्त्र भगवान्‌ नर- नारायण ही इस छोकमें विचर रहे हैं? | १६॥ तब श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा--“छक्ष्मण | इस ब्रह्मचारीको देखो | अवश्य ही इसने सम्पूर्ण शब्दशास्र ( व्याकरण ) कई बार भली प्रकार पढ़ा है ॥ १७॥ देखो, इसने इतनी बातें कहीं किन्तु इसके बोलनेमें कहीं कोई एक भी अझुद्धि नहीं हुई ।” तदनन्तर विज्ञानघन श्रीरघुनाथजीने हलुमानजीसे कहा--॥ १८ ॥ “हे द्विज ! मैं दशरथका पुत्र राम हूँ और यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है । मैं पिताकी [$ © RC सीतया भायया साथ पितुर्वचनगोरवात्‌ ॥#श्फ्ने ' आज्ञा मानकर अपनी खी सीताके सहित वनमें आया oe i -- _ Cd, f PG FRR: PNP LP OY NE SEP RP RR RPE CREME si र समं १] किष्किन्धाकाण्ड १५३ ७-307-37 4.0 770737५709 2-5 र RRR (००३९० NP ९००५ A ९० pe "१०९०४० ` ४४%४४४१४१/४१"0"४१४४४४४४४४0४४ ४८ ४४४७८७० य आगतस्तत्र विपिने खितोऽहं दण्डके द्विज ॥१९॥॥ था और यहाँ दण्डकारण्यमें रहता था । वहाँ किसी तत्र भार्या हृता सीता रक्षसा केनचिन्मम। | रासने मेरी भार्या सीताको हर ळ्या । उसे ढनेके लिये हम यहाँ आये हें । कहिये, आप तामल्वष्टुसिहायाता त्वं को वा कस्य वा वद॥२० ॥| कौन हैं और किसके पत्र हैं ? || १९-२०॥ बटुरुवाच ब्रह्मचारी बोळे- महामति सुग्रीव वानरोंके राजा _ सुवो नाम राजा यो वानराणां महामतिः हैं| वें अपने चार मन्त्रियोके साथ इस पर्वतके शिखर- ॥ चतुभिमन्त्रिमिः साथ गिरिमूर्धनि तिष्ठति॥२१॥ | पर रहते हैं ॥ २१॥ वे दुष्टचित्त वाळीके छोटे भाई आता कनीयान्‌ सुग्रीवो वालिनः पापचेतसः। | ह! उस पाळीने उनकी खी छीनकर उन्हें घरसे तेन निष्कासितो मायी येह बालिना॥२२॥ निकाळ दिया है || २२ ॥ अतः उसके भयसे वे इस तन [नष्कासता भाया हृता तस्यह बालिना॥२ ऋष्यमूक पर्वेतपर ही रहते हैं । हे महामते ! मैं उन्हीं तञ्कयादष्यमूकाख्यं शिरिमाश्रित्य संस्थितः । | सुप्रौवका मन्त्री और वायुका पुत्र ह ॥ २३ ॥ मेरा अइ सुग्रीवसचियो वायुपुत्रो महामते ॥२३। | जन्म माता अन्ननीके गर्भसे हुआ है और मैं 'हनूमान' हनूमान्नाम विख्यातो झञ्जनीगर्मसम्भवः नामसे विख्यात हूँ । हे रघुश्रेष्ठ ! आपको महाराज तेन सख्यं त्वया युक्त सुग्रीवेण रघत्तम ॥२४॥ | उरे मित्रता करनी चाहिये ॥ २४॥ बे आपकी याको चुरानेबालेका वध करनेमें आपके सहायक मार्यापहारिणं हन्तु सहायस्त भावष्यात । होंगे । आइये, यदि आपकी इच्छा हो तो अभी उनके इदानीमेव गच्छाम आगच्छ: यदि रोचते ।।२५॥ | पास चढें || २५॥ श्रीराम उवाच श्रीरामचन्द्रजी चोले-हे कपीश्वर ! मैं भौ उनसे अहमप्यागतस्तेन सख्यं कतुं कपीश्वर । मित्रता करनेके लिये ही आया हूँ । उन मित्रवरका भी जो सख्युस्तस्यापि यत्काय तत्करिष्याम्यसंश्यम्‌)२६॥| कुछ कार्य होगा वह मैं निस्सन्देह पूर्ण कर दूँगा ॥२६॥ हनूमाच्‌ स्वस्वरूपेण स्थितो राममथाघ्रबीत्‌ । यह सुनकर हनूमानजीने अपना रूप धारण _ 5 कर रामसे कहा, “आइये, आप दोनों मेरे कन्धोंपर आरोहतां मम स्कन्धौ गच्छामः पषेतोपरि ॥२७)| चढ़ जाइये, अब हम पर्वतके ऊपर चलते हैं, जहाँ PP Pe अपने मन्त्रियोंके सहित सुग्रीव बाळीके भयसे (छिपकर) यत्र स॒ [लिनो भयात्‌ । यत्र तिष्ठति सुग्रीबो तीर उना बाच रहते हैं ।” तब राम और लक्ष्मण बहुत अच्छा? कह तथेति तस्यारुरोह स्कन्धं रामोऽथ लक्ष्मण ॥।२८॥| उनके कन्धोंपर चढ गये ॥ २७-२८॥ वानरराज crs > या हनूमान्‌ एक क्षणमें -ही पवतके शिखरपर कूदकर ७ + | उत्पपात मिरेशूर्थ्नि क्षणादेव महाकपि पहुँच गये । वहाँ राम और छक्ष्मण एक बृक्षकी छायामें , वृक्षच्छायां समाश्रित्य खिता तो रामलक्ष्मणो।२९॥| दे हो गये || २९॥ हनूमानपि सुग्रीवश्ुपगम्य कृताञ्जालिः । इधर हनूमानूजौने सुप्रीवके पास जा उनसे हाथ _ जोड़कर कह्ा--“राजन्‌ | अब अपनी रांका दूर च्येतुते भयमायातो राजन्‌ श्रीरामरक्ष्मणो॥३०॥| जये क्‍योंकि आपके यहाँ श्रीराम और लक्ष्मण मे जितं घ्‌ ठेये, मैंने रामके साथ पि र्यं ते योजितं मया । पघारे हैं ॥ ३० ॥ शीघ्र उदि शीप्रुसिष्ठ रामेण सख्य त आपकी मित्रता होनेका योग छगा.दिया है । शीघ्र ही अग्नि साक्षिणमारोप्य तेन स्यं द्रत कुरु ॥२१॥ | अग्निको साक्षी करके उनसे मित्रता कीजिये ॥ २१॥ . ततोऽतिहपात्सुग्रीबः समागम्य रघूत्तमम्न्‌। तब सुग्रीव अति प्रसन्न होकर रघुनाथजीके पास २० ¦ १५४ अध्यात्मरामायण [सर्ग १. | RIS TR ISN UAT TNS १०५८ APNE NTN A ४१५७ रीच RANE तसु Nd a प i i र औ से अपने हाथसे ण्क वृश्षकी त्वा विष्टराय ददौ मुदा ॥३२॥ | आये और प्रसन्नमनसं अपन हायसे एक इ वृक्षशाखां स्वयं छित्वा विष्टराय ददो यु शाखा तोड़कर उन्हें वैठनेके लिये आसन दिया हनूमान्लक्ष्मणायादात्सुग्रीबाय च लक्ष्मणः । || ३२॥ इसी प्रकार हनमानजीने छक्ष्मणजीकरो इषेण महताऽऽविष्टः सर्व एवावतख्थिरे ॥१३॥ | तथा उक्र्मणजीने सुप्रीवको आसन दिया और सुर लोग अति आनन्दपूवेक अपने-अपने आसर्नोपर वैर गये ॥ ३३ ॥ तदनन्तर लक्ष्मणजीन आरम्मसे लेक बनमें आने और सीताजाके हरे जानेतकका रा मच जां का सारा वृत्तान्त सुनाया ॥२४॥ लक्ष्मणोक्त वचः श्रुत्वा सुग्रीवो राममन्रवीत्‌ । लद्ष्मणजीके वचन सुनकर सुग्रीवने श्रीरामचन्द्र , _ ~ | से कहा--“हे राजराजेश्वर ! में सीताजीका खोड राजन्द्र $ रणम ३५॥।। ` „` है बे व अह करिष्ये राजन सीताया परिमागणय॥ २ करूगा ॥ ३५ ॥ ओर रावुका वध करते समय भा + शृणु राप मया इष्टं किञ्चित्ते कथयाम्यहम्‌ ॥२३६॥ | जो कुछ देखा है वह आपको सुनाता हूँ, ठुनिचे ॥३६। लक्ष्मणरत्वत्रवीत्सव रामवृत्तान्तमादितः । | चनवासामिगमनं साताहरणमेव च॥२४॥ | | + स्मिर्धनि | > > साथ ड; गन एकदा मन्त्रिभिः साथे स्थितोऽहं गिरिमूर्धनि । | “एक दिन अपने मन्त्रियोंके साथ में पर्वते रु व | शिखरपर बैठा था । उस समय हमने देख विहायसा नौयमानां कैनचित्ममदोत्तमाम्‌ ॥२७॥ | कि कोई राक्षस किसी उत्तम कामिनीको आकाश मार्गसे > मेति रष््राऽसमान्पतोपि | लिये जाता हे ॥ ३७॥ वह “राम ! राम ! न्तीं रामरामेति दृष्टाउस्मान ¦ मागले हि शशि कि कोशन्ती रामरामेति ५७७ | | कहकर विलाप कर रही थी | हमें पर्वतपर बैठे देख आइटुच्याभरणान्याश्ु स्वोत्तरायेण भामिनी॥३८। | कर उसने तुरन्त ही अपने आभूषण उतारकर एक वख निर ey | बाँधे और हमारी ओर देखते इए नीचे गिरा दिये ।। निरीक्ष्याथ परित्यज्य क्रोशन्ती तेस रक्षसा । |. | इसी प्रकार निरन्तर विछाप करती हुई ऊ नीताऽहं भूपणान्याश्च गुहायामक्षिपं प्रभो॥३९॥/ अवछाको वह राक्षस ठे गया । प्रभो! मने तुरन्त ही ऊ शहर | आभूपणोंको उठाकर शुफामें रख दिया ॥ ३८-३५ इदानीमपिपद्यत्वंजानीहितववा न वा । आप उन्हें अमी देखिये और पहचानिये कि वे आपहा ह बीळ ee 1१) कपि [चने इत्युक्त्वाऽऽनाय रामाय दर्शयामास वानरः ४०। | हं या नह । ऐसा कह. का्षराज सुमा र ५ | आभूषण लाकर रामको दिखाये || ४० ॥ रामचन्द्रज॑ विभुच्य रामस्तददृष्टा हा सीतेति दुहुः । | ने उन्हें खोलकर देखा तो (उन्हें पहचानकर ) छाती दि निक्षिप्य तस्सर्व रुरोद प्राकृत लगा लिया और साधारण पुरुषोंके समान वारम्ता हाद नाष्य तत्सव रुरांद आकृतो यथा ॥४१॥ | ह साते ! हा सीते? कहकर रोने गे ॥४ १ ॥ आश्वास राघवं आता लक्ष्मणो वाक्यमन्रवीत्‌ । तत्र भाई छक्ष्मणने उन्हें ढॉंढस बॅँधाकर कहा-- अचिरेणेव ते राम प्राप्यते जानकी शुभा । “है राम ! वानरराज सुग्रीवकी सहायतासे युद्धः वानरेन्द्रसहायेन इत्वा राबणमाहचे ४२॥ | रमणको गो मरकर आप श्र ही झुभछक्षणा जनक सुग्रीवोऽप्याह हे राम प्रतिज्ञां करवाणि ते । Wo क ४२ | सुग्नीवने भी कहा-- समरे रावणं हत्वा तव दास्यामि जानकीम्‌ ॥४३॥ राम ! में आपसे प्रतिज्ञा करके कहता ह कि रावण- क्रो पी को युद्धमें मारकर आपको सीता दिला दूँगा” ॥४३॥ तता हनूमान्प्रज्वास्य तयोराभ्र समापत! । ` तदनन्तर हनूमान्‌जीने उन दोनोंके पास अग्नि a ^ य ह. ताइभी रामसुग्रीवावशौ साक्षिणि तिष्ठति ॥४४ । ग्रज्वलित क्री । तब निष्पाप राम और ग्रीन दोनों ही किष्किन्धाकाण्ड १५५ न्न TITTIES inn ४४१८४५१५१५ ४ ४४४ ४४ ४८ ४७८ ६८ ५.८ ४८८ ४७ ५८७ ३ २७ ४ २.० ३८ ६७३. १.० ९७० ७०९ ४८४५ ९० ०० १०७५५०७०६५ ५८९७८ ५-० ७५९९. ५६.० ५०७४. ७० १.९७ १० ६३७० ७० NANPA ७० ४७४४७७७ rr SSSI AS ew “ew तक Q ~ बाहू रस्य चालिइर्य परस्परमकर्मपो । |जअग्निको साक्षी कर परस्पर एकूसरेसे भुजा समीपे रघुनाथस्य सुग्रीवः सञ्चपाविश्त्‌ ॥४५॥ फेळाकर मिले | तत्पश्चात्‌ सुझ्रीब रामचन्द्रजीके दन्त गस बैठ गये || ४४-४५ || और अति प्रेमपूर्वक सांद्न्त कथयामास प्रणयाद्र्घुनायके। | उन्हें अपना वृत्तान्त सुनाने टगे | वे बोळे- “भिन्न ! सखे शृणु ममोदन्तं वालिना यत्कृतं पुरा ॥४६॥ श्व र कौ सुनो; वाढीने पूर्वेकालमे मेरे साथ रो जो कुछ किया है वह सुनाता हुँ ॥ ४६ || एक बारं “सथपुत्रोऽथ मायावी नाझ्ना परमदु्मदः अति मदोन्मत्त मय दानवके पुत्र मायावीने किष्किन्धा- किष्किन्धां सञ्चुपागत्य बालिनं ससुपाह्वयत्‌॥४७।।| पुरीमें आकर वाळीको युद्धके लिये छलकारा ॥ ४७॥ सिंहनादेन महता वाली तु तदमर्षणः । वह दैत्य वड़ा भारी सिंहनाद करने ल्गा। वाली Rr हे उसका यह दपं न देख सका, उसकी आँखें क्रोधसे निययो क्रोधताम्राक्षो जघान चढयुश्िना ॥४८॥ | छाल हो गयीं और उसने बाहर आ उसके बड़े जोरसे एक दुद्राव तेन संविशो जगाम खगुहां प्रति । घूँसा मारा ॥ ४८॥ उसके आघातसे व्याकुळ होकर । वाढी मायाविनमह मायावी अपनी गुफांकी ओर दौड़ा । तव वाली और अनुदुद्राव ते चारी माया तथा ॥४९॥ | जे दोनोद्दीने उसका पीछा किया ॥ ४९ ॥ मायावीको ततः ग्रवि्टमालोक्य शुहां मायाविनं रुपा । | गुफामें गया देखकर वालीको बड़ा रोष हुआ | ~ sp , , उसने मुझसे कहा--“तुम यहीं रहो, मैं गुफामें जाता पाल मामाह पए त्व हिगेच्छाम्यह मुहाम्‌ | |” ऐसा कहकर वह गुफामें घुस गया और एक मास- इत्युक्त्वाबिइय स गुहां मासमेकं न निर्ययौ ॥५०॥ तक उससे न निकला || ५० || एक महीना बीत जाने- | पर उस गुफाके द्वारसे बहुत-सा रक्त निकला | उसे देख- ~ Ce « मासादूष्वं शुहाद्वारानिर्गत रुधिरं वु! | र यह समझकर कि वाली मारा गया, मुझे बड़ा दुःख तद्दृष्टा परितप्ताड़ो सतो चालीति दु!खितः ॥५१॥ | और सन्ताप हुआ ॥ ५१ ॥ तब ( इस भयसे कि कहीं ~ 2 वाळीको मारनेवाला दैत्य बाहर आकर मुझे भी न मार गुहाद्वारि शिलामेकां निधाय गृहमागतः । रा _ हैं द्‌ दे है | े ण्ह डाळे ) उस शुफाके द्वारपर एक शिळा रखकर मैं घर ततो जत खतो बाली शुहायां रक्षसा हृतः ॥५२॥ | लोट आया; और सबसे यह कह दिया कि वाली शुफामें तच्छत्वा दुःखिताः सर्वे मामनिच्छन्तमप्युत । | रा्सकेदाथसे मारा गया ॥ ५२ || यह छुनकर सबको S रेच हा दि बड़ा दुःख हुआ और मेरी इच्छा न होनेपर भी समस्त राज्येऽमिपेचन चकुः सच वानरमान्त्रण! ॥५३॥ | घानर-मन्त्रिमण्डलने मुझे राजपदपर अभिषिक्त कर शिष्टं तदा मया राज्य किश्चित्काटमरिन्द्म । दिया ॥ ५३ ॥ हे शत्रदभन | मैंने कुछ ही दिन राज्य- ५४॥ शासन किया होगा कि पाली आ गया और क्रोधपूवक | ततः समागतो वाली मामाह परुपं रुपा ॥५४॥ | मुझसे बड़ी कड़वी-कड़वी बातें कहने छगा ॥ ५४ ॥ वह घा भर्त्सयित्वा मां निजघान च म्रष्टिमि! । | इस प्रकार, मुझे बहुत कुछ भळा-बुरा कहकर वह मुझे चूँसोंसे मारने छगा । तब मैं अत्यन्त भयभीत वतां नग॒ृत्य बगरादधाव परया भिया 1५५ होकर नगर छोड़कर भाग गया ॥ ५५॥ हे प्रमो | मैंने छो वान्परि ; न्तमें इस ऋष्यमूक-प्ेतकी लोकान्‌ सर्वान्परिक्रम्प ऋष्यमूकं समाश्रितः । | सम्पणे लोकोमिं घूमकर अ शि त्सोऽपि गनं गिरिं अमो शरण ली है क्योंकि ऋषिशापके भयसे वह इस पवेत- को! शापमयात्सो जपे नायावीम गिर रभो) ५३॥ पर नहीं आता || ५६ ॥ तबसे मेरी भार्यीको वह तदादि मम भायाँ स खयं शङ्कते विमूढथीः! [| दुर्मति स्वयं भोगता है और मैं खरी तथा घरके छिन अतो दुःखेन सन्तप्तो हृतदारों हताश्रयः ॥५७॥| जानेसे मन-ही-मन छुढ़ता हुआ यहाँ रहता हूँ । आज | | स्म | १५६ ._____________ अध्यासारामायण 111 जतमतचे अध्यात्मरामायण ) [सर्ग १ PPS SCNT 0 हक nr +++ nas TANS काका आज nN Sm न aN वसाम्यद्च भयत्पादंस्पश्चात्सुखितोऽस्म्यहम्‌ । | आपके चरणका रप वाससे सु सि चनः ॥ ५८ तब कमलनयन शरामचन्ट्रजीन सखा सुग्रीवे सित्रदुःखेन सन्तप्तो रामो राजोबल(चनः दःखसे आतुर होकर उसके सामने प्रतिज्ञा की कि हनिष्यामि तव देष्यं शध भार्यापहारिणम्‌ | | बहुत ही झीत्र तुम्हारी पढीको छोननवाळे तुम्हारे इति प्रतिज्ञामकरोत्सुग्रीवस्य पुरस्तदा ॥५९॥ | शत्रुका नाद कर डाडेंगा' ॥ ७७-५० ॥- ~ जेन्द्र वाली * नली | मुग्रीवन बहा-- हि राजेस्द्र ! बाल सम्पृ्णे* सुग्रीबोडप्याह राजेन्द्र पाली वबल बडा न ! थोद्वाओमें अग्रणी ह ( बह काश साधारण अल्याटा कर्थं हनिष्यति भवान्देपेरपि दुरासदम्‌ ॥६०॥। ¦ नहीं है ) । उसको पराजित करना देंबताओंके दि ' भी अति कठिन है| फिर आप उसे कैसे मार | सकेंगे १ ॥ ६० ॥ दे वीरश्रे्ठ | सुनिये में आपको कदाचिद्दुन्दुमिनीम महाकायो महाबलः ॥६१॥ , उसके बलका वृत्तान्त सुनाता है । एक बार बुन्नि नामका एक बड़ा बलवान ऑर स्थृल्काय दैत्य केष्किन्यासगमद्राम महामहिपरूपशक । किंप्किन्यापुरीगं भसेका रुप बनाकर आया और उस युद्धाय वालिनं रात्री समाह्वयत भापणः ॥६२॥ महाभयानक असुरन रात्िक समय वालीका युद्धके । चयि टटकारा ॥ ६१-६२ | उसकी गर्जना बालकों सहन न हुई और उसने अति क्रोबबृवेक उस भमेके महिषं भृज्ठयोशत्वा पातयामास भूतले ॥६३॥ ` सांग पकदकर उसे प्रथिवीपर पटक दिया ॥ ६३ ॥ पादेनैकेन तस्कायमाक्रम्यास्य शिरो महत । | तपा आपन एक परमे उसके दरीरकों दबाकर उसके - महान मस्तकका अपन हाथलि मरादयार तार डाला हस्ताभ्यां आमयंश्हिस्वा तोलुयिस्वाक्षिपद्धवि।६४। आर उसे उडालकर पभिव्रीपर दूर फेक दिया ॥ ६४ ॥ व | हैं राम ! बह फिर वहाँ से एक योजन दूर मनिर्योके पपात तच्छिरो राम मातङ्गाश्रमसान्िधा । आश्चममण्डलमें महर्षि मतंगक्के आश्रमके पास जाकर योजनात्पतितं तसान्युनेराश्रममण्डले ॥६५॥ ¦ गिरा ॥ ६५॥ उससे जहाँ-तहाँ बहुत-सा रक्त बरसा । 2. 6. 1 3 | उसे देखकर सुनिवर मतंगको बड़ा क्रोध हुआ और रक्तइृष्टिः पपातोचैरईट्रा तां क्रोधमूच्छित; । | उन्होंने करोधमे भरकर चाढीसे कद्वा--“यदि आजसे तजो वालिनं ह यद्यागस्तासि मे गिरिय॥६६॥ 57 क इस पतप आ तो निस | तुम्हारा शिर पट जायगा और तुम मर जाओगे | इतः परं भन्नशिरा मरिष्यसि न संशयः । ! है रामजी ! मुनिके इस प्रकार झाप देनेसे हाँ वह तवसे इस ऋष्यमूक-पर्वतपर नहीं आता ॥ ६६-६७ | ऐसा जानकर ही में यहाँ निर्भय होकर रहता हूँ । एतज्ज्ञात्वाहमप्यत्र वसामि भयवजित! । राम! (जिसे बालीने मारा था) आप जरा उस दुन्दुमि देत्यके पताकार शिरको तो देखिये । राम पय शिरस्तस्य दुन्दुभेः पवतोपमम्‌ ॥६८] | (इसीसे आपको उसके बलका कुछ अनुमान हो जायगा ।) ॥ ६८॥ यदि आप उस मलकको फेंक सकेंगे तो अवश्य बालीका बध भी कर सकेंगे !* हि ° [a A ` इत्युक्त्वा दर्शयामास शिरस्तद्विरिसन्निमम्‌ ॥६९।। ऐसा कहकर सुम्रीवने वह पर्वत-सद्श शिर शृणु ते कथयिष्यामि तद्वरं बलिना वर | तन्छृत्वाऽसहमानोऽपा वाला परमकांपचः | एव शपस्तदारभ्य ऋष्यमूक न यात्यसा ॥६७॥ | तस्क्षेपणे यदा शक्तः शक्तस्त्वं वालिनो वधे। ne सर्ग १ ] पप्प््ण््््ण्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प्फण्प्प्पिफ्क्क्क्फ्क्कपस्सस्2---------व्कब्ब्व्ननननननू-ूूरेूूरळ- NPN दृष्टा रामः स्मितं कृत्वा पादाजुं्ठिन चाक्षिपत्‌। दशयोजनपर्थन्तं तदद्भुतमिवाभवत्‌ ॥७०॥ साधु साध्विति सम्प्राह सुग्रीचो मान्त्रामिः सह। पुनरप्याह सुग्रीवो रामं भक्तपरायणम्‌ ॥७१॥ यूतं ताला महासाराः सप्त पद्य रघूत्तम । एकेकं चालयित्यासो निष्पत्रान्कुरुते$्ज्ञसा ॥७२)| यदि त्वमेकवाणेन विद्धा छिद्रं करोषि चेत्‌ । हतस्त्वया तदा वाली विश्वासो मे प्रजायते । तथेति धनुरादाय सायक तत्र सन्दधे ।७३॥ विभेद च तदा रामः ससत तालान्महावलः ! तालान्सप्त विनिसिद्य गिरिं भूमिं च सायकः ॥७४। पुनरागत्य रामस्य तूणीरे पूववत्सितः । ततोऽतिहर्पातसुग्रीवो राममाहातिविखितः ॥७५॥ देव त्वं जगतां नाथः परमात्मा न संशयः । मत्पूर्वकृतपुण्योधैः सङ्गतोऽयय मया सह।७६॥ त्वां भजन्ति महात्मानः संसारविनिश्वत्तये । तवां प्राप्य मोक्षसचिं ग्रार्थयेऽहं कथं भयस्‌॥७७॥ दाराः पुत्रा धनं राज्यं सरव त्वन्मायया कृतम्‌। अतोऽहं देवदेदेश नाकाङ्केऽन्यत्म्रसीद मे॥७८॥ आनन्दाचुभवं त्वाऽद्य गराप्ोऽहं भाग्यगौरवात्‌। मृदर्थ यतमानेन निधानमिव सत्पते ॥७९॥ अनाद्यविद्यासंसिद्धं वन्धनं छिन्नमद्य नः | यज्ञदानतपःकर्मपर्ते्टादिमिरप्यसौ ॥८०॥ (0७ न जीयते पुनर्दाद्य भजते संसृतिः प्रभो । त्वत्पाददशनात्सदो नाशमेति न संशयः ॥८१॥ दो जाता है--इसमें सन्देह नहीं || ८०-८ किष्किन्धाकाण्ड १५७ ७८-१५ दिखलाया ॥ ६९॥ उसे देखकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकाते हुए अपने पैरके अँगूठेसे उसे दश योजन दूर फेंक दिया । यह बड़े आश्चर्यकी बात हुई | ७० | अपने मन्त्रियोंके सहित सुग्रीव भी “चाह ! वाह! करने छंगे और फिर वह भक्तोंके एकमात्र आश्रय भगवान्‌ रामसे बोढे---)] ७१ ॥ “हे रघुश्रेष्ठ ! देखिये, ताळके ये सात वृक्ष कैसे सुद्द हैं, किन्तु बाळी इनमेंसे प्रत्येकको हिलाकर अनायास ही पत्र-हीन (बे-पत्तेके) कर दिया करता है | ७२ || यदि आप एक बाणसे ही इन सबको बेधकर इनमें छिद्र कर देंगे तो मुझे यह विश्वास हो जायगा कि आप अवश्य ही वाळीको मार डालेंगे ।” तब महाबली रघुनाथजीने “बहुत अच्छा? कह अपना धनुष लेकर उसपर वाण चढ़ाया और उन सातों ताळ- बृक्षोंको बेध दिया । तत्पश्चात्‌ वह वाण सातों ताळ, पर्वत और प्रृथिबीको बेधकर पहळेके समान फिर आकर रामचंन्द्रजीके तरकरामें स्थित हो गया । तब सुग्रीवने आश्चर्यचकित होकर श्रीरामचन्द्रजीसे अत्यन्त हषके साथ कहा--। ७३-७५ ॥ “हे देव ! आप सम्पूर्ण जगतूके स्वामी साक्षात्‌ परमात्मा हैं- इसमें सन्देह नहीं । मेरे पूर्वकृत पुण्य-पुञ्जके परिपाकसे ही आज आपसे मेरा संयोग हुआ है ॥ ७६ ॥ महात्मा लोग संसार-बन्धनकी निवृत्तिके लिये आपका भजन करते हैं, फिर आप मोक्षदायक प्रभुको पाकर में सांसारिक पदार्थोकी कामना केसे करू १॥ ७७॥ हे देव-देवेश्चर | ये खरी, पुत्र, धन, राज्य आदि समी आपकी मायाके कार्य हैं। अतः अब आपके अतिरिक्त और किसी पदार्थकी मुझे इच्छा नहीं है, आप मुझपर कृपा कीजिये ॥ ७८ ॥ हे सत्पते ! आप आनन्दुस्वरूप हैं । मिट्टी खोदते इए जैसे किंसीको खजाना हाथ छग जाय उसी प्रकार आज बडे भाग्यसे मुझे आपके दर्शन इए हैं ॥ ७९ ॥ आज हमारा अनादि अविद्याजन्य बन्धन कट गया । हे प्रभो ! यह संसार-बन्धन यज्ञ, दान, तप तथा इष्टापूत्त आदि कमसे भी नहीं टूटता बल्कि और दृढ़ हो जाता है । किन्तु आपके चरणकमळोंका दर्शन करते ही यह तुरन्त नष्ट १॥ = न्या धन शै ि " १५८ अध्यात्मरामायण [सर्ग क्षणार्धमपि यच्चित्तं त्वयि तिष्ठत्यचञ्चरुम्‌ । | जिसका चित्त आपके स्वरूपमें आधे क्षणके लिये भी ७. 12 निश्चल होकर संलझ हो जाता है उसका सम्पूर्ण तस्याज्ञानमनथानां मूल नश्याति तत्क्षणात्‌॥८ २॥ अनर्थाका मूलकारण अज्ञान तत्काळ नष्ट हो जाता है, तत्तिष्ठतु मनो राम त्वयि नान्यत्र में सदा ॥८३॥ | अतः हे राम ! मेरा मन सदा आपहीमें ठगा रहे, वह आपको छोड़कर ओर कहीं भी न जाय ॥ ८२-८३॥ रामरामेति यद्वाणी मधुर गायति क्षणम्‌ । | जिसकी वाणी एक क्षण भी 'राम-राम' ऐसा सुमधुर; गन रो वा मुच्यते सर्वपातकैः | करती है, वह त्रह्मघाती अथवा मद्यपी भी क्यों नहो स ब्रह्महा सुरापो वा मुच्यते सवंपातकः ॥८४॥ समस्त पापोंसे छूट जाता है॥ ८४ ॥ हे राम ! अब मु न काइश्षे विजयं राम न च दारसुखादिकस्‌। | बालीको जीतने अथवा खी आदिका सुख प्राप्त करनेकी क्तिमेव त्वयि वन्धविमोचनी॥८५ इच्छा नहीं है ! मैं तो संसार-बन्धनकों काटनेवाली भक्तिमेव सदा काह्ठे मयि बन्थविमोचर्नीम॥८५॥ | आपकी भक्ति ही चाहता हैँ ॥ ८५ ॥ हे र्ष ! सन्मायाकृतसंसारस्त्वदंशोऽहं रघूत्तम । | ष संसार आपकी मायाका विलास है और मैं भी आपहीका अंश हूँ। अत्तः अपने चरणकमळोंकी खपादभक्तिमादिइ्य त्राहि मां भवसङ्कटात्‌॥८६॥ | भक्ति देकर मुझे इस संसार-संकटसे बचाइये ॥ ८६॥ ९ ~ स्ववन्माया5घ्यृतचेतसः पहले, जब मेरा चित्त आपकी मायासे ढॅका हुआ पूव सित्रायुदासीनास्त्वन्मायाऽऽवृतचेतसः । था, मुझे अपने शत्रु-मित्र और उदासीन दिखायी देते ये आसन्मेञ्य सवत्पाददर्शनादेच राघव ॥८७॥ | किन्तु हे रघुनाथजी | अब आपके चरणकमलोंका RRR दशन पाते ही मुझे सब कुछ ब्रह्मरूप ही भासता है। सब ब्रह्मव मे भाति क मित्रं क़ च मे रिपु! । प्रभो | संसारमें मेरा कौन मित्र है और कौन शत्रु £ याव्न्मायया वद्धूस्‍तावहुणविश्ेषतता ॥८८॥ | जवतका जीव आपकी मायासे बँथा रहता है तभीतक S उसपर सत्वादि शुणोंका प्रभाव पड़ता रहता है सा यावदस्ति नानात्व॑ ताव्कयति नान्यथा । |॥ ८७८८ ॥ जवतक मायाका प्रभाव रहता है तभी- | | तक रात्रु-मित्रादि भेद-भाव रहता है । उसके दूर होते यावच्चानात्रमज्ञानाचावत्कारूकृत भयस्‌ ।।८९॥ ही समस्त भेद-भाव दूर हो जाता है । और जबतक PEP यह अज्ञानजन्य भेद्‌-भाव रहता है तमीतक अताऽविद्याङ्टुपास्त यः सोऽन्ध तमसि मञ्जति । मृत्युका भय है ॥८९॥ इसलिये जो पुरुप मायासूलमिदं सर्व पुत्रदारादिवन्धनम्‌ | | अविद्याकी उपासना करता है (अर्थात्‌ अविद्याजन्य पदार्थोकी कामना करता है) वह घोर अन्धकारमे तढुत्सारय साया त्व दासा तव रघूत्तम ॥९०॥ पड़ता है । ये पुत्र-खी आदि सम्पूर्ण बन्धन्न मायामय त्वत्पादपद्यापितिचित्तवृत्ति- ही हैं अतः हे रघुश्रेष्ठ ! अपनी दासीरूप इस मायाको| ) हमसे दूर कीजिये ॥ ९० ॥ प्रभो ! मेरी चित्तवृत्ति स्त्वन्नामसज्कीतकथासु बाणी । सदा आपके चरणकमलोमें लगी रहे, वाणी आपके नामसंकीर्तन और कथा-चार्तामें छगी रहे, हाथ आपके | भक्तोंकी सेवामें लगे रहें और मेरा शरीर (आपके पाद- सदङ्गसञ्ञ लभता मदज्ञम्‌ ॥९१॥ | स्पर्श आदिके मिससे ) सदा आपका अन्गसङ्ग करता त्वन्मूतिभक्तान्‌ स्वगुरुंच चक्षु रहे ॥ ९१ ॥ मेरे नेत्र सवदा आपकी मूर्ति, आपके भक्त और अपने शुरुका दर्शन करते रहें, कान पञ्यरवजस्रं स शृणोतु कर्णः । निरन्तर आपके अवतारोंकी जीळाओंका श्रवण करें त्वद्भक्तसेवानिरतौ करौ मे SSS Teen veins nde किष्किन्धाकाण्ड १५९ स्वजन्मकर्माणि च पादयुग्मं और मेरे पैर सदा आपके मन्दिरोंकी यात्रा करते रहें प्रजत्वजल तब मान्द्राण॥९२॥ | ॥ ९२ || हे गरुडध्वज ! मेरा शरीर आपकी चरण- अङ्गानि ते पाद्रजोविमिश्र ताथानि बिभ्रत्वहिशत्रकेतो । रजसे युक्त तीर्थोदकको धारण करे और मेरा शिर निरन्तर आपके उन चरणोंमें प्रणाम किया करे शरस्त्वदांय भवपद्मजाचे- जिनकी शिव ओर ब्रह्मा आदि देवगण भौ सदैव सेवा सुष्ट पद राम नमत्वजस्रम्‌ ॥९३॥ | करते हैं? ॥ ९३ ॥ शि अक इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे प्रथमः सर्गः | १ ॥ € द्वितीय सगे बाळीका वथ और भगवानके साथ उसका सम्भाषण | श्रीमहादेव उवाच इत्थं स्वात्मपरिष्वज्ञनिर्धताशेषकल्मपम्‌ । ': रामः सुग्रीवमालोक्य ससितं वाक्यमन्नवीत्‌॥१॥ भायां मोहकरीं तस्मिन्वितन्धन्‌ कायैसिद्धये । ससे त्वदुक्तं यत्तन्मां सत्यमेव न संशयः ॥ २॥ किन्तु लोका वदिष्यन्ति मामेवं रघुनन्दनः । कृतपान्कि कपीन्द्राय सख्यं कृत्वाऽश्निसाक्षिकम्‌ ३ इति लोकापवादो मे भविष्यति न संशयः । तस्मादाह्वय भद्रं ते गत्वा युद्धाय वालिनम्‌॥ ४॥ वाणेनकेन तं हत्वा राज्ये त्वामाभिपेचये । ..। तथेति गतवा सुग्रीवः किष्किन्धोपवनं द्रुतम्‌ ॥५॥ कृत्वा शब्द महानादं तमाहयत वालिनम्‌ । तच्छुत्वा आठृनिनदं रोपताग्रविहोचनः ॥ ६॥ निर्जगाम गृहाच्छीघं सुग्रीवो यत्र वानरः । तमापतन्तं सुग्रीवः शीधं वक्षस्यताडयत्‌ ॥ ७॥ श्रीमहादेचजी चोले-हे पार्वति ! इस प्रकार अपने संसगसे जिसके सव पाप दूर हो गये हैं उस सुग्रीवकी ओर देखते हुए श्रीरघुनाथजी कार्य सिद्ध करनेके ळिये उसपर अपनी मोह उत्पन्न करनेवाली मायाका विस्तार करते हुए सुसका कर बोले--“मित्र | तुमने मुझसे , जो कुछ कहा है वह निस्सन्देह सब ठीक है ॥१-२॥ तथापि (यदि तुम राज्यादिसे उपराम हो जाओगे तो) छोग मेरेंळिये कहेंगे कि रघुनाथजीने वानरराज सुग्रीवसे अश्निको साक्षी बनाकर मित्रता की; “किन्तु उन्होने उसका कौन-सा काम सिद्ध किया ? | ३ | , इस प्रकार छोगोमें मेरी निन्दा होगी इसमें सन्देह नहीं । अतः तुम्हारा कल्याण हो, तुम अभी जाकर वाळीको युद्धके लिये छछकारों ॥ ४ ॥ मैं उसे एक ही वाणसे मारकर तुम्हें राजपदपर अभिषिक्त कर दूँगा।” तब सुग्रीव 'वहुत अच्छा' कह तुरन्त ही किष्विन्धापुरीके उपबनमें गया और अति धोर शब्दसे गरजकर बालीको युद्भके लिये पुकारा । भाईका सिंहनाद सुनते ही वालीके नेत्र क्रोधसे लाळ हो गये और वह तत्काळ.अपने घरसे निकलकर वानरराज सुग्रीवके पास आया। उसके आते ही सुग्रीवने तुरन्त उसके वक्षःस्थलमें प्रहार किया 1॥५---७॥ - इसपर बाळीने भी क्रोधातुर होकर सुग्रीवपर अपने प्रहार किया और छुग्रीवने वाळीपर दोनों घूंसोंसे सुग्रीवमपि मुष्टिम्यां जघान कधमूच्छितः। । आक्रमण किया । इस प्रकार वे दोनों ही अति क्रोध- हा बज १५३ १६० अध्यात्मरामायण [सगे २ nen SSS SST ह्मा tea Sve NA कर क्न्कन्काान्या ९५०५८५८८०७ २ ६६३६३ ५४ ४४ ९2125०%३०३५२३७५-०६०४२ Rd क्य ४४ वाढी तमपि सुग्रीव एवं कुद्धो परस्परम्‌ ॥ ८॥ पूर्वक एक-दूसरेसे छड़ने ळी | उन दोनोका रूप ऐसा हु समान था कि श्रीरामचन्द्रजी उन्हें देखकर आश्चर्य- अयुद्धयेतामेकरूपी दृष्टा रामोडतिविस्मितः। | चकित हो गये ( और उनमंसे कान वाळी हैं तथा कौन सुग्रीव ? यह न पहचान सके ) | अतः इस आशंकासे न सुमोच तदा वाणं सुग्रीववधशङ्कया ॥ ९ ॥ | कि कहीं सुग्रीव न मारा जाय, बाण नहीं छोड़ा ॥८-९|| ततो दुद्राव सुग्रीवो वमन्‌ रक्त भयाकुलः । | अन्तमें सुग्रीव भयातुर होकर रक्त वमन करता £ दौड़ा और वाली अपने घर चला गया । तव सुग्रीवो वाली स्वभवनं यातः सुग्रीवो राममब्रवीत्‌ ॥१०॥ , श्रीरामचन्द्रजीसे कहा--॥ १०॥ “हें राम ! वय + _ ~ इस भ्रातारूपी शात्रसे मझ मरवाना चाहत हं। हे किं मां घातयसे राम शत्रुणा आत्रूपिणा । आप इस भ्रातारूपा बुत उच्च ६1 , प्रभो ! यदि आपका इच्छा मुझे मरबानेका हाँ यदि मद्धनने वाञ्छा त्वमेव जाहि मां षेभा॥११॥ । हे तो आप खयं ही मार डाठिये ॥ ११॥ है | सत्यवादी शरणागतवत्सळ रघुनाथजी ! मुझे इस प्रकार eo प्र्‌ ® ~ 1] रघूत्तम \ व | “२ शि “र जि रे एव य प्रत्यव हरवा उसवादव रवृ | विश्वास दिखाकर अव आप मेरी उपेक्षा क्यों कर उपेक्षसे किमर्थं मां शरणागतवत्सल ॥१२॥ र हैँ?” | १२॥ थुत्वा सुग्रीयवचनं रामः साशुविलोचन; | । उम्नीवके ये वचन सुनकंर रामचन्द्रजीन उसे हदयरे वि डू । ढगा ल्या ओर नेत्रोंम जळ भरकर कहा--“भैया आलिड्ग्य मास्म भपषीस्त्व रष्टा वामेकरूपणा। १३) डरो मत, तुम दानको एक रूप देखकर मेन इर 2 भयसे कि कही मित्रका बंध न हो जाय, वाण नहं मित्रघाततवमाशङक्य युक्तवान्सायक नाह | | छोड़ा । अत्र इस भ्रमको दर करनेके ल्य में तुम्हा; इदानीमेव ते चिहं करिष्ये अमशान्तये ॥१४॥ | शरोरमे कोई चिह कर दूंगा ॥ १३-१४ ॥ एक वा तुम फिर जाकर अपने शत्रको पुकारो । अबकी बाः गत्वाऽऽह्णय पुनः शत्रु हत द्रक्ष्या से पािनम्‌ । | तुम चाळीको अवश्य मरा हुआ देखोगे । भैया ! में राग RR ~ तुम्हारी शपथ करके कहता है कि इस बार में अवर मोह तवां शपे आतहनिष्यामि रिपु क्षणात्‌ ।१५। ९ रामाऱ्ह त्या शप तह खि क्षणात! १५ एक क्षणमें ही तुम्हारे शत्रको मार डाटेंगा* ॥ १% श्त्याब्धास्य स सुग्रीव रामो लक्ष्मणमत्रवीत्‌ | | ग्रीवको इस प्रकार दोंदस बंधाकर श्रीरामचन्द्र सुग्रीवस्य गले पुष्पमालामामुच्य घुण्िताम्‌ ॥१६॥ | ने लक्ष्मणजीसे कहा---/लक्ष्मण ! सुग्रीवे गलेमें एव _ 28 फूले हुए पुष्पोंकी माला डाळ दो ॥ १६ ॥ ओर हे ग्रपषयस्व महाभाग सुग्रांव वालन प्रात । महाभाग ! इसे वालीसे ळइनेके लिये भेज दो |” तः ठक्ष्मणस्तु तदा वद्ध्वा गच्छ गच्छेति सादरम!१७| उ्वमणजौने शुगर गहेमें पुप्पमाठा बावकर उसर है विद आदरपूवेक 'भाई जाओ, जाओ ऐसा कहक प्रेपयामास सुग्रीव सोऽपि गरवा तथाइकरोत्‌। | भेज दिया । सुम्रीबने भी वहाँ पहुँचकर पहटेक पुनरप्यद्ुतं शब्दं कृत्वा वालिनमाहयत्‌ ॥१८॥ | मोति ही फिर वडा विचित्र शब्द करते हुए बालक पुकारा ॥ १७-१८ || तच्छत्वा विस्मितो वाली क्रोधेन महता वृत! सुग्रीचका शब्द सुनकर वाळीको बड़ा विस्मय और साथ बढूध्या पारकर सम्यग्गमचायोपचक्रम ॥१९॥ | ही अत्यन्त क्रोध हुआ और वह अपनी कमर कसकर _ गच्छन्तं वालिन तारा गृहीत्वा निपिषेध तस्‌ | चढनेके लिये तैयार हो गया ॥ १९॥ जाते समय संग २] ` _ 'किष्किस्धाकाण् १६१ न गन्तव्यं त्वयेदानी शङ्का मेऽतीव जायते १९०॥ खी ताराने उसका हाथ पकड़कर रोका और इदानीमेव रे कहा---दिव | इस समय आप न जाइये, मेरे हृदयमें इदानीमेव ते स्नः पुनरायाति सत्वरः । ` । बडी शंका हो रही है ॥२०॥ यह अमी-अमी | आपसे मार खाकर भागा था, तो भी तुरन्त ही छोट आया ! इससे माम होता है कि अवश्य ही इसे कोई बल्वान्‌ सहायक मिल गया है” ॥ २१॥ चांठीने कहा--“हे सुन्दर भ्रकुटिवाली ! तुम इस , बिपयमें कोई शंका न करो । हे प्रिये! मेरा हाथ छोड़कर तुम घर लोट जाओ, में भी अभी जाकर उस , शन्र॒कों मारकर लौट आता हूँ। उस ( अमागे ) को भला कोन सहायक मिलेगा ! और यदि कोई होगा भी; _ RS ५ तो मैं एक क्षणमें ही दोनोंको मारकर आ जाउँगा । सहायो यदि सुग्रीवस्ततो हत्वोभय क्षणात्‌॥२३॥ | ह हुन्द्रे ! तुम किसी प्रकारकी चिन्ता न करो । RPO (मैं इस समय रुक नहीं सकता) शत्रुको बाहरसे युद्धके आयास्य मा शुचः शूर! कथं तिष्ठे र्‌ लिये ललकारता हुआ जानकर कोई शूरबीर अपने घरमें कैसे उदर सकता दै. १ अतः अब मैं उसे मारकर ही लेट्टग” | २२-२४ ॥ | तारोबाच तारा वोळी-हे राजेन्द्र | आप मुझसे कुछ और भी ब्न्यच्छणु न वृत्तान्त सुन ठीजिये । उसे सुनकर जो उचित. समझे त्पच राजेन्द्र भधत्वा क्लि मत्तोऽन्यच्छू न ला इर यथोचित । | दर । मुझसे आपके पुत्र अंगदने गाको सगव आह मामङ्कदः पुत्रो 'सृगयायां श्रुतं वच! ॥२५॥ | ( वनमे ) सुनी हुई यह बात कही थी॥ २५॥ कि अयोध्याधिपतिः श्रीमान्‌ रामो दाशरथिः किङ | अयोष्याधिपति दशरयनन्दन भगवान रामचन्द्रजी सहायो बलवांस्तस्य कथिन्नूनं समागतः ॥२ १॥ 'वाही तामाह हे सुश्च ङ्का ते व्येतु तहता । - प्रिये करं परित्यज्य गच्छ गच्छामि त॑ रिपुम्‌॥२२॥ हरवा शी समायासे सहायस्तस्य को भवेत्‌ । शञात्वाऽप्याह्वयमानं हि हत्वाऽऽयास्यामि सुन्दरि अपने भाई लक्षमण और मार्या सीताके सहित उक्षमगेन सह आजा सीतया भार्यया सह ॥२६॥ | दारणो आये थे । वहाँ उनकी प्रिया सीतांको आगतो दण्डकारण्य तत्र सीता हृता किळ । | रावण हर छे गया। अब वे अपने भाईके सहित जानकी न 9 'जीको ढँढ़ते हुए ऋष्यमूक-पर्वतपर आकर सुग्री आजा ० ल , रावणेन सह भ्राता मागमाणोऽथ जानकी ॥२७॥ | = 5 बो. रीन उनसे अग्निको साक्षी कर मिलता आगतो ऋष्यमूकाद़ि सुग्रीवेण समागतः ). | जोड़ी है ॥ २६-२८ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने उन > : वाली- : सख्यं चानठसाविकप ॥२८॥ | सहित छुमीवसे यह प्रतिज्ञा को है कि दं वा शिकार पन ग्र ह * दिं प्‌ को मारकर तुम्हें राजा बना दूंगा ॥ २९॥ इसी / प्रतिज्ञां कृतवान्‌ राम! सुग्रीवाय सरक्षण!) | निश्चयक्रो ठेकर वे दोनों भी ( उसके साथ ) आये चारिनं समरे इरया राजानं त्यां करोम्यहस्‌ ॥२९॥ | हैं; मेरी वह वात सच मानिये, नहीँ तो अमी-अमी ~ ने तिचि आपसे मार खाकर भागा हुआं वह कैसे लौट इति निचि तो याता निश्चित शरश महचः) | आता? ३०॥ इसलिये अब आप सर्वथा घुग्रीबसे ` इदानीमेव ते भग्नः कथं पुनरुपागतः ॥२०॥ | वैरभाव छोड़कर उसे छे आहे और उसे तुर्त वका ुरग्रीवमानय |. | उत्राजपद्पर अभिषिक्त कर श्रीरामकी. शरणे यौवराज्येडमिपिश्वाशु रामं त्वं शरणं वज ॥रे १॥ | तथा इस. राज्य और छुछकी रक्षा कौजिये । ऐसा कह २१ १६२ पु अध्यात्मरामायण [सगे २... Rd TTT TIT पाहि मामङ्कदं राज्यं इलं च हरिधुञ्गव । | कर तारा वालीके चंरणोम गिर पडी । उस समय उसके a पो! प्रणिपत्य तम्‌ ।१२। मुखपर आँसुओंकी धाराए वह रही थीं । ३२ ॥ वह इत्युक्त्वाश्वुसुखी तारा पादय? प्राणपत्य तथ्‌ 1९ ° | अयसे अधीर होकर अपने हार्थोसे उसके दोनों चरण हस्तास्यां चरणौ घतरा रुरोद भयविह्वला । | पकड़कर फूट-फुटकर रोने ठगी। .' "ह च मपूर्वक छिंगन तामालिङ्गय तदा वाली सखेहमिदमम्रवीत्‌॥३३॥। | तव वाढीने उसका प्रेमपूवेक आगन कर हम en प्रकार कहा || ३३ ॥ “प्रिये! तुम अपने खी-खः [म सलीखभावाद्विमेषि त्व प्रिये नासि भयं मम । | दई डरती हो, मुझे तो भयका कोई भी कारणो रामो यदि समायातो लक्ष्मणेन समं अथ्ु) ॥३४॥ | दिखायी नहीं देता | यदि ल्दमणके सहित प्रशु राम _ . | यहाँ आये हैं तो इसमें कोई सन्देह नहीं, कि उनसे तदा रामेण मे खेहो भविष्यति न संशयः। रा प्रेम हो जायगा । हे अनवे ! राम तो साक्षात्‌ रामो नारायणः साक्षादवर्तार्णा$खिलप्रभुः ॥ २५॥ | सर्वेश्वर श्रीनारायण हैं, उन्होंने एथिवीका भार उतारने- पय अतं पूर्व मयाऽन के लिये ही अवतार लिया है--यह वात मैंने पहरेमे अत | है । थे 58 शुभारहरगाथा ४ पूर्व मयानचे ही सुन रखी है । वें तो प्रकृति आदिसे परे सबके सपक्षः परपक्षो वा नास्ति तस्य परात्मनः।।३६।। | आत्मारूप हैं उनका कोई अपना या पराया पक्ष नहीं Se । हे ॥ ३४-३६ ॥ हे साध्वि ! में उनके चरणकमलोंमं सुः (2 है वी ण स्य च्य -देवेश्वर ज पं तचरणास्दुजय । प्रणाम कर उन्हें घर ठे आऊंगा। वे देव-देव मञतोऽनुमजत्येष भक्तिगम्यः सुरेश्वरः ॥३७॥ | भक्तिसे प्राप्त होते हैं और जो कोई उनका भजन ५ ~ ee करता है. उसीके अनुकूल हो जाते हैं ॥ २७॥ और स स्प क्षणात्‌ ~ ~ हे क क. Fs क यदि खर्य समायाति च मावा हन त॑ क्षणात्‌ । यदि अकेला सुग्रीव ही आया है तो उसे में एक क्षणम, यदुक्त योवराज्याय सुग्रीवस्याभिपेचनम्‌ ॥३८। | मार डागा । इसके सिवा, तुमने जो उसे युवराज- कथमाहयमानोऊ युद्धाय रिषुणा प्रियें। | पदप अभिषिक्त करनेको वात कही, सो हे झुमल्कषणे 0 ८७. , हैं प्रिये ! मैं सम्पूर्ण लोकोंमें माननीय शूरवीर हुँ । भला श्रो5ह सवलोकानां सस्मतः थुभलक्षणे ॥३९। | इनुद्वारा युद्धके लिये पुकारे जानेपर वाळी उससे र कैसे > Ce « [ < त्यन्त सकत 4 मीतभीतमिदं वाक्यं कथं वाली वदेखिये | | ऐसा अन्त भयपूण वाक्य केसे कह सकता है! 2. सिर अतः हे सुन्दरि ! तुम निश्चिन्त होकर घर तस्माच्छोकं परित्यज्य तिष्ठ सुन्दरि वेश्मनि।४० | बै” ॥ ३८-४० ॥ एवमाश्चास्य तारां तां शोचन्तीमश्ररोचनाम्‌। इस प्रकार शोकसे आँसू बहाती हुई ताराको धीरज गतो वाली सञ्चुह्ुक्तः सुग्रीवस्य वघाय सः॥|४१॥ | त्रैधा, वाली सुग्रीवको मारनेपर उतारू होकर चला इटा वाखिनमायानतं सुग्रीयो भीमविक्रमः । | वाखीको i देख प्रचण्ड पराक्रमी सुग्रीव गलेम पुष्पमाला पहने इए मत्त गजराजके समान उछलने उत्पपात गले बद्भपृष्पमालः मतङ्ग क कने र ५ डड हिनं सो गज ॥४२॥ | लगा || ४२ ॥ फिर सुम्रीवने अपने पूर्सोसे चालीपर मुष्टिम्यां ताडयामास वालिनं सोऽपि तं तथा । | और वालीने सुम्रीवपर प्रहार किया । इसी प्रकार अहल्वाडी च सुग्रीबं सुग्रीवो वालिनं तथा ॥४३॥ | परत्र वारम्बार वाली सुग्रीवपर और सुग्रीव चालीपर ~ -_ सुष्टिकाघात करने लगे | ४३ ॥ युद्ध करते समय रामं विरोकयन्नेव . सुग्रीवो युयुधे युधि । झुग्रीवकी दृष्टि रामकी ओर ही ठगी हुई थी | त्येवं ] क. A त्यच बुदूध्यसाना त इष्टा रामः प्रतापवान]४४॥ | परमम्रतापी श्रीरधुनाथजीने उन्‌ दोनोंको इस 7” बाणमादाय तूणीरादैन््रे धनुषि सन्दधे । : | “कट, अपे | पूण पजुषि सन्दधे । लड़ते देख अपने तरकशसे एक वाण ०८ हरिर आने ` आकृष्य कणपयन्तमदृश्या दृक्षखण्डग! ।।४५॥ | रन्द्र धनुषपर चढ़ाया और एक बृक्षकी ति पं रिः सगं २.] निरीक्ष्य वारिनं सम्यग्लक्ष्यं तद्धृदय हरिः । उंत्ससर्जीशनिसमं महावेगं महाबलः ॥४६॥ बिभेद स शरो वक्षो वालिनः कम्पयन्महीस्‌ । उतषात महाशब्द मुम्बन्स निपपात ह ॥४७॥ तदा मुहूर्त निःसंज्ञो भूत्या चेतनमाप सः । ततो वाली दद्शाग्ने रामं राजीवलोचनम्‌ । घलुरारम्व्य वामेन हस्तेनान्येन सायकम्‌ ॥४८॥ विश्रार्ण चीरवसनं जटामुकुटधारिणम्‌ । विश्ञालवक्षसं भ्राजद्वनमालाविभूपितम्‌ ॥४९॥ पीनचार्वायतञ्चुजं नवदूर्वादलच्छाविस्‌ । ANNE सुग्रावलकष्मणास्या च पाश्वयाः पारसावतस्‌।५०॥ विरोक्य शनकैः प्राह वाली रामं विगर्हयन्‌ । कि मयाऽपकृतं राम तव येन हतोऽस्म्यहम्‌ ॥५१॥ राजधर्ममविज्ञाय गर्हित कर्म ते कृतम्‌ । वक्षखण्डे तिरोधूत्वा त्यजता मयि सायकम्‌ ॥५२॥ यशः किं लप्स्यसे राम चोरपत्कृतसङ्गरः | यदि क्षत्रियदायादो मनोवेशसमुद्धवः ॥५३॥ युद्धं कृत्वा समक्षं मे प्राप्स्यसे त्फलं तदा । सुग्रीवेण कृतं किं ते मया वा न कृतं किट्टं ॥५४॥ रावणेन हृता भार्या तव राम महावने । सुग्रीवं शरणं यातसतदर्थमिति छुक्रम ॥५५॥ बत राम न जानीपे मद्धरं लोकविश्रुतम्‌ ।.. रावणं संकुल बद्ष्वा ससीतं छङ्कया सह ।५६॥ आनयामि मुद्दचांड्रोच्रदि चेच्छामि राघव । किष्किन्धाकाण्ड : TAA ATT | १६३: छिपे .धनुषको ` कर्णपर्यन्त तानकर महाबळवान्‌' श्रीहरिने बाळीको देख उसके इदयको ठीक लक्ष्य करके वह वज़के समान कठोर और महावेगशाळी बाण छोड़ दिया ॥ ४४-४६ || उस वाणने वालीके वक्षःस्थलको वेध डाळा | वाणके लगते ही वाळी बड़ा घोर शब्द करता हुआ उछलकर प्रथिवीपर गिर पड़ा | उसके गिरते समय पृथिवी डगमगा उठी || ४७ ॥ उस समय एक सुहु्तके लिये वह संज्ञाहून्य हो गया; पीछे जब उसे चेत हुआ तो उसने अपने सामने कमलनयन श्री- रघुनाथजीको खड़े देखा । वे बाय हाथसे धन्ुषका सहारा लेकर दाहिनेमें वाण लिये हुए थे तथा शारीरमें चीरवख्न और शिरपर जटाओंका मुकुट धारण किये थे। उनका विशाल वक्षःस्थल मनोहर वनमाळासे विभूषित था ॥ ४८-४९ ॥ भुजारँ स्थूल, सुन्दर-और छम्बी- छम्बी थीं, शरीरकी कान्ति नवीन दूर्वादळके समान इयामवर्ण थी तथा उनके दोनों ओर सुग्रीव और लक्ष्मण उनकी सेवामें खडे थे || ५० || रामचन्द्रजीको देखकर वाढीने कुछ तिरस्कार करते इुएं. 'मन्दखरमें. कहा--“हे राम ! ' मैंने आपका क्या बिगाड़ा था. जो आपने मुझे मारा ॥ ५१ ॥ राजनीतिको न जाननेके कारण ही आपने ऐसा निन्दनीय कार्य किया है । इस प्रकार इक्षकी आङमें ` | छिपकर मुझपर वाण छोड़ते हुए चोरके समान युद्ध करनेसे आपको क्या यश मिलेगा ? यदि आप क्षत्रियकुमार हैं और आपका जन्म मचुजीके पवित्र बंशमें हुआ है, तो मेरे सामने आकर युद्ध किया होता, तब आपको उसका ( यश अथवा खगरूप ) कोई फळ भी मिळता | हे राम ! घुग्रीबने आपके साथ ऐसा कौन-सा ‘उपकार किया थां और मैंने कया नहीं किया १ ॥ ५२-५४ || मैंने तो यही सुना है कि दण्डकारण्यमें रावण आपकी मार्याको हर ले गया था; उसे पानेके लिये ही. आपने सुग्रीवकी शरण ली है ॥ ५५॥ किन्तु खेद है कि आपने मेरा. विश्व- विख्यात बल नहीं सुना । हे. राधंव ! मैं यदि चाई | तो आधे मुदूर्तमें ही रावणको. कुळसहित बाँधकर शशश अध्यात्मरामायण [ समै ६ RD ल्‍ ओ ज इअककडंडंड्)फड:ः्नि स्‍ल्‍यइइनइिइ सी फिट सिट सा सकल कर ose I papery र्ण कटी णा, [० न्‍नक कका ४४४४४४शशशीशशीशशश/४" धर्मिष्ठ इति लोकेऽस्मिन्‌ कथ्यसे रघुनन्दन ॥५७॥ | सीताजी और टका सहित टे आऊँ। और हे रघुनन्दन | -। आप तो संसारमें बड़े धर्मात्मा कहे जातेहैं॥| ५६-५७ | वानरं व्याधवद्धत्वा धमे के लप्स्यसे वद । ब्रताऱ्ये, एक वानरकों व्याधके समान मारकर आपके क्या पण्य मिलेगा १ बानरका मांस वा अमन्य हैं फिर मझे मारकर आप क्या करेंगे £” ॥ ५८ ॥ इत्येचं वह भाषन्तं वालिनं राघवोऽब्रवीत्‌ || पार्लक इस प्रकार बहुत कुळ कहनपर रघुनाथः. है कहा- मैं धर्मका रक्षा करनेके छिव ही छोकम भरनुप धारण कर विचरता हैं ॥ ००॥ और अधम करने- अधर्मकारिणं हत्वा सद्धर्म पालयाम्यहम्‌ । वालोंको मारकर सद्वमंका पालन करता हू । पुत्री, ट हिका खी आर पत्रवच य चारा समान दुहिता भगिनी आहुमीरय चैव तथा स्ठुपा ॥६०॥ | नि rh ने किस न सकल साथ है समा यो रमते तासामेकामपि विमूढधीः । ` रमण करता है. उसे महापापी जानना चाहिये; राजाको ' उचित हैं कि उसे अवश्य मार डाळे ॥ ६०-६१ ॥ पातकी स तु विज्ञेयः स वध्यो राजमिः सदा॥६ १॥ ; ५ दनचर ! ठ बलात्कारसे अपने छोटे भारी के तं तु आहु! कनिष्ठस्य भार्यायां रमसे वलात्‌।| | साथ रमण करता था इसीलिये मुझ धर्मइने तुझे मारा हैं॥६२॥ त. वानर ही ता हैं; तुझ इस बातका पता नहीं हे कि महापुरुष सदैव अपने आचरणंसे त्वं कपिलान जानीपे महान्तो विचरन्ति यत्‌ | | छोकोंको पवित्र करते हुए विचरा करते हैं । इसल्यि. लोकं पुनानाः सश्चारेरतस्तान्नातिभाषयेत्‌ ॥६३॥ । ३ वहहकर वाह न करना तच्छूत्वा भयसन्त्रस्ता ज्ञात्वा राम रमापातमू | ! भगवानके ये वचन सुनकर वाली उन्हें साक्षात टक्ष्मीपति श्रीनारायण जानकर भयभीत हो गया और शीघ्रतासे प्रणाम करके बोंला-॥ ६४ ॥ “हे राम ! राम रास महाभाग जाने त्वां परमेश्वरम्‌ । हे राम ! है महाभाग ! में जान गया, आप साक्षात्‌ | परमेश्वर हैं । अज्ञानवश में जो कुड कह गया हैं उमे अजानता मया किञ्चिदुक्तं तरक्षन्तुमहसि ॥६५॥ | आप क्षमा कर ॥ ६५ ॥ हे प्रभो ! आपका ददन तो साकषाचयच्छरधातेन विशेषेण तवाग्रतः । | बड़े-बड़े योगियोको भी अत्यन्त दुर्लभ हैं; वडे भाग्यकी वात है कि में आपहीके वाणसे विद्ध होकर फिर त्यजाम्यखन्महागोगिदुर्लभं तव दर्शनम्‌ ॥६६॥ | आपहीके सामने प्राण छोड रहा हूँ॥६६॥ मरते समय विवश होकर भी जिनका नाम लेनेसे यक्षाम विवशो गृहन्‌ म्रियमाणः परं पद्म्‌ | पुरुप परम-पद ग्राप्त कर लेता हैं, वहीं आप आज इस ति साधार मेम पुरः खितः अन्तिम घडोपर साक्षात्‌ मेरे सामने विराजमान हैं यात साक्षात्स एवाद्य यूम धुरः खितः ॥६७॥ | || ६७ || हे देव ! में यह जानता हैं कि आप साक्षाद देव जानामि पुरुष त्वा श्रय जाचक शुभाम्‌ । परमएुरुप नारायण हैँ ओर जानकोजी लक्ष्मी ह] ब्रह्माजीकी प्राथनासे रावणका वध करनेके लिये ही आपने अवतार ल्या है ॥ ६८॥ हे राम ! अब मैं अभक्ष्यं वानरं मांसं हत्वा मां कि कारिष्यांस।।५५॥ घर्मस्य गोपा लोकेऽस्मिश्वरामि सशरासतनः॥५९। अतो मया धर्मविदा हतोऽसि वनगोचर ॥६२॥ वाढ! गणस्य रभसाद्राम वचनमत्रवात्‌ ॥६४॥ रावणस्य वधाथाय जातं त्यां जह्मणार्थितम्‌ ॥६८॥ | (१ चतुद्वीरकपाटादीन्‌ वद्ध्वा रक्षामहे पुरीम्‌ । f से रे] किष्किन्धाकाण्ड - 9 ४1४7/00. 7.५707 ४-४५7 /-७7७-५-५-५- 5-7-9707 5-3-5-५7 ८-H ASS STS NANA SSS, अनुजानीहि मां राम यान्तं त्वत्पदश्चत्तमस्‌। | आपके सर्वश्रेष्ठ परमधामको जा रहा - हूँ, आप मुझे _ ५ आज्ञा दीजिये | मेरा बाळक अंगद मेरे ही समान मम तुस्यबले बाले अङ्गदे त्त. दयां कुरु ॥६९॥ | बल्शाली है उसपर आप दयादृष्टि रखें ॥ ६९॥ विशर्यं कुरु मे राम हृदयं पाणिना स्पृशन्‌ 1. हे राम | मेरे हृदयको अपने कर-कमीसे स्पशकर इस लु | बाणको निकाल दीजिये |” तब रामचन्द्रजीने अच्छा । तश्ञेति बाणमुदूधवत्य रामः पस्पर्श पाणिना । कह उसे सश करते हुए बह वाण निकाळ दिया । [त्यक्वा तद्वानरं देहममरेन्द्रोऽमवरक्षणात्‌॥७०॥ रूप हो गया ॥ र bone वाली रघूत्तमशराभिहतो विसृष्टो वाणसे मारा गया था और फिर उसे उनके सुखमय वि हि कर-कमलका शीतल स्पर्श भी मिला । अतः वह शीघ्र रामेण शीतलकरेण सुखाकरेण । ही अपना चानर-देह छोड़कर उस परम श्रेष्ठ पदको सद्यो विसुच्य कणिदेहमनन्यलम्यं प्राप्त हुआ जो और 'किसीके लिये बहुत ही दुलंभ है। और तो क्या, महान्‌ परमहंसोंको भी उसका मिळना ग्रास परं परमहंसगणेदुरापम्‌ ॥७१॥ | अत्यन्त कठिन है ॥ ७१॥ RD प्न इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे द्वितीयः सगः ॥ २ ॥ -प्र कुष्ट ९ तृतीय सर्ग ताराका चिलाप, श्रीरामचन्द्रजीका उसे समभाना- तथा सुग्रीचका राजपद प्राप्त करना 1 श्रीमहादेव उवाच श्रीमदादेवजी बोले--हे पार्वति! परमात्मा रामके - निहते वालिनि रणे रामेण परमात्मना । द्वारा युद्धमें वालीके मारे जानेपर समस्त वानरगण नराः सर्वे किष्किन्धां भयसे व्याकुळ होकर किष्किन्धापुरीमें दोड़े गये ॥ १॥ दुडुडुबानराः सव किष्किन्धां भयविद्दठा: ॥ १ ॥ और तारासे बोळे--“हे महाभागे ! वानरराज वाळी तारामूचुमहाभागे हतो वाली रणाजिरे। ` | युदक्षेत्रमे भरे गे | अन आप राजकुमार हक - न्त्रिः परिनो क्षा कीजिये ओर मन्त्रियोंको साबधान कर दीजि अङ्गदं परिर्षाच मन्लिणः पन्दस । १0 | २ ॥ हे भामिनि ! हमछोग चारों द्वारोंके किवाड़ आदि. छगाकर नगरकौ रक्षा करते हैं, आप अंगदको वानराणां तु राजानमङ्गदं कुरु भामिनि ॥ ३॥ | वानरोंका राजा बनाइये” ॥ ३ ॥ | 4 वालिनं शोकबिमूच्छिता बोळीको मरा हुआ सुनकर तारा शोकसे मूच्छित निहत ' का गकि हो'गयी ओर अपने शिर और छातीको बारम्बार अंताढयत्स्वपाणिभ्यां शिरो व्रक्षथ-भूरिशः ॥ ४ ॥ | हाथोंसे पीटने लगी ॥ ४ ॥ और बोली “मुझे अंगद, . | राज्य, नगर और धन.आदिसे कया काम है, मैं तो किमज्ञदेन राज्येन . नगरेण भनेन या । अमी अपने पतिदेवके साथ ही प्राण त्याग करूंगी" इदानीमेव निधन यास्यांमे पाना सह ॥५॥ ॥ ५॥. ऐसा कह वह रोती हुई -तुरन्त ही वहाँ [समे है. १६६ अध्यात्मरामायण ~ NIE ०० >>. इत्युकत्वा त्वरिता तत्र रुदतीं मुक्तमूथजा । | गयी जहाँ उसके पतिका देह पड़ा इआ था, उस ययौ ताराऽतिशोकार्ता यत्र भतृकठेवरम्‌ ॥। ६ । पातितं वालिनं दृष्टा रक्तेः पांसुभिरावृतसू | | | समय. वह अत्यन्त शोकाकुल थी. और उसके वाढ बिंखरे हुएं थे ॥ ६॥ वहाँ बाळीको रक्त ओर धूळिसे लथपथ पड़ा देख वह हा नाथ | हा नाथ !' कह- रुदती नाथनाथेति पतिता तस्य पादयोः ॥ ७॥ | कर रोती हई उसके पैरोंपर गिर पड़ी ॥ ७॥ करुणं विलपन्ती सा ददर्श रघुनन्दनम्‌ | राम मां जहि बाणेन थेन वाली हतस्त्वया | ८ ॥ गच्छामि पतिसालोक्यं पतिमीमभिकाङ्कते । स्वर्गे पि न सुखं तस्य मां विना रघुनन्दन ॥ ९ ॥ पत्नीवियोगर्ज दुःखमञुभूतं त्वयाऽनघ । वालिने मां प्रयच्छाशु पल्लीदानफलं भवेत्‌ ॥१०॥ सुग्रीव तवं सुखं राज्यं दापितं वालिघातिना । रामेण रुमया साधे भव सापल्रवाजितम्‌ ॥११॥ इत्येवं बिळपन्तीं तां तारां रामो महामनाः । सान्त्वयामास दयया तखज्ञानोपदेशतः॥१२॥ कि मीरु शोचसि व्यर्थ शोकस्याविषयं पतिम्‌ । पृतिस्तपायं देहो वा जीयो वा षद तत्त्वत! ॥१३॥ पञ्चात्मको जडो देहस्त्वङ्मांसरुधिराखिमान्‌। कालकमशुणोत्पन्नः सो5प्यास्तेञ्यापि ते पुरः ।१४। मन्यसे जीवमात्मानं जीवस्त्हि निरामयः । ` न जायते.न भ्रियते न तिष्ठति न गच्छति ॥१५॥ न स्री पुमान्वा षण्डो वा जीव! सर्वगतोऽऽ्ययः एक . एवाद्वितीयोऽयमाकाञवदलेपकः -. नित्यो ज्ञानमयः शुद्धः स कथ शोकमहति ॥१६॥ इस प्रकार करुणक्रेन्दंन करते हुए उसकी (झट | बाळी) “राम | आपने जिस वाणसे वाळीको मारा है उसीसे मुझे मी मार डाल्यि ॥ ८ ॥ जिससे में तुरन्त हो पति-छोकको चली जाऊ; वे मेरी बाट देख रहे होंगे क्योंकि हे रघुनन्दन ! मेरे बिना उन्हें स्वगर्मे भी चेन नहीं होगा ॥ ९ ॥ हे अनध ! पत्नीके वियोगका -दुःख आपने अनुभव किया ही है (अतः आपको उसका तीत्रता- का अनुमान हो ही सकता है । ) इसलिये अब आप मुझे चाळीके पास पहुँचा दीजिये | इससे आपको खी-दानका फल मिलेगा || १० ॥ सुग्रीव ! तुम्हें वाळीको मारनेवाळे रामने राज्य दिला ही दिया है । अव उस निष्कण्टक राज्यको हुम रुमाके साथ सुखपूर्वक भोगो” ॥ ११॥ इस प्रकार विलाप करती हुई उस ताराको महामना रामने दयापूर्वक तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर शान्त किया ॥ १२ ॥ वे वोले--“'अयि भीरु ! तेरा पति शोक करनेयोग्य नहीं है, त. उसके लिये व्यर्थ क्यों शोक करती है? तू विचारकर ठीक-ठीक वता वाखवर्मे तेरा पंतिं यह देह है या इसमें रहनेवाला जीव ? ( यदि यह देह ही तेरा पति है तो) यह तो जड, पश्च- भूतमय एवं त्वचा, मांस, रुधिर और अखियोंसे बना हुआ है तथा काळ, कर्म ओर गुणोंसे उत्पन्न हुआ है; और वह तो अब भी तेरे सामने पड़ा है। (फिर उसके लिये शोक क्‍यों करती है १) ॥ १३-१४ ॥ और यदि तू जीवको अपना पति मानती है तो मी तुझे शोक न करना चाहिये क्योकि वह निर्विकार है । वह न उत्पन्न होता है, न मरता है, न स्थिर रहता है और न आता-जाता है ॥ १५ ॥ जीव 5, i और अव्यय है, वह खरी, पुरुप अथवा नपुंसक कुछ रे `| नहीं है बल्कि एक, अद्वितीय, आकाशके समान नि प्‌, नित्य, ज्ञानमय और शुद्ध है फिर बह कैसे'हो सकता है ?” ॥ १६ ॥ Ere हिट! वि ° अ { अहङ्कारादसम्वन्चा याषदुहान्द्रय\ सर्ग २] च्य्य्प्य्य्य्स्य्य्प्प्प्प्प्प्स्य्य्य्स््स्स्स्य्स्च्ल्ल्ट्ट्ट्स्ट््ट्््््ि्ल्िििि TR ४४८१-०४ ९३९३५/७७७४७-३९» ७.४६.» ६-० ७० १.०५. NII तारोवाच. देहोऽचित्काएवद्राम जीवो नित्यथिदात्मकः । सुखदु'खादिसम्बन्धः कस्य स्याद्राम मे वद ।१७॥ श्रीराम उवाच haa सह । सारस्तावदेच स्यादात्मनस्त्वविवेकिनः ॥१८॥ याऽऽरोपितसंसारो न स्वयं विनिवतते । विपयारध्यायभानरय स्म मिथ्याऽञामो यथा १९ अनाचविद्यासंम्बन्धात्तरकार्याहडडतेसथा | संसारोऽपार्थकोऽपि खाद्रागदेपांदिसड्ुलः ॥२०॥ सन एव हि संसारो बन्थश्वेव मनः शुभे । आत्मा मनः समानत्वमेत्य तद्गतबन्धभाक्‌ ॥२१॥ यथा विशुद्धः स्फटिकोऽरक्तकादिसमीपगः । तत्तदर्णयुगामाति वस्तुतो नाखि रञ्जनम्‌ ॥२२॥ बुड्ीन्द्रियादिसामीप्यादात्मनः संसृतिर्बठात्‌ । आत्मा स्वरिङ्ग तु मनः परिगृह्य तदुङ्भवान्‌ ॥२३॥ कामात्‌ जुषन गुणेबंद्दः संसारे वर्ततेज्वशः । किष्किन्धाकाण्ड १६७ क ७७/७० ७०.७७. ० १० दक र तारा बोली-हे राम ! देह तो काष्टके समान जड है और जीव नित्य तथा चैतन्यखरूप हैं, ( उसका नाश हो नहीं सकता) फिर सुख-टुःखादिका सम्बन्ध किससे होता है, यह मुझे 'वतळाइये ॥ १७॥ श्रीरामचन्द्रजी योले-जवतक देह और इन्द्रियोंक्रे साथ भैं? भेरापन? आदिका सम्बन्ध रहता है तव- तक आत्मा और अनात्माके विवेकसे रहित जीचका सुख-हुःखादिके भोगरूप संसारसे सम्वन्ध रहता है ॥ १८ ॥ यह संसार आत्मामें मिथ्या ही आरोपित हुआ है तथापि ज्ञानोदयके बिना यह अपने-आप निदत्त नहों होता; जिस प्रकार विषयोंका निरन्तर ध्यान करने- वाले पुरुषको खममें अनेक पदार्थ दीखते हैं, परन्तु वे होते मिथ्या ही हैं ॥१९॥ अनादि अविद्या और उसके कार्य अहंक्रारके सम्वन्धसे सित हुआ यह संसार निरर्थक (अत्यन्त मिथ्या ) होते इए भी राग-द्वेप आदिसे पूर्ण है ॥'२०॥ हे शुभे ! मन ही संसार है और मन ही बन्धन है । उस अनात्म वस्तु मनके साथ ( अन्योन्याध्याससे) एक हो जानेसे ही यह आत्मा तद्गत सुख-दुः्खादिके बन्धनमें पड़ता है ॥ २१॥ जैसे स्फटिकमणि खभावसे शु्कवर्ण होने पर भी लाख आदिके समीप होनेपर उसीके रंगकी माळम होने लगती है, परन्तु बास्तबमें उसमें वह रंग नहीं होता ॥ २२ ॥ वैसे ही बुद्धि और इन्द्रिय आदिकी सन्निधिसे आत्माको बळात्कारसे संसारकी प्रतीति होती है । आत्मा, अपने लिंग ( पहचाननेके साधन ) मनको खीकार कर उससे प्राप्तं होनेवाळे विपयोंका सेवन करता हुआ उसके राग-द्वेषादि गुणोंमें बँधकर विवश हो संसार-चक्रमें फंसा रहता है । पहले वह राग- देषादि मनके गुणोंकी रचना. करता है और फिर आदौ मनोशुणात्‌ सृठ्ठा ततः कर्माण्यनेकथा।२४। ( उनके योगसे) नाना प्रकारके कर्म करता है । बे शुक्कराहितकृष्णांन गतयस्तत्समानतः शुक्ल ( जप, ध्यानादि ) छोहित ( हिंसामय यज्ञ- यागादि ) और कृष्ण (मद्यपानादि पापकर्म ) तीन प्रकारके होते हैं । उन कर्मोके अनुसार ही उसकी एवं कर्मवशाज्जीवो भ्रमत्याभूतसम्प्ळबसू ॥२५॥ | , तया होती हैं। इस प्रकार यह जीव कर्मोके बशीभूत सर्वोपसंहतो जीवो वासनाभिः स्वकर्मो्े! । अनाद्यविद्यावशगस्तिष्ठत्यमिनिवेशतः होकर प्र्य-पयन्त आवागमनके चक्रम पड़ा रहता | हे ॥२३-२०॥ प्रळयकालमें सत्र भूतोंका ल्य हो जानेपर ॥२६॥ |.भी- अपने कर्ी-भोक्तापनके अभिनिवेहासे यह . अंपनी १६८ सृष्टिकाले पुनः पूर्ववासनामानसेः सह। जायते पुनरप्येवं घटीयन्त्रभिवावशः | यदा पुण्यविशेषेण लभते सङ्गतिं सताम्‌ । मङ्कक्तानां सुशान्तानां तदा मद्विषया मतिः ॥२८॥| मत्कथाश्रवणे श्रद्धा दुलेभा जायते ततः। ततः स्वरूपविज्ञानसनायासेन जायते ॥२९॥ तदाचांयग्रसादेन वाक्यार्थज्ञानतः क्षणात्‌ । देहेन्टियमनःआणाहुतिम्यः एथकिस्ितम्‌॥३०॥ खात्माजुभवतः सस्यमानन्दात्मानमद्वयम्‌ । ' ज्ञात्वा सदयो भवेन्सुक्त! सत्यमेव मयोदितम्‌॥३१॥ एवं मयोदितं सम्यगालोचयति योऽनिशञम्‌ । अध्यात्मरामायण [सर्ग ३ वासनाओं और कर्मोके साथ अनादि अविद्यासे आच्छादित हुआ रहता है॥२६॥ जब नवीन सृष्टि आरम्म होती है तो यह विवश होकर अपनी पूर्व वासनाओंसे युक्त मनके सहित घटीयन्त्रके समान फिर उत्पन्न हो जाता है॥ २७॥ जिस समय किसी निशेष पुण्यपरिपाकसे इसे मेरे भक्त और शान्तचित्त ला की संगति मिलती है उस समय इसका चित्त मेरी ओर छगता हे ॥ २८॥ उससे मेरी कथा सुननेमें इसंकी श्रद्धा होती है, जो बहुत ही दुर्लभ है। मेरी कथा सुननेसे इसको अनायास ही मेरे खरूपका ज्ञान हो जाता है ॥२९॥ उस समय गुरु-कृपाद्वारा तत्तमसि आदि महावाक्योंके अर्थ-ज्ञानसे तथा खयं अपने अनुभवसे भी यह अपने सच्चिदानन्दस्य अद्वितीय आत्माको देह, इन्द्रियः मन, प्राण और अहंकारादिसे पृथक्र जानकर एक क्षणमें ही तुरन्त सुक्त हो जाता हे । हे तारे ! मैंने यह वास्तविक सत्य तुझसे कह दिया ॥ २०-३१ ॥ मेरे कहे इए इस तस संसारदुःखानि न स्पृशन्ति कदाचन ॥३२॥ | परमार्थ-ज्ञानका जो अहर्निश मनन करता है उसे सांसारिक | दुःख कमी स्पर नहीं करते ॥ ३२ ॥ तू भी शुद्र त्वमप्येतन्सया ग्रोक्तमालोचय विद्युद्धधी! । न स्पृश्यसे दुःखजाले! कर्मवन्धाद्विमोक्ष्यसे॥३३॥ पूर्वजन्मनि ते सुश्र कृता मद्भक्तिरुतमा । अतस्तव विमोक्षाय रूपं मे दर्दित शुभे ॥३४॥ ध्यात्वा मद्रपसनिशमालोचय मयोदितम्‌ । ्रवाइपतितं कारय कुर्वन्त्यपि न लिप्यसे ॥३५) श्रीरामेणोदितं सर्व श्रृत्वा ताराऽतिविसिता । देहामिमानजं शोकं त्यक्त्वा नत्वा रघूत्तमम॥३६) आत्मानुभवसन्‍्तुष्टा जीवन्मुक्ता बभूव ह | कषणसङ्गममात्रेण रामेण परमात्मना ॥३७॥ ` अनादिन्धं निर्धूय बुक्ता साऽपि विकंरमषा । . -सुग्रीवोऽपि च तच्छ्रत्वा रामवकत्रात्समीरितम्‌ ।३८। | चित्त होकर मेरे इस उपदेशका मनन कर । ऐसा करनेसे छेरा-कछाप तुझे छू भी न सकेंगे और तू कमे-न्धनसे मुक्त हो जायगी ॥ ३३ ॥ हे सुन्न ! अपने पूवजन्ममें तने मेरी उत्कृष्ट भक्ति की थी, इसी ल्यि हे सुन्दरि ! तुझे सुक्त करनेके लिये मैंने अपना दशन दिया है ॥ २४॥ त्‌ रात-दिन मेरे रूपका ध्यान करती हुई मेरे उपदेराक्रा मनन कर । ऐसा करनेसे प्रारब्ध-क्रमसे प्राप्त इए कर्मोको करती हुई भी त उनसे लिप्त न होगी | ३५॥ भगवान्‌ रामका यह अद्भुत उपदेश सुनकर तारा- को बड़ा ही विस्मय हुआ और उसने देहाभिमान- जनित शोक छोड़कर शरीरघुनाथजीको प्रणाम किया, तथा आत्माचुभवसे सन्तुष्ट होकर बह तत्काल जीवन्मुक्त हो गयी । परमात्मा रामके क्षणमात्रके सत्संगसे वह अनादि अविदयाके बन्धनको काटकर निष्पाप और मुक्त हो गयी । भगवानूके श्रीमुखका वक्तव्य सुनकर सुप्रीवका भी समस्त अज्ञान 'जाता रहा और चह शान्त- सर्ग ३ ] प्य्न्स्य्य्स््य्य्प्प््य्म्च्च्च््य्स्य्स्स््््स््ट््स्््ट्ल्ल्ल्ल्ट्ट्ट्टट्ड--ज्ज---5--न्‍->+००००..................0ह0हत0हकहहतहतहतहह0०. .ततत “५९७००० जहावज्ञानमखिठं खखचित्तोऽभवत्तदा । ततः सुग्रीवमाहेदं रामो वानरुङ्भघस्‌ ॥३९॥ भातुर्ज्येछृठस्य पुत्रेण यद्युक्त साम्परायिकम्‌ । कुरु सर्वे यथान्यायं संस्कारादि ममाज्ञया ॥४०। तुधेति वरिभिर्ु्यर्वानरेः परिणीय तम्‌ । वालिनं एष्पके क्षिप्त्वा सर्पराजोपचारकैः ॥४१॥ भेरीदुन्दुभिनिर्धोपेत्राह्मणेमैन्त्रिमिः सह । यूथपेवानरैः पौरेस्तारया चाङ्गदेन च॥४२॥ गत्या चकार तत्सर्वे यथाशास्रं प्रयत्नतः | खात्वा जगाम रामस्य समीपं मन्त्रिमिः सह ॥४३॥ नत्वा रामस्य चरणो सुग्रीवः प्राह हृष्टधीः । राज्यं प्रशाघि राजेन्द्र वानराणां समृद्धिमत्‌ ॥४४॥ दासोऽहं ते पादपद्मं सेवे लक्ष्मणवच्चिरम्‌ । इत्युक्तो राघवः ग्राह सुग्रीबं सस्मितं चचः॥४५॥ त्वमेवाहं न सन्देहः शीघ्रं गच्छ ममाज्ञया । पुरराज्याधिपत्ये त्वं ख्रात्मानमभिपेचय॥४६॥ नगरं न प्रवेक्ष्यामि चतुर्दश समाः सखे । आगमिप्यति मे आता लक्ष्मणः पत्तनं तव ॥४७॥ अङ्गदं योवराज्ये त्वमभिपेचय सादरम्‌ | अह समीपे शिखरे पर्यतस्य सहानुजः ॥४८॥ वत्स्यामि वर्षदियसांस्ततस्त्वं यत्नवान्‌ भव। किञ्चित्कालं पुरे खित्वा सीतायाः परिमार्मणे।४९ साष्टाङ्ग प्रणिपत्याह सुग्रीनो रामपादयो!। ~ को ५ आ यदाऽऽज्ञापयसे देव तत्तथंव करोम्यहम्‌ ॥५०॥ अचुज्ञातश्च रामेण सुग्रीवस्तु सलक्ष्मणः । गत्वा पुरं तथा चक्रे यथा रामेण चोदितः ॥५१॥ २२ किष्किन्धाकाण्ड १६९ rr चित्त हो गया | तदनन्तर भगवानूने वानरश्रेष्ठ सुग्रीब- से कहा-॥ ३६-३९ ॥ “हे सुग्रीव | तुम मेरी आज्ञासे वेरा अंगदके द्वारा अपने वडे भाईका जो कुछ शास्त्रोक्त और्ध्वदैहिक कर्म हो बह सब विधिपूर्वक करो” || ४० ॥ तब “जो आज्ञा’ कह मुख्य-मुख्य बलवान्‌ वानरों- के साथ वाळीके शवको फूछोंके विमानपर रख- कर समस्त राजोचित उपचारोंके सहित भेरी और दुन्दुभि आदिका घोष करते हुए ब्राह्मण, मन्त्रि, यूथपति वानरगण, पुरवासी, तारा और अंगदके साथ उसे ले जाकर सुग्रीबने बड़े प्रयत्ते शाख्रानुकूल सब संस्कार किये और फिर ख्रानादि करके मन्त्रयोंके साथ रामके पास लोट आया ॥ 9 १-४२।। वहाँ आकर सुग्रीबने प्रसन्न चित्तसे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रणाम करके कहा--“हे राजराजेश्वर ! वानरों- के इस समृद्धिसम्पन्न राज्यका शासन कीजिये ।४४॥ मैं तो आपका दास हुँ; छक्ष्मणके समान मैं भी सदा आपके चरणकमलोंकी सेवा करता रहूँगा ।” यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने सुग्रीबसे मुसकाते इए | कहा-॥।४४। “सुग्रीव ! मैं और तू एक ही हैं--इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं । मेरी आज्गासे तुम तुरन्त ही जाकर फिप्किन्धाके राजपदपर अपना अभिषेक कराओ॥ ४६॥ हे सखे ! मैं चौदह वर्षतक किसी भी नगरमे प्रवेश नहीं कर सकता इसलिये तुम्हारे राज्याभिषेकके समय भाई लक्ष्मण तुम्हारे नगरमें आयेगा ॥ ४७॥ अंगदको तुम आदरपूर्वक योवराज्यपदपर अभिषिक्त करना । अब मैं वर्षाके दिनोमें भाई लक्ष्मणके साथ यहाँ पास ही पर्वत-दिखर- ' पर रहुँगा, सो तुम कुछ दिन नगरमें रहकर फिर सीताजीकी खोज करानेका प्रयत्न करना” ४८-४९ ॥ ' तब सुग्रीबने श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें साष्टांग, दण्डवत्‌ करके कहा--“भगबन्‌! आपकी जैसी आज्ञा होगी मैं वही करूँगा” ॥५०॥ फिर भगवान्‌ रामकी आज्ञा पा सुग्रीव लक्ष्मणजीको साथ लेकर किष्किन्धापुरीमें गये और जैसे-जैसे श्रीरामचन्द्रजीने करनेको कहा था सब कार्य वैसे ही किया ॥ ५१॥ तदनन्तर सुग्रीबसे १७०' अध्यात्मरामायण [ सर्म ४ rrr ३३5४ ७00 र eee meee वयच तक यथोचित आदर पा छक्ष्मणजी श्रीरघुनाथजीके पास चले आये और उनके चरणोंमें प्रणाम कर उनकी आगत्य राध शीघ्र प्रणिपत्योपतस्थिवान्‌ ॥५२॥ | सेवामें उपस्थित हो गये | ५२ ॥ ततो रामो जगामाशु लक्ष्मणेन समन्वितः। . तव श्रीरामचन्द्रजी तत्काळ ही लक्षमणके साथ ly तक्रे © शिखरं भूरिवि प्रवर्पण पर्वतको ऊपर अति विस्तीण ha र © Lae ए ] रि ने i र, प्रवषेणमिरेरूध्वे॑ शिखरं भूरिविस्तरम | I गये || ५३ ॥ वहाँ उन्होंने स्फटिकमणिकी एक व तत्रेकं गहर॑ ष्ट्रा स्फाटिकं दीस्तिमच्छुभम्‌ । और प्रकाशमान गुफा देखी । उसमें बर्षा, वायु और वर्षबातातपसह॑ फलमूलसमीपगम्‌ । धूपसे बचनेका घुभीता था तथा पास ही कन्द, मूळ और _ वि फळ भी रमे हुए थे । उसे देखबर श्रीराम और रक्ष्णण- रोचयामास तत्र रामः सलक्ष्मणः ॥५४।। | वासाय राघवामात क ने वहीं रहना पसन्द किया ॥ ५४ ॥ तव रघुकुल- 02९२९ ४७०५४९० ६.७७ १६४७७७४ ७७ ७४७ ४श केशी i क्क ४४८४४ ४०४४४/४११/१९१५४१७१४१५ सुग्रीवेण यथान्यायं पूजितो लक्ष्मणस्तदा । दिव्यमूलफलपुष्पसंयुते पि तिलक श्रीरामचन्द्रजी दिव्य मूळ फल और फटोसि सम्पन्न, मॉक्तिकोपमजलांधपल्वलं । मोतीके समान खच्छ जल्वाळे सरोवरोसे युक्त और चित्रवरणसृगपक्षिशोमिते चित्र-विचित्र मृग तथा पक्षियोंसे सुशोमित उस प्रवर्षण पेते रघुकुलोत्तमोऽबसत्‌ ॥५५॥ | पर्वेतपर रहने कगे ॥ ५५ ॥ क इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे तृतीयः सगः ॥३॥ RR व दीक--०-+ छु चतुर्थ सर्ग भगवान्‌ रामका लक्ष्मणजीसे क्रियायोगका वर्णन करना । । श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेबजी बोले-हे पार्वति! वहाँ श्रीरामचन्द्रजी तत्र वार्पिकदिनानि राघवो लक्ष्मणजीके साथ लीलासे ही मणिमय गुफाओंमें विचरते लीरुया मणिगुहासु सञ्चरन्‌। | और पके इए फल-फूल खाकर निर्वाह करते हुए च) ७) न्य ७ दिनोंमें ° पक्कपूलफलभोगतोपितो | वर्षाके दिनोमें आनन्दपूर्वक रहे ॥ १॥ बायुसे लक्ष्मणेन सहितोऽबसत्सुखम्र्‌ ॥ १ ॥ | प्रेरित सजल मेघोंको देखकर, जो अपने भीतर चाततुन्नजरपूरितमेधा- कौंघती हुई विजळीके कारण सुनहरी झूलोंसे युक्त नन्तरस्तनितवैद्यतगर्भान्‌ | हाथियोंके झुण्डके समान प्रतीत होते थे, उन्हें बड़ा ही विस्मय हुआ करता था ॥ २ ॥ नवीन घासके खानेसे हृष्ट-पुष्ट हुए मृग और पक्षिगण जव कभी इधर-उधर दोडते हुए शरीरामचन्ट्रजीको देख रेते तो "बवास समाखाय हृश्युश्ट्याद्वेजाः | | उनकी ओर टकटकी छगाये रह जाते ॥ ३ ॥ और धावन्तः परितो रामं बीक्ष्य विस्फारितेक्षणाः ॥३॥ | ध्याननिष्ठ सनीयरोंके समान इधर-उधर जाना भूलकर न चलान्ति सदाध्यानानिष्ठा इव शुनीश्वराः । | जहाँके-तहाँ खड़े रह जाते । इस समय परमात्म रामं माइुषरूपेण ' गारिकाननभूमिषु ॥ ४ ॥ | रामको मनुष्यरूपसे पर्वत और वनोंमें विचरते जानकर वीक्ष्यविस्मयमगाइूजयूथा- न्यद्ददाहितसुकाश्वनकक्षान्‌ ॥ २॥ सगे ४] किष्किन्धाकाण्ड १७१ चरन्तं परमात्मानं ज्ञात्वा सिद्धगणा भुवि । 'बहुत-से सिद्धगण प्रथिवीपर मृग और पक्षियोंके रूपसे मृगपक्षिगणा भूत्वा रामभेवालुसेविरे॥ ५॥ | सदा उन्हीकी सेवामें रहने छगे || ४-५॥ सौमित्रिरेकदा राममेकान्ते ध्यानतत्परम्‌ । समाधिविरमे भक्त्या प्रणयाद्विनयान्बितः॥ ६॥ 5 अवहत ते वाकयात्र्वोक्ताद्विगतो मम । _अनाद्यविद्यासम्भूतः संशयो हृदि संखितः ॥ ७॥ इदानी श्रोतुमिच्छासि क्रियामार्गेण राघव । भवदाराधनं लोके यथा कुर्वन्ति योगिनः ॥ ८॥ इदमेव सदा प्राहुयोंगिनो युक्तिसाधनम्‌ । नारदोऽपि तथा व्यासो व्रह्मा कपलसम्भवः॥ ९ ॥ ब्रह्मक्षत्रादिवणीनामाश्रमाणां च मोक्षदम्‌ । स्नीशुद्राणां च राजेन्द्र सुलभ पुक्तिसाधनम्‌ । तव भक्ताय मे आत्रे बूहि लोकोपकारकम्‌ ॥१०॥ श्रीराम उवाच सम पूजा विधानस्य नान्तोऽस्ति रघुनन्दन । तथापि वक्ष्ये सद्ठेपाययथावदयुपूर्वश! ॥११॥ स्वग्रृद्योक्तप्रकारेण द्विजत्वं प्राप्य मानवः । सकाशातसद्ुरोमन्त्रं लब्ध्या मद्धक्तिसंयुतः । १२ तेन सन्दर्शितविधिमामेवाराधयेत्सुधी! । */ हृदये वाडनले वा्चेतिमाऽऽदो विभावसो॥१३॥ शालग्रामशिलायां वा पूजयेन्मामतन्द्रितः । प्रातःस्नानं प्रकुर्वीत प्रथमं देहशुद्धये ॥१४॥ चेदतन्त्रोदितेमन्येर्मछेपनविधानतः । सन्ध्यादि कर्म यन्नित्यं तत्कुर्याद्विधिना बुधः | १५। सडूल्पमादो कुर्वीत सिद्धयर्थ कर्मणां सुधी! । ———— एक दिन एकान्तमें ध्यान करते हुए भगवान्‌ रामसे उनकी समाधि खुळनेपर सुमित्रानन्दन श्रीलक्ष्मणजीने अति प्रेम और भक्तिसे नम्नतापूर्वक कहा--“भगवन्‌ ! आपने मुझे जो उपदेश पहले दिया था उससे मेरे हृदयका अनादि अविद्या-जन्य सन्देह तो दूर हो गया है॥ ६-७॥ किन्तु हे राघव | योगिजन क्रियामा ( पूजा-पद्धति ) से जिस प्रकार संसारमें आपकी आराधना किया करते हैं, इस समय मैं उसे सुनना चाहता हुँ'॥.८॥ समस्त योगिजन एवं देवर्षि नारद, महर्षि व्यास और कमळ्योनि अश्रीत्रह्माजी भी इसीको मुक्तिका साधन बतळाते हैं || ९ ॥ हे राजराजेश्वर | ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णो तथा ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य आदि आश्रमोंको मोक्ष देनेवाळा यही साधन है और खी तथा शाद्रोंकी भी इसी साधनसे सुगमतासे मुक्ति हो सकती है। हे प्रभो ! में आपका भक्त और भाई हुँ; अतः आप मुझसे इस छोकोपकारी साधनका वर्णन कीजिये” ॥ १०॥ श्रीरामचन्द्रजी बोले-हे रघुकुलनन्दन लक्ष्मण ! मेरी पूजा-विधिका कोई अन्त नहीं है तथापि मैं क्रमशः उसका संक्षेपमें यथावत्‌ वर्णन करता हूँ ॥ ११॥ मेरी भक्तिसे सम्पन्न मनुष्य अपनी शाखाके गृह्यसून्नद्वारा बतळाये गये प्रकारसे ( उपनयन-संस्कारके अनन्तर ) द्विजत्व प्राप्त कर भक्तिपूर्वक सदूगुरुके पास जाय और उनसे मन्त्र ग्रहण करे ॥ १२ ॥ फिर बुद्धिमान्‌ मनुष्य- को चाहिये कि उन गुरुदेवकी बतायी हुई विधिसे अपने हृदयमें, अझ्िमें, प्रतिमा आदिमें अथवा सूर्यमें केवल मेरी ही सेवा-पूजा करे || १३॥ अथवा सावधान होकर झालग्राम-शिळामें ही मेरी उपासना , करे । बुद्धिमान्‌ उपासकको चाहिये कि सबसे पहले देह- झुद्धिके लिये, प्रातःकाळ ही वैदिक तथा तान्त्रिक मन्त्रॉका उच्चारण करते हुए शरीरमें विधिवत्‌ मृत्तिका आदि छगाकर खान करे और फिर नियमानुसार सन्ध्या आदि नित्यकर्म करे ॥ १४-१५॥ मेरी पूजा करनेवाला मतिमान्‌ पुरुष कर्मोकी सिद्धिके लिये ad १७२ — तल स्वगुरुं पूजयेद्भक्त्या मद्बुद्ध्या पूजको मम।।१६॥ La शिलायां स्नपनं छुर्यात्मरतिमासु प्रमार्जनम्‌ । ्रसिद्धर्गत्धपुष्पाधेमेतूजा सिद्धिदायिका ॥१७॥ अमायिकोघ्युवृत्त्या मां पूजयेन्नियतब्रतः । ग्रतिमादिष्वलङ्कारः प्रिया मे कुलनन्दन ॥१८॥ अग्रौ यजेत हविषा मार्करे खण्डिले यजेत्‌ । भक्तेनोपहतं प्रीत्यै श्रद्धया मम वार्यपि ॥१९॥ किं पुनर्भक्षयसोञ्यादि गन्धपुष्पाक्षतादिकम्‌ । पूजाद्रव्याणि सर्वाणि सम्पाचेब समारभेत्‌ ॥२०॥ चैलाजिनङुशैः सम्यगासनं परिकर्पयेत्‌ | तत्रोपविश्य देवस्य सम्मुखे शुद्धमानसः ॥२१॥ ततो न्यासं प्रकुवींत मातृकाव हिरान्तरस्‌ | केशवादि ततः छुर्याततच्वन्यासं ततः परमू ॥२२॥ सन्सूतिपञ्जरन्यासं मन्त्रन्यासं ततो न्यसेत्‌ | प्रतिमादावपि तथा छु्यान्नित्यमतन्द्रितः ॥२३॥ कलशं स्वपुरो वाभे क्षिपेतपुष्पादि दक्षिणे । अर्ध्यपावम्रदानार्थं मधुपकार्थमेव च ॥२४॥ तथेबाचमनाथ तु न्यसेत्पात्रचतुष्टयम्‌ । हृत्पद्ष भाजुविमले मत्करां जीवसंज्ञिताम्‌ ॥२५॥ श्यायेरस्वदेहमखिलं तया व्याप्तमरिन्दम | तामेवावाहयेन्नितयं प्रतिमादिषु मत्कलाम्‌ ॥२६॥ पा्ाध्यांचमनीयाचैः स्नानवसत्रविभूषणेः । यावच्छक्योपचारेा त्वचेयेन्मामसायया ॥२७॥ अध्यात्मरामायण [ सगे ४. "१४४0 ४४४१४ नी पहले संकल्प करे और फिर अपने गुरुदेवमे मरी हीं भावना रखकर उनकी पूजा करे ॥ १६॥ मेरी मूर्ति यदि शिळारूप हो तो ख़ान करावे और यदि प्रतिमाकार हो तो केवळ मार्जन ही करे । फिर प्रसिद्ध-प्रसिद्ध गन्व और पुष्प आदिसे पूजा करे | इस प्रकार की हुई मेरी पूजा झात्र हू फळ देनेवाली होती है ॥ १७॥ मनुष्यको स्व! प्रकारके छळ-छिद्र छोड़कर गुरुकी वतायी विविसे ' नियमत्रद्ध होकर मेरी पूजा करनी चाहिये। हे कुलनन्दन | प्रतिमा आदिका श्वंगार करना मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥ १८॥ यदि अभ्रिमें पूजा करनी हो तो आहुतिद्वारा करे और यदि सूर्यमें करनी हो तो वेदीमें सूर्यका आकार बनाकर करे । भक्तके द्वारा श्रद्वापूवक निवेदन किया हुआ जळ भी मेरी प्रसन्नताका कारण होता है ॥ १९॥ फिर भक्ष्य, भोज्य आदि पदार्थ और गन्ध पुष्प अक्षत आदि पूजा- सामग्रीको तो बात ही क्या है ? अतः पहले पूजाकी सब सामग्री इकट्टी कर पिर मेरी पूजा आरम्भ करे ॥२०॥ ( अत्र जिस प्रकार पूजा करनी चाहिये वह बतलाता हूँ---) पहले क्रमशः कुशा, मृगचर्म और वख विठा- कर आसन बनावे तथा उसपर झुद्चित्तसे इषटदेवके सम्मुख बैठे ॥ २१॥ तदनन्तर वहिर्मावृका और अन्तमीतृका न्यास करे तथा केशव, नारायण आदि चोवीस नामोंका न्यास करके तत्त्वन्यास करे । उसके पश्चात्‌ ( विप्णुपञ्जरोक्त विधिसे ) मेरी मूतिमे पज्ञर- न्यास तथा मन्त्रन्यास करे । मेरी प्रतिमा आदिमें भी निराळस्य-्मावसे उसी प्रकार न्यास करना चाहिये ॥ २२-२३ || तथा अपने सामने वारयां ओर कलश और दायीं ओर पुप्प आदि सामग्री रखे, उसी. तरह अर्ध्य, पाय, मधुपर्क और आचमनके लिये चार पात्रे रखे | तत्पश्चात्‌ अपने सूर्यके समान तेजखी - हृदय-कमळमें जीवनाम्नी मेरी कळाका ध्यान करे और हे शत्रुदमन ! अपने सम्पूर्ण रारीरको उससे व्याप्त देखे तथा प्रतिमा आदिका पूजन करते समय भी उन (प्रतिमा आदि ) में उस जीवकलाका ही आवाहन करे ॥ २४-२६ ॥ पाद्य, अर्ध्य, आचमन, ख़ान, बल्न, आभूषण आदिसे अथवा जो कुछ सामग्री मिळ सके उसीसे, निष्कपट होकर मेरी पूजा करे ॥ २७॥ सर्ग ४] La बळ विभवे सति कपरकुडुमागरुचन्दनेः । अचेयेन्मन्त्रवत्नित्यं सुगन्यडुसुनेः शुभैः ॥२८॥ दशाबरणपूजां वै ह्यागमोक्तां प्रकारयेत्‌ । नीर[जने भूपदी पने वस्त॑ श्रद्वयोपहरेन्नित्यं ॥२९॥ शरद्धा शुगह्माश्वरः । होम कुर्यापरयतेन विधिना मन्त्रकोविद१ ॥३०॥। अगस्तेनोक्तमार्गेण इण्डेनागमवित्तमः । जुहुयान्मूलमन्त्रेण पुंसक्तेनाथवा बुधः ॥३१॥ 'अथवोपासनाझौ वा चरुणा हविषा तथा । तप्जाम्बुनदग्रण्यं दिव्याभरणभूषितम्‌ ॥३२॥ घ्यायेदनलमध्यस्थं होमकाले सदा बुधः । पार्षदेभ्यो. बरिं दत्त्वा होमशेपं समापयेत्‌ ॥३३॥ ततो जपं ग्रकुर्वीत ध्यायेन्मां यतवाक्‌ स्मरन्‌ । युखवासं च ताम्वूलं देखा प्रीतिसमन्बितः॥३४॥। मदर्थे चृत्यगीतादि स्तुतिपाठादि कारयेत्‌ । ग्रणमेदण्डवद्भूमो हृदये मां निधाय च॥३५॥ शिरस्याधाय मदत्त प्रसादं भावनामथस्‌। पाणिभ्यां मत्पदे मूधि गृहीत्वा भक्तिसंयुतः ॥२६। { / रक्ष मां घोरसंसारादित्युकस्वा प्रणमेत्सुधीः । ~ 1 उद्घासयेदयथापूर्व प्रत्यग्ज्योतिषि संसरन्‌ ॥३७॥ एवपुक्तप्रकारेण पूजयेद्विधिवद्यदि । इहामुत्र च संसिद्धि प्राभोति मदलुग्रहात्‌ ॥३८॥ मद्धक्तो यदि मामेवं पूजां चैव दिने दिने । ` किष्किन्धाकाण्ड RRR व ््य्य्व््व्व्व्क्क्क्व्व्य्क््प्््क्ापाप वाडा १७३ यदि धनवान्‌ हो तो नित्यप्रति कर्पूर, कुंकुम, अगरु, चन्दन और अत्युत्तम छुगन्धित पुष्पोंसे मन्त्रोच्चारण करता हुआ मेरी पूजा करे ॥ २८ ॥ तथा नीराजन ( पाँच बत्तियोंकी आरती ), धूप, दीप और नाना प्रकारके नेवेदोंद्वारा वेदोक्त दशावरण-पूजा-विधिसे मेरा अर्चन करे ॥ २९ | नित्यप्रति अति श्रद्भाके साथ सत्र पदार्थ निवेदन करे क्योंकि मैं परमात्मा श्रद्धाका ही भूखा हुँ | मन्त्र- विधिको जाननेवाळा उपासक पूजाके अनन्तर विधिः पूवक हवन करे ॥ २०॥ झाख्विधिके जाननेवाळे बुद्धिमान्‌ पुरुषको उचित है कि अगस्त्य घुनिकी बतायी हुई विधिसे कुण्ड बनाकर उसमें गुरुके दिये हुए मूळमन्त्रसे अथवा पुरुषसूक्तके मन्त्रोसे आहुति छोडे ॥ ३१ ॥ अथवा अशिदोत्रकी अञ्निमें ही चरु तथा हविसे हवन करे । हवन करते समय बुद्विमान्‌ याजक होमाञ्चिमें 'तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाले सवीळंकारविभूषित भगवान्‌ यज्ञ-पुरुषके रूपमे परमात्माका सदा ध्यान करे | और फिर मेरे पापदोंके लिये बलि देकर होम समाप्त कर दे॥ २२-३३ ॥ तदनन्तर मौन होकर मेरा ध्यान और स्मरण करता आ जप करे । फिर प्रीतिपूर्वेक ताम्बूल और मुखवास - देकर मेरे लिये नृत्य, गान और स्तुति-पाठ आदि करावे और हृदयमें मेरी मनोहर मूर्तिको धारण कर परथिवी पर लोटकर साष्टांग दण्डवत्‌ करे || ३४-३५ ॥ मेरे दिये इए भावनामय प्रसादको 'यह भगवत्प्रसाद है' ऐसी भावनासे शिरपर रखे और मक्तिभावसे बिभोर हो मेरे चरणोंको अपने मस्तकपर रखकर और हे प्रमो ! इस भयंकर संसारसे मुझे बचाओ” ऐसा कहकर मुझे प्रणाम करे, उसके बाद बुद्विमान्‌ उपासक- को चाहिये कि ग्रतिमामें आवाहन की इई जीबकळाको बह्व मुझहीमें प्रवेश कर गयी है” ऐसी भावना करते हुए विसर्जन करे॥ ३६-२७॥ जो पुरुष उपरोक्त प्रकारसे मेरी विधिपूर्वक पूजा करता है वह मेरी इपासे इहलोक और परलोक दोनों जगह सिद्धि प्राप्त करता है ॥ २८॥ यदि मेरा भक्त इस प्रकार नित्यप्रति पूजा करे तो वह मेरा सारूप्य करोति मम सारूप्यं गराम्मोत्येब न संशय! ॥३९।।| प्राप्त कर ठेता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ २९ ॥ यह अति इदं रहस्यं परमं च पावन मयैव साक्षात्कथितं सनातनम्‌ | पठत्यजसं यदि वा शृणोति यः स सर्वपूजाफलभाङ्‌ न संशयः॥४०॥ एवं परात्मा श्रीरामः क्रियायोगमलुत्तमम्‌ । पृष्टः ग्राह स्वभक्ताय शेषांशाय महात्मने ॥४१॥ पुनः प्राकृतवद्रामो मायामालम्ब्य दुःखितः । हा सीतेति वदन्नेव निद्रां लेभे कथञ्चन ॥४२॥ एतसिन्नन्तरे तत्र किष्किन्धायां सुबुद्धिमान्‌ । हनूमान्प्राह सुग्रीवमेकान्ते कपिनायकम्‌ ॥४३॥ ` शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तवैव हितशचुत्तमम्‌ । रामेण ते कृतः पूवसुपकारो ह्यनुत्तमः ॥४४॥ कुतघवस्वया नून॑ विस्मृतः ग्रतिभाति मे । ~ त्वत्कृते निहतो वाली वीरखैलोक्यसम्मतः ॥४५॥ NAN राज्ये प्रतिष्ठितोऽसि त्वं तारां ग्राप्तोऽसि दुलेभाम्‌ । Q स रामः पवतस्याग्र भ्रात्रा सह वसन्सुधा! ॥४६॥ स्वदागमनमेकाग्रपरीक्षते कार्यगौरवात्‌ । तव तु वानरभावेन ख्रीसक्तो नाववुद्धचसे ॥४७॥ ॐ करोमीति प्रतिज्ञाय सीतायाः परिमार्मणम्‌ । न करोषि कृतप्नस्त्व॑ हन्यसे वालिबद्रुतम्‌ ॥४८॥ इनूमद्रचनं श्रत्वा सुग्रीवो भयविह्वलः । प्रत्युवाच हनूमन्तं सत्यमेव त्वयोदितम्‌ ॥४९॥ शी कुरु ममाशां तवं वानराणां तरस्विनाम्‌ । सहस्राणि दशेदानीं प्रेषयाशु दिशो दश ॥५०॥ सपृद्वीपगतान्सर्वान्वानरानानयन्तु ते। गोपनीय पूजाविधि परम पवित्र और सनातन हैं । इसे साक्षात्‌ मैंने ही अपने सुखसे कहा हे । जो पुरुप इसे निरन्तर पढ़ता या सुनता है उसे निस्सन्देह सम्पूर्ण पूजाका फल मिळता है || ४० || इस प्रकार अपने अनन्य भक्त दोपावतार महात्मा लक्ष्मणजीके पूछनेपर परमात्मा sels अत्युत्तम कियायोगका उन्हें उपदेश किंया॥ ४१ ॥ फि श्रीरामचन्द्रजी अपनी मायाका अवळम्बन कर साधारण पुरुपोके समान दुःखित-से दिखायी देन ढगे बे हा सीते ! ह्या सीते ! कहते हुए सारी रात या हौ बिता देते, उन्हें किसी प्रकार नींद न आती ॥ ४२॥ इसी समय किप्किन्धापुरीमें परम बुद्विमान्‌ हनुमान जीने वानरराज सुग्रीबसे एकान्तमं कहा-॥ ४३ ॥ “हे राजन्‌ ! सुनिये, में आपके बई हितका बात कहता हूँ । देखिये, श्रीरामचन्द्रजीने पहळे आपका कितना बड़ा उपकार किया है ॥ ४४ ॥ किन्तु मुझे माळम होता है आप कृतन्नके समान उसे भूल गमे हैं । अहो ! आपहाके लिये जिन्होंने त्रिठोकमान्य वीरवर वाळीको मारा ऑर आपको राजपदपर बैठाया तथा ( जिनकी कृपासे ) आपको परम दुलभ तारा मिलीं वे ही बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ राम अपने भाईके साथ पत्रत- शिखरपर रहते हुए अपने भारी कायके लिये एकाग्र- चित्तसे आपके आनेकी वाट देख रहे हैं। किन्तु आप वानर-लभावके अनुसार खी-छम्पट होकर सत्र कुछ भूर गये ॥ ४५-४७ ॥ आपने सीताजीकी खोज- के विपयमें भें अवश्‍य करूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा करके भी अमीतक कुछ नहीं किया । आप बड़े ही कृतघ्न हैं | माळम होता है वाळीके समान आप भी शौप्र ही कालके गाळमें जायेंगे” || ४८ ॥ हनूसानजीके वचन सुनकर सुग्रीव भयसे विहृळ हो गये और बोखे--“हनूमन्‌ ! तुम ठीक ही कहते हो ॥ ४९ ॥ अब तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही दशा दिशाओंमें बड़े शीघ्रगामी दश सहस्र वानर भेजो ॥ ५० वे सातों द्वीपोंमें रहनेवाले सम्पूर्ण वानरोंको यहाँ ठे आवें और जितने मुख्य-सुख्य वानर हैं वे सब्र यहाँ पक्षमध्य समायान्तु सवं वानरपुङ्गवाः ॥५१॥ | एक पक्षके भीतर आ जायँ ॥ ५१ || जो कोई एक A oe | . सग ५] . पेकाष्कन्धाकाण्ड १७५ Breet erro उनकी जाक नरक का न बन» मन» 5 RRR VMN were यन *९१/४/४/४ ४४९४५०७ ८९०१,८१४६ ०६११४९४९०९ ९९० ७2११६८९७५९ ००० ५५/०७/५७५७ न न च्यः ऱ्य ये पक्षमतिवतंन्ते ते वध्या से न संशयः । पक्षतक यहाँ न आयेगा वह निस्सन्देह मेरे हाथों मारा इत्याज्ञाप्य इनूमन्तं सुग्रीनो शृहमाविशञत्‌ ॥५२॥ | गणा ।” हनमानजीको इस प्रकार आज्ञा देकर सुग्रीव ( फिर) अपने-घरमें चले गये ॥ ५२ ॥ सुग्रावाज्ञां पुरस्कृत्य हन्‌मान्मन्त्रिसत्तम! । सुग्रीचकी आज्ञा पा परम बुद्धिमान्‌ मन्त्रिप्रवर सक्षु अयामास हरीन्दश दिशः सुधीः ॥५३॥ | श्रीहनूमानजीने तत्काळ ही बहुत-से बानर दशे दिशाओं- "1गिणितगुणसत्वान्यायुवेगप्रचारा- ने मेज दिवे|| ५३ ॥ जो अगणित गुण और पराक्रम शाली थे तथा वायुके समान वेगबान्‌ और पर्वतके ~ 0 स्तचरगणपुस्यात पर्वेताकाररूपानू । समान स्थूलकाय थे, उन सुख्य-सुख्य वानर दूतोंको पवनहितकुसारः प्रेषयामास द्ता- राम-कार्यके लिये अति उतावळे घवननन्दन श्रीहनूमान- नतिरभसतरात्मा दानमानादितृप्तान्‌ ॥५४॥॥ जीने दान-मानसे सन्तुष्ट कर सब ओर भेज दिया ॥५४॥ “+ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे चतुर्थः सगे: ॥४॥ पञ्चम सगे भगवान्‌ रामका शोक और लक्ष्मणजीका किष्किन्धापुरीमें जाना | श्रीमहादेवजी चोळे-हे. पार्वति | एक दिन प्रदोषकाल ( रात्रिके प्रथम भाग ) में प्रवर्षण पर्वतके मणिमय शिखरपर वेठे हुए श्रीरामचन्द्रजी सीताजीके सीताविरहजं शोकमसहन्निदमन्रवीत्‌ ॥ १ ॥ | विरह-जनित सन्तापको सहन न कर सकनेके कारण इस- प्रकार बोले---) १ ॥ “लक्ष्मण! देखो, हमारी सीताको प्य लक्ष्मण मे सीता राक्षसेन हृता वलात्‌ । राक्षस वलात्कारसे हर ले गया; वह. सुन्दरी जीवित PP SP है या मर गयी--इसका निश्चय करनेके लिये हमें अभी- मृताऽमृता वा निश्चेतुं न जानेऽद्यापि भामिनीम्‌।२। सने र्ताऱ्र छु कि तक वु.छ भी पता नहीं छगा | २॥ यदि कोई मुझे श्रीमहादेव उवाच रामस्तु पर्यतस्याग्रे मणिसानो निशासुखे । जीवतीति मम वूयात्कथ्िद्वा म्रियकृत्स मे । | यह समाचार सुनावे कि बह जीवित है? तो बह मेरा पा करेगा । यदि मुझे उस साध्वीके 7 भाद जानान ता साध्या जावन्ला पन इन जीवित रहनेका पता लग जाय तो फिर वह कहीं हठादेबाइरिष्यामि सुधामिव पयोनिघेः । |मौ क्यों न हो, समुद्रमेसे असृतके समान मैं जैसे होगा चेत्ते उसे अवश्य ही तुरन्त के आऊँगा । भाई ! मेरी प्रतिज्ञा सुनों---/जो दुष्ट मेरी जानकीको ळे गया है उसे नीता तं मस्मसात्कुर्या सपुत्रवर॒ुवाह॒नम। | पुत्र, सेना और वाइनोंके सहित मैं भस्म कर डाढंगा।' > > - हे चन्द्रवदने सीते ! मुझे न देखनेसे अत्यन्त दुःखातुर हे सीते चन्द्रवदने वसन्ती राक्षसाल्ये ॥५॥ | नर राक्षसंके धरमें रहती हुई तुम किस प्रकार प्राण दुःखात्ती मामपश्यन्ती कथं गराणान्‌ धरिष्यसि । | धारण करोगी ! हा ! चन्द्रमुखी साताके बिना तो प्रतिज्ञा शुणु मे आतर्थेन मे जनकात्मजा ॥ ४॥ ४४४४८ ४७४४७१९८७४ ८७ ४४९६०४०७७८ ०४० ७७ , क 0० sh चन्द्र त्वं जानकी स्पृष्टा करेगा स्परश शीतर; । सुग्रीवो5पि दयाहीनो दुःखितं मां न प्यति ॥७॥ राज्यं निष्कण्टकं प्राप्य खीमि। परिश्ती रह; । कुतधो इस्यते व्यक्तं पानासक्तोड3तिकामुक!॥८॥ नायाति शरदं पश्यन्नपि मा्मयिहुं प्रियाम्‌ | पूर्वोपकारिणं दुष्टः कृतघो विस्मृतो हि माम्‌॥९॥ हन्मि सुग्रीवमप्येनं सपुरं सहवान्धवस्‌ | वाली यथा हतो मेऽद्य सुग्रीचोऽपि तथा भवेत] १०। इति रुष्टं समालोक्य राघवं लकष्मणोऽत्रवीत्‌ । इदानीमेव गत्वाई सुग्रीषं हुष्मानसम्‌ ॥११॥ मामाज्ञापय ह्वा तसायास्ये राम तेऽन्तिकम्‌। इत्युकत्वा धनुरादाय स्वयं तूणीरमेव च ।१२॥ गन्तुमभ्युद्यतं वीक्ष्य रामो लक्ष्मणमत्रवीत्‌। NNN न इन्तव्यस्त्वया यत्स सुग्रीयो मे ग्रियः सखा ।१३। किन्तु भीषय सुग्रीवं वालिचस्मं हनिष्यसे । इत्युकत्वा शीघ्रमादाय सुग्रीचप्रतिभापितम्‌ ।१४॥ आगत्य पश्चादत्काये तत्करिष्याम्यसंश्यम्‌। तथेति लक्षमणोऽगच्छच्वरितो भीमविक्रमः॥ १५ किष्किन्धां प्रति कोपेन निर्देहन्निव चानरान्‌। सबज्ञो नित्यलक्ष्मीको विज्ञानात्मापि राघबः।१६॥ सीतामनुशुशोचात्ते! प्राकृत! ग्राकृतामिव । वुदू्यादिसाक्षिणस्तस्य मायाफायीतिवरतिंनः। १७) र।गादिरहितस्यास्य तत्काये कथञचङ्भवेत्‌ । अध्यात्मरामायण है ॥ ३--६ ॥ हे चन्द्र ! तुम अपनी किरणोसि पहले जानकीको स्पर्श करो, (उनका स्पर्श करनेसे वे शीतळ हो जायँगी ) फिर उन शीतळ विरणोसि मुझे स्पर्श करना । हाय ! सुग्रीव भी कैसा निर्दयी हो गया है जो मुझ दुखियाकी ओर नहीं झाँकता ॥ ७॥ अहो ! निष्कण्टक राज्य पाकर वपी आसक्त हुआ वह कामकिंकर ख्रियांसे घिरा एकान्तम, पड़ा रहता है। इससे वह स्पष्ट ही बड़ा कृतब्न दीख पड़ता है ॥ ८ ॥ शरदऋतुका आगमन देखकर मी बह प्राणप्रिया सीताकी खोज करानेके लिये नही आया । मैंने उसका पहले उपकार किया है तथापि चहू दुष्ट कृतघ्न होकर मुझे भूल गया ॥९॥ (जिस प्रकार मुझे सीताको हर ले जानेत्रालेक्रा नादा करना है) उसी प्रकार मैं सुम्रीवको भी उसके नगर और वन्घु- वान्धवोके सहित मार डाळेंगा । जैसे बाळी मेरे हाथसे मारा गया बैसे ही आज सुग्रीव भी मारा जायगा” ॥१०॥ इस प्रकार रघुनाथजीको क्रुद्ध देखकर लक्ष्मणजी बोले--हे राम ! आप मुझे आज्ञा दीजिये, में अभी जाकर दुष्टचित्त सुग्रीवको मारकर आपके पास डोंट आता हूँ ।” ऐसा कह द्वाचमें घनुप और तरकश लेकर लक््मणजीको अपने-आप ही जानेके लिये उद्यत देख श्रीरामचन्द्रजी बोले, “वत्स ! सुव मेरा प्यारा मित्र है, तुम उसे मारना मत ॥ ११-१३ ॥ केवल यह कहकर कि 'तू वाढीके समान मारा जायगा' उसे डराना और फिर शीघ्र ही उसका उत्तर लेकर आ जाना | उस समय जो कुछ करना होगा में अव्य वही करूँगा |” तब महा पराक्रमी लक्षमणजी बहुत अच्छा कह तुरन्त ही किप्किन्धापुरीमें आये । उस समय उन्होंने क्रोधसे ऐसा उम्र रूप धारण किया था कि मानो सम्पूर्ण वानरोंको भस्म कर डालेंगे | _औरघुनाथजी सर्वज्ञ ओर ज्ञानखरूप हैं । श्रीलक्ष्मीजी सवदा उनकी सेवामे रहती हैं; तथापि. साधारण खाके वियोगसे शोक करते हुए प्राकृत पुरुपके समान वे सीताजीके शोकसे विह हो रहे हैं । बे प्रभु बुद्धि आदिके साक्षी, मायाके कार्योसे परे और राग-्वेप आदि विकारोंसे रहित हैं फिर इन विकारोंका कार्य- रूप शोक उन्हें कैसे हो सकता है! उन्होंने तो सर्ग ५ ] किष्किन्धाकाण्ड (कारकाय eee 7-७ SNPS Ee २७०७३ २०७३० ७ ३४ २. २०० ३७४७ के.” Mae er bree wr ee, १७७ अह्मणोक्तमृत कतुं राज्ञो दशरथस्य हि॥१८॥ | अह्माजीकी वाणी सत्य करने और महाराज दशरथको तपसः फलदानाय जातो मालुपवेपष्टक्‌ । मायया मोहिताः सर्वे जना अज्ञानसंयुताः ॥१९॥ कथमयं भवेन्मोक्ष इति विष्णुर्विचिन्तयन्‌ । ॥ कथां अथयितुं लोके सवलोकमलापहास्‌ ॥२०॥ रामायणाभिधां रामो भूत्वा मानुपचेएकः । उनकी तपस्याका फळ देनेके लिये ही मनुष्यरूपसे अवतार छिया है | 'सब लोग मायासे मोहित होकर अज्ञानके वशीभूत हो गये हैं, उससे इनका किस प्रकार छुटकारा हो' यह सोचकर भगवान्‌ विष्णु अपनी सकळ-छोक-मछापहारिणी रामायण नामकी कथाका ठोकमें विस्तार करनेके लिये रामरूप होकर मनुष्यके समान अनेकों लीछाएँ करते हुए ब्यवहारकी सिद्धि- के लिये समयानुकूल क्रोध, मोह और काम आदि कोधं मोहं च कामं च व्यवहाराथसिद्धये ॥२१॥ | विकारोंको खीकार करके विकारोंके वशीभूत इई तत्तत्कारोचितं गहन मोहयत्यवशाः प्रजाः । अनुरक्त इचारोषगुणेषु गुणवर्जितः ॥२२॥ विज्ञानमूतिविज्ञानशक्तिः साक्ष्यशुथान्वितः । अतः कामादिभिनित्यमविलिप्तो यथा नभः॥२३॥ विन्दन्ति मुनयः केचिज्ञानन्ति जेनकादयः | तङ्कक्ता निमेलात्मानः सम्यग्‌ जानन्ति नित्यदा । भक्तचित्तानुसारेग जायते भगवानजः ॥२४॥ लक्ष्मणोऽपि तदा गत्वा फिष्फिन्धानगरान्तिकम्‌। ज्याधोपमकरोत्तीत्रं भीपयन्‌ सर्ववानरान्‌ ॥२५। तं दृष्टा ग्राकृतास्तत्र वानरा वम्रमूर्धनि । चक्रुः किलकिलाशब्द एतपापाणपादपाः ॥२६॥ तान्छ क्रोधताम्राक्षो वानरान्‌ लकषमणस्तदा। ~ ~ ~ निर्मूलान्कतुमुद्यक्तो धनुरानम्य चीर्यवान्‌ ॥२७॥ ततः शीध्रं समाप्छत्य ज्ञात्वा लक्ष्षममागतम्‌॥२८॥ निवार्य वानरान्‌ सर्वानङ्गदो मन्त्रिसत्तमः । गत्वा लक्ष्मणसामीप्यं प्रणनाम स दण्डवत्‌।२९॥ ततोऽङ्कदं परिष्वज्य लक्ष्मणः 'गरियवर्घनः । २३ | प्रजाको अपनी लीछासे मोहित कर रहे हैं । किन्तु | सम्पूर्ण शुणोंमें अनुरक्त-से दिखळायी देते हुए भी वे वास्तवमें उन सबसे रहित हैं ॥ १४-२२ ॥ वे विज्ञानखरूप हैं, विज्ञान ही उनकी शक्ति है तथा एकमात्र साक्षी और गुणातीत हैं | इसलिये वे आकाशके समान काम आदि ( मनोविकारों ) से सर्वदा अलिप्त हैं॥ २३॥ उनके वास्तविक खरूपको कोई-कोई मुनिजन, जनकादि राजषिंगग तथा उनके विशुद्ध- चित्त भक्तजन ही सदा ठीक-ठीक जान पाते हैं, वे अजन्मा भगवान्‌ भक्तकी भावनाके अनुसार अवतार लेते हैं ॥२४॥ इधर, लक्ष्मणजीने किष्किन्धापुरीके पास पहुँचकर सम्पूर्ण वानरोंको भयभीत करते हुए अपने धनुषकी ग्रत्यज्ञाका बड़ा भयंकर टंकार किया ॥ २५॥ उस समय नगरके परकोटेपर चढे इए कुछ साधारण वानर लक्ष्मणजीको देखकर अपने हाथोंमें पत्थर और इृक्षादि लेकर किळकारी मारने लगे । उन वानरोको देखकर वीरवर लक्ष्मणजीके नेत्र क्रोधसे लाळ हो गये और वे धनुष चढ़ाकर उनका मूळोच्छेद करनेके लिये तत्पर हुए॥ २६-२७॥ तब लक्ष्मणजीको आये जान वहाँ मन्त्रिबर अंगदजी तुरन्त ही उछलकर आये ओर उन्होंने सब वानरोंको रोककर उनके पास जाकर दण्डवत्‌ प्रणाम किया॥२८-२९॥ तदनन्तर, प्रियवद्धेन श्रीलक्ष्मणजीने , अंगदको हृदयसे लगाकर कहा--“वत्स | तुम अभी जाकर अपने काका सुम्रीवको सूचना दो कि श्नीरघुनाथजी वी हि १७८ अध्यात्मरामायण [सग ५ oI उवाच वत्स गच्छ त्वं पिठृव्याय निवेदय ॥३०॥ | तुमसे अतयनतकरुद्व है जर प्रेरणासे मैं यहाँ आया ५ es Snes हैँ |? यह सुनकर अंगदने बहुत अच्छा कह तुरन्त गतं राघवेण चोदितं रोद्रमूर्तिता। |ॐ साजा त न [च राय न्ये | ही सारा समाचार सुग्रीवको जा सुनाया॥ ३०-३१ ॥ तथेति त्वरितं गत्वा सुग्रीवाय न्यवेदयत्‌ ॥२१॥ | और बोळा कि 'लक्षाणजी क्रोधसे नेत्र डाळ किये लक्ष्मणः क्रोधताम्राक्षः पुरद्वारि वहिःखितः। | बाहर नगरके द्वारपर खड़े हैं? ` तच्छृत्वाञ्तीव सन्त्रस्तः सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥ ३२ | यह सुनकर वानरराज सुग्रीवको बड़ा ही ( म्य है | हुआ ॥ ३२ ॥ उन्होंने मन्तरिप्रवर ह॒नूमानजीको चुँ कर कहा--“तुम अंगदके साथ तुरन्त ही ढक्ष्मण्जीके पास जाओ और उन क्रोधित इए वीरवरको धीरे-धीरे हि | अति विनयपूर्वक शान्त कर आदरपूर्वक अपने सान्त्वयन्कोपितं वीरं शर्नरानय सादरम्‌ । ' साथ यहाँ ले आओ ।” इस प्रकार हनूमानजीको भेज- ॥३४॥ | कर कपिराज एुग्रीबने तारासे कहा--॥ ३३-३४ ॥ “हे अनघे ! तुम आगे जाकर अपनी मधुर चाणीसे वीरवर लक्ष्मणको शान्त करो और जब वे , व्यय शान्त हो जायँ तव उन्हें अन्तःपुरमं छाकर मुझसे शान्तमन्तःपुरं नीत्वा पश्चाइशय मेऽनघे ॥२५॥ | मिछाओ” ॥ ३५॥ भवत्विति ततस्तारा मध्यक्श समाविशत्‌ । | यह सुनकर तारा “बहुत अच्छा' कह वीचकी हनूमानङ्गदेनैव सहितो लक्ष्मणात्तिकम ॥३६।। | जग आ गयी । इपर अंगदके सहित हनुमानजी गर हि व लक्ष्मणजीके पास आये ओर उन्हें शिर नवाकर भक्ति- एहि बीर महाभाग भवट्शुहमशङ्कितस्‌ ॥ | निःशंक होकर आइये, यह घर आपहीका है ॥३६-३७॥ वद व ~ इसमें पधारकर राजमहिपियोसे और महाराज सुम्रीवसे आविश्य राजदारादान्‌ दृष्दवा सुग्रीवमेव च । हे जि तात है च्‌ 0 मिलिये । फिर आपकी जो आज्ञा होगी हम वहा यदाज्ञापयसे पश्चात्तत्सव करवाणे भो:॥३८॥ | करेगे” | ३८ ॥ इत्युकत्वा लक्ष्मण भक्त्या करे गृह्य स मारुति! | ऐसा कह पवननन्दन हनूमानूजी भक्तिपूर्वक , छक्ष्मणजीका हाथ पकड़कर उन्हें नगरके बीचसे होकर आनयामास नगरमध्याद्राजगुह प्रति ॥३९॥ न्‌ यूथपान राजमन्दिरको छे चळे ॥ ३९ ॥ तव, रक्ष्मण्जी मार्गमे पश्यस्तत्र महासांधान्‌ यूथपानां सभन्ततः। | जहाँ-तहाँ यूथपति वानरोंके महल देखते हुए इन्द्रभवनके जगाम भवनं राज्ञः सुरेन्द्रमवनोपसम्‌ 11४०॥ | समान अति शोभायमान राजभवनमें पहुँचे ॥ ४० ॥) >> व वहाँ बीचका ब्योडीमें चन्द्रवदना तारा बैठी थी; वह सध्यकर्क्ष गता तत्र तारा तारा सि _? ५ र नला । सम्पूणे आभूषणोंसे विभूषिता थी तथा उसके नेत्र सवाभरणसम्पन्चा सद्रक्तान्तलाचना ॥४१॥ | मदसे कुछ अरुणवर्ण हो रहे ये ॥ ४१ ॥ उवाच लक्ष्मणं नत्वा खितपूर्वामिभापिणी । वह मधुरभाषिणी तारा उक्ष्मणजीको प्रणाम याहि देवर भद्रं ते साधुस्त्वं भक्तवत्सल! ॥४२॥ आपका हो , डः bi “आइये देवर, > कीत मुर आप वड़े ही साधुखभाव ओर किमर्थे कोपमाकापीर्भक्ते मृत्ये कपीश्वरे । भक्तवत्सल हैं |'४२॥ आपने अपने भक्त और आहूय मन्त्रिणां श्रेष्ठ हनमन्तमथाव्रवीत्‌ | गच्छ ल्वमड़देनाशु लक्षमणं विनयान्वितः ॥३ ३॥ प्रेययित्वा हनुमन्तं तारामाह कपीश्वरः त्वं गच्छ सान्त्वयन्ती त॑ लक्ष्मणं सृदुभापितैः । सर्ग ५] न््स्ल्ल्किििडिसससससा यश मनन सन नम कक कक न वन २399» «9 1 VV V™V™ 8 TTR न्ध (कभ क्य किष्किन्धाकाण्ड. १७९ बहुकारुमनाश्वासं ` दुःखमेवाचुभूतवान्‌ ॥४३॥ | अनुगत वानरराज सुग्रीयपर किस कारण इतना. कोप इदानी बहुदुःखौषाङ्भवद्धिरभिरक्षितः । किया! उसने तो बहुत दिनोंसे बिना किसी प्रकारका सहारा मिले दुःख ही दुःख भोगा है॥४२॥| अव आपलोगों- सवाप्रसादात्सुग्रीचः भाप्मसोर्यो- महामतिः॥४१॥| ने ही.उसे बडे दुःख-समूहसे निकाला है। आपहीकी कपा- का|गसक्तो रघुपतेः सेवाथे नागतो हरिः । 'आगमिष्यन्ति. हरयो नानादेशगताः प्रभो ॥४५॥ प्रेषिता दशसाइस्रा हरयो रघुसत्तम। आनेतुं वानरान्‌ दिग्भ्यो महापर्वतसन्निभान्‌॥४६॥ सुग्रीवः खयमागत्य सर्ववानरयूथपेः । वधिष्यति देत्यौघात्‌ रावणं च हनिष्यति ॥४७॥ त्वये सहितो$्य्येव गन्ता घानरषुङ्गवः | से महामति सुग्रीवको यह सुख देखनेमें आया है॥ ४४ |. वह जातिका वानर है, इसलिये कामासक्त होकर श्रीरघुनाथजीकी सेवामें उपस्थित नहीं हुआ । हे प्रमो ! अब शीघ्र ही विविध देशोंसे बहुत-से वानर आनेवाले हैं॥ ४५ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! अब दिशा-विदिशाओसि महा- पर्वतके समान बड़े-बड़े डीलबाले असंख्य वानरोंको लानेके लिये दश सहस बन्दर भेजे गये हें ॥४६)) सुग्रीव खयं जाकर उन सब वानर-यूथपतियोंके द्वारा दैत्यदरूका संहार करावेगा और स्वयं रावणका बघ करेगा ॥४७॥ वह कपिश्रेष्ठ आज ही आपके साथ श्रीरघुनाथजीकी सेबामें उपस्थित होगा । 'चलिये, अन्तःपुरमें पधारिये । वहाँ पझ्यान्तर्भवनं तत्र पुत्रदारसुहृद्ब्ृतस्‌॥४८॥ | सुग्रीव अपने पुत्र, स्री और घुहृद्गणसे घिरा हुआ बैठा इष्ट्या सुग्रीवमभयं देश्या नय सहैव ते। , ताराया वचनं धुत्वा कृशकोघोऽथ लक्ष्मणः ४९॥ जगामान्तःपुरं यत्र सुग्रीवो वानरश्वरः। रुमामालिइग्य सुग्रीव! पर्यङ्के पर्यवस्थितः ॥५०॥ इष्ट्या लक्ष्मणमत्यथप्रुत्पपातातिभीतवत्‌ । वं रृष्दवा लक्ष्मणः क्रुद्धो मद्विह्वरितेक्षणम्‌ ॥५१॥ सुग्रीवं आह दुत्त विस्मृतोऽसि रघूत्तमम्‌ । . [वाली येन हतो वीरः स वाणोऽध परतीक्षते ॥५२॥ त्वमेव वालिनो मार्ग गामेष्यसि मया हतः । एवमत्यन्तपरुपं वदन्तं लक्ष्मणं तदा .॥५१॥ उवाच हनुमान्‌ पीरः कथमेवं प्रभापसे । रवत्तोऽधिफतरो रामे भक्तोऽयं वानराधिपः।।५४॥ रामकायार्थमनिशं जागति न तु बिस्मृतः । है । उससे मिळ्कर उसे अभयदान दीजिये और अपने साथ ही श्रीरामचन्द्रजीके पास ले जाइये ।” ताराका कथन सुनकर लक्ष्मणजीका क्रोध ठण्डा पड़ गया और बे. अन्तःपुरमें, जहाँ बानरराज सुग्रीव थे, गये। सुग्रीव अपनी भार्या रुमाको गले लगाये पलंगपर पड़े थे, | ४८-५० | लक्ष्मणजीको देखते ही वे अत्यन्त भयमीतके समान उछलकर खड़े हो गये । उनके नेत्र मदसे विहळ हो रहे थे । उन्हें ऐसी दशाम देखकर श्रीलक्ष्मणजीने अति क्रोधित होकर कहा--“भरे दुःशील | तू रघुनाथजीको भूछ गया! (त्‌ नहीं जानता--) जिस वाणके द्वारा वीरवर वाळी मारा गया था वही आज तेरी प्रतीक्षा कर रहा है ॥ ५१-५२] माळम होता है, मेरे हाथसे मारा जाकर तू भी वाळीके मार्गते ही-जाना चाहता है ।” लक्ष्मणजीको इस प्रकार अति कठोर भाषण करते देख बीरवर हनूसानूजी बोले--“महाराज ! ऐसी बातें क्यों कहते हैं? ये वानरराज श्रीरामचन्द्रजीके आप- से भी अधिक मक्त हैं ॥ ५३-५४ ॥ भगवान्‌ रामके कार्यके लिये ये रात-दिन जागते रहते हैं, ये उसे भूल नहीं आगताः परितः प्य वानराः कोटिशः ग्रभो॥५५॥ गये हैं । प्रभो । देखिये ये करोड़ों वानर इसीलिये सब < र १८० अध्यात्मरामायण [सग ५ TT गंमिष्यस्त्यचिरेणैव सीतायाः परिमार्मणम्‌। | ओरसे आ रहे हैं ॥ ५५॥ ये सव शीघ्र ही सीतीजी- की खोजके लिये जायेगे ओर महाराज सुग्रीव रामचन्द्र- साधयिष्यति सुग्रीवो रासकायमशेषतः ॥५६।॥ | जीका सब कार्य भली प्रकार सिद्ध करेंगे” ॥५६॥ श्रत्वा हनुमतो वाक्यं सौमित्रिलेजितो$्भवत्‌ । | हनूमानजीके ये वचन सुनकर लक्ष्मणजी छजित | हो गये । तदनन्तर सुग्रीवने अर्व्यं और पाद्य आरिदसे सुग्रीयोष्प्यध्यपाद्याधलेक्ष्मणं समएजयत्‌ ॥५७)॥ (८प्रणजीकी मली प्रकार पूजा की ॥५७॥ तथा उनसे गेली मिलकर कहा, “श्रीमन्‌ ! मैं तो रामका दास हूँ, उन्हींनें : | मेरी रक्षा की है; वे अपने तेजसे आधे क्षणमें ही रामः खतेजसा लोकान्‌ क्षणाडूनेव जंष्यात ॥५८॥ सम्पूण लोकोंको जीत सकते हैं ॥ ५८ ॥ हे प्रभो! में तो अपनी वानर-सेनाके साथ केवल उनका सहायकमात्र हूँगा। ( मुझसे भला उनका क्या कार्य सौमित्रिरपि सुग्रीवं आह किश्चिन्मयोदितम्‌॥५९॥ | सिद्ध होगा, वे तो खयं ही सर्वे-समर्थ हैं ) |” तब ~ लक्ष्मणजीने भी झुग्रीवसे कहा---“हे महाभाग ! मैंने तरक्षमख महाभाग ग्रणयाद्धापितं मया । | जु प्रणय-कोपवश आपसे जो कुछ अनुचित कहा है. गच्छामोञ्येव सुग्रीव रामसिष्ठति कानने ॥६०॥ | पह क्षमा करें । भगवान्‌ राम चनमें अकेले ही हैं fi हा दि ओर वे श्रीजानकीजीके विरहसे अति व्याकुळ हैं, अत एक्‌ एवातदुश्खाच जाचकाविरहात्मरञ्चुः | हम आज ही वहाँ चलेंगे [? तथेति रथमारुह्य लक्ष्मणेन ससन्वितः 1६१] | तव वानरराज सुग्रीव हाँ ठीक है' ऐसा कहकर लक्ष्मणजीके सहित रथमें चढ़े और वानरोंके साथ श्ररामचन्द्रजीके पास चले ॥ ५९-६२ ॥ आलिङ्ग्य प्राह रामस्य दासोऽह तेन राक्षतः । सहायमात्रमेवाहं वानरे सहितः प्रभो । वानरे सहितो राजा राममेवान्वपद्यत ॥६२॥ भेरामूदजबहुक्रक्षवानरे! उस.समय (उनका सवारीकी अपूर्व शोभा थी--) श्रेतातपरैन्यजनैश दोषि भेरी और मृदंग आदि नाना प्रकारके वाजे वज रहे थे अ शोभितः। तथा वहुत-से रीछ, वानर चेत.छत्र और बर ज्व नीलाडृदाथेईचुमत्मधानेः | उन्हें अत्यन्द सुशोमित कर रहे थे । इस प्रकार वानरराज सुग्रीव वडे ठाट-वाटसे नीळ, अंगद और समाइतो राघवमभ्यगाद्भारिः ॥६३)॥ | हनूमान आदि सुख्य-सुख्य वानरोंके साथ औरघुनाथजी- | के पास चळे ॥ ६३ ॥ —— POO इति श्रीमदध्यात्मरासायणे उमामहेश्वरसंवादे किप्किन्धाकाण्डे पञ्चसः सर्गः ॥५॥ TARO SSCS oe Stns mms ye0m denn हे RR OO oY YY डल्ला ४५१४१४७४१७ किष्किन्धाकाण्ड १८१ षष्ठ सरग सीताजीकी खोज, वानरोंका गुहाप्रवेश' और खयम्प्रभाचरित्र । महादेव उवाच चराम समासीन शुहाद्वारि शिलातले । " वेलाजिनधरं शयामं जटामौलिविराजितम्‌॥ १॥ विशालनयन शान्तं सितचारुमुखम्बुजम्‌ । सीताविरहसन्तप्तं पश्यन्तं स्ृगपक्षिणः॥ २॥ रथाद्रात्सयुत्पत्य बेगात्सुग्रीवलक्ष्मणी । रामस्य पादयोरग्रे पेततुर्भक्तिसंयुतो ॥ ३ ॥ रामः सुग्रीवमालिडग्य पृष्द्वाउनामयसन्तिके । स्थापयित्वा यथान्यायं पूजयामास घर्मबित ॥४॥ ततो5ञवीद्रधुश्रेष्ठ सुग्रीवो भक्तिनम्रधी! । देव पश्य समायान्तीं वानराणां महाचमूम्‌ ॥ ५ ॥ ' कुलाचलाद्विसम्भूता मेरुमन्दरसन्निमाः | नानाडीपसरिच्छेरुवासिनः पर्वेतीपमा! ॥ ६॥ असङ्घातः समायान्ति हरयः कामरूपिणः । सर्वे देवांशसम्भूताः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ७॥ अत्र फेचिद्रजवलाः केचिदशगजोपमाः | गजायुतबलाः केचिदन्येऽमितबलाः प्रभो ॥ ८ ॥ , केचिदञ्जनकूटामाः केचित्कनकसन्निभाः । { केचिद्रक्तान्तवदना दीर्भवारास्तथाऽपरे ॥ ९॥ | शुद्रफटिकसङ्काशाः केचिद्राक्षससनिभाः । श्रीमहादेवजी बोले--है पार्वति ! मृगेचर्म और जटा-मुकुटसे सुशोभित, विशाळ-नयन, सस्मित मनोहर- सुखारबिन्द, शान्तमूर्ते, श्यामशरीर भगवान्‌ रामको सीताजीकी विरह-ब्यथासे सन्तप्त होकर मृग और पक्षियांकी ओर निहारते हुए गुफाके द्वारपर एकं शिलाखण्डपर बैठे देख सुग्रीव और लक्ष्मण दूरसे ही तुरन्त रथसे उतर पड़े और अत्यन्त भक्ति-भावसे श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें जा गिरे ॥ १-३ ॥ धर्मज्ञ ्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवको गले छगाकर उनकी कुदळ पूछी तथा अपने पास बिठाकर उनका' यथोचित सत्कार किया ॥ ४॥ तब सुग्रीवने भक्तिवश अति विनीत होकर श्रीरधु- नाथजीसे कहा---“भगवन्‌ ! देखिये, बानरोंकी . यह महान्‌ सेना आ रही है ॥ ५॥ प्रभो ! हिमाल्य आदि कुल्पर्वतोंपर उत्पन्न इए, सुमेरु और मन्दरा- चलके समान डील-डोल्वाळे, भिन्न-भिन्न द्वीप नदी- तट और पर्वतोंके ऊपर रहनेवाले तथा पर्बतकें समान अगणित विशालकाय वानर आ रहे हैं। ये सभी देवताओंके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। ये इच्छानुसार रूप धारण कर सकते हैं और युद्ध करनेमें भी अति कुशल हैं ॥६-७॥ हे प्रभो ! इनमेंसे किन्हींमें एक, किन्हीमें दश और विन्हीमें दरा हजार हाथियोंका बल है . तथा किन्हींके बलका तो कोई परिमाण ही नहीं है ॥८॥ , देखिये, कोई कजळगिरिके समान काले हैं, कोई ।सुवर्णके समान सुनहरी हैं, किन्हींका मुख रक्तर्ण है और किन्हींके शरीरपर बड़े-बड़े वाळ हैं ॥९॥ कोई द्ध स्फटिकमणिके समान दिखायी देते हैं और कोई राक्षस-जैसे माळम पड़ते हैं । ये समी वानर युद्धके लिये अति उतावळे हैं इसीलिये गर्जते इए गर्जन्तः परितो यान्ति वानरा युद्धकाह्चिणः ॥१०॥ वर उघर दौड़ रहे हैं ॥ १०॥ हे प्रमो ! ये सब त्वदाज्ञाकारिणः सर्वे फलमूराशनाः प्रभो । आपकी आज्ञाका पालन करनेवाले और फर-मूछ आदि. ही खानेवाले हैं । ( इनके निर्वाहके लिये आपको ऋक्षाणामधिपो वीरो जाम्बवान्नाम बुद्धिमान । १ १॥ कोई चिन्ता नहीं करनी पड़ेगी) ।- ये रीछोंके अधिपति १८२ हन्यन्कण्कपकण्कन्क्क्क्न्कगुक ॐ RRR II क्य एप मे मन्त्रां श्रेष्ठ कोटिभर्छकबृन्दपः । हनूमानेष विख्यातो महासच्मपराक्रमः ॥१९॥ वायुपुत्रो$तिवेजखी मन्त्री बुद्धिमतां वरः | नलो नीलश गवयो गवाक्षो गन्धमादनः ॥१२॥ शरभो मैन्दबशैव गजः पनस एव च | वलीश्वुखों दधिश्ुखः सुपेणस्तार एव च ॥१४॥ केसरी च. महासत्वः पिता हचुमतो बली | एते ते यूथपा राम ग्राधान्येन मयोदिताः ॥१५॥ महात्मानो महावीयीः शक्रतुल्यपराक्रमाः | एते. प्रत्येकतः कोटिकोटिवानरयूथप।ः ॥१६॥ तबाज्ञाकारिणः सर्वे सर्वे देवांशसम्भवाः । एष वालिसुतः श्रीमानङ्गदो नाम विश्रुतः ॥१७॥ वालितुल्यवलो वीरो राक्षसानां बलान्तकः । एते चान्ये च बहवस्त्वदर्थ त्यक्तजीविताः ॥१८॥ योद्धारः पर्वताग्रैश्च निपुणाः शत्रुघातने । आज्ञापय रघुश्रेष्ठ सर्वे ते बशवतिनः ॥१९॥ रामः सुग्रीवमालिङ्ण्य हपेपूर्णा शुलोचनः । राह सुग्रीव जानासि सरथ त्वं कार्यगोरवम्‌ ॥२०॥ मार्गणार्थ हि जानक्या नियुङ्क यदि रोचते । श्रुत्वा रामस्य वचनं सुग्रीव! प्रीतमानसः ॥ २ १॥ प्रेषयामास बलिनो वानरान्‌ वानरर्षभः । दश्च सर्वाहु विविधान्वानरान्‌ प्रेष्य सत्वरम्‌॥२२॥॥ दक्षिणां दिशमत्यरथं प्रयत्नेन महावलान्‌ । अध्यात्मरामायणे 0५०४० ५ ४८१ म [सर्ग ६ SOTA eee Ns FANN जाम्बवान्‌ वड़े ही वीर और बुद्विमान्‌ हैं । ये एक करोड़ भाळुओंके यूथपति हैं और मेरे मन्त्रियमें अग्रगण्य हैं | अपने महान्‌ बळ और पराक्रमकें लिये सर्वत्र विख्यात ये परम तेजखी पघन-पुत्र हनूमानूजी हैं। ये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और मेरे (प्रमुख) मन्त्री[हैं। इनके अतिरिक्त हे रामजी ! नळ, नीळ, गतय, be क, गन्धमादन, शरम, मैंदव, गज, पनस, वळीसुख, दधि- मुख, सुप्रेण, तार, तथा हनूमानूके पिता महाबली और परम धीर केशरी--ये मेरे प्रधान-प्रधान यूथपति हैं, सो मैंने आपको बता दिये ॥ ११-१७ ॥ ये सत्र बड़े महात्मा, वीर और इन्द्रके समान पराक्रमी हैं; तथा इनमेंसे प्रत्येक करोड़ों वानरोंके यूथका अधिपति है ॥ १६॥ ये सभी आपके आज्ञाकारी और देवताओंकि अंशसे उत्पन्न हुए हैं । ये वाळीके पुत्र परम विख्यात श्रीमान्‌ अंगदजी हैं ॥ १७॥ ये भी बाळीके समान ही वल्वान्‌ और राक्षसदलका दलन करनेवाले हैं । इस प्रकार ये सव तथा और भी बहुत-से वानर-बीर आपके लिये प्राण निछावर करनेको उद्यत हैं ॥१८॥ ये पर्वत-दिखर छेकर छड़ा करते हैं और शन्रुका नाश करनेमें बड़े कुशल हैं । हे रघुश्रेठ्ठ ! ये सव आपके अधीन हैं, आप इन्हें इच्छानुसार आज्ञा दीजिये” ॥१९॥ तब श्रीरामचन्द्रजीने नेत्रॉमें आनन्दाश्रु भरकर सुग्रीकको हृदय लगा लिया और कहा--“सुग्रीब ! तुम मेरे कार्यको कठिनताके विपयमें जानते हो हो ॥ २० ॥ यदि तुम ठीक समझो तो इन्हें यथायोग्य जानकीजीकी खोजके लिये नियुक्त कर दो !” रामका यह बचन सुनकर वानरश्रेष्ठ सुग्रीबने प्रसन्न होकर बहुत-से वलवान्‌ वानरोंको सीताकी खोजके लिये भेजा | इस प्रकार तुरन्त ही समस्त दिशाओंमें अनेकों वानरोंको युवराजं जाम्बवन्तं हतूमन्त॑ महावरम्‌ ॥२३॥|| भेजकर दक्षिण-दिशामे. अधिक प्रये साथ महावलौ नरुं सुषेणं शरभं मेन्दं द्विविद्मेव च । अषयामास सुग्रीवो वचनं चेद्सबबीत ॥२४॥ विचिन्वन्तु प्रयत्नेन भवन्तो जानकीं शुभाम्‌ । मासादर्वाङ्निनर्तध्वं मच्छासनपुरःसराः ॥२५॥ युवराज अंगद, जाम्बवान्‌, हनूमान्‌, नल, सुपेण, शरम, मैंद और द्विविद आदिको भेजा तथा उनसे इस प्रकार कहा--11२ १-२४॥ “मेरी आज्ञासे तुम सब लोग बडे ्रयत्रसे शुमलक्षणा जानकीजीकी खोज करो और एक मासके, भीतर ही छट आओ ॥२५॥ सर्ग ६] सीतामदृश्वा यदि वो मासादुर्ध्ष दिनं भवेत्‌ । तदा-्राणान्तिकं दण्डं मत्तः प्राप्स्यथ वानराः।२६। इति प्राप्य सुग्रीवो वानरान्‌ भीमविक्रमान्‌ । रामुख 'पार्थे श्रीराम नत्वा चोपाविवेश सः ॥ "गच्छन्तं मारुति दष्ट्वा समो वचनमत्रवीत्‌ । अभिज्ञानाथेमेतन्मे ाङ्गुछीयकसुत्तमस्‌॥२८॥ मन्नामाक्षरसंयुक्तं सीतायै -दीयतां रहः 1 असिन्‌ कार्ये प्रमाणं हि त्वमेव कपिसत्तम। जानामि सश्च॑ते सर्व गच्छ पन्थाः शुभस्तव॥२९। एवं कपीनां राज्ञा ते विसृष्टाः परिमार्गणे । सीताया अङ्गदसुखा बश्रमुस्तत्र तत्र ह ॥३०॥ अरमन्तो विन्ध्यगहने ददशः पर्यतोपमम्‌ । ._ राक्षसं भीषणाकार भक्षयन्तं खगान्‌ गजान्‌ ॥२१॥ रावणोऽयमिति ज्ञात्वा केविद्ठानरपुङ्कवाः । जघ॒/किलकिलाशब्दं सुश्चन्तो युष्टिमिः क्षणात्‌ २२ | नायं रावण इत्युक्त्वा ययुरन्यन्महद्दनम । न तृपातीः सलिलं तत्रःनाविम्दन्‌ हरिपुज्ञवा! ॥ ३ ३॥ किष्किन्धाकाण्ड (४४४४४४४४४४ ४४४८५९ NSN UNIAN NFU _ विभ्रमन्तो महारण्ये शुष्क्कण्डोष्ठताङुक्राः। . दर्झुगंहर॑ तत्र तृणगुल्माबृतं महत्‌ ॥३४॥ { ( आद्रपक्षान्‌ कश्चहसान्निःसृतान्ददञ्च्ततः । ` अत्रास्ते सलिलं नूनं प्रविशामो महागुद्दाम्‌॥२५॥ इत्युकत्वा हलुमानग्र अविवेश तमन्वयुः । १८३ ४४ ह चेक क्क यदि सीताजीको बिना देखे तुम्हें एक माससे एक दिन भी अधिक हो जायगा तो हे वानरो ! याद रखो, तुम्हें . मेरे हाथसे प्राणान्त-दण्ड भोगना पड़ेगा” ॥ २६ ॥ उन महापराक्रमी वानरोंको इस प्रकार भेजकर २७॥ सुग्रींब श्रीरामचन्दरजीको प्रणाम कर उनके पास जा चैे ॥ २७॥ उस समय पवन-नन्दन हनूमान्‌को जाते देख श्रीरघुनाथजीने कहा---“हे कपिश्रेष्ट ! तुम मेरी यह अँगूठी ले जाओ, इसपर मेरे नामाक्षर -गुदे हुए हैं । इसे अपने परिचयके लिये तुम एकान्तमें सीताजीको देना । हे कपिश्रेष्ठ | इस कार्यमें तुम्हीं समर्थ हो । मैं तुम्हारा बुंद्धिबल अच्छी तरह जानता हूँ। अच्छा, जाओ। तुम्हारा माग कल्याणमय हो” ॥२८-२९॥ इस प्रकार वानरराज सुग्रीवके भेजे हुए वे अंगदादि वानरगण सीताजीकी खोज करते हुए प्रथिबीपर जहाँ- तहाँ विचरने ढगे ॥ २०1. घूमते-घूमते उन्होने विन्ध्याचलके गहन वनमें एक पर्वताकार भयंकर राक्षस देखा, जो जंगलके मृग और हाथियोंको पकड़- पकड़कर खा रहा था ॥ ११ ॥ कुछ वानरोंने यह समझकर कि 'यही रावण है! बड़ा किलकिला-दाब्द करते हुए उसे एक क्षणमें ही पूँसोंसे मार डाछा ॥ ३२ ॥ फिर ( उसे इतनी सुगमतासे मरा हुआ देख- कर) 'यह रावण नहीं है' ऐसा कहते हुए वे एक दूसरे घोर वनमें गये | वहाँ उन्हें बड़ी प्यास लगी किन्तु जळ कहीं भी दिखायी न देता था ॥ ३३॥ उस भयंकर वनमें घृमते-घूमते उनके कण्ठ, ओठ और (त्ालु सूख गये; तब उन्होंने वहाँ तृण, गुल्म और लता आदिसे ढँकी हुई एक विशाळ गुहा देखी ॥२४॥ उसमेंसे उन्होंने भीगे हुए पंखोंवाले क्रीज और हंसों- को निकलते देखा । तब यह कहकर कि चलो इस गुहामें चलें, इसमें अवश्य जळ होगा’ सबसे आगे हनूमानजीने उसमें प्रवेश किया, उनके ही पीछे अन्य सब्र वानर भी 'एक दूसरेकी बाँहमें बाँह डालकर सर्वे परस्परं शृत्वा बाहून्बाहुभिरुत्सुकाः ॥२६॥ | उत्सुकतापूर्थक उसमें घुस गये || ३५-३६ ॥ अन्धकारे -महहरं गत्वाउपश्यन्‌ कपीइवराः। ' बहुत दूरतक अन्धकारहीमें जानेके अनन्तर जलाशयान्मणिनिभतोयान्‌ कल्पहुमोपमान्‌ः ।३७। | उन वानरे देखा कि वहाँ ( स्फटिक ) मणिके समान SEE अध्यात्मरामायण [सर्ग ६ rR eee esse जज जा १८४ ५४८४५४०४८४ ४४ २७७० ४. ७० ७९७७ ७9 कटक फश फेरी ०७ ७४७ ४४७४ एक कारक 0” ७४ शीन क ७ पक्का कम कक कक वृक्षान्पक्रफलेन म्रान्मधुद्रोणसमन्वितान्‌ । गृहान्‌ सर्वेशुणोपेतान्‌ मणिवस्रादिपूरितान ॥रे८॥ च्छ जलसे पूर्ण कई सरोवर हैं; उनके पास ही पके फलोके भारसे झुके हुए कल्पतरुके समान सुन्दर वृक्ष हैं जिनमें शहदके छत्ते लगे हुए हैं। पास हां, | मणिमय वल्लालंकारोसे युक्त और दिव्य भक्ष्य-भोज्य दिव्यमक्ष्यान्नसहितान्माच्पेः परिबजितान्‌। | आदि सामग्रियोंसे पूर्ण सर्वगुणसम्पु्न निर्जन भत्रन 3 दिव्ये कमकविष्टरे | हैं । उनमेंसे एक दिव्य भवनमें उन्होंने कृति बिखितासतत्र भवने दिव्ये कनकविष्टरे ॥रे९॥ आश्चर्यचकित हो एक रमणीको अक्ेळी शे | सिंहासनपर विराजमान देखा | वह सुन्दरी योगान प्रभया दीप्यमानां तु ददशुः खियमेककास्‌ । = | इसमे तत्पर एक योगिनी थी, अपने तेजसे बह उस AN ० | प्रकाशित कर रही थी तथा शारीरपर चौर-बन्न यन्त Nn योगिनीं गः माखता ४० } स्थानको काश र A ध्यायन्तो चारवसना यानन याग य्‌ | धारण किये उस समय ध्यान कर रही थी ॥३७-४०॥ प्रणेझुस्तां महामायां मकत्या भीत्या च वानराः । | उस महाभागा युवतीको देखकर बानरोंने भय और ५ त. ग्रीतिसे उसे प्रणाम किया । तब उस देवीन उनकी 'न्यानरान्देवी यूयाकेमागता। ४ १॥ RR इष्ट्वा तान्वाचराच्दवा प्राह यया ओर देखकर कहा---“तुमलोग क्यों और करीते कुतो वा कख दूता वा मत्स्थानं किं प्रथथंथ । | आये हो तुम किसके दूत हो ? तथा मेरे स्थानको ~ | क्यों भ्रष्ट कर रहे हो ?” यह सुनकर हनूमानजीने तच्छत्वा हनुमानाह शशु वक्ष्यामि देवि ते॥४२॥ | कहा--..“देवि ! में आपते सब इसतान्त वेदन करता अयोध्याधिपतिः श्रीमान्‌ राजा दशरथ! प्रभु । हूँ, सुनिये--॥ ४१-४२ || परम ऐश्वर्य सम्पन्न महा- तस्थ पुत्रो महाभागो ज्येष्ठो राम इति श्रत। ॥४३॥| राज दशरथ अयोध्याके अधिपति थे। उनके महा शिका ीि हि भाग्यशाली ज्येष्ट पुत्र राम नामसे विख्यात हैं ॥ ४३ ॥ पितुराज्ञा पुरस्कृत्य सभार्यः सानुजा वनम्‌ । वे अपने पिताकी आज्ञा मानकर अपनी मायी और गतस्तत्र हृता भार्या तस्य साध्वी दुरात्मना ॥४४॥ छोटे भाईके सहित वनमें आये थे, यहाँ उनकी परम साध्वी पत्नीको दुरात्मा रावण हर ठे गया | तब वे अपने अनुजके सहित वानरराज सुग्रीवके पास आये | सुग्रीवो मित्रभावेन रामस्य प्रियवक्षमास्‌ ॥४५। | सुग्रीवने उनसे मित्र-भाव हो जानेके कारण हमें यह ~ CN प्राणप्रियाकी = ~~ न कि तुमलोग रामकी की खांज करो सगयध्वमिति ग्राह ततो बययुपागताः | | अशा दी टे कितुमलोग रामकी प्राणप्रियाकी खोज करो । अतः हम वहींसे आये हैं । यहाँ घनमे जानकीको हूते tA ततो बन विचिन्वन्तो जानकी जलकाद्विण॥(४ ६॥| हूँढ़ते हमें जलकी आवश्यकता इई । इससे हम इस विष्टा गद्दरं घोरं दैवाद समागताः । भयंकर कन्दरामं घुसे ओर देवयोगसे यहाँ आ गये । रावणेन ततो रामः सुग्रीबं सानुजो ययों । eo , _ हे शुभे ! आप यहाँ किसलिये रहती हैं और कौन हे? त्ये वा किमथमत्रासि का वा स्वं वद नः शुभे॥४७॥| यह हमें बताइये” ॥ ४४-४७ यागिना च तथा इष्टा वानरान्‌ प्राह हुशधीः । । यह सत्र देखकर उस योगिनीको बड़ा हर्ष हुआ ॥४ ओर वह वानरोसे बोली--“पहले तुम इच्छानुसार | फ़छ-मूछादि खाकर अमृतमय जळ पान करो । फिर आगच्छत ततो वक्ष्ये मम वृत्तान्तमादितः । | मेरे पास आना, तव मैं आरम्भसे तुम्हें अपना सत्र ` | वृत्तान्त सुनाऊँगी ।” तब उन वानरोने बहत अच्छा' शेति क हुत अच्छा तथात शुक्त्या पात्वा च हृष्टास्ते सवघानराः ॥४९॥| कह यथेष्ट फल-मूलादि खाकर जळ पीया और फिर्‌ यथेष्टं फलमूलानि जग्ध्वा पीत्वाऽमृतं पयः ततः प्राह हनूमन्तं योगिनी दिव्यदर्शना ॥५०॥ , हेमा नाम पुरा दिव्यरूपिणी विश्वकर्मणः । | पुत्री महेश नृत्येन तोषयामास भामिनी ॥५१॥ '| तुशे महेशः प्रददाविद दिव्यपुरं महत्‌ । अत्र खिता सा सुदती बर्षाणामयुतायुतम ॥५२॥ तस्या अहं सखी विष्णुतत्परा मोक्षकाङ्किणी | नाम्ना स्वयम्प्रभा दिव्यगन्धर्बतनया पुरा ॥५३॥ गच्छन्ती ब्रह्मलोक सा मामाहेद॑ तपथर । काष्कन्थाकाण्ड ५१४५४४४४४५ ४७४५४ ४४ ४५ ४४७१-७० ४ USNS LULA २० ४७ प्रसनचित्तसे उस देवीके पास आकर हाथ जोड़कर खड़े हो गये । त तदनन्तर वह दिव्यदशीना योगिनी हनूमानजीसे इस प्रकार कहने ल्गी--॥ ४८-५०॥ “पूर्वकाकमें विश्व- कर्माकी हेमा नामवाळी एक दिव्यरूपिणी पुत्री थी । उस सुन्द्रीने अपने नृत्यसे श्रीमहादेवजीको प्रसन्न किया ॥५१॥ प्रसन्न होनेपर श्रीशंकरने उसे यह विशाळ और दिव्य नगर ( रहनेके लिये ) दिया । यहाँ वह सुन्दर दाँतोंचाळी हजारों बर्ष रही ॥ ५२ ॥ मैं उसकी सखी दिव्य नामक गन्धर्वकी पुत्री हुँ । मेरा नाम खयंप्रभा है | मुझे मोक्षकी इच्छा है अतः मैं सर्वदा विष्णु | भगवानकी उपासनामें तत्पर रहती हूँ । पूर्वकालमें, जब वह ब्रझलोकको आने छगी तब उसने मुझसे कहा कि "तू सब प्रकारके प्राणियोसे रहित अत्रे निवसन्ती त्वं सर्वप्राणिविवजिते ॥५४॥ ! इस स्थानमें ही रहकर तपस्या कर ॥ ५३-५३ ।| | ्रेतायुगमें साक्षात्‌ अव्यय नारायण राजा दरशरंथके । यहाँ जन्म लेकर प्रथिवीका भार उतारनेके किये वनमें । बिचरेंगे || ५५ ॥ उनकी मार्याको हूँढ़ते इए कुछ न्तो 6. A | वानर तेरी गुहामें आयेंगे। उनका भली प्रकार सत्कार मागन्ती वानरासस्थ भायामायान्त ते गुहास्‌ । | कर तू रामचन्द्रजीकी (उनके पास जाकर ) प्रयत्षपूर्वक पूजयित्वाउथ तान्‌ नत्वा रामं सतुरवा प्रयत्ततः।५६। वन्दना और स्तुति करके भगवान्‌ विष्णुके नित्यधाम- 1 11 को चली जायगी, जो योगियोंको ही प्राप्त होने योग्य है।' यातासि भवनं विष्णो योगिगम्यं सनातनम्‌। अतः अव मैं तुरन्त ही भगवान्‌ रामका दर्शन करनेके हं गन्तुमिच्छामि रामं दरष्टुं त्वरारि हुँ ॥ ५६-५७॥ तुमलोग इतोऽहं गन्तुमिच्छामि रामं दरष्टुं त्वरान्विता ॥५७॥| ख्यि जाना चाहती हैं ॥ ५३-५७ गो दी HA Uw अपनी-अपनी आँखें मूँद छो, अभी गुद्दाके बाहर यूयं पिदध्तरमक्षीणि गमिष्यथ वहिगुहासू। | पहुँच जाओगे ।” तथैव चक्रस्ते वेगादवताः पूर्वख्थित बनम्‌ ५८ त्रेतायुग दाशरथिर्भूत्वा नारायणोऽच्ययः । भूभारहरणार्थाय विचरिष्यति कानने॥५५॥ उन्होंने ऐसा ही किया और तुरन्त ही पहले बनमें पहुँच गये || ५८॥ इधर वह योगिनी भी उस गुहाको साऽपि त्यकत्वा युहां धरं ययौ राघवसबिधिम्‌। | छोड़कर तत्काळ औरखुनायजीके पास आयी और वहाँ ; ४ लक ० त सुग्रीव तथा लक्ष्मणजीके सहित उनका दशन * तत्र रामं ससुग्रीवं लक्ष्मणं च ददश ह ॥५९॥ | च्या | ५९ |] उस बुद्विमतीने श्रीरामचन्द्रजीकी प्रदक्षिणा कर उन्हें बारम्बार प्रणाम किया और फिर पुछकित-तचु होकर गदूगदवाणीसे इस प्रकार कहने लगी--॥ ६० ॥ (हे राजाधिराज | मैं आपकी दासी आपके दशशेनोंके लिये यहाँ आयी हूँ; मैंने आपका दर्शन पानेके लिये ही गुद्दामें रहकर सहसरं वर्षोसे बड़ी कठोर तपस्या की है । आज मेरा वह तप सफल हो गया। अहो! कृतवा प्रदक्षिणं रामं प्रणम्य वहुशः सुधी! । आह गद्गदया वाचा रोमाञ्चिततनूरुहा ॥६०॥ दासी तबाह राजेन्द्र दर्शनार्थमिहागता । बहुवर्षसहस्राणि तपं मे दुश्चरं तपः ॥६१॥ गुहायां दर्शनार्थं ते फलितं मेऽद्य तत्तपः । २७४ १८६ अध्यात्मरामायण [सर्ग ६ rrr नृ ४0४१४५४४०० सि दिन है कि) मैं साक्षात्‌ हि त्वां पयाया? परतः खितम्‌६२ | आज (यह कैसा झुम हि अद्य हि त्वां नमस्यामि म दर आज (सत ब नह सर्वभूतेषु चालक्ष्य॑ बहिरन्तरयस्थितम्‌। | भीतर विराजमान आप परमेश्वरको प्रणाम कर रही हैं ! ~ | ने शुद्धरूपको योगमायासे आवृत कर ऱ > = १।।६३॥। आप अपन प योगमायाजवानिकाऽऽच्छच्ो माङुपिगरह | | मचुष्य-दारीरमं प्रकट हुए हैं। अतः जिस प्रकार मायिक- न लक्ष्यसेऽज्ञानदशां शोळूष इव रूपश्वकू। `, रूप धारण करनेवाले मायावीकों साधारण पुरुष नाही | देख सकते उसी प्रकार आपके शुद्धखरूपको जान लोग नहीं देख सकते । हे भगवन्‌ ! आपने मद्दान्‌^ भगवद्भक्तोंके भक्तियोगका विधान करनेके लिये ही जे ~ अवतार लिया है | मैं तमोगुणी घुद्भिवाळली आपको । स्वं रघत्तम की रेट ! संसारे जो कोर ठोके जानातु यः कश्चिचब तखं रघूत्तम ॥६५॥ | हते जान सकती हूँ ? हे खुष ! संसारमें जो कोई शत + कन । आपक भळे ही जाना कर रे ममैतदेव रूप ते सदा भातु हृदार्ये। | आपका परमतत्त जानते हों वे उसे भर ही जाना करे, जि 1 1 . । मेरे हृदयभवनमें तो सदा आपका यही रूप विराज- राम ते पादयुगलं दर्शित मोक्षदर्शनम्‌ ॥६६॥ | मान रहे । हे राम ! आज मुझे आपके उन मोक्षदायक | चरणकमलोंका दर्शन हुआ है, जो संसाररूपी सरिता- से पार करनेवाले और सन्मार्गका ज्ञान करानेवाले हैं । “हे आदिपुरुप | जो मनुष्य धन, पुत्र, कलत्र और ॥॒ TR विभूति आदिके मदसे उन्मत्त हो रहा है बह आपकी अकिश्वनधनं त्वाद्य नामिधातुं जनोऽहाति ॥६७॥ | स्तुति नहीं कर सकता, वर्योकि आप तो अकिञ्चनोंके ® हन पचसे हि ~ ही सवख हैं ॥ ६१-६७॥ जो गुर्णोकी पहु नि हे च्िञचनोके न निदृत्तयुणमार्गाय निष्किश्चचधनाय ते ॥६८॥ | दह्र, निष्किक धन, अपने आत्मखरुपमें ही ~ निर्गुण नमः खात्माभिरामाय निर्गुणाय गुणात्मने । | रमण करनेवाले और (खरूपसे ) निर्मण तथा ` (आरोपसे) सगुण हैं, उन आपको मैं बारम्बार प्रणाम कालरूपिणमीशानमादिमध्यान्तवजितम्‌ ॥६९॥ | करती हुँ । मैं आपको काळरूपसे सवका नियन्ता, आदि, मध्य और अन्तसे रहित, सर्वत्र समानभावसे समं चरन्तं सवत्र मन्थे त्वां पुरुष परम्‌ | व्याप्त तथा परात्पर पुरुष मानती हूँ। हे देव | मानव- देव ते वेदितं किन्न वेद चृविडम्बनस्‌ ॥७०॥ | चरिता अनुकरण करते हुए आप जो-जो जीए करते हैं उनका मर्म कोई भी नहीं जान सकता || ६८-७० ॥ न तेडरि कथिइयितो द्वेष्यो वाऽपर एव च । | मो ! आपका न कोई प्रिय है न अप्रिय है और . तर न उदासीन है । आपकी मायासे जिनके अन्तःकरण- _ रन्मायापिहितात्मानस्त्वां पश्यन्ति तथाविधम्‌॥ | आइत हैं वे ही छोग (अपनी-अपनी भावनाके अजस्र देवविर्यब्लरादि अनुसार ) आपको वैसा देखते हे ॥ ७१॥ आप फस ससादइ। | अजन्मा, अकर्ता और इश्वर है, आपके जो देव, तिर्यक जन्मकमादिकं यद्यत्तदत्यन्तविडम्बनम्‌ ॥७२॥ और महुष्य आदि योनियोमें जन्म और कर्म होते हैं बह आपकी महान्‌ लीला ही है | ७२ ॥ त्वामाहुरक्षरं जातं कथाश्रवणसिद्वये । “कहते हैं, आप अविनाशी ईश्वरने ( अपनी कीर्ति अवितो फैडाकर ) कथा-अबणकी सिद्विके लिये ही अवतार चर्कासठराजस्य तपस; फलासेडूये ॥७३॥ | लिया । कोई यह भी कहते हैं कि कोसलाधिपति महामागवतानां त्वं भक्तियोगविधितसया ॥६४॥ अवतीर्णोऽसि भगवन्‌ कथं जानामि तामसी । अदनं भवार्णानां सन्मागेपरिदर्शनम । धनपुत्रकलत्रादिविभूतिपरिद््पितः | न्ग ` उवाच योगिनीं भक्तां कि ते मनासि काहितम्‌।७८। | मुष्यन्ति गायन्ति च ये कथास्ते रघुनन्दन 11७५ सगे ६] किष्किन्धाकाण्ड १८७ अट उ 0४७०७ ७ तार 00७७, ७ ४५५ VINNY करचे, es ६७०७१ पल कत लीच WF pp SAA Ue INFO Us, कच Tp ७७ कोसल्यया प्रार्थयमान जातमाहुः परे जना! । | महाराज दशरथको उनकी तपस्याका फल देनेके लिये आपने जन्म ल्या हे ॥ ७३॥ किन्ही छोगोंका दृएराक्षसभूभारहरणायार्थितो विश्वः ॥७४॥ | कहना है कि आप कोसल्याजीकी प्रार्थनासे प्रकट हुए हैं; तथा. किन्हीं-किन्हीका मत ऐसा भी है कि ्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर भूमिके भारभूत राक्षसोंका नाश करनेके लिये ही आप सर्वव्यापक होते इए भी मनुप्यरूपसे अवतीर्ण इए हैं । हे रघुनन्दन ! जो लोग आपकी कथाओंको सुनेगे या कहेंगे वे अवश्य ही संसार-सागरको पार करनेके लिये नोकारूप आपके चरण-कमलोंका दर्शन करेंगे । हे देव ! मैं आपकी | मायाके गुणोंके वशीभूत हूँ, फिर उन गुर्णोसे अत्यन्त कथं त्यां देव जानीयां सोहं वाऽविपयं विश्चुम्‌। | पक्‌ और उनके आश्रयरूप आपको मैं कैसे जान हि | सकती हुँ? ऐसे ही बाणीके विषय न होनेके कारण मैं नमस्यामि रघुभ्रेष्ठ वाणासनशरान्वितमू। | आप विभु स्तुति भी कैसे कर सकती हूँ ! अतः भाई है | लक्ष्मण और सुग्रीबादि (पार्षदों ) के सहित आप धचुर्वाण- लक्ष्मणन सह भ्रात्रा सुग्रीवादिमिरन्वितम्‌ ॥७७॥ | धारा रघुश्रेष्टको मे केवळ प्रणाम करती हूँ” ॥७४-७७॥ ब्रह्मणा नररूपेण जातोऽयामिति केचन । पश्यन्ति तब पादाण्जं भवार्णत्रसुतारणम्‌ । स्वन्मायाशुणवद्धाऽहं व्यतिरिक्तं शुणाश्रयम्‌।।७६॥ उसके इस प्रकार स्तुति करनेसे प्रणतपापापहारी | शरीरघुनाथजी अति प्रसन्न हुए और उस अनन्यभक्ता योगिनीसे बोठे--“तरी हार्दिक इच्छा क्या है?” ॥७८॥ एवं स्तुतो रघुश्रष्टः प्रसन्नः प्रणताघहृत्‌ । sr ०-० | सा ग्राह राघवे भक्त्या भक्ति ते भक्तवत्सल । उसने अति भक्तिपूर्वक श्रीरघुनाथजीसे कहा--“हे ~ 2 | भक्तवत्सल प्रभो ! में जहाँ कहीं भी जन्म छँ आप यत्र कुत्राप ज्ञाताया चश्षला दाह मे अभा 1॥७९॥ | मुझ अपनी अविचल भक्ति दीजिये |७९॥ प्रत्येक जन्ममें त्वद्धक्तंपु सदा सद्धा भूयान्मे ग्राकृतेषु न] | मेरा संग आपके भक्तोसे ही हो, संसारी लोगोंसे न | हो और मेरी जिह्वा सदा भक्तिपूवक 'राम-राम' ऐसा र॒ठा करे || ८०॥ और हे राम ! मेरा मन आपकी उस शोभायमान श्यामल मूर्तिका श्रीसीताजी और छक्ष्मणके | सहित सर्वदा चिन्तन करता रहे जो धचुष-बाण मिहामे रामरामेति भक्त्या वदतु सर्वदा ॥८०॥ मानसं इयामलं रूप सीवालक्षमणसंयुतम्‌ । , घनुत्रीणधरं पीतवाससं मुकटोज्ज्यलमू ॥८१॥ | धारण क्रिय इए है तथा जो पीताम्बरधारी, मुक्ुढ- विमृपित एवं भुजवन्द, नूपुर, मोतियोंकी माळा, कौस्तुभ- , लय मणि और कुण्डळोंसे सुशोमित है। हे प्रभो | इसके भान्तं सरतु मे राम वरं नान्यं इणे ग्रमो ॥८२॥ | सिवा में और कोई वर नहीं मागती ॥ ८१-८२ ॥ अद्वदेर्नपूरमक्ताद्ारेः कॉस्तुमङुण्डलेः । श्रीराम उवाच श्रीरामचन्द्रजी बोळे-हे महाभागे ! ऐसा ही होगा। भवत्वेत्र महाभागे गच्छ त्वं घदरीचनम्‌ | अब त. बद्विकाश्रमको जा, वहाँ मेरा स्मरण करती तत्रेव मां सरन्ती त्वं त्यकलेद भूतपश्चकम्‌। | हुई त. शीघ्र ही इस पाञ्चभौतिकः शरीरको छोड़कर मामेय परमात्मानमचिरात्रतिपद्यसे ॥८३॥ ¦ मुझ परमात्माको ही प्राप्त हो जायगी ॥ ८३ ॥ १८८ | | अध्यात्मरामायण [संगे ७. श्रुत्वा रघूत्तमवचो5यरतसारकरपं | रघुनाथजीके ये अझुतके समान र भन धर त वि खयंग्रभा उसी समय पुण्यक्षेत्र वद्रिकाश्रमको चळी न गत्वा दब पदरतरुल स्लम । गयी, जहाँ बहुत-से वेरीके चृक्ष लगे इए हैं। वहाँ अपने तीर्थ तदा रघुपतिं मनसा स्मरन्ती अन्तःकरणमें श्रीरछुनाथजीका स्मरण करती इई वह त्यक्त्वा कलेवरमवाप परं पद्‌ सा ॥८४॥ अन्तमें शरीर-पात होनेपर परमपदको प्राप्त हुई ॥८४॥ I TS 2-7 इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे पष्टः सर्गः ॥ ६॥ cee र सप्तम सग वानरोंका प्रायोपवेशन और सम्पातिसे मॅट । श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेवजी चोळे-हे पार्वति ! इधर, सीताजीकी के _ , खोजसे थक्रे हुए वानरगण उस गुहाके समीप सघन अथ तत्र समासोचा वक्षखण्डेपु वानराः | वृक्षोंबाळे स्थानपर बैठकर (सीताको न पानेके कारण) चिन्तयन्तो बिमुद्यन्तः सीतामार्मणकर्शिताः ॥१॥ | मोहित होकर आपसमें सोचने छगे ॥ १ ॥ उस समय _ en 0 वानरश्रेष्ठ अंगदजीने कुछ वानरोसे कहा--“माळम तत्रोबाचाइदः कांबिद्ानरान्‌ वानरपेभः । | होता है इस कन्दरं घुमते-ुमते हमारा एक मास भ्रमतां गहरे5्स्माकं मासो चूर्नं गतोऽभवत्‌ ।।२)) | अवश्य पूरा हो गया ॥ २] परन्तु अभीतक हमें न नस सीताजी नहीं मिळीं | हम वानरराज सुम्रीवकी . सीता नाविगतासाभिने कतं राजशासनस्‌ । | आज्ञाका पाडन नहीं कर सके | अब यदि हम यदि गच्छाम किष्किन्धां छग्रीवोऽसान्‌ हनिष्यति | किष्किन्धापुरीक्ो लौट चर्ळे तो वह हमें अवद्य मार विशेषत | मां मिषाजिहनिष्यर डालेगा ॥ ३ ॥ विशेषतः, अपने शात्रके पुत्र मुझे तो ' शुसुते मा [मपाभिहानण्यात । चह इस मिषसे अबश्य ही मार डालेगा | मुझमें सयि तस्य कुतः ग्रीतिरहं रामेण रक्षितः ॥ ४॥ | उसका प्रेम कहाँ हो सकता है? मेरी रक्षा तो कया श्रीरामचन्दजीने ही की हे ॥४॥ अव मुझसे इदानीं रामकाये मे न कृतं तत्मिषं भवेत्‌ । श्रीरघुनाथजीका कार्य नहीं सधा; अतः मेरा वध करनेके तस्य मद्धूनने नूनं सुग्रीवस्य दुरात्मनः ॥ ५॥ लिये उस दुरात्मा सुग्रीवको निश्चय ही यह अच्छा चहाना | ५ र मिल जायगा || ५ ॥ वह पापात्मा अपने बड़े भाईकी साठकल्पां भ्रातभाया पापात्मानुभवत्यसो । | पत्नीको, जो उसकी माताके समान है, भोगता है; अतः _ हे वानरश्रेष्ठो | में अब उसके पास तो जाउँगा न गच्छेयमतः पार्श्व तस्य वानरपुङ्गवाः वि (तट व क अनवाः ॥२॥ | नही 1६॥ किसी-न-किसी उपायसे यहीं अपने लक्ष्यात्ति जावेत चात्र येन केनापे मृत्युना । | जीवनका अन्त कर दूंगा ।” इत्यक्षुनयनं केचिद्दष्टवा वानरपु्ठवाः || ७॥ | इस प्रकार उन्हें नेत्रोमें जळ भरे देखकर कितने ही नस -, | प्रमुख वानरोको बड़ा खेद हुअ it च्ययिताः साक्षनयना युवराजमथाहुबन्‌ ॥ ८॥ | भरकर रासे इजा भर उद भ किमर्थं तव शोकोऽत्र बयं ते प्राणरक्षकाः । | इतना शोक क्यों करते हैं, हम सब आपके प्राणोंकी | रक्षा करेंगे और निर्भय होकर इस गुहामें ही भवामो निवसामोऽत्र शुहायां भयवर्जिताः ॥ ९॥ | रहेंगे ॥ ९ ॥ इसमें जो नगर है वह अमरावतीपुरीके का ४. TINY Yrs CEPI euceus Teas wh सर्म ७] + TTT Neu, किष्किन्धाकाण्ड PRP PVP के स्मेसौभाग्यसहितं पुरं देवपुरोपमम्‌ । शनेः परस्परं वाक्यं वदतां मारुतात्मज! ॥१०॥ भ्ुत्वाऽङ्गद समालिङ्ग्य ्रोवाच नयकोविद्‌ः । ०७ किमर्थे ते दुर्विचारों युज्यते ॥११॥ * ,राज्ञोऽत्यन्तप्रियस्त्वं हि तारापुत्रोडतिवछमः क रामस्य लक्ष्मणात्त्रीतिस्त्वाये नित्य प्रवते १२॥ अतो न राघवाङ्कीतिस्तव राज्ञो विशेषतः अह तब हिते सक्तो वरस नान्यं विचारय ॥१३॥ गुदावास्च निर्भेद्य इत्युक्तं वानरेस्तु यत्‌ । तदेतद्रामनाणानामभेद्य कि जगलये ॥१४॥ ये त्वां दुर्वोधयन्त्येते वानरा बानरपंभ । पुत्रदारादिक त्यकत्वा कथं स्थास्यन्ति ते त्वया १ अन्यद्वद्मतमं वक्ष्ये रहस्यं शृणु मे सुत । रामो न माचुपो देव? साक्षान्नारायणोऽऽ्यय१ ।१६। सीता भगवती माया जनसम्मोहकारिणी । लक्ष्मणी भ्रुवनाधार! साक्षाच्छेपः फणीइवरः। १७॥। ब्रह्मणा प्रार्थिताः सर्वे रक्षोगणविनाशने । मायामाचुपभावेन जाता लोकेंकरक्षकाः ॥१८॥ चयं च पार्पदाः सर्वे विष्णेविकुण्ठवासिन! । 'मचुष्यभावमापन्ने स्वेच्छया परमात्मनि ॥१९॥ चयं वानररूपेण जातासतस्यैंय मायया । चयं तु तपसा पूर्वमाराध्य जगतां पतिस्‌ ॥२०॥ तेनेवाचुगृहीताः स्मः पार्पदत्बमुपागताः । इदानीमपि तस्यैव.सेवां कृत्वैव मायया ॥२१॥ पुनरवेकुण्ठमासाद्य सुखं खास्यामहे बयम्‌ । इत्यड्रदमथाइवास्य गता विन्ध्यं महाचरुम]२२। बज समान समस्त सुख-सामग्रियोंसे सम्पन्न है।” इस प्रकार उनके आपसमें धीरे-धीरे कहे हुए ये शब्द नीतिनिपुण श्रीहनुमानजीके कानोंमें पड़े तो उन्होंने अंगदजीको हृदयसे लगाकर कहा---“अंगद ! तुम ऐसी चिन्ता क्यों करते हो,त॒म्हें किसी प्रकारकी दुर्भावना न करनी चाहिये। तुम ताराके अत्यन्त छाडिले छाल हो, अतः महाराज सुग्रीवको भी तुम बहुत प्रिय हो। और श्रीरामचन्द्रजी- की तो तुममें नित्यप्रति लक्ष्मणजीसे भी अधिक प्रीति बढ़ती जाती है॥ १०-१२॥ इसलिये तुम्हें श्रीरघुनाथजी या राजा सुम्रीवसे किसी प्रकारका खटका न होना ` चाहिये | और फिर मैं भी सब प्रकार तुम्हारा हित करनेमें तत्पर हूँ । अतः हे वत्स ! तुम किसी ऐसी- चेसी बातकी चिन्ता मत करो ॥ १३॥ और इन वानरोंने जो कहा कि 'गुहामें किसी प्रकारका खटका न होगा' सो त्रिळोकीमें ऐसी कौन-सी वस्तु है जो भगवान्‌ रामके वाणोंके लिये अमेय हो ? || १४॥ हे कपिश्रेष्ठ ! जो वानरगण तुम्हें यह बुरी सलाह दे रहे हैं वे भी अपनी खी और बाळकोंको छोड़कर तुम्हारे साथ कैसे रह सकेंगे ! ॥ १५॥ इसके सिवा, बेटा ! एक अत्यन्त गुप्त रहस्य और बताता हुँ, सावधान होकर सुनो--भगवान्‌ राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं वे साक्षात्‌ निर्विकार नारायणदेव हैं ॥ १६ ॥ भगवती सीताजी जगन्मोहिनी माया हैं और छक्ष्मणजी त्रिधुवनाधार साक्षात्‌ नागनाथ शेपजी हैं ॥ १७॥ ये सब ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे राक्षसोंका नाश करनेके लिये माया-मानवरूपसे उत्पन्न हुए हैं । इनमेंसे प्रत्येक त्रिलोकीकी रक्षा करनेमें समथ है ॥१८॥ हम सब भी बैकुण्ठछोकमें रहनेवाले भगवान्‌ विष्णुके पार्पद हैं । जब परमात्माने अपनी इच्छासे मनुष्यरूप धारण किया तो हम भी उन्हींकी माया- शक्तिसे वानररूपसे उत्पन्न हो गये । पूर्वकालमें हमने तपस्याहारा श्रीजगदीश्वरकी आराधना की थी; तब उन्हींकी कृपासे हम उनके पार्षद इए थे । अब भी हम मायाकी प्रेरणासे उन्हींकी सेवा करते इए अन्तमें फिर 'वैकुण्ठमें जाकर आनन्दपूर्वक ( उन्हींके साथ ) रहेंगे ।” इस प्रकार अंगदजीको ढॉब्स बंधाकर वे सब १९० अध्यात्मरामायण [ सगे ७ mere Smee on वयच नी क २020 हय किली TRIER Draper peg सामकाबंक्कय क्का कं SO वेन््याचळ पर्वतपर गये॥ १९-२२ ॥ फिर धीरे-धीरे विचिन्वन्तोऽ निकी दक्षिणाम्बुधे! । | विन्थ्याचळ पयतपर गय | १% र्‌ धीरे विचिन्वन्तोऽथ शनर्कज दाबनाम्ड श्रीजानकीजीको खोजत हुए दक्षिण-समुद्रकें तटपर तरे महेन्द्राख्यगिरेः पवित्र पादमायदु! ॥२२॥ | महेनदरपर्वतकी पवित्र तराईमें पहुँचे ॥ २३ ॥ इष्ट्वा समुद्र दुष्पारमगाधं भयवर्घनम्‌ । । वहाँ पहुँचनेपर थे अपार, अगाध और भयको स कई हति वादि | बढ़ानेवाले समुद्रको देखकर भयभीत हो गये और एक- $ सन्त्रस्त $ ४ I; ~) न वानराः भयसन्त्रस्ताः किं कुमे इति वादिनः॥ २४।। रे कने छो कि अव क्या करना चाहिये! य्‌ 1 1 निमेदुरुदघेसीरे सर्वे चिन्तासमन्विताः । | अंगद आदि समस्त महापराक्रमी वानर अति चिन्ता) मस्त्रयामासुरल्योन्यमज्ञदा , ग्रस्त होकर समुद्रतटपर ब्रेंठ गये और आपसमें यामाझरन्यान्यमरभैदाचा ताल १रधा, सलाह करने ळो--॥२५॥ 'अद्दो ! बनमें घृमते-बृमते भ्रमतो मे वने मासो गतो<त्रेव गुहान्तर । ' हमें एक मास तो उस गुहामें ही बीत गया। परन्तु न चो रावणो वाऽद्य सीता वा जनकात्मजा॥२६॥| रावण अथवा जनकनन्दिनी सौता हम अभीनक नर ~ 8 | नहीं देख सके ॥ २६॥ राजा सुग्रीव बडा दुदण्ड सुग्रीवस्तीक्ष्णदण्डो5्स्मान्रिहन्त्येष न सँशयः। | ह वह हमें निस्सन्देद्द मार डालेगा । सुग्रावके दाथसे सुग्रीववधतोऽस्माकं श्रेयः प्रायोपवेशनम्‌ ॥२७॥ मरनेकां अपेक्षा तो प्रायोपवेशन ( अन्ननजल छोडकर इति निश्चित्य त्रैव दर्भानास्तीर्य सर्वतः । | मर जाने) हीमे हमारा अधिक कल्याण हैं ॥ २७॥ वि ऐसा निर्णय करके वे सव जहा-तहो दुद्या व्रिकर उपाविवेशुस्ते सर्वे मरणे कृतनिभयाः ॥२८) | मरनेका निश्चय कर वहीं बैठ गये ॥ २८ ॥ क LA ~ i ~ च नेकलकर द व्हॉ ८ एतस्सिजन्तरे तत्र महेन्द्राद्रिगुहान्तरात्‌ । | इसी समय महेन्दरपर्बेतकी कन्दरासे निकला बह ~¢ > 02. | एक पवेताकार गृप्र धीरे-धीरे चलकर आया ॥ २९ ॥ निर्गत्य शनकेरागादुय ध्र। पवतसन्रिभः ॥२९॥ | उन बड़े-बड़े धानरोंको प्रायोपवेशनके लिये वेढे देख दृष्दवा प्रायोपवेशेन स्थितान्मानरपुङ्गवाच्‌ । , वह मन्द खरमें कहने लगा--“आज मुझे ( एक साथ नि ॥ ) बहुत-सा भक्ष्य प्राप्त हो गया ॥ ३ उवाच शनकैप्रः प्राप्ती मक्ष्यो्य मे बहुः॥३०॥ | ८ › “इतस त ह गया | २० ॥ अब एकेकशः क्रमारसर्वान्‌ भक्षयामि दिनेदिने। | करके खाउँगा।” | में इन सबको नित्यप्रति क्रमशः एक-एक थुत्वा तद्‌गृधवचन वानरा भीतमानसाः ॥३ १॥ । शृप्रके ये वचन सुनकर थे समस्त वानर भयभीत ~~ 5 3. :_ | होकर कहने लगे--॥ ३१ ॥ “अहो ! निस्सन्देह्द अब मक्षपिष्यति नः सवानसो गृध्रो न संशयः । | यह गृध्र हम सत्रको खा जायगा । हे धानरेंशरगण ! रामकाय च नासाभिः कृतं किश्विद्धरी स्वरा) । ३२) | हमसे न तो भगवान्‌ रामका ही कुछ काम सधा और न. Ne os ~ राजा सुग्रीवका या अपना ही कुछ हित हुआ; अत्र सुग्रीवस्यापि च हितं न कृत स्वात्मनामपि। | हम व्यर्थ इसके हाये रवार छ दित इजा अ वृथाऽनेन वधं प्रासा गच्छामो यमसादनम्‌ ॥३३॥| || ३२-३३ ॥ अहो ! धर्मात्मा जटायु धन्य है जिस अहो जटायुधेमात्मा रामस्यार्थे मृतः सुधी: । मानने ee कारक अपने प्राण दिव व ~ A खो, उस शन्नुदमनने वह मोक्षपद प्राप्त कर जिया जे मों प्राप दुरावापं योगिनामप्यरिन्द्सः ॥३४॥ | योगियोंको भी दुरम हे” ॥ ३४ ॥ सम्पातिस्तु तदा वाक्यं श्रुत्वा वानरभाषितम्‌ । वानरोंके कहे हुए इस वाक्यको 'सुनकर सम्पाति व बोला--“हे कपिश्रेष्ठणण ! आपलोग कौन हैं. जो ग केवा दूय मम आतु? कणपीयूषसन्निभम्‌ ॥३५॥ | आपसमें, मेरे कानोंको अमृतके समान प्रिय लेपूने ` सर्ग७] . ' किष्किन्धाकाण्ड १९१ STERIC ४६४४४॥/१/१४५/४॥११४ ४४९७ टी्ीक 2०५० ५० ७०७७५. कक हकक क 7 eT जटायुरिति नामाद्य व्याहरन्तः परस्परम्‌ । | वाळा मेरे माईका 'जटायु नाम छे रहे. हैं । आप मुझसे किसी प्रकारका भय न करके अपना वृत्तान्त उच्यत चा त्पत्त ® ग्‌ के से वा भय माथून्मत्तः उवगसत्तमा; ॥३३॥ | हिन ।” | ३५-३६ ॥ तञ्चुवाचाङ्गदः श्रीमानुत्थितो गृप्रसन्निधो । तब श्रीमान्‌ अंगदजी उठकर उस गृभ्रके पास गये और बोले---“दशरथकुमार श्रीरामचन्द्रजी भाई लक्ष्मण रामे । दाशरथिः श्रीमान्‌ लक्ष्मणेन समन्वितः | ३७| ¦ डम चर तः।२७। और प्राणप्रिया सीताके सहित घोर दण्डकारण्यमें हीतया मार्यया साथ विचचार महावने । ` विचर रहे थे | वहाँ उनकी साध्वी भार्या सीताको _ ही दुरा ` दुरात्मा छे गया॥३७-३८॥| जिस समय राम तस्य सीता हृता साध्वी रावणेन हुरा ८॥ | दूरमा रावण हर Da इरात्मना ॥२८॥ | और छक्षण मृगयाके छिये गये हुए ये उसी समय वह सृगया नित रामे लक्ष्मणे च हृता बलात । बळात्कारसे उन्हें छे चला | उस समय वे 'हा राम | हा राम! रामरामेति क्रोशन्ती शरुत्वा शृध्रः प्रतापवान्‌ ॥३९॥ कूकर रोने छां | उनका शब्द सुनकर महाप्रतापी पक्षिराज गृप्रवर जटायुने श्रीरघुनाथजीके लिये रावण- जटायुर्नाम पक्षीन्द्र युद्धं कृतया सुदारुणम्‌ । से धोर युद्ध किया, किन्तु अन्मे वे महाबलवान्‌ बीर- -_ os वर रावणके हाथसे मारे गये ॥ ३९-४० ॥ फिर खयं रावणेन हतो वीरो राघवार्थे महावलः ॥४०॥ श्रीरामचन्द्रजीने उनका दाह-संस्कार किया और उन्हों- रामेण दग्धो रामस्य सायुज्यमगमरक्षणात्‌। ने तत्काळ भगवान्‌ राममें ( छीन होकर ) सायुज्य- ५ जप + कत्वाऽगनसाषि मोक्ष प्राप्त किया | तदनन्तर श्रीरघुनाथजी झुग्रीवके रामः सुग्रावमासाथ सख्य कृत्वाञशसाक्षिकस्‌ ४१. पास आये और अग्निको साक्षी वनाकर उनसे मित्रता :. सुग्रीचोदितो इत्वा बालिनं सुदुरासदम्‌ । . की ॥ ४१ ॥ फिर सुम्रीवके कहनेसे महाबली रामजीने अति दुर्जय वाळीको मारा और वानरोंका राज्य झुग्रीव- ' राज्यं ददो वानराणां सुग्रीवाय महाबलः 11४२ । ञो द्या ॥ ४२॥ महाबळी धुग्रीनने हमारे-जैसे सुग्रीवः ्रपयामास सीतायाः परिसार्मणे । | अनेकों महापराक्रमी वानरोंको सीताकी खोजके लिये | भेजा है ॥ ४३॥ और यह कह दिया है कि 'सब- अस्मान्वानरऱन्दान्तं महासचान्महावर१।४३॥ लोग एक मासक्रे भीतर ही लोट आना नहीं तो मैं तुम्हारे प्राण हर छगा ।' उनकी आज्ञासे इस वनमें ३ ध्व चाचत्म्राणान्हरास व} गे बड मासादर्वाडनिवर्तध्वं नोचेत्माणान्हरामि वः | घूमते हुए हम एक गुदामे चळे गये ॥ ४४ ॥ वहाँ हत्याज्ञया भ्रमन्तोऽरिमन्वने गहरमध्यगा!॥४४॥, हमारा मास समाप्त हो गया, किन्तु अमीतक : लि ५ हमें न तो सीताका पता चला है और न राबणका। $ रावण गतो मासो न जानीमः सीतां वा राव च वा। | अतः अब हम ग्रायोपवेशन करके मरनेके जिय मतुं प्रायोपविष्टाः स्मस्तीरे ठवणवारिधेः ॥४५॥ | इस क्षार (खारी) समुद्रके तटपर बैठे हैं ॥ ४५॥ काया हे पक्षिन्‌ ! यदि तुम्हें शुभछक्षणा सीताका कुछ पता याद जाचास ह पाक्षन्सातां कथय नः शुभाम्‌ | हो तो बतलाओ ।? अङ्गदस्य वचः शुत्वा सम्पातिहृमानसः ॥४६॥ | अंगदके ये वचन सुनकर सम्पाति चित्तम प्रसन्न सिय होकर बोला--“हे कपीश्वरो | जटायु मेरा परम प्रिय उवाच मरिप्रयो भ्राता जटायुः इवगेश्वराः। | गराई था। आज कई सहस्र वर्षोके अनन्तर मैने भाईका समाचार सुना है ॥४६-४७॥ हे वानरो ! मैं बातोंसे अवश्य आपलोगोंकी कुछ सहायता करूंगा | पहळे वाक्‍साहाय्यं करिष्येऽहं मवतां इुभगेश्वराः। । माईको जलाज्ञलि देनेके लिये मुझे जळके पास छे वहुवर्षसहस्रान्ते आतृवार्ता श्रुता मया ॥४७॥ १९२ अध्यात्मरामायण [सर्ग ७ आतुः सलिलदानाय नयभ्वं मां जलान्तिकम्‌ [४८1 | चळे ॥ 9८ ॥ फिर आपलोगोंकी कार्य-सिद्धिके लिये पश्चात्सव शुभं वक्ष्ये भवतां कार्यसिद्धये । जो ठीक होगा वह सब वतळाऊँगा |” तथेति निन्युस्ते तीरं समुद्र विहङ्गमम्‌ ॥४९।| तव बहुत अच्छाः कहकर वे सम्पातिको समुद्र- .. र ^~ __ | तटपर ले गये | ४९ ॥ वहाँ पहुँचकर उसने जल्में ऽपि जलाञ्जलिम्‌ | ८ हि है सोऽपि तत्सलिले खात्वा आातुर्देखा जलाञ्जलिम्‌ | खान कर माईको जलाझलि दी। तदनन्तर वानरगण उसे पुनः खस्यानमासाद्य खितो नीतो हरीश्वरेः। | उसके स्थानपर छे गये । वहाँ बैठकर की | सम्पातिः कथयामास वानरान्परिहर्षयन्‌ ॥५०।।| (अपने वचनसे) वानरोंको आनन्दित करता हुआ $~ A eA On बोछा-1५०॥ “त्रिकूट-पवतपर लंका नामकी एक नगरी हक्काचा नापास दानानां । वहाँ सीताजी अशोकबनमें राक्षसियोंकी तत्राशोकवने सीता राक्षसीभिः सुरक्षिता ॥५१॥ | ६ रखें रहती हे ॥ ५१॥ वह छंकापुरी यहाँ. समुद्रमध्ये सा लङ्का शतयोजनदूरतः | से सौ योजनकी दूरीपर ससुद्रके वीचमें है | इसमें इश्यते मे न सन्देहः सीता च परिदृश्यते ॥५२॥ | सन्दे नहीं मुझे तो वह और सीताजी यहाँसे दोख रही हैं ॥ ५२ || आपढोग इसमें सन्देह न करें | चार | सशायतु स्‌ गध होनेके कारण मेरी दृष्टि बहत दूरतक जाती हैं । शतयोजनविस्तांणे समुद्र यस्तु लङ्कयत्‌ ॥५२। | आपमेसे जो कोई सौ योजन समुद्रको छाँव सकता सएव जानकी इष्टा पुनरायास्यति धुवम्‌ | | हो वही निश्चय जानकीजीको देखकर आ सकता है | अहमेव दुरात्मा रावणं हन्तुमुत्सहे । | मेरे भाईको मारनेवाठे ब्स दुरात्मा रावणको मारने तो मैं अकेला ही समय हूँ; परन्तु (करूँ क्या ?) मेरे पंख ९ कप a ~ विवर्जित आतुदन्तारनकाक पु पक्षावाजत; पशा | नहीं रहे ॥ ५२-५४ || आपलोग किसी-न-किसी तरह यतध्वसातयलन लाजत सारतां पा्वस्‌। : समुद्र लाँधनेका प्रयत्न कीजिये; फिर राक्षसराज रावण- ततो हन्ता रघुश्नेष्ठो रावणं राक्षसाधिपम्‌ ॥५५)॥ को तो शरीरघुनायजी खयं मार डालेंगे ॥५५॥ आपलोग, उछड्ध्य सिन्धुं शतयोजनायत व गह विचार करें कि आपमेंसे ऐसा शक्तिशाली लड्ढां प्रविश्याथ विदेहकल्यकाम | | ` नो सौ योजन विश्ताखाले समुद्रको लॉबकर | ढंकामें जाय ओर श्रीजानकीजीसे मिळकर तथा उनके इृष्टा समाभाष्य च वारिधि झन | साथ सम्भाषण कर फिर समुद्र पार करके लौट स्ततु समर्थः कतमो विचार्यताम्‌ ॥५६॥ , आवे” ॥ ५६ || र रकन इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे सप्तमः सगेः ॥७॥ कं । ग्च्छुर्मगवच्‌ ब्रहि समुदन्त त्वमादितः॥ १॥ | वृत्तान्त सुनाइये” ॥ १ ॥ तब सम्पातिने पहले जैसा- \ , चि | | सगट] | ` किष्किन्धाकाण्ड १९३ © अष्टम सग खम्पातिकी आत्मकथा | महादेव उवाच भ्रीमहादेवजी बोले--है पार्वति ! यह सुनकर अथ ते कोतुकाविष्टा! सम्पातिं सर्ववानरा।। | उ सव वानरोने बड़े कुतहळ में भरकर सम्पाति- से पूछा--“भगवन्‌ | आप आरम्मसे ही अपना सम्पातिः कथयामास स्वडृत्तान्तं पुरा कृतम्‌) | नसा किया था वह सब दृत्तान्त घुनाते हुए कहा-- बह पुरा जटायु आतरो रूढ्यौबनी ॥ २॥ | रमण मैं और भाई जइ जिस समय पूर्ण युवा है शि हि थे बलके गवसे उन्मत्त होकर यह जाननेके लिये कि वलेन दर्षितावावां वक्जिज्ञासया खगो। | हममें कितना बळ है, बडे धमण्डसे आकाझामे सूर्यमण्डल- सर्यमण्डलपर्यन्त॑ गन्तुयुत्पतितो मदात्‌ ॥ ३॥ | पर्यन्त जानेको उड़े ॥ २-२ ॥ जब हम कई सहत है , योजन ऊँचे चले गये तो जटायु ( सूर्यके तेजसे ) जलने पहुयोजनसाहर्स गती तत्र प्रतापितः | | छा । मैं उसकी रक्षाके च्य मोहबश उसे अपने जटायुस्तं परित्रातुं पक्षेराच्छा्य मोहतः ॥ ४॥ | पंखोसे डँककर चलने ढगा और अन्तम सूर्यकी किरणों- सतोऽ रदिमभिरग्धपध्षोडसिरि ~, | से पंख जळ जानेके कारण यहाँ विन्ध्याचळके शिखर” खितो5ह रश्मिभिदेंर अंग्रेन्विन्४ ड छू सतोऽ रदिममिदगधपक्षोअसिन्यि यमूरथीन । पर गिर पड़ा ओर हे कपीश्वरो | बहुत उँचेसे गिरनेके पतितों दूरपतनान्सूच्छितोव्ह कर्पाश्वरा।॥ ५ ॥ | कारण मूर्छित हो गया ॥ ४-५॥ जब तीन दिन | दिनत्रयात्युनः प्राणसहितो दग्धयक्षकः। | पाए सने चेत हुआ तो पंख जळ जानेसे मेरा चित्त पर है भ्रममें पड़ गया और मैं यह कुछ भी न जान सका देश चा गिरिकूटात्या न जाने भ्रान्तमानस; | ६॥ कि यह कौन-सा देश अथवा गिरिशिखर है | ६॥ शनेरन्मील्य नयने दृष्टा तत्राश्रमं शुभम्‌ । फिर धीरे-धीरे नेत्र खोलनेपर मुझे वहाँ एक छुन्दर शनेः शनेराश्रमस्य समीपं गतवानहम्‌ ॥ ७॥ | आश्रम दिखायी दिया । तब मैं शनेःशनेः उस आश्रमके पास गया ॥ ७॥ वहा चन्द्रमा नामक चन्द्रमा नाम सुनिराड दृष्टा मां विस्मितो$वदत्‌ । | मुनीश्वर रहते थे । उन्होंने मुझे देखकर विस्मयपूर्वक कहा--“सम्पाते | यह क्या, तुम्हे आज इस प्रकार विरूप किसने कर दिया ? |] ८ |! मैं तुम्हें पहलेसे ० वही. ७. सम्पाते क्रिमिदं तेऽद्य विरूपं केन वा कृतम्‌ ॥ ८ ॥ जानामि तामहं पूर्वमत्यन्तं बलवानसि | (| ही जानता हूँ; तुम तो बडे बख्वान्‌ हो, फिर तुम्हारे पंख कैसे जळ गये ? यदि तुम ठीक समझो तो अपना सब वृत्तान्त कहो” ॥९॥ तत! चेष्टितं सर्व कथयित्वातिदुःखितः । तब मैंने उन मुनिश्रेष्ठको अपनी सब करतूत छुनायी 4 र A) > आल 1 $ होकर उनसे कहा---अब अरव बहिना ॥१०॥ | और फिर अति दुःखित ह अत्रवं युनिशादूरं दबे दावबहिना ॥१ मैं दाचाझ्चिमें जल मरूँगा ॥ १० ॥ क्योंकि हे प्रभो ! कथं धारयितुं शक्तो विपक्षो जीवितं प्रभो । बिना पंखोंके मैं किस प्रकार जीवन धारणकर सकता हूँ?” इत्युक्तोष्थ मुनिर्वीक्षय सां दयाईरविकोचन/॥११॥ | , मेरे इस प्रकार कहनेपर सुनिवर दयावश नेत्र २५ - ~ दग्धो किमर्थ ते पक्षों कथ्यतां यदि मन्यसे ॥ ९ ॥ ¢ १९४ अध्यात्मरामायण [ सगं ८ OPS RR करकन्ययामयत्याव्यनमन्य वकसन सुन *२४४५० ४४" करजन्यन्यन्कनकन्कन्कनकव्यकव्कध्य“वन्क्का धन्यन्क य ४3००) ट re शृणु वत्स वचो मेऽ शृत्वा कुरु यथेप्सितस्‌ | | जळ भरकर मेरी ओर देखते हुए बोढे--॥ ११॥ “वच्चा ! अब तुम मेरी वात सुनो । उसे सुनकर देहसूलमिदं दुःखं देहः कमससद्धवः ॥१२॥ , तुम्हारी जैसी र च हा करना । इस दुःखका । है आर देह कमजन्य हैं ॥ १२॥ कमं प्रवतंते देहेऽहवुद्घ्या पुरुषस्य ह । si अहं-घुद्धि करता हे तभी कर्मकी अहङ्कारस््ववादिः स्यादविद्यासम्भवो जडः।।१३।। प्रवृत्ति होती हैं; आर यह अविथा-जनित जड अहंकार अनादि है ॥ १३ ॥ ( अञ्निसें व्याप्त ) तप्त लोहपिण्ड- के समान यह अहंकार सर्वदा चिदाभाससे व्याप्त है । तेन देहस्य तादात्म्याइहश्रेतनवान्भवेत्‌ ॥१४॥। ¦ उस चिदाभासविशिष्ट अहंकारका देहसे तादात्म्य ( ऐक्य ) होनेके कारण देह चेतनायुक्त होता हैं ददाऽहानात द्धः सादात्यनाञहङुतबलात्‌ | ॥ १४ ॥ अहँकारके कारण ही आत्माको भे देह हूँ तन्मूल एष संसारः सुखदुःखादिसाथकः ॥१५॥ यह बुद्धि होती है और उसके कारण यह सुख- दुःखादिका देनेवाला जन्म-मरणरूप संसार प्राप्त होता है || १५॥ निर्विकार आत्माके साथ देहके इस मिथ्या देहोऽहं कर्मकर्ताहमिति सङ्करप्य सर्वदा ॥१६॥ तादाल्यसे ही जीव सर्वदा यह संकल्प करके कि भैं वः करोति कर्माणि तत्रे ध्यतेज्बश: देह हूँ और कर्मोका करनेवाला हूँ! नाना प्रकारके कर्म ज करप कला त्फर्लनद् ष्यतेऽवश+ | करता है तथा विवश होकर उनके फलोसे बता है । ऊध्वांधी अमत नित्यं पापपुण्यात्मकः स्वयम्‌ । १७) और इस प्रकार पाप-पुण्यके वशीभूत होकर सदा ऊँची ४ 208 त नौची योनियोमे भ्रमता रहता है ॥ १६-१७ || वह व मयाऽयं य यश्दानादि निवितस्‌ | ऐसे संकल्प करने छगता है कि मैने यक, दान आदि सग गत्वा सुख पाल्य शात सडझ्डत्पवान्भवंत्‌॥१८) बहुत-से पण्य-कर्म किये हैं अतः में निश्चय ही स्मे तयैवाध्यासतस्तत्र विर भुत्वा सुखं महत्‌ । जाकर सुख भोगूँगा ॥ १८ ॥ ऐसे अध्वाससे वह वहाँ हि ( जाकर ) चिरकाल्तक महान्‌ सुख भोगता है ओर क्षीणपुण्यः पतत्यर्वागनिच्छन्कर्मचोदितः ॥१९।॥ अन्तमे पुण्यक्षय हो जानेपर प्रारव्यकी प्रेरणासे, इच्छा न रहते हुए भी, नीचे गिरता हैं ॥ १९॥ पतिस्वा मण्डले चेन्दोस्ततो नीहारसंयुतः । “पहले बह चन्द्रमण्डलपर गिरता है। बहाँसे (चन्द्र मे एतित्वा ता २०० २.०० ४): , रङ्मियोंके द्वारा) कुहिरेके रूपमें प्रथिवीपर आकर भूसा पातत्वा ब्राह्यादो तत्र खित्वा चिर पुनः।२०। बहुत दिनोंतक ब्रीहि आदि धान्योंमें रहता है ॥२०॥ सूत्वा चतुर्विधं भोज्यं पुरुपेभुज्यते ततः । रह (भक्ष्य,भोज्य,लेद्य और चोष्य) चार कारके अन्न रेतो भूत्रा एनस्तेन ऋतो खीयोनिि खूपसे पुरुषीद्वारा खाया जाता है और वीर्यरूपमें वा बुला पुनस्तेन ऋतो खीयोनिसिश्चितः॥२१॥ परिणत हो जाता है तदनन्तर वह उसके द्वारा ऋतुकाठमे योनिरक्तन संयुक्त जरायुपरिवेशितम | ' ख्रीकी योनिमें डाछा जाता है ॥ २१ ॥ योनिमे स्थित शे भूल ' रजसे मिलकर वह एक दिनमें ही झिद्छोसे लिपटे हुए दननकेन कलल भुत्या रूढत्वमाप्नुयात्‌ ॥२२॥ ` कललके रूपमे परिणत होकर कुछ कठिन-सा हो जाता तत्पुनः पञ्चरात्रेण बुद्बुदाकारतामियात्‌। ' दै॥२१॥ फिर पाँच रानिमें वह चुद्चुदाकार हो सप्तरात्रेण तदापि सांसपेशित्वमाप्लुयात : जाता है और सात रात्रि वीतनेपर मांसपेशीके समान तदपि त ॥२३॥ , (अण्डाकार ) हो जाता है ॥ २३ ॥ पनरह दिनके चिच्छायया सदा युक्तस्तप्तायःपेण्डवत्सदा । आत्मनो निविकारस्य मिथ्या तादात्म्यतः सदा । सगे ८] किष्किन्धाकाण्ड १९५ NNN PUNE साय pepe INNES ANALINGUS NAINA NNN कक क कलक क NAN DN पक्षमात्रेण सा पेशी रुधिरेण परिप्छुता। | भीतर उस पेशीमें रुधिर भर .जाता है और पच्चीस तस्या एवाइरोत्यत्तिः पश्चविंशञातिरात्रिषु ॥२७॥ | रातरिके- पश्चात्‌ उसमें अंकुर उत्पन्न होने लगते ॥ २४॥ एक मास हो जानेपर उसमें एक-एक ग्रीवा हिरअ स्कन्ध इशंशतयोदस्‌। | करके मशः ओवा, शिर, कसे रीढ़ दडी और पञ्चधाङ्कानि चकेकं जायन्ते मासतः क्रमात्‌ ॥२५॥ पेट ये पाँच अङ्ग उत्पन्न हो जाते है ॥ २५॥ फिर „ पएणिपादों तथा पा: कटिजोनु तथेव च। दो महानेमें क्रमशः हाथ, पाँव, पसिया, कमर और भासद्यात्मजायन्ते क्रमेणेव न चान्यथा ॥२६॥ | धुटने बन जाते हैं । इस क्रममें कभी ह पड़ता त्रिमिमोसेः प्रजायस्ते अङ्कानां सन्धयः क्रमात्‌। | 1२६ || इसी क्रमसे तीन भहीनेमें उसमें अह्ञोकी स्य सन्धियाँ तथा चार महीनेमें समस्त अङ्कियाँ उत्पन्न सवाहुल्यः अजायन्त कमान्मासचतुष्टय ॥२७॥ , ह जाती हैं ॥ २७॥ पाँच मास होनेपर नाक, कान नासा कणा च नेत्रे च जायन्ते पञ्चमासतः । और नेत्र बनते हैं तथा पाँचवे मासमें ही दन्तावली, दुन्तपह्किर्नखा गुह्यं पश्चमे जायते तथा ॥२८॥ नख और गुह्य खान भी उत्पन्न होते हैं ॥२८॥ छठे मासके आरम्भमें ही कानोंके छितर स्पष्ट हो जाते हैं तथा अचावपप्मासतरिहिद कर्णयोभवति स्फूमू । हि इसी समय गुदा, खी-पुरुपके भेदसे योनि अथवा लिंग . गादुप च नामेथापि अवन्छुगाय्‌ ॥२१)॥ हया नाभि उसन होते हैं ॥ २९ ॥ सातवें ममे . = पुत्रदारादिसम्तन्धं फोदिशः पशुवान्धवान्‌ ॥३४ सप्तमे मासि रोमाणि शिरः फेशास्तथंच च । रोम और शिरके केश प्रकट होते हैं तथा आठवे महीने- विभक्तावयवत्वं च सर्व सम्पद्यतेऽएमे॥३०॥। में सत्र अङ्गोपांग अखा-अळग स्पष्ट हो जाते हैं ॥३०॥ ने वर्धते गर्भः हिया एवं विहङ्गम "हे पहि प्रकार खीके गर्भाशयमें गर्म बढ़ता जठरं पथते गर्भ! (ख्या एवं विहडूम । पक्षिन ; इस प्रकार , १॥३१॥ है । जिस समय पाँचवाँ महीना होता है उसी समय पञ्चमे मास चतन्य जाप: मा उस जीवको चेतना-शक्ति प्राप्त हो जाती है ॥ ३१ ॥ गर्भ नाभियत्राल्परन्धंण मातृभुक्तानतारतः | स्मित पिण्ड अपनी नाभिमे छगे हुए नाळके द 6: A ९ ठिद्रसे प्राप्त माताके खाये हुए अनके रससे बढ़ता वर्षते गगः पिण्डोन त सकत हि और अपने कर्म-बहा मरता नहीं है ॥ २२॥ उस स्मृत्वा सर्वाणि अन्मावि पूर्वकसाि सर्वशः । समय अपने सम्पूर्ण पूर्व-जन्मोंका और कर्मोका ~ 68 स्मरण करके जठरानलसे सन्तप्त हुआ यह जीव इस- ऽना मत्रवीत्‌ t. लेठरानलतप्तोज्यामेद॑ बघेन र्र प्रकार कहता है--॥ २२ ॥ “पहले कई सहन नानायोतिसदसेु जायमानोडयुयूतयान्‌ । योनियोमे उत्पन्न होकर मैने करोड़ों वनधु-बान्धव, पशु- | घरीओर स्री-पुत्नादिके सम्बन्धका अनुभव किया है ॥३४॥ मुझ अभागेने उत्त समय खप्तमें भी भगवान्‌ विष्णुका न्याये पोषणमें कुडुम्यमरणासकत्या स्यायान्यायैर्धार्यनम्‌ । स्मरण नहीं किया; बस, अपने इम भरण जी न I SN आसक्त होकर न्याय अथवा अन्यायसे धन कमा कृतं नाकरवं विप्णुचिन्तां सम्नेऽपि दुभंग! ॥२५॥ | ढगा रहा ॥ ३०॥ अब उसका फछलरूप यह अति क क क { इदानीं तत्फरु शुख गर्भदुःखं महत्तरम्‌ । | महान्‌ गर्म-दुःख मोग रहा हूँ और इस नश्वर देशको न नित्य-सा समझकर इसकी तृष्णामें फसा हुआ हू ॥१६॥ अश्ाश्वते शाद्वतवदेढे दृष्णासमन्वितः ॥३६ | नदा अकार्य कर्म ही करता रहा, कमी अपना अकायाग्येव इतवान कृते हितमात्मनः । हित-साधन नहीं किया । अत अपने कमोनुसार मैं इत्येव बहुधा दुःखमनुभूय खकमतः ॥३७॥ | इसी. प्रकार, वहुत-से दुःख भोगता रहा ॥ १७॥ अब Re १९६ अध्यात्मरामायणं [सम्‌ ८ rT या ्फ्णआाारणण-«००- ० 2 त +तपिलीयनर री मर य (अर जराभ पहल अीकन ९#न मिमी +बैड ०5० क re wd re तवाहमद्य िकमक्याम्याकनयालकण्यान्याच्यान भटक कट कदा निष्क्रमण मे साहमोन्रिस्ससालिभात्‌ू।... इत ऊर्ध्व नित्यमहं विष्णुमेवानुपूजये |३८॥ इत्यादि चिन्तयन्‌ जीवों योनियस्त्रअपीडितः । | त्रावमानो$तिदुःखेन नरकात्यातकी यथा ॥३९॥ [तित्रणान्निपतितः कृमिरेष इवापरः | [तो बाल्यादिदुःखानि सर्व एवं विभुज्ञते (४० जया चेवाडुभूतानि सर्वत्र विदितानिच | र वर्णितानि मे ग्रश्न यौवनादिषु सर्वतः ॥४१॥ ` वं देहोऽहमित्यसादस्यासान्निरयादिकस्‌। सवासादिदुःखाति भवन्त्याभिनिवेशतः ॥४२॥ स्मादेहइयादन्यमात्मानं प्रकृतेः परम्‌ । शास्वा देदादिसमतां त्यक्त्वात्सज्ञानवान्‌ भवेत ४२. ग्रदादिविनि्ुक्तं सत्यज्ञानादिलक्षणस्‌। | दं बुद्धं सदा शात्तमात्मानमतघारयेद्‌ ॥४४।। चेदात्मनि परिज्ञाते नरे मोहेऽ्हसम्भवे । (हः पततु त्राऽर्धकमेवेगेन तिष्ठतु ॥8५॥ गोमिनो चहि दुःखं वा सुखं घाऽहञानसम्भवस्‌। . स्मादेहेन सहितो यावत्म्ारव्घसङ्कयः ॥४९॥ पवत्ति सुखेन त्वं धृतकड्युकसर्पवद । | गन्यद्वक्ष्यासि ते पश्चिन्‌ भणु मे परमं हितम्‌॥४७॥ ` [तायुगे दाशरथिर्भूत्वा नारायणोऽव्ययः | णस्य वधार्थाय दण्डकानागमिष्यति 11४८] पीतया भार्यया साधं रक्ष्मणेन समन्बरितत। त्रासे जनकजां भ्रावृभ्यां रहिते बने ॥४९॥ | वणरतरन्नीत्वा लङ्कायां खापयिष्यति। i i उसा सुग्रीवनिर्देशाद्वानराः परिमार्गणे ॥५०॥ ' {~ =: निकळेंना ' न जाने इत नरकतुल्य गर्मसे मं कव निकळ्ना | फिर तो मैं सर्वदा श्रीविष्णुमगवान्‌की ही उपासना करूँगा” ॥ ३८ ॥ ऐसी ही चिन्ता करते-करत वह जीव योनियन्त्रसे पीडित होता हुआ अति कएसे जन्म लेता है, जैसे कोई पापी जीव नरकसे निकता हो ॥ ३९ || उस समय वह दुर्गन्धित त्रण (घाव से गिरे हुए एक कीडेके समान होता है । फिर जी वाल्यादि अवस्थाओके छेश भोगने पडते दे । इस प्रकार सभी देहधारियाक ये कट उठाने पडते हे ॥९०॥ किया ॥ ४१ ॥ इस प्रकार में देह ह उत्पन्न हुए देहामिमानके कारण जीवको नरक और गर्भवास आदि अनेक दुःख उठाने पडते हैं ॥ ४२ ॥ अतः मनुप्यको चाहिये कि अपने आत्माको प्रकृतित र ०. ७८ प्रकार के > शर्गरांसे पृथक अतीत तथा स्थूल-सून्म दोनों प्रकारके दारारोते पृथक्‌ जानकर देहादिकी नमता छोइकर आत्मज्ञानसम्पत्न हो ॥ ४३ ॥ आत्माको स्वेदा जाग्रत्‌ आदि अवस्थाओं- pe रहित सत-त्रित ख्रूप तथा छु > बद्ध मर आन्त टन स राहत, सउ चतूचल्प तथा सुद्ध, बुद्ध आर झान्त- रूप जाने ॥ ४४॥ चेतनखरूप आत्माका ज्ञान हो रहे अथवा जाय योंगीको किसी प्रकारका अज्ञान-जन्य सुख-दुःख ' नहीं होता । हु “अततः जवतक तेरा प्रारव्ध क्षय न हो तत्रतक काँचुळीसहित सर्पेके समान आनन्दपूर्वक देह धारण करके रह । इसके अतिरिक्त हे पक्षिन्‌ ! तेरे परम हितकी एक वात और वतछाता हूँ, सुन ॥ २५-७७॥ त्रेतायुगमे अविनाशी नारायगदेव महाराज ददारयके यहाँ अवतार लेकर रावणका वध करनेक्रे लिये अपनी भार्या सीता ओर भाई लक्ष्मणके सहित दण्डकारण्बरमें आयेंगे ॥ ४८ ॥ बहा दोलां भाइयोंके तपोवनसे चळे जानेपर रावण आऔजानकाजी- को सूने आश्रमसे चोरके समान ले जाकर ल्कामें रखेगा । तदनन्तर वानरराज सुग्रीवकी आज्ञासे उन्हें खोजते हुए कुछ वानरगण समुद्रतटपर आयेंगे, वहाँ रब दि सग बाका १९७ 1९ ] | किष्किन्धाकाण्ड १९७ आगामप्यान्त जलधेसीर तत्र समागमः | किसी कारण-बिरोषसे तेरे साथ उनका समागम होगा--- तया तः कारणवणाद्भपिष्यति न सशयः ॥५१॥ | इसमें सन्देह नहीं॥ ४९-५१ ॥ तव तू उन्हें सीताजी- वदा सीताखिति तेभ्यः कथयख यथार्थतः का ठीक-ठीक पता वतला देना | बस, उसी तदन तथ पक्षा हाइुत्पत्स्येते पुननवो ॥५२॥ | समय तेरे फिर नये पंख उत्पन्न हो जायेंगे” || ५२ ॥ 1 तम्पातित्वाच सम्पाति चोला-हे वानरेश्वरगण ! इस प्रकार मुझे * जोधयामास मां चन्द्रनामा मुनिकुलेश्रः | चन्द्र नामक मुनीश्वरने समझाया । ( इससे मैं शान्त पञ्यन्तु पक्षा में जातो नृतनावतिकोमलों ॥५३॥ ह इल - अति | ्रतीक्षामे रहने ल्गा । ) देखिये सरित वोऽस्तु गमिष्यामि सीतान्द्रक्षयथ निश्यमर] , ^ १९ ऽ अति कोमळ नवीन पंख निकळ आये हैं || ५३ ॥ आपलोगोंका कल्याण हो, अब मैं जाना यल कुरुध्ये दुलेश्ध्यस ५ ह, कं र तं कुरुध्य॑ दु्लध्यसप़ुद्रस्प विलङ्घने ड्घने ॥५४॥ चाहता हुँ । इसमें सन्देह नहीं आपलोग सीताजीको १७७४७०७४ एक अवइय देखेंगे। केवल इस दुर्लढष्य समुद्रके कः ससारवारानाथ लॉधनेका प्रयत्न कीजिये ॥ ५४ ॥ हे वानरगण ! जिनके तोत्वां गच्छति दृजनोऽपि परमं नामके स्मरणमात्रसे वड़े हुएजन भी इस अपार बप्णाः पद शाश्वतम्‌ | संसार-सागरको पार करके भगवान्‌ विष्णुके सनातन तस्यव खितिकारिणस्रिजगतां परमपदको प्राप्त कर छेते हैं, आपळोग तो, त्रिलेकी- रामस्य भक्ताः प्रिया की खिति करनेवाले उन्हो भगवान्‌ रामके प्रिय भूयं किं न समुद्रमात्रतरणे , भक्तगण हैं | फिर इस क्षुद्र समुद्रमात्रको पार करनेमें शक्ताः कथ वानराः॥।५५॥ | आप क्यों समर्थ न होंगे १ ॥५५॥| ब्रा उति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंत्रादे क्रिप्किन्वाकाण्डे अष्टमः सगः ॥ ८ ॥ हन र नवस्‌ सम्‌ समुद्रोलङ्घनकी मन्त्रणा | श्रीमहादेव उवाच ध्रीमहादेवजी वोळे-हे पार्वति | गृध्रराज सम्पाति- ने विहायसा ग्रथराजे बानरपद्नवाः के आकाडा-मार्गसे चले जानेपर सीताजीके दर्शनोंके जीते विद्वायसा ग्रश्नराजे वादरङ्गः लिये अति उत्कण्ठित वानरगण (उनका पता लग जानेके हषण महतीऽञवाः सीताददानलालसाः HN कारण) अत्यन्त हर्षित हुए ॥ १॥ किन्तु जब उन्होने ऊच; सङ्ग पद्यन्तो नक्रचक्रभयङ्करस । नाकों और भवर आदिके कारण अत्यन्त भयङ्कर, उत्ताळ कड बडदे वाया न स्प, दरंगसे उठते हुए तथा आकाशके समान दुर्ळड्य तरबादिमिरुत्रद्ठमाकाशमित्र मू २ ॥ | समुद्की ओर देखा तो वे आपसमें कहने लगे कि परस्परमयोचन्त कथमेनं तरामहे । | हम इसे किस प्रकार पार कर सकेंगे। तब अंगदजीने कहा--“हे वानरश्रेष्ठणण ! झुनिये--1॥ २-३ ॥ उवाच चाहुदरत्र शुणुध्च वानरोत्तमा।॥ ३॥ | आपलोग समी अत्यन्त बलवान, श्रबीर और पराक्रमी भवन्तोऽत्यन्तत्रिनः श्रा कृतविक्रमाः | हैं | अतः आपमेंसे ऐसा कोन है जो समुद्र लाँवकर पाका अ हि १९८ य I FI Id TNA क्क्य्ण््कभातक वी को वामत्र वारिधिं तीत्वा राजकार्य करिष्यति॥४॥ एतेपां चानराणां स प्राणदाता न संशयः । तहुच्तिष्ठतु मे शीघ्रं पुरतो यो मद्दावलः ॥ ५ | वानराणां च सर्वेपां रामसुग्रीवयोरपि । स एव पालको भरूयान्नात्र काया विचारणा ॥ ६ ॥ इत्युक्ते युवराज्ञेन तूण्णीं वानरसानेकाः । ee 4: आसन्नो! किश्विदपि परस्परविलोकिनः अङ्गद उवाच उच्यतां वै बलं सर्वे! प्रत्येक कार्यसिद्धये । केन वा साध्यते कार्य जानीमस्तदनन्तरम्‌ ॥ ८ ॥ अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा प्रोचुवीरा बलं एथक्‌ । योजनानां दशारभ्य दशोत्तरशुणं जशुः॥ ९॥ Tne 1७॥ शतादर्वाग्जाम्बबांस्तु प्राह मध्ये वनोकसाम्‌। पुरा त्रिविक्रमे देवे पादं भूमानरक्षणम्‌॥१०॥ त्रिःसप्तकृत्वोव्हमगां प्रदक्षिणविधानतः | इदानीं वाधकग्रस्तो न शक्कोसि बिरूङ्गितुम्‌॥११॥ अङ्गदोऽप्याह मे गन्तुं शक्यं पारं महोदधेः । पुनरुष्ठनसामर्थ्यं न जानास्पस्ति चा न वा ॥१२। तमाह जास्ववान्वीरस्त्वं राजा नो नियामकः । योक्तु __ स्‌ [कप च युक्तं त्वां नि त्वं समर्थोऽसि यद्यपि। १ ३॥ जङ्ग उवाच एवं चेतूर्ववत्सरवे स्मप्स्यामो दर्भविष्टरे । केनापि न कृतं कार्य जीवितुं च न शक्यते ॥ १४) तमाह जास्ववान्वीरो दशेयिष्यामि ते सुत । येनासाकं कायसिद्भिभेविष्यत्यचिरेण च ॥ १५) अध्यात्मरामायण TT ANNU लीली ४४४१४ Dn? IY १४१४४४ [सर्ग ९ ह (टी ANNIE S SUNT 1 राजकार्यं सम्पन्न करे ॥ ४ ॥ वह निःसन्देह इन समस्त वानरोंको प्राण-दान करनेवाला होगा | अत जो महावळ्यान बौर ऐसा हो वह शीघ्र ही मेरे सामन आवे ॥ ५ || इसमें कोई सन्देह नहीं, बही सम्पूण वानरोंकी, सुग्रीबकी और खथ भगवान्‌ रामकी भं रक्षा करनेवाला होगा” ॥ ६ युवराज अंगदके इस प्रकार कहनेपर समा वानर सेनापति चुपचाप वैठे रहे, किसीके मुखमे णक शब्द भ॑ न निकला, परस्पर एक-दृसगका सुख ताकते रह गय ।७। अंगद बोले--अच्छा, इस कायको सिद्ध करनेके लिये सत्र लोग अपना झाक्तिका वणेन करो | तत्र इस चातः का पता चळ जायगा कि इसे कोन साध सकेगा ॥८। अंगदजीकी यह वात सुनकर सत्र वानर-वीर प्रथक्‌ पृथक्‌ अपना वळ बतळाने लगे । उनमेंसे एक-एकरे दश योजनसे लेकर क्रमश -ददा-दशा योजन अधित जानतकका अपना सामश्यं बतायी ॥ ९ ॥ अन्तम उन सव वनचरोंमंसे जाम्वबानने अपनी शक्ति सां योजन के मीतरतक जानेकी वतायी । वे बोळि--“पु्ेकाळमं जर भगवानूने त्रिविक्रम अवतार लिया था तो में, उनके पृथिबीके बरावर परिमाणबाळे चरणके चारों ओर परिक्रमा करनेके लिये, इक्कीस वार फिरा था । किन्त अब मुझे वृद्धावस्थाने दवा लिया हे इसलिये में समुद्रक नहीं ठाँध सकता” ॥ १०-११ ॥ अंगदजीने भी कहा--“में इस महासागरके पार ते जा सकता हूँ, किन्तु फिर लोटनेकी सामर्थ्य है या नहं यह नहीं जानता” || १२ ॥ तव वीरवर जाम्बबानर उनसे कहा--“अंगदजी ! इस कार्यक्र यद्यपि आप सर्वथा समर्थ हैं तथापि आपको इर कार्यमे नियुक्त करना हमें ठीक नहीं जँचता, क्योंतरि आप हमारे नायक ओर नियामक हैं” | १३ ॥ अंगद बोळे--“यदि ऐसी वात है, तो हम सवक = करच ' (प्रायोपवेशनका संकल्प करके) फिर पूर्ववत्‌ कुशासनों पर ही पड़ रहना चाहिये; क्यों कि यह काम तो किसारे | हुआ नहीं, फिर जीवन भौ कैसे रह सकता है ?” ॥ १ ४। तव वीरवर जाम्बबानने कहा--'वेटा ! जिसवे हाथसे हमारा यह कार्य बहुत शीघ्र ही सिद्ध होग्‌ उस वीरको मैं तुझे दिखलाता हूँ” ॥ १५॥ णा र | ~ ¢ ८. ८५ सग ९ किष्किन्धाकाण्ड १९९ IIR TRI TETTI TT T TS OR TT YVR NPR इत्युक्त्वा जाम्ववान्प्राह इनूमन्तमवस्थितस्‌। | ॐ कहकर जाम्बवानूने वहाँ बैठे इए हनूमानजी- 2०2 ~ --- ! ण हनसस्कि रहस्तूष्णी सीयते कार्यगौरव ॥१६॥ हदें हवन! इस महान्‌ कार्यके उपखित Oe । दोनेपर आप इस प्रकार अनजानके समान चुपचाप म्रापऽश्ञनच सामथ्यं दशयाद्य महाबळ | '। एकान्तमें क्यों बैठे हैं ! हे महावीर | आप साक्षात्‌ | साकाडायुतनयो वाञुतुल्यपराक्रमः ॥१७॥। | वदेगक पुत्र हैं ओर उन्हीके समान परानमी हैं शी TP । अतः आज अपनी सामथ्य दिखळाइये || १६-१७॥ !एमकायाथिमेव तं जनितोऽसि महात्मना । | महात्मा वायुने राम-कार्यके लिये ही आपको उत्पन्न किया जातमात्रेण ते पूर्व इष्टोद्यन्त विभावसुम्‌ ॥१८॥ | दै । जिस समय आपका जन्म हुआ था उसी समय आप ल. $3 ५» । सूयको उदय हुआ देखकर 'इस पके फलको लेना चाहिये! पक्क फं निवृक्षामीत्युरुडुत बाठचेश्या । | इस इच्छासे बाललीलासे ही पैंच:सी योजन ऊँचे योजनानां पश्चश्षतं पतितोऽसि ततो स्वि ॥१९॥ ¦ उछलकर प्रथिवीपर गिरे थे ॥ १८-१९॥ अतः, ५ नल ' ऐसा कौन है जो आपके बळका माहात्म्य वर्णन कर स्त्वद्गल्माहात्र ~ अत्स्त्वद्वगलस य का वा शक्गाति वाभतुस्‌। | सके । हे ुन्रत ! आप खड़े हो जाइये और थह राम- उत्तिष्ठ कुरु रामस्य कार्य नः पाहि सुब्रत ॥२०॥ कार्यं करके हम सबकी रक्षा कीजिये” ॥ २० || ha 4 4 Lox | दट श्रुत्वा जाम्बवता वाक्य हृनूसानांतेहापेत! । ¦ जाम्बबानूके ये वचन सुनकर हृनूमानजी अति प्रसन्न ‘~ ५ ८ ' हुए और उन्होंने समस्त ब्रह्माण्डको मानो कम्पायमान चकार नाद [सहस्य ब्रह्माण्ड स्फाटयान्वव ॥२९॥ जेवि दावर याष ॥२१ करते हुए घोर सिंहनाद किया॥२१॥ दूसरे त्रिविक्रम ' बभूव पर्यताकारख्तिविक्रम इवापरः। ' भगवानके समान वे पर्वताकार हो गये, (और कहने उङ्कयित्वा जलानिधि कृत्वा लड्ढां च मससात्‌1२२॥ ठे) “दे बानरो ! मैं ससुद्वको लँधकर ल॑काको , _ व | भस्म कर डाळूंगा और रावणको उसके कुछसहित रावण सकुल हत्वा55नेष्ये जनकनान्दनीम्‌ । , मारकर श्रीजानकीजीको ले आऊँगा; अथवा कहो तो, यद्वा बच्चा गले रज्ज्वा रावणं वामपाणिना ॥२३॥। रावणके गळेमें रस्सी डालकर और छंकाको त्रिकूट- पुर्वतसहित बायें हाथपर उठाकर भगवान्‌ रामके आगे क 6७ ™ लड्ढां सपयतां एत्वा रामस्याग्रे क्षिपाम्यहम्‌ । ' छे जाकर डाळ हूँ, या केवळ झुभळक्षणा जानकीजीको यद्वा इृष्टेब यास्यामि जानकी शुभलक्षणाम्‌ ॥२४॥। ¦ देखकर ही चछा आऊँ” ॥ २२-२४॥ श्रुत्वा हनुमतो वाकयं जाम्भवानिदम्रवीत्‌ | : दयसानजीके ये वचन छुनकर जाम्बवानूने कहा-- > ५७ ह श॒भागारणा। | है वीर | तुम्हारा शुभ हो, तुम केवर झुभळक्षणा 'दषट्वागच्छ भद्र ते जावन्ता जानकी शुनाम्‌ , जानकीजीको जीती-जागती देखकर ही चले || पश्नाद्रामेण सहितो दर्शगिष्यासि पौरुषमू। | आओ ॥२५॥ फिर रामचन्हजीके साथ जाकर ९ कल्याण ते चि दिखळाना । हे भद्र ! आकाइमागसे एणं भवताक्वद्र गच्छतस्ते विह्ायसा ॥२६॥ ना ऽशाः न हक जाते हुए तुम्हारा कल्याण हो ॥ २६ ॥ रामकार्यके | न्ः् पे ' शीवीदोसे अभिनन्दन करते हुए इत्याश्ीमिःसमामन्त्य विसृष्टः प्लवगाविंपे२७| शस प्रकार आ न गो कं वानर-यूथपोके विदा करनेपर हनुमानजी महेन्डपर्वतके महेन्दराद्रिक्षिरो गत्वा बभूवाद्भुतदर्शनः ।॥२८॥! | शिखरपर चढ़ गये । वहाँ उन्होंने अ्ठतरूप ' धारण 2१ व्हा हि पक री , [ ३०० अध्यात्मरामायण [सम ९ none ISSIR ISO ाानयमयनवामताा्न्छन्कशस्य वनकर ककत जज 5 < < य्य : 1 &श ४४ का का कान महानगेन्द्रप्रतिमो महात्मा किया ॥ २७-२८ ॥ उस समय समख प्राणियों | वायुपुत्र महात्मा हृनमानजा महान प्रवतराजक तुवर्णवर्णोडरुणचार्ववत्रः । ` सो पाइए महातमा हनुसानाजा मह ह | समान विशालकाय, सुवणबणे अरुण (वाल्सूवं) के महाफणीन्द्रामसुदी धेबाहु- ! समान मनोहर मुखवाळे और महान, सर्पराजके समान वातात्मजोऽदृश्यत स्वेभूते! ॥२९॥ , दीघ मुजाओंवाळे दिखायी देने ळग || २५० | । मा 72“ 4० sgt इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किण्किन्धाकाण्डे नवमः सर्गः | ९ ॥ समाप्तमिदं किष्किन्धाकाण्डम्‌ प्र |॥७४॥॥ रच ७५५७५ 2 DE च च F | BICEP =F RNRENMNRERCS 5 . - भ १० ७३ रा re = = Se sf क भा की “आ हो “fe ह = Sak CANE sr br श्रीसीतारासाभ्यां नमः अध्यात्मरामायण --+-“० 58 -#9------ -+**४%ह/१०----- प्राणान्दघे प्राणमयं प्रभु तं श्रीजानकीजीवनमानतोइस्मि ॥ यद्वधाननिर्धूतवियोगवहिविंदेहबाळा विदबयुधारिवन्याम्‌ । i ` भ EASINESS, 0 EP ANE DCDCDC DDD DCDCDC 072 uw र्श्ि खख ९३ धर 0 0850 eg ९६७ kx कू 0s 0२७ 0 0२५७ 0२9 १8७० CORR as i NT TURN RRR RR ततः सीतां नमस्कृत्य हनूमानत्रवीडचः | आज्ञापयतु मां देवि भवती रामसच्निधिम्‌॥ अध्यात्मरासायण सुन्द्र्काण्डुः ग्रथम सगं इच्मानजीका समुद्रोलद्रन और छंका-परवेशा। श्रीमहादेव उवाच | शतयोजनबिस्तीर्ण समुद्र मकरालयम्‌ । लिलङ्घयिपुरानन्दसन्दोहो मारुतात्मजः ॥ १॥ घ्यात्वा रामं परारमानमिद्‌ बचनमत्रवीत्‌ । पर्यन्तु वानराः सर्वे गच्छन्तं मां विहायसा॥२॥ अमोघं रामनिमुक्त॑ महाबाणमिबाखिलाः । पञ्याम्थद्येव रामस्य पत्ती जनकनन्दिनीम्‌ | ३ ॥ | कृतार्थाऽहं कृतार्थोऽहं पुनः पश्यामि राघवम्‌ । प्राणप्रयाणसमये यस्य नाम सक्ृत्स्मरन्‌ || ४ ॥ नरस्तीत्वा भवाम्भोधिमपारं याति तत्पदम्‌ । किं पुनस्तस्य दूतोऽहं तदज्वाजुलियुद्रिकः ॥५॥ तमेव हृदये ध्यात्वा लट्ठयाम्यल्पवारिधिम्‌ । इत्युक्त्वा हनुमान्वाहू प्रसा्यायतवारूधिः ॥ ६ ॥ 'क्रजुग्रीबोर्ध्वदृष्टिः सन्नाकुश्वितपदद्दयः । दक्षिणामिद्चुसस्तूर्णं पुप्डवेडनिलविक्रमः ॥ ७॥ आकाशाचरितं देवेबीक्ष्यमाणो जगाम स! । दष्राऽनिलसुतं' देवा गच्छन्तं वाञ्ुवेगतः ॥ ८॥ परीक्षणार्थं सत्यस्य वानरस्पेद्मब्रुवन्‌ । गच्छत्येष महासच्वो चानरो वायुविक्रमः॥ ९ ॥ श्रीमहादेवजी वोले-हे पार्वति ! आनन्दघन : श्रीहनुमानजी सो योजनतक फैले हुए और मकरादि दुष्ट जळ-जन्तुओंसे पूर्ण समुद्रको झॉधनेके लिये उद्यत हो परमात्मा रामका स्मरण कर इस प्रकार वोठे---“हे वानरगण | तुम सब इस ओर देखो । मैं भगवान्‌ रामके छोड़े हुए अमोघ वाणके समान . आकाश-मागसे जाता हूँ | मैं आज ही रामप्रिया : जनकनन्दिनी श्रीसीताजीको देख्‌ँगा ॥ १-३॥ निश्चय ही, अब मैं कृतकार्यं होकर ही पुनः श्रीरघुनाथजीका दर्शन करूँगा । प्राण-प्रयाणके समय जिनके नामका एक वार स्मरण करनेसे ही मनुष्य अपार संसार-सागरको ग कर उनके परमधामको चला जाता है, फिर मैं उन्हींका दूत उनके अवयव- रूप अँगुलीकी अंगूठी लिये हुए अपने हृदयमें उन्ही- का ध्यान करता हुआ इस तुच्छ समुद्रको लाँच जाऊं तो इसमें कौन बड़ी बात है!” ऐसा कह श्रीहनुमानूजीने अपनी बाँहें फेलायी और पूछको सीधा किया तथा तुरन्त ही गरदनको सीधा एवं ष्टिको ऊपरकी ओर कर पाँव सिकोड़ लिये और दक्षिणकी ओर मुख करके बायु- वेगसे उड़ान छगायी ॥ 9-७ ॥ उस समय वे देवताओंके देखते-देखते आकाश- मार्गसे बड़े तीब्र वेगसे जा रहे थे । पवनपुत्र हतुमानजीको इस प्रकार वायु-वेगसे जाते देख देवताओंने उनकी सामर्थ्यकी परीक्षाके लिये आपसमें इस प्रकार कहा--“यह मह्ाशक्तिशाळी वानर वायुके समान तीव्र वेगसे जा रहा है ॥ ८-९ || किन्तु पता अध्यात्मरामायण ' [ सगे १ स घुस. सकेगा या नहीं | अतः इसके पम? नहीं यह छंकामें घुस सकेगा या नहीं । अतः इसके लङ्का प्रवेष्ठ शक्तो वा न वा जानीमई बलम्‌ । नही यह हा चाहिये” ह विचार, एवं विचार्य नागानां मातरं सुरसाभिधाम्‌॥११ | द उन्होंने कुवढळ्वश नागमाता सुरसासे कहा-- अ्नवीददवतावन्दः कोतूहरुसमन्वितः । “वुरसे | तुम अभी जाकर इस बानरश्रेष्ठके मार्गमे कु गच्छ लव वातरेन्द्रस्य किश्विद्धिम समाचर ॥ १ १॥ | विश खड़ा करो और इसकी बल-बुद्धिका पता छगाकर ; बुद्धि पुनरेहि त्वरानि तुरन्त छोट आओ |” देवताअंकि इस प्रकार कहनपर ज्ञात्वा तस्य बलं बुद्धि पुनरेहि त्वरान्विता । | तुरन्त ही हजुमानजीको विज्ञ उपस्थित करने त्युक्ता सा ययौ शीधं हतुमद्विध्वकारणात्‌ ॥ १ २॥ | हये गयी ॥१०-१२॥ बह उनके गार्गका सामनेस रोक आवृत्य मार्ग पुरतः स्थित्वा वानरमत्रवीत्‌ । कर खड़ी हो गयी और बोडी--“हे महामते ! आओ, Oe र ही मेरे सुखमें प्रवेश करो; म भूखसे अत्यन्त रे शस्व महामते ॥१३॥ ९" नि रा एदि म वदन दाण गत हि व्याकुळ थी, अतः देवताओंनि तुम्ह मरा भक्ष्य बनाया देवैस्त्वं कल्पितो मक्ष्यः क्षुधासम्पीडितात्मनः। | है |” तब हनुमान्‌जने उससे कदा--हि मातः ! तामाह हलुमान्मातरहं रामस्य शासनात्‌ ॥१४।। | मैं श्रीरामचन्द्रजाकी आज्ञास जानकाजीकों देखनेके मु - लिये जा रहा हुँ । वहाँ से शत्र हो ठोटकर श्रीरध- षटु पुनरागम्य सत्वर! । i ड गच्छामि जानको र्ड पुनराग i नायजीको उनका कुशल-समाचार सुनाकर फिर में रामाय कुशलं तस्या! कथयित्वा त्वदाननम्‌॥ १५॥| तरे मुले प्रवेश करूँगा । हे सुरसे ! मे तुझे प्रणाम निवेक्ष्ये देहि मे मार्ग सुरसायै नमोऽस्तु ते। | करता हुँ, त मेरा मार्ग छोड दे ।” इसपर सुरसाने फिर कहा--“मुझे बडी भूख लगी है । अतः एक धितास्म्यहस्‌ ।। १६॥। A LY ह. र * * त्युक्त पुनरेवाह सुरसा क्षुधितास्म्यहम्‌ ॥१६ वार मेरे मुख प्रवेश करके फिर चछे जाना, नहीं प्रविष्य गच्छ मे बकन नो चेत्त्वां भक्षयाम्यहम्‌ । | तो मैं तुम्हें खा जाऊँगी |” तव हनुमानजीने कहा इत्युक्तो हचुमानाह सुखं शीघ्र विदारय ॥१७॥ | अच्छा तो शीघ्र ही अपना मुख खोल । में अभी तेरे है ५ र र मुखम घुसकर तुरन्त ही लंकाकों चछा जाऊँगा ।” ऐसा प्रविश्य वदनं तेऽ यच्छामि त्वरयान्वितः | | कह हनुमानजी अपना शरीर एक योजन लम्ता- इत्युक्त्वा योजनायामदेहो भूत्वा पुरः स्थितः ।१८। चौड़ा बनाकर सामने खडे हो गये ॥ १३-१८ ॥ २०४ दृष्टा हनूमतो रूपं सुरसा पञ्चयोजनम्‌ । हनुमानूजीका वह रूप देखकर सुरसाने अपना , कि सुख पाँच योजन फेलाया; तब हनुमान्‌जीने अपना सुख चकार हनुमान्‌ दिशुण रूपमादथत्‌ ॥१९॥ | श्र उससे दूना कर लिया॥ १९॥ फिर सुरसाने ततश्चकार सुरसा योजनानां च विंशतिम्‌ । अपना मुख बीस योजन किया तो हनुमानूजीने अपना , ।सिशययोजनसम्मित देह तीस योजनका कर लिया ॥ २० ॥ इसपर जब वक्त्र चकार हुमा 201 01. हुनु म्‌॥२०॥ | रसाने अपना सुख पचास योजन कैलाया तो ततथकार सुरसा पश्चाशद्योजनायतम्‌ । हनुमानजी अंगूठेके समान छोटे-से आकारके हो गये वक्त्रं तदा हनमांस्तु वभूवाङ्गछसन्निमः ॥२१॥ और चट उसके सुखम जाकर बाहर निकल आये तथा रचि , , S ~ उसके सामने खडे होकर बोले---“हे देवि | में तुम्हारे ्रविशय बदन तस्याः पुनरेत्य पुरः स्थितः । | मुखमें जाकर फिर निकळ आया हूँ, अब तुम्हें नमस्कार च अविशे निर्गतोऽहं ते वद्नं देवि ते नमः ॥२२॥ क ॥ २१-२२ ॥ हलुमानजीको इस प्रकार कहते ५ ख सुरसा बोली--"हे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ | जाओ, चद्न्तं दृष्टा मन्तम्‌ | एव वदन्त दृष्टा सा दनसन्तमथाजवीद्‌ । श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सिद्ध करो । हे वानर ! देवता- . _गच्छ साधय रामस्य कार्य घुद्धिमतां वर ॥२३॥,| लोग तुम्हारा बल जानना चाहते थे अतः उन्हींने मुझे सर्ग १ ५१११-९१ ११४१-८५ ५» सुन्दरकाण्ड. . २०५ इत्युकर्वा सा ययौ देवलोक वायुसुतः पुनः । जगाम वायुमार्गेण गरुत्मानिब पक्षिराद्‌॥२५॥ हू शो ऽप्याह मेनाकं गच्छत्येप महासत्वो हनूमान्मारुतात्मजः ॥२६॥ रामस्य कार्यसिद्धर्थ तस्य रवर सचिवो भव । ' सणरेव्धितो यस्मात्ुराऽहं सागरोऽमवस्‌ 11२७ तस्यान्वये बभूवासौ रामो दाशरथिः प्रथुः । तस्य कार्यार्थसिद्धथर्थं गच्छत्येप महाकपिः॥२८॥ त्वमुत्तिष्ठ जलातूणे त्वयि विश्रम्य गच्छतु । स॒ तथेति ग्रादुरभूज्जलमध्यान्महोन्नतः ॥२९॥ नानामणिमयैः शृङगेस्तस्योपरि नराकृतिः । ~ ग्राह यान्तं हनूमन्त मेनाकोऽहं महाकपे ॥३०॥ समुद्रेण समादिष्टस्त्वद्विभामाय मारुते । सागच्छाएतकर्पानि जग्ध्वा पक्वफलानि में ॥३ १॥ ८ ६७ ४७० २७९०७ ८ ६० MNS USN ५ ८ ३/७.०९७ ७७७७७७७९४९ ७१७७७ देवैः सम्म्रेपिताऽहं ते बलं जिज्ञासुभिः कपे । दृष्टा सीतां पुनगेत्वा रामं द्रक्ष्यसि गच्छ भो)।२४॥ NN तुम्हारे पास भेजा था । मुझे निश्चय है कि तुम सीताजीको देखकर फिर शीघ्र ही रघुनाथजीसे मिळोगे। अब तुम जाओ” ॥ २३-२४ ॥ ऐसा, कहकर सुरसा देवलोकको चली गयी और श्रीहनुमानूजी फिर आकाश-मार्गसे पक्षिराज गरुड्के समान चलने लगे ॥ २५॥ इसी समय समुद्रने भी सुवर्ण और मणियोंसे युक्त मैनाक पर्षतसे कहा-- “देखो, ये महाशक्तिशाली पवनपुत्र हनुमानजी राम- कार्यके लिये जा रहे हैं; तुम उनकी सहायता करो । पू्वकालमें मुझे सगर-पुत्रोंने बढ़ाया था. इसीसे मैं सागर कहलाता हुँ ॥ २६-२७ ॥ ये दशरथनन्दन भगवान्‌ राम उन्हींके बंशमें प्रकट हुए हैं और ये कपिराज उन्हींका कार्य सिद्ध करगेके लिये जा रहे हैं ॥ २८॥ तुम तुरन्त ही जळसे उपर उठ जाओ, जिससे ये तुम्हारे उपर कुछ देर विश्राम लेकर आगे जायँ ।” तब मैनाक पर्वत “बहुत अच्छा' कह तुरन्त अपने अनेक मणिमय शिखरोंसे पानीसे ऊपर बहुत ऊँचा निकळ आया | और उन #ंगोंके उपर मलुष्याकारसे स्थित होकर उसने जाते हुए हतुमानूजीसे कहा--“हे महाकपे ! मैं मैनाक हूँ । हे मारुते ! ! समुद्दने मुझे तुम्हे . विश्राम देनेके लिये आज्ञा दी है । आओ, मेरे.ये अमृत-तुल्य फळ खाओ ॥ २९-३१ ॥ कुछ देर यहाँ मणिकाश्चनपर्षतम्‌ । विश्रम्यात्र क्षणं पश्नाद्वमिण्यसि यथासुखम्‌ । विश्राम करके फिर आनन्दपूर्वक चले जाना |” एवमुक्तोञ्य तँ प्राह हनूमान्मारुतात्मजः ॥२२॥ इस प्रकार कहनेपर पवनपुत्र हनुमानजी गच्छतो रामकार्याय मक्षणं मे कथं भवेत्‌ । बोछे--॥ ३२ ॥ “राम-कार्यके छिये जाते" हुए मैं मोजनादि कैसे कर सकता हूँ?! और मुझे जल्दी ही जाना विश्रामो वा कर्थ में स्पाहन्तव्य त्वरित मया॥३२॥ है, अतः विश्रामका अवकाश भी कहाँ है!” ॥११॥ इत्युक्त्वा स्पृष्टशिखर! जरण ययो कपिः रे मानजी ( मैनाकका कराग्रेण ययो कपिः । ऐसा कह कपिश्रेष्ठ हनुमान न मान रखनेके लिये ) उसके शिखरक केवल अँगुलीसे किश्चिदरं गतस्यास्य छायां छायाग्रहोंड्यहीत्‌।३४। | छूकर आगे चळ दिये । वें कुछ ही आगे बढ़े थे कि ळ्‌ उनकी छायाको एक छायाग्रहने पकड लिया ॥ २४ ॥ सिंहिका नाम सा घोरा जलमध्ये स्थिता सदा । | बह सिंहिका नामकी एक घोर राक्षसी थी जो, आकाशमामिनां छायामाक्रम्याकृष्य भक्षयेत्‌ ।३५। हे सदा जळमें रहकर आकाशमें जाते हुए जीवोंकी छाया पकड़कर उन्हें खींच लेती थी और खा जाया करती तया गृहीतो हलुमांथिन्तयामास वीर्यबान| |" ॥ °) ॥ उससे पकडे जानेपर महापराक्रमी श्रीहुमान्‌जी सोचने लंगे--- यह ऐसा कोन विश्न- केनेदं मे कृतं वेगरोधन विघ्नकारिणा ॥३६॥ | कारक है जिसने मेरा बेग रोक लिया १ दिखायी अध्यात्मरामायण [ समै १ oro २०६ | च्यते नैव कोऽप्यत्र विस्मयो में रजायते । NA तो यहाँ कोई देता नहीं, इससे मुझे वड़ा आश्चर्य एवं विचिन्त्य हनूमानथो इष्ट प्रसारयत्‌ ॥२७ | चेक ओर की तो उन्हें वहाँ वडे विकराङ रूप और स्थूळ शरीरवाळी सिंहिका राक्षसी दिखायी दी। उसे सिंहिकां घोररूपिणीम्‌ । त्र इष्ट्वा महाकायां सिद स्‌ देखते ही वे तुरन्त जळमें कूद पड़े और वडे क्रोधे दक्षिणकी ओर चलने छ न्दक्षिणामिम्ुखों ययौ । | दउमाचजी फिर उछल्कर द उवरत्डत्य दड द k | और समुद्रे दक्षिण-्तटपर पहुँच गये, जहाँ नाना ततो दक्षिणमासाद्य कूळ नानाफलट्टुमय्‌ ॥ ३९ , प्रकारके फलवाले दक्ष लगे हुए थे ॥३ “और जो तर ~ ne तरहके पक्षियों आर मृगांसे पूण तया विविध भाँतिक्ी नानापश्षिसृगाकोर्ण नानाइुष्परताइतम्‌। पुप्पलताओंसे आइत था । वहाँ पहचकर उन्होंने ततो ददश नगरं त्रिकूटाचलमूर्धनि॥४०॥ | त्रिकूट पर्वतके शिखरपर बसी इई लंकापुरी देखी जो सव ओरसे अनेकों परकोटों ऑर खाइयाँसे ग्राकारेबहुनियुक्त पारेखाभिश्च सवतः । घिरी हुई थी। उसे देखकर वे सोचने लगे कि मुझे किस प्रकार इस नगरमें जाना चाहिये॥४०-४१॥ फिर निश्चय प्रवेकषयाधि कथ लक्लामिति चिन्तापरोऽगवत्‌॥४१॥ जिया कि में राजिके समय सूकम शरीर भारणकर इस रात्रा वेक्ष्यामि सूक्ष्मो$्ह॑ ङङ्कां रावणपालिताम्‌ | रावणप्रतिपालित लंकापराम प्रवंश करूगा । यह हे ब, विचारकर वें वहीं ठहर गये और फिर (रात्रि एव विचित्त्य तत्व खित्वा ठका जगास सः २।। होनेपर ) लंकाकी ओर चले ॥ ४२ ॥ शृत्वा दक्ष्मं वपृद्वारं प्रविवेश प्रतापवान्‌ । जिस समय महाप्रतापी ्रीहनुमानजाने सूक्ष्म शरीर * घारण कर नगरके द्वारमें प्रवेश किया उस समय वहाँ तत्र उङ्कापुरी साक्षादराक्षसावेपथारिणी ॥४२॥ साक्षात्‌ लंकापुरी राक्षसीका रूप धारण किये खड़ी थी विशन्तं हनूमन्तं दृष्टा लङ्का व्यतर्जयत्‌ । ।|॥ ४३॥ उसने हङुमान्‌जीको नगरमे जाते देख डाँटा और पूछा--“तू कोन है जो इस रात्रिके समय मुझ करत्व वाचररूपण इत्य त्ये वानररूपेण मामनाइत्य रङ्किनीम्‌ ॥४४॥ ळंकिनीका अनादर कर चोरके समान वानररूपसे मावश्व चोरद्रात्रों कि भवान्कतुमिच्छति । :! नगरमे जा रहा है £ और ( यहाँ) त्‌ क्या करना त्युक्त्वा रोपताम्ाक्षी पादेनाभिजघान तम्‌।४५।' | चाहता है १” ऐसा कह उसने रोधसे आँखें लाळ कर उनके छात मारी ॥ ४९-४५ ॥ तत्र हनुमानजीने देडुवाचाए ता वासशुष्टिनाऽबज्ञयाऽहनत्‌। | उसकी अवज्ञा करते हुए उसे वाये हाथका घूँसा मारा, तदेव पतिता भूसो रक्तमुहमती भृशम्‌ ॥४६॥ भ फिर जड़ दे आर उर नमन्त | पर गिर पड़ी ॥ ४६॥ कुछ दर पीछे लॉकिनीने - थाय गाह सा लङ्का इन्त महाबलम्‌ । | उत्कर महाबली हुानजे कहा. हे हनुमन ! इचुसव्‌ गच्छ भद्र ते जिता उङ्का त्रयाऽनघ॥।४७॥| जाओ, तुम्हारा कल्याण हो; हे अनघ ! तुम लंकापुरी- पुराऽहं ब्रह्मणा प्रोक्ता हष्टाविंशतिपर्यये । क जात उके ॥ ४७॥ ल ममत श्रीत्रह्माजीने - RR हा था कि 'अट्टाईसरवे चतुर्युगे त्रेतायुगमें नेतायुगे दाशरथी रामो नारायणोऽव्ययः ।।४८। | अविनाशी नारायणदेव दद्शरथक्ुम र रामरूपसे अवतीणे जनिष्यते योगमाया सीता जनकवेइमति । होंगे और उनकी योगमाया महाराज जनकके घरमें पवित्र RR सीताजी होकर प्रकट होंगी, क्योंकि मैंने पहले कमी भूमारहरणार्थाय प्राथता्य मया काचित्‌ 1४९] | उनसे प्रथिवीका भार उतारनेके लिये प्रार्थना की थी करता सर्ग १] TET TTS en सभायो राघवो शत्रा गमिष्यति महावनम्‌ । तत्र सीतां महामायां रावणोऽपहरिष्यति ।५०॥ पश्चाद्रामेण साचिव्यं सुग्रीवस्य भविष्यति । सुग्रीवो जानका द्रष्टुं चानरान्प्रेषयिष्यति ॥५१॥ , तुतरैको वानरो रात्रावागमिष्यति तेऽन्तिकम्‌ । । त्वया च भत्सितः सोऽपि त्वां हनिष्यति मुष्टिना५२ तेनाहता त्वं व्यथिता भविष्यसि यदानघे । तदैव रावणस्यान्तो भविष्यति न संशयः ॥५२॥ तसात्तवया जिता लङ्का जितं सर्वे त्वयाऽनघ । रावणान्तःपुरवरे क्ीडाकाननसुत्तममू ॥५४॥ तन्मध्येऽद्योकवनिका दिव्यपादपसङ्कूला । अस्ति तस्यां महावृक्ष शिशपानाम मध्यगः ॥५५। तत्रास्ते जानकी घोरराक्षसीभिः सुरक्षिता । . इद्र गच्छ स्वरितं राघवाय निवेदय॥५६॥ ` धन्याऽहमप्यद्य चिराय राखब- | स्मृतिर्ममासीङ्कयपाशमोचिनी । तङ्क्तसङ्गोऽप्यतिदुलेभो मम प्रसीदतां दाशरथिः सदा हृदि ॥५७॥ उलह्ठितेऽन्धी पवनारमजेन घरासुताया्च दशाननस्य। पुस्फोर वामाक्षि शुजथ तीव्र रामस्य दश्षाङ्गमतीन्द्रियस्य ॥५८॥ ` सुन्दरकाण्ड . 7000४४0७७८ ५७५४ ७९ ७८१४ ३४ ७८४७७ १.० ९८७९४७१०११ ७७४७ ७७७७७ घट ७७ २०७ कर ४९५५४४४४७० ४८७४४७० ४७७ LON INAS NN सकळ ॥ ४८-४९ || वे श्रीरामचन्द्रजी भाई लक्ष्मण और भायो सीताके सहित महावन ( दण्डकारण्य ) में जायेंगे | वहाँ महामायारूपिणी ्रीसीताजीको रावण हर ले जायगा ॥५०॥ तदनन्तर रामके साथ सुग्रीवकी मित्रता होगी और सुग्रीब जानकीजीकी खोजके छिये . वानरोंको भेजेगा ॥ ५१ ॥ उनमेंसे एक वानर रात्रिके समय तेरे पास आयेगा । वह तुझसे तिरस्कृत होनेपर तेरे मुक्का मारेगा ॥ ५२ ॥ हे अनघे | जिस समय तू उसके प्रह्मारसे व्याकुल हो जायगी उसी समय रावणका अन्त होगा--इसमें सन्देह नहीं | ५३ ॥. अतः हे निष्पाप हनुमन्‌ | तुमने (मुझ ) लंकाको जीत लिया तो समीको जीत लिया । राबणके अन्तःपुरमें एक अत्युत्तम क्रीडावन है ॥ ५४॥ उसमें दिव्य वृक्षोंसे सम्पन्न एक अशोकवाटिका है । उसके बीचों- बीचमें एक अति विशाळ रिंशपा ( सीसमका ) वृक्ष है ॥ ५५ ॥ श्रीजानकीजी वहींपर भयंकर राक्षसियों- के पहरेमें रहती हैं । तुम उनका दर्शन कर शीघ्र ही श्रीरघुनाथजीको उनका समाचार छुनाओ ॥ ५६ || आज बहुत दिनोमें मुझे श्रीरामचन्द्रजीकी संसार चन्धनको नए करनेवाली स्मृति हुई है और उनके मक्तका अति दुळम सङ्ग प्राप्त हुआ है । अतः आज मैं धन्य हुँ । मेरे हृदयमें विराजमान वे दहारथनन्दन राम मुझपर सदा प्रसन रहें” ॥ ५७॥ पवननन्दन हनुमानजीके समुद्र लॉँबते ही पृथिवी- पुत्री श्रीसीताजी और रावणकी बाँयी सुजा और बाँये नेत्र तथा इन्द्रियातीत श्रीरामचन्द्रजीके दाँये अंग बड़े जोरसे फड़कने लगे | ८५८ || रनर इति श्रीमदथ्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे सुन्दरकाण्डे प्रथमः सगः ॥ १॥ हनुमानज़ीका वाटिकामें जाना तथा रावणका सीताजीकी भय दिखाना । श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेवजी बोले--छे पार्थेति ! तदनन्तर _ ५ | श्रीहनुमान्‌जी अति सुशोभिता लंकापुरीमें गये और ततो जगाम हलुमान्‌ सङ्का परमशाभनास्‌ सूक्ष्म शरीर धारण कर रात्रिमें नगरमे सत्र ओर तुमने रात्रों सक्ष्मतलुभूत्वा बभ्नाम परितः पुराम्‌ ॥ १ ॥ कप ॥| क ॥ ताल पता ठगानेके लिये वे राजे | ५ मन्दिरमें घुस गये, बहाँ सव ओर हु ढ़नेपर भी जब उन्हं सीतान्वेषणकायीथी प्रविवेश चपालयय । जानकीजी न मिलीं तो उन्हें लंकिनीका कथन याद तत्र सर्वप्रदेशेषु विविच्य हलुमान्कपिः॥ २॥ | आया और वे तुरन्त हीं अति मनोज्ञ अशोकवाटिकामें नापश्यज्जानकी स्त्वा ततो खङ्काऽभिसापितम्‌ । | पहुँचे ॥ २-३ ॥ वह वाटिका कल्पसे पण थी, _ उसकी वावड़ियोंकी सौढ़ियाँ रतजटित थीं, उसमें जगाम हलुमान्‌ शीभ्रमशोकवनिकां शुभाम्‌ ॥ रे | | नाना प्रकारके पक्षी और मृगगण विचर रहे थे तथा सुरपादपसम्वाधां रत्रसोपानवापिकास्‌ । | छुवर्ण-निर्मित मददळोंकी अपूर्व शोभा थी ॥ ४ ॥ बह नानापक्षिसगाकीर्णा खरणप्रासादशोभितास॥४॥ | शाटिका पडेंके भारते छुको हुई शाखार्थोबाठे दक्षा ब दि घिरी हुई थी । वहाँ प्रत्येक बृक्षके नाचे जानकीजीको फलेरानम्रशाखाग्रपादपेः परिवारिताम्‌ । | हूँढ़ते-हंढ़ते पवननन्दन हलुमानजीने एक अति सुन्दर विचिन्वन्‌ जानकीं तत्र प्रतिदृर्श मरुत्सुतः ५॥ नाळ तखा | वद इतना उचा था कि उसके शिखर शभह बादलोंसे टकराते थे। सेकडों मणिमय स्तम्भोसे युक्त उस ददशोअंलिह तत्र चेत्यप्रासादयुत्तमम्‌ । देवाळ्यको देखकर उन्हें वडा आश्रर्य हुआ ॥ ५-६ ॥ दृष्टा विसयमापन्नो मणिस्तम्भशतान्वितम्‌ ॥ ६॥ | उससे कुछ और आगे बढ़े तो उन्होंने एक अत्यन्त समतीत्य पुनर्गत्वा किश्चिदरं स मारुतिः । घने पत्तोचाछा दिंशपा ( सीसमका ) वृक्ष देखा ॥७॥ h न उसके नीचे धूप कमी नहीं जाती थी और वह झुनहरी ददश झिंशपाद्वक्षमत्यन्तनिविडच्छदम्‌ ॥ ७॥ | पक्षियोंसे आकीर्ण था। वीरवर हनुमानजीने देखा कि अचष्टातपमाकीर्ण सर्णवर्णबिहङ्गमम्‌ । उस इक्षके नीचे श्रीजानकीजी पुथिरबीपर स्थित देवताके तन्पूठे राक्षसीमध्ये खितां जनकनन्दिनीस्‌ ॥ ८ ॥ समान राक्षसियोसे घिरी हुई वेठ हैं । उनके वाळों- कॅश की जुड़कर एक वेणी हो गयी है, वे अत्यन्त दर्बल और ददर्श हलुमान्‌ वीरो देवतामिव भूतले। | दीन-अवस्ा में हैं तथा मैंडे-कुचैछे वख धारण किये एकवेणी कृशां दीनां मलिनास्वरघारिणीम॥ ९॥ | इए हैं ॥ ८-९ ॥ ऐसी अवश्थामें पृथिवीपर पड़ी हुई बे भूमौ शयानां शोचन्ती रामरामेति भाविणीम्‌। | ऽ ग राम-राम! काह रही हैं उन्हें अपना भयान कोई रक्षक भी दिखायी नहीं देता और घे उपवास त्रातारं नाधिगच्छन्तीमुपवासकृशां शुभस्‌ ॥ १ ०॥ | करनेसे अति दुर्वळ हो गयी हैं ॥ १०॥ क Ly सु शाखान्तच्छदमध्यस्थो ददश कपिङु्जर। । कपिश्रेष्ठ श्रीहनुमानजी शाखाओंके पत्तोमें छिपकर _, ५ उन्हें देखने लगे और मन-ही-मन कहने लगे कि ' कृतार्थोऽहं कृताथोऽहंदष्ट्रा जनकनन्दिनीम्‌। ने जिन रुगे कि आज रु वी चट ॥११ जानकीजीको देखकर मैं कृतार्थ हो गया, कृतार्थ हो मयेव साथितं कार्य रामस परमात्मनः। | गा ! अहा ¦ परमात्मा रामका कार्य मेरे ही द्वारा सिद्ध हुआ ।' इसी समय अन्तःपुरमेंसे वडे किलकिला शब्दकी वः किलकिलाशब्दो बभूवान्त।पुराद्वहिः ॥१२॥ | आवाज आयी ॥ ११-१२ ॥ तव हनुमानूजीने यह सर्ग २) सुन्द्रकाण्ड २०९ TITERS INST SSNS SSCS SSC NSAP NAN 2४0०0 ५ ७४४ ७.१ ३.४ ANAS ७७९७ 4३४ ६४ NN PANN WANA WU ७७, दस NP किमेतदिति सँछ्लीनो दृक्षपत्रेपु मारते! | | सोचकर कि यह क्या गड़बड़ है! वृक्षके पत्तोमे ठिपे- आयान्तं रावणं तत्र स्रीजनेः परिवारितम्‌ ॥१३॥ | धि देखा कि लियोंसे घिरा हुआ रावण उसी ओर » ७2. ५ है आ रहा है ॥ १३ ॥ उसके दश मुख, बीस भुजा और दशास्ये विंशतिशुजे नीलाञ्जनचयोपमम्‌। | कजढ-समूहके समान काले शरीरको देखकर हलुमान्‌- दृष्टा विस्मयमापन्नः पत्रखण्डेप्वलीयत ॥१४॥ | जीको बड़ा विस्मय हुआ और वे पत्तोमें छिप गये ॥१४॥ क ha ° ~ ® = | , ताचो रायवणाश मरण भ कथ भवत | | रावणको सदा यही चिन्ता रहती थी कि 'किस ' सीतार्थमपि नायाति रामः किं कारणं भवेत्‌।१५॥। | कार श्ीरामनन्दरजीके हायसे जल्दी-से-जल्दी मेरा इत्येवं चिन्तयक्षित्य राममे ~ मरण हो, न जाने क्या कारण है कि वे अभीतक (तन वस्तयामत्य राजसे सदा हाद । | सीताके लिये भी नहीं आये ? इस प्रकार निरन्तर तसिन्दिनेऽपररात्रो रावणो राक्षसाधिपः ॥१६॥ ¦ भगवान्‌ रामका ही हृदयमें स्मरण रहनेसे राक्षसराज ror o> ; रावणने उसी दिन शेषरात्रिमें खप्रमे देखा कि रामका वभ रामण सान्दष्टाः काश्चदागत्य 1 । गो प हे प द किबा प गान त । सन्देश लेकर आया हुआ कोई स्वेच्छारूपधारी वानर कासरूपधरः समा बृक्षाग्रस्या्युपत्यांते ॥१७॥ सूक्ष्म शरीरसे इक्षकी शाखापर बैठा हुआ देख रहा इति दृष्ट्वाऽङ्टुत स्प स्वात्मन्येवाच्ुचिन्त्य सः] | है ॥ १५-१७॥ इस अह्डूत स्वभको देखकर उसने देवं तत्र करे ` अपने मनमें सोचा-'कदाचित्‌ यह खम ठीक ही हो; स्मः कदाचित्सत्यः स्यादेवं तत्र करोम्यहम्‌ ।१८। अतः अब अशोकवनमें चलकर मुझे एक काम जानकीं वाक्दरोवैंदूध्या दुःखितां नितरामहम्‌ | । करना चाहिये--मैं जानकीजीको अपने बाग्वाणसे सेमि इष्टवा नि : वेधकर अत्यन्त दुःखी करूँ जिससे वह वानर यह करोमि दृष्दवा रामाय निवेदयतु वानरः ॥१५९॥ , तव देखकर रामचन्द्रजीको पुनावे' ॥ १८-१९ ॥ त्ये चिन्तयन्सीतासमीपमगमद्दठतम्‌। › = सोचकर वह तुरन्त सीताजीके पास चला । नुपुराणां किङ्किणीनां शरुत्वा शिख्ञितमङ्कमा॥२० । (उसके साथकी खियोंके ) नूपुर ( पायजेब ) और ५ _ | किंकिणी ( करधनी ) आदिकी झनकार सुनकर सुन्दर सीता भीता लीयमाना स्वात्मन्येव सुमध्यमा | , कडिवाली कल्याणी सीताजी घबडाकर अपने शरीरको अधोमुख्यश्रुनयना खिता रामार्पितान्तरा ॥२१॥ | सिकोड नाचेको मुख करके बैठ ग्य । उस समय उनके _ है | जञेत्रोंमि जळ भर आया और हृदय भगवान्‌ राममें ळग गया रावणोऽपि तदा सीतामालोक्याह सुमध्यमे । | ॥ २०-२१ ॥ सीताजीको देखकर रावण बोला--“हे हाफ स्वात्मन्येव विली । कमनीय कटि और सुन्दर भकुटिवाली ! तू मुझे देखकर दृष्टा किं वृथा सुभु स्वात्मन्येव विलीयसे ॥२२॥ म । दृथा क्यों इतनी सिकुड़ती है £ ॥ २२ || अब, राम रामो बनचराणां दि मध्ये तिष्ठति साचुजः। तो अपने भाईके साथ बनचरोंमें रहता है, वह कमी तो किसीको दिखायी देता है और कभी दिखायी भी नहीं देता || २३॥ मैने तो उसे देखने- डोकाः प्रर नने के लिये कितने ही लोग भेजे, किन्तु बहुत प्रयत्न- मया तु वहुधा लोका! प्रेपितास्तस्य दशने | भ पूर्वक सब्र ओर देखनेपर भी वह उनको कहीं दिखायी नहीं दिया ॥ २४ ॥ अव रामसे तुझे क्‍या काम है १ बह तो तुझसे सदा उदासीन रहता है । सदा तेरे पास रहते हुए और सदा तुझसे आलिंगित त्वया सदाऽऽलिङ्गितोऽपि समीपस््रोऽपि सर्वृदा २५ होते हुए भी उसके हृदये अभीतका तेरे प्रति खेर २$ व | कदाचिदूडद्यते केथित्कदाचित्नेव इव्यते ॥२३॥ | न पदयन्ति ग्रयत्तेन वीक्षमाणाः समन्ततः ॥२४॥ कि करिष्यसि रामेण निःस्टृहेण सदा त्वयि । अध्यात्मरामायण [सर्ग २ क्ट ee TTA Serer “५ ५०५९ १४४४४ २१० IS sng or डा: TRIRRIT MIAN ANN Done १४१ news a NRA, oer = ग ऊः इअ गमको जितने भोग ग्राप्त इए द्ये यि रामस्य जायते | | नहा हुआ | रामको तुझसे 2 हृदयऽस्थनचं ख़हस्त्व हैं और तुझमें जितने गुण हैं उन सबको भोगकर भी त्वत्कृतान्सर्बमोगांश त्वहुणानापि राघवः 1२६) | बह कृतप्, गुशहीन और अधम कभी उनकी याद भी शुज्ञानोऽपि न जानाति कृतध्नो निर्युणोऽधमः । | नहीं करता । तुझ-जैसी सतीको दुःख ओर झोकसे वि 1 दःखशोकसमाकुलारणा। "ड देखकर ही मैं ळे आया था | २०-२७ ॥ और त्वमानीता सया साध्वा टुःखशाकसमा देख, वह तो अभीतक नहीं आया; जव उसे तुझं इदानीमपि नायाति भक्तिहीनः कर्थ मजेत । | प्रेम ही नहीं है तो आता कैसे ? बह सर्वथा असमर्थ, नेःसत्तो निर्ममो ५ पी ममताशून्य, अभिमानी, मूख ओर अपनेको बडा वुद्धिमान्‌ निःसखो तिमयो मानी हि रय ८ । पाननेचाऊ है ॥ २८॥ हे भामिनि | अपनेसे उदासीन नराधमं त्यद्ियुखे किं करिष्यसि भामिनि । | उस नराधमसे तुझे क्या टेना है १# देख, में राक्षस- स्वय्यतीब समासक्तं मां मजस्वासुरोत्तमम ॥२९॥ | श्रेष्ठ तुझसे अत्यन्त प्रेम करता हूँ, अतः व मुझ हीं ३ _Q , ~ अंगीकार कर ॥ २९ ॥ यदि ठ. मेर अधन रहेगी तो देवगन्धवैनागानां यक्षकिन्रयोषिताम्‌। =. गन्ध, नाग, यक्ष और किन्नर आदिकी भविष्यसि निथोषत्री त्वं यदि मां प्रतिपद्यसे ॥३०। | सख्रियोका शासन करेगी” ॥| ३०॥ रावणस्य वचः त्वा सीताञमरपसमन्विता । | रावणकेये बचन सुनकर सीताजीको वडा कोध हुआ। _ भूत निधाय तृ ८ ॥। ' उन्होंने दिर नीचा कर लिया और बीचमें तृण रखकर † उवाचाधोयुखी भूत्या निधाय ठृणमन्तरे ॥३१॥ कहा-॥३ १॥ “अरे नीच ! इसमें सन्देह नहीं, श्रीरघुनाथ- राधवाद्विभ्यता चूतं भिक्षुरूपं त्वया धृतम्‌ । , जीसे डरकर ही तने मिश्षुक्ा रूप धारण किया था, और . रहिते राघवाम्यां त्वं शुनीव हविरध्वरे ॥३२॥ ¦ उन दोनों रहुश्रेष्ठोकी अनुपश्चितिम ही. कुत्ता जिस - तवाचि मां नीच तत्फलं न प्रकार सूनी यज्ञशालासे हवि ले जाता हैं उसी प्रकार तवानासे मा नांच तत्फलं आप्र्यसंगचरात्‌ । तू मुझे हर लाया है;सो त. बहुत यात्र ही उसका फ यदा रामशराधातविदारितबपुर्भवान्‌ ॥३३॥ पायेगा । जिस समय भगवान्‌ रामकी वाणवर्पसि विदीर्ण # यहाँ २३ से २८ ऋोकतक रावणने गूठभावसे निन्दाके मिपसे भगवान्‌ रामकी स्तुति की है । इनका तात्पर्य इस प्रकार है-- “रास अपने भाईके सहित चनवासी तपस्वियोर्मे रहते हैं। उनमेंसे चे ( ध्यान-्धारणादि द्वारा ) कभी किसी- को दिखायी देते हैं और कभी ( ध्यान-धारणासे भी ) दिखायी नहीं देते ॥२३॥ मैंने तो उनका साक्षारकार करनेके लिये कई वार अपनी इन्दियांक्रो उधर लगाया है, किन्तु बहुत कुछ प्रयत्न करनेपर भी सुरे उनका साद्षात्कार नहीं हुआ ॥२४॥ (तुम साक्षाद योगमाया हो, परवहारूप रामके साथ तुम्हारा सदा सहवास है और उसके साथ तादात्म्य भी है किन्तु) फिर भी वह सर्वदा निःस्टृ और असंग है । उसे तुम्हारी परवा नहीं है ॥२४॥ निःस्पृह और असंग होनेसे परनह्मरुप रामको तुम, मायारूपिणीसे बन्धन भी नहीं होता और न वह तुम्हारे ( मायाके) गुण या भोगों ही फँसता है॥२६॥ सांख्यवादीयण (उपचारसे) उसे भोक्ता भी कहते हैं तथापि उन्हींके मतानुसार 'जहाव्येनां ` झुक्तभोगामजोऽन्यःः इस श्रुतिके अनुसार वह “सें भोक्ता हूँ! ऐसा अभिमान नहीं करता । इसी प्रकार वह कृत्त (किये हुए कर्मोका नाश करनेवाछा ) निगुंण ( सत्त्व रज, तमसे रहित ) और अधम (न धमति शब्दचिपयो भवति--जो शब्दका विषय न हो अर्थात्‌ अशब्द ) भी है ॥ २७॥ उसकी सायापर प्रीति नहीं है इसलिये वह अभी- तक नहीं आया । इससे रावण अपनेको लक्ष्य करके कहता है कि वह अव भी मेरे हृदयमे नहीं आता क्योंकि भक्तिहीन होनेसे मेरा हृदय उसतक केसे पहुँच सकता है? बह निगुंश, असतारहित, असानी, मूढ ( म शिवः -उः = ब्रह्मा ताभ्यास्‌ ऊढः--ध्यानविपयत्ञीतः अर्थात्‌ शिव और बल्ाके ध्येय ) और विद्ठानोंसें सम्मानित हे ॥ २८॥ नराधम ( नराः अधमाः यस्मात्‌ स नराघमः--मलुष्य जिससे अधम हैं अर्थात्‌ पुरुषोत्तम) विसुख ( भाया-पराङ्‌ःसुख ) । 1 पतिज्रता खीको पर-पुरुषसे प्रत्यक्ष वार्तालाप नहीं करना चाहिये । यदि कोई अनिवार्य प्रसंग आ पढ़े तो झी कोई जड वस्तु ही वीचमें रख छेनी चाहिये । इस नियमके अनुसार ही सीताजीने वीचमें तुण रखा था । सगे २] सुन्दरकाण्ड २११. क्क भाक NIN 2९८०५७९ ९७ .०१५०१.०७ 0९०१५००७०९ ०७०0 ८ "४५९४४४४ ८ ३.४४. NIN झास्यसेञ्मानुप रामं गमिष्यसि यमान्तिकप। ` होकर त्‌ यमलोकको जायगा उस समय ही तू अमानब सञ्चरं शोपयिरवा वा शरेदृष्याऽ्थ वारिधिम्‌ 1२४1 रामको जानेगा । अरे राक्षसाधम ! इसमें सन्देह नहीं, a _ व तू शीघ्र ही देखेगा कि तुझे युद्धमें मारनेके लिये भाई हन्तु तवां समरे रामो लक्ष्मणेन समन्वितः । लक्ष्मणसहित भगवान्‌ राम समुद्रको सुखाकर अथवा आगमिष्यत्यसन्देहो द्रक्ष्यसे राक्षसाधम ॥३५॥ | उसपर वाणोंका पुल बनाकर यहाँ आयेंगे ॥ २२- २५ ॥ और तुशे पुत्र और सेनाके सहित मारकर मुझे “वां सपुत्रं सहवलं हत्या नेष्यति मां पुरम्‌। | अयोध्यापुरी छे जायेंगे।” ` श्रुत्वा रक्षःपतिः कदो जानक्याः परुपाक्षरम्‌।३६।।| जानकीजीके ये कठोर वचन सुनकर राक्षसराज वाक्यं क्रोधसमाविष्टः खङ्गमुद्यम्य सत्वरः । रावणको अत्यन्त क्रोध हुआ और वह क्रोधसे नेत्र लाळ , है हे कर तुरन्त ही खड़ खींचकर जनकनन्दिनी सीताजीको हन्तुं जनकराजस्य तनयां ताम्रलोचनः ॥२७॥ : मारनेपर उतारू हो गया ॥ १६-२७॥ तब, पतिके मन्दोद्री निवार्यीह पतिं पतिहिते रता। , हिमे तत्पर रहनेवाली महारानी मन्दोदरीने अपने 3.0 1 . पतिको रोकते हुए कहा-“पतिदेव | इस दीना, क्षीणा, त्यजना मानुषी दाना दुःखिता कृपणां कृशाम्‌ २८, दु:खिया एबं कातर मानवीको छोड़ दीजिये ॥ ३८॥ देवगन्धर्यनागानां वहः सन्ति यराङ्खनाः। . आपके डिये तो देवता, गनधर्य और नागादिकोंकी ऐसी अनेकों मदमक्तनयना मनोहारिणी महिलाएँ है जो बड़े चावसे आपहीको वरण करना चाहती हैं” ॥ ३९ ॥ ततोऽत्रवीददशग्रीयो राक्षसीर्विकृताननाः | तब राबणने बहुत-सी विकराल ब्रदनवाळी राक्षसियों- , __ | यथा मे वशगा सीता भविष्यति सकामना | पे कहा है निशाचरियो | मय अथवा आदर जिस 1 हू व उपायसे भी सीता कामनायुक्त होकर शीघ्र ही मेरे तथा यतध्वं त्वरित तजनाद्रणादिभिः ॥४०॥ ¦ अधीन हो जाय, तुम सब छोग वही करो ॥ ४०॥ द्विमासाभ्यन्तरे सीता यदि मे वशगा भवेत्‌ । | यदि दो महीनेके भीतर बह मेरे वशीभूत हो जायगी तदा सर्वसुखोपेता राज्यं भोक्ष्यति सा मया ॥8 १॥ तो सर्व-सुख सम्पन्न होकर मेरे साथ राज्य भोगेगी ॥४१॥ ~ ९ नाभिनन्दि । और यदि दो महीनेतक भी यह मेरी शय्यापर आना याद्‌ मासद्वयादृष्यं मच्छय्या नाभिनन्दात | ' श्वीकार न करे तो इस मानबीको मारकर मेरा प्रातः- तदा भे प्रातराशाय हत्वा कुरुत मानुपीम्‌ ॥४९॥ , कालका कलेवा.बना देना” ॥ ४२॥ इत्युकत्वा प्रययौ खीभी राबणोऽन्तःपुरालयम्‌ । ¦; ऐसा कह रावण अपनी ख्रियोके साथ अन्तःपुरको i Ro) ~ भ जानकीमित्य भीषयन्त्यः स्वतर्जनेः चला गया और राक्षसियाँ सीताजीके पास आकर | राक्षस्या जानकसित्य भाषयन्त्यः स्वत जन ४ ३। ॥ उन्हें अपने-अपने उपायोंसे भयभीत करने लगीं॥४ ३॥ तत्रेंका जानकीमाह योवनं ते वृथा गतम्‌ । उनमेसे एक बोळी--“जानकि ! तेरा यौवन इथा ही | गया, यदि तू रावणका सहवास करे तो यह सफल हो Da क ~ ~ | रावणेन समासाद्य सफल तु भावष्यात ॥४४॥ | जाय” ॥ ४४ ॥ दूसरीने क्रोध दिखाते हुए कहा-- अपरा चाह कोपेन किं विलम्बेन जानकि । “जानकि | अब (हमारी बात माननेमें) देर क्यों कर्ती नी है?” इसी प्रकार कोई खडग निकालकर जानकोजी ठेचतामड ४५॥ दे!” इसी र i इदानीं छेद्यता विभज्य च एथक्‌ एथक्‌ ॥४५। परनेके टिये तैयार होकर बोली कि “इसके अंगेंको काठ- अन्या तु खब्मु्म्प जानकी हन्तुसुच्चता ।' कर अभी अळग-अळग कर डाछो।” तथा कोई भयंकर मुख- अन्या करालवदना विदार्यास्यमभीपयत्‌ ॥४६॥ | वाली राक्षसी अपना मुख फाडकर डराने लगी] ४५-४६॥ त्वामेव वरयन्त्युचैर्मदमत्तविळोचनाः ॥३९॥ ; अध्यात्मरामायणे [ सर्ग २ REST सम मप्प्स्प्प्य्स्य्स्स्स्स्य्स्स्स्स्प्प्स््स्प्स््ति a org २१३ pat hanes “7७४४४ एवं तां भषयन्तीस्ता राक्षसीविकृतानना! । वदान श मकार बर उन कदन ~ 0 ठा य राक्षसियोंको रोककर त्रि& क वृद्धा राक्षसी यमन्रवीत्‌ ॥४७॥ 1 इद्धा निवाये त्रिजटा द्दा राक्षसी वाकय र व्‌ बोडी--]] ४७॥ “अरी दृष्टा राक्षसियो | मेरी वात शृणुध्वं दुष्टराक्षस्यो मद्वाक्यं वो हितं भवेत्‌ ॥४८॥| दुनो, इसीसे तुम्हारा हित होगा | ४८॥ तुम इन न भीषयध्वं रुदतीं तमस्कुरुत जानकीम्‌ । | रोती-विलखती जानकीजीको मत डराओ, बल्कि इदे > जे रो । मैंने अभी-अभी खममे देखा है ए ! कमललोचन! ॥४९॥ | कर कर है है इदानीमेव सॅ क राम शि कमललोचन भगवान्‌ राम टक्ष्मणके साथ श्वेत ऐरावत आरुक्वरावत शुञ्र लक्ष्मणेन समागतः । हाथीपर चढ़कर आये हैं । और मैंने उन्हें सम्पूर्ण दरध्वा ठङ्कापुरीं सर्वा हत्वा रावणमाहवे ॥५०॥ | छंकापुरीको जलाकर तथा रावणको युद्धमें मारकर आरोप्य जानकीं स्वाङ्के स्थितो इष्टोऽगसूर्धनि । i अपनी गोदमें लिये पनत-दिखर पर ब ` रावणो गोमयहदे तैलाभ्यक्त दिगम्बरः ॥५१॥ | २ देखा है । रावण गढेमें मुण्डमाळा पहने शर्रारमें रावणा गामपहुद तहास्यक्ता दग्र तैल लगाये नंगा होकर अपने पुत्र-पोत्रोंके साथ अगाहत्युत्रपात्रश्च कृत्वा वद्नमालकाम्‌। गोवरके कुण्डम डुबकी लगा रहा हैं और विभीषण विभीषणस्तु रामस्य सन्निधौ हृष्टमानसः ॥५२॥ | प्रसलचित्तसे रघुनाथजीके पास वैंठा हुआ अति भक्ति- र क रहा 5s नि सेवां करोति रामस्य पादयोर्थक्तिसंयुतः । पूवक कर चरणा कर रहा हैँ | इससे निश्चय र्या राणं रामो इत्वा सङुलमज्जसा ॥५३॥ | ध दकि र्दी अनायास ही रावणका इ सा र | ऐैत्या स्म सहित नाश कर विभीपणको ढंकाका राज्य देंगे और विभीपणायाधिपत्यं दना सीतां शुभाननास्‌ । | सुसुखी सीताको गोदमें विठाकर निस्सन्देह अपने अङ्के निधाय स्वपुरीं गमिष्यति न संशयः ॥५४॥॥ नगरको चले जायेंगे" || ४९-५४ ॥ _ त्रिजटया वचः श्रुत्वा भीतास्ता राक्षसाद्धियः | । त्रिजठाके ये बचन सुनकर वे राक्षसियाँ डर गयी । वे तृष्णीमासंस्तत्र तत्र निद्रावशमुपागता! ॥५५॥ | चुपचाप जहाँ-तहाँ वेठ गयी और कुछ देर ऐछे उन्हें नींद तजिता राकषसीमिः सा सीता मीताऽविरि आ गयी ॥ ५५॥ राक्षसिर्योके डरानेस सीताजी अत्यन्त की साता भाताझवावेह्ृळा | | अयभात और विहळ हो गयो ओर अपना कोई सहायक त्रातार नाधिगच्छन्ती दुखेन परिमूच्छिता॥५६॥| न देखकर वे हुःखसे मूर्छित हो गयीं ॥५६॥ फिर अभ्रमि! पूर्णनयना चिन्तयन्तीदमत्रवीत्‌ । ऑँखोंमें आँसू भरकर अति चिन्ताऊुळ होकर इसप्रकार ~ ~ ~ , 8 PT { MA, £ :काळ ~ प्रभाते भक्षयिष्यन्ति राक्षस्यो माँ न संशय! । | ऽ ल्य इसमं सन्देह नहीं प्रातःकाळ होते इदानीमेव मरणं केनोपायेन से भरे ही राक्षसियाँ मुझे खा जायेंगी। ऐसा कोन उपाय शदानासच सरण कनोपायन से भवेत्‌ ॥५७॥ | है जिससे मुझे अभी मोत आ जाय” ॥५७॥ इंस प्रकार एइ सुदुःखेन परिष्डुता सा मौतका निश्चय करके भी उसका कोई साधन न - वशुक्तकण्ठं रुदती चिराय | देखकर कल्याणी सीता इक्षकी शाखा पकड़े हुए आलम्ब्य शाखां कृतनिश्चया मृतो अत्यन्त दुःखसे भरकर बहुत देरतक फूट-फटकर न जानती कञ्चिदृपायमङ्गना॥५८॥ | रोती रहीं ॥ ॥ ५८॥ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे सुन्दरकाण्डे द्वितीयः सरैः ॥ २ ॥ Ce IT क ¢ .तृतीय सगे जानकीजीसे सेंट, वाटिका-विध्चंस ' और ब्रह्मपाश-वन्धन । श्रीमहादेव उवाच । श्रीमहादेवजी बोळे-हे पार्वति | इस प्रकार रोते- उद्धन्धनेन वा मोक्ष्ये शरीरं राघवं विना । | रोते सौता्जीने सोचा--“अच्छा तो, मैं फाँसी छगाकर स्यान्मम ही अपना शरीर क्यों न छोड़ दूँ ? इन राक्षसियोंके +, जीवितेन फे किं स्पान्मम रकोऽधिमध्यतः ॥१॥ | चीचमें रहकर रघुनाथजीके विना जीनेसे छाभ ही क्या है! दोघी वेणी समा त्यर्थमुद्धल्याय भविष्यति । | त्यथमु ॥ १॥ फाँसी छगानेके लिये मेरी लम्बी वेणी पर्याप्त एवं चञ्चितडुद्ध ता मरणायाथ जानकाम्‌ | २ ॥ | होगी ।” जानकीजीको इस प्रकार मरनेका निश्चय विलोक्य हनुमान्किक्षिद्दिचार्येतदभापत । | करती देख सूक्ष्महूपधारी श्रीहचुमानजी हृदयमें कुछ शनेः शनेः सक्षमरूपो जानक्याः श्रोत्रग वचः ॥३॥ | विचारकर उनके कानोंमें पडनेयोग्य धीमी बाणीसे इक्षवाङंशसम्भूतो राजा दशरथो महान्‌ । शनेः-शनैः इस प्रकार कहने छगे॥ २-३ ॥ “इक्ष्वाकु अयोष्याधिपा चत्वारो लोकविश्रता: ॥४॥ वंशमं उत्पन्न हुए अयोध्यापति महाराज दशरथ बड़े तस्तस्य चत्वारा लाकावशुता । प्रतापी थे। उनके त्रिळोकीमें विख्यात चार पुत्र हुए । पुत्रा देवसमाः सर्वे लक्षणरुपरुक्षिताः | ये राम, लक्ष्मण, भरत और इन्नुन्न चारों ही देवताओंके रामश्च लक्ष्मणश्वव भरतश्च रावुहा॥५॥ | समान झुभ छक्षणोंसे सम्पन्न हैं ॥ ४-५ ॥ उनमेंसे ज्येष्ठो रामः पितुवाक्याइण्डकारण्यमागतः । | बड़े भाई राम भ्राता लक्ष्मण और भार्या सीताके सहित लक्ष्मणेन सह त्रा सीतया भायया सह ॥ ६॥! अपने पिताकी आज्ञासे दण्डकारण्यम आयेथे। वे महामना वहाँ गोतमी नदीके तीरपर पक्षवटी आश्रमे उबास गांतमीतीरे पञ्चवट्यां महामनाः । रहते थ । उस आश्रमसे श्रीरामचन्द्रजीकी अनुपस्थिति- तत्र नीता महाभागा सीता जनकनन्दिनी ॥ ७॥ | दुरात्मा रावण महाभागा जनकनन्दिनी सौताजीको राहत रामचन्द्रेण रावणन दुरात्मना | | छे गया । तब अति शोकाकुल भगवान्‌ रामने जानकी- ततो रामोऽतिदृःखातो मार्गमाणोऽथ जानकीम्‌ ।८॥ जीको इधर-उधर हूँढ़ते हुए पृथिबीपर पडे पक्षिराज जटायुपं पकषिराजमपश्यतपतितं भरुवि। | जटायुको देखा । उसे भ ही दिव्यधाम पहुँचा- न दित गी मृष्यम कर वे ऋष्यमृक-पर्बंतपर आये ॥ ६-९ ॥ वहा आकर वश दजा षि पवय काण 1 | आत्मदर्शी भगवान्‌ रामने सुग्रीबसे मित्रता की और सुग्रीवेण कृता मंत्री रामस्य विदितात्मनः उसकी ख्रीका हरण करनेवाछे दुष्ट वाळीको मारकर तङ्गायाहारिणं हृत्वा वालिन रघुनन्दनः ॥१०॥ | उस्न राज्यपदपर अमिपिक्त किया । इस प्रकार श्री- राज्येऽमिपिच्य सुग्रीवं मित्रकायं चकार सः | रघुनन्दनने मित्रका कार्य सिद्ध किया । वानरराज सुग्रीवस्तु समानाय्य वानराल्यानरप्रभुः ॥११॥ , सुग्रीचने भी समस्त बानरोंको बुलाकर सब ओर प्रपयामास परितो वानरान्परिमार्मणे । | सीताजीकी खोज करनेके लिये भेजा । उन्हीमेसे एक , मैं भी सु्रीवका मन्त्री वानर हूँ । मैं सम्पातिके कथनाइसार , सीतायासत्र चकोऽहं सुग्रीवसचिवो हरिः ॥१२॥ | = जन समुद्र लॉवकर तुरन्त ठद्धापुरीमे आया सम्पातिव चनाच्छीप्रमकृद्नथ शतयोजनम्‌ । और यहाँ सर्वत्र शुभलक्षणा सीताजीको ढूँढ़ा । शने समुद्रे नगरां लां विचिन्वन्‌ जानकीं शुभाग|। १ ३॥| जानः अशोकवाटिकामें ढूँढते-दँढते मैंने यह शिंशपा शर्मरशोकवनिकां विचिन्वन्‌ शिंशपातरुम | [ इक्ष देखा और यहाँ रामचन्द्रजीकी महारानी देवी ह नि अध्यात्मरामायण [ सग ६ जानकीजीको अति छेशसे शोक करते पाया । इनके र शोचन्तीं दुःखसम्प्छतामू । ९४) है . व अद्राक्षं जानकीमत्र शोचन्तीं दु म्‌ दर्शनसे मेरा यहाँ आना सफळ हो गया !” ऐसा रामस्य महिषीं देवीं कृतकृत्योऽहमागतः । (ककर परम घुद्धियान' हतमानो भन हे त्युकत्वोपररामाथ मारुतिईद्विमत्तरः ॥१५॥ गये ॥ १०-१५ ॥ सीता क्रमेण तत्सर्व श्रुत्वा विस्मयमाययो | क्रमशः ये सव बातें सुनकर सौताजीको बड़ा विस्मय हुआ और वे कहने ळग, “मन जो आकाझिमे क्रिमिदं मे श्रतं व्योन्नि चायुना सञ्चुदीरितस्‌॥१६॥ ` शब्द छुना है बह क्या वायुका उच्चारण किया हुआ हैं ॥१६॥ अथवा खप्न या मेरे मनकी भ्रान्ति है ? अथवा स्वप्नो वा मे मनोभ्रान्तियंदि वा सत्यमेव तत्‌। ` यह सव सत्य ही तो नहीं हैं, क्योंकि दुःखके कारण ' नींद तो मुझे आती नहीं, ( फिर स्वप्न कैसे हो सकता निद्रा मे नास्ति दुःखेन जानाम्येतत्कुतो अमः। १७ | है १ ) और मैं प्रत्यक्ष सुन रही हूँ इसलिये यह श्रम भा 1 1 ७. ७ , ag कैसे हो सकता है ? (अतः निश्चय ही यह सत्र येन मे कर्णपीयूषं वचनं ससुदीरितम्‌ । यथार्थ हे ) | १७ ॥ छुतरां, जिसने मेरे कानोंका अमृतके ० समान प्रिय छगनेवाले ये वचन कहे हैं बह प्रियभापी स इश्यतां महाभाग! प्रियवादी समाग्रतः ॥१८॥ महाभाग मेरे सामने प्रकट हों? || १८ ॥ श्रुत्वा तञ्जानकीवाक्यं हनुमान्पत्रखण्डतः । जानकीजीके ये वचन सुनकर हनुमानजी दाने :-दनें: अवतीय शनैः सीतापुरतः समवस्थितः ॥१९॥ | उस रक्षके पत्र-भागसे उतरकर सौताजीक सामने _ n । खड़े हो गये ॥ १९ ॥ उस समय उन्होंने अरुण-तदन, करुविङ्कप्रमाणाङ्गो रक्तास्यः पीतवानरः | | पीतवर्णं और कठविक (चटक) पक्षी बराबर: ननाम शनकेः सीतां प्राज्ञलिः पुरतः स्थितः ॥२०॥| आकारवारे वानरके रूपसे धीरेसे सामने आकर सीता- इष्वा तं जानकी भीता रावणोऽयश्चुपागतः | | गको दाय जोइकर प्रणाम किया ॥ २० ॥ उसे देखकर ~ a | जानकीजीको यह भय हुआ कि मुझे फॅसानके लिये मायासे मां मोहयितुसायातो मायया वानराकतिः ॥२१॥ | , रूप धारण कर यह रावण ही आया हे ॥२१॥ इत्येवं चिन्तयित्वा सा तृष्णीमासीदधोमुखी । यह सोचकर वे चुपचाप नीचेको सुख किये बैठी $ |: रहीं । तब हनुमानजीने सीताजीसे फिर कहा-- पुनरण्याह तां सीतां देवि यच्चं विशङ्कसे ॥२२॥ .... , जेसी आवाड कर रहीं हैं मैं बह नही न ~ । “देवि ! आप जैसी आइाङ्टा कर रहीं हैं में बह नहीं नाहं तथाविधो मातस्त्यज शङ्कां मयि खिताम्‌ । | हूँ । हे मातः | मेरे विषयमें आपको जो शह्ठा हो रही दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्य परमात्मनः ॥२३॥ | ऐ उसे दूर करें । हे शुभग्रदे ! में तो कोसलाधिपति किया _ परमात्मा रामका दास और वानरराज सुग्रीवका मन्त्री साचवा रान्द्रस्य रत . ऽह हरीन्द्रस्य सुग्रीवस्य शुभप्रदे । हूँ तथा हे शोभने ! सम्पूर्ण जगतके प्राणवरूप पवन- वायोः पृत्रोऽहमखिलग्राणभूतस्य शोभने ॥२४॥ | देवका मैं पुत्र हूँ” ॥ २२-२४॥ तच्छत्वा जानकी प्राह हनूमन्तं कृताञ्जलिम्‌ । यह सुनकर श्रीजानकीजीने हाथ बाँधे खड़े हुए वानराणां मनुष्याणां सङ्गतियेटते कथम्‌ ॥२५॥ हतुमानर्जीस काहा तुम जो कहते हो कि मैं ह शरामचन्द्रजीका दास हूँ, सो भला वानर यथा त्वं रामचन्द्रस्य दासोऽहमिति भाषसे । | और मलुष्योंकी मित्रता कैसे हो सकती है?” तब सामने खडे हुए हनुमानजीने प्रसन्न होकर तामाह मारुतिः प्रीतो जानकी पुरतः खितः॥२६।॥ जानकौजीसे कहा ॥ २५-२६ ॥ “शबरीकी प्रेरणासे - सुन्दरकाण्ड २१५ ऋष्यमूकमयाद्रासः शबयों नोदितः सुधीः | परम बुद्विमान्‌ भगवान्‌ राम ऋष्यमूक पर्वतपर आये । सुग्रीवो ऋष्यमूक दष्टवान्‌ रामलक्ष्मणी ॥२७॥ | उस पर्वतपर बैंठे हुए सुभ्रीवने जब ( दूरहीसे ) राम और छक्ष्मणको आते देखा तो मनमें भय मानकर भाताम । मपयासास ज्ञात रामस्य हृतम्‌ | मुझे उनका आशय जाननेके लिये भेजा । तब मैं नेह्लचारवएुटरवा गता5ह रामसाक्चाविस्‌।।२८॥। , ब्रह्मचारीका वेष बनाकर रामजीके पास आया न्वा रामस्य सङ्भावं स्कन्धोपरि निधाय तौ। ,॥ \०_३८॥ और उनका शुद्ध भाव जानकर उन्हे त्या कन्घेपर चढा सुप्रीवके पास छे गया तथा ( राम ग्रीवस्य हृता भार्या वारिना तं रघूत्तमः) सुप्रीवकी पत्रको वाळीने छीन लिया था । रघुनाथजी- जघानेकेन वाणेन ततो राज्येऽभ्यषृचयत्‌ ॥२०) ने उसे एक ही वाणसे मारकर सुग्रीवको वानरोंके राज्यपदपर अभिषिक्त कर दिया । तब ,सुग्रीचने सुग्रीव वानराणां स प्रेपयामास वानरान्‌ । । आपकी खोजके लिये बड़े-बड़े बीर और पराक्रमी दिम्म्यो महावलान्यीरान्‌ भवत्याः परिमार्गणे ३१); वानरोंको दिशा-विदिशाओंमें भेजा | २०-३१ || गच्छन्तं राघवो इष्टवा मामभापत सादरम्‌ ॥३२॥ | उस गय युहे चलता देख शरीखुनाथजीने मुझसे RRR आढरपूवेक कहा ॥ ३२ ॥ है पवननन्दन | मेरा त्वयि कायमशेपं मे स्थितं मारुतवन्दन । सन काम तुम्हारे उपर निर्भर है । तुम सीताजीसे ब्राहे में कुशल सव सीताये लक्ष्मणस्य च ॥३३॥ मेरी और लक्ष्मणकी सब कुशल कहना ॥३३॥ तथा अपनी पहचानके लिये मेरी यह उत्तम अंगूठी -अड्ललायकसतन्सं पारज्ञानाथंसुत्तमसू । || जिसपर मेरे नामके अक्षर खुदे हुए हैं, सीताजीको सीताये दीयतां साधु मन्नामाक्षरशुद्रितस्‌ ॥३४॥ | अति सावधानीसे दे देना! ॥ २९ ॥ ऐसा कहकर इत्युकत्वा प्रददौ मह्यं फराग्रादङ्ुलीयकम्‌ | ' उन्होंने अपनी अंगुळीसे उतारकर वह अगूठी मुझे _ तं देवि ६ _ दी । मैं उसे बड़ी सावधानीसे छाया हूँ । देवि | आप बला || , प्रयलेन मयानीतं देवि पया यकय्‌ ॥२५] यह अँगूठी देखिये” ॥ ३५॥ ऐसा कह हत्मान- इत्युक्त्वा मददा देव्ये मुद्रिका मारुता त्मजः । जीने वह अँगूठी देवी जानकीजीको दे दी और नमस्कृत्यः खितो द्राह्नद्भाज्नलिपुटो हरि! ॥३६॥ | नमस्कार कर हाथ जोड़े हुए दूर खड़े हो गये॥ ३६॥ उस रामनामाङ्किता मुद्रिकाकों देखकर सीताजी अति दृष्ट्या सीता प्रमुदिता रामनामाङ्कितां तदा । । आनन्दित हुई और उसे शिरसे ळगाकर नेसे मुद्रिकां शिरता धृत्वा खवदानन्दनेत्रजा ॥३७॥ | आनन्दाश्र बहाने लगीं ॥ ३७॥ न { - 1 / कपे मे प्राणदाता त्वं चुद्धिमानसि राधवे । । तदनन्तर वे कहने wy | तुम मेरे > ES | प्राणदाता हो | तुम बड़े ही बुद्धिमान ओर रघुनाथ- 5 < भक्तोऽसि ग्रियकारी स्वं विश्वासोऽस्ति तवेब हि३८, जीके अक्त तथा प्रियकारी हो । मुझे निश्चय है नो चेन्मत्सन्निथि चान्यं पुरुष प्रेपयेत्कथम्‌ । | उनको भी तुम्हारा ही पूर्ण विश्वास है ॥ ३८ ॥ यदि हनूमन्दटमखिलं मम दुःखादिकं त्वया॥२९॥ ऐसा न होता तो तुम पर-पुरुषको बे मेरे पास क्यों भेजते ? हनुमन्‌ ! मेरी सारी आपंदाए सर्व कथय रामाय यथा मे जायते दया। [तुमने देख ही ळी हैं ॥३९॥ रामको ये मासद्वयाचचि प्राणाः स्थास्यन्ति मम स॒त्तम।।४०॥ | सब बातें सुना देना जिससे उन्हें सुझपर दया ~ Hire उत्पन्न हो । हे साधश्रेष्ट ! अब मेरे प्राण दो ही | मास और रहेंगे ॥ ४० ॥ यदि इस बीचमें रघुनाथजी अतः शीध्रं कपीन्द्रेण सुग्रीवेण समन्वितः ॥४१॥। | न आये तो यह दुष्ट मुझे खा जायगा । अतः यरद | [ज सुग्रीबके सहित अन्य वानर- RR जाट णमाइचे । ¦ भगवान्‌ राम वानरराज सुग्रीबके सहित अन र्‌ वानरानीकपैः सार्थ हतवा रावणमाहवे यूथपोंको लेकर तुरन्त ही रावणको पुत्र और सेनाके सपुत्रं सबं रामो यदि मां मोचयेत्मभुः ॥४२॥ सहित संग्राममे मारकर मुझे छुडायेंग तो ही उत्का र क क ५ 08 9 कप यह पुरुपाथ ठीक होगा । आर तभी तुम इस णन तत्तस्य सदशं वीय वीर वर्णथ वणितस्‌ | ¬ पुरुपार्थका वर्णन करना । हे इजुमन ! तुम भ ष्र he] ~ यथा मां तारयेद्रामो इत्वा शोघं दशाननम्‌ (४३॥ ऐसी युक्तिसे उनसे सव बातें कहना जिससे वे ९ ~ शीघ्र ही रावणको मारकर मेरा उद्धार करें । ऐसा तथा यतस्व हतुमन्वाचा थमसवाप्युदि | करके तुम भी वाचिक पुण्यं प्राप्त करो |” < हनूमानपि तामाह देवि इष्टो यथा मया ॥४४॥ तव हलुमानजीने उनसे कहा--“देवि ! मैंने जैसा ; सलक्ष्मणः शीघ्रमागमिष्यति सायुधः। कुछ देखा है उससे तो यही प्रतीत होता है कि रामः सलक्ष्मणः शाधमागासष्यात साइद। लक्ष्मणके सहित औरामचन्द्रजी शत्र ही अख-शख् टेकर सुग्रीवेण ससेन्येन इत्वा दशघुर्ख वलात्‌ ॥४५॥ सेनायुक्त सुग्रीयके सहित आयेंगे और रावणको NS वल्पूवेक मारकर तुम्हें अयोध्या ले जायेंगे । देवि! 6 ट हे त्र र च टफ है न समानेष्यति देवि त्वामयाच्यां नात्र सशयः । इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है (” तमाह जानकी रामः कर्थ बारिधिमाततस्‌ ॥४६। इसपर जानकीजी कहने लगी, “भगवान्‌ रास तत्यीऽऽयास्यत्मेयात्मा वानरानीकपैः सह । भेगेयातमा है, (उनके शरीरका कोई माप नहीं है, ५ वे सवंब्यापक हैं) किन्तु वानर-यूथपोंके साथ वे हनूमानाह से स्कन्थावारह्य पुरुषर्षभों ॥४७॥ किस प्रकार समुद्रको पार करके यहाँ आयेंगे !” आयाखतः ससेन्यश्व सुग्रीवो वानरेश्वर? । हतमानूजी बोले--“बेः दोनों नरश्रेष्ट मेरे कन्ध ~ वैच तीर ! पर चढ़कर आयेंगे और वानरराज सुग्रीव सेनासहित विहायसा कषणेचेच तीत्वा वारिधिसाततम्‌ ॥४८॥ : इस विस्तीर्ण समुद्रको आकाश-मार्नसे एक क्षणमें पार- निर्ददिष्यति रशौघांस्त्वत्कृते नात्र संश्र्‍यः। ` फर उदे मातत करनेके लिये सम्पूर्ण राक्षस-समहको ' भस्म कर डालेंगे । इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । अनुज्ञां देहि मे देवि गच्छामि त्वरयान्वितः।४९॥ | हे देवि | अब मुझे आज्ञा दो; मैं अभी-अभी अनुज- दृष्ट रामं सह आता त्वरयामि तवान्तिकम्‌ । | सहित भगवान्‌ रामका दर्शन करनेके ल्मे जाता हूँ और शिक हिषे २ उन्हें तुरन्त तुम्हारे पास छानेका प्रयत्न करता हूँ 1. देवि किश्चिदभिश्ञानं देहिमे येन राघवः ॥५०॥ | देवि ! मुझे कोई ऐसा चिह दो जिससे श्रीरघुनाथजी विश्वसेन्मां रेन ततो गन्ता सपुत्तुकः । मेरा विश्वास करें । उसे लेकर मैं बड़ी सावधानीसे | उत्सुकतापूर्वक उनके पास जाऊँगा |” ` ततः किश्चिद्विचार्याथ सीता कमललोचना ५१॥ | तब कमललोचना सीताजाने कुछ सोच-विचारकर विमुच्य केशपाशान्ते खितं चूडामणि ददौ । . | अपने केशपाशमें स्थित चूडामणिको निकाला और अनेन विशवसेद्रामस्त्वा कपीन्द्र सलक्ष्मणः ॥५२) उपे इठभानीको देकर कहा--“हे. कपिर! इससे भगवान्‌ राम और लक्ष्मण तुम्हारा विश्वास ~ अिक्षानार्थमन्यच वदामि तब सुव्रत | '! केगे॥४१-५२॥ हे ुन्रत | उनको विश्वास दिलानेके ean, CTT es ववा. ह १0. शशश vee, सर्ग ३] सुन्द्रकाण्ड २१७ ४-७-४५7७ ४८५-५-३-४- = RRR SNS ep, ५५ चित्रकूटगिरो पूपेमेकदा रहसि खितः । मदङ्गे शिर आधाय निद्राति रघुनन्दनः ॥५३॥ ऐन्द्रः काकसतदाऽऽगत्य नखैरतुण्डेन चासकृत्‌ । मत्पादाझुष्ठमारक्त विददारामिपाशया ॥५४॥ ततो रामः प्रदुद्ष्याथ इष्ट्वा पादं कृतत्रणम्‌ । केन भद्रे कृतं चेतादिप्रियं मे दुरात्मना ॥५५॥ इत्युकत्वा पुरतोऽपइ्यद्वायसं मां पुनः पुनः । अभित्र्वन्ते रत्ताक्तनखतुण्डं चुकोप ह ॥५६॥ ठृणसेकमुपादाय दिव्यास्रेणाभियोज्य तत्‌ । चिक्षेप लीलया रामो वायसोपरि तज्ज्वलन्‌॥५७॥ अभ्यद्रवद्धायसथ भीतो लोकान्‌ भ्रमन्पुन! । न्द्र्र्मादिभिश्चापि न शक्यो रक्षितुं तदा ॥५८॥ रामस्य पादयोरग्रेऽपतद्कीत्या दयानिधेः । शरणागतमालोक्य रामस्तमिदमब्रवीत्‌ ॥५९॥ अमोधमेतदर्स मे दच्यैकाक्षमितों ब्रज। सव्यं दरवा गतः काक एवं पोरुपवानपि ॥६०॥ उपेक्षते किमर्थ मामिदानीं सोऽपि राघवः । हनूमानपि तामाह शृत्वा सीताइुभापितम्‌॥६१॥ देवि त्वां यदि जानाति खितामत्र रघुत्तमः । करिष्यति क्षणाद्धस्म लङ्कां राक्षसमण्डिताम।६२। जानकी प्राह त॑ वस्स कथं तयं योत्स्यसेज्सुरे! । अतिद्नक्ष्मवपुः सर्वे वानराश्च भवादृशाः ॥६२॥ शरुत्वा तद्वचनं देव्ये पूर्यरूपंमदशयत्‌ । मेरुमन्दरसङ्कांं रक्षोगणतिभीपणम्‌ ॥६४॥ दृष्टा सीता हनुमन्तं महापर्वतसन्निभम्‌ । रा मय्य लिये एक बात और बतलाती हूँ---एक दिन चित्रकूट परवेतपर श्रीरघुनाथजी एकान्तमें मेरी गोदमें शिर रखे रहे थे ॥ ५३ ॥ इसी संमयं इन्द्रका पुत्र ( जयन्त ) काक-वेषमें वहाँ आया और मांसके छोमसे मेरे पैरके छाळ-छाळ अँगूठेको अपनी चोंच तथा पज्ञोसे फाड़ डाला ॥ ५४ ॥ तदनन्तर जब श्रीराम- चन्द्रजी जागे तो मेरे पेरमें घाव हुआ देखकर बोळे--“प्रिये ! किस हुरात्माने मेरा यह अग्रिय किया है £” ॥ ५५ ॥ वे यह कह ही रहे थे कि उन्होंने अपने सामने उस कोएको बारम्बार मेरी ओर आते देखा । उसकी चोंच और पञ्जे रुधिरसे सने हुए थे। उसे देखकर उन्हें बड़ा क्रोध हुआ ॥ ५६॥ उन्होंने तुरन्त ही एक तृण उठाकर उसपर दिव्याश्रका प्रयोग ' किया और उसे लीळासे ही उस कौएकी ओर फेंक दिया । उसके तापसे सन्तप्त हो वह काक भयः भीत होकर त्रिलोकीमें भटकतो फिरा किन्तु जब इन्द्र, ब्रह्मा आदिसे भी उसकी रक्षा न हो सकी तो बहुत + ही डरता-डरता दयानिधान भगवान्‌ रामके चरणांमें गिरा । उसे शरणागत देख श्रीरामचन्द्रजीने उससे कहा--॥५७-५९॥ “मेरा यह अन अमोध है। ( यह कभी व्यर्थ नहीं जा सकता ) । अतः तू केवळ अपनी एक आँख देकर यहाँसे चला जा । तब. वह काक अपनी वाया आँख देकर चला गया। जो ऐसे पुरुपार्थी हैं बे ही श्रीरघुनाथजी न जाने इस समय क्यों मेरी उपेक्षा कर रहे है?” सीताजीका यह कथन सुनकर हनुमान्‌जीने कहा-- “देवि ! जिस समय श्रीरधुनांथजीको तुम्हारे यहाँ होनेका पता चढेगा उस समय इस राक्षस-मण्डल- मण्डिता लंकाको वे एक क्षणमें ही भस्म कर डाळगे” ॥ ६०-६२ || जानकीजीने कहा--“बत्स ! तुम अत्यन्त सूक्ष्म झरीरवाले हो, अतः राक्षसोंसे कैसे छड़ सकोगे ! और सब वानर भी तो तुम्हारे ही समान होंगे १?) ६३ ॥ देवी जानकीजीके ये वचन सुनकर हनुमानजीने उन्हें अपना पूर्वरूप दिखळाया । जी मेरु और.मन्दर पर्वतके समान अति विशाळ और राक्षसोंको भय उत्पन्न, करनेवाला था ॥ ६४ || हनुमानजीकों महा- पर्षेतके समान विशालकाय देखकर सीतांजीको अपारं ध्य व ९. २१८ हपेंण महताऽऽविष्टा प्राह तं समर्थोऽसि महास्त द्रक्ष्यन्ति त्वां महाबलम्‌ राक्षस्यस्ते शुभ! पन्था गच्छ रामान्तिकं हुतम्‌।६६। बुभुक्षितः कपिः प्राह दर्शनात्पारणं मम । भविष्यति फलैः सनैरतव इष्टो खितेहिं मे ॥६७॥ तथेत्युक्तः स जानक्या भक्षयिरया फलं कपि! । ततः ग्रस्यापितोऽगच्छञ्जानकी प्रणिपत्य सः। किखिद्रसथो गत्वा खात्मन्येवान्तरचिन्तयत्‌।६८। कार्याथमागतों दूतः खामिकार्याविरोधतः । अन्यर्किञ्चिदसम्पाधच गच्छत्यधम एव स! ॥६९॥ अतोऽहं किञ्चिदन्यच्च कृत्वा इष्ट्राऽथ रावणम्‌। सम्भाष्य च ततो रामदरशनाथ ्रजाम्यहम्‌ ॥७०॥ _ इतिनिश्चित्य मनसा वृक्षखण्डान्महावठ! । . उत्पाटयाशोकबानिकां निईक्षामकरोतक्षणात्‌॥७१॥ सीता55श्रयनर्ग त्यकत्वा वनं शून्य चकार स! । उत्पाटयन्तं विपिनं दृष्ट्या राक्षसयोपितः ॥७२॥ अएच्छन्‌ जानकीं कोऽसौ वानराकृतिरुळ्ूटः॥७३]॥ जानक्युवाच भवत्य एव जानन्ति मायां राक्षसनिर्मिताम । नाहमेनं विजानामि दुःखशोकसमाकुरा ॥७४॥ इत्युक्तारत्वरितं गत्वा राक्षस्यो भयपीडिताः। हनूमता कृतं सर्वे रावणाय न्यवेदयन्‌ ॥७५॥ देव कथिन्महासरतवो वानराकृतिदेहसृत्‌ । सीतया सह सम्भाष्य हशोकवानैकां धंणात्‌। उत्पाट्य चैत्यग्रासादं बभञ्जामितविक्रमः ॥७६॥ प्रासांदरक्षिण! सबोन्हत्वा तत्रैव तस्थिवान्‌ । .¬वच्छूत्वा तूर्णयुत्याय बनमङ्ग महाऽग्नियस्‌ ॥७७॥ | 3 अध्यात्मरामायण र = = कपिङुञ्जरम्‌ ॥६५॥ | आनन्द हंआ और वे उन काभश्ेष्से कहने ट्गी- [सर्ग ३ pe मव सकमन म्याक ॥ ६५॥ “हे महासत्त्व ! तुम बड़े ही सामर्थ्यवान्‌ हो; अच्छा, अव तुम शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजीके पास जाओ । हे महावीर | तुम्हें राक्षसियाँ देख छेंगी, (अतः अव तुम जाओ) तुम्हारा मार्ग कल्याण- मय हो ॥ ६६॥ हनुमानजीकों भूख लगी हुई थी | वे बोढे-“देवि ! आपका दर्शन कर अब मुझे आपके सामने छगे हुए फोंसे पारण करनेकी इच्छा होती हैं” || ६७॥ तब जानकीजीके “बहुत अच्छा कहने- पर कपिवरने वे फल खाये और उनके विदा करनेपर उन्हें प्रणाम करके चळ दिये । फिर कुछ दर चलनेपर उन्होंने अपने मनमें सोचा ॥ ६८ ॥ जो दृत अपने खामीके कार्यके लिये आकर उसमें किसी प्रकारका विन्न न करनेवाला कोई और कार्य न करके यों ही चला जाता हैं वह अधग ही है ॥ ६९ ॥ अतः में कुछ और भी करूँगा और रावणसे मिलकर तथा बातचीत कर फिर श्रौरघुनाथजीके दर्शनार्थ जाऊँगा” || ७० || मनमें ऐसा निश्चय कर महाबली हनुमानजीन बृक्षों- ` को उखाइकर अशोकवाठिकाको एक क्षणर्म ही वृक्ष- हीन कर दिया ॥ ७१ ॥ जिसके नीचे श्रीसीताजी बैठी थीं उस वृक्षको छोड़कर शेष समल वाटिकाको उन्होंने उजाड डाला | उन्हें बन उजाइते देख राक्षसियोने जानकीजीसे पूछा, “यह वानराकार विकट वीर कोन है ?” ॥ ७२-७३ ॥ जानकीजी चोळीं--इस राक्षसी मायाको आप ही लोग जानें । दुःख ओर शोकसे आतुर मैं यह क्या जानें? ॥ ७४॥ जानकीजीके इस प्रकार कहनेपर भयपीडिता _ राक्षसियोंने राबणके पास जा उसे हनुमानजीकी सारो करतत कह सुनायी ॥७५॥ वे कहने लगी--"देव ! एक बड़े पराक्रमी वानरावार प्राणीने सीताजीसे सम्मापण कर एक क्षणमें ही सारी अशोकवाटिका उजाड दी है। उस महापराक्रमीने मन्दिरके प्रसादको भी तोड़ डाला और उसके सव रक्षकोंको मारकर इस समय भी वह वहीं बैठा हुआ है।” वनविध्वंसका यह महान्‌ प्रय समाचार सुनकर राक्षसराज रावण तुरन्त उठा १ सर्ग ३] To सुन्दरकाण्ड २१९ किङ्करान्मरपयामास नियुतं राधसाधिपः । निमयचेत्यप्रासादम्रथमान्तरसं खितः हचुमान्पर्चताकारो लोहस्तम्भकृतायुधः ॥७८]॥ किश्चिछाइलचलनो रक्तास्यो भीषणाकृति। ॥॥७९॥| म्रापतत्त महासङ्घ राक्षसानां ददश स! । चकार सिंहनादं च श्रुत्वा ते मुमुहुभशम्‌ ॥८०॥ इनूमन्तमथो दृष्ट्या राक्षसा भीषणाकृतिम्‌ । निर्जध्चुर्विविधाखोधेः सर्वराक्षसघातिनम्‌ ॥८१॥ तत उत्थाय हजुमान्सुद्गरेण समन्ततः । निष्पिपेष क्षणादेव मशकानिव यूथपः॥८२॥ निहतान्किङ्करान्‌ शृत्वा रावणः कोधमूञ्छितः । पञ्च सेनापतींस्तत्र प्रेपयामास दुर्मदान्‌ ॥८२॥ हनूमानपि तान्सवाछोहस्तम्भेन चाहनत्‌ । “ ततः कदो मन्त्रिसुतान्प्रेपयामास सप्त सः ॥८४॥ आगतानपि तानम्सर्वान्पूरववद्वानरेश्वरः । ' श्षणानिःशेपतो हत्वा लोहस्तम्भेन मारुति॥।८५॥ पूर्वखानमुपाश्रित्य प्रतीक्षन्‌ राक्षसान्‌ खितः । ततो जगाम वळवान्कुमारोऽक्षः प्रतापवान्‌ ॥८६॥ तपुत्पपात हनुमान दष्राऽऽकाशे समुद्र! । गगनात्वरितो मूर्ति मुह्रेण व्यताडयत्‌ ॥८७॥ :- , हत्वा तमक्षं निःशेपं बलं सवें चकार सः ॥८८॥ ततः श्रुत्वा छुमारस्थ बधं राक्षसपुङ्गवः । क्रोधेन महता55विष्ट इन्द्रजेतारमत्रबीत्‌ ॥८५९॥ पुत्र गच्छाम्यहं तत्र यत्रासते पुत्रहा रिपुः । हत्वा तमथवा वद्ध्या आनयिष्यामि तेऽन्तिकम्‌॥ इन्द्रजित्पितरं ग्राह त्यज शोक महामते । और उसने दश लाख सेवकोंको भेजा। इधर, पर्वताकार हनुमानजी लोहेके खम्मको शख्रूपसे लिये इए उस हटे-फटे मन्दिरके प्रथम भागमें वैठे थे । उनकी पूँछ कुछ-कुछ हिल रही थी, तथा सुख अरुणवर्ण और आकृति भयानक थी ॥ ७६-७९ ॥ राक्षसोंके समूहको आया देख उन्होंने धोर सिंहनाद किया, जिसे सुनकर वे सब अत्यन्त स्तब्ध हो गये ॥ ८० ॥ फिर सम्पूर्ण राक्षसोंको मारनेवाळे भीषणाकार हलुमानूजी- को देखकर राक्षसोंने उनपर नाना प्रकारके अख-हंख छोड़े ॥८१॥ तदनन्तर, यूथपति गजराज जैसे मच्छरोंको मसल डाळता है वैसे ही हनुमानूजीने उठकर अपने सुद्गरसे एक क्षणमें ही सबको चारों ओरसे पीस डाला ॥ ८२॥ अपने किङ्करोंका मरण सुनकर रावण क्रोधसें पागल हो गया और उसने वहाँ पाँच बड़े बाँके सेनापतियांको (अपनी सेनाके साथ ) भेजा ॥ ८३ ॥ हनुमानजीने अपने छोह-स्तम्मसे तुरन्त ही उन सबको मार डाला | तब उसने अति क्रोधित होकर सात मन्त्रपुत्रोंको भेजा || ८४ || वानराधीश पवननन्दनने, वहाँ आनेपर उन सबको भी पहलेकी भाँति एक क्षणमें ही उस लोह-खम्मसे मार डाला || ८५॥ और ' अपने पूर्व-स्थानमें ही बैठकर अन्य राक्षसोंके आनेकी बाट देखने छगे | तब अति बलवान और प्रतापशाळी राजकुमार अक्ष आया ॥ ८६ ॥ उसे देखकर हनुमान्‌- जी अपना मुद्र लेकर आकाशमें उड़ गये और बड़े वेगसे ऊपरसे ही उसके मस्तकपर मुद्गरका प्रहार किया । इस प्रकार अक्षको मारकर उसकी सेनाका भी नामो-निशान मिटा दिया ॥ ८७-८८ ॥ राजकुमार अक्षके बधका वृत्तान्त पाकर राक्षसराज रावण अत्यन्त क्रोधमें भरकर इन्द्रजित्से बोला-- “बेटा ! जहाँ मेरे पुत्रका मारनेवाळा मेरा शत्रु है मैं वहाँ जाता हुँ और उसे मारकर या बाँधकर तेरे पास लाता हूँ” ॥ ८९-९०॥ इन्द्रजितने पितासे कहा--हि महामते ! शोक न कीजिये; मेरे रहते इए आप ऐसे मयि खिते किमर्थ त्वं मापसे दुःखितं वचः दुःखमय वचन क्यों बोलते हैं! ॥ ९१॥ मैं उस २२९० बद्ष्माऽऽनेष्ये हुतं तात वानरं अह्मपाशतः । इत्युकत्वा रथमारुद्य राक्षसेवहुभिर्दतः ॥९२॥। जयाम वायुपुत्रस्य समीपं वीरविक्रमः । ततोऽतिमितं शरुत्वा ्तम्मशुदयम्य वीर्यवाव्‌॥९२॥ उत्पपात नमोदेशं गरुत्मानिव मारुतिः । ततो भ्रमन्तं नभसि हनुमन्तं शिळीमुखे! ॥९४॥ विदृध्या तस्य शिरोभागमिपुमिश्राष्टमि। पुनः । हृद्यं पादयुगलं पड्भिरेफेन वालधिम्‌ ॥९५॥ भेदयित्वा ततो घोरं सिंहनादमथाकरोत्‌ । ततोऽतिहपीद्व्ुमांरम्भशुद्यम्य वीर्यवान्‌ ॥९६॥ जघान सारथिं सारश्च रथं चाचूर्णयतक्षणात्‌ । ततोऽन्यं रथमादाय मेघनादो महाबलः ॥९७॥ शीध्रं अल्यात्लमादाय बद्ध्वा वानरपुङ्गपरम्‌ | निनाय निकटं राज्ञो रावणस्य महाबलः ॥९८] यस्य नाम सततं जपन्ति ये- ऽज्ञानकर्मक्ृतवन्धनं क्षणात्‌ । सद्य एव परिशुष्य तत्पदं है यान्ति कोटिरविभासुरं शिवम्‌ ॥९९॥ तस्येव रामस्य पद म्वुज सदा हृत्पद्ममध्ये सुनिधाय मारुतिः ! सदेव निमुनंक्तसमस्तवन्धनः अध्यात्मरामायण RROD SINAN TSR er TS TTSSSII Sus Se SEIS ISIN WS eg ्कयक्य्या क ४१४५४७४ [ सगे ४ चानरको शीघ्र ही भद्मपारामं बॉँघकर लिये आता हूँ |? ऐसा कह बह महापराक्रमी वीर रथपर चढ़ा और बहुत-से राक्षसोंके साथ पवनपुत्र हनुमानके पास पहुँचा। तव, वीर्यवान्‌ हनुमानजी भयद्गर सिंहनाद सुन हाथमे स्तम्म लिये गरुइके समान आकाइामं उइ गये | उन्हें आकाद्रमें उडते देख इन्द्रजितने आद चाणोंसे उनके डिरको बरींधा, फिर छः वार्णोसि, उनके हृदय और दोनों चरणांको तथा एकसे उनकी पूँछकों बीधकर वह घोर सिंहनाद करने लगा । तव महा- बलवान्‌ हचुमान्‌जीने मी अति प्रसनतासे म्तम्म उठाकर एक क्षणमें ही उसके सारथीकों मार डाळा और घोडके सहित उसके रथको चूर्ण कर दिया । तव महाबली मेघनाद ( इन्द्रजित्‌) ने दूसरे रथपर चढ़कर तुरन्त ही वानरश्रेष्ठ हन॒मानर्जीको व्रह्मपादासे बाँध लिया और उन्हें राक्षसराज रावशके पास रे गया ॥ ९२-९८ || जिनके नामका निरन्तर जप करनेब्राले भक्तजन एक क्षणमें ही अज्ञानकृत बन्धनको काटकर करोड़ों सूर्योके समान प्रकादामान उनके परम कल्याणमय पदको तत्काळ प्राप्त कर लेते हैं, उन्हीं भगवान्‌ रामके चरणकमरोंको सदा अपने हदयकमळमं धारण करनेसे हचुमानजी सदा ही समस्त घन्धनोंसे छूटे हुए हैं । उनका त्रहमपाश अथवा और किसी बन्धनसे क्या किं तस्य पाशैरितरेश्च बन्धने! 11१००] | हो सकता है ? ॥ ९९-१०० ॥ इति श्रीमदभ्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे सुन्दरकाण्डे तृतीयः समः ॥ ३ ॥ NB € ° चतुथ सग हनुमान, और राचणका संवाद तथा छङ्कादहन । श्रीमहादेव उवाच यान्त कपीन्द्र घृतपाशवन्धनं विलोकयन्तं नगरं विभीतवत्‌ । अताडयन्मृष्टितहैः सुकोपनाः पोरा; समन्तादचुयान्त इद्षितुस्‌ ॥ १ ॥ श्रीमहादेवजी वोळे--हे पार्वति ! ब्रह्मपाइसे चेंधे हुए श्रीहनुमान्‌जी जब डरे हुएके समान नगर देखते जा रहे थे, उस समय उन्हें देखनेके लिये इधर-उधरसे इकट्ट हुए | पुरवासी उनके पीछे-पीछे चलते हुए उन्हें करोधपू्क धूँसोसे भारने छगे ॥ १ ॥ ब्रह्माजीकै सर्ग ४] सुन्दरकाण्ड २२१ Dv oxo त्रह्ञा्रमेनं क्षणमात्रसङ्कमं कृत्वा गतं ब्रह्मवरेण सत्वरम्‌ । जञात्वा हनूमानपि फल्णुरज्जुमि- ` शतो ययो कार्यविशेषगारवात्‌॥ २॥ सभान्तरखस्य च रावणस्य तं ~ पुरो निधायाह बलारिजित्तदा । ` ब॒द्धो मया ब्रह्मवरेण वानरः समागतोऽनेन हता महासुराः ॥ ३॥ यहुक्तमत्राये विचार्य मन्त्रिभि- विंधीयतामेष न लौकिको हरि! । ततो विलोक्याह स राक्षसेश्वरः अहुस्तमग्रे स्थितमञ्जनाद्विभम्‌ ॥ ४॥ प्रहस्त एच्छेनमसौ किमागतः किमत्र कार्य छुत एव वानरः । चनं किमथ सकलं विनाशितं हताः किमर्थ सम राक्षसा बलात्‌॥ ५॥ ततः प्रहस्तो हचुमन्तमादरा- त्पप्रच्छ केन भ्रहितोऽसि वानर । भयं च ते माऽस्तु विमोक्ष्यसे मया सत्य वदस्वाखलराजसनिधो ॥६॥ ततो5तिहर्पात्पवनात्मजो रिपु निरीक्ष्य ठोकत्रयकण्टकासुरम्‌ । वक्तुं प्रचक्रे रघुनाथसत्कथां क्रमेण रामं मनसा सरन्युहुः ॥ ७॥। शृणु स्फुटं देवगणाद्यमित्र हे रामस्य दृतोऽहमरोषहृत््ितेः | यस्याखिलेशस्य हृताऽघुना त्वया , भार्या स्वनाशाय शुनेव सद्भविः॥ ८॥ स राघयोऽभ्येत्य मतङ्गपयेतं सुग्रीचमैत्रीमनलस्य कृत्वैकवाणिन निहत्य वालिनं सुग्रीबभेवाधिपतिं चकार तम्‌॥ ९॥ स॒ वानराणासघिपो महावली महावलेवानरयूथकोटिमिः । रामेण साधं सह लक्ष्मणेन भो सन्निधौ । वरके प्रभावसे ब्रह्मा हनुमानजीके झारीरका क्षण- भरके लिये स्पर्श कर तुरन्त चला गया । यह वात जानकर भी श्रीहनुमानजी विशेष कार्य सम्पादन करनेके लिये तुच्छ रस्सियोसे ही बँघे हुए राबणके पास चले गये ॥ २॥ तब इन्द्रजित्‌ उन्हें सभामें खित रावणके सामने ले गया और बोळा--“में इस वानरको ब्रह्माके वरके ग्रभावसे बाँध छाया हूँ; इसीने हमारे बड़े- बड़े वीर राक्षस मारे हैं।| ३ ॥ महाराज ! मन्त्रियोके साथ विचारकर इसके लिये जैसा उचित समझें वैसा विधान करें | यह कोई साधारण वानर नहीं है |” तब राक्षसराज रावणने सामने बैठे हुए कजळगिरिके समान कृष्णवर्ण प्रहस्तसे कहा--॥ ४ ॥ “प्रहस्त | इस बन्दरसे पूछो तो सही, यह यहाँ क्यों आया है? इसका क्या कार्य है ! यह कहाँसे आया है : इसने मेरा सारा वन क्यों उजाड डाला १ और मेरे राक्षस वीरांको बळात्कारसे क्यों मारा ?” || ५॥ तब प्रहस्तने हनुमानजीसे आदरपूर्वक पूछा--“वानर ! तुम्हें किसने भेजा है ! तुम डरो मत; राजराजेशवरके सामने सब बात सच-सच बतछा दो; फिर मैं तुम्हें छुड़ा दूँगा ॥ ६॥ तब अपने शत्रु त्रिलोकीके कण्टकरूप राक्षसराज रावणको देखकर पवननन्दन हनुमानूजीने हृदयमें बार- म्बार श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण कर अति हर्षित हो क्रमसे रघुनाथजीकी सुन्दर कथा कहनी आरम्भ की ॥७॥ वे कहने छगे--“हे देवादिके शत्रु रावण | तुम साफ-साफ सुनो; कुत्ता जिसप्रकार हविंको चुरा छे जाता है उसी प्रकार तुमने अपना नाश करानेके लिये जिन अखिलेश्वरकी साध्वी मार्याको हर छिया है मैं उन्हीं सर्वान्तर्यामी भगवान्‌ रामका दूत हूँ ॥ ८॥ उन श्रीरघुनाथजीने मतङ्गपवतपर आकर अझ्निके साक्ष्यमें सुभ्रीवसे मित्रता की और एक ही वाणसे वाळीको मारकर सुग्रीचको वानरोंका राजा बना दिया॥ ९ ॥ हे रावण ! इस समय वे महाबळी वानरराज ओर भौ करोड़ों महाशूरवीर वानरयूथोंके साथ राम और छक्ष्मणके सहित अति कोधयुक्त हो प्रवर्षण पर्वतपर विराजमान हैं रवर्षणेऽमर्षयुतोऽबतिष्ठते ॥१०। ॥ १० ॥ उन्होंने श्रीजानकीजीको टूँटनेके लिये दशों अध्यात्मरामायण [ सगे ४ RRS Id हकनाक ~ २२३ rr सञ्चोदितासतेन महाइरीश्वरा धरासुतां मागयितुं दिशो दश । तत्राहमेकः पवनात्मजः काप सीतां विचित्वन्छनकः दृष्टा मया पद्मपलाशलोचना सीता कपित्वादिपिन विनाशितस्‌ । दृष्टा ततोऽहं रमसा समागता- नमां हन्तुकामाच्‌ एतचापसायकान्‌ ॥१२॥ दिदारओमिं वई-वडे वानर्श्वर भेजे ह । उन्हीमिते एक वानर में वायुका पुत्र, में सीताजीका घीर-चीर दूदा ' हुआ यही आया है ॥ ११॥ मं कमल्दळटाचना समागतः ॥११॥ जानकीजीका दशन कर झुका ६ फिर अपने बानर- खभावस मैने बन उजाइ दिया, और जब मंन रामों को बड़े वेगसे धनुप-वाण आदि लेकर अपनो मारने : के लिये आते देखा, तो उन्हें भारळार अपनी र) रक्षा का, क्योकि ! राजन | अपना दारॉोर ता सभा देदधारियोंकों प्यारा होता हे. । पिर यह मेघनाद . Li ! | - सया क प कना प्रभो | | नामक राक्षस मुझे बराम बायर यदी दे आवा पाशेन ध्य मां तत ॥ १२-१३ ॥ हे रावण ! में यद्यपि यह जानना था नह्माजपाशन नव हा सा पट कि ब्रह्माजीके चरके प्रभावसे वह त्रदायांदा मुझे छते समागमन्मेषानिनादनामकः ॥१२॥ | = पटा गया, तथापि करुणाया तग हिलओं बात स्टू मां मक्षवरमभावत- । बतानेके लिये में बंध दणके समान महा चला आया १९ त्यक्त्वा गतं सर्ैमयैमि रावण | , है रावण ! तुम विवेकपूर्यक संसारको गतिका विचार तथाप्यह वद्ध इवागता हत ' करो; राक्षसी चुडिकों अ्ीकार मत करो और संसार प्रवक्षकामः करुणारसाद्रधीः ॥१४॥ | «न्यनसे छटानेदाढों प्राणियोंकी अत्यन्त हितकारिए विचायं लोकस्य विवेकतो गतिं देवी गतिका आश्रय ले ॥ १५ ॥ तुम बरद्माजीकि अति ` न राक्षसा वुद्धिमुपाहे रावण | । उत्तम बंद उत्पन्न हुए हो नथा एुलसूयनम्दन विश्चवा- re i. > ~ «> ~ ~ देवी भतिं संसुतिमोक्षहेतुकां ' के पुत्र और कुरवे भाई हो; अनः देग्गे, तुम तो समाश्रयात्यन्ताहताय दहिन ॥१५॥ ` दहात्मवश्रिस भी राक्षस नहो दो; किर आत्मतुसिसे त्वे ब्रह्मणां हत्तमवेशसस्थवः : राक्षस नहीं छा--इसम तो करना हो कया 6; | 11 १६॥ (तुम बालवम कोन हा सा 1 ) तुम सवथा निर्विकार हो; इसलिये शरीर, बुद्धि, इन्द्रियों और दुःखादि--ये न तुस्दारे गुण) हैं ओर न तुम खय हो । इन सबका कारण | अज्ञान हे और स्त्रमदध्यके समान ये सत्र असत ई पॉलस्त्यपुत्रोऽसि कुवेरवान्धवः | देहात्मबुद्धथापि च पद्य राक्षसो नाखात्मबु दया किमु राक्षसो नहि ॥१६॥ | शर्रारवुद्धीन्द्रियदुःखसन्तति- नते नच त्वं तव निर्विकारतः । 1] | भः अज्ञानहेरोश तये र ॥ १७॥ यह बिल्कुल कि तुग्हारे आगम श्च तथेव सन्तते स्वरूपमें कोई विकार नहीं है क्योंकि अद्वितीय दोनेसे रसत्त्मस्याः खपता हि इश्यचत्‌ ॥१७॥ | उसमें कोई विकारका कारण ही नहीं है। जिस प्रकार इद्‌ तु सत्य तच नाख विक्रिया आकाश सत्र होनेसे भी ( किसी पदार्थके गुण-दोपसे ) विकारहेतुर्न च तऽष्वयत्वतः । लिप्त नहीं होता उसी प्रकार तुम देहमें रहते हए यथा नभः सवगतं न लिप्यते सूक्मरूप होनेसे उसके ठुख-दःवादि विकारोंसे लिप्त क्य तथा भवान्देहगतोऽपि चक्ष्पक! । नहीं होते । आत्मा देह, इन्द्रिय, प्राण और दारीरसे ्ट्रयम्राणशरीरसङ्गत- मिला हुआ है' ऐसी वुद्धि ही सारें बन्धनोंका कारण स्त्वात्मेति बुदष्वाऽखिरवन्धमाग्मवेत्‌॥१८॥| होती है ॥ १८॥ और भें चिन्मात्र अजन्मा अविनाशी . *. ह्यानन्दभावोऽहमिति प्रम्रुच्यते । देहोऽप्यनात्मा पृथिवीविकारजो न प्राण आत्माऽनिल एष एव स! ॥१९॥ मृनोऽप्यहङ्कारविकार एव नो न चापि बुद्धि! प्रकृतेर्विकारजा | ` आत्मा चिदानन्दमयोऽविकारवा- ' न्देहादिसङ्षाइचतिरिक्त ईश्वरः ॥२०॥ निरञ्जनो मुक्त उपाधितः सदा ज्ञात्वेवमात्मानमितो विमुच्यते । अतोऽहमात्यन्तिकमोक्षसाधनं वक्ष्ये शृणुष्वावहितो महामते ॥२१॥ विष्णो हिँ सक्तिः सुषिशोधनं घिय- स्ततो भवेज्ज्ञानमतीच निर्मलम्‌ । विशुद्धतत्त्वाचुभवो भवेचतः सम्यस्विदित्वा परमं पदं ब्रजेत्‌ ॥२२॥ . अतो भजखाद्य हरिं रमापतिं रामं पुराणं प्रकृतेः परं विश । विसृज्य मोख्यं हृदि शज्ञुभावनां भजख रामं शरणागतम्रियम्‌ । सीतां पुरस्कृत्य सपुत्रवान्धवो रामं नमरकृत्य विमुच्यसे भयात्‌ ॥२३॥ रामं परात्मानमभावयन्‌ जनो भक्त्या हृदिखं सुखरूपमद्दयमू । कर्थ परं तीरमवाप्लुयाज्ञनो सवाम्ब्रभेईःखतरङ्गमालिनः ॥२४॥ नो चेच्वमज्ञानमथेन पहिंना ज्वलन्तमात्मानमरक्षिताऽरिवित्‌ । नयस्यघोऽधः खकृतैथच पातकैः विंमोक्षशङ्का न चते भविष्यति ॥२५॥ शृत्वाऽमृताखादसमानमापितं तद्वायुद्रनोदेशकन्धरोऽसुरः । अमृष्यमाणोऽतिरुपा कपीश्वरं . ; .-ज्माद रक्तान्तविलोचनो ज्वलन्‌ ॥२६॥ rs तथा आनन्दस्वरूप ही हूँ इस बुद्धिसे जीवं मुक्त हो जाता है । एथिवीका विकार होनेसे देह भी अनात्मा है और प्राण वायुरूप ही है, अतः यह भी आत्मा नहीं है ॥ १९ ॥ अहंकारका कार्य मन अथवा प्रकृतिके विकारसे उत्पन्न हुई बुद्धि भी आत्मा नहीं है । आत्मा तो चिदानन्दखरूप, अविकारी तथा देहादि संघातसे एथक्‌ और उसका स्वामी है ॥२०॥ बह निर्मळ और सर्वदा उपाधिरहित है; उसका इस प्रकार ज्ञान होते ही मनुष्य संसारसे मुक्त हो जाता है । अतः हे महामते | मैं तुम्हें आत्यन्तिक मोक्षका साधन बतळाता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ २१॥ भगवान्‌ विष्णुकी भक्ति, बुद्धिको अत्यन्त शुद्ध करनेवाळी है, उसीसे अत्यन्त निर्मळ आत्मज्ञान होता है । आत्मज्ञानसे शुद्ध आत्मतत्त्वका अनुभव होता है और उससे दढबोध हो जानेसे मनुष्य परमपद प्राप्त करता है॥ २२] इसलिये तुम प्रकृतिसे परे, पुराणपुरुष, सर्वव्यापक आदि- नारायण, लक्ष्मीपति, हरि भगवान्‌ रामका भजन करो । अपने हृदयमें स्थित शत्रुभावरूप मूखेताको छोड़ दो, और शरणागतवत्सळ रामका भजन करो । सीताजीको आगेकर अपने पुत्र और बन्धु-वान्धर्वोके सहित भगवान्‌ रामकी शरण जाकर उन्हें नमस्कार करो । इससे तुम भयसे छूट जाओगे ॥ २३॥ जो पुरुष अपने हृदयमें स्थित अद्वितीय सुखस्वरूप परमात्मा रामका भक्तिपूर्वक ध्यान नहीं करता वह दुःख- तरज्ञावलिसे पूर्ण इस संसार-समुद्रका पार कैसे पा सकता है £ ॥ २४ ॥ यदि तुम भगवानू रामका भजन न करोगे तो अज्ञानरूपी अग्निसे जळते हुए अपने- आपको शत्रुके समान सुरक्षित नहीं रख सकोगे और उसे अपने किये हुए पापोसे उत्तरोत्तर नीचेकी ओर ही छे जाओगे; फिर तुम्हारे मोक्षकी कोई सम्भावना न रहेगी” ॥ २५॥ पृबनसुतके इस अमृतसदश मधुर भाषणको सुनकर राक्षसराज रावण उसे सहन न कर सका और अत्यन्त क्रोधसे नेत्र छाल कर मन-ही-मन जळता हुआ हनुमानूजी- से बोला--॥२६॥ “अरे दुष्टबुद्धे ! त्‌ वानरोंमें अधम है । मेरे सामने इस प्रकार निर्मयके समान कैसे प्रलाप कर Cnt one Od [a २२४ अध्यात्मरामायण | [सग ४ यं ममन विलपसमीतवत्‌ रहा है १ यह राम और वनचर सुम्रीच ध क्या चीड ! पुचद्गमानामधमोऽसि दुष्टपीः । उस नराधमको तो सुग्रीवके सहित में ह मार डाडगा RTT Se oor” re er क एप रामः कतमो वनेचरो ॥ २७॥ ऐ वानर ! पडे नो आज तुझे ही मारूँगा, निहन्मि सुग्रीवयुत॑ नराधमम्‌ ॥२७॥ | किर जानकीका वध करूंगा, तदनन्तर टक्ष्मणक त्वां चाच हत्वा जनकात्मजां ततो सहित रामको माँगा और उनसे पटे उस ब निहन्मि रामं सहलक्ष्मण ततः । | बली वानरराज सुग्रीबरको उसकी वानरसेनाके सद्दित i . सुग्रीचमग्रे बलिनं कपीश्वरं । देरमे मार डाळेंगा |” रावणके ये वचन सुनकर सवानरं हन्म्यचिरेण चानर। हनुमानजी अपने वढे हुए कोत्रमे उसे जछाते हुए-से चत्वा दशग्रीववचः स मारुतिः | बोढे--॥२८॥ “अरे अथय ! मेरी समानता तो करोड़ ` _ विंदृद्धकोपेन दहक्िवासुरस्‌ ॥२८॥ | नाण भी नहीं कर सकते; जानता नहीं, में भगवान्‌ न मे समा राबणकोट्योऽम | रामका दास हुँ, मेरे पराकगका कोई दिकाना नहीं रामस्य दासोऽहमपाराविकमः। | ह ५ दनुमानूजीके ये वचन सुनकर रावणने अग्यन्त श्रत्वाञतकापच हचूमता वचा दशाननो राक्षसमेवमब्रवीत्‌ ।२९॥ पार्श्वे खितं मारय खण्डशः कर्पि क्रोधपूर्वक अपनी चगल्में सरे हुए एक राक्षरसे कहा-- | अरे | इस वानरके दकोररे-दकद़े कारके मार दाळ, उ | जिससे सब राक्षस, मित्र तथा चन्धुगग इस कोतुकको दि पश्यन्हु सनऽ्सुरामत्रयान्धवाः | देखे ।! तव, विभीपणन, हथियार लेकर मारनेके लिये . निवारयामास ततो विभीपणों | क्षैयार इए उस प्रचण्ड राधसको रोककर कहा महाधुर सायुधमुद्दत चध। | “राजन्‌ ! प्रतापी पुरुपांको अन्य राज्यक वानरलूतका राजन्वधाह न भवेत्कथश्वन ! किसी प्रकार भी न मारना चाहिय ॥ २०-३० || प्रतापयुक्त। परराजबानरः ॥३०॥ यदि यह वानर-दृत मारा गया ते। जिनका बंध करने- हतेऽसिन्वानरे दूत वाता का वा निवदर्यत | | के लिये आप उचत हुए हे उन रामको यह समाचार रामाय त्व यञ्चादिय वधाय समुपासथितः ॥३ १॥ | कोन सुनावेगा ? ॥ ३१ ॥ अतः, इस वानरके लिये अतो वधसमं किश्चिदन्य्चिन्तय वानरे । | वधके समान छी कोई और दणड निय कीजिये, सचिहो गच्छतु हरिर दष्ट्राऽऽ्यास्यति दुतम्‌॥३२॥, जिसका चिद् लेकर यह वानर जाय और उसे रामः सुग्रीयसहितस्ततो युद्ध भवेत्तव । देखकर सुग्रीबके सहित राम तुरन्त ही आर्ये और बिभीपणवचः धुवा रावणो$प्येतदजवीत्‌ ॥३२॥ | र उनसे आपका युद्ध हौ" विभीषणका कथन वानराणां हि ठाले महामानो भवेत्किठ । सुनकर रावण भी याँ बरोला--॥३२-३३॥ “बानरोंको अतो बलादिः चछ वेटयि पूँछपर बड़ी ममता होती हैं। अतः इसकी पृक अता वल्लादाथ; पुच्छ वष्टायत्वा अयततः ॥३४) | बस्जादिसे खूब लपेट दो और फिर उसमें आग छगाकर वहिना योजयित्वेनं भ्रामयित्वा पुरेऽभितः इसे नगरमें चारों ओर घुमाकर होड़ दो, जिससे समसत विसजयत पश्यन्तु सव वानरयूथपाः २५ | बानरयूथपति इसकी वह दुर्दशा देखें” ॥ ३४-२७॥ तथेति शणपदधेश्न वसरन्येरनेकशः । तव राक्षसोंने 'बहुत अच्छा' कह हनुमानजी तलाक्तर्वेष्टयामासुलाडुुळं मारुतेडंढम ॥३६॥ | पूँछ सनके पहोंसे और तेलों भगे हुए नाना प्रकारके पुच्छाग्र किश्विदनळं दीपयित्वाऽ्थ राक्षसाः । | चियड़ोंसे बड़ी इृदतासे छपेटी; और पूँझके सिरेपर रज्जुः सुं वद्धा इरया त बलिनोच्सुरा।॥३७॥ | थोड़ी-सी आग छगाकर उन्हें दृढतापूर्वक रस्सीसे बोंध- समन्ताद्‌ म्रामयासासुथोसे$यमितिःवादिनः । | कर-कुछ बलवान्‌ राक्षस उन्हे मारते और वारम्वार तुरही सर्ग ४] य्य्य्य््य्म्भ्ण्््प््््््््््््््ल्ल्लचज्‌्ल्््चञ्ः "४९१५१९४५७७ ६०७० nesses Yo rosa yrirrernon NNN ज्ज्ज्ण्णर रार न नन | तूयथोपेथोपयन्तस्ताडयन्तो शुः ॥३८॥ | हतूमताऽपि तत्सवं सोढं किञ्चिचिकीरधुणाः। गत्वा तु पञ्चिमद्वारसमीपं तत्र मारुति! ॥२९॥ सूक्ष्म वभूव वन्थेभ्यो निःसृतः पुनरप्यसौ । „अश्व पर्वताकारस्तत उत्युत्य गोधुरम्‌ ॥४०॥ संत्रेकं स्तम्भमादाय हत्वा तान्‌ रक्षिणः क्षणात्‌ । विचार्य कार्यशेपं स प्रासादाग्रादगृहाद्गृहम्‌॥४१। उत्प्लत्योत्प्लुत्य सन्दीप्तपुच्छेन महता कपिः | ददाह रङ्कामखिलां साइग्रासादतोरणाम्‌॥४२॥ हा तात पुत्र नाथेति क्रन्दमानाः समन्ततः । व्याप्तः प्रासादशिखरेऽप्पारूढा दैत्ययोपितः।४३॥। देवता इव द्यन्ते पतन्त्यः पावकेऽखिलाः । विभीपणगुहं त्यक्त्वा सभे भस्मीकृतं पुरम्‌॥४४॥ तत उत्प्लुत्य जलधों हनूमान्मारुतात्मज! | सुन्दरकाण्ड २२५ ४४४५५१४४४४५/५८४८१७ ७ ४५ ७०/१४/५०५५ ७१९» ०५००५०१०१० पररा. १ ६५७७४०७०५६ ७००५०७५ ७०१७२ बजाकर यह कहते हुए कि 'यह चोर है! नगरमें सबं ओर घुमाने लगे | ३६-३८ || हनुमानूजीने भी कुछ कौतुक करनेकी इच्छासे यह सब सहन कर लिया | जिस समय वे पश्चिमद्वारपर पहुँचे उस समय तुरन्त ही सूक्ष्मरूप होकर उन बन्धनोंमेंसे निकळ गये और फिर पवेताकार हो उछलकर द्वारके कँगूरेपर चढ़ गये ॥ २९-४० ॥ बहाँसे उन्होंने एक स्तम्भ उखाडकर एक क्षणमें ही उन समस्त रक्षकोंको मार डाला और फिर अपना शेप कार्य निश्चय कर उस प्रासादके अप्र- मागसे एक धरसे दूसरे धरपर छलांग मारते हुए अपनी जळती हुई छम्बी पूँछसे महळ, अटारी और वन्दनवारादिसे युक्त समस्त ळंकापुरीमें आग लगा दी ॥ ४१-४२॥ उस समय द्वा तात ! हा पुत्र | हा नाथ !' कहकर सव ओर फैली इई, महळोंके ऊपर भी चढ़ी हुई तथा अझ्िमें गिरती हुई समस्त दैत्यस्रियाँ देबताओंके समान माळम होती थीं | इस प्रकार हनुमानजीने यिभीषणके घरको छोड़कर और सारा नगर भस्म कर डाला ॥ ४२-४४ ॥ तदनन्तर पबनाध्ष्ज हनुमानजी उछळकर समुद्रमें कूद पडे और लाडूल मञ्जपितवान्तः स्वस्थचित्तो वभूव सः ।४५)| अपनी पूँछ बुझाकर खस्थचित्त हो गये ॥ ४५॥ घायोः प्रियसखित्वाच सीतया प्राथितोऽनलः । सीताजीकी ग्रार्थनासे तथा वायुका प्रिय मित्र होनेके कारण अझ्निने ह्ुमानजीकी पूँछ नहीं जलायी। न ददाह हरेः पुच्छं बभूवात्यन्तशीतछः ॥४६॥ | उनके लिये बह अत्यन्त शीतळ हो गया ॥ ४६॥ यन्नामसंसरणधूतसमस्तपापा- स्तापत्रयानळमपीह तरन्ति सच! | तस्यैव कि रघुवरस्य विशिष्टद्तः जिनके नाम-स्मरणसे मनुष्य समस्त पापोसे टूटकर तुरन्त ही तापत्रयरूप अभिको पार कर जाते हैं उन्हीं श्रीरघुनाथजीके विशिष्ट दूतको यह प्राकृत अग्नि गन्तप्यते कथमसौ प्रकृतानलेन ॥४७॥ | मळा किस प्रकार ताप पहुँचा सकता था £ ॥ ४७॥ ns oC इति श्रीमदध्यात्तरामायणे उमामहेश्वरसंवादे सुन्दरकाण्डे चतुर्थः सगः ॥ ४ ॥ अध्यात्मरामायण [सगे ५ SSS 0 ¢ पञ्चम सग हनुमानज़ीका खीताजीसे विदा होना और श्रीरामचन्द्रजीको उनका सन्देश सुनाना | श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेवजी चोरे-हे पार्वति ! तदनन्तर . नन्नवी टचः श्रीहनुमानजीने सीताजीके पास जाकर उन्हें प्रणाम ततः सीतां नमस्कृत्य हनूसान्रवचः। | दूरके कहा--“देवि ! आप मुझे आज्ञा दीजिये; अव न आज्ञापयतु मां देवि भवती रामसब्निधिस्‌ | १ ॥ | मैं श्रीरघुनाथजीके पास जाता हूँ; वे शीघ्र ह भाई गच्छामि रामस्त्वां दरष्टुमागमिष्यति साचुजः। लक्ष्मणसहित आपसे मिळनेके लिये यहाँ आयेंगे ।” . ~ oe ऐसा कह पवननन्दन हनुमानूजीने जानकीजीकी तीन RS दात्मजः . जानेके इत्युक्त्या वि।परिक्रम्य जानकी मारुदात्मज॥॥२॥ | कमाई कर उन्हें प्रणाम किया और जानेके छिये प्रणस्य प्रस्थितो गन्तुमिदं वचनमत्रवीत्‌ । कुछ दूर चळकर बोळे--“देवि ! मैं जाता हूँ, आपका देवि गच्छामि भद्रे ते तु द्रक्ष्यसि राघवम्‌ ॥ ३ ॥ | शुम हो, आप शीत्र ही सुग्रीव और करोड़ों अन्य लक्ष्मणं च ससुग्रीवं वानराधुतकोटिभिः । | वानरोंके सहित भगवान्‌ राम और रक्ष्मणको देखेंगी ।” ततः प्राह हनूमन्तं जानकी दुःखकशिता ॥४॥ न इ द इ जानान दग 1 अब त्वां दष्दवा विस्तृत इ'खमिदानी सं गथिष्यसि । | हुम जा रहे हो; अब, श्रीरामचन्द्रजीका समाचार सुने इतः परं कथं वर्ते रामवाताश्चुतिं विना॥ ५ विना मैं कैसे रहूँगी” ॥ १-५ ॥ मारुतिरुवाच हनुमानजी बोळे-हे देवि ! यदि ऐसी वात है._ चेषं देवि भे स्कन्धमारोह धषणमात्रतः । और आप स्वीकार करें तो हे जनकनन्दिनी ! आप मेरे कन्धेपर चढ़ लीजिये, मैं एक क्षणमें ही औराम- रामेण योजयिष्यामि मन्यसे यदि जानाकि।। ६ ॥ | चन्द्रजीसे आपको मिला दंगा ॥ ६॥ सीतोवाच , सीताजीने कहा--यदि श्रीरामचन्त्रजी समुद्रको रामः सागरमाशोष्य बद्धा वा शरपञ्जर; । सुखाकर या उसे वाणोंसे बाँधकर यहाँ बानरोंके साथ आयें आगल् वानरेश साथ हत्वा रावणमाहवे ॥ ७॥। | और रावणको युद्धमें मारकर मुझे ले जायँ तो इससे मां नयेद्यदि रामस्य कीतिर्भवति शाइवती । | उन्हें अमर कोर्ति प्राप्त होगी । इसलिये तुम जाओ, अतो गच्छ कथं चापि प्राणान्सन्धारयाम्यहम 1८1 मैं जैसेतैसे प्राण धारण करूंगी ॥ ७-८॥ इति प्रस्थापितो वीरः सीतया प्रणिपत्य ताम्‌ | | सीताजीसे इस प्रकार बिदा हो वीरवर हनुमान्‌ जगाम पर्वतस्याग्रे गन्तुं पारं महोदधेः ॥ ९॥ | उषे प्रणाम कर महासागरके पार जानेके लिये त शिखरपर चढ़ गये ॥ ९॥ वहाँ पहुँचकर महावीर त्र गत्वा महासत्त्वः पादाभ्यां पीडयन्‌ गिरिम्‌ । | हनुमानजी पर्वतको अपने पैरोसे दवाकर वायुवेगसे > चय ( र. ~ जगाम वाडुवेभन पशेतश्च महातलम्‌।१०। | नले और ( उनके दबानेसे) वह तीस योजन ऊँचा गतो महीसमानत्व॑ त्रिंशध्योजनश्चुच्छितः | [| पर्वत प्रथिवीमें घुसकर समतल हो गया। हलुमान- सारुतिगगनान्तश्थो महाशब्दं चकार सः ॥११॥ | जीने आकाशमे जाते समय बड़ा घोर शब्द किया ॥१०- त॑ श्वा वानरः सर्वे ज्ञात्वा मारुतिमागतम्‌ । ११॥ उसे सुनकर सब वानरगण, यह जानकर कि , हनुमानजी लोट रहे हैं, बड़े आनन्दमें भरकर घोर दर्पेण महता55विष्टाः शब्द चक्रम A ` देण महताऽऽविष्टः शब्दं चक्रमेहास्वनम्‌ ॥१२॥ शब्द करने ळो ॥ १२॥ (वे आपसमें कहने ळो---) ९ सगे ५ ] सुन्दरकाण्ड २२७ ovr 0-३५-४ TTT शब्देनेव ब्देनेव विजानीमः कृतकार्यः समागतः । “इस सिंहनादसे ही माळम होता है कि हनुमानजी ~ ® hy हनूसानेव पश्यध्वं वानरा वानरषेभम्‌ ॥१३॥ ये ६ कि करके लौटे हैं । हे वानरगण ! देखो, देखो, $ ब्वत्स चीरे ~ कपिश्रेष्ठ हनुमानजी ही तो हैं ” ॥ १३ ॥ वानर एवं इुवरछु वीरेषु वानरेषु स मारुतिः ड़ डः hl गप उ है उ वीरोंके इस प्रकार कहते-कहते हनुमानजी उस गिरि- अवतोर्य 1 वानरानद्मन्रवीत्‌ ॥१४॥ | शिखरपर उतर आये और उनसे यों कहने लगे "ईष्टा सीता मया लड्ढा धर्षिता च सकानना । ॥ १४॥ “मैंने सीताजीको देखा, अशोकवनसद्दित ` सम्भाषितो दशग्रीदसततोऽह पुनरागतः ॥१५॥ लंकाका विध्वंस किया और रावणसे भी बातचीत इदानीमे न गवसकिष् की । उसके पश्चात्‌ मैं यहाँ आया हूँ || १५॥ अब इृदानीमेव गच्छामों रामउप्रीवर्ान्रधिस्‌ । (हम इसी समय राम और सुग्रीबके पास चलेंगे |” इत्युक्ता वानराः सर्वे हपेणालिज्ञय मारुतिम]॥ १६॥ | हतुमानजीके इस प्रकार कहनेपर सब वानरोंने अत्यन्त केचिच्चुजम्बु्जर ननृतुः केचिदुतसुकाः हषसे उन्हें गळे छगाया, किन्हींने उनकी पूँछ चूमीं केचिच्चुचुम्बुसा्गूरं नृतुः केचिदुत्सुका: । ताले जग प्रसवण गिरि और कोई अति उत्साहसे नाचने लगे | तदनन्तर हनुमान्‌ हनूसता समतासत जगु ग्रस्वण गिरिसू ॥१७॥ | जके साय वे सब प्रशवण पर्वतपर गये ॥ १६-१७॥ गच्छन्तो ददृशुवीरा घनं सुग्रीवरक्षितम्‌ । जिस समय वे वीर वानरगण जा रहे थे उनकी १+ हुरङ्गद दृष्टि सुग्रीबद्वारा सुरक्षित मधुवनपर पडी । उसे तदा ग्राहुरङ्गदं वानरषमाः॥१८॥ | _ | र मंधुसश तदा आइए रमाः ॥१८॥ देखकर वें अंगदजीसे बोळे ॥ १८॥ “हे वीर ! हमें बड़ी भूख लगी है | अतः हे महामते ! हमें आज्ञा फळान्यद्च पिवामोऽसृतवन | दीजिये जिससे आज हम इस वनके फळ खाकर भक्षयामः फलान्यद्य पिवामोड्यूतवन्मधु ॥१९॥ अमृततुल्य मधु पियें ॥ १९ ॥ उसके पश्चात्‌ हम दप दर गच्डामोज्ये होकर भाई लक्ष्मणसहित रघुनाथजीके दर्शन करनेके अङ्गद उवाच अंगदजी बोले--हनुमानजीने कार्य सिद्ध किया हनूमान्कृतकार्यो्य॑ पिबतेतत्मसादतः | (है, अतः हे वानरश्रेष्टाण | इनकी कृपासे तुम जक्षूध्व फलमूलानि त्वरित हरिसत्तमाः ॥२ १ | शीघ्र ही फळ-मूळ खाओ और मधु-पान करो ॥२१॥ ~ ~ गदजीकी आज्ञा पा वानरगण उस वनमें घुस- ततः प्रविश्य हरयः पातुमारेभिरे मधु । न द ए ड कर दधिमुखके भेजे हुए वनरक्षकांकी उपेक्षाकर रक्षिणस्ताननाइत्य दधिवक्त्रेण नोदितान्‌ ॥२२। मध पीने छो ॥२२॥ जब उन वानरोने उन्हें ` पिवतस्ताडयामासुर्वानरान्वानरपेभाः । ।मधुपान करते देखकर मारा तो वे उन्हें छात और ततर्तान्युष्टिमिः पादैदवूर्णयित्वा पपुर्मधु ॥२श॥ | प्ॅसोसे कुचल्कर मधु पीते रहे ॥ २३ ॥ तब सुप्रीव- त वसी , का मामा दधिमुख अन्य वनरक्षकोंके साथ अति करुद्ध ततो द्विशः कुद सुग्रीवस्य स मातुठ!। हो जहाँ वानरराज घुग्रीब थे वहाँ गया ॥ २४ ॥ जगाम रथिभिः साधे यत्र राजा कपीश्वरः ॥२४॥ | वहाँ पहुँचकर वह बोला-- “राजन्‌ | तुमने चिरकाङ- गत्या तमब्रबीदेव चिरकाराभिरक्षितम्‌ । से जिस ॒मधुवनकी रक्षा की थी उसे आज युवराज ५ जे - ५॥ | अगद और हनुमानूने उजाड डाला” || २५॥ दधि- नष्टं मधुबन तेञ्य झुमारेण हनूमता ॥९ मुखकी बात सुनकर सुग्रीव प्रसन्न होकर कहने लगे- शरुत्वा दधिश्चुखेनोक्तं सुग्रीवो हृष्टमानसः | “इसमें सन्देह नहीं पवनकुमार सीताजीको देख आये क्षुधिताः स्मो बयं वीर देद्यनुक्ञां महामते । अध्यात्मरामायण [सगे ५ 2 हक्कन्कनया्छ्यन््का क्क क कभ कभ श््यनय्य्क्् /५/४४४४४४४४४४ी हण्कम्कम्कम्कम्क्कनपकम्फमक कक | तह तो, मेरे मधुबनकी ओर देखनेकी इृष्टाउडतो न सन्देहः सीतां पवननन्दनः ॥२६॥ | द नद 5 मेरे मधुबनक ओर देखनेकी भला किसे नो चेन्मधुवन द्र समर्थः को भवेन्मम । | सामर्थ्य थी £ और उनमें भी निस्सन्देह्द यह कार्य , ५ | किया हलमानजीने ही है" २६-२ त्रापि वायुपुत्रेण कतं कार्य स संशयः ॥२७॥ | किया दमान ह देणा २६-२७॥ क्क सुग्रीवके वचन सुनकर भगवान्‌ रामने प्रसन्न त्वा सुग्रीयवचनं हृष्टो रामस्तमतरवीत्‌ | कसरत न इला उग्र ह्‌ के हो उनसे पूछा--“राजन्‌ ! यह सीता-सम्बन्धी किदे त्वया राजन्वचः सीताकथान्वितम्‌ 1९८ तुम क्या वात कह रहे हो?” ॥ २८ ॥ घुर सुग्रीवस्वत्रवीद्वाक्यं देव दशब्वनीसुता। ने कहा--“भगबन्‌ ! माळम होता है भूमिखुत - या सर्वे प्रविष्ट ॥२९॥ जानकीजीका पता छग गया है, क्योंकि हनुमान्‌ हनूमलामुखाः सर्वे ग्रनिशा सुकन । आदि समस्त वानरगण मधुवनमें घुसकर उसके पळ भक्षयन्ति स्म सकलं ताडयन्ति स रक्षिण।। | खा रहे हैं और उसके रक्षकोंको मारते हैं | विना अकृत्वा देवकार्य ते द मधुवनं मम ॥३० | आपका कार्य किये तो वे मेरे मधुवनकी ओर देख OR । भी नहीं सकते थे | अतः यह निश्चय होता है न समथ स्ततो देव! दृष्टा सातात नाश्वतस्‌ | (कि वे देवी जानकीजीसे मिल आये हैं | रक्षको ! राशिणो वो भयं माऽस्तु गत्वा घत ममाज्ञया ॥ ३ १॥ | तुम डरो मत, उन्हें जाकर मेरी आज्ञा छुनाओ और ' उन अंगदादि वानरोंको मेरे पास छे आओ ।” सुत्रीव- | की आज्ञा सुनकर वे वागुवेग से चले और हनुमान्‌ वानरावङ्कदञ्चखानानयध्यं ममान्तिकम्‌ । नर री ब न श्‌ स्वाते वा युवेग | $ j आदिसे > ुत्वा सुग्रीववचर्न गला ते वायुवेगतः ॥।२२॥ | दिसे कहा--“महाराजको आज्ञा है, आपलोग. _ हनुम्रमुखातूचुर्गच्छतेश्वरशासनात्‌ । तुरन्त वहाँ जाइये क्योंकि राम और छक्ष्मणके सहित महाराज सुग्रीव आपलोगोंसे मिलना चाहते हैं । हे है हि महावीरगण ! आपळोगेसि प्रसन्न होकर वे आपको युष्मानताब हृष्टास्त त्वरयान्त महाबला? । बहुत शीघ्र बुला रहे हैं |” तत्र वे वानरश्रेष्ठ “बहुत तथेत्यम्बरमासाध ययुस्ते वानरोचमाः ॥२४॥ | अच्छा’ कह आकाशम चढ़कर चलने लगे । वे हनूमन्तं पुरस्कृत्य युवराजं तथाऽङ्गदस्‌ । सत्र वानरगण हनुमान और युवराज अंगदको आगे कर चले और तुरन्त ही राम ओर सुग्रीवके सामने हनूमान्‌ राघवं ग्राह इष्टा सीता निरामया | दृष्टमिच्छति सुग्रीव! सरामो लक्ष्मणान्वितः ॥३ ३। | हनुमान्‌जीने पहले श्रीरघुनाथजीको और फिर वानरराज सुग्रीवको साष्टाङ्ग प्रणाम कर श्रीरामचन्द्रजीसे | कहा--“मैं सीताजीको सङुशळ देख आया हूँ॥ ३६॥ कुशल प्राह राजेन्द्र जानकी त्वां शुचान्विता | हे राजेन्द्र शोकमऱा जानकीजीने आपको अपना 1 है कुशल-समाचार सुनानेके लिये कहा है | बे अशोक- अशोकवनिकामध्ये शिशपामूलमाशिता ॥३७॥ | वाटिकाके वीचमें शिंशपा वृक्षके तळे वैठी हैं, और हे A र प्रभो ! सदा राक्षसियोंसे घिरी रहती हैं, अन्न-जळ छोड़ राक्षपाभ! पारद्ता नराहारा कुशा प्रभा । देनेके कारण वे अत्यन्त दुर्बळ हो गयी हैं, और निरन्तर हारामराम रामेति शोचन्ती मरिनास्वरा॥३८॥। | हो राम | हा राम !' कहकर शोक करती रहती | हैं, उनके वस्न मलिन हो गये हे. तथा बाछोंकी मिलकर एक वेणी हो गयी है--ऐसी अवस्था- साएङ्गं प्रणिपत्याग्रे रामं पश्चाद्रीश्वरम्‌ ॥३६॥ . “एकबेणी मया दष्टा शनेराश्वासिता शुभा । ट ५ सगे ५] सुन्दरकाण्ड २२९ Ie SiN ९७०८ sd NNSA SLANG ped he wp ७४९३९ »९-१ ७५ Ud NAA ae 2 द शीशी लीश ५०५१ लडी ४ ४७७ ४टीकी शीट ण 3० ली कोल णक कटी ७०० थक वृक्षशाखान्तरे खित्वा प्क्षमरूपेण ते कथाम|॥३९॥ | में मैंने सीताजीको देखा और धोरेधोरे उन्हें ढॉइस- व बन | वँधाया | वहाँ जाकर पहले मैंने सूक्ष्मरूपसे वृक्षके माना दवार दकान तथा (चोमे छिपेछिये संक्षेपे आपकी सब कथा सुनायी, दशाननेन हरणं जानक्या रहिते त्वयि ॥।४०॥। ¦ जिस प्रकार जन्मसे लेकर आपका दण्डकारण्यमें आना सुग्रीवेण यथा मैत्री कृत्वा वालिनिमईणम्‌ । ; इमः आपकी अतुपसितिमे राबणने सौताजीको हरा, >पारगेणार्थ च वैदेह्याः सुग्रीवेण बिसरबिवाः ॥४१॥ ' तथा जिस प्रकार सुग्रीवसे मित्रता कर आपने बालीको ¢ थेच दला; सुमरवण [वसाजता' , मारा---(वह सब सुनाकर फिर मैंने कहा कि) सुभ्रीव- बला महासच्वा इरयो जितकाशिनः। द्वारा सीताजीकी खोजके लिये भेजे हुए बड़े बळ्यान, गता? सर्वत्र सर्वे चे तत्रैकोऽहमिहागतः ॥४२॥ | क और विजयशाळी बानरगण स दिशाओंमें गये , A सन च | हैं और उनमेंसे एक मैं सुग्रीवका मन्त्री ओर रघुनाथजीका अहं घुग्रीवसचिवी दासीव्ह राबवत दि दास यहाँ आया हूँ। आज भाग्यवश मैने जानकीजीको दृष्टा यज्ञानकी भाग्यात्यासः फरितोऽद्य मे ।४३।, देख लिया अतः मेरा प्रयास सफल हो गया॥३७-४ १॥ शरितम [$ ~~ [a i ४२ ह इत्युदीरितमाकर्ण्य सीता विस्फारितेक्षणा । भरा यह कथन सुनकर सीताजीके ५४ खिल गये कर्णपीयप श्रावितं भो ने छगीं--“सुझे ये कणोमृतरूप शुभ न चा कर्णपीयूपं श्रावितं मे शुमाक्षरम्‌॥४४॥ | "९ वे कहने छगी-- सु भे केन त कर्ण रि भे डू सस । संवाद किसने सुनाया है ? यदि यह सब सत्य है (-सुझे यादे सत्य तदायातु महर्शनपर्थ ठु स! । । श्रम नहीं हुआ है ) तो इस संवादको सुनानेवाछा मेरे ततोऽहं वानराकारः स्क्ष्मरूपेण जानकीम्‌॥४५॥ | सामने आबे ।” हे परमो ! तब मै सरे we तरणम्प्राञ्जलिर्भत्ता दरादेव खितः प्रभो । | आकारमें उनके सामने उपस्थित हुआ और दूर रि | प्रणाम कर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तब पृष्टो5ह सीतया कस्त्वमित्यादि वहुविस्तरस्‌।४६। | जानकीजीने मुझसे तुम कोन हो ? इत्यादि hd & ~, ~ इ: नर = शत्र | { उन $ क्रमश्च वि रिन्दम । बातें पूछीं || ४ ९-१ ६॥ ओर हे शत्रुदमन ! मेला सत क हा वा क्रमशः सब बातें वतला दीं । इसके पश्चात्‌ मैंने उन्हें पद्चान्ममार्पित देव्ये भवइत्ताजुळीयकम्‌ ॥४७॥ | आपकी दी हुई अँगूठी निवेदन की ॥४७॥ इससे उन्हे © च तिवि मुझपर पूर्ण विश्वास हो गया और वे मुझसे इस प्रकार चरन मारत पे्वस्ता पे चेदमत्रवौत्‌ कहने लगी--“हनुमन्‌ ) जिस प्रकार इन राक्षसियों- यथा दृश5सि हलुमन्पीड्यमाना दिवानिशम्‌ ४८ ह त्राससे तुमने मुझे अहनिश दुःख उठाते देखा है राक्षसीनां तर्जमैस्तत्सव कथय राघवे। | वह सब ज्यो-्कान्यों एखुनायजीको ना देना । i गर्क देवि राम्रोऽपि खचिन्तापरिनिष्टितः॥ ४९॥ कहा--“देवि | रघुनाथजी भौ तुम्हारी ह (चन मक्त दभर प [प ताच ४ प्रसा रहते हैं, और तुम्हारा समाचार न मिले » प्रिशोचल्यद्ोरात्र तवद्वाती नाधिगम्य सः । रातदिन तुम्हारी ही चिन्ता करते रहते हैं। मै मिव गराऽहं स्थितिं रामाय ते अबे ॥५०॥ | अमी जाकर उन्हें तुम्हारी स्थिति सुनाऊगा ॥ ४८- इदान गला ह्‌ [| हि ह क ०० [| और रघुनाथजी' उसे सुनते ही सुग्रीव, लक्ष्मण रामः श्रवणसात्रण सग्रावण सलधषमणः । और अन्यान्य वानर सेनापतियोंके साथ तुम्हारे पास वानरानीकयैः सार्धमागमिण्यति तेऽन्तिकम्‌ ॥५१। आयेंगे ॥५१॥ तथा वको व परक > = भेष्यति त्यां स्वर अपनी राजधानी अयोध्याको छे जाथगे। * तुम रावणं सकुठं हत्या नष्यति लां लक इर । पे कोई ऐसा वि दो जिससे भगवान मेरा विवास अभिज्ञा देहि मे देवि यथा मां विश्वसेडियुः ॥ 4९ ॥ | कर” || ५२॥ मेरे इस प्रकार कहनेपर उन्होंने अपने इत्युक्ता सा शिरोगतं चूडापाशे खितं मियम्‌ । शपाशे खित अपनी प्रिया चूडामणि दी और पहले \ (६४ अध्यात्मरामायण [सम्‌ ५ ROIS जज पत > टचए फर ५० चली बल 4 लीक डी का. 244 की ५ दरवा काकेन यदव चित्रकूटगिरो पुरा ॥५३॥ | चित्रकूट पर्वतपर काकके साथ जो कुछ हुआ था वह सब है भी सुनाया तथा नेत्रोंमें जळ भरकर कहा--“रघुनाथ- तद॒प्याहाशुपूर्णाक्षी कुशल अहि राघवम्‌ । | जाते मेरी ुदाळ कहना और छत्ष्मणर्मीसे कहना कि लक्ष्मणं ब्रूहि मे किञ्चिद्‌ दुरुक्ते मापितं पुरा ॥५४। | हे कुळनन्दन ! मने पहले तुमसे जां कुछ कठोर नन्दन । वचन कहे थ उन अज्ञानवश कहे हुए वा्कयोके ठिये तत्क्षमस्थाशभावन भाषित इलनन्द मुझे क्षमा करें। इसके सिवा जिस प्रकार रघुनाथजी कपा तारयन्मा यथा रामस्तथा कुरू कुपाच्मत। | ५ ष्‌ | | करके मरा उद्गार क्र त्रही नष्टा करना 3? | [७३ RET iy २३० इत्युकत्वा रुदती साता दुःखेन महताऽऽइता । । "ऐसा कहकर सीताजी महान दुःखम भरकर रान मयाऽप्याश्वासिता राम वदता सवेमंव ते ॥५६॥। | लगी; मेने भी उन्हं आपका सथ वृत्तान्त मुनाकर ततः ग्रथापिता राम खत्समापामेहागतः । हॉदस बेधाया और फिर उनसे विदा होकर आपके तदागमनवेळायामशोकवनिकां प्रियास्‌ ॥५७। | पास चला भाया । आती-त्रार मैंने रावणको प्रिय अशोक उत्पाट्य राक्षसास्तत्र बहुनहतवा क्षणादहमू | | वाटिका उनाड य और एक क्षणम ह बडुतसे | राक्षस मार डाळे | रावणके पत्रका भी मारा ओर गणस्य सवं णेन ष्य < रावणस्य सुतं हत्वा राबणेनाभिभाष्य च ॥५८॥ | राबणसे वार्तालाप कर ळंकाको सेव ओरसे जलाकर फिर लङ्कामशेपता दग्ध्वा एनरप्यग्म क्षणात्‌ । | क्षणमरमें ही यहाँ चढा आया ।" चत्वा हनूमतो वाक्यं रामोऽत्यन्तप्रहृटघी।।५९॥ | हनुमान्जीके ये बचन सुन श्रीरामचन्द्रजी अति ५७३ > ~ कर कहने लगे-॥५६-००९॥ “हनुमन्‌ ! तुमने कृतं कार्य देवे प्रसन हैं दुसर ॐ देवराव सुदुष्करम्‌ | जो काय किया है वह देवताअसि भी होना कठिन है, में उपकार न पश्याम तच प्रत्युपकारेणः 1६०] | इतके बदलेमें तुग्हारा क्या उपकार करूँ---सो नहीं इदानीं ते प्रयच्छामि सर्वखं मम मारते। | जानता॥६०॥ जो, में अभी तुम्हें अपना सवख संपता ~ , हुँ।” ऐसा कह उन्होंने चानरश्रेष्ठ हनुमानजीको खींच" इत्यारिङ्ण्य समाकृष्य गाढं वानरपुद्भवस्‌ nT ला इस समाकूष्य गाढ वानरउङ्गयम्‌॥६१॥ कर गाढ आढिजन किया ॥ ६१ ॥ उनके नेत्रॉमेंजठ साहलेत्रो रघुश्रेष्ठः परां प्रीतिमवाप स! । भर आया और हदयमें परम प्रेम उमडने लगा। तब हनूमन्तशुवाचेदं राघवो भक्तवत्सलः ॥६२॥ | भक्तवत्सल रघुनाथजीने हनुमानजीसे कहा-॥ ६२॥ परिरम्भो हि मे लोके दुर्ठभः परमात्मनः । संसारमें मुझ परमात्माका आलिङ्गन मिळना अत्यन्त दुळम हे, हे वानरश्रेष्ट ! ( तुम्हें यह सौभाग्य प्राप्त हुआ अतस्त्वं मम भक्तोऽसि प्रियोऽसि हरिपुङ्गव ॥६३1 है ) अतः तुम मेरे परम भक्त और प्रिय हो” ॥ ६३ ॥ यत्पादपत्नयुगर्ल तुलसीदलायेः हे पाति ! जिनके चरणारविन्दयुगल्का तुल्सीदल सम्पूज्य बिष्णुपद्बीमतुलां प्रयान्ति । आर ड कर क शरीरका : Pe ५ 3 | करते हैं उन्हीं रामने जिनके शरीरका आलिठन किया तनव के पनरसा ऽ रसा परिरव्धमूर्ती उन पित्र कर्म करनेवाले पवनपत्रके विययमें क्या रामण वायुतनय! कुतपुण्यपञ्गः ॥६४॥ कहा जाय १ ६४ ॥ -- +१9340४%६2:॥ --- इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेःचरसवादे सुन्दरकाण्डे पञ्चमः सग: ॥ ५ || समाप्तमिदं सुन्द्रक्राण्डस्‌ — Rone , हि 33 ews? का र प ES i “३७.5 10 Sis 4 द ९ ¢} श्रीसीतारासाभ्यां नमः अध्यात्मरामायण BG यस्यातिवीर्यास्चुधिवीचिराजो वंश्यैरहो वैश्रवणो विलीनः । तं वैरिविः्वंसनशीललीळं श्रीजांनकीजीवनमानतोऽस्मि || = ह ४ DRED OIE Prd Ne 1) कक. आड. यी कक डळ I OS UF य यी 5 यल यला य त्रा वाय त्र 8 22220 8262४ I i Me 200 tl Pd | वळ / Ze le Ne 77०६६ 2/ 0] १4६ an र क्य 1 i शि Iss 2 OTT WY; टं 8 fi 11111) ॥॥॥1॥111 ४॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥ 10॥॥॥॥॥॥ i 2100 00008 णा पा ee nnn aon प TITTLE पिशी शिशिर (२६1६६ ०४२०1 ०७७) ॥ य्यम | 1815 पुर 1 Apne $20 (कपार) 22 CO BE-inklarklk ३० अध्यात्मरामायण युद्दकाण्ड प्रथम सगे वानर-सेनाका प्रस्थान | श्रीमहादेव उवाच यथाबद्धापितं वाक्यं श्रुत्वा रामो हनूमतः । उवाचानन्तरं वाक्यं हर्षेण महताऽऽ्वृतः॥ १॥ कार्य कृतं हजुमता देवैरपि सुदुष्करम्‌ । मनसाऽपि यदन्येन स्मतु शक्यं न भूतले ॥ २॥ शतयोजनविस्तीणे रङ्घयेत्कः पयोनिधिम्‌ । उङ्ां च राक्षसेंगुप्ता को वा धर्षयितुं षमः ॥ ३॥ भृत्यकायं हनुमता कृतं सर्वमशोपतः। सुग्रीवस्येदशो लोके न भूतो न भविष्यति ॥ ४॥ अह च रघुवंशाश्च लक्ष्मणश्च कपीश्वरः । जानक्या दर्शनेनाद्य रक्षिताःसो हनूमता ॥ ५॥ सर्वथा सुकृतं काये जानक्याः परिमार्गणम्‌ । दं मनसा स्मृत्वा सीदतीव मनो मम ॥ ६॥ कथं नक्रझपाकीर्ण समुद्र शतयोजनस्‌। लङ्घयित्वा रिपुं हन्यां कथं द्रक्ष्यामि जानकीय)।७)॥ श्रुत्वा तु रामवचनं सुग्रीवः प्राह राधवम्‌ | समुद्र ठडधयिष्यामो महानक्रश्षपाकुलग्रू 1८1 लक्कां च विधमिष्यामो हनिष्पामो5च रावणम्‌ । श्रीमहादेबजी बोळे-हे पार्वति | हनुमानजीके जयों-के-त्यों कहे हुए वाक्योंको सुननेके अनन्तर श्री- रामचन्द्रजीने अति हर्षसे भरकर ये वचन कहे--- ॥ १॥ “हनुमानजीने जो कार्य किया है उसका करना देवताओंको भी अति कठिन है, पथ्वबीतल्पर और कोई तो उसका मनसे भी स्मरण नहीं कर सकता ॥ २॥ भला ऐसा कोन है जो सो योजन बिस्तारवाठे समुद्रको छॉँधने और राक्षसोंसे सुरक्षिता लङ्कापुरीका ध्वंस करनेमें समर्थ हो! ॥ ३ ॥ हजुमानने सुग्रीवके समग्र सेवक-धर्मको खूब निभाया । संसारमें ऐसा न कोई हुआ और न आगे होगा ही ॥ ४ ॥ हन्नुमानने जानकीजीको देखकर आज मुझको तथा रघुवंश, लक्ष्मण और सुग्रीव आदि समीको बचा लिया है ॥५॥ जानकीजीकी खोजका कार्य तो बिलकुल ठीक हो गया, किन्तु समुद्रकी याद आनेसे मेरा मन व्यथिंत- सा होने लगता है ॥ ६॥ नाके और मकरोंसे भरे'इए सो योजन विस्तारवाळे समुद्रको छॉँधकर मैं शत्रुको कैसे मारूँगा ? और जानकीजीको कैसे देख सकूगा? ॥७) श्रीरधुनाथजीके ये बचन सुनकर सुग्रीव उनसे बोळा--“हम बड़े-बड़े नाके और मछलियोंसे पूर्ण समुद्रको लाँध जायँगे और शीप्र ही छङ्काको विध्वंस कर - रावणका भी नाश करेंगे। रघुनाथजी | आप चिन्ता चिन्तां त्यज रघुश्रेष्ठ चिन्ता कार्यविनाशिनी ॥९॥ | छोडिये, चिन्ता तो कार्य बिगाड़नेवाली होती .है ३९० २२४ opr or Re एतान्पश्य महासस्वान्‌ शूरान्वानरपुङ्गाय्‌ | त्वत्मियार्थ समुुक्तान्प्रवे्ठमपि पावकम्‌ ॥१९॥ समुद्रतरणे बुद्धि कुरुष्व प्रथमं ततः । दृष्टा सङ्का दशग्रीवो हत इत्येव मन्महे ॥ ११ ॥ नहि पइ्याम्यहं कसित्त्रिपु लोकेषु राघव । गुहीतधनुपो थस्ते ति्ठेदभिस्ुखो रणे ॥१२॥ सर्वथा नो जयो राम भविष्यति न संशयः । निमित्तानि च पझ्यामि तथाभूतानि सर्वशः।१२॥ सुग्रीववचन श्रुत्ला भक्तिवीर्येसमन्बितम्‌ । अङग कृत्यबरवद्रामो हतूमनतं धुरःस्थितम्‌॥१४॥ गेन केन प्रकारेण लड्ययामो महार्णवम्‌ । लङ्कास्वरुं मे तहि दुःसाध्यं देवदानवैः ॥१५॥ ज्ञात्वा तस्य प्रतीकारं करिष्यामि कपीइवर। शुत्वा रामस्य वचनं हनूमान्विनयान्वितः ।।१६॥ उवाच ग्राञ्जिदेव यथा दष्टं ब्रवीमि ते । लङ्का दिव्या पुरी देव त्रिकूटशिखरे खिता॥१७॥ सवर्णप्राकारसहिता स्वृर्णाइलकर्सयुता । परिखाभिः परिद्वता पूर्णामिरनिंमेोदके! ॥१८॥ नानोपवनशोभाढया दिव्यवार्पाभिरावृता । गृहैबिचित्रशोभाढचैमेणिसम्भमये! घुमे! ॥१९॥ पथ्चिमद्वारमासाद्य गजवाहाः सहस्रशः। उत्तरे द्वारि तिष्ठन्ति साइवाहाः सपचयः ॥२०॥ तिएन्त्युंद्सङझ्याकाः ्राच्यामपि तथैव च । रक्षिणो राक्षसा वीर दवारं दक्षिणमाश्रिताः ॥२१॥ मध्यकक्षेऽप्यसङ्कयाता गजारवरथपत्तय! | - रक्षयन्ति सदा लङ्कां नानाखकुशला! प्रभो ॥२२॥ अध्यात्मरामायण ॥ ८-९ ॥ आप इन महापराक्रमी और शूरवीर वानर- चीरोंको देखिये | ये आपका प्रिय करनेके लिये अग्निम प्रवेश करनेको भी तैयार हैं || १० ॥ पहले समुद्र पार करनेका विचार कीजिये, फिर छड्काके तो दर्शन होते ही हम रावणको मरा हुआ ही समझते हैं ॥ ११ ॥ हे राघव ! त्रिलोकीमें मुझे ऐसा कोई है। , दिखायी नहीं देता जो आपके धनुप ग्रहण करनेप्‌ युद्धमें सामने डटा रहे ॥ १२ ॥ हे राम ! इसमें तनिक भी सन्देह नहीं सव प्रकारसे जीत हमारी हा होगी, क्योंकि मुझे सत्र ओर ऐसे ही कारण ( झाकुन ) दिखायी दे रहे हैं? ॥ १३ ॥ सुम्रीवके ये भक्ति और पुरुपार्थसे भरे वचन सुनकर भगवान्‌ रामने उन्हें सादर स्वीकार किया और फिर सामने खड़े हुए हलुमानजीसे कहा--॥१४॥ “हम जेसे-तेसे समुद्र तो पार करेंगे ही, किन्तु तुम छट्डाका रूप तो बताओ । सुना है, उसे जीतना तो देवता ओर दानवोंको भी अत्यन्त कठिन हे ॥ १५॥ हे कपीश्वर | उसका खरूप विदित होनेपर में उसका _ कोई प्रतिकार सोचूँगा ।” रामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर हनुमानजीने विनयपूर्वेक हाथ जोड़कर कहा--“देव | मैंने जैसा कुछ देखा है वह आपसे निवेदन करता हूँ । दिन्यपुरी लङ्का त्रिकूटपर्वतके शिखरपर वसी हुई है॥१६-१७॥ उसका सोनेका परकोटा है और उसमें सोनेकी ही अद्टालिकाएँ हैं तथा वह निर्मळ जलसे भरी खाइयोंसे चिरी हुई है॥ १८॥ अनेकों उपवनोंके कारण उसकी अत्यन्त शोभा हो रही है और उसमें जहाँ-तहाँ बहुत-सी वावड्या तथा विचित्रशोभासम्पन्न मणिः" स्तम्भयुक्त भवन शोभायमान हैं ॥१९॥ उसके पश्चिम द्वापर हजारों गजारोहा, उत्तरद्वारपर पैदरू सेनाके सहित बहुत-से घुडसवार, पूर्वद्वारपर एक अरव राक्षस चीर और दक्षिणद्वारपर भी इतने ही रक्षक रहते हैं ॥२०-२१॥ हे प्रभो ! उसके मध्यभागमें भी हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी असंख्य सेना रहकर नगरकी रक्षा करती है । बे सव नाना प्रकारके शत्र चळानेमें अत्यन्त कुशळ हैं ॥ २२ ॥ इस प्रकार छ्झ्टामें सगे १] सर] इई ` ३३६ युद्धंकाण्डै २३५ सङ्ज्मैविविधैरङ्गा शतन्चीभिश्च संयुता । एवं खितेऽपि देवेश शृणु मे तत्र चेटटितम्‌ ॥२३॥ दृशावनवलोधस्य चतुर्थांशो मया हतः दग्ध्वा खङ्कां पुरी स्वणप्रासादो घर्षितो मया॥२४॥ ` शतघ्न्यः सङ्क्रमाथेव नाशिता मे रघत्तम | Lo देव त्वददशनादेव लङ्का भस्मीकृता भवेत्‌ ॥२५॥ प्रस्थान कुरु देवेश गच्छासो ठवणाम्युचे । तीरं सह महावीरेधानरोधेः समन्ततः ॥२६॥ श्रत्वा हनूमतो वाक्ययुवाच रघुनन्दनः । सुग्रीव सेनिकान्सर्वान्प्रस्थानायाभिनोद्य ॥२७॥ इदानीमेव बिजयो मुहूर्त! परिवतेते । अस्मिन्हते गत्वाऽहं उङ्क रक्षससङ्कुलाम्‌ ॥२८॥ ` सम्राकारां सुदुर्घपां नाशयामि सरावणाम्‌। आनेष्यामि च सीतां मे दक्षिणावि स्फुरत्यघः।२९। अयातु वाहिनी सी वानराणां तरस्विनास्‌ । रक्षन्तु यूथपाः सेनामग्रे ए च पाश्वयोः ॥३०॥ हनूमन्तमथारुह्य गच्छाम्मग्रेऽङ्गदं ततः । आरुद्य लक्ष्मणो यातु स॒ग्रीव तमं मया सह ॥३१॥ गजो गवाधो गवयो मेन्दो द्विविद एव च । नलो नीछः सुपेणअ जाम्बवांश्च तथाऽपरे ॥३२॥ सर्वे गच्छन्तु सर्वत्र सेनायाः शत्रुधातिनः । इत्याज्ञाप्य हरीन्‌ रामः प्रतस्थे सहलक्मणः ॥३३॥ सुग्रीवसहितो इर्पात्सेनामध्यगतो बिः | वारणेन्द्रनिभाः सर्वे वानराः कामरूपिणः ॥३४॥ हवेठन्तः परिगजेन्तो जग्मुस्ते दक्षिणां दिर । भक्षयन्तो ययुः सर्वे फलानि च मधूनि च ॥३५॥ चुवन्तो राघवस्याग्रे हनिष्यामोऽद्य रावणम्‌। जानेके मार्ग नाना प्रकारके संक्रम (सुरंग) और शतप्नियों (तोपों ) से सुरक्षित हैं; किन्तु हे देवेश्वर ! यह सब कुछ होते इए भी मैंने जो कुछ किया है वह सुनिये ॥ २३ ॥ मैंने रावणकी चौथाई सेना मार डाली और छङ्कापुरीको जलाकर उसका सोनेका महल नष्ट कर दिया ॥२४॥ हे रघुश्रेष्ठ | संक्रमों ओर तोपोंको मैंने तोड़ डाला । हे देव ! (मुझे तो विश्वास है) आपकी दृष्टि पड़ते ही छङ्का भस्मीभूत हो जायगी ॥ २५ ॥ हे देवेश्वर ! अब चळनेकी तैयारी कीजिये | हम सब्र ओरसे महाबळ्बान्‌ वानर-वीरोंकी सेना लेकर क्षार ( खारे पानीके) समुद्रके तटपर चळे” ॥ २६ ॥ हनुमानूजीका कथन सुनकर श्रीरघुनायजीने कहा-- “सुग्रीव | सव सैनिकोंको इसी समय कूच करनेकी आज्ञा दो, क्योंकि इस, समय विजयनामक सुहुते बीत रहा है । इस मुहृचंगें जाकर मैं राक्षससंकुळित.छङ्काको, जो परकोटे आदिके कारण अति दुर्जय है, राबणके सहित नष्ट कर दूँगा और सीताजीको ळे आउँगा । इस समय मेरी दायीं आँखका नीचेका भाग फडक रहा है ॥ २७-२९ ॥ इसी समय वल्वान्‌ वानरोंकी सम्पूर्ण सेना चले; जो यूथपति हों वे अपने-अपने यूथकी आगे-पीछे और इधर-उधरसे रंक्षा करें ॥३०॥ मैं हनुमानके कन्धेपर चढ़कर सबसे आगे चलता हूँ, उसके पीछे लक्ष्मण अंगदके ऊपर चढ़कर चळें और हे सुग्रीव !तुम मेरे साथ चलो ॥ २१ ॥ गज, गवाक्षं. गवय, मैन्द, द्विविद, नळ, नील, सुषेण और जाम्बबान्‌ तथा इन्रुओंका नाश करनेवाढे और भी समस्त सेनापतिगण सेनाके चारों ओर चले |” बानरोंको इस प्रकार आज्ञा दे श्रीरामचन्द्रजीने छक्ष्मणजीके सहित कूच किया ॥ १२-३३ ॥ भगवान्‌ राम अति हर्षसे सुग्रीवके साथ सेनाके बीचमें जा रहे ये । समस्त वानरगण गजराजके समान. बड़े डील्वाठे और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले ग्रे ॥३४॥ वे सब बडे वेगसे उछछते-कूदते, गरजते और फल तथा मधु खाते दक्षिण दिशाको चले ॥ २५॥ इस प्रकार वे अतुळ पराक्रमी वानरश्रेष्ठ श्रीरधुनाथजीके. अध्यात्मरामायण [सर्ग १ rrr Te se कध ३० ७९७ कल लक हार sew ao v fo २३६ एवं ते वानरभ्रेष्ठा गच्छन्त्यतुळावक्रमा ॥३६॥ | सामने 'हम आज ६ od Te कहते इए जा रहे थे ॥ १६ ॥ हनुमान और अंगदके हरिभ्यामुद्यमानो तो शुशुभाते रवूत्तमा | क््योपर जाते हुए वे दोनों ररे ऐसे शोभायमान हो रहे वक्षत्‌ साचत यह्चन्द्रद्याववास्वर ॥३७॥ 1 थ मानो आक्ादॉ-मण्डटम नक्षत्रात गावित मव और आइत्य पाथवा कृत्खा जगाम महता चमू || ; चन्द्रमा हो ॥ ३७ ॥ बह महान सना सम्पूर्ण प्रधित्री- रो घेरकर चल रही थी। चानरगण अपना पुजू /पच्छाग्रालुदहन्तथ पादपान्‌ ॥३८॥! / », ८. व! प्रस्फोटयन्ता उच्छ दा फटकारते और पेक उग्बा इते हुए पत्रतोपर उछळते-* शेलानारोइयन्तथ जअग्छुमारुतवगतः | ` जूते बायुवेगते जा रहे थे । उस समय सत्र ओर असहुयाताथ सर्वत्र वानराः परिपूरिता; २९ ` असंख्य वानर भरे हुए दीख पड़ते थे ॥ ३८-३९] ~ क्षित क दर मी नताए वक ची हृष्टास जखुरत्यथ॑ रामेण पारपाठता। , भगवान्‌ रामस पुरक्षित हाकर १ प्रसवतादूआ बना कचिज्ञासजत क्षणम्‌ ॥४०॥ ` ने चा रे थे। व्ह वानरसेना रात. दिन ची गता चसूदिवाराव काउच म्‌ 1, कहीं एक क्षणका मॉ न रुकी था | १० ॥ काननाति विचित्राणि पर्यन्मलयसद्ययां! । अन्तमें वे सवळोग मळयाचळ और सगाद्रिके विचित्र [न ~ a र सिरी बनाओ देखत हुए उन पनताका पार क्र्म्या ते सह्य समतिक्रम्य मलयं च तथा गिरीच्‌ ॥४१॥ बनोंको खते हुए उन दोनो पताका पार कर त्र भेण संसद भीसनि।खनम । भयक्कर गजेना करनवाल समुद्रक तटपर पहुँच गय | आयशुधाइुएच्यण सुद 'खनस्‌ ` तब श्रीरामचन्द्रजी हनुमानजीके कन्येस उतरकर सुत्ीचके गये हनस्त + रा नि LE] . 1 ~ . ३ « द. ल्य अवतीये हनूसन्द रामः सुग्रीवसयुतः !!४२)) ` साथ जल्के निकट आये और घोठे-“हे वानरगण ! सलिलास्याशमासाद रामो वचनमब्रवीत्‌ । ¦ हमलोग मकरादिसे पूर्ण समुद्रके तटपर तो आ गये आगता स्मो चयं सर्वे स्‌ मुद मकरालय | ।४३॥ ] क्न्त 6३1 अन्न आग निना कार विज्ञप उपाय ५1 क्लि २४ नहा आयता? hd य्‌ जा सकत । अतः अव वहा सेनाकी छावनी डाली च. हळ ७) क he ~ Ce e छे अत्र सेनानिवेशो$स्तु मन्त्रयामाऽस्य तारणे ४४), परामश करन !॥ ४१-४४ ॥ श्रुत्वा रामस्य वचन सुग्रीवः सागरान्तिक्े। ' रामके वचन सुनकर तुद्रीवत तुरन्त ही समुद्रके ON 2 , es . «७ , निकट सेनाका पडाव डाला । ओर वहुत-से प्रधान- त्यवेश्शर्यार $ ॥४५] ' , , _ सेना न्‍्यवेशयत्क्षितर राक्षता कापङुङ्जरः ॥ प्रधान वानर-चीर उसकी रक्षा करने छगे॥ १७॥ ये ते पश्यन्तो विपेदुसं सागरं भीमदर्शनम्‌ । लोग उत्ताळ तरङ्गा पूर्ण तथा दारुण नाके आदिके अगाध॑ गगनाकारं सागरं वीक्ष्य दाखिता लगे ॥ ४६ | उस आकारके समान अगाध समद्रका” [ शय हु/खता। देखकर उन्हे वड़ा दुःख हुआ ओर चे सोचने लगे तरिष्यामः कथं घोरं सागरं वरुणारुयम्‌॥४७॥। | कि 'इम इस घोर वरुणाल्यको केसे पार करेंगे ॥४७॥ इन्तव्योऽस्माभिरच्ेव रावणो राक्षसाधमः | | रषिसाधम रावणको तो हमें आज ही मारना है (पर मारे कैसे !)' इस प्रकार सव लोग अति चिन्ताग्रज इ।तचन्ताङुला१ सव रासपाश्च व्यवासताः।।४८॥ हो श्रीरधुनाथजीके पास वेळ गवे || ४८॥ , 1 रामः सीतामनुस्मृत्य दुःखेन महता5वयूतः | इधर श्रीरामचन्द्रजो भी सीताकी यादकर महान विलप्य जानकीं सीतां बहुधा कायमालुपः ॥४९॥ : दुःखमे इब गये । वे यद्यपि एक अद्वितीय चिन्मात्र सर्ग २] भ्स्प्प्प्य्स््य्ल्प्प्प्प्य्प्प्य्य्प््य्ल्य्स््ल्य्य्य्य्ट्््ल्ल्स्य््ट्स्य्््््ट्ट्ट्स्ट्स्स्स्य्स्स्य्स्ट्ट््ट्््य्स्ल्ट्््ट्ल्च््््््स्स्््ल्ट्ल्च््च्ल्च्च्च््च्च्ड्ल्ल्ल्ल्च्ल््ल्ल्डि ४४७४७ ७८000४ ६० ७५१७७. ४५ ७० ४४९ ७ 20.00. NAN PNT NAINA NN ६//७०० अद्वितीयभिदात्मैकः परमात्मा सनातन! । यस्तु जानाति रामस्य खरूपं तत्वतो जन! ॥५०॥ तं न स्पृशति दुःखादि किप्रुतानन्दमच्ययम्‌ । दुःखहर्षमयक्रोधठोभमोहमदादयः ॥५१॥ ज्र 'अंज्ञानलिज्ञान्येतानि कुतः सन्ति चिदात्मनि । देहाभिसानिनो दुःखं न देहस्य चिदात्मन! ॥५२॥ सम्प्रसादे इयाभावात्सुखमात्रं हि इश्यते । बुद्धया्यभावात्संशुद्धे दुःखं तत्र च वयते । अतो दुःखादिकं सवे बुद्धेरेव न संशयः ॥५३॥ रामः परात्मा पुरुपः पुराणो नित्योदितो नित्यसुखो निरीहः । तथापि मायागुणसङ्गतोऽसो युंद्धकाण्ड २३७ परमात्मा सनातन पुरुष थे, तथापि कार्यवश मनुष्यरूप होनेके कारण जानकीजीके लिये नाना प्रकारसे बिळाप करने लगे | जो पुरुष परमात्मा रामका वास्तविक स्वरूप जानता है उसे भी दुःखादि स्पर्श नहीं कर सकते, फिर आनन्दस्वरूप अविनाशी भगवान्‌ रामकी तो बात ही क्या है ! दुःख, हर्ष, भय, क्रोध, लोभ, मोह और मद आदि सब अज्ञानके ही चिह हैं; चिदात्मा राममें ये वैसे हो सकते हैं ? देहका दुःख देहामिमानीको ही होता है, चेतन आत्माको नहीं ॥४९-५२॥ समाधि- अवस्थामें दवैत-प्रपञ्चका अमाव द्वो जानेके कारण वहाँ केवल सुखका ही साक्षात्कार होता है । उस अवस्थामें बुद्धि आदिका अमाव हो जानेसे शुद्ध आत्मामें दुःखका लेश भी दिखायी नहीं देता । अतः इसमें सन्देह नहीं ये दुःखादि सब बुद्धिके ही धर्म हैं॥५३॥ भगवान्‌ राम परमात्मा, पुराणपुरुष, नित्य-प्रकाश- स्वरूप, नित्यसुख-स्वरूप और निरीह हैं; किन्तु | अज्ञानी पुरुषको बे मायिक युणोंके सम्बन्धसे सुखी सुखीव दुःखीव विभाव्यते5्युधे! ॥५४॥ | या दुःखी-से प्रतीत होते हैं ॥ ५४ ॥ IES इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्‍वरसंवादे युद्धकाण्डे प्रथमः सगे: ॥१॥ द्वितीय सर्ग राबणद्वारा विसीपणका तिरस्कार | श्रीमहादेव उवाच लङ्कायां रावणो दृष्टा कृतं कमे हनूमता । दुष्कर दैबतेवीऽपि हिया किश्विदवाड्युखः ॥ १ ॥ . आहूय मन्त्रिणः सवीनिदं वचनमत्रवीत्‌ । हनूमता कृतं कर्म भवङ्भिध्टसेव तत्‌॥ २॥ प्रविश्य लङ्कां दुर्थपी इष्ट्वा सीतां दुरासदाम। हत्वा च राक्षसान्वीरानक्षं मन्दोदरीसुतम्‌॥ ३ ॥ दग्ध्वा लङ्कामदोपेण लक्कयित्वा च सागरम्‌ । युप्मान्सरवानतिक्रम्य स्वस्थोऽगातपुनरेव सः ॥४॥ कि कपेव्यमितोऽसाभिरययंमन्त्रविश्ञारद । मन्त्रयध्वं प्रयतेन यत्कृतं में हितं भवेत्‌ ॥ ५॥ श्रीमदादेबजी वोले-हे पार्वति ! इधर छक्ढामें श्रीहतुमान्‌जीका देवताओंके लिये भी दुष्कर कृत्य देख रावणने अपने समस्त मन्त्रियोंको बुछाकर छजासे शिर नीचा करके कहा--“हलुमानने ओो-भो कर्म किया वह सब आप लोगोंने देखा ही है॥१-२॥ बह दुष्प्रवेश्य उङ्कमें घुसकर सर्वथा दुष्प्राप्प सीतासे मिळा तथा उसने अन्य राक्षस वीरोंके साथ मन्दोदरीके पुत्र अक्षको मारकर सम्पूर्ण उङ्काको जला दिया और फिर आप सब छोगोंका तिरस्कार कर कुशढपूर्वक समुद्र लॉधकर लौट गया | ३-४ ॥ आप सब लोग नौति- निपण हैं, अतः अब हमें क्या करना चाहिये, और क्या. करनेसे हमारा हित दो सकता है--इसका परय्तपूर्वक विचार कीजिये” ॥ ५ ॥ २३८ अंध्यात्मरामायणं [सम २ अभि जज ७९ ०७ ७७ फक पल 2४८४४४७७४७ ता, फिडल कि चना न epaprerat फट तयी रावणय वचः शुत्वा राक्षसास्तसथाव्रुवन्‌ । रावणके वचन सुनकर राक्षसाने उससे कहा-- लोकजितो रणे | देव ! आपको रामसे क्या झाका दे आपने तो देव शङ्का इतो रामात्तव छोकजितों रणे ॥ ६॥ नरभ समल छोकोंकों जीत लिया दै ॥ ६॥ आफ भि? पत्रे ने , पत्रने इन्द्रको वोधकर अपनी राजधानीमें डाळ छिया बद्धवा चोक्षः पुत्रण तव पत्तने । पु स वि है हि था आर आप सय भा डुर जातकर उसका पसक त्वा दुवेरभानीय पुष्पकं भुज्यते स्वया ॥ ७॥ ` विमान लाकर मागते हैं ॥ ७॥ हे प्रभा ! आपने यमो जितः कालदण्डाङ्कयं नाभूत्तव प्रभो । ` यमराजको भी जीत छिया, उरे कालदण्ड म आपका काई भय चह हुआ तथा चढण आर सनन्त रुणो हुङ्तेनेव जितः स्पि राक्षसाः ॥ ८॥ रहसोको आपने इंकारसे ही जीत ल्या या ॥ ८ ॥ मयो महासुरो भीत्या कन्यां दरवा खयं तव | ` और महातुरोकी तो बात ही यया है, ख्य मयामुर भो आपके भयसे आपको अपना कन्या देकर आजतक तदश व्तेऽ्यापि क्रिप्रतान्ये महासुरा।॥ ९ ॥ उके अधीन वना हुआ है ॥ ५॥ हनमानने जो इतूमद्भपेणं यत्त तदबज्ञाकृत च वा । हमारा तिरस्कार किया है बढ तो हमारी ह उपेक्ासे 2 मिल, ~ ~ a दशे व वानरोऽयं किमसाकमसिन्पारुपदशने १०]| हुआ है। हमने यह सोचवार कि यद वानर है इसे है है परुपाय दिखानेमं कवा रद्य हैँ उसकी उपे कर इत्युपेक्षितससामिधेषंणं तेन कि भवेत | ` दीया, नहीं तोऽ्ह हनारी अहा क्या कर सकता वा £ वयं प्रमत्ताः किं तेन वञ्चिताः सो हनूमता ॥११॥ . ॥ १° ! अंतः अत्ता ` हनुमानने ठग लिया तो इस हुआ यदि हम सत्र हम ~ पान — ज ror नत. अद्यादधान रहनक कारण याद हृ जानीसो यदि तं सर्वे कथं जीवन्‌ गमिष्यति । ` उसेजानते तो वह जीता हुआ कैसे जा सकता था ? आप | ha La nd आज्ञापय जअगत्कृत्लसतवाचरममाचुषस्‌ 1१२॥ | हम आज्ञा दीजिये सव अमी जाकर एयिवीका ह्म बानर ओर मनप्यांसे अन्य कर आते हं । अथवा हमम- ] Ce _ नियत की जिवे $ {स एक-एकको ही इस काये लिये नयुता काजिय | [ इुम्भकर्णस्तदा प्राह रावण राक्षसेश्रम्‌॥१३॥: तदनन्तर राक्षसराज रावणसे इुन्भकण बोछा-- आरब्ध न स्वात्मनाशा केवलम्‌ ॥ ११-१३ ॥ “आपने जा बाच आरभ्न किया हु बह रन्ध यक्तया कमं स्वारमनाशाय केषुम्‌। | कवळ आपका नाझ करनेके लिये हो है । सौमाग्यवश कुत्वाऽऽ्यास्यामहे सर्वे प्रत्येकं वा नियोजय । श्या न इष्टोऽसि तदा भाम्याचं रामेण महात्मना ॥१४॥ इतना हो अच्छा हुआ कि सीताजीको चरानेके समय यदि परयति रामस्त्वां जीवन्नायासि रावण । महात्मा रामने आपको नहा देखा ॥ १९॥ हे रावण ! _ _ यदि उस समय राम आपको देख लेते तो आप जीते- रामो न माजुपो देवः साक्षा्ञारायणोऽव्ययः॥१५॥। जागते नहीं लोट सकते घे रातः साधारण मनष्य 4 hs सीता भगवती लक्ष्मी रामपत्नी यशख्रिनी। ; नही छ वे साह्ात्‌ अब्यय नारावगदेव हे ॥१५॥ राक्षसानां विनाशाय त्वयाऽऽनीता सुमध्यमा 1१६ 1 ९ दनो संताजी सादात ञ्‌] सा।१६ भगवता ल्त्मा ह, उत्त टुन्दराका आप राक्षसा के विंषपिण्डमिवागीये सहामीनो यथा तथा । | नाशके ह ह ड हें ॥ १६ ॥ जित प्रकार के ! महामत्स्य विका पिण्ड निगल जाय उसी प्रकार आप आता जानकी पाच्या कि घा भविष्यति) १७1) (अपने नाशके ढिये) जानाको छे आये हैं, न जाने यद्यप्यचुचितं कर्म त्वया कृतमजानता । | जमेच्या होना है हज १७॥ हे आपने अनजानमें ह्‌ हा 3 ते कान किया हैं, तथापि आप सब सम कारष्यामे खस्याचित्तो सव प्रभो |१८॥ | शान्त होइये, में सत्र काम ठीक किये देता हैं कुम्भकर्णवचः श्रुत्वा वाक्‍्यमिन्द्रजिदजवीत । देहि देव ममाजुज्ञां इत्वा रामं सलक्ष्मणमू । सुग्रीवं बानरांश्वेब पुनर्यास्यामि तेऽन्तिकम्‌ ॥१९॥ तत्रागतो भागवतमप्रधानो विभीषणों बुद्धिमतां वरिष्ठ! । श्रीरामपाददय एकतानः प्रणम्य देवारिमुपोपविष्टः ॥२०॥ बिलोक्य कुम्मश्रवणादिदेत्या- न्मत्त्रमत्तानातिविसयेन । विलोक्य कामातुरमम्रमत्तो दशाननं प्राह विशुद्धबुद्धिः ॥२१॥ न झुम्भकर्णेन्दजितो च राज॑- स्तथा महापार्श्वमहोदरौ तौ । निकुम्भकुम्भो च तथातिकायः खातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥२२॥ सीताऽभिधानेन महाग्रहेण | ग्रस्तो$सि राजन्‌ न च ते बिमोक्षः। तामेव सत्कृत्य महाधनेन दर्वाभिरामाय सुखी भव त्वम्‌ ॥२३॥ यावन्न रामस्य शिताः शिलीएखा ` लङ्कामभिण्याप्य शिरांसि रक्षसाम्‌ । छिन्दन्ति ताबद्र्घुवायकस्य भो तां जानकीं त्वं प्रतिदातुमहेसि ॥२४॥ यावन्नगाभाः कपयो महाबला हरीन्द्रतुस्या नखदंष्र्योधिनः । लङ्कां समाक्रम्य विनाशयन्ति ते तावदूहुत॑ देहि रघूत्तमाय ताम्‌ ॥२५॥ जीवन्न रामेण विमोक्ष्यसे त्वं शुपः सुरेन्द्रपि शङ्करेण । न देवराजाङ्कगतो न म्रृत्यो! पातारलोकानपि सम्प्रविष्टः ॥२६। शुभं हितं पवित्र च विभीषणवचः खलः । प्रतिजग्राह नैवासौ प्रियमाण इवौषधम्‌ ॥२७॥ बोछा--“प्रमो ! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं अभी लक्ष्मणके सहित राम, छुग्रीव और समस्त वानरोंको मारकर आपके पास लोट आतला हूँ” ॥ १९॥ , इसी समय वहाँ भागवत-प्रधान बुद्चिमानोंे श्रेष्ठ विभीषणजी आये | उनके अन्तःकरणकी बृत्ति एकाग्रता- पूर्वक भगवान्‌ रामके चरणयुगलमें लगी हुई थी । वहाँ आकर वे देवशत्नु रावणको प्रणाम कर उसके पास बैठ गये ॥ २० ॥ वहाँ बैठकर उन्होंने एक बार कुम्मकण आदि समस्त मदोन्मत्त राक्षसोंको अति विस्मयक्रे साथ देखा | फिर यह भी देखा कि रावण कामातुर है, ( वह किसीकी माननेबाळा नही है ) । तथापि अति निर्मळ-बुद्धि होनेसे वे अपने कर्तेय्यमें सावधान थे, इसल्यि उन्होंने रावणसे कहा--॥ २१.॥ “हे राजन्‌ ! युद्धमें रघुनाथजीके सामने कुम्भकर्ण, इन्द्रजित्‌, महापारर्व, महोदर, निकुम्भ, कुम्भ तथा अतिकाय आदि कोई भी नहीं ठहर सकते ॥ २२॥ हेः राजन्‌ ! आपको सीता नामक एक प्रबळ ग्रहने ग्रस्त कर लिया है, इससे आपका छुटकारा इस तरह नहीं हो ` सकता । अब आप उसे सत्कारपूर्वक बहुत-से धनके साथ श्रीरामचन्द्रजीको छौटा दीजिये और सुखी हो जाइये ॥ २३ ॥ जब्रतक श्रीरामचन्द्रजीके तीक्ष्ण वाण लंक्रामें व्याप्त होकर राक्षसोंके शिर नहीं कारते, तवतक ही उचित है कि आप उन्हें जानकीजीक्री सौंप दें ॥ २४॥ नख और दाढोसे ही लडनेवाठे, सिंहके समान महावळत्रान्‌ वे पर्वताकार वानर- गण जबतक लंकामे फैलकर उसे नष्ट-श्रष्ट नहीं करते तभीतक आप सीताजीको जल्दी-से-जह्दी श्रीरघुनायजीको सौंप दीजिये || २५॥ नहीं तो, मळे ही इन्द्र और शंकर भी आपकी रक्षा करें, अथवा देव- राज इन्द्र और मृत्यु भी आपको गोदमें लेकर बचायें, या आप पाताछमें भी घुस जाये, तो भी रामसे आप जीवित नहीं बच सकते” ॥ २६॥ बिभीपणके इन झुम, हितकर और पवित्र बचनोंको दुष्ट रावणने इसी प्रकार ग्रहण नहीं किया जैसे मरने- वाळापुरुष औषध ग्रहण नहीं करता || २७ ॥ बल्कि ल्न इ अलम नन तिका अध्यात्मरामायण [सर्ग २ MIR eee we eT se me we meres eure Te उन नोदितो दत्यो विभी चह दृष्ट दैत्य कालकी प्रेरणासे विभीपणसे इस प्रकार विभीषणमथाब्रवीत्‌ । ठ्‌ > गोरे कालेन नोदितो देतय एन है कहने लगा--“देखो, यह मेरे ही दिये हुए भोगोसे पुष्ट मदत्तमोगेः पुषटङ्गो मत्समीपे वसन्नपि ॥२८॥ होकर और मेरे ही पास रहकर भी मुझ अपने हित- प्रतीपसाचरत्येष ममैंब हितकारिणः। [| कर्ताके ही विरुद्ध चलता है; निःसन्देद्द यद्द मित्ररूप से मेरा शत्रु ही प्रकट हुआ है. ॥ २८-२९ ॥ इस मित्रभावेन शत्रुर्मे जातो नास्त्यत्र संशयः | ।२९॥ अनार्य और कतन्रका मेरे साथ रहना ठाक नहो है । प्रायः यह देखनेमें आता है कि आातिवाठे अपने नकद | ही जाति-भाइयोंके नादाकी सदा इच्छा किया करते विनाशमाभिकाडुन्ति शार्तानां ज्ञातयः सदा॥२०॥ | ह ।३०॥ चदि कोई और राक्षस ऐसा एक भी योड्न्यस्त्येवंबिधं शूयाद्वाकयमेकं निशाचरः। वाक्य कहता तो मैं उसे उसी क्षण मार डालता । ` अरे नीच ! त राक्षसकुलम अत्यन्त अघम हे, तुझे इन्मि तस्मिन्‌ क्षणे एव धिक त्वां रक्ष/कुलाघसमरे ९ धिक्कार है” ॥ ३१ ॥ अनार्येण कुतघेन सङ्गतिमें न युज्यते । कहनेपर गद्टाबली क = च उड ॥ ३२॥ और रावणेनैवमुक्तः सन्परुषं स विभीषणः। : रावणके इस प्रकार कटूवचन उत्पपात समामध्याङ्गदापाणिर्महावलः ॥३२॥ ` विभीपण दयम गदा लेक समासे 0 _ , ` अपने चार मन्त्रियोंके साथ आकारानं सित होकर अत्यन्त चतुमिमन्त्रिमिः सार्थ गगनखोऽञ्रवीदचः। | नषे भरकर दरारा राबणसे कद्ा--॥ ३३॥ शॉ क्रोधेन महता55विशे रावणं दशकन्धरम्‌। , तुम्हारे द्वितकी वात कहनेवाडा हूँ; फिर भी तुम मुझे मा विनाशश्चुपेहि तव॑ प्रियवादिनमेव सास्‌ ॥३ ३॥ : घिक्कारते हो! तथापि में चाहता हूँ कि तुम्हारा नाश न घिकरोपि तथापि त जयेष्ठो आता पितुः समः । ' हो; शकि मेरे बड़े माई हो;अतः पिताके समान हो। _ वि है ` तुम्हारा काल रघुनाथजीके रूपसे महाराज दशरथके घर- कालो राघवरूपेण जातो दशरथालये ॥२४॥ , ३ प्रकट हो गया है ॥३४॥ और मद्ाशक्ति काली 'सीता' काली सीताऽभिधानेन जाता जनकनन्दिनी । | नामसे जनकजीकी पुत्री हुई है। ये दोनों पुथिधीका भार ताबुभावागतायत्र भूमेमीरापतुत्तये ॥३५॥ , उतारनेके व्यि ही यहाँ आये हैं ॥ २५॥ उन्हा RRO १ 11 | प्रेरणासे तुम मेरा हितकर वचन नह सुनते । तेनेव रितसत्व तु न शृणोषि दितं मम | | त्रान्‌ राम सर्दा साक्षात्‌ प्रकृतिसे परे । श्रीरामः प्रकृते; साक्षात्परस्तात्सर्वदा खितः॥३६॥ ॥ ३६॥ वे प्राणियेंके बाहर-भीतर सर्वत्र समान बहिरन्तश्च भूतानां समः सर्वत्र संखितः | | भावसे सित हैं और नित्य निर्म होते हुए भी RR नाम-रूप आदि भेदसे बिभिन्न-से भासते हे ॥३७॥ नामरूपादिमेदेन तत्तन्मय इवामलः ॥२७॥ | जिस प्रकार अज्ञानी पुरुषोंकी दृष्टिमे एक ही महाझि यथा नानाप्रकारेषु वृक्षेष्वेको महानछः । नाना प्रकारके बृक्षोमें उनके आकार-भेदसे भिन्न-भिन्न तत्तदाकृतिभेंदेन भिधतेऽज्ञानचश्ुपाम्‌ ॥३८॥ मत वि वी RRR हा स्फटिक i 5 33 -पीतादि रङ्गको सन्रिधिमान्नसे ही नील-पीत आदि पश्चकोशादिभेदेन तत्तर्मय इवावभौ । | चणोंवाळी प्रतीत होती है, वैसे ही पत्रकोश आदिके नीलपीतादियोगेन निर्मळ स्फटिको यथा ॥३९॥ | भेदसे आत्मा तद्रूप-सा भासता है ॥ ३८-३९ ॥ वे स एव नित्यषषुक्तोऽपि खमायाशुणबिम्ब्ितः। |` जि अतिनिश्दित नक होकर भी अपनी मायाके जी गुणों प्रतिविम्बित होकर काल, प्रधान, पुरुप और काला प्रधान एरुपोऽच्यक्तं चेति चतुर्विधः |४०॥। | अव्यक्त इन चार प्रकारके नामेंसे कहे जाते हैं॥ ०८ ॥ रे hi] + सगे ३ ] ` युद्धकाण्ड ` २४१ Sey ४४0७७७ ee we ७४ ३७४ ४७४९७४७४७४ ४४१८ Yee Ty PY ~ ४४४४४१११४४४४४७४॥१४४४/ ४४४१४४ ४४१४४१७४१४" / क्ट €४४४४४/ ४४४ dud adr or 9५204२ ७07४. 0707 tv NN प्रघानपुरुपाभ्यां स जगत्कृत्खं सृजत्यजः । अजन्मा होकर भी प्रधान और पुरुषरूपसे सम्पूर्ण कालरूपेण कलनां जगतः इरुतेऽन्ययः ॥४१॥ | गयौ रचना करते हैं और अविनाशी होकर भी दे काळरूपसे जगतका संहार करते हैं ॥ ४१ ॥ वे ही कालरूपी स भगवान्‌ रामरूपेण मायया ॥४२॥ | काळछूपी भगवान्‌ बरह्माकी प्रार्थनासे आपका वध ब्रह्मणा प्रार्थितो देवस्लद्धार्थमिहागतः। | करनेके लिये मायासे रामरूप होकर यहाँ आये हैं । ईश्वर -:<दुन्यथा कथं छुर्यात्सत्यसडूल्प ईश्षरः ॥४३॥ सत्यसंकल्प हैं, इसलिये वे अपनी प्रतिज्ञाको अन्यथा ! कैसे कर सकते हैं॥ ४२-४३ ॥ अतः राम अवश्य ही आपको पुत्र, सेना और वाहनादिके सहित मारेंगे। हे. हन्यमान न शक्नोमि द्रष्टुं रामेण रावण ॥४४॥ | रावण! मैं रामद्वारा सम्पूर्ण राक्षसवंश और आपका Le संहार होता नहीं देख सकता। अतः मैं रघुनाथजी- त्वा राक्षसकुल तता गच्छाम च त्यां राक्षसकुठ करल ततो गच्छाम राघवश के पास जाता हूँ । मेरे चळे जानेपर आप आनन्दपूर्वक मयि याते सुखीभूत्वा रमख भवने चिरम्‌ ॥४५॥ | अपने महळ्में बहुत समयतक भोग भोगना?॥४४-४५॥ हनिष्यति त्वां रामस्तु सपुत्रवळवाहनम्‌ | विभीपणो रावणवाक्यतः क्षणा- इस प्रकार, सन्तुष्टचित्त बिमीषण रावणके कठोर द्विसुज्य सर्व सपरिच्छदं गृहम्‌ । | भाषणसे एक क्षणमें ही समख सामप्रीके सहित अपने जगाम रामस्य पदारविन्द्यो! घरको छोड़कर भगवान्‌ रामके चरणकमलोंकी सेवाकी सेवाभिकाङ्ली परिपूर्णमानसः ॥४६॥ | कामनासे उनके पास चले गये ॥ ४६॥ — SSS इति श्रीमदभ्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे द्वितीयः सगः ॥ २॥ © तृतीय सग विभीपषणकी शरणागति, समुद्रका नराल तथा सेतु-घन्धका आरम्भ। श्रीमहादेव उवाच _ श्रीमहादेबजी बोळे--हे पारेति ! तदनन्तर महा- विभीषणों Crs भाग विमीपण अपने चार मन्त्रियोंके साथ आकर आकाश- णि महाभागतुभिमेन्तिमिः थत स्ट | में श्रीरघुनाथजीके सामने उपस्थित हुए। १॥ और ऊंचे _ आगत्य गगने रामसम्सुखे समवस्थितः ॥ १॥ छरे कहने छो-हे कमळतयन परमो राम ! मै ` उ्चेरुवाच मोः खामिन्‌ राम राजीवलोचन | आपकी भायौका हरण करनेवाले रावणका छोटा भाई रावणस्याचुजोऽहं ते दारहतुविभीपणः ॥ २ ॥ | हुँ । मेरा नाम विमीषण है । मुझे भाईने निकाल दिया रासा आतरा निरस्तोऽहं त्वामेव शरण गतः! | दशस्यि आपकी शरणमे आया हूँ । हे देव ! मैने विदितात्मनः उस अज्ञानीके हितकी बात कही थी ॥ २-३ ॥ उससे हितमुक्त मया देव तस्य चाविदितात्मन: ॥ ३॥ बार-बार कहा है कि तुम विदेदनन्दिनी सीताको रामे सीतां रामाय यैदे म्रेपयेति पुनः पुनः | | पास मेज दो, तथापि कालके वशीभूत होनेके कारण उक्तोऽपि न शृणोत्येव कालपाशवर्श गतः ॥ ४ ॥ | बह कुछ सुनता ही नहीं है ॥ 8॥ इस समय वह राक्षसाधम हन्तु मां खड़मादाय प्राद्रवद्राशसाथम। | | मुज तल्वारसे मारनेके लिये दौड़ा; तब मैं भयसे तुरन्त हो ३१ अ. न्ड प ४.६, ६६. RENN RN 1 १४२ अध्यात्मरामायण [सर्ग ३ तंतोऽचिरेण सचिषैश्चतुरमिः सहितो भयात्‌॥ ५ ॥ त्वामेव मवमोक्षाय झुझुक्चुः शरण गतः । विमीषणवचः श्रृत्वा सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत्‌ ॥ ६॥ विश्वासाहों न ते राम मायावी राक्षसाधमः । c सीताहतुंविं मन्त्रिभिः सायुधेरस्मान्‌ विवरे निहनिष्यति | वेण रावणस्यानुजो बली ॥ ७॥ तदाज्ञापय देव वानरेईन्यतामयम ॥ < || समैवं भाति ते राम शुद्धया किं निश्चितं वद । त्वा सुग्रीवयचनं रामः सस्मितमन्रर्वीत्‌ ॥ ९ ॥ यदीच्छामि कपिश्रेष्ठ लोकान्सर्वान्सहेश्वरान्‌। निमिषार्धेन संहन्यां सुजामि निमिषाधेत! ॥१०॥ अतो सयाऽभयं दत्तं शीघ्रमानय राक्षसस्‌ ॥ १ ॥ सकृदेव भ्रप्नाय तवास्मीति च याचते । अमयं सर्वभूतेस्यो ददाम्येतद््रतं मम ॥१२॥ रामस्य वचनं श्रुत्वा सुग्रीवो हृष्टमानस! । विभीषणमथानाय्य दशेयामास राघवम्‌ ॥१३॥। विभीषणस्तु साष्टाङ्गं प्रणिपत्य रघूत्तमम्‌ । पगदूदया वाचा भक्त्या च परयान्वितः ॥१४।। राम इयाम विश्ञालाक्षं ग्रसन्नष्ुखपङ्कजम्‌ । घदुर्बाणधरं शान्तं लक्ष्मणेन समान्वितम्‌ ॥१५॥ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा स्तोतुं समुंपचक्रमे ॥१६॥ विमीषण उवाच नमस्ते राम राजेन्द्र नमः सीतामनोरम। . .. नमसे चण्डकोदण्ड नमस्ते भक्तवत्सल ॥१७॥ पंमोषनन्ताय शान्ताय रामायामितंतेजसे । ुग्रीयमित्राय च ते रघूणां पतये नमः॥१८॥ ज़गदुत्पत्तिनाशानां कारणाय महात्मने । लिये-मुमुक्ष होकर आपकी ही शरणमे चछा आया हूँ ।” ` विभीषणके ये वचन सुनकर सुग्रीवने कहा--- ॥ ५-६॥ “हे राम | इस मायावी राक्षसाधमका कुछ विश्वास न करना चाहिये । ( यदि कोई ओर होता तब कोई विशेष चिन्ताकी बात भी नहीं थी किन्तु) यह. तो सीताका हरण करनेवाले रावणका ही छोटा भाई है और वैसे भी बहुत बळवान्‌ दिखायी देता है ॥ ७॥ यह अपने सश मन्त्रियोके साथ किसी समय एकान्त- में हमें मार डाठेगा | अतः हे प्रभो ! मुझे आज्ञा दीजिये मैं इसे वानरोंसे मरवा डाळे ॥ ८ ॥ हे राम ! मुझे तो ऐसा ही जँचता है, आपका इस विपयमें क्या निश्चय है, सो कहिये ।” सुग्रीवके वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकाकर कहा---॥९॥ “हे कपिश्रेष्ठ ! यदि मेरी इच्छा हो तो में आधे निमेपमें ही ळोकपालोंके सहित सम्पूर्ण छोकोंको नष्ट कर सकता हुँ और आधे निमेषमें ही सवको रच सकता हुँ, अतः ( तुम किसी प्रकारक चिन्ता न करो ) मैं इस राक्षसको अभयदान देता हूँ, तुम इसे शीघ्र ही ले आओ ॥ १०-११ मेर यह नियम है कि जो एक वार भौ मेरी शरण आकर में तुम्हारा है" ऐसा कहकर मुझसे अभय माँगता है उसे मैं समस्त प्राणियोसे निमय कर देता हँ” ॥१२॥ रामके ये वचन सुनकर सुग्रीबने अति प्रसन्नचित्तसे विभीषणको छाकर रघुनाथजीसे मिळाया ॥ १३॥ विमीषणने रघुनाथजीको साष्टांग प्रणाम किया और हर्षसे गदूगदकण्ठ हो परम भक्तिपूर्वक हाथ जोड़- कर शान्तमूतिं प्रसन्नवदनारविन्द॒ विशालनयन इ्याम- सुन्दर धनुर्वाणधारी भगवान्‌ रामकी, लक्ष्मणजीके सहित, स्तुति करनी आरम्भ की ॥ १४-१६॥ Ds बिभीषण बोले--“हे राजराजेश्वर राम ! आपको नमस्कार है। हे सीताके मनमें रमण करनेवाले! आपको नमस्कार है | हे प्रचण्डधनुर्घर ! आपको नमस्कार है । हे भक्तवत्सळ | आपको बारम्वार नमस्कार है ॥ १७॥ हे अनन्त, शान्त, अतुछतेजोमय, सुग्रीवसखा रघुकुरनायक भगवान्‌ राम ! आपको नमस्कार है ॥१८॥ जो संसारकी उत्पत्ति और नाशके कारण हैं. त्रिळोकी- युद्ध काण्ड पयम््य्य्य्य्य््य्य्य्ज्््व्््््प्ा्क््क्क्फ्प्कापप्पपप्कक्क्क्ककस्पाटटस्टन्स्न्म्न्््टलन ळू वट SS a rtrd artnerds ontniee oY itt >> >> rit onli ४ पटक बट कर घट चल कट सर चल च्म त्रैलोक्यशुरवेऽनादिगृह्याय नमोनमः ॥१९॥ | के गुरु और अनादिकालीन गृहस्थ% हैं उन महात्मा १४३ त्वमादिरजगतां राम त्वमेव स्थितिकारणम्‌ | . रामको बारम्बार नमस्कार है ॥ १९॥ हे राम ! आप संसारकी उत्पत्ति और स्थितिके कारण हैं तथा अन्तर्भे- समन्ते निधनस्थाने खेच्छाचारस्त्वमेव हि॥२०॥ | आप ही उसके ल्यस्थान हैं; आप अपनी इच्छानुसार वराचराणां भूतानां वहिरन्तश्च राघव । 5थॉप्यव्यापकरूपेण भवान्‌ भाति जगन्मयः।२१॥ चन्मायया हृतज्ञाना नष्टात्मानो बिचेतसः। एतागतं प्रपद्यन्ते पापपुण्यवज्ञात्सदा ॥२२॥ तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिकारजतं यथा । घावन ज्ञायते ज्ञानं चेतसाऽनन्यगामिना ॥२३॥ तदहानारसदा युक्ताः पुत्रदारशुहादिपु | (मन्ते विपयान्सर्वानन्ते दुःखम्रदान्विभो ॥२४॥ 'बमिन्द्रो$मिर्यमो रक्षो परुणश्च तथानिरः । विर तथा रुद्रस्त्वमेव पुरुषोत्तम ॥२५॥ चमणोरप्यणीयांश्च स्थूलात्‌ स्थूलतरः प्रभो | वे पिता सर्वलोकानां माता धाता त्वमेव हि ॥२६॥ आदिमध्यान्तरदितः परिषर्णोऽच्युतोऽच्ययः | च॑ पाणिपादरहितथक्षु/श्रोत्रविवजित। ॥२७॥ रोता द्रा ग्रहीता च जवनस्त्वं खरान्तक । गेशिभ्यो व्यतिरिक्तस्त्वं निर्गुणो निरुपाश्रय।२८। नेर्विकरपो निर्विकारो निराकारो निरीश्वरः। [इभावरहितोऽनादिः पुरुषः प्रकृतेः परः ॥२९॥ पायया शुद्ममाणस्त्वं मनुष्य इव भाव्यसे । ऱात्वा तवां निर्गुणमजं वेष्णवा मोक्षगामिनः ३े०॥ रह स्वरपादसङ्कक्तिनिःश्रेणीं प्राप्य राघवं | 'च्छामि ज्ञानयोगाख्यं सौधमारोइमीश्वर ॥ ३ १॥ [मः सीतापते राम नमः कारुणिकोत्तम । विहार करनेवाले हैं॥ २० ॥ हे राघव ! चराचर भूतों- के भीतर और बाहर ब्याप्य-च्यापक-रूपसे आप विश्वरूप ही मास रहे हैं || २१ ॥ आपकी मायाने जिनका सदसद्विवेक हर लिया है वे नष्ट-बुद्धि मूढ पुरुष अपने पाप-पुण्यके वशीभूत होकर संसारमें बारम्बार आते- जाते रहते हैं ॥ २२ | जबतक मनुष्य एकाग्र चित्तसे आपके ज्ञानस्वरूपको नहीं जानता तभीतकं सीपीमें चाँदीके समान यह संसार सत्य प्रतीत होता है ॥२३ || हे बिमो | आपको न जाननेसे ही लोग पुत्र, खी और गृह आदिमें आसक्त होकर अन्तमें दुःख देनेवाले विपयोमें सुख मानते हैं॥ २४ ॥ हे पुरुषोत्तम! आप ही इन्द्र, अशि, यम, निऋ ति, वरुण और वायु हैं तथा आपं ही कुवेर और रुदर हैं॥ २५ ॥ हे प्रमो ! आप अणु-से- अणु और महान्‌-से-महान हैं तथा आप ही समस्त लोकोंके पिता, माता और धाता ( धारण-पोषण करनेवाले ) हैं ॥२६॥आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित सर्वत्र परिपूर्ण अच्युत और अविनाशी हैं । आप हाथ-पाँवसे रहित तथा नेत्र और कर्णहीन है ॥ २७॥ तथापि हे खरान्तक | आप सब कुछ देखनेवाले, सब कुछ सुनने" वाले, सब कुछ ग्रहण करनेवाले और बड़े वेगवान्‌ हैं | हे प्रभो! आप अन्नमय आदि. पाँचों कोशोसे रहित तथा. निर्गुण और निराश्रय हैं || २८ ॥ आप निर्विकल्प; निर्विकार और निराकार हैं, आपका कोई प्रेरक नहीं है, आप (उत्पत्ति, बृद्धि, परिणाम, क्षय, -जीर्णता और नाश--इन ) छः भाव-विकारोंसे रहित हैं तथा प्रकृतिसे अतीत अनादि पुरुष हैं ॥ २५॥ मायाके कारण ही आप साधारण मचुष्यके समान प्रतीत होते हैं; बैंपगवजन आपको निर्गुण और अजन्मा जानकर मोक्ष प्राप्त करते हैं ॥३२०॥ हे राघव ! हे प्रभो! मैं आप- के चरण-कमळकी विशुद्ध भक्तिरूप सीढ़ी पाकर ज्ञान- योग नामक राजभवनके शिखरपर चढ़ना चाहता हूँ ॥ ३१ ॥ है कारुणिकश्रेष्ट सीतापते राम ! आपको ` नमस्कार है; हे राबणारे ! आपको बारम्बार नमस्कार वणारे नमस्तुभ्यं त्राहि मां भवसागरात्‌ ॥३१॥ | है; आप इस संसार-सागरसे मेरी रक्षा कीजिये” १२ Se IIIs पि TT & प्रकृतिरूपा पद्चीके साथ भगवानूका अनादि सम्बन्ध है, इसलिये वे अनादि गृहस्थ हॅ । - २४४ अध्यात्मरामाथण | [ सर्ग ३ reer TTT te ar SII SE es SU mee SSSI NY YYYYY SR wre SAS गे भक्तवत्सल! भक्तवत्सळ भगवान्‌ रामने प्रसन्न होकर कहा- १ प्रसन्न! प्रोवाच श्रीरामो भक्तवत्सल! । तब भक्तवत्सळ भगवान्‌ रामने ततः असन शा ४विभीषण | तेरा कल्याण हो, में तुझे वर देना चाहता बरं वृणीष्व भद्रं ते वाञ्छितं वरदोऽस्म्यहम्‌ ॥२२॥ | हृ; अतः तेरी जो इच्छा ह्यो वही वर माँग छे” ॥३३॥ बोळे 2 चौ ७ क्क विभीषण उवाच विभीपण बोले है रघुनन्दन । मं तो आपके श्र दि चरणोंका दर्शन पाकर ही धन्य ओर कृतकृत्य हो धन्यो$खि कृतकृत्योऽस्मि कृतकायों5रिम राघव । आया; मुझे जो कुछ पाना था वह मिछ गया । क रे न ४ मैं निः > > | त्वत्पाददर्शनादेव वियुक्तोडस्मि न संशय: ॥३४॥ | मैं निःसन्देह मुक्त हो गया ॥ ३४ ॥ हूं राम आपका मनोहर मूर्तिका दशान करनेसे आज मेरे समान कोई धन्य और पवित्र नहीं है; अब इस संसारमं ( किसी भी नास्ति मत्सदृशो लोके राम तवन्सूतिंदर्शनात्‌॥२५। प्रकार ) मेरी समता करनेवाला कोई नहीं है ॥ ३५ ॥ हे रघुनन्दन ! कर्म-बन्धनकों नष्ट करनेके लिये आप मुझे अपनी भक्तिसे प्राप्त होनेवाला ज्ञान और अपने त्वद्धचानं परमार्थं च देहि मे रघुनन्दन ॥३६।। | परमार्थ-खरूपका साक्षात्‌ करानेबाळा ध्यान दीजिये ~ ५ २ ॥ ३६ ॥ हे राजराजेश्वर राम ! मुझे विपयजन्य सुखकी राजेन्द्र सर ५ ५ ne < न याचे राम राजेन्द्र सुखं विषयसम्मवम्‌ । इच्छा नहीं है; में तो यही चाहता हूँ कि आपके चरण- त्वत्पादकमले सक्ता भक्तिरेव सदास्तु में ॥३२७॥ | कमळोंमें सदा मेरी आसक्तिरूपा भक्ति वनी रहे ॥२७) ओभित्युक्तवा पुनः प्रीतो रामः ग्रोवाच राक्षसम्‌। | तव रघुनाथजीने 'तथास्तु' कहकर विमीपणसे प्रसन्न ~ . ~ र | सुनो; में + अपना काना प्रशान्तानां योमिमा वीतरागिणाम्‌ | रहस्य सुनाता हूँ ॥ २८ ॥ जो मेरे श्ञान्तखभाव, विरक्त मळताना प्रशास्ताना लालना चातरानिगास्‌ ' और योगनिष्ठ भक्त है, उनके दयें मैं सीताजीके सहित हृदये सीतया नित्यं वसाम्यत्र न संशय! ॥३९॥ | सदा रहता हूँ--इसमें सन्देह नहीं ॥ ३९॥ अतः तुम तस्मात्वं सर्वदा ज्ञान्तः सर्वकर्मपवर्नितः ! सर्वदा शाम्त और पापरहित रहकर मेरा ध्यान करनेसे * ध्यात्वा मोध्यसे नित्यं घोरसं घोर संसार-सागरसे पार हो जाओगे ॥ ४०॥ जो मां ध्यात्वा मोक्ष्यसे नित्यं घोरसंसारसागरात।४०॥ "९ 5 रेके है ससारस गरात पुरुष मुझे प्रसन्न करनेके लिये इस स्तोत्रको पढ़ता, स्तोत्रपंतत्पठेचस्तु लिखेद्यः शृणुयादपि । लिखता अथवा सुनता है वह मेरा प्रिय सारूप्यपद मत्मीतये ममाभीष्टं सारूप्यं समवाप्लुयात्‌ ॥४१॥ | प्राप्त करता है” ॥ ४१ ॥ इत्युकत्वा लक्ष्णं प्राह श्रीरामो भक्तभक्तिमात्‌। विभीपणसे ऐसा कह भक्तवत्सल शरीरामने पश्यत्विदानीमेबेष मम सन्दर्ने फलम्‌ ॥४२॥ | उष्मणजीसे कहा--“लक्ष्मण | यह अमी मेरे दर्शनका ;ाराज्येऽभिपे फल देखे ॥ ४२॥ तुम समुद्रसे जळ ले आओ; मैं रं्काराज्येऽभिषेक्ष्यामि जलमानय सागरात्‌। | इसे ढंकाके राज्यपर अभिषिक्त किये देता हूँ। जबतक यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत्तिष्ठति मेदिनी ।।४३॥। | चन्द्र-सू्य और प्रथिवीकी स्मिति है तथा जवतक लोकमें नास्ति मत्सदृशो धन्यो नारित मत्सदृश? शुचिः कमेबन्धविनाशाय तज्ज्ञानं भक्तिलक्षणम्‌ | यावन्मम कथा लोके तावद्राउ्यं करोत्वसौ । मेरी कथा रहेगी तबतक यह लंकाका राज्य करेगा ।” इत्युक्त्वा लक्ष्मणेनाम्बु द्यानाय्य कलशेन त्‌।४४। ऐसा कह श्रोरमापतिने लक्मणजीसे कलरामें जल रङ्काराज्याधिपत्यार्थमभिपेकं रप्रापतिः। | सा और मन्त्रयों तथा बिशेषतः लक्ष्मणजीसे उसे. लंकाके राज्यपद्पर अभिषिक्त कराया ॥ ४३-४५॥ पु ASQ ह क विशे ` ` कारयामास सविवेलकमणन पत! ॥४५॥ | उस समय समस्त वानरः प्रसन्न होकर “धन्य है, धन्य स्मर] साधुसाध्चिति ते सर्वे वानरास्तुष्टुयुभूशय । सुग्रीयोऽपि परिष्वज्य विभीपणमथाजवीत्‌ ॥४६॥ बिभीषण वयं सर्वे रामस्य परमात्मनः । किङ्करास्तत्र पुख्यस्त्व भवत्या रामपरिग्रहात । सवणस्थ बिनाशे त्व॑ साहाय्य॑ कतुमहासे ॥४७॥ विभीषण उवाच अहं कियान्सहायत्वे रामस्य परमात्मन! । किं तु दास्यं करिष्येऽहं भक्त्या शक्त्या ह्मायया४८ दशग्रीयेण सन्दिष्टः शुको नाम महासुरः । संस्थितो. हम्बरे वाक्यं सुग्रीवमिदम्रवीत्‌ ॥४९॥ त्वामाह रावणो राजा भरातरं राक्षसाधिपः । महाकुलग्रसतस्त्व॑ राजाऽसि चनचारिणास्‌ ॥५०॥ मम भ्रातृसमानस्त्व॑ तव नास्त्य्थविप्ठवः । अहं यदइरं भाया राजपुत्रस्य कि तव ॥५१॥ किष्किन्धां याहि हरिभि्सङ्का शक्या न दैवते! ्राप्तुं किं मानपैरल्पसस्तैवानरयूथपैः ॥५२॥ तं प्रापयन्त वचनं तृर्णमुत्प्छत्य वानराः । ग्रापद्यन्त तदा क्षिप्रं निहन्तु दढय्ुष्टिभिः ॥५३॥ वानेरईन्यमानस्तु शुको राममथात्रवीत्‌ | न दूतान्‌ भन्ति राजेन्द्र वानरान्पारय प्रभो ॥५४॥ रामः श्रृत्वा तदा वाक्यं शुकस्य परिदेवितम्‌ । मा वधिएति रामस्तान्वारयामास वानरान्‌ ॥५५॥ पुनरम्बरमासाध शुकः सुग्रीवमत्रवीत्‌ । रहि राजन्द्रीवं कि वक्ष्यामि त्रजाम्यहम्‌॥५६॥ | सुग्रीव उवाच यथा वाढी मम भ्राता तथा खं राक्षसाधम । हन्तव्यस्त्वे मया यत्रात्सपृत्रवकवाहनः ॥५७॥ युद्धकाण्ड ee ono NN FENN Ne re ५८०७७७७९४७ NN २४५ है! ऐसा कहने रो; और सुग्रीबने विमीषणको गळे लगाकर कहा-। ४६ ॥ “विभीषण ! हम सब परमात्मा रामके दास हैं, तथापि तुम हम सबमें प्रधान हो क्योंकि तुमने केवळ भक्तिसे ही उनकी शरण ली है । अब तुम्हें राबणका नाश करानेमें हमारी सहायता करनी चाहिये” || ४७॥ बिभीषण वोले-“में परमात्मा रामकी क्या सहायता कर सकता हूँ, तथापि मुझसे जैसी कुछ बनेगी निष्कपट होकर भक्तिमाबसे उनकी सेबा करता रहुँगा” ॥ ४८॥ इसी समय रावणका भेजा हुआ झुक नामक महा- दैत्य आकाशमें स्त्रित होकर सुग्रीवसे इस प्रकार बोला- ॥ ४९ ॥ “राक्षसराज रावण तुम्हें अपने भाईके समान मानते हैं, उन्होंने तुम्हारे ल्यि कहा है कि तुम बड़े कुलमें उत्पन्न इए हो और वानरोंके राजा हो ॥ ५०॥ तुम मेरे भाईके समान हो ओर तुम्हारा कोई खार्थघात भी नहों हुआ है । यदि मैंने किसी राजकुमारकी खीको हर ही लिया तो उससे तुम्हें क्या ! ॥५१॥ अतः तुम अपने वानरोंके सहित किण्किन्धाको छौट जाओ। छंकाको पाना तो देवताओंके लिये भी कठिन है, फिर अस्पकृक्ति मनुष्य और वानरयूथपोंकी तो बात ही क्या है १? ॥५२॥ जिस समय झुक इस प्रकार सन्देश सुना रहा था, वानरोंने अपने सुदृढ धूँसासे मारनेके लिये उसे तुरन्त ही उछलकर पकड़ लिया ॥ ५३ ॥ वानरोंके मारनेपर झुकने शरीरामचन्द्रजीसे कहा-- हे राजेन्द्र ! ( विज्ञजन ) दूतको मारा नहीं करते, अत:'हे प्रभो | इन बानरोंको रोकिये” || ५४ ॥ झुकका यह करुणा- युक्त वचन सुनकर रामने इसे मत मारो' ऐसा कहकर धानरोंको रोक दिया ॥ ५५॥ तब झुकने फिर आकाइमें चढ़कर सुग्रीवसे कहा--“हे राजन्‌ ! मैं जाता हुँ; कहिये, रावणको आपकी ओरसे क्या उत्तर दूँ ?” ॥ ५६ ॥ | झुग्रीचने कहा--उससे कहना, जिस प्रकार मैंने अपने भाई बालीको मारा था, हे राक्षसाधम ! उसी प्रकार तू भी अपने पुत्र, सेना और वाहनादिके सहित २४६ ITT शका तक्र रहि मे रामचन्द्र भायो हृत्वा क्र याससि । ._ थ ततो रामाज्ञया शृत्वा शुर्क बध्वान्वरक्षयत्‌ ॥५८॥ ारदूहोऽपि ततः पूर्व दृष्टा कपिवरं महत्‌ । यथावत्कथयामास रावणाय स राक्षस! ॥५९॥ दीर्षचिन्तापरो भूत्वा निःश्वसन्नास मन्दिरे । ततः सञ्चद्रमवेकष्य रामो रक्तान्तलाचनः ॥६०॥ पश्य लक्ष्मण दुटोऽसौ वारिधिर्मामुपागतम्‌ । नाभिनन्दति दुष्टात्मा दर्शनार्थं ममानध ॥६१॥ जानाति माचुपोऽयं मे किं करिष्यति वानरे! | अध्यात्मरामायणे र्क Laid (स SAN NINE 248 AAMANNAS © nA मेरे हाथसे मारा जायगा | त. हमारे रामचन्द्रजीकी मार्याका हरण करके अब कहाँ जा सकता है? तदनन्तर भगवान्‌ रामकी आज्ञासे झुकको पकड उन्होंने बन्धनमें डालकर वानरोकी रक्षामें छोड़ दिया।५७-५८॥| शुकसे पहले ही शादळ नामक राक्षसने वानरोंका महान्‌ सेना देखकर रावणसे उसका यथावत वर्णन कर दिया था ॥ ५९ ॥ यह सब सुनकर रावणको बड़ी चिन्ता हुई और वद दीर्ध निःश्वास छोइता अपने महळमें तरैठा रहा | इसी समय भगवान्‌ रामने समुद्रकी ओर देखकर क्रोधसे नेत्र छाल कर कहा- ॥ ६०॥ “लक्ष्मण | देखो, यह समुद्र कैसा दृष्ट है १ में इसके तीरपर आया हूँ किन्तु हें अनघ ! इस हुरात्माने दर्शन करके भी मेरा अभिनन्दन नहीं किया ॥ ६१ ॥ यह समझता है, “यह अद्य पश्य महाबाहो शोषयिष्यामि वारिधिस्‌ ॥६२|| एक मनुष्य ही तो है; वानरोंके साथ मिल्कर पादेनेव भमिष्यन्ति वानरा विगतज्वरा! | इत्युक्त्या कोधताम्राक्ष आरोपितधचुर्थरः ॥६३॥ तूणीराद्वाणमादाय कालामिसदशग्रभम । सन्धाय चापमाकृष्य रामो घाक्यमथान्रवीत्‌।६४। ` पञ्यन्तु सर्वेभूतानि रामस्य शरविक्रममू । इदानीं मस्मसात्कुयी समुद्र सरितां पतिम्‌ ॥६५॥ एवं रुवति रामे तु सशैलवनकानना | चचाल वसुधा चोथ दिशश्च तमसा5ष्यृता।॥९६॥ चुक्षुमे सागरो वेलां भयाद्योजनमत्यगात्‌ । तिमिनक्रज्ञषा मीना! प्रतप्ताः परितत्रसुः ।६७॥ एतस्मिन्नन्तरे साक्षात्सागरो दिव्यरूपधृक्‌ । दिव्याभरणसम्पन्नः खभाता भासयन्‌ दिश॥६८॥ स्वान्तःखदिव्यरल्ानि कराभ्यां परिशृह्य सः । पादयोः पुरतः कषिप्ता रामस्योपायनं बहु ॥६९॥ . दण्डवर्णिपत्याह रामं .रक्तान्तलोचनम्‌ । भी यह मेरा क्या कर सकता है! सो हे महा- बाहो ! देखो, आज में इसे सुखाये डाळता हूँ ॥ ६२ ॥ फिर वानरगण निश्चिन्त होकर पेंढछ ही इसके पार चले जायेंगे |” ऐसा कह भगवान्‌ रामने क्रोधसे नेत्र जाळ कर अपना धनुष चढ़ाया और तणीरसे एक कालाग्निके समान तेजोमय बाण निकाल- कर उसे धनुपपर रखकर खींचते इए कहा-॥।६२- ६४॥ समस्त प्राणी रामके वाणका पराक्रम देखे; में इसी समय नदीपति समुद्रको भस्म किये डालता हँ” ॥६५॥ भगवान्‌ रामके ऐसा कहते ही वन ओर पर्वतादिके सहित सम्पूर्ण प्रथिवी हिरने डगी तथा आकाश और दिशाओंमें अन्धकार छा गया ॥६६॥ समुद्र क्षुमित हो गया और भयके कारण अपने तटसे एक योजन आगे बढ़ आया; तथा बड़े-बड़े मत्स्य, माके, मकर और मछलियाँ सन्तप्त होकर भयभीत हो गये | ६७॥ इसी समय नाना प्रकारके दिव्य आभूषण धारण किये दिव्यरूपधारी समुद्र, हाथोंमें अपने ही भीतर स्थित दिव्य रत्न लिये, अपने प्रकाशसे दझों दिशाओं- को प्रकाशित करता, स्वयं उपस्थित हुआ और भगवान्‌ रामचन्द्रजीके चरणोंके आगे नाना प्रकारके उपहार रख, जिनके नेत्रोंके मध्यभाग क्रोधसे ला २४७ ताह त्राह जगन्नाथ राम त्रठोक्यरक्षक ॥॥७०॥ | हो रहे हैं उन रघुनाथजीको साष्टाङ्ग दण्डवत्‌ कर जडीऽद राम ते सृष्ट: तृजता निखिलं जगत्‌ । खभावमन्यथा कतुं क! शक्तो देवनिसितम्‌॥७१॥ स्थूलानि पञ्चभूतानि जडान्येच खभावतः | रटिनि भवतैतानि त्वदाज्चां लङ्घयन्ति न ॥७२॥ तामसादहमो राम भूतानि प्रभवन्ति हि। बोला- हे त्रेलोक्यरक्षक जगत्पति राम ! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो ॥ ६८-७० ॥ है राम ! सम्पूर्ण संसारको रचना करते समय आपने मुझे जड ही बनाया था; फिर आपके बनाये स्वभावको कोई कैसे बदल सकता है १ || ७१ ॥ पाँचों स्थूळ भूतोंकों आपने स्वमावसे जड ही बनाया है, वे आपकी आज्ञाका उछ्इ्न नहीं कर सकते ॥ ७२॥ हे राम ! भूत तामस अहंकारसे उत्पन्न होते हैं, अत कारणाइुगमात्तेषां जडत्वं तामसं खतः ।॥७३॥ | अपने कारणका अनुगमन करनेसे उनमें तमोरूप निर्शुणस्त्वं निराकारो यदा माथाशुणान््रमो। लीलयाङ्कीकरोपि त्वं तदा वेराजनामवान्‌ ॥७४॥ | शयिक युणात्मनो विराजश्च सत्त्वाददेवा वभूविरे । रजोगुणाठाजेशाद्या मन्योशतपतिस्तव ॥७५॥ | । जडत्व तो स्वतःसिद्ध है ॥७३॥ हे प्रभो ! आप निर्गुण और निराकार हैं | जिस समय आप लौछासे ही गुणोंको अङ्गीकार करते हैं उस समय आप- ' का नाम 'ैराज' पड़ जाता है॥ ७४ ॥ उस गुणमय बिराटके सात्तिकांशसे देवगण, राजसांझसे प्रजापतिगण और तामसांशसे रुद्रगण उत्पन्न होते हैं । ॥७५॥ हे त्वामहं मायया छन्नं लीलया मालुषाकृतिम्‌ ।।७६॥। | नाथ | लीलावश मायासे आच्छन्न होकर मनुष्यरूप जडवुद्धिजेडो मूर्खः कथं जानामि निशुणम्‌ । भूतानाममरश्रे्ठ पशनां रगुहो यथा । शरणं ते त्रजामीश आरण्यं भक्तवत्सल । कै अभयं देहि मे राम लक्कामागे ददामि ते ॥७८॥ श्रीराम उवाच अमोधोऽयं महावाणः करिमिन्देशे निपात्यताम्‌] लक्षयं दर्शय मे शाघरं वाणस्यामोधपातिनः ॥७९॥ रामस्य वचनं श्रत्वा करें दृष्टा महाशरम्‌ । महोदधिर्मददातेजा राघवं वाक्यमन्रवीत्‌॥८०॥ रामोत्तरम्रदेशे तु हमकुल्य इतिं श्रृतः । प्रदेशस्तत्र बहवः पापारसानो दिवानिशम्‌ ॥८१॥ चाघन्ते मां रघुश्रेष्ठ तत्र ते पात्यतां शरः | रामेण सृष्ट वाणस्तु क्षणादाभीरमण्डलम्‌ ॥८२॥ हत्वा पुनः समागत्य तूणीरे पूवेवत्सितः | ` हुए आप निर्गुण परमात्माको मैं जडबुद्धि मूर्ख कैसे | जान सकता हूँ £ हे अमरश्रेष्ठ प्रभो ! पशुओंको दण्ड एव हि मूर्खाणां सम्मार्मग्रापकः प्रभो ॥७७॥ जैसे लाठी ठीक-दीक मार्गमें छे जाती है उसी प्रकार (सुझ-जैसे) मूर्ख जीबोंके लिये तो दण्ड ही सन्मार्गपर लानेबाला होता है । हे भक्तवत्सल भगवान्‌ राम ! आप झरणागतरक्षककी मैं शरण हूँ | आप मुझे अभय- दान दीजिये । मैं आपको ळंकामें जानेका माग दूंगा” ॥ ७६-७८॥ श्रीरामचन्द्रजी बोले--मेरा यह महावाण व्यथं जाने- चाळा नहीं है; अतः शीघ्र ही मुझे इस अमोघ वाणका लक्ष्य बताओ । ॥ ७९॥ ॥॒ रामका यह वचन सुनकर और उनके हाथमे वह महाबाण देखकर महातेजस्वी समुद्रने रघु-. नायजीसे कहा--॥ ८०॥ “हे राम ! उत्तरकी ओरं एक 'द्ुमकुल्य' नामक देश है । वहाँ वहुत-से पापी रहते हैं। वे मुझे रात-दिन पीड़ा पहुँचाते हैं । हे रघुश्रेष्ठ ! आप अपना यह बाण वहीं गिराइये ।” तदनन्तर रामः का छोड़ा हुआ वह वाण एक क्षणमें ही समस्त आमौर- मण्डलको मारकर पिर पूर्ववत्‌ तरकशमें लौट आया । तब समुद्रने रघुनाथजीसे अति विनीत भावसे कहा-- अध्यात्मरामायण | [सम ४ न re यभयभाभाधपपाना पद +८ल्‍+ ततोष्जबीद्रधभरेष्ठ॑ सागरो विनयान्वितः ॥८३॥ | ॥ ८१-८३ ॥ हैं राम | विश्‍्वकर्माका पुत्र नळ मेरे सेतु करोल्वस्मिन्‌ जले मे वि श्रकर्मण: । जळपर पुल निर्माण करे 1 बहू चतुर बानर बरे नह सेतु करोत्वार्मन्‌ जट भत = = ० प्रभावसे इस कार्यको करनेमं समथ हे ॥ ८४ ॥ इससे सुतो धीमान्‌ सम्थोऽसिन्काय हब्बरी दि सत्र लोग आपकी संसार-मळापहारिणी कीर्ति जान कीर्ति जानन्तुते लोकाः सर्वलोकमलापहाम्‌। | जायेंगे |” रघुनाथजासे इस प्रकार कद समुद्र उन्हें इत्युकत्वा राधवं नत्वा ययो सिन्धुरच्ब्यताम्‌॥८५॥, रणाम कर अन्तर्धान हो गया ॥ ८५॥ ततो रामस्तु सुग्रीवलक्ष्मणाभ्यां समान्वितत। | तदनन्तर, घुग्रीव और लक्ष्मणके सहित रामः} चानरेः सेतुवन्धने चन्द्रजीने नरको वानरोंकी सहायतासे तुरन्त पुल बाँघने- नलमाज्ञापयच्छीधरं बानरेः सेतुषन्धने ॥८६॥ | चन्द्रजीने नकां वानर्राका सह. पु [ ~ हज रय च्य ततोऽतिहृष्टः प्लवगेन्द्रयुथपे- २४८ की आज्ञा दी ॥ ८६ ॥ तब नळने, महापवतके समान महानगेन्द्रप्रतिमयुतों नलः | | अन्य बानरयूथपतियेंकि साथ, अति प्रसत्नतापूर्वक पर्त बबन्ध सेतु शतयोजनायतं | और इक्षादिकोंसे एक सो योजन छम्बा अति बिन्ती सुविस्तृतं पर्वतपादयेडेढम्‌ ॥८७॥। | और सुदृढ पुछ बनाया ॥८७॥ nnn जिम्मा इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहे३वरसंवादे युद्धकाण्डे तृतीयः सर्ग: ॥३॥ च्‌ ७ ७ तुथ सग समुद्र-तरण, लङ्का-निरीक्षण तथा रावण-शुकसंवाद । ! श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेवजी बोले--हे पार्वति ! सेतुबन्धके आरम्म होनेपर भगवान्‌ रामने रामेश्‍वर महादेवकी स्थापना कर उनका पूजन करते हुए लोकहितके लिये इस प्रकार कहा-। १॥ “जो पुरुष रामेश्‍वर शिवका दर्शन कर सेतुबन्धको प्रणाम करेगा वह मेरी कृपासे ब्रह्महत्या आदि पापोसे मुक्त हो जायगा ॥ २ ॥ यदि कोई पुरुष सेतु- वन्धमें स्नान कर रामेश्वर महादेवके दर्शन करे और फिर संकल्पपूर्वक काशी जाकर वहाँसे गंगाजल लावे तथा उससे रामेश्वरका अभिषेक कर उस जलके पात्रको समुद्रम डाल." दे तो वह निःसन्देह अह्मको प्राप्त कर लेता है” ॥ १-९ ॥,-- कृतानि प्रथमेनाह्वा योजनानि चतुर्दश । सुना जाता है, वानरश्रे् नने पहले दिन चौदह - द्वितीयेन तथा चाह्वा योजनानि तु विंशतिः॥ ५ ॥ | गोजन,दूसरे दिन बीस योजन, तीसरे दिन इक्कीस योजन, कृतीयेन तथा चाह्वा योजनान्येक्िंश्तिः । सेतुमारभमाणस्तु तत्र रामेश्वरं शिवम्‌ । संखाप्य पूजयित्वाऽऽह रामो लोकहिताय च ॥१॥ प्रणमेत्सेतुवन्धं यो दृष्टा रामेश्वरं शिवस्‌ । ्रह्महत्यादियापेस्यो झुच्यते मदचुग्रहात्‌ ॥ २॥ सेतुबन्धे नरः खात्या दृष्टा रामेश्वरं हरम्‌ । सङ्कर्पानियतो भूत्वा गत्वा वाराणसीं नर!॥ ३॥ आनीय गङ्कासलिलं रामेशमभिपिच्य च । च्रे क्षिप्ततद्भारो ब्रह्म प्रामोत्यसंशयम्‌ ॥ ४॥ चतुर्थेन तथा चाहा द्वाविंशतिरिति श्रुतम्‌ ॥ ६ ॥ | चे दिन बाईस योजन और पाँचवें दिन तेईस योजन पञ्चमेन त्रयोविंशद्योजनानि समन्ततः । समुद्रपंर पुल बाँधा ॥ ५-७॥ उसी पुलसे वानर- बन्ध सागरे सेतु नलो वानरसत्तमः॥ ७॥ | गण तुरन्त ही सो योजन समुद्रके उसपार चले गये । _ तेनेव जम्मु) कपयो योजनानां श॒तं हुतम्‌) | और फिर असंख्य वानरवीरोंने सुवेळ-पर्वतको घेर असङ्कयाताः सुवेलाट्रि रुरुधुः प्लवगोत्तमाः || ८ | ¦ किया ॥ ८ ॥ सर्ग ४] युद्धकाण्ड २४९ TSS आरुद्य मारुति रामो लक्ष्मणोऽप्यङ्गदं तथां। ` दिइक्ू राघवो लङ्कामारुरोहाचरं महत्‌ ॥ ९॥ दृष्टा लङ्कां सुविस्तीणां नानाचित्रध्वजाङ्कुलाम्‌ । चित्रमासादसम्ताधां खर्णम्राकारतोरणाम्‌ ॥१०॥ १ रिखाभिः शतप्तीमिः सउक्रमैथ विराजिताम्‌ । प्रासादोपरि विस्तीणग्रदेशे दशकन्धरः ॥११॥ मन्त्रिभिः सहितो वीरे! किरीटदशकोज्ज्वल । चीलाद्रिशिखराकारः कारुमेघसमप्रभः॥१२॥ रलदण्डेः सितच्छत्रैरनेकेः परिशोभितः । एतसिन्नन्तरे बद्धो झुक्तो रामेण वे शुकः ॥१३॥ वानरेस्ताडितः सम्यक्‌ दशाननश्रुपागतः । अहसन्‌ रावणः प्राह पीडितः किं परे? शुका १४॥ _ रावणस्य वचः श्रुत्वा शुको चचनमन्रवीत्‌ । ` सागरस्योत्तरे तीरेऽघ्रवं ते वचनं यथा ॥ तत उत्प्ठुत्य कपयो शृहीत्वा मां क्षणात्ततः |।१५॥ युष्टिभिर्बखदन्तैश्च इन्तुं लोप प्रचक्रु । ततो मां राम रक्षेति क्रोशन्तं रघुपुङ्गवः ॥१६॥ विसुज्यतामिति श्राह विसृष्टोऽहं कपीश्वरः ततोऽहमागतो भीत्या दृष्टा तद्वानरं धरम्‌ ।१७॥ , राक्षसानां घलौघस्य वानरे्द्रबुस्य च | जैतयोबिद्यते सन्धिदैवदानवयोरिव ॥१८॥ पुर्राकारमायान्ति क्लिप्रमेकतरं कुछ । सीतां वाऽस्मै प्रयच्छाशु युद्धं वा दीयतां प्रभो । १९) मामाह रामस्त्वं जूहि राघणं मंद्रचः शुक । यद्धल॑ च समाश्रय सीतां मे हृतवानसि ॥२०॥ तद्दर्शय यथाकामं ससैन्यः सद्दवान्धव! । च्च ere फिर, श्रीरामकी लंका देखनेकी इच्छा होनेपर राम- चन्द्रजी हनुमान्‌के और छक्ष्मणजी अङ्गदके ऊपर बैठकर उस महान्‌ पर्यतपर चढ़ गये ॥ ९ ॥ उन्होंने देखा कि छङ्कापुरी अति विस्तीर्ण है । वह नाना प्रकारकी ध्वजाओं, बिचित्र प्रासादों तथा सुबणनिर्मित परकोटों और तोरणोंसे सुसजित है ॥१०॥ बह (सब ओरसे ) खाइयों, तोपों और संक्रमो ( सुरंगों ) से सुशोमित - है। उसके एक राजभवनके ऊपर अति विस्तृत भागमें अपने वीर मन्त्रियोंके सहित रावण बैठा है । उसके शिरोपर दश मुकुट सुशोभित हैं, बह नीलाचळके शिखरके समान आकारवाळा एबं श्याम मेघकी-सी आमावाळा है ॥ ११-१२ ॥ नाना प्रकारके रत्रदण्डयुक्त सवेत छत्रोसे उसकी अपूर्व शोभा हो रही है। इसी समय भगवान्‌ रामद्वारा बाँधकर छोड़ा हुआ झुकनामक दैत्य वानरोसे मली प्रकार मार खा- कर राबणके पास पहुँचा | उसे देखकर रावणने हँसते इए पूछा-“झुक ! क्या शत्रुओने तुम्हें कुछ कष्ट पहुँचाया है ?” ॥ १३-१४ ॥ | रावणके वचन सुनकर झ्ुकने कहा-““समुद्रके उत्तरतटपर जाकर ज्यों ही मैं आपका सन्देश छुनाने लगा त्यां ही कुछ वानरोंने उछलकर मुझे तवक्षण पकड छिया ॥१५॥ और मुझे धूँसों, नखों एवं दांतोसे मारने- तथा लुप्त करनेका आयोजन करने लगे । तब, हि राम ! मेरी रक्षा करो! इस प्रकार मुझे पुकारते सुन रघुश्रेष्ठ रामने कहा, “इसे छोड़दो ।” इससे उन वानरोंने . मुझे छोड़ दिया । तब मैं वानरोंकी सेना देखकर बड़ा डरता-डरता यहाँ आया हैँ ॥ १६-१७॥ मेरे बिचारसे देव और दानवोंके समान राक्षसोंके दळबळ और वानरोंकी सेनामें किसी प्रकार मेल नहीं हो सकता ॥ १८ ॥ दे प्रभो ! वे शीघ्र ही नगरके पर- कोटपर आनेबाछे हैं, आप दोनोमेंसे कोई एक काम कीजिये-या तो उन्हें सीता दे दीजिये और या उनके साथ युद्ध कौजिये ॥ १९॥ रामने मुझसे कहा है कि “शुक | रावणसे मेरी ओरसे कहना कि जिस शक्तिके भरोसे तुमने हमारी जानकीको हरा है उसे मली प्रकार अपनी सेना और बन्धु-वान्धर्वोके सहित मुझे दिखलाना । तू कळ ही प्राकार और ‘६५ १" A १.१ २५० SSS 1 श्वःफाठे नगरी लङ्कां सप्राकारां सत्तोरणाम॥२ १॥ राक्षसं च वलं पश्य शरेविंध्वेसित मया । धोररोपमहं मोक्ष्ये बलं धारय रावण ॥२२। इत्युकत्वापररासाथ रामः कमललोचन! । एकखानसता यत्र चत्वारः पुरुषर्षभाः ॥२२॥ श्रीरामो लक्ष्मणश्चैव सुग्रीय विभीषणः । एत एव समर्थास्ते लङ्कां नाशायेतुं ग्रमो ॥२४॥ उत्पा भस्मीकरणे सर्वे तिष्ठन्तु वानराः । तस्य यांग बल॑ इष्टं रूप प्रहरणानि च ॥२५॥ वधिष्यति पुरं सर्वभेकस्तिष्ठन्तु ते त्रयः । प्य वानरसेनां तामसहयातां प्रपूरिताम ॥२६॥ गजीस्त वानरास्तत्र पर्य पर्वतसन्निभाः । न शक्यास्ते गणयितुं ग्राधात्येन ब्रवीमि ते २७ एष योऽभिषुखो सङ्कां नदंस्तिष्ठति वानर! । यूथपानां सहस्राणां शतेव परिवारितः ।।२८॥ सुग्रीवसेनाधिपतिनीलो नामाग्निनन्दनः । एप पर्वेतशृङ्गाभ! पद्मफिज्ल्कसनिमः ॥२९] स्फोटयत्यभिसंरव्धो लाइ च पुनः पुनः । युघराजोऽङ्गदो नाम वालिपुञ्नोतिबीर्येवाच्‌ 1३०] येन इष्टा जनकजा रामस्थातीववछुभा । हनूमानेप विख्यातो हतो येन तवात्मजः ॥३ १॥ श्वेतो रजतसङ्काशो महाबुद्विपराक्रमः । ू्ण सुग्रीवमागम्य पुनर्भेच्छति वानरः ॥३२॥ यस्त्वेष सिंहसङ्काशः प्यत्यतुलविक्रमः । रम्भो नाम महासचो लङ्कां नाशयितुं क्षमः ॥३३॥। एप परयति दै लङ्कां दिधक्षषिव बानरः । „ शरभो नाम राजेन्द्र कोटियूथपनायकः ॥३४॥ पनसश्च महावीयों भेन्दश्च द्विविद्स्तथा । नलश्च सेतुकताऽसौ विश्वकर्मसुतों वली ॥३५॥ अध्यात्मरामायण [ समे ४. तोरणादिके सहित छंकापुरी और राक्षसोंकी सेनाको मेरे बाणोंसे विध्वस्त हुई देखेगा । रावण ! उस समय मैं भयंकर क्रोध छोड गा, त्‌ अपने बछको सिर रखना! ॥२०-२२॥ ऐसा कहकर कमळनयन भगवान्‌ राम चुप हो गये । ॥& प्रमो | और सव वानर एक ओर रहें तो भी, एक ” साथ मिल जानेपर, छंकाको जइसे उखाड़कर उसे भस्म और नष्ट करनेमें तो राम, लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषण ये चार पुरुषश्रेष्ठ ही पर्याप्त हैं । और मैंने,जैसे उनके चळ,रूप और अ-शख्नादि देखे हैं उससे तो यही माळम होता है कि और तीनों अन्यत्र रहें, अकेले राम ही समस्त नगर- को नष्ट कर सकते हैं। अब, सव ओर फैली हुई वानरोंकी उस असंख्य सेनाको देखिये ॥ २३-२६ ॥ देखिये, थे पर्वंतसद्ृदा वानर वीर कैसे गर्जे रहे हैं । इन्हे गिना नहीं जा सकता, इसलिये मैं आपको इनमेंसे प्रधान-प्रघान वतराता हूँ ॥२७॥ यह वानर, जो लकाकी ओर देखकर वारम्वार गर्जे रहा है और एक लाख यूथपतियोसे घिरा हुआ है, वानरराज सुग्रीवका सेनापति अग्निनन्दन 'नीळ' है। जो कमळ-केशरकी-्सी : आभाबाळा तथा पर्वेत-शिखरके समान विशालकाय है एवं रोषपूर्वक वारम्वार अपनी पूँछ पटक रहा है वह अति वीर्यवान्‌ वालिपुत्र युवराज 'अङ्घद' है || २८-३०॥ जिसने रामकी अत्यन्त प्रिया जनक-नन्दिनी सीताको देखा और आपके पुत्रका वध किया, यह वही विख्यात चीर हनुमान्‌' है ॥ ३१ ॥ जिसकी कान्ति चाँदी- के समान शुक्र वर्ण है, जो बड़ी शीघ्रतासे - सुग्रीवके पास आकर फिर लोट जाता है तथा जो - महाधुद्धिमान्‌ पुरुषार्थी और सिंहके समान अतुळितु पराक्रमी वानर इधर देख रहा है बह रम्भ! . है । ढंकाको नष्ट करनेमें यह अकेला ही समर्थ है ॥ ३२-३३ ॥ हे राजेश्वर ! यह दूसरा वानर, डि जो छंकाकी ओर इस प्रकार देखता है मानो जळा ही डालेगा, करोड़ यूथपतियोंका नायक “शरभं | है ॥ २४ ॥ इनके अतिरिक्त महापराक्रमी पनस, मैन्द, | द्विविद और सेतु वॉँधनेवाछा विश्वकर्माका पुत्र महा- चली नछ---ये सव भी प्रधान-ग्रधान योद्धा हैं ॥३५॥ सग ४ | Dk Spee, = EE NN ०० ५. NN’ वानराणां वर्णने वा सङ्झ्याने वा क ईश्वरः । शूराः सव महाकायाः सर्वे युद्धामिका ङ्विणः।२६॥ शक्ताः सर्वे चूर्णयितुं झट्का रक्षोगणैः सह । एतेषां वरुसङ्कधानं प्रत्येक वच्मि ते शृणु ॥२७॥ ` एफ्रां कोटिसहस्राणि नव पश्च च सप्त च। ज्या शह्ूूसहस्राणि तथार्धुदशतानि च॥३८॥ सुग्रीवसचिवानां ते घलमेतस्प्रकीतितम्‌ । अन्येपां तु बलं नाहं घक्तु. शक्तोऽसि रावण ॥३९॥ रामो न माइुपः साधादादिनारायणः परः । सीता साक्षाजञगद्भेतुश्रिच्छक्ति्जगदास्मिका।४०॥ ताभ्यामेव समृत्पन्न जगत्थावरजङ्गमम्‌ । तस्माद्रामश्च सीता च जगतस्तस्थुषश्च तो ॥४१॥ 'पितरी प्थिवीपाल तयोंवेंसी कथं भवेत्‌ । अज्ञानता स्वयाऽऽनीता जगन्मातेच जानकी।४२॥ क्षणनाशिनि संसारे शरीरे क्षणमहुरे। पञ्चभूतात्मके मल्मांसासिदुर्गन्यभूयिष्ठेव्हुतालये । केबाय्या व्यतिरिक्तस्य काये तव जडात्मके ॥४४॥ राजंश्रतुर्विशतितच्यके ॥४३॥ यत्कृते व्रह्महत्यादिपातकानि कृतानि ते । भोगमोक्ता तु यो देहः स देहोऽत्र पतिष्पति।४५॥ पुण्यपापे समायातो जीवेन सुखदुःखयोः । कारणे देहयोगादिनाऽऽत्मनः कुरुतोऽनिशम्‌।४६। यावदेदोऽसि कर्तीखीत्यात्माञहदुरुतेव्वशः | युड्काण्ड २५१ "२४४४१४४४४१ इन बानरोंका वर्णन करने और गिननेकी सामर्थ्य किसमें है । ये सभी बड़े शूरवीर, विशालकाय और युद्धके लिये उत्सुक हैं ॥३६॥ राक्षसोंके सहित छंका- को चूर्ण करनेमें ये सभी समर्थ हैं। अब मैं इनमेंसे प्रत्येककी सेनाकी संख्या बतळाता हूँ, सावधान होकर सुनिये ॥ २७ ॥ इनमेंसे प्रत्येकके नीचे इक्कीस हजार करोड, हजारों शंख और सैकड़ों अरब सेनां है॥३८॥ “हे रावण | यह तो मैंने सुग्रीबके मन्न्रियोंकी ही सेना बतायी है; उनके अतिरिक्त औरोंकी सेना गिनानेमें तो मैं सर्वथा असमर्थ हूँ ॥ २९ ॥ राम भी कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे साक्षात आदिनारायण परमात्मा हैं; और सीताजी जगतकी कारणरूपा साक्षात्‌ जगद्रृपिणी चित-शक्ति हैं॥ ४० ॥ इन दोनोसे ही समस्त स्थावर-जंगम संसार उत्पन हुआ है, अतः राम और सीता स्थावर-जंगम जगतके माता-पिता हैं । हे पृथिवीपते ! सोचो तो, उनका बैरी कोई कैसे हो सकता है ! आप जिस जानकीको अनजानमें ठे आये हैं बह साक्षात्‌ जगन्माता ही है ॥४ १- ४२॥ हे राजन्‌ | क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले संसारमें चौबीस तत्त्वों#के समूहरूप इस क्षणमंगुर पाञ्चभौतिक शरीरमें जिसमें मळ, मांस, अस्थि आदि दुर्गन्धयुक्त पदार्थोकी हो अधिकता है और जो अहंकारका आश्रय- स्थान तथा जडरूप है आप क्या आखा करते हैं £ आप तो इससे सर्वया प्रथक्‌ हैं ॥ ४३-४४॥ हाय ! जिस शारीरके लिये आपने ब्रह्महत्यादि अनेकों पाप किये हैं, सम्पूर्ण मोगोंका भोक्ता वह शरीर तो यहीं पड़ा रह जायगा | ॥ ४५॥ सुख-दुःखके कारण- रूप (पूर्वजन्मकृत) पाप-पुण्य जीवके साथ ही आते हैं और वे ही देह-सम्बन्ध आदिके द्वारा जीवको अहर्निश सुख-दुःखकी प्राप्ति कराते हैं ॥ ४६ ॥ जब- तक अज्ञानजन्य अध्यासके कारण जीव भें देह हूँ, मं कर्ता हूँ? ऐसा अभिमान करता है तमीतक अध्यासात्ताबदेव स्याजन्मनाशादिसम्भवः।४७॥ | उसे विवश होकर जन्म-पृत्यु आदि भोगने पडते हैं MRR YR सिक टा & प्रकृति, वुद्धि, अहंकार, ग्यारह इन्त्रियाँ, पञ्चभूत भौर शब्द-स्पर्श आदि उनके पाँच विषय--ये सब मिलाकर श्ोबीस तत्व कहळाते हैं । अंध्यात्मरीमायणं rrr ध्य २५२ Bosom 5४5५४ ४ तखास्व॑ त्यज देहादावभिमानं महामते । आत्माडविनिपैछ! शुद्धो विज्ञानात्माऽचलोऽन्ययः खाज्ञानवश्तो बन्धं प्रतिपद्य वियुद्यति । ` तसां शुद्धभावेन ज्ञात्वाऽऽत्मानं सदा सर।।४९। विरतिं भज सर्वत्र पुत्रदारगृहादिषु | निरयेष्वपि भोगः स्थाच्छवशुकरतनावपि ॥५०॥ देह लब्ध्या विषेकात्य विजरं च विशेषतः । तत्रापि भारते वर्षे कर्मभूमौ सुदुलभम्‌ ॥५१॥ को बिद्वानात्मसात्कृत्वा देई भोगाचुगो भवेत्‌ । अतस्तं ब्राह्मणो धूत्वा पौरस्त्यतनयश्च सच।५२॥ अज्ञानीव सदा सोगानतुधावासे किं सुधा । इतः परं बा त्यक्त्वा त सर्वसङ्गं समाश्रय ॥५२॥ राममेव परात्मानं भक्तिभावेन स्वेदा । सीतां समर्प्यं रामाय तत्पादानुचरो भव ॥५४॥ विश्ुक्तः सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं ग्रयास्यसि। नो चेदरमिष्यसेऽघोऽधः पुनराबृत्तिवर्जित! । अङ्गीकुरुष्व मद्वाक्यं हितमेव वदामि ते ॥५५॥ सस्सङ्कतिं: कुरु भजख़ हरिं शरण्यं श्रीराघं मरकतोपरकान्तिकान्तम्‌। सीतासमेतमनिशं शतचापवाणं [सर्ग 0१ आशि ७०४ ५०3० ७४0१४००००० ue, ॥ ४७॥ अतः हे महामते ! आप देह आदिमे अभिमान छोडिये । आत्मा तो अत्यन्त निर्मळ, शुद्ध- स्वरूप, विज्ञानमय, अविचछ और अविकारी है ॥ ४८ ॥ अपने अज्ञानके कारण ही वह वन्धनमें पड़- कर मोहको प्राप्त होता है । अतः आप आत्माको शुद्ध भावसे जानकर नित्य उसीका स्मरण कीजिये ॥ ४९ ॥ पुत्र, खी और गृह आदि सभीसे उपराम हो 1 जाइये क्योंकि भोग तो कुत्ते और शकरादिकी योनिमें१ तथा नरकादिमें भी मिळ सकते हैं | ५० ॥ सदसदू- विवेक-बुद्धिसे युक्त मनुष्य-शरीर पाकर, उसमें मी विशेषतः द्विजत्व पाकर और अति दुर्लभ कर्मभूमि भारतवर्षमें जन्म ग्रहण कर, ऐसा कौन बुद्विमान्‌ होगा जो देहमें आत्मबुद्धि कर भोगोंका सेवन करेगा ! “अतः आप ब्राह्मण-शरीर और सो भी पुलत्त्य- नन्दन विश्रवाके पुत्र होकर अज्ञानीके समान सदा ही इन भोगोंकी ओर व्यर्थ क्यों दोड़ते हैं £ आजसे आप सब प्रकारका संग छोड़कर अति भक्तिभावसे सदा परमात्मा रामका ही आश्रय लीजिये और श्रीसीताजी- को भगवान्‌ रामके अर्पण कर उनके चरणकमलोंकी सेवा कीजिये | ५१-५४ | यदि आप ऐसा करेंगे तो सब पाप्रसे छूटकर विष्णुळोक प्राप्त करेंगे, नहीं तो पुनः उपर लौटनेसे बञ्चित रहकर उत्तरोत्तर नीचेके छोकोंमें . ही जाते रहेंगे । मैं आपके हितकी ही बात कहता हूँ, आप इसे स्वीकार कीजिये || ५५ || हे रावण ! आप अदिश सत्संग कीजिये और जिनके शरीरकी कान्ति मरकतमणिके समान है तथा सुग्रीव, लक्ष्मण और बिभीषण जिनके चरणकमलोंकी सेवा कर रहे हैं उन शरणागतवत्सल, धनुर्वाणध्वारी श्रीरघुनाथजीका सीताजी- सग्रीवलक्ष्मणविभीषणसेविताङ्घ्रिःम्‌५६ | के सहित भजन कीजिये” | ५६ ॥ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उंभामहेश्‍वरसंवादे युद्धकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥ सर्ग ५] युद्धकाण्डं र्प्रे र पञ्चमं सगे शुक्रका पूर्वबचरितर, माल्यवानका रावणको समकाना तथा वातर-राक्षस-संत्राम । श्रीमहादेव उवाच र्ता शुकमुखोद्रीत घावपम्शाननाशनम्‌ । रावणः क्रोधताम्राक्षो दहन्नित तमन्रवीत्‌ ॥ १॥ अनुजीव्य सुदुुंद्धेः गुरुवद्धापसे फथम्‌। शासिताऽहं त्रिजगतां त्वं मां शिक्षत्र रञ्जसे ॥ ९॥ इदानीमेव इन्मि त्वां किन्तु पूवकृते तब । स्मरामि तेन रक्षामि त्यां यद्यपि वघोचितम्‌॥ ३॥ इतो गच्छ विमूढ त्वमेवं श्रोतुंन मे क्षमम्‌ । महाप्रसाद इत्युकत्वा वेपमानो ग्रह ययो ॥ ४ ॥ | शुकोऽपि प्राह्मणः पे ्र्षिष्टो ब्रह्मवित्तम ` बानम्रस्थविधानिन वने तिष्ठत्‌ खकमैकृद ॥ ५॥ देवानाममित्रद्धथथं विनाशाय सुरद्विषाम्‌ । चकार यज्ञगिततिमविच्छिन्नां महार्माते! ॥६॥ राक्षसानां विरोधोऽभूच्छुको देषहितोद्यतः । व्रजञदेप्र इतिं ख्यातस्त्रकी राक्षसो महान्‌ ॥ ७॥ अन्तर॑ प्रेप्सुरातिष्ठच्छुकापकरणोधत! | कदाचिदागतोाऽगस््खस्याश्रमपदं पुनेः ॥ ८ | -.तेन सम्पूजितो5गस्त्यो भोजनार्थ निमन्त्रितः | गते खात मुनी कुम्भसम्मंवे प्राप्य चान्तरस्‌ ॥९॥ अगस्त्सरूपशक सोऽपि राक्षसः शुकमब्रवीत्‌ । यदि दास्यति में अह्मन भोजनं देहि सामिषस्‌।१०॥ रुकारं न शुक्त मे मांस छागाद्गसम्भवस्‌ । तथेति कारयामास मांसमोज्यं सविस्तरम्‌ |. श्रीमहादेवजी वोळे--हे पार्वति ! झुकके मुखसे | निकले हुए इन अज्ञाननाशक बचनोंको सुनकर रावण , क्रोधसे मानो जळता हुआ उससे आँखें लाळ करके बोछा-- ! ॥१॥ “अरे दुुंद्रे | मेरे ही टुकडोसे परकर द इस प्रकार | गुरुकी भाँति कैसे बोलता है! तीनों छोकोंका शासन करनेवाला तो मैं हूँ, मुझे उपदेश देते हुए तुझको लज्जा नहीं आती ? ॥ २॥ तू यद्यपि वध करनेयोग्य है और मैं तुझे अभी मार डाळता, परन्तु तेरे पूवे- कृत्योंको याद करके मैं तुझे छोड़े देता हूँ ॥ ३ ॥ अरे मूढ़ | त तुरन्त यहाँसे टल जा, मैं ऐसी बातें नहीं सुनना चाहता |” रावणके ये वचन सुनकर झुक भ्हाराजकी वडी कृपा है! ऐसा कहकर काँपता हुआ अपने घर चळा गया ॥ ४ ॥ पूर्व-जन्ममें धुक एक वेदज्ञ और ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण था, तथा बानप्रख-विधिसे अपने धर्म-कर्ममें तत्पर हुआ चनमें रहता था ॥ ५॥ इस महामतिने देवताओंकी वृद्धि और दैत्योंके नाशके लिये लगातार बहुत-से बढ़े- बढ़े यज्ञ किये॥ ६ ॥ अतः देवताओंके हितमें लगे रहने- के कारण झुकका राक्षसोंसे विरोध हो गया! उस समय चच्रदंष्र नामक एक महान्‌ राक्षस झुकका अपकार करनेपर उतारू होकर अवसर देखने लगा | एक दिन सुनिवर शुकके आश्रममें महर्षि अगत्त्य परधारे॥७-८॥ झुकने अगस्त्यजीव्हो पूजा कर उन्हें भोजन के लिये निमन्त्रित किया ! जिस समय महर्षि अगस्त्य स्नानके लिये गये हुए थे उस राक्षस (बन्रदंट्) ने अपना मौका देखकर अगल्यका रूप बनाया और शुकसे कह[--- हि ब्रह्मन्‌ | यदि तुम मुझे भोजन कराना चाहते हो तो मांसबुक्त अन खिळाओ ॥ ९-१०॥ मैने बहुत दिनोंते छाग (बकरे) का मांस नहीं खाया है!” तब शुकने 'जो आज्ञा' कह बड़ी ॥११॥ | तैयारीसे मासमय भोजन बनवाया ॥ ६६ ॥ २५४ ee ~ ४४४४४७ ९८०७० उपधिष्टे मुनौ मोक्तु राक्षसो5तीव सुन्द्रस्‌ | शुकभार्यावपुर्दत्वा तां चान्तमोंहयन्‌ खलः॥१२॥ नरमांस ददौ तस्मै सुपकं बहुविस्तरम्‌ | देवान्तर्दधे रक्षसतो दृष्टा चुकोप सः ॥१३॥ अमेध्यं मालुषं मांसमगस्त्यः शुकमत्रवीत्‌ । अभक्ष्य मालुष॑ मांस दत्तवानसि दुर्मते ॥१४॥ मह तव राक्षसो भूरा तिष्ठ त्य सानुपाशन: । इति शप्तः शुको भीत्या म्राहागर्तयं धुते ्वया।१५। इदानीं भाषितं मेऽद्य मांसं देहीति विस्तरम्‌ | तथेव दत्तं मे देव किंमे शापं प्रदास्यसि ॥१६।॥ शरुत्वा शुकस्य वचनं झुहृते ध्यानमाखितः । झ्ञात्वा रक्षःकृतं सर्वे ततः ग्राह झुकं सुधी! ॥१७॥ तवापकारिणा स्वे राक्षसेन कृतं त्विदमू । अविचायेंब मे दत्तः शापस्ते मुनिसत्तम ॥१८॥ तथापि मे वचोऽमोघमेवमेय भविष्यति | राक्षसं वपुरास्थाय रावणस्य सहायकृत्‌ ॥ १९) तिष्ठ तावच्दा रामो दशाननवधाय हि। आगमिष्यति लङ्कायाः समीपं बानरे! सह ॥२०॥ प्रेपितो रावणेन त्व॑ चारो भूत्वा रघृत्तमस्‌। अध्यात्मरामायणे कक २७४०४७७ ४७ ४७५०४७४१४४ तवव्यब्याःकन्यक्य काल कक ्ष्न््न््ट ०७०५५ कक कमक क क He wa Snes NS, जिस समय मुनि भोजन करने वेठे उस दुष्ट राक्षसने झुककी पत्नीका अति सुन्दर रूप धारण किया, और उसे ( शुककी खीको ) आश्रमके भीतर ही मूच्छित कर मुनिवरको नाना प्रकारसे बनाया हुआ नरमांस परोसा | उसे परोसकर वह राक्षस अन्तर्धान हो गया | मुनिवर अगस्त्य अपने आगे अभक्ष्य नरमांस देखकेए, अति क्रोधित हुए और झुकसे बोले“ हेर दुर्मते | तुमने मुझे अभक्ष्य नरमांस खानेको दिया है, अतः तुम मनुप्यमोजी राक्षस होकर रहो ।” अगस्त्यजीके इस प्रकार शाप देनेपर झुकने डरते-डरते कहा--“मुने ! आपने अमी कहा था कि आज मुझे नाना प्रकारका मांस खानेको दो; हे देव ! मैंने आपकी आज्ञानुसार ही आपको मांस दिया हैं फिर आप मुदे शाप क्यों देते हैं ?' ॥ १२-१६ ॥ झुकके वचन सुनकर महावुद्धिमान्‌ अगस्त्यजीने एक मुहूर्ततक ध्यानस्थ होकर राक्षसकी सत्र करतत जान ली। तब वे शुकसे बोळे || १७ ॥ “हे सुनिश्रेष्ठ । यह सब करवत तुम्हारे अपकार-कर्ता राक्षसकी है, मैंने तुम्हें बिना विचारे ही शाप दे दिया ॥ १८॥ तथापि मेरा वचन बृथा जानेवाळा नहीं है, इसलिये होगा ऐसा ही । तुम राक्षसका शरीर धारण कर राबण- की तबतक सहायता करते रहो जवतक कि उसका नाश करनेके लिये श्रीरामचन्द्रजी वानरोंके सहित छंकाके समीप न आये ॥ १९-२० ॥ इसके पश्चात्‌ तुम राबणके भेजनेसे उसके दूत होकर रघुनाथजीके पास जाओगे और उनका दर्शन कर झापसे मुक्त हो जाओगे, दृष्टा शापाद्विनिर्मुक्तो बोधयित्वा च रावणम्‌॥२१।| फिर रावणको तत्त्वज्ञानका उपदेश कर मुक्त होकर तच्वज्ञानं ततो मुक्तः परं पदमवाप्स्यसि । इत्युक्तोऽगस्त्यञ्चुनिना शुक्को जाह्मणसत्तमः ॥२२॥ बभूव राक्षसः स्यो राणं प्राप्य संखितः । परमपद प्राप्त करोगे ।” सुनिवर अगस्त्यके ऐसा कहनेपर बिप्रवर झुक राक्षस होकर तुरन्त रावणके पास आकर रहने ळगे । इस इदानीं चाररुपेण इष्टा रामं सहातुजम ॥२३॥ | प रवणके दूतरूपसे लक्ष्मणसहित भगवान्‌ रावणे दत्तविज्ञानं बोधयित्वा पुनट्ठुतम । _* पदेवह्ाक्षणो भूत्वा खितो वैखानसैः सह ॥२४॥ © रामका दशेन कर तथा रावणको तत्वज्ञानका उपदेश दे वे फिर शीघ्र ही पूर्ववत्‌ ब्राहमण-शरीर हो बानग्रस्थोंके साथ रहने लगे ॥ २१-२४ ॥ सर्ग५] युद्धकाण्ड २५५ ततः ससागमद्दद्ठी माल्यवान्‌ राक्षसो महान । बुद्धिमान्नीतिनिएणो राज्ञो मातु!म्रियः पिता॥२५॥ आह तं राक्षसं वीरं प्रशान्तेनानतरात्मना । ( झुकके चळे जानेपर ) राजा रावणकी माताका. प्रिय पिता अति बुद्धिमान्‌ और नीतिनिपुण बृद्ध राक्षस माल्यवान्‌ वहाँ आया ॥ २५॥ वह झान्त- चित्तसे उस राक्षसवीर ( रावण ) से बोढा--“ह्े शृणु राजन्वचो मेघ्च श्रुत्वा कुरु यथेप्सितम्‌ ॥२६॥|| राजन ! मेरी प्रार्थना घुनिये, फिर आपकी जैसी “दा प्रविष्टा नगरीं जानकी रामबछभा । तदादि पुर्या इश्यन्ते निमित्तानि दशानन ॥२७॥ घोराणि नाशहेतूनि तानि से वदतः णु । खरस्तनितनिधॉपा मेघा अतिभयज्कराः ॥२८॥ शोणितेनाभिवपैम्ति लज्कामुष्णेन सर्वदा । रुदन्ति देवलिङ्गानि खिद्चन्ति अचलन्ति च ॥२९। कालिका पाण्डुरदेन्तेः प्रहसन्त्यग्रतः खिता । खरा गोपु प्रजायन्ते भूपका नङुलेः सह ॥३०॥ मार्जारेण तु युध्यन्ति पन्नगा गरुडेन तु । करालो विकरो मुण्डः पुरुपः कृष्णपिद्धल। ॥३१॥ कालो शृहाणि सर्वेपां काले काले त्वयेक्षते | एतान्यन्यानि द्यन्ते निमित्तान्युङ्भवन्ति च।३२। Nr अतः कुलस्य रक्षार्थ शान्ति कुरु दशानन । सीतां सत्कृत्य सधनां रामायाशु प्रयच्छ भो ३२। रामं नारायणं विद्वि विद्वेषं त्यज राघवे । थत्पादपोतमाश्रित्य ज्ञानिनो भवसागरम्‌ ॥३४॥ :/ तरन्ति भक्तिपूतान्तास्ततो रामो न मालुपः। भजख भक्तिमावेनु, रामं सर्वहृदालयमू ॥३५॥ यद्यपि त्वं दुराचारो भकत्या पूतो भविष्यासि। मद्वाक्यं कुरु राजेन्द्र कुलकोशलहेतवे ॥३६॥ तत्तु माल्यवतो वाक्यं हितमुक्त दशाननः । न मर्पयति दुष्टात्मा कालस्य वशमागता ॥३७॥ इच्छा हो वह करना ॥२६॥ हे दशानन ! जबसे नगरमें राम-मार्या जानकीका प्रवेश हुआ है तभीसे यहाँ वड़े भयंकर नाइाकारी हेतु दिखायी दे रहे हैं, सो में आपको बतलाता हूँ, छुनिये--अति भयंकर मेघगण तीण कडकके साथ गर्जते हैं. और स्वेदा ळंकाके उपर गर्भ-गर्म रक्तकी वर्षा करते हैं । देवमूर्तियाँ रोती हैं, उनके शरीरमें पसीना आ जाता है और बे अपने स्थानसे स्खलित हो जाती हैं॥ २७- २९॥ कालिकाएँ राक्षसोके आगे अपने पीले-पीले दाँत निकालकर हँसती हैं, गोओंके गधे उत्पन्न होते हैं और चूहे न्यौले तथा बिछीसे एवं सर्प गरुडसे युद्ध करते हैं । समस्त राक्षसोंके धरोंकी समय-समयपर काळे और पीले रंगका एक महाभयंकर बिकरालवदन मुण्डित-केश काळपुरुष देखा करता है । इस प्रकार ये तथा और भी बहुत-से अपशकुन उत्पन्न होते और दिखायी देते हैं ॥ २०-३२॥ अतः हे दराशीश ! अपने कुलकी रक्षाके ढिये इनकी शान्ति कीजिये और तुरन्त ही सीताको सत्कारपूर्वेक बहुत-से धनके सहित रघुनाथजीको दे दीजिये ॥ ३३॥ रामको आप साक्षात नारायण समझिये, इसलिये उनमें द्वेषभाव छोड़ दीजिये । इन रघुनाथजीके चरण-कमळ-रूप नौकाका आश्रय लेकर भक्तिसे पवित्र अन्तःकरण इए योगिजन संसारसागरको पार कर जाते हैं। अतः ये कोई साधारण पुरुष नहीं हैं। ये सबके अन्तःकरणोमें विराजमान हैं, आप भक्तिभावसे इन रघुनाथजीका भजन कीजिये ॥ ३४-३५ | यद्यपि आपका आचरण अच्छा नहीं है, तथापि उनकी भक्तिसे आप पवित्र हो जायेंगे । हे राजेन्द्र | अपने कुछकी कुशलताके छिये मेरा यह वचन मान ळीजिये” ॥ ३६ ॥ किन्तु माल्यवानूके ये हितकर वाकय दुष्टचित्त रावणको सहन न हुए, क्योंकि वह फाळके बशीभूत हो रहा था॥३७॥ वह वोला---“इस बेचारे एक तुच्छ २५६ rT roto pee | मानव कृपणं राममेक शाखास््गात्रयय्‌ । । समर्थ मन्यसे केन हीनं पित्रा झुनिग्रियम्‌॥३८॥ | रामेण प्रेषितो चूते भापसे त्वमनर्गल्यू। | गच्छ बद्धोऽसि बन्धुसतंसोटं सर्वे त्वयोदितम्‌ २९ ` इतो मत्कर्णपदवी दहत्येतद्वचस्तव । त्युक्त्वा सर्यसचिवै। सहितः प्रस्ितस्तदा ॥४०॥ Ce प्रासादाग्रे समासीनः पद्यन्वानरसेचिकान्‌। युद्धायायोजयत्सर्वराक्षसान्सङ्गपस्िताच्‌ ॥४१॥ रामोऽपि घञुरादाय लक्ष्मणेन समाहृतम्‌ । दृष्टा रावणमासीनं कोपेन कछुपीकृतः॥४२॥ | किरीटिनं समासीनं मन्त्रिभिः परिवेष्टितम्‌ । ¦ ba शशाङ्काैनिमेनेचच ब्राणेनेकेन राघवः ॥४३॥ ेतच्छत्रसहस्राणि किरीददशर्क तथा। ` चिच्छेद निमिपार्धेन तदद्भुतमिवाभवत्‌ ॥४४॥ लञ्जितो रावणस्तूणं विवेश भवनं सरकम्‌ | आहय राक्षसान्‌ सधान्प्रहस्तम्रमुखान्‌ सर!) ४५॥ . वावरे? सह युद्धाय नोदयामास सत्वरः । | ततो भेरीमृदङ्गाधेः पणवानकगोमुखे! ॥४६॥ महिषोष्े खरे! सिंदैद्ठीपिभिः कृतवाहनाः । खङ्गशूलुघज्ुःपाशयष्टितोमरशक्तिभिः ॥४७॥ लक्षिताः सर्वतो रङ्कां परतिद्वारश्रुपाययुः। | तत्पूर्वमेव रामेण नोदिता चानरपभाः ॥४८॥ ` उद्यम्य गिरिशृङ्गाणि शिखराणि महाम्तिच। ` तरूंश्ोत्पाट्य विविधान्युद्धाय हरियूथपाः ४९॥ : रक्षमाणा रावणस्य तान्यनीकानि भागशः । : राघवग्रियकामार्थं उङ्घामारुरुहुस्तदा ॥५०॥ ' ` ते दुभेः पवेताग्रेश सृशिमिश्र इङ्गमाः। ` _ ततः सहस्रयूथाथ कोटियूथाथ यूथपाः॥५१॥| अध्यात्मरामायण मनुष्य रामको, जिसने बन्दरका आश्रय छिया दुआ है और जिसे उसके पिताने भी निकाल दिया है, तुम किस वातमं समर्थ मानते हो ? बह तो केवळ वनवासी सुनिजनोंका हीं प्यारा हैँ ॥ ६८॥ माद्धम हाता है, तुम्हे रामने ही भेजा है इसीजिये तुग इस प्रकार ऊटपटांग' बातें बनाते हो | जाओ, तुम बूड और अपने ने- सम्बन्धी हो इसलिये मैन तुम्हारा सब्र बातें सहेन, कर ली हैं ॥ १९ ॥ किन्तु अत्र तुम्हारे वचन र कानोंको जछाते हैं ।” ऐसा कहकर वह अपने समज मन्त्रियॉसहित बहास चळ दिया ॥ ४०॥ ओर अपने राजभवनके सर्वोच्च तलपर ब्रठकर वानर -सैनिको- को देखता हुआ अपने आस-पास वेळे हुए राक्षसॉको युद्धके ल्यि नियुक्त करने लगा ॥ ४१ ॥ इधर, रामचन्द्रजीने रावणको बैठा देख अति क्रोघातुर हो छक्ष्मणजीका लाया हुआ धनुष उठाया ॥ ४२ ॥ वह झिरपर मुकुट धारण किये अपने अनेकों मन्त्रियोंसे घिरा हुआ बैठा था भगवान्‌ रामने आधे निमेषम ही एक अर्चन्द्राकार वाणसे उसके हजारों वेत छत्र और ददो मुकुट काट ढाले। यह बड़ा आश्चयं-सा हो गया ॥४२-९०॥ इससे ढलित होकर रावण तुरन्त अपने घरमं घुस गया; और उस दुएने शीघ्र ही प्रहत आदि मुण्य-मुख्य राक्षसोको बुलाकर चानरोंके साथ युद्ध करनेकी आज्ञा दी । तब राक्षसळोग भेरी, मृदंग, पणव, आनक ओर गोमुख आदि वाजे वजात मेंसों, ऊँठों, गधों, सिंहो और हाथियोंपर चढ़कर खड्ग, झूल, धनप, पाश, यष्टि : (डण्डे),तोमर और शक्ति आदि अत्न-शत्रोंसे पुसजित हो छक्के प्रत्येक द्वारपर आ गये । भगवान्‌ रामने वानरोको > पहले ही आज्ञा दे दी थी ॥४५-४८॥ अतः वे पर्वतोंकी शिलाएँ तथा बड़े-बड़े शिखर उठ कर और नाना प्रकारके वृक्ष उखाडकर युद्धके लिये चळे और[रावणकी वह पथक्‌ पृथक्‌ सेना देखकर रघुनायजीका . प्रिय कार्य करनेके लिये लंकापर चढ़ गये ॥ ४९-५० || उनमेंसे कोई सहस्रयूथपति, कोई कोटियूथप और कोई शतकोटि- यूपनायकथे। उन वानरे उषठलते-कूदते और गर्जते हुए सगे ५ ] कोटीशतथुताश्चान्ये रुरुधुर्नगरं ` भूशम । आप्लवन्तः प्लवन्तश्च गजन्तश्च प्लवङ्गमा$।।५२॥ रामो जयत्यतिबलो लक्षणश्च महाबल? । राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाचुपालितः ॥५२॥ इत्येनं घोपयन्तश्च समं युयुधिरेऽरिभिः ;रनुमानङ्कदश्चेव झुमुदो नील एच च ॥५४॥ नेरु शरमश्रेष मेन्दो द्विविद एव च। जाम्बवान्द्धिवक्‍त्रथ् केसरी तार एव च॥५५॥ अन्ये च बलिनः सर्वे यूथपाश्च प्लवङ्गम; । दाराण्युतप्हुत्य लङ्काया! सर्वतो रुरुधुर्भशम । तदा वृक्षेमहाकायाः पर्वताग्रैश्च वानराः ॥५६॥ निजध्लुस्तानि रक्षांसि नसैर्दन्पेश्च वेगिताः राक्षसाश्च तदा मीमा द्वारेभ्यः सर्वतो रुपा ॥५७॥ नित्य मिन्दिपालेअ सङ्गै शेः परश्वयैः । निञध्चुर्वानरानीकं महाकाया महाबलाः ॥५८॥ राक्षसांश्च तथा जघ्चुर्वानरा जितकाश्षिनः । तदा बभूव समरो मांसशोणितकर्दमः ॥५९॥ रक्षसां वानराणां च सम्मभूवादभुतोपमः । ते हयेश्च गर्जेश्रेंव रयैः काश्वनसन्निभेः ॥६०॥ रक्षोव्याघ्रा युयुधिरे नादयन्तो दिशो दश । राक्षसा कपीन्द्राय परस्परजयैषिणः ॥६१॥ राक्षसान्वानरा जध्युरवानरांेव राक्षसा! । रामेण विष्णुना दृष्टा हरयो दिविजांशजा) ॥६२॥ बभूउुबीलिनों हृष्टाखदा पीताणृता इव। सीतामिमशैपापेन रावणेनाभिपालिताव्‌॥६२॥ हतश्रीकान्हतवलान्‌ राक्षसान्‌ जघ्चुरोजसा । चतुर्थाशावशेपेण निहतं राक्षसं बलम्‌ ॥६४॥ स्वसैन्यं निहतं दृष्टा मेधनादोऽथ दृष्टीः । ्रहमदत्तवरः श्रीमानन्तर्धाने गतोऽसुरः ३३ . युद्धकाण्ड SRR Sh २५७ वृक्ष, पवेतशिखर और मुषट्टियाँ तानकर नगरको सब ओर- से घेर लिया ॥|५१-५२॥ महाबळी राम और वीरवर लक्ष्मणकी जय हो, रघुनाथजीसे सुरक्षित राजा सुप्रीवकी जय हो! इस प्रकार शब्द करते हुए वे शत्रुओसे लड़ने लगे । हनुमान्‌, अंगद, कुमुद, नील, नळ, शरभ, मैन्द, ` द्विविद, जाम्बवान्‌, दधिसुख, केसरी, तार तथा अन्य समस्त बळ्वान्‌ वानर और थूथपतियोंने उछल- उछलकर छंकाके सब द्वारोंको चारों ओरसे घेर लिया । तब वे महाकाय वानरगण वृक्ष, पर्वतशिखर और नख तथा दॉतोंसे अति वेगपूर्वक उन राक्षसोंको मारने लगे | तब, महाभयानक और बड़े-बड़े डीलूवारे महा- बळी राक्षसगण भी अति रोषपूर्वक सब द्वारोंसे निकलकर भिन्दिपाळ, खड्ग, शूळ और परशु आदि विविध अख-शख्नोंसे वानर-सेनापर प्रहार करने लगे ॥ ५१-५८ ॥ इसी प्रकार विजयी वानरवीर भी राक्षसोंको मारने छगे । उस समय वहाँ राक्षसो और वानरोंका बड़ा विचित्र युद्ध छिड़ गया, जिससे उस रणभूमिमें रक्त और मांसकी कीच हो गयी । वीर राक्षसकेसरी घोडों, हायियों और सुवर्णमय रथोंपर चढ़- कर अपने शाब्दसे दरों दिशाओंको गुञ्ञायमान करते हुए लड़ रहे थे, और राक्षस तथा वानर दोनों ही परस्पर एक दूसरेकी जीतना चाहते थे || ५९-६१॥ वानरगण राक्षसोंको और राक्षसळोग वानरोंको मारने छगे। बिष्णुरूप भगवान्‌ रामकी दृष्टि पडनेसे देवताओंके अंश- से उत्पन्न हुए वानरगण बड़े प्रबळ हो गये; और मानो अमृतपान कर अति हर्षसे उत्साहपूर्वक, सीताजीको (इरण करते समय) स्पर्श करनेके कारण मद्दापापी रावणसे पालित निस्तेज और बछहीन राक्षसोंको _ मारने लगे धीरे-धीरे राक्षसोंकी सेना नष्ट होकर केवळ एक चौथाई रह गयी ॥ ६२-६४॥ अपनी सेनाको नष्ट हुई देख ब्रह्माजीके वरसे शरीसम्पन्न हुआ दुष्टबुद्धि राक्षस मेघनाद अन्तर्धान हो ॥६५॥ | गया॥६५)] वह दैत्य सब प्रकारके अख-शत्न चलानेसें _२५८ ' अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५ ROSS Roo 77 OCCT CLIC CRITI RECO og tinea ५० ल re ee ‘een & १४%. के क ८» वच न rey वुदाळ था। अतः चह आवादर्मे चदकर ब्रग्मासद्रारा चानर-सेनाका दल्ति करता हुआ स्र आर नाना | अकारक शस और घागयशूद चाचे टया । यह ववष शरजालानि तददूशुतमियाभवत्‌। | , बड़ा आथर्य-सा होने खगा । अखवेत्ताओंम श्रेष्ट भगवान रामोऽपि मानयन्य़ाह्ममखमखाबिदां वरः ॥६७॥ | राम भी प्रसासका गाने रसनेके लिये पक क्षणक शि ५ चुपचाप वानर-सेनाका पतन देग्यत यो! । अन्तम -से क्षणं तृष्णीकर॒वासाथ ददद पतितं बलम्‌ । | रघुश्रेष्ठ क्रोधसे अग्निक समान प्रखलित हो 3): वानराणां रघुभ्रेष्ठशचुकोपानलसब्ििभः ॥६८॥ | ॥ ६६-६८ ॥ और वोडे-“टक्ष्मण! मेरा धनुप नो चापमावय सौमित्रे त्र्मास्धेणासुर धषणाद । लाओ, में एक क्षण दी इस दृष्ट दानवको प्रभाससे 2. भस्म कर डाळे गा । घे रघुब्रेष्ट ! आज तुम मेरा पराळाम मसीकरोमि मे पश्य वलमद्य रघूत्तम ॥६९॥ | शना? ॥ ६० ॥ सर्वाख्रकुशलो च्योन्नि ब्रह्माख्रेण समन्ततः | । । ९ मेघनादो5पि तच्छत्वा रामवाक्यमतन्द्रित) । गेघनाद भी बहुत सावधान था; रामचन्दजीके ये S ~ a » Fe यिको वाक्य सुनते ही वह मघामायावी दैत्य मायापू्वेक तुरन्त तूर्ण जगाम नगरं मायया मायिकोऽ्सुरः ||७०॥| _ _+ . Mi अपने नगरको चला गया || ७० ॥| बानर-सेनाकी नए हुई पतितं वानरानाक इष्ट्वा रामोऽतिदुःखितः | | देख श्रीरामचन्द्रजी अति दुःमित होकर एसुमानजीसे Cr क्षीरमहोदा ~ बोले-“हनुमान्‌! तुग तुरन्त ही शौर-सागरपर जां उवाच मारुति शीघ्र गरवा घम्‌ ॥७१॥ द श्‌ गन्‌; तुम तुर तदा टर तागरपर माझा] . ९ दिव्यौपधिसमुद्धव बहाँ द्रोणाचल नामक पतेत है, जिसपर नाना तत्र द्रोणगिरिनोम दिव्योपधिसमुद्धवः । प्रकारकी दिव्य ओपधिथा उत्पन होनी हैं| है मदाभते! तमानय टत गत्वा सञ्जीवय महामते ॥७२॥ | तुम झटपट जाकर उस पर्वतको ले आओ और इन चर _ महापराक्रमी वानरयू्षोक्रो जीवित करो । इससे वानराधान्महासत 1 कोति वि ५ * वानराचा त चान्कीतिस्ते सुखिरा भवत | तुम्हारी काति अविचल हो जायगी |” यहद सुनकर पनन- आज्चाप्रमाणामत्युकत्वा जगामानठनन्दनः।७३ | कुमार जो आज्ञा' ऐसा कहकर चल द्यि ॥७१-७३॥ पं तुरन्त हं उस पैन कर { उसका i त्रिय Te आनीय च गिरिं सर्वोन्वानरान्वानरपंभः । | ओर तुरन्त ही उस पवतको लाकर ( उसकी ओपधियों वि | से ) समस्त वानरोंको जीवित कर उसे पिर वर्दी रग जीवयित्वा पुनरत्र खापयित्वाऽऽययी दतम!।७४॥ आये ॥ ७४ ॥ पूर्वपळैरवं नाद वानराणां घलोघत! । । तब वानर-सेनाका पिर पूर्ववत, भयानक शाब्द श्रवा विसयमापन्नो रावणो चाक्यमब्रवीत्‌॥७५॥ | सुनकर रावण अति विस्मित होकर कदने टगा-॥७५॥ राघवो मे महान्‌ शश; प्राप्तोदेवविनिर्भित:। “देवताओंका प्रकट किया हुआ यह राम मेरा महाय हन्तु त समरे शाघ् गच्छन्तु मम यूथपाः ॥७६॥ | शन्न आया है । इसे युद्धमे मारनेके यि मेरे सेनापति, मन्त्रिणो वान्धवाः शूरा ये च मत्ियकाहिणः । | मन्त्री, बन्घु-यान्धब तया और भी जो शरवीर सर्वे गच्छन्त बुद्धाय त्वरित मम शासनात्‌ ॥७७॥ | र हित चाहते हों, वे संत्र मेरी आज्ञा मानकर येन गच्छन्ति युद्धाय भीरवः प्राणाविष्लवात। भय बढ करने नही ज डरपोक अपने यी तान्हनिष्याम्यह सर्वान्मच्छासनपराड्युखान्‌ Isc) आ करन नहा जायगे, अपनी आज्ञा न मानने- ण वाळे उन सबको में मार डाळेंगा” ॥ ७८॥ रावणकी तच्छत्वा भयुसुन्न्स्ता रणकावेदाः |” | यह आज्ञा सुनकर अतिकाय, प्रहस्त, महानाद, महोदर, छः री सम्‌ ६] युद्धकाण्ड . २५९ SRR SERS oar अतिकायः प्रहस्तश्च महानादमहोद्रौ ॥७९॥ | देवशत्रु, निकुम्म, देवान्तक और नरान्तक - आदि ` देवशत्ुयिङुम्भश्च देवान्तकनरान्तकौ । रणङुशळ बीर तथा और भी समस्त बढ्वान्‌ योद्धा ~ ज्र भयभीत होकर वानरोंके साथ युद्ध करनेके लिये चळे अप $ ् रेः सैकों-सहसों है र तान पर्व यशुशुद्धाय वानरः ॥८०॥ ॥७९-८०॥ ये तथा और भी बहुत-से -सहस्त एते चान्ये च बहवः शुराः शतसहस्रशः । शूरवीर अपने-अपने बळके गर्वसे उन्मत्त हो वानर- -यविशय वानरं सैन्यं ममन्धुर्घलदारपैताः ॥८१॥ | सेनामें घुसकर उसे दलित करने छगे॥ ८१ ॥ बे coe 3 3 3 भुशुण्डी, भिंदिपाल, वाण, खडग, परशु तथा और भी डामिन्दिपालश्च बाणे! खड! पर | तियोंपर - ड्या क त i ॥ स, शः | नाना प्रकारके अख-शाख्नोसे वानर-यूथप प्रहार अन्यश्च विविधरसनिजध्तुहरियूथपान्‌ ॥८२॥ | करने छो ॥ ८२॥ ते पादपेः पवेतांग्रेनखदंट्रैथ मुश्टिमिः । इधर, वानरवीर भी दक्ष, पर्षतशिखरों, नखों, दाढ़ों ग्राणैरबिमोचयामासुः सर्वराक्षसयूथपान्‌ ॥८३॥ | और मुडियोंसे समस्त राक्षस-यूथपोंको निष्प्राण करने रामेण निहताः केचित्सुग्रीविण तथाऽपरे । लगे | ८३ ॥ उन राक्षसोमेंसे कोई श्रीरामके हाथसे, 5 हि कोई सुग्रीवके द्वारा, कोई हनुमान्‌ और अंगढके द्वारा, हनूसता चाङ्गदन लक्ष्मणेन महात्मना | कोई महात्मा लक्ष्मणजीके हाथसे ओर कोई अन्यान्य यूथपैबानराणां ते निहतः सर्वराक्षसाः ॥८9॥ | वानर-यूथपोंके द्वारा मारे गये । इस प्रकार उन समस्त न ~ A राक्षसोंका अन्त हो गया ॥ ८४॥ राम-तेजके समावेश- १ ऽ्भ रामतजः समावेश्य वानरा विनाऽभवच्‌ । से वानरगण अत्यन्त प्रबळ हो रहे थे। राम-शक्तिसे स्ेश्वरः सर्वमयो विधाता ॥ ८५ ॥ भगवान्‌ राम सर्वेश्वर, सर्वमय, सबके नियन्ता मायामनुष्यत्वविडम्बनेन । और सर्वदा चिदानन्दमय हैं, तथापि मायासे मानव- सदा चिदानन्दमयोऽपि रामो चरित्रका अनुकरण करते इए युद्धादि लीलाका विस्तार युद्वादिलीलां वितनोति मायाम्‌॥८६॥ | करते हैं ॥ ८६॥ ' नाहव हैं इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे पञ्वमः सगः | ५ || |) षष्ठ सग _ छक्ष्मण-सूच्छौ, राम-राबण-संग्राम, हदुमानजीका ओषधि लेने जाना और रावण-कालनेमि-संचाद | | श्रीमहादेव उवाच . श्रीमहादेवजी बोले-हे पार्वति ! युद्धमें अतिकाय र्वा यदे वह > ५ आदि राक्षसोंकी महती सेनाको नष्ट हुई सुन इत्या बद्धे यर नशमापिकायदुखे महत | रावण अति दुःखातुर हो महान्‌ क्रोधसे भर गया राबंगो हुःखसन्वप्त क्रोधेन महताउ5इत ॥ १॥ ॥ १ ॥ और वह महातेजस्वी राक्षस छङ्काकी रक्षाके -निधायेन्द्रजितं लङ्कारक्षणार्थं महाद्यति!। | ल्यि इन्द्रजीतको नियुक्त कर स्वयं रघुनाथजीसे छडनेके खर्य जगाम युद्वाय रामेण सह राक्षसः ॥ २॥ लिये चला ॥ २॥ महाबली राक्षसराज समख शज्ाल- enone, ae क कलना- २६० अंध्यात्मरामायणं [सगे ६ rr दिव्यं स्यन्दनमारह्य सर्वशखाखसंयुतम्‌ | | सेससजित एक दिव्य रथपर आरूढ हो श्रीरामचन्दजी- राममेवामिदुद्वाव राक्षरेन्द्रो महाबलः ॥ ३ ॥ | की ओर ही दोडा ॥ ३ ॥ उसने अपने सर्पके समान पैराशीविपोपमेः उग्र वाणोसि बहुत-से चानरोंको मारकर सुग्रीच आदि वानरान्बहुशो हत्वा बाणेराशीविपापसः । यूथपतियोंको भी एथिचीपर गिरा दिया ॥ 9 ॥ फिर पातयामास सुग्रीवप्रसुखान्यूथनायकान्‌ ॥ ४ ॥ | महापराक्रमी विभीषणक्रों वहाँ गदा डिये खडा गदापाणिं महासर तत्र दृष्टा विमीपणस्‌। | देख उसने उसकी ओर मयदानवकी दी हुई नं शिः उत्ससर्ज महाशक्ति मयदत्तां विभीषणे ॥ ५॥ | छोडी ॥ ५॥ उस शक्तिको विभीपणका नाझ करने RP OP SF लिये बढ़ती देख "रामने इसे अभय दिया है, यह तामापतन्तीसारानय विभीपणविधातिनीस । असुरुकुमार वध किये जानेयोग्य नहीं हैं! ऐसा कहते दत्तामयोऽयं रामेण वधाद नायमासुर ॥ ६॥ | हुए महावीर्यान्‌ लक्ष्ममनी अपना प्रचण्ड धनुप इत्युकत्वा लक्ष्मणो भीम चापमादाय वीपबान। | लेकर विभीषणके आगे पर्वतके समान अचल होकर विभीषणस्य पुरतः स्थितो5कम्प इवाचलः ॥ ७1 | खड़े हो गये ॥ ६-७॥ सा शक्तिर्लक््मणतनु विवेशामोधशक्तितः । उस शक्तिकी सामर्थ्ये अमोध (कभी व्यर्थ न जानेवाली ) थी, अतः वह ठक्ष्मगर्नाके झारीरमं घुस यावन्त्यः शक्तयों रोके मायायाः सम्भवन्ति | गयी । संसारमे मायासे जितनी शक्तियों उत्पन होती हैं महात्मा लक्ष्णनी, उन सत्रके आधार भगवान्‌ विष्णुके खरूप भूत झेपनागके अंशावतार हैं। उनका मायाशकत्या भवेत्कि वा शेषांशस्य हरेखनोशी।९॥ | उस मायाशक्तिसे क्या बिगइ सकता था ? ॥ ८-९ तथापि इस समय मनुप्यभात्र अंगीकार करनेसे उसका अनुकरण करते हुए वे मूच्छित होकर सूच्छितः पतितो थूमी तमादातुं दशाननः ॥१०॥ | प्रथिवीपर गिर पड़े । रक्ष्मणजीको छे जानेके इस्तैसतोलपित शक्तो य लिये रावण उन्हें अपने हार्थोसे उठानेमें सफल ्तस्तोलयितुं शक्तो न बभूवातिविसितः । न हुआ, अतः उसे बड़ा ही विस्मय हुआ । सर्वस्य जगतः सारं विराजं परमेश्वरम्‌ ॥११॥ | भडा, जो सम्पूर्ण जगतका सार परमेश्वर विरार पुरुप है, उस निखिल लोकाघार विष्णुको एक क्षु राक्षस कैसे उठा सकता था ? तासाम्राधारभूतस्य लक्ष्मणस्य महात्मन! । तथापि मालुपं भावमापत्नसदनुत्रतः । & © कर्थं लोकाश्रय विष्णु तोलयेल्लघुराक्षस) । ग्रहीतुकामं सौमित्रिं रावण वीक्ष्य मारातिः ॥१२॥ | जव हनुमानजीने देखा कि रावण ल्क्ष्मणजीको आजघानोरापि कुद्धो वजकल्येन मु्टिना। | जागा चाहता है तो उन्दोंन अति कुद्ध होकर 7 उसकी छातीमं एक वज्र-सद्श घूसा मारा ! उस पन मुष्टिप्रहारेण जालुभ्यामपतद्भुवि ।1१३॥ | धूसेके आघातसे रावण घुट्नोंके बल घृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १०-१३ ॥ और अपने मुख, नेत्र और कानोसे बहुत-सा रुधिर वमन करता हुआ घूमती वेशूर्णमाननयनो रथोपस्थ उपाविशत्‌ ॥१४॥ | डर भोजसे रथके पिछले भागमें वेठ गया ॥ १४॥ तदनन्तर हनुमानजी रावणद्वारा आहत मथ लकषमणसादाय हनुमान्‌ रावणादितम्‌ । लक्ष्मणजीको अपनी झुजाओंपर उठाकर श्रीरामचन्द्रजी- श्या. आस्यैश्च नेत्रश्रवणेरुडमन्‌ रुधिरं बहु । सेरे६] युद्धकाण्डे २६१ स्स्च्च््स्य्स्स्स्स्च्य्क््स्स्स्फ्प्स्ल्स्स्स्सस्स्फिपियिडपपपपप+पपप+प+++८८+८८०२०---०८२-००८८००-९-८--............... क ७० ७७ क आनयद्रामसोसीप्यं बाहुभ्यां परिगृह्य तम्‌ ॥१५॥ | के पास ळे आये ॥ १५॥ हनुमानजीके लिये, उनके हनूमतः सुहृस्येन थदत्या च परमेश्वरः | खघुर्वमगमदेवो गुरुणां गुंरुरप्यज) ॥१६॥ सा शक्तिरपि तं त्यकत्वा ज्ञास्या नारायणांशञञजम्‌ । सर्वणस्य रथं आगाद्रावणोऽपि शनैस्ततः।१७॥ संज्ञामवाप्य जग्राइ वाणासनमथो रुपा । राममेवाभिदुद्राव दृष्ट्रा रामोऽपि त क्रपा ॥१८॥ आरुह्य जगतां नाथो हनूमन्तं महामरु्‌ रथस्थं रावण दृष्टा अभिदुद्राव राधवः॥१९॥ उयाशब्दमकरोचीवं वजनिष्पेषनिषठरम्‌ । रामो गम्भीरया वाचा राक्षसेन्द्रमुवाच ह ॥२०! राक्षसाधम तिष्ठाच छ गमिष्यसि भे पुर! । _कृत्वाऽपराधमेवं में सर्वत्र समदर्शिनः ॥२१॥ येन वाणेन निहता राक्षसास्ते अनालये । तेनेव त्वां हनिष्यामि तिष्ठाद्य मम गोचरे ॥२२॥ श्रीरामस्य वचः शरुत्वा रावणो मारुतात्मजम्‌ । बहन्तं राघवं संइथे शरेस्तीक्षणेरताङयत्‌ ॥२३॥ हतस्यापि श्रेखीक्षणेबायुसनोः खतेजसा। व्यवर्धत पुनस्तेजो ननर्द च महाकपिः ॥२४॥ ततो इष्वा हनूमन्तं सत्रणं रघुसतमः क्रोधमाहारयामास काठरुद्र इवापरः ॥२५॥ साश्वं रथं भ्वजं सते शस्रोषं धञुरञ्जसा | छत्रं पताकां तरसा चिच्छेद शितसायकेः ॥२६॥ तो महाशरेणाशु रावणं रघुसत्तम। विव्याध वजूकल्पेन पाकारिरिय पर्वतम्‌ ।।२७॥ रामबाणहतो चीरश्चचार च मुमोह च। सौहाद और भक्तिभावके कारण वे अजन्मा और प्रकाश- खरूप परमेश्वर ( छक्ष्पणजी ) मारी-से-भारी होनेपर भी अत्यन्त लघु ( हल्के ) हो गये॥ १६ | श्रीलक्ष्मण- जौको साक्षात्‌ नारायणका अंश जानकर वह शक्ति भी उन्हें छोड़कर फिर रावणके रथपर चली गयी | इधर, रावणको भी जब धीरे-धीरे कुछ चेत हुआ तो उसने अत्यन्त क्रोधसे अपना धच्ुष उठाया और रामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा । उसे (अपनी ओर आता) देख जगत्पति भगवान्‌ राम अति क्रुद्ध होकर महाबळी हचुभानजीके कन्धेपर चढ़े ओर रावणको रथमें बैठा देख उसकी ओर दौड़े॥ १७--१९॥ भगवान्‌ रामने अपने धनुषको प्रत्यज्ञाका ऐसा कठोर शब्द किया जो मानो बज्र- को भी चूर्ण करनेवाला था, और फिर अति गम्भीर वाणीसे राक्षसराज राचणसे ऐसा कहा-। २०॥ “अरे राक्षसा- धम! जरा ठहर तो, मुझ सर्वत्र समदर्शीका ऐसा अपराधं | करके तू कहाँ जा सकता है! ॥२१॥ अरे! तू तनिक मेरे सामने खड़ा रह, जिस बाणसे मैंने जन- स्थानमें ( खर-दूषणादिसे युद्ध करते समय ) तेरे राक्षसोंको मारा था आज उसासे तुझे भी मार डागा” ॥ २२ | औरामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर रावणने उन्हें वहन करनेवाले हनुमानूजीके बड़े तीखे वाण मारे ॥ २३ ॥ किन्तु उन तीक्ष्ण वाणोंके लगनेपर भी पवन- पुत्रका तेज अपने प्रभावसे बराबर बढ़ता ही गेया और वे महान्‌ कपीश्वर बड़े जोरसे गर्जने ढगे ॥ २४ ॥ जब रघुनाथजीने हनुमानजीको क्षत-विक्षत देखा तो दूसरे काळरुद्र्के समान बड़ा भयंकर क्रोध धारण किया ॥ २५ ॥ और अपने तीक्ष्णव्राणोंसे बड़ी फुतीके साथ सुगमतासे ही राबणके घोडेसहित रथ, ध्वजा, सारथी, शख्समूह, धनुष, छत्र और पताका आदि काट डाले ॥२६॥ फिर इन्दने जैसे पर्वतोंपर आक्रमण किया था वैसे ही उन्होंने एक वज्रतुल्य महावाणसे रावणको वेध डारा ॥ २७ ॥ भगवान्‌ रामका वाण छाते- से वह बीर विचलित हो गया, उसे मच्छी आ | गयी और उसके द्वाथसे धनुष छूट गया । ३ के 1 कर), a Ca उ 1 अध्यात्मरामायण पा बा देखकर, ए रघरत्तमः ॥२८॥ | उसकी ऐसी दशा द रठुलीथजीन एक ह. पय अर्द्धचन्द्राकार वाणसे उसका सूर्यद्र्द प्रकाशमान मुकुट अर्धचन्द्रेण चिच्छेद तत्किरीद रविम्रभस | | छाट डाला और कद्दा-- "रावण ! तुम मेरे वाणसें पीड़ित अनुजानामि गच्छ त्वमिदानीं वाणपीडित!।।२९) हो; अतः मैं तुम्हें, आज्ञा दता हैं, इस समय तुम जाओ । ॥ २८-२९ ॥ आज लंकामं जाकर विश्राम करो, फिर कळ मेरा पराक्रम देखना |” - कि रामवाणेन संविद्धो हतद्ोंऽथ रावणः ॥३०॥| तब, श्रीरामचन्द्रजीके वाणसे विद्व निके कार! महत्या रुजया युक्तो लड्ढां ्रविशञदातुरः। | सारा दे दण हो नपर र उत अर ऽवि लक्षण + व्याकुळ हॉ लंकामें प्रवेश किया | इधर रामचन्द्रजी रामोजपि लक्षण बा मूत पत दति॥R१॥ भी लक्ष्मणजीको मूच्छित अवस्त्रामं प्रविवीपर माहुपसशुपाश्रि्य लौलयाजुशुशोच ह । पड़े देख मनुष्यमावका आश्रय छे लीलास शोक ततः ग्राह हनूमन्तं वत्स जीवय लक्ष्मणम्‌ ॥३२॥ | करने ढगे और हनुमानजीसे वोळि--“वत्स ! पहली महौषधीः समानीय पूर्वषद्वानरानपि। | तरह ही ( द्रोणाचलसे ) महौपत्रि छाकर लक्ष्मण और तथेति राघवेणोक्तो जगामाशु महाकविः ॥१३॥ | ्रानरोको जीवित करो |” रघुनाथजीके इस प्रकार कद 1 6. ८ कहनेपर महाकपि हनुमानजी 'बडुत अच्छा कहद 'हतूसान्यायुवगेन क्षणात्तात्वा महादाव । एक क्षणमें ही महासागरको पारकर त्रायुवेंगसे चछे । एतािन्नन्तरे चारा रापणाय न्यवेद्यन््‌।।३४॥ इसी समय रावणके गुप्तचरोंने उससे कहा-॥।३ ०-३ ४॥ NN रामेण प्रेषितो देव इनूसान्‌ क्षीरसागरम्‌ । , “खामिन ! रामने दनुमानको क्षीर-तमुद्रपर भेजा है. गतो नेतुं लक्ष्मणस्य जीवनार्थं महोपधीः ॥३५॥ | और वह छक्षमणको जीवित करनेके लिये महोपधि « > जज ; लेने गय है ३५ उनके चचन सुनकर त्वा तच्चाखचन राजा चिन्तापरोऽमवत्‌ । {पेने गया है” ॥ ३५॥ उनके ये वचन सुनकर ` 1 11 1 राक्षसराज अति चिन्तातुर हुआ और उसी क्षण जगास रात्राबेकाक काठनोसगृह क्षणात्‌ ॥३६॥ | रात्रिमे हो अकेला कालनेमिके घर गया ॥ ३६॥ शुहागतं समालोक्य रावणे विसयान्वित! । रावणको घर आया देख कालनेमिको बड़ा आश्चर्य कालनेमिरुवाचेद॑ प्राज्ललिभियविह्नलः । और: जि भा दे स सम खड़ा हो गया ५ त र अति भयभीत हो हाय जोड़कर बोला |॥३७॥ “राज- अध्यादिकं ततः व्‌ १ स्थितः शि र डेला राजग ्तः।३७॥। राजेश्वर ! आज किस निमित्तसे आना हुआ? कहिये, मैं किं ते करोमि राजेनद्र किमागमनकारणस्‌ । | आपकी क्या सेवा करू?” तत्र राबणने अति दुःखित कालनोमिमुवाचेद रावणो हुःखपीडितः॥३८॥ | होकर काळनेमिसे कहा ॥३८॥' आज कालक्रमसे मुझे भी' ममापि कालवशतः कष्टमेतदपस्थि यह कष्ट उपस्थित हो गया । मेरी राक्तिसे आहत होकर वीर ' सया शक्त्या हतो वीरो लक्ष्मण ; परि इ कद प्रथिनीपर गिर पदा हे ॥३९॥ उसे जीवित करनेन न सेमर पातता झव ।३९।| छिये हनुमान्‌ ओपधि लेने गया है । हे महामते! तुम कोई ते जीवयितुमानेतुमोषधीईनुमान्‌ गतः। |ऐसा उपाय करो जिससे उसके छानेमे वित्न खड़ा हो यथा तस्य भनेदविध्नं तथा कुरु महामते ॥४०॥ | जाय ॥ ४०॥ तुमध्मायासे मुनि-बेष बनाकर हनुमान्‌- [न क हर काम ने मायया मुनिवेषेण मोहयस्व महाकापम्‌ |. भि मोडित करो जिससे ( उस ओपधिके प्रयोग व का) समय निकल जाय | यह कार्य करके फिर अपने काठालययो यथा भूयात्तथा कृत्वैहि मन्दिरे॥४१॥| घर लौट आना” ॥ ४१ ॥ ns २६२ ५४४७९५४५४४ ४४ गहृ स्तान्निपतितश्चापरतं समीक्ष्य प्रविइय लङ्कामाश्चास्य शवः पश्यसि वं मम | समे ६] रावणस्य वचः त्वा कालनेमिरुवाच तम्‌ । रावणेश चचो मेऽद्य शृणु धारय तत्वत! ॥४२॥ प्रिय ते करवाण्येच न प्राणान्‌ धारयाम्यहम्‌ । मारीचस्य यथाऽरण्ये पुराभून्सृगरूपिणः ॥४३॥ चैव भे न सन्देहो भविष्यति दशानन । ताः पुत्रा पोत्रा वान्धवा राक्षसाश्च ते ॥४४॥ घातयित्याऽसुरङ्ुलं जीवितेनापि किं तव । राज्येन वा सीतया वा किं देहेन जडात्मना ॥४५॥ सीतां प्रयच्छ रामाय राज्यं देहि विभीषणे । वनं याहि महावाहो रम्यं युनिगणाश्रयम्‌ ॥४६॥ युद्धकाण्ड 1 TIESTO ICCC NNN ९८१७ ४४३५ ७४७५७ USN ७० ६३ ४४९३ ७१ ०९० af NNN WU NN राबणके वचन सुनकर काछनेमिने उससे कहा--- “महाराज रावण ! मेरी वात सुनिये और उसे यथार्थ समझ- कर धारण कीजिये ४२॥ मैं आपका प्रिय करूंगा ही, उसके लिये मैं अपने प्राणोंकी परवा नहीं करता, (तथापि उससे क्या छाम होगा ? ) हे दशानन | इसमें सन्देह नहीं जो कुछ दण्डकारण्यमें मृगरूपधारी मारीचकाः हुआ था वही दशा मेरी भी होगी । देखिये, आपके पुत्र, पौत्र और अनेकों सगे-सम्बन्धी राक्षसळोग मारे गये | ४३-४४ ॥ इस प्रकार राक्षस- वंशका नाश कराकर आपके जीवन, राज्य, सीता अथवा इस जड देहसे भी क्या छाम है? || ४५॥ हे महाबाहो ! आप रामचन्द्रजीको सीता और विभीषणको राज्य देकर मुनिगणसेवित सुरम्य तपोवनको जाइये ॥ ४६ ॥ वहाँ प्रातःकाळ शुद्ध जळमें स्नान कर तथा स्नात्वा प्रातः शुभजले कृरवा सन्ध्यादिकाः निया! सन्व्योपासनादि नित्य-कर्मोसे निकृत्त हो एकान्त देशे तत एकान्तमाश्रित्य सुखासनपरिग्रहः ॥४७॥ | सुखमय आसनसे वेठिये ॥ ४७॥ ओर सब ओरसे विसृज्य सर्वतः सङ्गमितरान्विपयान्वहिः । बहिःप्रवृचाक्षगणं शनेः प्रत्यक प्रवाहय ॥४८॥ प्रकृतेभिन्नमात्मानं विचारय सदाऽनघ । चराचरं जगत्कृत्स्नं देहवुद्धीन्द्रियादिकम्‌ ।।४९॥ आब्रह्मलम्वपर्यन्तं इश्यते श्रूयते च यत्‌। संपा प्रकृतिरित्युक्ता सैव मायेति कीर्तिता ॥५०॥ सर्मखितिविनाश्चानां जगदूदक्षस्य कारणस्‌। लोहितश्चेतकृष्णादि श्रजाः सृजति सर्वदा ॥५१॥ .कामक्रोवादिपुत्राद्यान्हिसाठृष्णादिकन्यकाः । मोहयन्त्यनिश देवमात्मानं स्वेगुणेविभुम्‌ ॥५२॥ कतुत्वमो क्ृत्बद्गुखान्‌ खयुणानात्मनीश्वरे । आरोप्य स्ववशं कृत्वा तेन कीडति सर्वदा ॥५३॥ शुद्धोऽप्यात्मा यया युक्तः पश्यतीव सदा बहिः। विस्मृत्य च खमात्मानं मायाशुणविमोहितः।।५४। यदा सदूयुरुणा युक्तो बोध्यते वोधरूपिणा। निःसंग हो बाह्य विषयोंको छोड़ अपनी बाह्य वृत्तिवाली इन्द्रियोंकी धीरे-धीरे अन्तर्मुख कीजिये | ४८॥ हे अनघ ! अपने आत्माको सदा प्रकृतिसे भिन्न विचारिये | देह, चुद्धि और इन्डरियादिसे युक्त सम्पूर्ण चराचर जगत्‌ अर्थात ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब ( कीठविशेष ) पर्यन्त जो कुछ दिखायी या छुनायी देता है वह सन प्रकृति है. और वही माया भी कहलाती है ॥ ४९-५० ॥ वही सर्वदा संसार-रूपी दृक्षकी उत्पत्ति, स्थिति और विनाश- की कारणरूप सवेत (सात्विक) लोहित (राजस) और कृष्णवर्ण ( तामस ) प्रजा उत्पन्न करती है ॥५१॥ तथा बही अपने गुणोंसे अहर्निश सर्वव्यापक आत्मदेवको मोहित कर काम-क्रोधादि पुत्रों और हिंसा-तृष्णादि कन्याओंको उत्पन करती है ॥ ५२ || वह कत्त ख और मोत्तुत्र आदि अपने गुणोंको अपने प्रसु आत्मामें आरोपित कर उसे अपने वशीभूत कर उससे सदा खेळती रहती है ॥ ५३ ॥ जिससे युक्त होकर आत्मा मायिक गुणोंसे मोहित होकर अपने खरूपको भूल जाता है, और नित्यशुद्ध होता हुआ भी सदा बाह्य विषयोको देखने रुगता है ॥ ५४ ॥ जिस समय सद्गुरुका साक्षात्कार होता है और वे इसे निर्मल ज्ञानइष्टिसे जागृत करते हैं उस समय यह बाह्य विषयों- २६४ rrr SITS gr Te ee ७.४ ७४४७ क ००१७. ७.० पक ४७ ७७ ७४९ ७९७ ४४४४४४११७४ अध्यात्मरामायण [ सगे ६ र ms ३५५४ १४५९८ -९४/९-४४-/१४४७५४/ ५४१ “pr निदृत्तदष्टिरात्मानं पद्यत्येव सदा स्फुटम्‌ ॥५५॥ से अपनी इष्टि हटाकर अपने आपको ही स्पष्ट देखता जीवस्मुक्तः सदा देही झुच्यते आाकतैरुणेः । त्वमप्येवं सदात्मानं विचाये नियतेन्द्रियः ॥५३॥ ्रकृतेरन्यमारमानं ज्ञात्वा युक्ती भविष्यासि । ध्यातुं यद्यसमथोऽसि सगुणं देवमाश्रय ॥५७॥ हत्पदूमकार्गिके खर्णपीठे मणिगणान्विते । | मृदुक्षक्षणतरे तत्र जानक्या सह संस्थितम्‌ ॥५८॥ . वीरासनं विशालाक्षं विदुत्पुज्ञनिभाम्बरस्‌ । किरीटहारकेयूरकोस्तुभादिभिरन्वितस्‌ ॥५९॥ नूपुरः कटकैमोन्त॑ तथैव वनमाल्या । ` हक्ष्मणेन धसुर्दन्दकरेण परिसेवितम्‌ ॥६०॥ एवं ध्यात्वा सदाऽऽत्मानं रामं सर्वह्ृदि खितस्‌। भक्त्या परमया युक्तो मरुच्यते नात्र संशयः ॥६१॥ भृणु वै चरितं तस्य मक्तेनित्यमनन्यधी! । एवं चेत्हृतपूवीणि पापानि च महान्त्यपि । ` श्णादेव विनश्यन्ति यथायेस्तूठराशय! ॥६२॥ | मजख रामं परिपूर्णमेके _ नषिद्दाय वैरं निजभक्तियुक्तः | हृदा सदा भावितमावरूप- है ॥ ५५॥ और फिर यह देहधारी जीव जीवन्मुक्त होकर प्राकृत गुणोंसे छूट जाता है । हे रावण ! आप भी संयतेन्द्रिय होकर इसी प्रकार अपने वास्तविक आत्मस्वरूपका चिन्तन कीजिये ५६|| इससे आत्माको प्रकृतिसे भिन्न जानकर आप सुक्त र जायेँगे। और यदि आप इस प्रकार ध्यान करनेमें असमर्थ | हों तो सगुण भगवानका आश्रय छीजिये ॥५७॥ ( उस सगुण घ्यानकी विधि इस प्रकार है ) हृदयकमळकी कणिकाओंमें मणिगणजटित अति ग्रुदुळ और खच्छ सुवर्ण-सिंहासनपर जो जानकीजीसहिंत विराज- मान हैं, जो वीरासनसे वेठे हैं, जिनके नेत्र अति विशाल और ब विद्युक्षताके समान तेजोमय हैं. तथा जो किरीट, हार, केयूर और कोस्तुममणि आदि आमूषणोसे सुशोभित हैं; नूपुर, कटक और वनमाला आदिसे जिनकी अपूर्व शोमा हो रही है तथा लक्ष्मणजी अपने हार्थोमें दो धनुप ( एक अपना और एक प्रभु रामका ) लिये जिनकी सेवामें खड़े हैं, उन सबके हृदयमें विराजमान अपने आत्मारूप भगवान्‌ रामका इस प्रकार सर्वदा अत्यन्त भक्तिपूर्वक ध्यान करनेसे आप सुक्त हो जायँगे--इसमें सन्देह नहीं ॥ ५८-६१ ॥ नित्य अनन्यबुद्धि होकर उनके भक्तोंके मुखारबिन्दसे उनके पवित्र चरित्र छुनिये । ऐसा करनेसे आपके पूर्वक्ृत महान्‌ पाप भी एक क्षणमें ही इस प्रकार भस्म हो जायेगे जैसे अग्निसे रूईका ढेर भस्म हो जाता है ॥ ६२॥ जो सवित्र परिपूर्ण हैं उन अद्वितीय भगवान्‌ रामके साथ वैर छोड़कर आत्मप्रेम- पूर्वक उन नामरूपरहित पुराणंपुरुषकी हृदयमें सगुण- मनामरूपं पुरुष पुराणम्‌ ॥६३॥ | भावते भावना कर उनका सर्वदा भजन कीजिये”॥६३॥ इति श्रीमदथ्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे षष्ठः सर्गः | ६ ॥ क का अप स हे सप्तम सगे कालनेमिका कपट, हतुमानजीद्वारा उलका वध, लक्ष्मणजीका सचेत होना और रावणका कुम्भकर्णको जगाना | न श्रीमहादेव उवाच = -कालनेभिवचः श्वा रावणो5्मृतसन्निभस्‌ । ' ज्वाल क्रोधताम्राक्षः सर्पिरद्धिरियापिसत्‌ ॥ १॥ | रावण जळ उठा और रोधसे उसके नेत्र लाळ हो गये निइर्मि त्वां दुरात्मानं मच्छासनपराङ्घुखम्‌ । ` श्रीमहादेचज्ञी बोले--हे पार्वति ! जैसे अग्निसे तपाया हुआ घृत जळ डालनेसे छुनछुनाने छगता है वैसे ही काउनेमिके ये अमृततुल्य वचन सुनकर ॥१॥ वह कहने छूगा---“अरे ! माळूम होता है तू शत्रुसे कुछ लेकर ही इस प्रकार रामके दासकी भाँति बातें बंगाता रेः किश्चिद्गृहीत्वा त्यं भापसे रामकिंकरः ॥ २ |॥ दै | याद रख, मेरी आज्ञाका उठन करनेवाले तुझ दुष्ट कालनेभिरुवाचेदं रावण देव कि कृषा । न रोचते मे वचनं यदि गत्वा करोमि तत्‌ ॥ हे ॥ इत्युकत्वा अययों शीघ्रे कालनेमिर्महासुरः । hoo Sin नोदितो रावणेनेव इनपद्विघ्नकारणात्‌॥ ४॥ स गत्या हिमवत्पाश्चं तपोवनमकह्पयत्‌। तत्र शिष्यैः परिश्वतो गरुनिवेपघरः खलः ॥ ५॥ गच्छतो मार्गमासाच वायुस्तनोमहात्मना | ततो गत्वा ददर्शाथ हचूमानाश्रमं शुभस्‌ ॥ ६। चिन्तयामास मनसा श्रीमान्पवननन्दन! । पुरा न दृष्टमेतन्मे मुनिमण्डलयुत्तमम्‌ ॥ ७॥ मार्गों विश्रेशितों वा मे अमो वा चित्तसम्भवः । ४1. यद्वाऽऽविइयाश्रमपदं इष्वा मुनिमशेषतः ॥ ८॥ पीत्वा जळं ततो यामि द्रोणाचलमलुत्तमम्‌ । इत्युक्त्वा प्रविवेशाथ सर्वेतो योजनायतम्‌ ॥ ९ ॥ आश्रमं कदलीक्लालखर्जूरपनसादिमिः । समावृर्त पक्कफलेनंम्रशाखैथ् पादपैः ॥१०॥ वैरभाव्‌विनिर्मुकत शुद्धं निर्मललक्षणम्‌ । को मैं अभी मार डाढूंगा” ||२]| तब काळनेमिने रावण- से कहा--“देव | क्रोधकी क्‍या बात है ? यदि आपको मेरा कथन अच्छा नहीं लगता तो मैं अभी जाकर ( आप जैसा कहते हैं) वही करता हुँ” ॥ ३॥ इतना कह महादैत्य काळनेमि रावणकी ही प्रेरणासे हनुमान्‌जीके कार्यमें विन्न करनेके लिये वहाँसे तुरन्त चळ दिया ॥ २ ॥ उसने दिमाळयकी तराईमें पहुँचकर उधरसे जाते इए वायुपुत्र महात्मा हनुमानके मारेमें एक तपोत्रन बनाया और वहाँ वह दुष्ट स्वयं मुनिवेष बनाकर दिष्यवर्गसे विरकर बैठ गया । जिस समय हनुमानजी वहाँ पहुँचे तो उन्होंने वह सुन्दर आश्रम देखा ॥५-६॥ उसे देखकर श्रीमान्‌ पवन- नन्दन मन-ही-मन सोचने लगे, भैंने पहले तो यह उत्तम मुत्तिमण्डळ देखा नहीं था ॥ ७॥ कया मैं मागे भूल गया हूँ, या मेरै चित्तमें कोई श्रम हो गया है £ अथवा चळो, इस आश्रममें चढकर सब मुनीश्वरों- का दर्शन करूँ और जळ पीऊँ, तदुपरान्त पर्वतश्रेष्ठ द्रोणाचळपर चढधगा |” ऐसा विचार वे उस आश्रममें गये, बह सब ओरसे एक योजन विस्तारवाळा था तथा उसमें सब ओर, पके इए फछेसे जिनकी शाखाएँ झुकी हुई हैं ऐसे कदली, शाळ, खजूर और कठहल आदिके दृक्ष लगे हुए थे || ८-१०॥ वह शुद्ध और निर्मळ आश्रम चेरमावसे सर्वथा रहित था । उस अति सुरग्य महाश्रममें तसिन्महाश्रमे रम्ये कालनेमिः स राक्षसः ॥११॥। | राक्षस काठनेमि इन्द्रजाल विधाका आश्रय कर शिवजीका डेरे २६६ अध्यात्मरामायण [ सगे ७ rrr TTR Tee ne ne iets = ws टोशीशीशीडीच क ` इन्द्रयोगं समाखाय चकार शिवपूजनम्‌ । हनुमानभिवाद्याह गौरवेण मददासुरम्‌॥१२॥ पूजन कर रहा थां । हनुमान्‌जीने उस महादेत्यको बड़े गौरवसे नमस्कार कर कहा--॥।११-१२॥ ८मगवन्‌ | मैं भगवान्‌ रामका दूत हूँ, मेरा नाम हलुमान्‌ भगवन्‌ रामदूतोऽहे हनसाझाम नामतः । |. और में औरामचम्दजीके एक महान्‌ कार्ये क्षीर- रामकार्येण महता क्षीराब्धि गन्तुसुच्यतः ॥१३॥ | नागरको जा रहा हैँ ॥१३॥ ब्रह्मन्‌ ! सुझे वहुत प्यास तृषा मां वाधते ब्रहमनचुदर्क छत्र विद्यते! |ळ्गी इई है, मैं खूब जळ पीना चाहता हूँ । यथेच्छं पातुमिच्छामि कथ्यतां मे युनीश्वर ॥ १४॥ | सुनौश्वर। कृपया वतळाइये यहाँ जल कहाँ है £” ॥१४॥ तच्छृत्वा वारुतेर्वाकयं कालनेमिस्तमत्रवीत्‌ | हनुमान्‌जीके ये वचन सुनकर कालनेमिने कहा-- _ ५ | पातमहीसि “तुम मेरे कमण्डलुका जल पी सकते हो ॥१५॥ यहाँ कमण्डळुगतं तोयं भम त्वं पातुमहासे ॥१५॥ ये फळ न हैं, इन्हें खाओ और र क झुडुएव चेमानि पक्वानि फलानि तदनन्तरम्‌ । | यहाँ विश्राम लेकर कुछ सो छो, ऐसी जल्दी मत ~ देनात्र निद्रामिहि करो ॥१६॥ मैं अपने तपोबल्से भूत, भविष्यत्‌ और 'निवसस्व दुनार हि त्वरास्तुमा ॥१९॥ वर्तमान तीनों कालोंकी बात जानता हूँ | इस समय भूतं सव्यं भविष्यं च जानामि तपसा खयम्‌। रामचन्द्रजीके देखनेसे ही लक्ष्मणजी और समस्त वानर- गण सचेत होकर उठ बैठे हे” ॥१७॥ यह सुनकर हनुमानूजीने कद्दा--“सुझे बड़े जोरकी प्यास लगी तच्छ्रत्वा हतुमानाह कमण्डलुजलेन मे | हुई है, इस कमण्डलुके जलसे वह शान्त नहीं हो न शाम्यत्यथिका तृष्णा ततो दर्शय से जलम्‌। १८॥ सकती, अतः से जाय ही दिखा दीजिये ॥१८॥ तव अच्छी बात है! ऐसा कहकर उसने एक माया- 'तथेत्याज्ञापयामास बड़ मायाविकरिपितस्‌ । कल्पित ब्रह्मचारीको आज्ञा दी,“ब्रह्मचारिन्‌ ! हनुमानजी- को वह बिस्तृत जलाशय दिखला दो” ॥१९॥ (फिर हनुमानजीसे बोला--) “देखो, तुम आँखें मूंदकर निमील्य चाक्षिणी तो यं पीत्वाऽऽगच्छ ममान्तिकस्‌| जळ पीना और फिर तुरन्त मेरे पास चले आना । b उपदेक्ष्यामि ते मन्त्र येत दरक्ष्यति चौषधीः ॥२०॥ | म यें एक मन्त्रका उपदेश करूंगा, जिससे तुम ओषधिको देख सकोगे” ॥२०] तथेति दातं शीध्रं बना साहिलाशयम्‌ । तव बहुने “जो आज्ञा' कह तुरन्त ही जलाशय प्रविश्य हतुमांस्तोयमपिबन्मीलितेक्षणः ॥२१॥ | दिखला दिया | उसमें घुसकर हनुमानजी आँख मूँदकर ° जल इतनेहीमें वहाँ सई ततश्चागत्य मकरी महामाया महाकपिम्‌ । पीने लगे ॥२ १॥ इतने बहो प्क चन) RE 3 घोररूपिणी मकरी आकर बड़ी शीधतासे महाकपि अग्रसत्त महावेगान्मारुतिं घोररूपिणी॥२२॥ हलुमानजीको निगलने लगी ॥२२॥ हजुमानजीने उ ततो ददर्श हहुमान्‌ ग्रसन्तीं मकरीं रुपा । रको अपनेको निगठते देख अति कछु इस्त 4 ® अ उसके क्य दारयामास हस्तास्यां बदन सा समार ह ॥२३॥। पने हाथोंसे उसका मुख फाड डाला, जिससे क्ल तत्काळ मर गयी ॥२३॥ ततण्न्सारक्ष ददश दव्यरूपधराङ्गना। इसी समय आकाशमें एक दिव्यरू यान्यमालीति विख्याता इनूसन्तमथान्नमीत्‌॥२४॥॥ सती दिखळायी दी, उसका नाम धार 7, उत्थितो लक्ष्मणः सर्वे वानरा रामवीक्षिताः॥ १७॥ बटो दर्शय बिस्तीण वायुखनोजेलाशयम्‌ ॥१९॥ सगे७] "य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्य्यय्य्य्प्प्प्ण्प्ण्प्य्प्य्प्य्प्ण्प्प्ण्प्प्प्प्प्प्प्प्प्पपाफपटट-स--------..._.... NNN त्वत्रसादादह शापाद्िसुक्ताखि कपीश्वर । ` शक्ताऽहं मुनिना पूवेमप्सरा कारणान्तरे ॥२५॥ ` आश्रमे यस्तु ते इष्टः' कालनेमिमहासुरः । \ मिड रावणम्रहितो मार्गे विघ्नं कतुं तवानघ ॥२६॥ ुनिवेपधरो नासौ झुनिविगरविहिसकः । जहि दुष्टं गच्छ शीघ्र द्रोणाचलमतुत्तमम्‌ ॥२७) गच्छाम्यहं ब्रह्मलोकं स्वत्स्पशीद्भतकरमषा। इत्युकत्वा सा ययौ खगे हनूमानप्यथाश्रमस्‌॥२८॥ आगतं ते समालोक्य कालनेमिरभाषत । कि विलम्पेन महता तव वानरसत्तम॥२९॥ गृहाण मचो मन््ास्तवं देहि मे गुरुदक्षिणाम्‌ । "इत्युक्तो हनुमान्सुष्टि दढ बद्ध्वा55६ राक्षसस्‌॥३०॥ गृहाण दक्षिणामेतामित्युक्त्वा निजघान तम्‌। विसृज्य मुनिवेपे स काउनेमि्महासुरः ॥३१॥ युयुधे वायुपुत्रेण नानामायाविधानतः । महामायिकदूतोऽसो हनूसान्मायिनां रिधुः॥२२॥ जघान मुष्टिना शोष्णि भग्रमूधो ममार सः। ततः क्षीरनि्धि गत्वा दृष्टा द्रोण महागिरिस्‌॥ ३३ - अदृष्टा चौपधीस्तत्र गिरियुत्पात्य सत्वर! । चुद्धकाण्ड क्य २६७ हचुमान्‌जीसे बोली--1॥२४॥ “हे कपीश्वर | आपकी कृपासे मैं आज झाप-मुक्त हो गयी | पहले मैं एक अप्सरा थी । किसी कारणवश मुझे एक मुनीश्नरने शाप दिया था । ( इसीसे मैं मफरी हो. गयी थी) ॥२॥ इस आश्रममें आपने जिस पुरुषको देखा है वह काळनेमि नामक महादैत्य है । हे अनघ ! इसे रावणने आपके मार्गमें विन्न डालमेके लिये भेजा है ॥२६॥ यह सुनिवेष धारण करनेबाछा वस्तुतः, कोई सुनि नहीं है, बल्कि त्राह्णोंकी हिंसा करनेवाला है । इस दुष्टको शीघ्र ही मारकर आप प्वेतश्रेष्ठ द्रोगाचळ- को जाइये ॥२७॥ मैं आपके स्परासे निष्पाप'. होकर अब ब्रह्मलोकको जाती हूँ ।” ऐसा कह बह स्वर्गलोक- को चली गयी'और हनुमानजी भी आश्रमको चळे ॥२८॥ हचुमानूजीको आये देख काळनेमिने कहा--“हे वानर श्रेष्ठ | अब बहुत विखम्ब करनेसे तुम्हें क्या छाम है ! ॥२९॥ छो, मुझसे मन्त्र प्रण करो और मुझे गुरुदक्षिणा दो । उसके इस प्रकार कहनेपर हनुमानजीने अपनी सुट्टी कसकर बाँधी और उस राक्षससे कहा--॥२०॥ “छो दक्षिणा तो यह छो”-ऐसा कह उसके एक मुक्का मारा । उसके लगते ही महादैत्य काळनेमि मुनिवेष त्यागकर नाना प्रकारकी मायाओंसे पवनपुत्रके साथ लड़ने रुगा। किन्तु हनुमानजी तो महामायावी ( मायापति भगवान्‌ राम) के दूत और इन . तुच्छ मायावी राक्षसोंके शत्रु थे, ( उनपर इन तुच्छ मायाओं- का क्या प्रभाव हो सकता था ? ) ॥२१-१२॥ उन्होने उसके शिरमें एक मुक्का मारा जिससे मस्तक फट जानेके कारण वह तुरन्त मर गया । तदनन्तर चे क्षीर-समुद्रपर पहुँचे और महापर्वत ट्रोणाचळको देखा । किन्तु उन्हें बह ओषधि न मिली । अतः फौरन ही उस पर्वतको उखाड़ ळ्या और उसे गृहीत्वा वायुवेगेन गत्वा रामस्य सन्निधिम्‌ ॥।२४॥। | बायुबेगसे रामचन्द्जीके पास छे जाकर उनसे कहा-- उवाच हतुमान्‌ राममानीतोऽयं महागिरिः । “हे देवेश्वर ! मैं इस महापर्यतको ले आया हँ । आप जो उचित समझें शीघ्र ही करें, इस: कार्यमें बिलम्ब युक्त कुरु देवेश विलम्बो नात्र युज्यते ॥२५॥ | दनाः ठीक नहीं है” ॥३३-३५॥ शर्वा हनूमतो वाक्य रासः सन्तुश्मातसः \ हनुमानूजीका यह बचन छुनकर भगवान्‌ राम गृहीत्वा चौपश्नीः शीघ्र सुपेणेन महामतिः ॥३६॥ | अति प्रसन्न हुए और उन महामति प्रभुने तुरन्त ही "7 oR अध्यात्मरामायंण ` [सम्‌ऽ RSIS RR TT non २०६०५ २४ FNS WSU PIN NTN mr भनक RRO चिकित्सा कारयामास लक्ष्मणाय महातमने। | उस पर्वतसे ओपयि लेकर दुपेणसे महात्मा छ्मणकी चिकित्सा करायी । तब नींदसे उठे इणके समान तः सुप्ोि षया गनो }।३७। | | ततः सुप्तोत्थित इव बुद्ध्वा ग्रोवाच लक्ष्मणः ।२ ढक्ष्मणजीने सचेत होकर कद्दा--11३ ६-३७॥ “अर दुष्ट दिष्ठ तिष्ठ क मन्तासि हन्मीदानीं दशानन । | दश्यानन ! खड़ा रह, खडा रह, त जायगा कहाँ ? में इति ब्रुवन्तमाठोक्य सूध्न्यवघाय राघवः ॥३८॥ | तुझे अमी मारे डालता हूँ ।” उन्हें इस प्रकार कहते जे रघुनाथजीन उनका शिर सेघकर हलुमानजीसे- ि पराह वर्षाय त्वत्मसादान्महाकपे । | देख रथुनायजीन उन no माह गाह त्याच लारा कहा-- हि वत्स ! हे महाकपे | आज तुम्हारी कृपास २६८ ~ श्य कक कशदे धट शेशीशी शहरी निरामयं प्रपश्यामि लक्ष्मणं आतरं मम ॥३९॥ | | के अपने भाई रक्ष्मको सकुद्याल देख रहा ह” ' ॥३८-२९॥ हचुमानुजीसे इस प्रकार वह श्रीरामचन्द्र- ` विभीषणमतेनैव युद्धाय समवस्थितः ॥४०॥ | जी सुप्रीव और अन्यान्य बानरोंके साथ विभीषणकी । सम्मतिसे युद्धका तैयारी करने लगे ॥४०॥ तब युद्धके छ गदै क श्वच्‌ बताये शव रे हु पादाय, प पता वानस इ ल्यि अत्यन्त उत्सुक समस्त वानरगण पापाण, र आर उुद्ठायाभिह्ठुखा भूत्वा ययुः सव युयुत्सवः 1४ १॥ | पर्वतशिखर आदि टकर लड़नेके लिये चढे ॥ ११ ॥ इत्युक्त्या बानरे साधे सुग्रीयेण ससन्वितः। इधर, भगवान्‌ रामके वाणेसे विद्ध होकर महा- राक्षस रावण ऐसा व्याकुळ हो रहा था जैसे सिंहसे हाथी और गरुउसे सर्प हो जाता है। अतः वह राक्षस- अभिशूतोऽगमद्राजा राघवेण महात्मना । | राज महात्मा रामते परास्त होकर छ॑कापुरीमें गया और सिंहासने समाविश्य राक्षसानिदमत्रतीत्‌ ॥४३॥ | अपने राजासहासनपर वठकार राक्षसा इस प्रकार ‘~ कहने डगा-॥।४२-४३॥ “पूचकाल्मं पितामह ब्रह्ञाजीने माडुपो हिन मां इ शक्तोऽसि झुवि कथन ४४ | संसारम ऐसा कोई मबुप्य नहीं है जो मुझे मार सके _ a सं ॥४४॥ अतः इसमें सन्देह नहीं साक्षात्‌ नारायणः ततो नारायण! ताझान्यादुपोड्यून संशय! | हीने मनुष्यका अवतार ळ्वि है और वें ददारथ- रामो दाशरथिभूत्वा मां इन्तु समुपस्थितः ॥४५॥ | कुमार राम होकर मुझे मारनेके लिये आये हैं ॥४५॥ । प्रबेकालमें सदे जं थाकि अरण्येन यसू शष्ोऽह राक्षर । | पकाल झे जो अनरण्यने शाप दिया था कि , i | हि राक्षसराज ! मेरे वंहामें सनातन पुरुष परमात्मा उत्पत्सत च सहश परमात्मा सनातन! ॥४६॥ | अवतार लगे और उन्होंके हाथसे तुम निःसन्देह अपने तेन स पुत्रपौत्रैथ वास्थवैश्व समन्वितः। | उ पौत्र और वान्धवोंके सहित मारे जाओगे और व्यक कक ऐसा कहकर वह स्वगंकी चला गया था, सो उन्हीं रामने दानसं न सन्दह इत्युक्तया सा दिव गतः ॥४७॥ | मेरेलिये अवतार लिया है और ये मुझे अवश्य मारेंगे। स एव रामः संजातो मदर्थे मां हनिष्यति । हमारा भाई कुम्भकर्ण तो बड़ा ही मूढ़ है, वह सदा 3 भक _ ¢ A 1 निद्राके च्‌ शी है नट इम्मकर्णस्तु मूढात्मा सदा निद्राञ्च गतः ॥४८॥ | . शीभूत रहता है. ॥४६-४८ तुम व उस महावीरको जगाकर मेरे पास ठे आओ !” घे पइ स्स्व 5 वाच्य महासजपानयन्तु ममास्तिकय | रावणके इस प्रकार कहनेपर घे महाकाय राक्षसगण रावणो विव्यथे रामबाणेविंद्धों महासुरः । मातङ्ग इभ सिंहेन गरुडेनेव पञन्नगः।।४२॥ इत्युक्तास्ते मंह!कायास्तूर्ण गरा तु यत्रत॥॥४९॥ | तुरन्त ही गये और प्रयत्नपूर्वक ङुम्मकर्णको जगाकर + ७ सर्ग ७] बुद्धकाण्ड २६९ स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्ल्स्प्प्ल्प्ण्ण्ण्न्प्यगापिपगक्रपापपतपपपप८८८८2८९<----२२२२-----....__._____._ Doe Tororo SS Sve क्क विवोध्य कुस्भश्रचणं न्यू रावणस्निषिम्‌ | ` | राबणके पास छे आये । वहाँ पहुँचनेपर वह राजाको नमस्कृत्य स राजानमासनोपरि संखितः ५०) | प्रणाम कर आसनपर बैठ गया ॥४९-५०] तमाह रावणो राजा आतर दीनया गिरा । तब राजा राबणने अत्यन्त दीन-चाणीसे उस अपने कुम्भकर्ण नित्रोध त्व महत्कष्टयुपस्थितम्‌ ॥५१॥ मासे कहा--“कुम्मकर्ण | इस समय हमारे उपर बडा संकट है, सो तुम सुनो ॥ ५१॥ रामने हमारे बडे- ण निहताः शूराः पुत्राः पौत्राथ बान्धवाः! | बडे वीर, पुत्र, पोत्र और बन्धु-बान्धबगण मार डाळे किं कपैव्यमिदानी गे सृत्युकाठ उपखिते ॥५२॥ | द! भई शस समय मेरा शुका आ गया है, अन कि) मुझे क्या करना चाहिये ॥ ५२ || यह महाबली एप दाशरथी रामः सुग्रीवस्तहितों वळी । | दशरधकुमार राम सुग्रीवके सहित दल्बलके साथ समुद्र समुद्रं सब॒लरतीत्वा मूलं नः परिकृन्तति ॥५३॥ | पारकर सब ओरसे हमारी जड़ काट रहा है॥ ५३॥ दि रि So हमारे जो सुख्य-मुख्य राक्षस थे वे सब युद्धम वानरोंके ये राक्षसा मुख्यतमास्ते हता वानरंयुि । | हाथसे मारे गये, किन्तु इस युद्धमें हमें वानरोंका क्षय वानराणां क्षयं युद्धे न पश्यामि कदाचन ॥५४॥ | होता कमी दिखायी नहीं देता ॥ ५४ ॥ हे महाबाहो ! तुम इनका नाश करो, मैंने इसीलिये तुम्हें जगाया है । हे महाबीर ! अपने भाईके लिये इस दुष्कर कार्यको करो” | ५५ || राजा रावणके ये दुःखमय वचन सुनकर कुम्भकर्ण बड़े जोरसे ठट्टा मारकर हँसा और इस प्रकार कहने लगा--11५६॥ “राजन्‌ ! आपने जब पहले सम्मतिकी पुरा मन्त्रविचारे ते गदितं यन्मया नृप! | थी उस समय मैंने जो कुछ कहा था आपके पापका तदध त्यामुपगतं फलं पापस्य कर्मणः ॥ ५७ | ° मछ आज उपस्थित हो ही गया ॥ ५७ | मैंने तो ५ आपसे पहले ही कहा था कि राम साक्षात्‌ परब्रह्म क baie ba पूयेमेव मया प्रोक्तो रामो नारायणः पर! । नारायण हैं और सीताजी योगमाया हैं, किन्तु सीता च योगमायेति बोधितोऽपि न बुध्यसे ॥५८) आप तो समझानेपर भी नहीं समझते | ५८॥ OS । सितो एक दिन मैं रात्रिके समय वनमें एक विशाळ एकदाऽहं बने सानी विशालायां नि । | झिळापर बैठा था। इसी समय मैंने दिव्यमूति इषो मया मुनि! साक्षान्नारदो दिव्यदशन$॥५९॥ | साक्षात्‌ नारद मुनिको देखा ॥ ५९॥ उन्हे _ ~ देखकर मैंने कहा-“हे. महाभाग | कहिये, इस समय गग गन्तासे सं वद । छळ तमे महाभाग छतो से मे वद आप कहाँ जा रहे हैं।” मेरे इस प्रकार इत्युक्तो नारदः प्राह देवानां मन्त्रणे स्थितः ॥६०॥ पूछनेपर नारदजीने कहा--“ैं अभीतक देवताओं- तत्नोत्पत्ममुदन्त ते वक्ष्यामि शृण तस्वत!। | की एक गुप्त गोष्ठीमें था ॥ ६० ॥ वहाँ जो कुछ हुआ RPO , मैं तुम्हें ज्यो-का-त्यों सुनाता हूँ । तुम दोनों म्यां पीडिता देवाः सर्वे विष्णुश्ुपागताः।६१॥ दि उपाम्या पाडता द हे भाइयोंसे अत्यन्त पीडित होकर समस्त देवगण विष्णु- उच्चुस्ते देवदेवेशं स्तुत्वा भक्त्या समाहिता!! | अगबानूके पास गये ॥ ६१ ॥ और उन देवदेवेश्ररकी जदि रावणमक्षोभ्य देव त्रैलोक्यकण्टकम्‌ ॥ ६२ ॥ | अत्यन्त भक्ति और एकाग्रतासे स्तुति कर कहने लो- नाशयख महावाहो यदर्थं परिवोधितः । आतुर्रथ महासत्त्व कुरु कमे सुदुष्करम्‌ ॥५५॥ शृत्वा तद्रावणेन्द्रस्य वचनं परिदेवितम्‌ । NO झुम्भकणों जहासोचेपेचनं चेदमन्रवीत्‌ ॥५६॥ मातुपेण खृतिस्तस्य कल्पिता अक्षणा पुरा । अतस्त्वं सालुषो भूत्वा जदि रावणकण्टकम्‌ ॥६२॥ तथेत्याइ महाविष्णुः सत्यसङ्कल्प इश्वरः । जातो रघुकुले देवो राम इत्यमिविश्तः ॥६४॥ स हनिष्यति चः सर्वानित्युकत्ा प्रययौ मुनि! । अतो जानीहि रामं त्वं परं बरह्म सनातनम्‌ ॥६५॥ त्यज पैरं सजस्वाद्य मायामालुषविग्रहम्‌ । भजतो भक्तिभावेन प्रसीदति रघूत्तमः॥६६॥ अक्तिजनित्री ज्ञानस्य भक्तिमोक्षप्रदायिनी । भक्तिहीनेन यस्किश्चि्कृतं सवेमसत्समम्‌ ॥६७॥ अवताराः सुबहो विष्णोलीलानुकारिणः । तेषां सहस्रसदशो रामो ज्ञानमयः शिवः॥६८॥ : रामं भजन्ति निएणा मनसा पचसाऽनिशम्‌। अनायासेन संसारं तीर्त्वा यान्ति हरे? पदम्‌ ।।६९।। ये राममेव सततं श्वि शुद्ध्या ष्यायन्ति तस्य चरितानि पठन्ति सन्तः । घुक्तात्त एव अवभोगमहाहिपाशैः 'हे देव | इस रावणके आगे हमारी कुछ नहीं चलती आप इस त्रिलोकीके कॉटेका शीघ्र दी संहार कीजिये ॥ ६२॥ पूर्वकालमे ब्रह्माजीने उसकी मृत्यु मनुष्यके हाथ- से निश्चित की है, अतः आप मनुष्य होकर इस रावण- रूप कण्टकको नष्ट कीजिये! || ६३ | तब सत्यसंकल्प भगवान्‌ विष्णुने बहुत अच्छा’ कहा | अब वे रघुकुलें अबतीण होकर राम-नामसे विख्यात हुए हैं ॥ ६४॥ तुम सबको मारेगे।” ऐसा कहकर नारद सुनि चले गये । “अतः आप रामको सनातन परब्रह्म ही जानिये ॥ ६५॥ और वैर छोड़कर उन मायामानवरूप भगवानका भजन कीजिये । श्रीरघुनाथजी मक्तिमावसे भजन करनेषालेसे प्रसन्न हो जाते हैं || ६६ ॥ भक्ति हा ज्ञानकी जननी और मोक्षको देनेवाली है । भक्तिहीन पुरुष जो कुछ करता है बह सब न कियेके समान ही है ॥ ६७ ॥ भगवान्‌ विष्णुके अनेकों अवतार हुए हैं और वे सभी अपने खरूपके अनुसार लीळा करनेवाले थे । किन्तु यह शिवखरूप ज्ञानमय रामावतार वैसे एक सहस्र अवतारोंके समान है ॥ ६८॥ जो लोग रात-दिन मन ओर वचनसे भगवान्‌ रामका भली प्रकार भजन करते हैं वे विना प्रयास ही संसारको पारकर श्रीहरिके परम धामको जाते हैं ॥ ६९ ॥ जो शुद्ध चित्त महानुभाव इस भूमण्डलमें निरन्तर रामका ही ध्यान करते और उन्हींके चरित्र पढ़ते हैं वे ही सांसारिक विषयरूप महान्‌ नागपाशसे छूटकर श्रीसीतापतिके सातापतः पदमनन्तसुख प्रयाच्त ॥७०॥ | अनन्त सुखमय चरणकमलोंको प्राप्त होते है? || ७०॥ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेशवरसंवादै युद्धकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७॥ 7 _. १ ७ अष्टम सर्ग कुर्भकण-बच । श्रीमहादेव उवाच कुम्भकर्णवचः श्रत्वा भुकुटीविकटानन! । दशग्रीचो श्रीसद्दादेचजी बोले-हे पार्वति ! कुम्भकर्णके यै . वचन सुनकर रावणका मुख और भकुटि (क्रोधसे) विकराळ हो गये | और उसने मानो आसनसे उचलते जगाददभासनादुत्पतान्नेव॥ १॥ ¦ इए इस प्रकार कहा-॥ १ ॥ “मै जानता हुँ तुम बडे. सगे८] युद्धकाण्ड २७१. त्वमानीतो न मे झानबोधनाय सुबुद्धिमाच्‌। | बुद्धिमान हो, किन्तु इस समय मैंने तुम्हें ज्ञानोपदेश सया कृतं समीकृत्य थुष्यख यदि रोचते ॥ २॥ करनेके लिये नहीं बुढाया है। यदि तुम्हें अच्छा लगे तो CR निद्रा त्या बाते मेरे कृत्यक्ी ठोक मानकर युद्ध करो ॥२॥ नहीं तो जाओ रावणस्य वच! कृत्वा कुम्भकर्णो महाबलः ॥ ३।।| रावणके ये वचन सुनकर महाबळी कुम्भकर्ण, यह न्स ऽयसिति बि ९ - ९२ । जानकर कि रावण रुष्ट हो गया है, तुरन्त युद्धके लिये ह८ाऽयमिति विज्ञाय तूण बुद्धाय नियेयो । | चळ पडा । वह महापर्वतके समान विशालकाय राक्षस | रकोटेके व) ~ , $~ नगरके परकोटेको लॉघकर बाहर आया ( क्योंकि स लट्ठायरवा आकार पर्वत १॥४ नेवे उद्वार र मदापवतसानभः ॥ ४ ॥ | न्त दोईकाय होनेके कारण वह नगरके संकुचित चर्ण रिपैनि ~ | रमे ¢ ¢ सम्पू € निर्ययौ नगराचूर्ण भीपयन्हरिसैनिकार्‌ | | इग दोर नहीं निकड सकता था । ) और समरण , वानर सैनिकोंको भयभीत करते हुए उसने बड़ा धोर प ननाद मदानादै समुद्रमभिनादयन्‌॥ ५ || . शब्द किया, जिससे समुद्र मी गज उठा ॥ ३-५॥ राम ५ । फिर बह अत्यन्त क्रुद्ध हो अपनी भुजाओोंसे मानरान्कालयामास वाहुभ्यां मक्षयन्‌रुपा। | नाको निगल-निगठकर नष्ट करने ल्गा | तब तो म्भकणे तदा ष्वा सपक्षमिव पर्वतम॥ ६॥ जिस प्रकार समस्त प्राणी बगरको देखकर भागते हैं : उसी प्रकार सपक्ष पवतके समान विशाळकाय कुम्म- वुर्वानरा? सर्वे कारान्तकमिवाखिलाः। । कर्णको देखकर समस्त वानरगण भागने छगे। ~ मन्तं हरिवाहिन्यां मुहरेण महावलम्‌॥ ७॥ | शती सम्य, महाबळी कुम्भकर्णको मुद्दर धारण कर गलुयन्तं हरीन्येगाङ्कक्षयन्त समन्ततः । अन्त बेगसे क्षण करते और अपने सुदर तथा चूर्णयन्तं मुद्गरेण पाणिपादेरनेकधा || ८ ॥। | छत और घूसोंसे नाना प्रकार कुचळते देख परम कुम्भकर्ण तदा दृष्टा गदापाणिविभीपणः । | बुद्धिमान, गदापाणि विभीषणने उस अपने अठ , भ्राताके चरणोंमे प्रणाम किया ॥६--९॥ ओर कहा-“हे ननाम चरणं तस्य आतुर्ज्येठस्य बुद्धिमान्‌ ॥ ९ ॥ महामते ! मैं आपका भाई विभीषण हूँ, आप मुझपर विमीपणोऽहं आतुमे दयां कुरु महामते। [दया कर । भाई मैंने रावणको बारम्बार समझाया , ~ कि राम साक्षात्‌ विष्णुभगवान्‌ हैं, तुम उन्हें रावणस्तु मया भ्रातर्वहुधा परियोधितः ॥१०॥ | सीताजीको सौंप दो, किन्तु उन्होंने मेरी बात नहीं छुनी सीतां देहीति रामाय रामः साक्षाजनादन।। | और मुषे मारनेके : लिये तळ्वार खींचकर कहा कि क्काम तझे धिक्कार है, व यहाँसे ठल जा' । पापी मन्त्रियों- न शृणोति च मां हनत ञ्चएयम्य चोक्तवान्‌ ११ ' से घिरे हुए भाई रावणने ऐसा कहकर मेरे छात मारी । धिक्‌ त्वां गच्छेति मां हत्वा पदा पापिभिरावृतः। | तब मैं अपने चार मन्त्रियोंके सहित भगवान्‌ रामकी ~ १) चतुर्भिरमन्त्रिमिः साथ रामं शरणमागतः ॥१९॥ | 7 चला आया” ॥ १०-१२॥ च्र्या दुम्भकणोंऽपि ज्ञत्वा आतरमागतम्‌। | ऐसा इन कुम्मकर्णने भी अपने भाइँको आया दवाई जान उन्हें हृदयसे लगाया और कद्ा--“बत्स | भगवान्‌ समालिङ्च च वत्स त्वं जीय रामपदाश्रयात्‌।१२। रामके चरणका आश्रय पाकर अपने कुछकी ० > हो काल्य ये हरुसंरक्षणाथीय राक्षसानां हिताय च। | रका और रासन कल्याणक दिये इ चिरकाउतक RR नानया सम सकी चयन 00 हकआम्याककम का महाभागवतो5पि तवं पुरा मे नारदाच्छूतम्‌ ॥ १ ४1 | अध्यात्मरामायण [सगट जीवित रहो । पूर्वकाटमें मैने नारदजीसे सुना था क्रि हि तुम बड़े ही भगन्रद्गक्त हो ॥ १३-१५ ॥ भैया ! झच्छ तात ममेदानीं इश्यते न च किश्वन । | जर तुम जाओ, मेरे नेत्र मदसे मतवारे हो रहे द, सदीयो घा परो वापि मदमत्तविरोचनः ॥१५॥। | अतः इस समय सुझे अपना-पराया कुळ नही नना । ॥ १० ॥ भाई कुम्मकर्णके इस प्रकार कदनपर विभीपण- इत्पुक्तोड्युसुखो भ्रातुभरणावमिवन्ध सः । क नेत्रोमे जळ भर आया और ये उसके चरण रामपार्श्वहुपागत्य चिन्तापर उपखितः॥१६॥ प्रणाम कर चिन्तग्रला हो भगवान रामके पास आकर खड़े हो गये ॥१६॥ इधर कुम्भकर्ण भी ममन गजराज- कुम्भकर्णोऽपि हस्ताभ्यां पदास्षां पेपयन्हरीनू । . क्र समान अपने दाथ और पैरोंसे बानरोंकों रोंदता चचार यारी सेनां कालयन्‌ गन्थहस्तिवत्‌॥१७॥], इआ समला वानरा वूमन टगा ॥ १७॥ कुम्मकर्णकों देखकर श्रीरघुनाथजीन कुद हो चायव्यास ` चढाया और उसे सावधानीसे उसकी ओर छोड़ ठिया | चिक्षेप छुम्मकर्णाय तेन चिच्छेद रक्षसः ॥१८॥ | उस अससे उन्होंने उस राक्षसका मुहरसहित दाहिना सञ्च॒द्गरं दक्षहस्त तेन घोरं ननाद सः | | हाथ काट डाला'। इससे वह मद्ामर्यकर गर्जना करने स इस्तः पतितो भूमावनेकानर्दयन्कपीन्‌ ॥१९॥ | एण | उसका वह (कटा हुआ) हाय अन वानर प व | कुचटता हुआ पृथ्वीपर गिर पडा ।1१८-१९॥ तव, इधर पर्यल्तभाश्रिताः सर्वे बावरा भयषेपिताः। | उधर खड़े हुए समस्त वानरगण भयसे कापते हुए भगवान: रासराक्षसयोयुडड पश्यन्तः पर्यवव्थिताः ॥२०॥ | राम और राक्षस कुग्भकणेका युद्ध देखने लगे || २० ॥| इम्मकर्णश्छिबहस्तः शालुद्यम्य देगतः। ` अपने दोय थक कट जानेपर मभक दु रुनाय , , _ | जीको मारनेके लिये एक झाढ-दृक्ष उठाकर बड़े वेग समरे राघवं इं दुद्राव तमयोऽच्छिनत्‌ ॥२१॥ | दडा । किन्तु रघुनाथजीने ऐर शासने शाललहिः शाखेन सहितं वामहस्तमैन्द्रेण राघवः। ` उसका बायाँ हाथ भी काट डाठा । दोनों मुजाआंरे : = > ळा, हक क ° © छिञ्चवाहुमथायान्तं चर्दन्तं वीक्ष्य राघवः ॥२२॥ ; र जव शरामचन्नोनि उसे गर्जेगर्जेकर शकल ` अपनी ओर आते देखा तो दो अत्यन्त तीक्ष्ण अद्र द्वावधेचल्द्री निश्चितावादायास पदद्वयम्‌ | चन्द्राकार वाण चढ़ाकर उसके दोनों चरण भी कार चिच्छेद पतितौ पादौ ठज्ञाद्वारि महाखनो ॥११॥ डाटे । ना चरण बड़ा शब्द करते हुए लेकाचे RP याच वि ' द्वारपर गिरे ॥ २१-२३ ॥ हाथ-पाँवोंके कट जानेपर निकतपाणिपादोऽपि कुस्भकणोऽतिभीपणः । मी महाभयानक कुम्भकर्ण राहु जैसे चनरमाकी ओ बडवायुखवहकत्न व्यादाय रघुनन्दनम्‌ ॥२४॥ दोडता है वैसे ही घोड़ीके समान मुख फाइकर अभिदुद्राव निनदत्राहुअन्द्रमस यथा । ; चिघाडता हुआ भगवान्‌ रामकी ओर दोडा | किन्त हि | रघुनाथजीने उसे अत्यन्त तीक्ष्ण वार्णोसे भर दिय ) अपूरयाच्छताग्रथ सायफसद्रघूचमः ॥२०।॥ । ॥२३-२५ ॥ वाणोसे मुख भर जानेपर वह अति शरपूरितयक्त्रोऽसौ चुक्रोशातिभयडूरः | ¡ भयंकर राक्षस चिल्लाने रगा | तव रघुनाथजीने सूर्ये वर्यप्रतीकागगेन समान देदीप्यमान अति उत्तम ऐन्द गण चढ़ाया और अथ स्रयग्रताकाशमन्द्र शरमलुत्तमम्‌॥।२६॥ ` ॥ उत्तममु ॥२९॥ बहू वज्ञके समान कठोर वाण उस राक्षसका वध कारने. - ! के ल्यि छोड़ा । इन्द्रके वजने जिस प्रकार इत्रासुरका दृष्टा तं राघवः क्रद्धो वायव्यं शस्तमादरात्‌ । पज्ञाशनिसस॑ रामकिक्षेपासुरमृत्यवे | सर्ग ८ ] युद्धकाण्ड २७३ env (र या ययम्या्स ८४४१४४५ nd र ४४२४४४८ ७० ४० ~ ४४४५ ४८४ ४ 0४ १४५ SYS ७४ ४४७५१ ७ ५० ६२७७ ३० ७४ ७८० ७७ ७७४५० ७४७४७०७४१४ ree ३७१०० ITY य द्याम्चयकटक ww ४ ४४५१ ७४७०४४७ ७१५१७ कट कटी, ur Uw ७७०७४१४ तर र्ष « स तत्पर्षेतसङ्काश स्फुरत्कुण्डलदष्कस्‌॥२७॥ | शिर काटा था उसी प्रकार उस बाणने उसका पर्वत- चकते रक्षोधिपतेः शिरो बृत्रमिवाशनिः । सदृश शिर, जिसमें कुण्डल और दाढे चमक रही थीं, काट डाळा । कुम्भकर्णका शिर छंकाके द्वारपर तच्छिरः पतितं लङ्कादवारि कायो महोदधो ॥२८॥ | और उसका धड समुद्रमें गिरा ॥ २६-२८-॥ उस शिरोऽस रोधयदूद्वारं कायो नक्रा चूर्णयत्‌। मस्तकने छंकाके द्वारको रोक लिया और धड़ने बहुत- से नाके आदिं जलजन्तुओंको कुचल डाला । इस प्रकार उतो देवाः सक्रपयो गन्धी पन्नगाः खगाः।२९॥| कुम्मकर्णके मारे जानेपर ऋषियोंके सहित देवगण तथा सिद्धा यक्षा गुद्यकाश्च अप्सरोभिश्च राघवम्‌ । हीडिरे ङुसुमासारैषर्पन्तथाभिनन्दिताः ॥३०॥ आजगाम तदा रामं द्रष्ट देवुनीश्वरः । नारदो गगनाच्तूर्ण स्वभासा भासयन्दिशः ॥३१॥ राममिन्दीवरश्यामपनुदाराङ्गं धनुर्धरम्‌ । ईपत्ताग्रविशाराधमेन्द्राद्ाश्वितवाहुकम्‌ ॥३२॥ दयाईडटचा पञ्यनतं वानरान्‌ शरपीडितान्‌। | दृष्टा गठ्ठदया वाचा भक्त्या स्तोतुं प्रचक्रमे ॥२३॥ नारद उवाच देवदेव जगन्नाथ परमात्मन्सनातन। नारायणाखिलाधार विश्वसाकषिनमोज्स्तुते ॥३४॥ बिशुद्ज्ञानरूपोऽपि त्य लोकानतिवश्वयन्‌ । मायया मनुजाकारः सुखदुःखादिमानिव ॥२५॥ _ त्वं मायया गुद्यमानः सर्वेपां हृदि संखितः । खयंज्योतिःखमावस्त्वं व्यक्त एवामलात्मनाम्‌ ३ उन्मीलयन्‌ सूजस्येतन्ेत्रे राम जगत्त्रयम्‌ । उपसंद्दियते सवे त्वया चक्षुनिमीलनात्‌॥१७॥ याखिन्सर्वमिदं भाति यतश्चैतच्चराचरम्‌ । अम्सराओंके सहित गन्धर्व, नाग, पक्षी, सिद्ध, यक्ष और गुझक आदि अति प्रसन्न होकर श्रीरघुनाथजीपर पुष्पा- वली बरसाते हुए उनकी स्तुति करने ळगे।२९-३०।| इसी समय अपने प्रकाशसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए देवर्षि नारद भगवान्‌ रामका दर्शन करनेके लिये तुरन्त ही आकारासे आये ॥ ३१ ॥ जो नीळकमळके समान इयामवर्ण, अति मनोहर- मूर्ति और धनुष धारण किये इए हैं, जिनके नेत्र अति विशाल और कुछ अरुणवर्ण हैं तथा सुजाएँ ऐन्दाखसे सुशोभित हैं, जो अपनी दयामयी इष्टिसे बाणों- से पीडित वानरोंकी ओर देख रहे हैं उन भगवान्‌ रामका दर्शन कर श्रीनारदजी भक्तिसे गदूगदकण्ठ हो इस प्रकार स्तुति करने लगे | ३२-३३ | नारद्जी चोळे-हे देवाधिदेव ! हे जगत्पते ! हे परमात्मन्‌ ! हे सनातन पुरुष | हे नारायण ! हे सर्वाधार ! हे विश्‍वसाक्षिन्‌ | आपको नमस्कार है ॥ ३४ ॥ आप विशुद्ध विज्ञानखरूप हैं, तथापि लोकों- की वक्चना करनेके लिये आप अपनी मायासे मनुष्या- कार धारण कर छुखी-दुःखी-से दिखायी देते हे ॥ ३५॥ आप अपनी मायासे आच्छादित होकर ( अन्तर्यामी- खूपसे ) सबके अन्तःकरणोंमें स्थित हैं । आप खमाव: से ही खयंप्रकारा हैं और झुद्ध-चित्त ब्यक्तियोंको हँ आपका साक्षात्कार होता है ॥ २६॥ हे राम ! आप नेत्र खोलकर ही इस सम्पूर्ण ज्रिडोकीकी रचना कर देर हैं और आपके नेत्र मूँदते ही इस सबका ल्य हो जाता ह ॥ ३१७ || जिसमें यह सम्पूर्ण चराचर जगत्‌ भास रहा है जिससे इसकी उत्पत्ति हुई है तथा जिसके अतिरित संसारमें और कुछ भी नहीं है वह ब्रह्म आप ही है यस्मात्न किञ्चिछोकेऽसिसरम ते जह्मणे नमः | रे! | आपको नमस्कार है ॥ ३८॥ जिन्हें मुनिश्रेष्ठः ३५ हि २७४ कक कमकन््कमकन्येकन्हवकव्हमकण्कनकनकनयर्यका पकी IIS FT भ प्रकृतिं पुरुष कालं व्यक्ताव्यक्तखरूपिणसू । यं जानन्ति मुनिश्रेशस्तस्म रामाय ते नमः ।।३९॥ ' विकाररहितं शुद्ध ज्ञाररूपं श्रुतिर्जगों। सां सर्जगदाकारमूरति चाप्याह सा श्वति।।४०॥ विरोधो इश्यते देव वैदिको वेदवादिनाम्‌ ।. निश्चयं नाथिगच्छन्ति त्वत्प्रसादं विना बुधा! ४१) मायया क्रीडतो देव न विरोधो मनागपि । रश्मिजारं सवेर्यद्वदूदश्यते जलवदू श्रमात्‌ ॥४२॥ भ्रान्तिज्ञानात्तथा राम त्वयि सर्वे प्रकरप्यते । मनसोडविषयो देव रूपं ते निर्गुणं परम्‌ ॥४३॥ कथं इश्यं भवेदेव इश्याभावे भजेत्कथम्‌ । अतस्तवायतारेषु रूपाणि निपुणा थुषि ॥४४॥ भजन्ति वुद्धिसम्पन्नास्तरन्त्येव भवार्णवम्‌ । कोमकोधादयस्तत्र बहवः परिपन्थिनः ॥४५॥ भीषयन्ति सदा चेतो मांजीरा मूषकं यथा । त्वन्नाम सरतां नित्य त्वदूपमपि मानसे ॥४६॥ त्वत्पूजानिरतानां ते कथामृतपरात्मनाम्‌ । त्वद्भक्तसङ्किनां राम संसारो गोष्पदायते ॥ ४७) अतस्ते सशुणं रूपं ध्यात्वाऽहं सर्वदा हृदि । युक्तथरामि रोकेषु पूज्योऽहं सर्वदेवते। ॥४८॥ | | देवताओंसे पूजित होता हँ ॥ ४८ ॥ हे राम ! आपने राम त्वया महत्कार्य कृतं देवहितेच्छया । च्य (क धेना भूमारोऽयं »-) इम्बकणबधेनाद्य भूमारोऽयं गतः प्रभो ॥४९॥ LoS श्वो हनिष्यति सोमित्रिरिन्द्रजेतारमाहवे । हनिष्यसेऽथ राम त्व॑ परश्वो दशकन्धरम्‌ ॥५०॥ . अध्यात्मरामायण antennas कप्य [सम्‌ ८ प्रकृति, पुरुप, काळ और व्यक्ताव्यक्तखरूप जानते हैं उन्हीं श्रीरामरूप आपको नमस्कार है ॥३९॥ श्रुतिने विकाररहित, शुद्ध और ज्ञानखरूप कहकर आपका € सम्पू च वर्णन किया है और वही आपको सम्पूण जगद्रूप भी वतलाती है ॥ ४०॥ हे देव ! इस प्रकार बेदवादियों- NNN NNN NNN ANNAN को यह वैदिक ( वेद-बचनोंमें ) विरोध 'दिखायी देता, है; किन्तु आपकी कृपाके बिना तो विज्ञजन भी किसी निइचयपर नहीं पहुँचते || ४१ ॥ हे देव ! आप माया- से ही लीळा कर रहे हैं, अतः इन वेदवाक्योंमें कुछ भी विरोध नहीं है । जिस प्रकार सूर्यका किरणसमूह भ्रमसे जळके समान प्रतीत होता है, हे राम ! उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत अज्ञानसे ही आपमें कल्पित हुआ है; आपका वास्तविक- निगुणरूप तो मन- का अविषय है || ४२-४३ ॥ हे देव ! चह किस प्रकार किंसीको दिखायी दे सकता है ! और दिखायी न देनेसे कोई उसका भजन भी केसे कर सकता है ? अतः संसारमें बुद्धिमान और निपुणळोग आपके अवतारखरूपोंका ही चिन्तन करते हैं और वे ज्ञानसम्पन्न होकर संसार-सागरको पार कर ही लेते हैं। इस भक्तिमागमें काम, क्रोध आदि बहुत-से बित्न भी होते हैं ॥ ४४-५५ ॥ वे, विठ्ठी जिस प्रकार चूहेको डराती है उसी प्रकार चित्तको सर्वदा भयभीत करते रहते हैं, हे राम ! जो लोग निरन्तर आपका नामस्मरण करते हैं, आपके रूपका हृदयमें ध्यान करते हैं, आपकी पूजामें तत्पर रहते हैं, आपके कथामृतका पान करते रहते हैं तथा आपके मक्तोंका संग करते हैं उनके लिये यहद संसार ( जो कि समुद्रके समान दुस्तर है) गोखुर- के समान तुच्छ हो जाता है ॥ ४६-४७॥ अतः मैं, हृदयमें सवेदा आपके सगुणरूपका ध्यान करता हुआ जीवन्मुक्त होकर छोकान्तरोंमें विचरता हूँ और समस्त देवहितकी कामनासे यह बहुत बड़ा काम किया है; हे प्रमो ! इस कुम्मकर्णके बधसे आज पृथिवीका ( बहुत कुछ ) भार उतर गया ॥ ४९ || कळ छक्ष्मण- जी युद्धम इन्द्रजितको मारेंगे और परसों आप रावण- का बध करेंगे | ५० ॥ हे देवेख़र ! मैं सिद्धोंके साय न foamnernyoynparereg pny ्-सससससस सकल सनक ना 9+ कक 9 «न न+-स+»-+ ०» «+»««>ल-ज«०-न>>बन->«न्‍म-मक errr NINDS 2३८९० ४८५४१५०६८१ 20८ ५३ ७० ५३७० ६३६ UNA ०५५ ९० ६० "क्ट ७७ 5३५)९०५२९०६५ ५० ५०४० ९० ५५५० ९००१ ०-० ०८४०४०५०५४ ४५००५५० चट कट फटा चलन चल फट पल व ज्ञानी पल चम ९३९५५ ०५७: PPO क Yu पड्यामि सत्वं देवेश सिद्धैः सह नभोगतः । | आकारमें स्थित होकर यह सव चरित्र देखूंगा | हे अतुयृह्णष्य मां देव गमिष्यामि सुरालयम्‌ ॥५१॥ ! आए मुश्नपर दयादृष्टि रखें, अब मैं स्वगेळोक बा यम को जाता हैँ ॥ ५१ ॥ ऐसा कह सुनिवर भगवान इत्युक्त्वा राममामनून्य नारदो भगवाचुपिः। | नारदी औ्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पा देवताओंसे पूजिट N ७ ब ~ ~ ययो देचेः पूज्यमानो ब्रह्मणोकमकस्मषस्‌ ॥५२॥ | हो पापहीन ब्रह्मलोको चळे गये ॥ ५२॥ -आतरं निहतं श्रुत्वा कुम्मकर्णं महाबलम्‌ । बिना प्रयास ही अदूसुत कर्म करनेवाले भगवान १ शोकसन्तधो रामिणाङ्कि रामद्वारा महाबळी भाई कुम्भकर्णको मारा गया सुन रावण रावण शाकसर ण्‌ णा ॥५ शोकसन्तप्ता रामेणाछिटकर्मगा ॥५२॥ | न्त शोकाकुछ हुआ और पूछत होकर पिवी मूच्छितः पतितो भूमावुत्थाय विललाप ह्‌ । गिर पड़ा तथा ( मूर्च्छा निवृत्त होनेपर ) उठकर विळा! पिठुब्यं निहतं शरुत्वा पितरं चातिविहलम्‌ ॥५४॥ करने लगा | तब इन्द्रजितने अपने चचाको मारा गया और क ७ _, पिताको अति विह्ृळ सुन अपने शोकाकुल पितासे कहा- इन्द्रजित्माह शोकात त्यज शोक महामते । “हे मद्दामते ! शोक दूर कीजिये । हे राजेन्द्र ! मुः मयि जीवति राजेन्द्र मेघनादे महाबळे ॥५५॥ | महाबली मेषनादके जीते इए आपके दुःखका कारण ह दुःछस्यावसरः इत्र देवान्तक महासते। | है £ हे देवताओंके वाढलखप हाहा व पूथिवीपते | अपना समस्त दुःख छोड़कर आप शान येतु ते दुः्खमलिलं स्तर्यो सब महीपते ॥५६॥ | होइये ॥५३-५६॥ मैं अमी सब कुछ ठीक किये देत सर्व समीकरिष्यामि हनिष्यामि च नै रिपूत । | हे शुको मैं अबश्य मार डाळेगा । इस सगय 11111 ह निकुम्मिळा गुफामें जाता हूँ, वहाँ अग्निको तृप्तकः गत्वा निकुम्भिलां सद्चसरपंयित्वा हुताशनम)५७)॥ (य आदि प्राप्त करूँगा; इससे मैं शब्रुओंके छि लब्ध्वा रथादिकं तसादजेयोऽहं भवाम्यरे! । अजेय हो जाऊँगा |” ऐसा कह वह, निर्दिष्ट यज्ञ ~ A+ झालामें गया ॥ ५७-५८ ॥ उस निकुम्मिळा ( नामक इत्युक्त्वा त्वरित गत्वा ॥५८॥ ०५ पोक इत्युक्त्वा त्वारेत गत्वा वाद हपनस्थलस देवी ) के स्थानमें उसने रक्तवर्ण वस्त्र, रक्त पुष्पोंव रक्तमाल्याम्बरधरों. रक्तगन्धानुलेपनः! । | माळा और रक्तचन्दनका छेप धारण कर हवन| करन निकुम्मिलाखले मौनी हवनायोपचक्रमे ॥५९॥ | जार किया ॥ ५९ ॥ | विभीषणों5थ तच्छुत्वा मेघनादस्य चेशितस्‌ । जब विभीपणको मेघनादके इस कार्यका ग ला S |, तो उन्होंने उस दुरात्माके होमारम्भका सारा साचा + 0-५ “हे राम | यदि दुरात्मा मेघनादका यह होम तिविः समाप्यते चेद्रोमोउ्प मेघनादस्य दुगतः \ समाप्त हो गया तो वह देवता या असुर किस स : तदाउजेयो भवेद्राम मेघनादः सुरासुरैः ॥६१॥ | नहीं जीता जा सकेगा ॥६१॥ अतः मैं शीघ्र ही ह! शी ठक्ष्मगे यिष्यामि रावणिम्‌ । जीके द्वारा उस रावण-कुमारका बध कराये देता हू अतः शीर्घ लक्ष्मणेन घातयिष्यामि रावणिस्‌ आप बलवान ष्ट ््दमणीको मेरे साय जा आज्ञापय मया सार्ध लक्ष्मंणं बलिनां वरम्‌ । | आज्ञा दीजिये । इसमें सन्देह नहीं, आपके छोटे १ हनिष्यति न सन्देहो मेघनादं तबाचुजः ॥६२॥ | छक्ष्मणजी मेघनादको अवश्य मार डालेंगे” ॥ ६२ ॥ श्रीरामचन्द्र उवाच | श्रीरामचन्द्रजी बोले--समस्त राक्षसोको मारे अहमेवागािष्यामि हन्तुमिन्द्रजित रिधुस्‌ । | बाले महान आग्नेय अछसे अपने शत्रु इन्द्रजितः आग्नेयेन महास्त्रेण सर्वराक्षस॒घातिना ॥६३॥ | मारनेके लिये मैं खयं ही ओउँगा ॥ ६३ ॥ - २७६ अध्यात्मराभायण [सर्ग ९ RROD DTT a e100 pth a pdr peer भुफ न कण काम मघ अरमान मम ममट क०कऊ०कमफ पक कंमथा कान या० मम काम कक २०५३७ ३ ५ कप्मा भा DCD I SITTIN क क्क का कट कर्म >क पक कनका कट प जमाना मम अभय 1०777" एणोए (कल कट विभीषणोऽपि तं ग्राह नासावल्येनिंहन्यते । तब विभीषणने ह राक्षस किसी el ~ FR नहीं मारा जा सकता । जिसने बारह वर्षतक निद्र यस्तु द्वादश वर्षाणि निद्राहारविर्वाजतः ॥६४॥ और आहारको छोड दिया हो, त्रह्मार्जान इस दुरात्माकी तेनेव मृत्युनिदिशे ब्रह्मणाऽस् दुरात्मनः | | लु उसीके हाथ निश्चित की है । हे रघुनाथर्जी | लक्ष्मणस्तु अयोध्याया निर्गम्यायाखया सह।६५। | ये छक्ष्मणजी जबसे अयोष्यासे निकडकर आपके साथ तदादि निद्राहारादीन्न जानाति रघूत्तम । | आये है तमीसे, आपकी सेवामे ढगे रहनेके कारण, ये ब , 6... निद्रा और आहारादि तो जानते ही नही । हे राजेन्द्र | ' सेवार्थ तब राजेन्द्र ज्ञातं समिदं सया ॥६६॥ | ३ सब बातें जानता हूँ ॥६४-६६॥ अतः हे तदाज्ञापय देवेश लक्ष्मण त्वरया भया! | देवेश्वर ! आप शीघ्र ही ल्क्ष्मणजीको मेरे साथ जानेकी हनिष्यति न सन्देहः शेषः साक्षाद्वराघर! 11६७) . आज्ञा दीजिये । ये साक्षात धरावारी शेषनाग हैं, । इसमें सन्देह नहीं उस राक्षसको ये अवस्य मार डालेंगे सम साक्षाजगतामधाशा टू ॥६७॥ आप ही साक्षात्‌ जगत्पति नारायण हे और नारायथो लक्ष्मण एवं शेषः । | ढक्मणजी ही शेपनाग हैं । आप दोनों इस संसाररूपी युवां धरामारनिवारणाथ | नाटकके सूत्रधार हैं और प्रृथिवीका भार उतारनेके जातौ जगन्नारकसत्रधारो ॥६८॥ | लिये ही आपने जन्म ल्या है” ॥|६८॥ ree इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेऱचरसंवादे युद्धकाण्डे अष्टमः सरः ॥८॥ नवम सग मेघनाद्‌-चध । श्रीमहादेव उवाच श्रीमदादेचजी चोळे-हे पार्वति ! विभीषणके ये वचन सुनकर श्रीरघुनाथजीने कहा--“बिभीषण ! उस महामयङ्कर दैत्यक्ी में सारी माया जानता हैँ ॥१॥ जावामितस्यरोदरस्य मायं कृत्लां विभीपण॥१॥| वह मह्माखर-विधयाका जाननेवाढा, बड़ा शूरवीर, शि व मायावी ओर महावर्ल हैं | तथा लक्ष्मण मेरी जैसी सेवा स हि भह्माखविच्छ्रो मायावी च महाबळ! । करते है में उसका स्वरूप भी जानता हूँ ( अर्थात्‌ मुठ जामामि र त यह पता है कि मेरी सेवाके कारण उन्होंने निद्रा गास लक्ष्मणस्थाअप खरूप मम्र सेवनम || २॥ |... ¦ न वि न र ग॥२॥ कोर आहार आदिको छोड रखा हैं )॥ २॥ किन्तु जञात्ववासमहं तृष्णीं भविष्यत्कार्यगौरवात । | इस आगामी कार्यकी कठिनताका विचार करके ही । मैंने यह सब जान-वूझकर भी अभीतक कुछ नहीं कहा ।” इत्युक्या लक्ष्मण ग्राह रामो ज्ञानवतां वरः 1। ३ || | विभीषणसे इस प्रकार कह ज्ञानियोंम श्रेष्ठ भगवान्‌ गच्छ लक्ष्मण सैन्येन महता जहि रावणिम्‌ | रामचन्द्र रक्ष्णजीसे बोढे--॥३॥ “या लक्ष्मण ! + यी तुम ओर हनुमान्‌ अ यूथ बड़ी हनूमअम्न। सपेयूथपैः सह लक्ष्मण॥ ४॥ सेनाके स न दि समल यूति; वहत है 1 साध जाओ ऑर रावणके पुत्र मेघनादको मारो ॥४॥ अपनी सेनाके सहित क्रक्षराज जाम्बबान्‌ पिभीषणवचः त्वा रामो वाक्यमथाजवीत । जाम्बवानृक्षराजोऽयं सह सैन्येन संद्रतः | युड्काण्ड २७७ [al विभीषणश्च सचिवैः सह त्वामभियास्यति ॥ ५ ॥ अभिङस्तस्य देहस्य जानाति विवराणि सः रामस्य वचनं शरुत्वा लक्ष्मण: सबिभीपणः ॥ ६ ॥ जग्राह काके भ्रे्ठमन्यद्ञीसपराक्रम! । Nee रामपादाम्बुज स्पृट्टा हृष्ट: सोमित्रिरन्नबीत्‌। ७॥ अद्य मत्कार्मुकान्युक्ताः शरा निमि रावणि्‌। गमिष्यन्ति हि पातारं खातु भोगवतीजले॥ ८॥ एवदरुकत्वा स सौमित्रिः परिक्रम्य प्रणम्य तम्‌ | -इन्द्रजिन्तिधनाकाङ्की ययौ त्वरितविक्रमः ॥ ९॥ वानरैनेहुसाहसेहेनूमान्धृष्ठतोऽन्वयात्‌ । विभीषणश्च सहितो मन्त्रिमिस्त्वरितं ययो ॥१०॥ जाम्बवता ऋक्षाः सौमिवि त्वरयान्वचुः "गत्या निङुम्मिलादेशं लक्ष्मणो वानरैः सद्ग ॥११॥ अपञ्य्करसङ्घातं दूराद्राक्षससङ्स्‌ । धनुरायम्य सौभि्रियेत्तोऽधूक्रिषिक्रमः | अङ्केन च वीरेण जाम्बवान्‌ राक्षसाधिपः । ४६. ४१, तदा विभीषण ग्राह सौमित्रि पश्य राक्षसान | (३| (3: अली यदेतद्राक्षसानीक मेघश्यामं विलोक्यते । अस्यानीकस्य महतो भेदने यत्रवान्‌ भव ॥१४॥ /”'शह्षसेन्द्रसुतो5प्यसिन्‌ मिक दृश्यों भविष्यति । अभिद्रवाशु यावहे नैतत्कर्मी समाप्यते ॥१५॥ जहि नीर दुरात्मानं हिंसापरमंधागिकम । विभीपणवचः श्रुस्वा लक्ष्मण! शुभलक्षणः ॥१६॥ घवर्ष शरवर्षाणि राक्षसेन्द्रसुतं प्रति | पापाणै! पर्वताग्रैथ दृवैश्व हरियूथपाः ॥१७॥ ल्य और मन्त्रियोंके सहित विभीषण तुम्हारे साथ जायेंगे ॥ ५॥ ये विमीषण उससे परिचित हैं. और उसके छिपनेकी समस्त कन्द्राओंको जानते हैं, ( अतः इनसे तुम्हें उसका पता छगानेमें बहुत सहायता मिलेगी ) |” रामचन्द्रजीके वचन सुनकर महापराक्रमी लक्ष्मणजीने बिभीषणको साथ छे अपना एक दूसरा उत्तम धनुष उठाया और अति प्रसन्नतापृवक भगवान्‌ रामके चरण- कमलका स्पर्श कर कहा ॥६-७॥ “प्रभो | आज मेरे धचुषसे छूटे हुए वाण राविण-पुत्र इन्द्रजितके शरीरको भेदकर भोगवती ( पाताळनाङा ) के जल्मे स्मान करनेके लिये पाताळलोकको चले जायेंगे” || ८॥ रघुनाथजीसे इस प्रकार कह सुमित्रानन्दन लक्ष्मण- जीने उनकी परिक्रमा की और इन्द्रजितको मारनेके लिये बड़ी तेजीसे चले || ९ ॥ उनके पीछे हजारों बानरोंके साथ हनुमानजी और मन्त्रियोंके सहित विभीषणने भी बड़ी शीघ्रतासे कूच किया ॥१०॥ तथा जाम्बवान्‌ आदि रीछ भी तुरन्त ही श्रीलक्ष्मणजी- के साथ चले । जिस समय बानरोंके सहित लक्ष्मणजी निकुम्मिकाके स्थानपर पहुँचे, उन्होंने दूरसे ही वहाँ राक्षसोंकी बड़ी भारी सेना एकत्रित देखी । तब महापराक्रमी ळक्षाणजी धनुष चढ़ाकर सावधान हो गये ॥११-१२॥ उनके साथ ही वीरवर अंगदके सहित जाम्बवान्‌ भी सावधान हो गये । तब राक्षसराज विभीषणने छक्ष्मणजीसे कहा--- “छक्ष्मण- जी | इन राक्षसोंको देखिये ! सामने जो मेधके समान श्यामवर्ण राक्षस-सेना दिखायी दे रही है इस प्रवल अनीको नष्ट करनेका यत्न कीजिये ॥१३-१४॥ इसके नष्ट हो जानेपर राक्षसराज रावणका पुत्र | इन्द्रजित्‌ भी दिखायी देने छोगा । इस कर्मके समाप्त होनेसे पहले ही तुरन्त धावा कर दीजिये ॥१५॥ हे वीर ! इस हिंसापरायण दुरप्मा पापीको आप शीघ्र ही मार डालिये |” विभीषणके वचन सुनकर शुभलक्षण छक्ष्मणने राक्षस- राजकुमार मेधनादकी ओर वाण बरसाने आरम्म किये तथा बानर-यूथपति मीसव ओरसे पत्थर, पवंत-शिखर और इक्षादिसे दैत्योपर प्रहार करने छगे। इसी २७८ ह्य RR एत कि? ोिो"के।णश),) sere अध्यात्मरामायण [ सर्ग ९ निर्जध्लु! सर्वतो दैत्यांस्तेडपे वानर्यूथपाच्‌। ' प्रकार राक्षसॉने भी वानरयृथपतियों आर त्रानर-सेना- जर ५ | पर परद्यु, तौदण त्राण, स्वडग, यदि आर तोमरादि परश्ववैः शितेर्बाणेरसिमियष्टिवोमर: ॥ १८) शाखोंसे आक्रमण क्रिया | तब वहाँ वदा भारी निजेष्लुर्वानरानीर्क तदा शब्दो महानभूत्‌ | कोळाहळ हुआ और राक्षस तथा वानरोंमे बड़ा घमासान स सम्महारस्तुयुळः संजज्ञे इरिरक्षसाम्‌॥१९॥ युद्ध छिड़ गया ॥१६-१९॥ दर ` अपनी सेनाका इस प्रकार दछित होते देण इन्द्रजित इन्दजिस्खवद सवेमथपान विलोक्य सः निकुम्भिछा आर होमका छाइकर बाहर आया॥२०॥ _निकुम्भिलां च होमं च त्यक्तया शीधं विनिगेतः२० और तुर्त हो रथपर चढ़ अत्यन्त क्रोथसे हाय रथमारह्य सधनुः क्रोधेन महताऽगमत्‌ ' भप ळे रणमूमिमं सागन आया तथा ल्वमण जीको के लिये ठलकारते इए बोडा--२१॥ “ख्दमण ! समाहयन्‌ स सोमित्रि युद्धाय रणमूधेनि ॥२१॥ में मेघनाद हैं, अब तुम सुस जीवित नहीँ वच सौमित्रे मेघनादोऽहं मया जीवन मोश्यसे , सक्त |” फिर वहाँ अपने चचा विभापणको देखकर ' वह कठोर दाच्दोंप कहने छगा ॥२२॥ “तुम इस लङ्गा- , 26 पुरीमं ही उत्पन्न हुए हो और इसीम रहकर इतने बड़े इहव जातः संबद्ध) साक्षाद्‌ भ्राता पितुस । हुए हो तथा मेरे पिताके सगे भाई हो, किन्तु अब्र यस्त्वं खजनद्भत्सुञ्य परभृत्यत्वमागतः ।।२३॥ | तुमने अपने स्त्रजनोंकों छोदघार इात्रओंका दास ९ , स्वीकार किया है ! ॥२२॥ में तुम्हारे पत्रक समान कथं दुहि पुत्राय पापीयानसि दुमेतित। ¦ हूँ, न जाने तुम कीमे मुझसे रोह कर रहे हो! इत्युकत्वा लक्ष्मणं दृष्ट्या हन्‌सत्पृष्ठतः खितम1२४॥ अय ही तुम बड़े पापी और दराव्मा हो 1” ऐसा कह उसने हतुमानूजीकी पीठपर वेठ हुए लक््मणजीको । ओर देखा ॥२४॥ तथा जिसमे नाना ग्रकारके तौक्ष्ण महाप्रमाणश्चद्यम्य घोरं विस्फारयन्धनुः॥२५॥ ' शत्र उपस्थित थे उस महान्‌ रथम बैठे हुए उस देत्य- ने एक बड़ा लम्बा धनुप उठाकर उसकी भवर टंकार अद्य वो मामका वाणाः प्राणान्पार्यान्त वानरा । | की ॥२५॥ और बोळा “अरे बानर ! आज मेरे चाण ततः शरं दाशराथिः सन्धायामित्रकर्षणः ॥२६॥ ` उम्हारे प्राणोंकों पियेंगे।” तत्र रोधसे सर्पक्रे समान फूफकारते हुए, शत्रका दमन करनेवाले, दरारधळमार SM 1 | लक्ष्मणजांन भा अपन परनुपपर एक वाण चढाकर उस नेत्र कर लक्ष्मणजीकी ओर देखा ॥२६-२७॥ तत्र इष्द्वा पितृव्यं स ग्राह निष्टुरमापणस्‌ ॥२२॥ उद्यदाशधनिस्िंशे रथे महति संखितः । ससज राक्षसेन्द्राय ऋद्धः सर्प इप श्वसन्‌ । शक्राशनिसमस्पशेलेक्षमषणेनाहतः शरेः । श्रोलक्ष्मणजीके छोड़े हुए इन्दवज्रक समान महा- ¢ Ne ०. च क मुहूतसभवन्मूढः पुनः प्रत्याहुतेन्द्रियः ॥२८॥ | कठोर वाणोंके लगनेसे वह एक मुहर्तके लिये अचेत हो ददशोवस्थित चीरं वीरो दशरथात्मजम्‌ । गया | फिर चेत होनेपर उसने अपने सामने दरारथनन्दन सोअबेचक्राम सामित्रि क्रोधसंरक्तलोचनः॥२९। | वीरवर लक्ष्मणजीको खडे देखा । उन्हें देखकर वह राक्षस शरान्ध्ुष सन्धाय लक्ष्मण चेदमन्रवीत्‌ । क्रोधसे नेत्र लाळ कर उनकी ओर दोडा ।२८-२९॥ तथा यदि ते प्रथमे युद्धे न इष्टो मे पराक्रमः ॥३०॥ | अपने धनुषपर वाण चढ़ाकर उनसे यों कहने लगा, “यदि युद्धकाण्ड २७९ २४४४४८७ ७७४४४७ ७७४७० NAPUS ६/९८३९:३४/०७./६:४०७०५५१९/९/९५/ अद्य त्वां दर्शयिष्यामि तिष्ठेदानीं व्यवस्थित: । | तूने पहले युद्धमें मेरा पराक्रम न देखा हो तो तैं तुझे अमी इत्युक्त्वा सप्तभिर्बाणैरमिविव्याध लक्ष्मणम।३१॥ दिखाये देता हूँ; द, जरा स्थिरतापूर्वक खड़ा रह |” दशमिश हनूमन्तं तीश्णधारैः शरोत्तमेः | ˆ | ' कड उस महाबौर्यवानूने सात वाणोसे रक्षणजी- ततः शरशतेनैव सम्भयक्तेन यीः को, बड़ी पैनी धारवाळे दश बाणोंसे हनुमानजीको नेने सन्मुक्तन वोयबान ॥२२॥ | और क्रोधसे दूने उत्साहे साथ मळी प्रकार छोड़े इए _कोधदिगुणसरुूधो निविभेद विभीषणम्‌ । | तौ बाणोंसे िमपगको वष डाळ! इधर लक्ष्मणजी | I SE | भी शत्रृपर वाणोकी वर्षा-सी करने लगे ॥३०-३३॥ लक्ष्मणोऽपि पथा श शरपरवाकिरत्‌॥३२। न वाणोसे छित्नमित्र होकर मेधनादका घुवर्णकी- तस्स बाणः सुसचिद्ध कवच काश्चनग्रभस्‌। सी आमावाछा कवच तिल-तिळ होकर रथके पिछले व्यशीयेत रथोपसे तिलशः पतितं भुवि ॥३४॥ | भागमें गिर पडा और फिर वहाँसे प्रथिबीपर जा गिरा र ~ त्म ' ॥३४॥ तब रावणकुमार मेंधनादने संप्राममें अत्यन्त ततः शरसहसण सडका राघणात्मजः । क्रोधित हो महापराक्रमी छक्ष्मणजीको हजारों बाणोंसे विभेद समरे वीरं ठक्ष्मणं भीमविक्रमम्‌ ॥३५॥ बोध बा २ इससे लक्ष्मणजीका दिव्य कवच व्यशीयतापतरिव्यं कवचे भी छिल्न-मिन्न होकर गिर पड़ा । इस प्रकार वे दोनों जा गवाम कवच उकसगस्य च! ह एकदूसरेी क्रियाका प्रतिकार करते हुए आपसमें कृतप्रातक्रठाल्यान्य वभूवतुरामिद्र्तों ॥३६॥ . छडने ठगे ॥३६॥ वे दोनों ही बारम्बार दीर्ध निःश्वास अभीइणं नि*श्वसन्ती तो युध्येतां तुपुलं पुन; | ' छोड़ते हुए बड़ा घोर युद्ध करने लगे । उनके शरीरोंके «५, (6९0७५ टु कय अङ्गमम्रत्यङ्घ सव ओरसे वाणोसे, छिन्न-मित्न होकर शरसंबतसबाज्ी सवतो रुधिरोक्षितो ॥२७॥ होू-डहान हो गये ॥९७॥ वे दोनों महापराक्रमी सुदीर्घकालं तो वीरावन्योन्य निशितैः शंरेः। . वीर बड़ी देरतक एक दूसरेपर तीखे-तीखे बाण छोड़कर न हि विव्जितो ; लड़ते रहे । उनमेंसे किसीकी भी जय अथवा पराजय अयुध्येतां महासत्ता जयाजयबिवर्जितों ॥३८॥ ` = हुए | ३८॥ एतसिन्नन्तरे वीरो लक्ष्मणः पञ्चभिः शेरे | ।, इतनेहीमें हक णच गन वाण | लेकर PN ५ | मेघनादके सारथि ओर धो्डीके सहित रथको चूण स सा प्ता स्वच समचूणेयत्‌ ॥२४॥ । कर डाला ॥३९। और अपने हाथकी सफाई दिखळाते चिच्छेद कामुक तस्य दर्शेयन्हस्तलाघवस । | हुए उसका धुप भी काट डाला | तब मेधनादने सोऽन्यत्त कामुक भद्रं सञ्यं चक्रे तरान्वित॥।४०। | तुरन्त ही दूसरा उत्तम धनुप चढ़ाया ॥४०॥ ल्क्ष्मण- ~ ~ ~ _ ~ १ जीने तीन वाणोसे उसे भी चाद डाला, और चिच्छेद भिराशुग्‌ः । कश hs हस्त भर | धनुप-हीन इए उस राक्षसको भी अनेक वाणों- ` तमेव छिन्नधन्वानं विव्याधानेकसायकैः ॥४१॥ : ३ बराध दिया ॥४१॥ फिर भीमविक्रम इन्दरजितने एक 1 a पुनरन्यत्समादाय कामुक भीमविक्रमः। | और घु डेकर सर्थके समान 'चमकीळे और पेने इन्द्रजिल्लक्ष्मण वाणः शितेरादित्यसन्निमेः ॥9२॥ | वाणोंसे सम्पूण दिशाको व्याप्त करते हुए लक्ष्मण- ~ ानसर्वान्माणे Os जी तथा समस्त वानरोंको वेध डाला | तब छक्ष्मणजी- भद वानरान्सवान्यागरा रर कर | ने ऐन्द्र वाण निकालकर उसे मेघनादकी ओर लक्ष्य उत ऐन समादाय रक्षणो रावणिं अति ॥४३॥ | र धनुपपर चढाया और उस कठोर घलुपको क्ण सन्धायाकृप्य कर्णान्तं कार्मुक दढनिष्टरम्‌। | पर्यन्त खचकर वीरवर लक्ष्मणजी हेदयमें भगवान्‌ उवाच लक्ष्मणो वीरः सरन्‌ रामपदाम्बुजम्‌।।४४। | रामके चरणकमळोंका स्मरण करते हुए बोटे--॥४२-- | \ “त ९ < ° ४ ७ ४४४४ ४४७१७११७४४ मिनी कल लत TTT 2:77777-४७७४७७छछए ७ ०७३५० ७+९८७७ ०४८४०५” ' धर्मास्मा सत्यसन्धश्च रामो दाशरथियेदि । त्रिलोक्यामग्रतिहन्दस्तदेन॑ जहि रावणिम्‌ ॥४५॥ इत्युकत्वा बाणमाकणो द्विकृष्य तमजिह्मगम्‌। लहमणः समरे वीर! ससर्जेन्द्रजित अति ।४६॥ स शरः सशिरखराणं श्रीमज्ज्वलितकुण्डलम्‌ । प्रसथ्येन्द्रजितः कायात्पातयामास भूतले ॥४७॥ ततः ग्रश्ुदिता देवाः कीतेयन्तो रघूत्तमम्‌ । बवषुः पुष्पवर्षाणि ` स्तुवन्तश्च महुमहु' ॥४८॥ जहषै शक्रो भगत्रान्सह देवेमहर्षिमिः । अध्यात्मरामायण Ep पक TTT Re vw ०५००४०५४५६०६०५ ६४-०*१४५१४:४१६१५०५०४४७९७४४ ४ pro IIT I nanny entaran nmnnang ame ४४ “यदि दहारथनन्दन भगवान्‌ राम परम धार्मिक, सत्यकी मर्यादा रखनेबाले और न्रिळोकीमें प्रतिद्वन्दी (मुकाविळा करनेवाले) से रहित हैं तो हे बाण ! तू इस मेघनादको मार डाळ'||४५॥ वीरवर ल्क्ष्मणजी- ने रणममिमें ऐसा कह उस सीघे जानेवाळे वाणको कानतका खींचकर इन्द्रजितकी ओर छोड दिया ॥४६॥ उस चाणने शीर्पत्राणके सहित इन्द्रजितके कान्तिमान्‌ मल्तकको, जिसमें अति उञ्ञ्बल कुण्डल झिळमिळा रहे थे, काटकर पड़से प्रृध्वीपर गिरा दिया ॥४७॥ इस प्रकार मेंघनादके मारे जानेपर देवगण प्रसन्न होकर रघुश्रेष्ठ लक्ष्मणजीका गुण गाने और उनकी । वारम्वार प्रशंसा कर पुष्प बरसाने लगे ॥४८॥ देवता और महर्षियोंके सहित भगवान्‌ इन्द्र अति हर्षित हुए। | उस समय आकारामण्डळमें भी देवताओंके नगार्डोका | शब्द सुनायी देने लगा ॥४९॥ रावणके पुत्र मेघनाद- विमरं गगनं चासीस्थिराभूड्धिश्रधारिणी । को मारा गया देख सर्वत्र जयजयकार शब्द भर ' निहतं रावणिं इट्टा जयजल्पसमन्वितः ॥५०॥ | गया | आकाश निर्मल हो गया और जगद्वात्री घरणी स्थिर हो गयी ॥५०॥ जब लक्ष्मणजीकी थकान उतर गयी तो उन्होने शङ्क बजाकर रणमूमिको गुञ्जायमान कर दिया और फिर भयङ्कर सिंहनाद कर अपने धनुपकी ठक्कार की ॥ ५१॥ उस सिंहनादसे समस्त वानरगण अति आनन्दित और श्रमहीन हो गये । फिर प्रसन्नचित्त वानर वीरोंसे प्रशंसित होते इए श्रीळक्ष्मणजीने उन सबके साथ प्रसन्न-मनसे श्रीरछुनाथजीके पास आ उनका दर्शन किया । श्रीलक्ष्मणजीने हनुमान्‌ और विभीपणके सहित अति विनयपूर्वक अपने ज्येष्ठ त्राता साक्षात्‌ नारायण- खरूप भगवान्‌ रामको प्रणाम कर कहा-“हे रघुश्रेष्ठ! आपकी कपासे इन्द्रजित्‌ युद्धमें मारा गया” ॥५२-५४॥ आकाशेऽपि च देवानां शुश्रवे दुन्दुभिस्वनः ४९॥। गतश्रमः स सौमित्रिः शङ्कमापूरयद्रणे। | सिंहनादं ततः कृत्वा ज्याशब्दमकरोद्विञ्चः।५१॥ देन नादेन संहृष्टा वानराश्च गतश्रमाः । वानरेन्द्रेथ सहितः स्तुवड्धिह्टमानसेः ॥५२॥ लक्ष्मणः परितुष्टात्मा ददर्शास्येत्य राघवम्‌। हनूमद्राक्षसाभ्यां च सहितो विनयान्वितः ॥५३॥ बवन्दे भ्रातरं रामं ज्येष्ठं नारायणं विशचुम्‌ । त्वत्ससादादधुभ्रे्ठ हतो रावणिराहवे॥५४॥ डवा तठकष्मणाङ्कक्त्या तमाहिङ्कच रघूत्तमः। लक्ष्मणजीके ये भक्तिमय वचन सुनकर श्रीरघुनाथ- जीने अति प्रसन्न होकर उनका आलिङ्गन किया और फिर प्रेमपूर्वक सिर सुँधकर कहा--॥५०॥ “लक्ष्मण | तुम धन्य हो ! मैं तुम्हारे इस कार्यसे Ea बहुत सन्तुष्ट टू, आज तुमने बडा ही 'कठिन काय . पमरन्दुम्‌॥५६।। | किया है। हे शन्नदमन ! इस मेघनादके मारे जानेसे - © कक (र सुध्न्येवप्राय मुदितः सस्तेहमिदमब्रबीत्‌ ॥५५॥ साधु लक्ष्मण तुष्टोऽसि कर्म ते दुष्करं कृतस। मेघनादस्य निधने जितं सग ९] काट | हि पयय्य्य्य्य्यप्प्य्ण्यप्ण्प्प्प्प्प्ण्प्प्क्प््प्प्प्प्प्प्फ्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प्णापपपपासट--------------........ Co ५५ अहोरात्रेश्षिभिवीरः कथञ्चिद्विनिपातित।। ` | हमने मानो सभी कुछ जीत लिया. ॥५६॥ तुमने दि है 1 1. तीन दिन और तीन रात्रितक निरन्तर संग्राम कर . घिसपतः कृतोऽस्म्यद्य निय[स्यति हि रावणः ५७ किसी प्रकार उस महान्‌ योद्धाको मार डाल । इससे न न्या योड ठं इनिष्या आज तुमने मुझे शन्नुहीन कर दिया। अब पुत्र-शोकसे : उनशाकाच्पया योडु त हनिष्यामि रावणम्‌ ।५८। | व्याकुळ हुआ रावण मुझसे छड़ने आयेगा, सो उसे मैं मार डागा” ॥५७-५८॥] | |; मेषनाद्‌ इतं श्रुत्वा लक्ष्मणेन भह्दावलम्‌। । महाबळी मेघनादको छक्ष्मणजीद्वारा मारा गया ' रावणः पतितो भूमौ मूच्छितः पुनरुत्थितः । | छुन रावण मूर्च्छित होकर पएथिवीपर गिर पड़ा और विललाशातिदीनात्मा दुत्रशोकेन रावणः ॥५९॥ | र प वपर इक असनत दीन होकर NR बिळाप करने लगा ॥५९॥ पुत्रके गुण और कर्मोका पुत्रस्य गुणकमोणि संसर्पर्यदेवयत्‌। ' स्मरण कर वह अत्यन्त शोक करने छगा। 'आज अद्य देवगणाः सर्वे लोकपाला महर्षयः ६०) | समस्त देवता, डोकपाळ और महर्षिगण इन्द्रजितको हतमिन्द्रजितं जात्या सुखं खप्सन्ति वर्भयाः। । गरा गया सुनकर निर्भेयतापूर्वक कक सोव त्यादि बहुशः पत्रजारसो विललाप ह॥६१॥ । इस प्रकार पुत्रकी आसक्तिवश वह माँति-माँतिसे विळाप हु 3 ७ करने छगा ॥६०-६१॥ तदनन्तर राक्षसराज रावण ततः परमसङ्क्रुद्धो रावणी राक्षसाधिपः |, अत्यन्त क्रुद्ध हो अपने शनुर्भोको युद्धम नष्ट करानेकी उवाच राक्षसान्सवान्निनाशयिपुराहवे ॥६२॥ ¦ कामनासे समख राक्षसोसे वातचीत करने ल्गा ६२ स पुत्रवधसन्तप्तः शूरः क्रोधवणं गतः । | फिर, शूरवीर रावण पुत्र-शोकसे व्याकुल हो अपनी n । बुद्धिसे कुछ सोचकर करोधपूर्वक सीताजीको मारनेके लिये संवीक्ष्य रावणो बुद्धया हन्तुं सीतां बरद ऐसे हेत रावणा इद्धया इन्द साता ग्रहन ॥ ९२ , ना (अर्थात्‌ शोक और क्रोषककारण वह ऐसे निन्य सङ्गपाणिमथायान्तं क्रदं दृष्टा दशाननम्‌ । | कर्मको हो अपना कर्तव्य मान बैठा) ॥६३॥ रावण- न है ! को हाथमें खङ्ग लिये क्रोधपूवेक अपनी ओर आता देख राक्षसीम ध्यगा सीता भयशोकाङुलाऽमेषत्‌ ॥९४॥॥| राक्षसियोंके बीचमें बैठी हुई सीताजी भयभीत हो एतसिनन्तंरे तस्य सचिवो बुद्धिमान्‌ शुचि)। गयीं ॥६४॥ इसी समय रावणके लुपाझ नामक क काका मन्त्रीने, जो परमबुद्धिमान्‌ झुद्ध-हदय और विचार- सुपाश्वा नाम मधावा रावण घाक्यमत्रवीत्‌ ॥६५॥ | वान्‌ था, उससे कहा-।।६५॥। “अहो दशानन | यह क दे , | क्या £ आप तो साक्षात्‌ विश्रवानन्दन कुवेरजीके ननु नाम दशय्रीव साक्षाइश्व॒णाजुतः । | छोटे भाई हैं, बेदबिद्यामें निपुण और यज्ञान्तमे NAN चेदविद्याप्रतखातः खकर्मपरिनिष्टितः ॥६६॥ | ज्ञान करनेवाले एवं खधर्मपरायण हें ॥६६॥ इस हि ॥॒ हे प्रकार अनेक गुणसम्पन होकर भी आप खी-वध अनेकगुणसम्पन्नः कथं खीवधमिच्छसि । करना कैसे चाहते हैं ? हम सबको साथ ठेकर आप ५ और ढक्ष्मणको. युद्धमे मारकर बहुत सप्र टक $ युद्धे व कमण | राम अं हे असामिः सहितो ददे हत्या रामं चछ ५ प्‌ जानकीको प्राप्त कर छेंगे।” सुपारवंके इस प्रकार प्राप्स्यसे जानकी शीघ्रमित्युक्तः स न्यवतंत ॥६७) समझानेपर रावण लोट आया ॥६७॥ ततो दुरात्मा सुहृदा निवेदितं तदनन्तर दुरात्मा रावण अपने बन्धुके कहे इए वचः सुधर्म्य प्रतिगृह्य रावणः । धर्मामुकूल थाक्योंको प्रहणकर शोकसे मूढुडि हो तुरन्त 3६ De रू १८१ अध्यात्मरामायण [ सम्‌ १० गृहं जगामाशु शुचा विसूढधीः अपने घर गया और फिर दूसरे दिन अपने बन्धु- पुनः सभां च प्रययो सुहदद्तः ॥६८॥ । वान्धवोंके साथ समामें आया ॥६८॥ — er ‘ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे नबमः सर्गः ॥९॥ — So दशम सर्ग रावणका यज्ञ-विध्वंख तथा उसका मन्दोदरीको समभाना | श्रीमहादेव उवाच ' ्रीमददादेवज्जी योळे-हे पावेति! फिर रावण सभा- स विचार्य सभामध्ये राक्षसैः सह मन्त्रिसिः । में अपने राक्षस-मन्त्रियोंके साथ विचार कर पतङ्ग I यचे , जिस प्रकार अन्यान्य पतङ्घोंके साथ प्रज्वलित अग्निपर नि्ययो येऽवशिष्टा $ सह राघवम्‌ ॥ १ ॥ ' र लता कया प प्र पे । गिरता है उसी प्रकार वचे-खुचे राक्षसोंको लेकर रघु- शलः शैः प्रज्वलल्तमिवानलम । । नाथजीके पास चला; किन्तु श्रीरामचन्द्रजीने उन समस्त ततो रामेण निहताः सर्वे ते राक्षसा युथि॥ २ ॥ | राक्षसोंको युद्वमें मार डाला॥१-२॥ और खयं रावण खर्य रामेण निहतस्तीक्ष्णव्ाणेन वक्षसि । | भी हृदयमें भगवान्‌ रामका तीक्षण वाण छगनेसे व्याकुछ व्यथित॒स्त्वरित लड्ढां प्रविवेश दुशाननः ॥ ३॥ | हो तुरूत छङ्कामें लौट आया ॥३॥ दृष्टा रामख बहुशः पोरुपं चाप्यमानुपमू | भगवान्‌ राम और हलुमानूजीके वहुत-से अति- च्य © त मारते शोतं शक्रान्तिकं ययौ मानुष पौरुष देखकर रावण अति शीप्रतासे झुक्राचाये- [वणो मारुतेश्चव स्तक यया ॥ ४ || जीके गैर उन्हें रावणा मा शी शुक्रान्तिक य जीके पास गया 11४॥ और उन्हें नमस्कार कर वह नमस्कृत्य दशग्रावः शुक्र प्राक्ञलिरत्वदीतू । हाथ जोड़कर .कहने ल्गा-“'भगवन्‌ ! रामने समस्त -यूथंपांके J भगवन्‌ राघवेणेवं उङ्का राक्षसयूथेः ॥ ५॥ | राक्षस-यू्ंपाके सहित छक्कापुरी नष्ट कर दी और नी मिनिट जितने बड़े-बड़े दैत्य और मेरे बन्घु-बान्धव थे वे सभी विनाशिता महादैत्या निहताः पुत्रवान्धवाः। >> hs Le, RN | मार डाले आप-जैसे सद्शुरुके रहते ह्मे यह महान्‌ कथं मे दुःखसन्दोहस्त्वाये तिष्ठति सदूगुरो ॥ ६ ॥ | दुःख क्यों देखना पड़ा ?? ॥५-६॥| रावणके इस प्रकार इति विज्ञापितो दैत्यगुरुः ग्राह दशाननम्‌ । | प्रार्थना करनेपर दैत्यगुरु शुकाचार्यजीने उससे कहा-- ~. व्र ल्« + 11 | जैसे > किसी ~ , होमं कुरु प्रयत्नेन रहसि त्वं दशानन ॥७॥ हे दशानन तुम जेसे हो सके वेसे किसी एकान्त ५ RO देशमं हवन करो ।।७॥ यदि तुम्हारे हवनमें कोई यादे बिप्नो न चेद्धोमे तहिं होमानलोतस्थितः 1८ ॥ | विष्न न हुआ तो उस होमाग्निसे एक बहुत बड़ा महान्‌ रथश्च वाहा चापतूणीरसायकाः। | रथ, घोडे, धनुष, तरकश ओर वाण उत्पन्न होंगे । सम्भविष्यन्ति तेयुक्तस्त्वमजेयो भविष्यासि॥ ९ || ऽ पाकर तुम अजेय हो जाओगे ॥८-९ मेरे दिये नात इए मन्त्रोको ग्रहण करो और इनसे तुरन्त जाकर ग्रहाण मन्त्रान्मदत्तान्‌ गच्छ होमं कुरु डुतय्‌। | हवन करो [” इत्युक्तस्त्वरित गत्वा रावणो राक्षसाधिपः ॥१०॥ झुक्राचार्यजीके इस प्रकार कहनेपर राक्षसराज जहा पातालसच्शा मन्द्र स्ते चकार ह | रावणने तुरन्त ही जाकर अपने महळमें एक पाताळके २८३ उङ्काद्वारकपाटादि वद्धा सवत्र यत्ततः ॥११॥ | समान गम्भीर शुदा तैयार करायी और बड़ी साबधानीसे होमद्रव्याणि सम्पादय यान्युक्तान्याभिचारिके | A N+ गुहां प्रविश्य चैकान्ते मौ {उत्थितं धूममारोक्य महान्तं रावणाचुजः रामाय दशयामास हामधूम भयाङुलः ॥१३॥ पश्य राम ददाग्रीयो होमं कतु समारभत्‌ । ळङ्काके सब द्वारोंके फाटक आदि बन्द करा दिये१०-१ १ तथा शाख्ोमें अभिचार कर्मोंकी जो-जो हवन-सामग्रियाँ बतायी गयी हैं वे सब एकत्रित कीं और गुद्दामें घुसकर ना हाम प्रचक्रमे ॥१२॥ | एकान्तर्मे मौनावळम्बनपूर्यक होम करने ल्गा॥ १२॥ तब रावणके छोटे माई विमीषणने बड़ा भारी धुआँ उठते देख अति भयभीत हो उसे श्रीरामचन्द्रजीको - दिखाया ॥१३॥ (और कहा--)“हे राम ! देखिये, दशशीशने हवन करना आरम्भ किया है; यदि यदि होमः समाप्तः खात्तदाब्जेयो भविष्यति।१४। पठ हवन ( नि्िश्) समाप्त हो गया तो वह अजेय अतो विघाय होमस्य मेपयाशु हरीश्वरान्‌ । हो जायगा ॥१४॥ अतः इसमें विश्न डाळनेके लिये शीघ्र ही वानर-सेनापतियोंको भेजिये |” तब रघुनाथजीने तथेति रामः सुग्रीयसम्मतेनाङ्गदे कपिम्‌ ॥१५॥ । अच्छा! कहकर सुमीवकी सम्मतिसे कपिवर अंगद और इनूमलमुखान्मीरानादिदेश महावलान्‌ । प्राकार खद्घयिस्वा ते गत्या रावणमन्दिरम्‌ ॥१६॥ दशकोटयः पुवज्ञानां गत्वा मन्दिररक्षकान्‌। चूर्णयामासुरक्षांथ गबांश्च न्यहनन्‌ क्षणात्‌ ॥ १ ७॥ ततश्च सरमा नाम प्रभाते हस्तसंज्ञया । विभीपणस्य मायी सा होमखानमक्चयत्‌ ॥१८॥ गुदापिधानपापाणमङ्गदः पादघइनेः । चूर्णयिरवा महास; ग्रविवेश महागुहाम्‌ ॥१९॥ दृष्टा दशानन तत्र मीलिताक्षं दृढासनम्‌ । ततोऽङ्गदाङ्ञया सर्वे वानरा विविशुररतम ॥२०॥ तत्र कोलाहलं चक्रस्ताउयन्तअ सेवकान्‌ | सम्भारांशरिक्षिपुस्तस्य होमकुण्डे समन्ततः ॥२१॥ सुवमाच्छि्य हस्ताव रावणस्य वलाहुपा । तेनैव सप्घानाशु हंनूमान्‌ प्छवगाप्रणीः ॥२२ी परन्ति दन्तेथ काप्टेथ वानरास्तमितर्ततः । हनुमान्‌ आदि महात्रळवान्‌ वानर-वीरोंको आज्ञा दी । वे सब नगरके परकोटेको छाँधकर रावणके महलपर पहुँचे ॥ १५-१६ |) इन दश करोड़ वानरोंने वहाँ पहुँचकर महलके द्वारपाशेंको चूणे कर डाला और एक क्षणमे ही बहुत-से घोड़ों तथा हाथियोंका संहार कर दिया ॥ १७] ( इस प्रकार छट्कामें रातभर बड़ा भारी कोलाहल मचा रहा ) । प्रातःकाल होते ही विभीषणकी भार्या सरमाने हाथके संकेतसे होमस्थान बतछा दिया ॥१८॥ गुहाको दँकनेके लिये उसके मुखपर रखे हुए पत्थरको महापराक्रमी अंगद पैरकी ठोकरसे बूर-चूरकर उस महाकन्दरामें घुस गये॥ १९ ॥ वहाँ उन्होंने रावणको नेत्र मूँदे, दृढ आसन छगाये बैठे देखा | तदनन्तर अंगदजीकी आज्ञासे समस्त वानरगण तुरन्त उस गुहामें घुस गये ॥ २० ॥ गुहामें घुसकर वे सेवकोंको पीटने और बड़ा मारी कोलाहृल करने लगे, तथा जहाँ-तहाँ . रखी हुई यज्ञ-्सामग्रीको उन्होंने हवनकुण्डमें डाळ दिया ॥ २१ ॥ वानराग्रणी हतुमानजीने अति रोष- पूर्वक बळात्कारसे रावणके हाथसे खुबा छीनकर उसासे उसपर आधात किया ॥ २२ ॥ वानरगण 'रावणपर इघर-उघरसे दाँतों और लकडियासे प्रहार कर रहे थे; किन्तु उसने विजयकी कामनासे इस प्रकार आहत न जहौ रांवृणे ध्यानं हतोऽपि विजिगीषया | नपर भी अपना ध्यान नही छोड़ा ॥ २३ ॥ RSI ees ~ ~ २८४ अध्यात्मरामायण [सगे १० Me ्रविश्यान्तःपुरे वेश्मन्यङ्गदो वेगवत्तरः । | तव अन्त वेगवान्‌ अंगदजी अन्तःपुरमें जाकर केश डु न | तुरन्त ही शुभलक्षणा मन्दोदरीकों चोटी पकड़कर समानपत्केशवन्धे इत्वा मन्दोदरी भास्‌ ॥२४॥ द „| २४॥ और रावणके सामने ही उन्होंने रावणस्यैव पुरतो विलपन्तीमनाथवत्‌ । ` अनाथके समान विलाप करती हुई मन्दोदरीकी रन्न" कञ्च पि जठित कुकी ( चोळी) फाड डाळी ॥१५॥ उसके मोती बिददाराङ्कदस्तस्या। कञ्चुक सलत ॥२५॥ | टू रतसमूदके सहित सव ओर विसर गये, मक्ता विमुक्ताः पतिताः समन्ताद्रत्सश्चयः। | | इसी प्रकार ) मन्दोदरीकी रत्जदित फरधनी भी श्रोणिसत्रे निपतितं जटितं रत्तचित्रितस्‌ ॥२६॥ | हटकर पृथिवीपर गिर पड़ी ॥ २६ ॥ रावणक देखते- 1 3 | देखते ही उसके अधोषलका बन्धन दीठा पडकर कठिप्रदेशाद्विसरस्ता नीवी तस्यैव पश्यतः । | ८टिप्रदेदासे खिसक गया और समस्त आभूषण जहाँ- भूषणानि च सर्वाणि पतितानि समन्ततः ॥२७॥ | तहो गिर गये | २७ ॥ ऐसे ही अन्यान्य बानरगण _ ९ ल र , भी कुतृहृळवश देव और गन्धर्व आदिकी कन्याओंको देवगन्धवकन्याथ नाता हूः प्लवज्ञमः । | ( जो रावणकी पल्लियाँ थीं ) पकड छाये । तत्र मन्दोदरी मन्दोदरी रुरोदाथ राबणस्याग्रतो भृशम््‌ ॥२८॥ | रावणके सामने अत्यन्त विलाप करने लगी ॥ २८ ॥ और करुणावद अति दीन होकर रावणसे कहने लगी, | “अहो ! तुम बड़े निरु हो । तुम्हारे सामने ही झत्र- निलेजोऽसि परेरेवं केशपाशे विकृष्यते ॥२९॥ | गण तुम्हारी मार्याको चोटी पकड़कर खींच रहे हैं, १3 शरा _ और फिर भी तुम हवन कर रहे हो ! क्या तुम्हें साया तवव पुरतः कि जुहो न लजसे। उजा नहीं आती ? जिसकी भायीको उसीके सामने हन्यते पश्यतो यस्य भाया पापैश्च शत्रुमिः ॥३०॥ | पापी शनुगण मारते हों उसे तो वहीं मर जाना चाहिये । उसके जीनेसे तो मरना ही अच्छा है । हा मेघनाद ! आज तेरी माता वानरोंके हाथोंमें हा मेघनाद ते माता ह्लिइयते वत वानरे! ॥३१॥ | पड़कर क्डेश पा रही है ! ॥ २९-३१ ॥ बेटा! NS SES तेरे जीते रहनेपर मुझे यह दुःख कयां देखना पड़ता ? be “इल नक सत्‌ । मेरे पतिने तो अपना जीवन वचानेके लिये अपनी भाया रज्ञा च सन्त्यक्ता मत्री मे जीविताशया।३२) खी और ल्जासे भी मुँह मोड लिया है !”॥ ३२॥ क्रोशन्ती करुणं दीना जगाद दशकन्धरम्‌ । सेव्यं तेन तत्रैष जीवितान्मरणं वरम्‌ | त्वा तद्देवित राजा मन्दोदर्या दशाननः । मन्दोद्रीका यह विलाप सुनकर राक्षसराज रावण उत्तस्ो खङ्ग मादाय त्यज देवी मिति घुवन्‌ ॥३३॥| | हाथमें खड्ग लेकर अरे देवीको छोड़ो' यों कहर्ता जधानाङ्गदसव्यग्रः कटिदेशे दशाननः | हुआ उठा ॥ ३३ ॥ रावणने उठते ही अंगदजीकी कमरमें प्रहार किया तव समस्त वानरगण उसका महा- यज्ञ विध्वंस कर वहाँसे चल दिये ॥३४॥ और सवके सव अति प्रसन्न हो रघुनाथजीके पास आ उपस्थित हए ॥३५॥ रावणस्तु ततो भार्यामुवाच परिसान्त्वयन्‌ । तब रावण अपनी भायी मन्दोद्रीको ढॉब्स बँधाते इए वोळा-“हे कल्याणि ! ये सुख-दुःखादि दैवके अधीन हैँ-जीता हुआ प्राणी कया नहीं देखता ! तदोत्सृज्य ययुः सर्वे रिध्बंस्य इवनं महत्‌ ॥३४॥ राम (जा च्य; ne रामपाश्वेयरुपागम्य तस्थुः सर्वे प्रहर्षिता। ॥३५॥ के Ne ~ ~ ~ दवाधानामेद्‌ भद्रे जीवता कि न इश्यते । सग १० | युद्धकाण्ड - संग १०1 इदा ` २८५ २८५ त्यज शोकं विशालाक्षि ज्ञानमासम्ब्य निश्चितम्‌ | अतः हे विशाळनयनि ! इस निश्चित ज्ञानका आश्रय- अज्ञानप्रभवः शोकः शोको ज्ञानविनाशकृत्‌ ॥३६॥ हे जो शोक छोड दो | २६ || शोक अज्ञानसे होता विधि और वह ज्ञानको नष्ट कर देता है। शरीरादि अज्ञानप्रभवा5हन्धी! ष्वनात गणे अहि भी ज्ञ ह्‌ धी शरीरादि बनात ॥२ | जनात-पदायोमे अहुद्धि मी अज्ञानसे ही होती है तन्सूः एुत्रदाराशदसम्वन्धः ससातस्तवः। ` ॥३७॥ इस मिथ्या अहंकारके कारण ही पुत्र, स्री आदि- दर्पशोकभयक्रोधलोभमोहस्प्रहादयः ॥३८॥ | का सम्बन्ध होता है और इन सम्बन्ोमें आसा होनेसे दि | ही जन्म-मरणरूप संसार तथा हष, शोक, भय, क्रोध , | बी 1 4 ॥। 2 जानता लेते _ अन्मशर्जरादयः । होम, मोह और स्पृहा आदि होते हैं॥ ३८॥ ये आत्मा तु केवलः शुद्धो व्यतिरिक्तो लेपकः ।३९। | जन्म, मृत्यु और जरा आदि अवस्थाएँ अज्ञान-जन्य ही आनन्दरुपो ज्ञानात्मा सर्वभावविवर्जित:। | दै । थाणा तो एकमात्र, झुद्ध, समसे पृथक और असंग RR । है || ३९ || वह आनन्दखरूप, ज्ञानमय और समस्त न संयोगो वियोगो वा विद्यते केनचित्सतः॥।४०॥ | भावोंसे रहित है। उस सत्खरूपका कमी किसीसे एवं ज्ञात्वा खमात्मानं त्यज शोकमनिन्दिते। संयोग-वियोग नहीं होता ॥ ४०॥ हे अनिन्दिते ! इदानीमेव गच्छामि हत्वा रामं सलक्ष्मणम्‌ ॥४१॥ | अपने आत्माका ऐसा खरूप जानकर तुम शोक छोड ० _ दोड मैं अमी जाता हूँ, और या तो लक्ष्मणसह्दित रामको आगमिष्यामि नोचेन्मां दारयिष्यति सायकेः। . मार कर ही आऊँगा या श्रीराम ही अपने वज्रसदददा श्रीरामो वजूकल्पेश् ततो गच्छामि तत्पदस्‌॥४२। | वाणोसे मुझे छिन्न-मिन्न कर देंगे | तब मैं उनके पदको 3 0 „^ . प्राप्त होऊगा ॥४१-४२॥ हे प्रिये ! मेरी आज्ञासे तब् तदा त्वया में कतव्या क्रिया मच्छासनात्िय। : तुम मेरे लिये एक काम करना; तुम सीताको मारकर छः छू ७ ७७ य । शि र सीतां हसवा यया साथ त्व्‌ प्रन्यास पावकस्‌। ४ दे ॥ |; उसे लेकर अग्रिम प्रवरा कर जाना” ॥ ४ ३ ॥ | एवं श्रत्वा वचस्य रावणस्यातिदुःखिता। , रावणके ये वचन छुनकर मन्दोदरौने अति दुःखित उवाच नाथ मे वाकयं शृणु सत्य तथा कुरु ॥४४॥ | टोकर कहा-“प्रमो ! मैं आपसे ठोक-ठौक, बात | कहती हुँ, आप उसे सुनकर वैसा ही कीजिये || ४४। शक्यो न राघवो जेतुं त्यया चान्येः कदाचन। । रम तुमसे अथवा और भी किसीसे कमी नहीं जीर रामो देववरः साक्षात्रधानपुरुपेश्वरः ॥४५॥ जा सकते । देवाधिदेव भगवान्‌ राम साक्षात्‌ प्रकि मत्स्यो भूत्या पुरा कर्पे मनु घेवखव प्रः । | और पुरुषके नियामक हैं ॥४५)| भक्तवत्सळ रघुनाथजी | _ ने ही कल्पके आरम्ममें मत्स्यरूप होकर वेवखतमनुका ररक्ष सकलापळूयो राघयो भक्तवत्सलः ॥४६। | त आपत्तियोंसे रक्षा की श्री ॥ ४६॥ भगवान्‌ रामः कूर्मोड्मचत्पूर्व लक्षयोजन विस्वृतः । राम ही पूर्वकामें एक लक्ष योजन विस्तारवाळे कच्छप समुद्रमथने पठे दधार कनकाचरम्‌॥४७॥ | हुए थे और समुद्र-मन्थनके समय इन्हींने अपनी पीठ- 9. र है र व्यण्याभोइतिदर्वतो हतोऽनेन महार पर सुमेरु पर्वतको धारण किया था ॥ ४७॥ किसी - हरण 5 तदु तो हताउनन महात्मना । राका ह समय वराहरूप धारण कर पृथिवीका उद्धार करते समय क्रोडरूपेण चपुपा ोणीध्ुद्रता कचित्‌ ॥४८॥ हो महान महाहुराचारी दिरण्याक्ष दैतयको मारा त्रिलोककण्टकं देत्यं हिरण्यकशिपु पुरा | था || ४८॥ इन रघुनन्दनने ही शृसिंह-शरीरसे हतवान्नारसिंदेन वयुपा रघुनन्दनः॥४९॥ | त्रिहोकीके कण्टकरूप हिरण्यकशिपु दैत्यको मारा 'अध्यात्मरामायण [सभ्‌ १० २८६ ~ Ne fe त्त्र विक्रमेत्रिमिरेवासी बलि बद्धा जगत्त्रयम्‌ । या ॥ ४ त निळोकीकी तीन ही पो आक्रम्यादात्सुरेन्द्राय भृत्याय रघुसत्तम। ॥५०॥ | _पकर अपने सेवक इन्द्रको दे दिया था॥५०॥ राक्षसाः क्षत्रियाकारा जाता भूमेभरावहाः | | जिस समय राक्षसगण क्षत्रियकपसे उत्पन होकर क त न्या पृथिवीके भाररूप हुए तव इन्हींने परशुरामरूपसे _ तान्हत्वा बहुशो रामो झव जित्वा ह्यदान्छुनेश।५१॥ उन्हें कई वार संग्रामो गारा और परथिवीको जीत: “ स एव साम्प्रतं जातो रघुवंशे परात्परः । कर उसे कद्यप सुनिको दे. दिया ॥ ५१ ॥ इस समय ` भवदर्थे रघुभ्ेष्ठो माहुपत्वमुपागतः ॥५२॥ | येही परात्पर प्रश रघुवंशमें रामझूपसे अवतीर्ण होकर ॒ oe कं आपके लिये मनुप्यरूप इए ह. ॥५२ ।। आपने उनका ` तस्य सायां किमथ वा हृता साता बनाद्गलात्‌। | द्वी सीताको मेरे पुत्रके नाशके लिये और अपनी भी मम पुत्रविनाशार्थ खस्याडपि निधनाय च ॥५३॥ मौत बुलानेके लिये भला, वढात्कारसे तपोवनसे क्यों ' उ प वा घेनेरी 3 जे चुरा लिया 71 || ५३ ॥ आप अब भी जानकीकों ही त ना देही i सबूत । रघनाथजीके पास भेज दीजिये; फिर विर्भाषणकों विभीषणाय राज्यं तु द्वा गच्छामहे वनम ।५४।| | राज्य देकर हम वनको चढेंगे” || ५४ ॥ मन्दोदरीवच। शस्या रावणो वाक्यमत्रत्रीत्‌ । मन्दोदरीके वचन इनक रावण वोा--"अयि ५, - भद्रे | युद्भमे रघुनाथजीसे अपने पुत्र,ज्ञाता और राक्षस- कथे भद्रे रणे राच आहूनू राक्षसमग्डळयू ॥५५॥ समूहका नाझ कराकर भला में वनवासी होकर केसे घातयित्वा राघवेण जीवामि वनगोचरः । जीवन काट सकता हुँ ? अब तो में भी रामके साथ ` रामेण सह योत्स्यामि रामबाग! सुशीम्रगैः ॥५६॥ | उद करेगा और उनके सातरगामी बाणो विद होकर ~ _ व यया उन विष्णुमगवानके परमधामको जाऊँगा। में रामको ` बिदार्यमाणो यास्यामि तदिष्णोः परमं पदम्‌। | साक्षात विष्णु और जानकीको भगवती ळी जानता '' जानामि राघवं विष्णु लक्ष्मी जानामि जानकीस। | हँ । और यह जानकर ही कि 'रामके हाथसे मरकर लि ५. a उनका परमपद प्राप्त करूँगा में जनकनन्दिनी | ताल जानकी सीता मया55नीता वनाद्वरात्‌५७| सीताको बलात्कारसे तपोबनसे हे आया था। हे प्रिये ! रामेण निधन प्राप्य यास्यामीति परं पदम्‌ । अब मैं तुम्हें छोड़कर अपने अन्यान्य राक्षस वीरोंके साथ ` वियुच्य त्वां तु संसाराष्ट्रमिष्यामि सह प्रिये ॥५८॥ | संसारसे कूच करूंगा॥ ५५-५८ ॥ और मुसुक्षुगण क ब जिस परमानन्दमयी विशुद्ध गतिका सेवन करते हैं, परानन्दमयी शुद्धा सेव्यते या मुमुक्षमि! । संग्राममें भगवान्‌ रामके हाथसे मरकर मैं उसी गतिको तां गतिं तु गमिष्यामि इतो रामेण संयुगे ॥५९॥ | रा करूँगा |५९॥ इस प्रकार अपने समस्त पाप-पुञ्जका RP ~ ्रक्षाळन कर मैं दुम मोक्ष-पद प्राप्त करूँगा॥ ६०॥ . प्रक्षाल्य करमषाणीह मुक्ति यास्यामि दुल क RT दुलेभास्‌ ९१| जिसमें ( अविद्या, अस्मिता, राग, हेप और अभिनिवेश छशादपश्चकतरज्गयुत अमाळ्य नामक ) पाँच छेश ही तरंगे हैं, भ्रमरूप भवरे दारात्मजाप्तधनवस्धरुझपाभियुक्तम्‌। | हैं। खो पुत्र खजन विभव और बन्धु आदि म्य औरवीनलाभनिजरोषमनङ्गजालं हैं, अपना क्रोधरूपी वड्वानळ है तथा कामरूपी अ जाळ फेलाया हुआ है उस संसार-सागरको पारकर अब ससारसागरमरतात्य हर्‌ घ्रजामे ६१ | मैं ्रीहरिके निकट जाऊँगा” ॥ ६१ ॥ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्‍वरसंवादे युद्धकाण्डे दशमः सगः ॥ १०॥ . ७७ SR pp युद्ध काण्ड २८७ एकादश सर्गे राम-रावण-संग्राम और रावणका बघ | श्रीमहादेव उवाच इत्युक्त्या वचनं प्रेम्णा राज्ञीं मन्दोदरी तदा। /रावणः प्रययौ योड रामेण सह संयुगे ॥ १॥ ५ दं स्यन्दनमास्याय इतो घोरेनिशाचरेः । चक्रैः पोडशभिर्यृक्तं सवरूथं सङूवरम्‌ ॥ २ ॥ पिशाचवदनेवारेः खरेयुक्ते भयावहम्‌ । सर्वास्शस्रसहितं सर्वोपस्करसंयुतम ॥ ३॥ निश्रक्रामाथ सहसा रावणो भीषणाकृतिः | आयान्तं रावणं दृष्टा भीपणं रणकर्कदास्‌ ॥ ४॥ सन्त्रस्ताऽभूत्तदा सेना वानरी रामपालिता ॥५॥ हनुमानथ चोत्प्लुत्य रावणं योदुमाययो | आगत्य हनुमान रक्षांबक्षस्यतुठविक्रमः ॥ ६॥ मुश्विन्ध दृढ़ वद्ध्वा ताडयामास पेगतः । तेन गुप्टिप्रहरेण जानुभ्यामपतद्रथे ॥ ७॥ मूच्छितो5्थ मुहूतंन रावणः पुनरुत्थितः । उबाच च इनूमन्तं शूरोऽसि मम सम्मतः ॥ ८ ॥ हनूमानाह तँ धिड्मां यस्त्वं जीवसि रावण । त्वे तावन्यमुष्टिना वक्षो मम ताउय रावण ॥ ९ ॥ पश्चान्मया हतः ग्राणान्माक्यसे चात्र संशयः । _ तथेति मुशिना वक्षो रावणेनाऽपि ताडितः ॥१०॥ विधूर्णमाननयनः किञ्चित्कहमलमाययो । संज्ञामवाप्य कपिराद रावणं हन्तुम्रुबतः ॥११॥ ततोऽन्यत्र गतो भीत्या रावणो राक्षसाधिपः। हनूमानड्ूदओव नलो नीलख्रयैव च ॥१२॥ चत्वारः समवत्याग्रे इृष्टा राक्षसपुङ्गवान्‌ । अग्निवर्णं तथा सर्परोमाणं खङ्भरोमकस्‌॥१ | श्रीमहादेचजी बोले--हे पार्वति ! महारानं मन्दोदरीको प्रेमपूर्वक इस प्रकार समझा-बुझाकर रावण श्रीरामचन्द्रजीके साथ युद्ध करनेके लिये रणभूमिके चला ॥ १ || वह महाभयंकर राक्षसोसे धिरकर एव सुद्दढ रथपर सवार हुआ । उस रथमें सोलह पहिये. तथा वरूथ और कूबर लगे हुए थे॥ २॥ बह पिझाचके समान सुखजारे भोके जुते रहनेरे अति भयानक जान पड़ता था तथा सब प्रकारवे अख-शख्नोसे सुसज्जित एवं समस्त युद्ध-सामग्रीसे सम्पन था ॥ ३ ॥ इस प्रकार महाभयंकर राक्षसराज रावण छंकापुरीसे निकला । युद्धमें अत्यन्त निष्ठुर भीपणाकार रावणको आत देख भगवान्‌ रामसे सुरक्षित वानरसेना भयभीत हं गयी ॥ ४-५ || तब हनुमानजी रावणसे युद्ध करने लिये उछलकर सामने आये । वहाँ आते ह अतुलितपराक्रमी पवनकुमारने कसकर मुट्ठी बाँ६ ओर बड़े वेगसे उस राक्षसकी छातीमें प्रहार किया उस घूं सेके लगते ही वह रथमें घुटनोंके बळ गिर गर ॥ ६-७॥ एक मुहूते मूर्च्छित रहनेके अनन्तर रावण को फिर चेत हुआ । तब उसने हनुमानूजीसे कहा- “मैं मानता हुँ, त. वाखवमें वडा झूरवीर है” ॥ ८॥ हनुमान्‌जीने कहा--“अरे रावण ! मुझे थिक्का है कि (मेरा धूँसा खाकर भी ) द जीता रह गया अच्छा, अब तू मेरी छातीमें धूँसा मार ॥९॥ फि मेरा घुँसा छगनेपर ठ. प्राण छोड़ देगा, इसमें सन्दे नहीं । तब राबणने 'अच्छा' ऐसा कहकर उनक छातीमें धूँसा मारा || १० ॥ उसके छानेसे उनके ने घूमने ळो और वे कुछ तिलमिछा उठे फिर चे होनेपर कपिराज हनुमानजी रावणको मारने लिये तैयार हुए ॥ ११॥ तब राक्षसराज रावा भयभीत होकर कहीं अन्यत्र चला गया । हलुमार अंगद, नळ और नीळ इन चारोंने एकत्र होकर अप सामने अझ्िवर्ण, सर्परोमा, खन्गरोमा और इश्विकरोः १-रथकी रत्ञाके लिये बना हुआ छोहे आदिका आवरण । २-रयका वह भाग “पक्ष ताके लिये बना हुआ छह आदिका आवरण । २-र्यका वह भाग जिसपर जआ बाँधा जाता है. ५ अध्यात्मरामायण [ सम्‌ ११ arr टट PR मक चार राक्षसोंको खड़े देखा | तव उन चारोंने करोमाणं निजन्नः ऋमशोऽसुराच्‌। |ना क तथा इनि ७ क्रमशः इन चारों महापराक्रमी राक्षसोंको मार डाला चत्वारथतुरो हत्या रक्षसान्‌ भीमविक्रमाय । | ओर किर पथकर गरजते -हए श्रीरघुनायजीके | सिंहनाद पृथक कुत्वा रामपार्थवमुपागता! ॥१४॥ | पास आ खड़े इए ॥ १९-१४ ॥ "८४४ ऋठो दशभीवः सन्दश्य दशनच तद्नन्तर अत्यन्त क्रूर दशग्रीव (रावण ) क्रुद्ध ततः कुद्धो दशग्रीवः सन्दश्यदशच्छदस्‌ ॥१५॥ ns भ क i फाइकर के विदृित्व नयने क्रो राममेवान्वधावत | रामचन्द्रजीकी ओर ही दोडा । रावण रथमें चढ़ा हुआ . दशग्रीयो रथखस्तु रामं वज़ोपमे! श्रे! ॥१६॥। था ( और श्रीरघुनाथजी र॒थहीन ये म वह, मेध -. भरेभौराशिरिब तोयद! ' जिस प्रकार जळकी धाराएँ वरसाता हे वैसे ही महा- 'आजवान महाघोरैघोरामिरिव तोयदः। | भयंकर वज्र-सइ्शा वाणोंसे श्रीरामचन्द्रजीपर प्रहार करने रामस्य पुरतः सवोन्वानरानपि विव्यथे ॥१७॥ । ढगा और भगवान्‌ रामके सामने ही उसने समख ततः पावकसज्ञाशे: सरैः काश्वनभूषणै | | वानरोको भौ व्ययित कर दया ॥ १ ७॥ सद यबे रामो दशगीवे समाहितः | श्रीरामचन्द्रजी भी सावधान होकर रणभूमिमे रावणपर अर रामो दशग्रीवं समाहितः ॥१८॥ | अर्‍्िके समान तेजखी सुवर्ण-भूषित वाणोंकी वर्षा रथं रावणे दृष्टा भूमिष्ठं रघुनन्दनम्‌ | | करने छगे। इन्द्रन जब देखा कि रावण रथपर चढ़ा - हुआ है और श्रीरघुनाथजी पृथिवीपर ही खड़े हैं तो उसने अपने सारथि मातलिको बुलाकर कहा--]॥ १ ८- स्थेन मम भूसिष्ठ शीघ्र याहि रघूत्तमस । १९ | “हे अनघ | देखो रघुनाथजी पृथिवीपर खड़े हैं, तुम तुरन्त मेरा रथ लेकर भूळोंकमें उनके पास जाओ और मेरा कार्य करो” ॥ २०॥ आहूय मातरि शक्रो बचनं चेदमब्रवीत्‌ ॥१९॥ स्वरितं सूतल गतया कुरु कार्य ममानघ ॥२०॥ एवशुक्तोऽथ ते नत्वा सातलिदेवसारथिः । इन््रकी यह आज्ञा पाकर देवसारयि मातलिने उन्हें ततो हयैश्च संयोज्य हरिते स्यन्दनोत्तमम्‌ ॥२१। | नमस्कार किया और उनके उत्तम रथमें हरे रंगके घोडे खगीजयार्थ रामख दपचक्राम मातलिः | | जोतकर भगवान्‌ रामको विजयके लिये स्वति चलकर कक पी | उनके पास उपस्थित हुआ तथा उनसे हाथ जोड़कर आज्ञद्िदिषराजेन प्रेषितोषईखि रघूत्तम ॥२२॥ | बोछा--“है र॒घुश्रेष्ठ | मुझे देवराज इन्द्रे भेजा है रथोऽयं देवराजश्य विजयाय तब प्रभो। |॥२१-२२॥ हे प्रभो ! यह रथ इन्द्रका ही है, इसे प्रेषितश्च महाराज घजुरेन्दर च्च भूषितम्‌ ॥२३॥ उन्होंने आपकी विजयके लिये भेजा है । हे महाराज ! - Oe इसके साथ ही यह अति शोभायमान ऐन्ह धनुष” अभेदं कवच सङ्गं दिव्यतूणीञुगं तथा । अभेद्य कवच, खज्न और दो दिव्य तूणीर भी भेजे आरक्ष च रथं राम रावणं जहि राक्षसम ॥२४॥ | दं! दे राम ! सुझ सारथीके साथ, इन्दने जिस प्रकार कश Ne वृत्रासुरका वघ किया था उत्ती प्रकार हे देव ! आप इस सया सारथिना देव इत्र देवपतियंथा । रथपर आरूढ होकर राक्षस रावणका बघ कीजिये।” इत्युक्तरं परिक्रम्य नमस्कृत्य रथोत्तममू ।२५।। | मातलिके इस प्रकार कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उस रथकी परिक्रमा कर उसे नमस्कार किया ॥२३-२५॥ आएराह रथ रामा ठोकान्ठकम्या तियोजयन्‌। ..! और सम्पूर्ण छोकोंको सम्पन्न करते हुए -उसपरं . सगे ११] ॐ ०-०५-० TTT १५४४४४१४४५ ४ ४४ eS UNS ANN er te wo ee ee मा ततो5भवन्महायुद्ध भेरव॑ रोमहर्षणम्‌ ॥२६॥ | आरूढ इए। फिर महात्मा राम और बुद्विमान्‌ रावण- महात्मनो राघवस्य रावणस्य च धीमतः । आक्षियेन च आश्नेयं देवं दैवेन राघवः ॥२७॥ असं राक्षसराजस्य जघान परमास्नवित्‌ । तस्तु ससृजे घोरं राक्षसं चास्रमस्नवित्‌ । क्रोधेन महताऽऽविष्टो रामस्योपरि रावणः ॥२८॥ रावणस्य धचुर्घुक्ताः सपा भूत्वा महाविषाः । शराः काश्चनपुङ्काभा राघवं परितोऽपतन्‌ ॥२९॥ तेः शरैः सर्पवदनैर्मद्भिरनलं गुखः । दिशश्च विदिशश्चैव व्याप्तासत्र तदाऽभवन्‌ ॥३०॥ रामः सपांस्ततो दृष्टा समन्तात्परिपूरितान्‌ । सौपर्णम्रं तद्घोरं पुरः प्रावपेयद्रणे ॥३१॥ रामेण युक्तास्ते बाणा भूत्या गरुडरूपिणः । चिच्छिदुः सर्पबाणांसान्समन्तात्सर्पेशत्रवः अस्रे प्रतिहते युद्धे राभेण दशकन्धरः । अभ्यवर्षत्ततो रामं घोराभिः शरवृष्टिभिः ॥३२॥ ततः पुनः शरानीकै राममङ्किष्टकारिणम्‌ । अदेयित्वा तु घोरेण मातलिं प्रत्यविध्यत ॥३४॥ पातयित्वा रथोपस्थे रथकेतुं च काञ्चनम्‌ । ऐन्द्रानश्वानभ्यहनद्रावणः क्रोधमूच्छितः ॥३५॥ विषेदु्देवगन्धर्वाश्चारणाः पितरस्था । आर्त्ताकारं हरिं दृष्टा' व्यथिताश्च महर्षयः ॥३६॥ व्यथिता वानरेन्द्राथ बभूवुः सविभीषणाः । दश्ञास्यो विंशतिभुजः प्रशृष्दीतशरासनः ॥३७॥ दडे रावणस्तत्र मैनाक इय सर्तेः । रामस्तु शुं बद्धवा क्रोधसंरक्तलोचनः ॥३५॥ कोपं चकार सदृशं निदेहन्निव राक्षसम्‌ । चहुरादाय देवेन्द्रवहुरकारमद्शुतस्‌ ।।३९॥ गृहीत्वा पाणिना बाणं कारानरसमम्नरभस्‌ । का महाभयानक और रोमाञ्चकारी धोर युद्ध होने लगा । अञ्न-विद्यामें परम कुळ श्रीरामचन्द्रजीने राबणके. आग्नेयारको आग्नेयाज्से और देवाखको देवाखसे काट डाला | तव अखविद्याविशार्‌द राबणने अत्यन्त क्रोधाविष्ट हो श्रीरामचन्द्रजीपर महाभयंकर राक्षसा छोड़ा ॥२६---२८॥ रावणके धनुपसे छूटे हुए बाण, जो सुवर्णमय पंरूसे भासमान हो रहे थे, महाविषधर सर्प होकर श्रीरघुनाथजीके चारों ओर गिरने लगे [| २९ || जिनके सुखसे अग्निकी लपटें निकल रही थीं रावणके उन सर्पमुख-वाणोंसे उस समय सम्पूर्ण दिशा-विदिशाए ब्याप्त हो गयीं ॥ ३० ॥ रामने जव रणमूमिमें सब ओर सर्पोको ब्याप्त देखा तो महाभयंकर गारुंडाख छोड़ा ॥ ३१ ॥ श्रीरामचन्द्रजीके छोड़े ` हुए वे वाण सपोंके शत्रु गरुड होकर जहाँ-तहाँ सर्परूप वाणोको काटने लगे ॥ ३२॥ इस प्रकार भगवान्‌ राम- द्वारा अपने झल्को नष्ट हुआ देख रावणने उनके उपर भयंकर बाण-वर्षा की || ३३ ॥ और फिर ढीला- विहारी भगवान्‌ रामको अति तात्र वाणावलीसे पीड़ित कर मातळिको वेध डाछा ॥ ३४ ॥ ( इतना ही नहीं) क्रोधसे उन्मत्त हुए रावणने रथकी सुवर्णमयी ध्वजा काट कर उसके पष्ठ भागपर गिरा दी और इन्द्रके धोड़ोंको भी हताहत कर दिया ॥२५॥ भगवानको इस आपत्तिमें देखकर देवता, गन्धर्व, चारण और पितर आदि विषादग्रस्त हो गये तथा महर्षिगण मन-ही-मन दुःख मानने लगे ॥ ३६ ॥ चिभीषणके सहित समस्त वानर-यूथपतिगण अति चिन्तित इए । उस समय हाथमें धनुपवाण लिये दश मुख और बीस सुजाओंबाळा रावण मैनाक पर्वतके समान दीख पड़ता था। भगवान्‌ रामके नेत्र रोधसे छाल हो गये, उनकी त्योरी चढ़ गयी और उस राक्षसको मानो जळा डालेंगे ऐसा क्रोध करते हुए उन्होंने इन्द्र-यनुपके समान एक विचित्र धनुष उठाया तथा हाथमें एक कालाम्निके समान तेजोमय वाण लेकर अपने नेत्रोंसे समीपवर्ती शात्रुकी ओर इस निर्दहन्निव चक्ुभ्यी ददृशे रिपुमन्तिके ॥8४०॥ | प्रकार निहारा मानो भसम कर देंगे ॥३७-६.०॥ काट ३७ भा अध्यात्मरामायण [सग ११ rrr ७ 4 तेजसा 9 प्रज्वलन्नित | रूपी भगवान्‌ रामने अपने तेजसे प्रञ्तछित-से हो सम्पूर्ण पराक्रमं दर्शयितुं तेजसा अज्यठानित्र । i न अपने मेरे समू चक्रमे काळरूपी सर्वलोकस्य पश्यतः ।।४ १॥ | डर 9१ ॥ उन्होंने अपना धुप खींचकर रावण- विषय चाप॑ रामस्तु रावणं ग्रतिविध्य च । को बींब डाला । ओर ये सम्पूर्ण वानर-सेनाको पयः a भौ || आनन्दित करते हु खोक्ान्तकारी काठके समान हर्षयम्वानरानीर्क कालान्तक इवाबभा ॥४२। | हुशोभित होने लगे ॥ ४२ ॥ LN eo ee bee Se ne Lop छुद्धं रासरय वदनं दृष्टा शु प्रधावतः | झन्रुपर धावा करते हुए भगवान, रामका क्रोधयुत्त RT सुन मुख देखकर समख प्राणी भयभीत हो गये और १ न्धरा ॥४३॥ | ॐ ५ र तत्रसुः सवेभूतान चचाल च वझुन्थ पृथिची डगमगाने छगी || ४३ ॥ रामको अति रोद्र- रामं दृष्टा महारोद्र्युत्पातांश्च सुदारुगाच्‌। ' रूप और इन दारुण उत्पातोंको देखकर समस्त रानि सर्वभूतानि रावणं चाविशङ्धयस्‌ ॥४४॥ | जीवांम त्रास छा गया ओर रावणक भक भं शेडगन्धर्यकिनरा । आतंक समा गया ॥ ४४ ॥ उस समय देवता, सिद्ध, विमानख्याः सुरगणाः सिद्धगन्धवाकिलरा। । | गन्धर्वं और किन्नरगण विमानोंपर चढे हुए संसारवे दद्णुः सुमहायुद्ध॑ ढोकसंवर्तकोपमम्‌ । । महाप्रळ्यके समान इस घोर युद्धको देख रहे ये । इस | बीचमें श्रीरामचन्द्रजीने ऐन्द्रा्ञ छोइकर रावणके झिग ऐन्द्रमल्लं समादाय रावणस्य शिरोऽच्छिनत्‌ ॥४५॥ काट डाळे ॥४५॥ तव रावणके बहुत-से शिर रुधिररे मूधीनो रावणस्याथ बहवो रुधिरोक्षिताः । | ल्थपथ हो आकाइा-मण्डळसे इस प्रकार गिरने ठरे ! जैसे ताल-वृक्षसे उसके फल गिरते हे ॥ ४६ | उर । समय दिन, रात, सन्ध्या अथवा दिद्याएँ आदि ठु न दिनं न च वे रात्रिन सन्ध्या न दिशोऽपि वा | भी स्पष्ट नहीं जान पड़ती थीं तथा उस संप्रांम-भूमिः ! रावणका रूप भी दिखायी नहीं देता था (केव | कटे इए शिर ही दीख पडते ये) ॥ ४७॥ ततो रासो बभूवाथ विस्मयाविष्टमानस | | तब तो शरीरामचन्द्रजीको बड़ा ही विस्मय हुआ शतमेकोत्तरं छिन्नं शिरसां चेकवर्चसास्‌ ॥४८॥ | (वे सोचने लगे) 'मॅने समान-तेज-सम्पन्न एक सो एव न चैव रावणः श्रान्तो इश्यते जीवितक्षयात्‌ | शिर काटे हैं ॥ ४८ ॥ किन्तु फिर भी रावण ग्राणः ततः सर्वाख्नविद्वीरः कोसल्यानन्दवर्धनः ॥४९॥ | त शान्त डल दाती नहीं ता तत तब अनेक र भिय ~ | अञ्जसि युक्त सवोश्नविशारद धीरवीर कोदाल्यानन्दन अद्ंथ बहुभियुक्तश्रिन्तयामास राघचः। | ह मेने ड | रघुनाथजीने विचारा--“मैंने जिन-जिन वाणोंते वडे- घेयेंबोणह (९९ च्छ पैचबाणहता दत्या महासस्थपराक्रमा; ।,५०॥ | बड़े तेजस्वी और पराक्रमी दैत्योंको मारा था, इस व एते निष्फलं याता रावणस्य निपातने । । रावणका वघ करनेमें वे सभी निष्फल हो गये ।” ह क (र ~ हक | धन इति चित्ताकुळे रामे समीपस्थो विभीषणः ॥५१॥ भगवान्‌ रामको इस प्रकार चिन्ताग्रस्त देख उवाच राधवं वाक्यं बरह्मदत्तवरो हसौ । | उनके पास खड़े इए विभीपणने कहा--“भगवन्‌ ! विच्छि ब्रह्माजीने इसे एक वर दिया था । उन्होंने कहा था विच्छिन्ना बाहूबो$प्यस्य विच्छिन्नानि शिरांसि च हि चि भााहयोबऱ्यस्य विच्छिन्नानि शिरासे च | कि इसकी 'भुजाएँ और शिर वारम्वार काट दिये जानेपर उतत्सयन्ति पुनः शीघ्रमित्याह भगवानजः । । भी फिर तुरन्त नये उत्पन्न हो जायेंगे)! इसके नामि- शगनात्मपतत्तिस तालादिव फलानि हि ॥४६॥ प्रकाशन्ते त त्रं इञ्यते तत्र सङ्गरे ॥४७॥ सर्ग ११] . ` युद्धकाण्ड २९१ Sef ४४७0७४८ ४१./१७१९७०७. ६४०५०३/६/ ६ py GUNNA >. नाभिदेशेऽसृतं तस्य कुण्डलाकारसंखितम्‌ ॥५३॥ | देशमें कुण्डलाकारसे अमृत रखा हुआ है ॥४९-५३॥ तच्छोपयानलास्नेण तस्य मृत्युस्ततो भवेत्‌ । उसे आप आग्नेयाखसे सुखा डालिये, तमी इसकी मृतय विभीपणवचः अत्वा रामः शीघ्रपराक्रमः ॥५४॥ | दो जायगी ।” विभीषणके बचन सुनकर शीतरपरकमी विजय RE भगवान्‌ रामने अपने धनुषपर आग्नेया चढ़ाकर उस पावकास्रेण संयोज्य नाभिं विव्याध रक्षसः । ी राक्षसकी नाभिमें मारा और फिर महाबळी रघुनाथ- अनन्तरं च चिच्छेद शिरांसि च महावलः ॥५५॥ | जीने क्रोधित होकर उसके शिर और सुजाएंँ काट बाहूनपि च संरूधो रावणस्य रघूत्तमः । डालीं । ततो घोरां महाशक्तिमादाय दशकन्धरः ॥५६॥ | इसपर रावणने अत्यन्त क्रोधातुर हो विमीपणको विभीपणवधार्थीय चिक्षेप क्रोधविद्दळः । | मरे ल्यि एक महाभयानक शक्ति छोडी । किन्त शका रघुनाथजीने उसे तुरन्त ही सुवर्णमण्डित तीक्ष्ण वाणोंसे चिच्छेद राघवो बाणेस्तां शितैहेमभू पिततः ॥५७॥ ¦ काट डाला || ५४-५७॥ रावणके शिर काटे जानेसे ` | ~ विनिर्ग तेज निकल गया और वह उन भयंकर शिरोंके कट दशग्रीवशिरर्छेदात्तदा तेजो विनिर्मतम्‌। ! 5 दशग्रीयशिरस्छेदाचद छिसेः शय प्‌ | जानेसे विरूप दिखायी देने गा ॥५८॥ अब, रावणके म्हानरुपो वझूयाथ छिः शॉॅर्मयडरेः ॥५८ | एक मुख्य शिर और दो युजाए रह गयी थीं । किन्त एकेन मुख्यशिरसा वाहुभ्यां रावणो वभौ । | फिर मी वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर भगवान्‌ रामपर ~ नाना प्रकारके अख-शाख बरसाने छगा । इसी प्रकार $ कुद्धो नानाश ; | रावणस्तु पुनः कुद नानादाखास्ृष्टिमि ॥५९॥ | ने भी उसपर भयंकर वाणवर्षा कौ । पिर तो वतर रामं ते रामस्तथा घाणेववप च। | वहा अत्यन्त रोमाञ्चकारी घमासान युद्ध छिड ततो युद्धमभूद्धोरं तुशुलं लोमहर्षणम्‌ ॥६०॥ | गया ॥ ५९-६० ॥ अथ संस्मारयामास मातली राघव तदा । तव मातलिने औरामचन्द्रजीको स्मरण दिलाया विसुज्यास क कि “हे रघुश्रेष्ठ ! इसका बध करनेके लिये आप शीघ्र ज्यास्रं बधायास ब्राह्मं शध रघूत्तम ॥६१॥ ही तरमा छोडिये ॥ ६१॥ देवताओंने इसके नाशका ~ आ आ ~ तेते । विनाशकालः प्रथितो यः सुरेः सोञ्य वतते। । जो समय निश्चित किया है वह इस समय वर्तमान £ न घेतस्य छेत्तच्य र हे रघुनन्दन ! आप इसका मस्तक न उत्तमाङ्गं न चैतस्य छेत्तव्यं राघव त्यया ॥६२॥ है। हेर + ७0... _ :- CL oe काटियेगा ॥ ६२॥ ( क्योंकि ) हे प्रभो ! यह शिर नेव शाण्ण प्रभा वध्यां वध्य एवं हि मभाण । काटनेसे नहीं मर सकता, बल्कि (हृदयरूप ) मर्गस्थानके | ततः संस्मारितो रामस्तेन वाक्येन मातलेः ॥६३॥ विद्ध होनेपर ही इसका अन्त हो सकता है ।” मातछि- » OC re वाक्याँसे स्मरण दिलाये जानेपर भगवान्‌ रामने जग्राह सशरं दौत निश्चसन्तमियोरगम्‌। | कै रण भावस स्मर फुफकारते हुए सर्पके समान एक परम तेजखी वाण यस पाश्च तु पवनः फले भास्करपावकी ॥६४॥ निकाला । उसके पारवेभागरमे पवनकी, नोंकपर सूय शारीरसाकादामयं गौरवे भेरुमन्दरो । और अझनिकी, गुरुता ( मारीपन ) में सुमेरु और दि > ५ मन्द्राचळकी तथा गाँठोंमें महातेजली छोकपाछोंकी पसि च निन्यखा सकाल महौजसः NR झापना की गयी थी, एवं उसका खरूप आकाशमय था जाज्वल्यमान बपुपा भातं भास्करवर्चसा , । ॥६३--६५॥ उसका आकार अत्यन्त दैदीप्यमान होनेके तमुग्रमख्॑ लोकानां .भयनाशनमद्भुतम्‌ ॥६६॥ | कारण वह सूर्येके समान प्रकाशमान था । सहावा ३९३ अध्यात्मरामायण [ सगे ११ भगवान्‌ रामने सम्पूर्ण लोकोंका भय दूर करनेवाले उस अत्यन्त उग्र और अद्भुत अत्नको धनुर्वेदोक्त विधि- से अभिमन्त्रित कर अपने धनुपपर चढ़ाया || ६६-६७॥ भगवान्‌ रामद्वारा उस उत्तम वाणके चढ़ाये जानेपर समस्त प्राणी भयभीत हो गये और प्रयित्री कॉपने लगी ॥ ६८ ॥ इसी समय उन्होंने अत्यन्त क्रुद्ध हो धुक भली प्रकार खींच बड़ी सावधानीस बह मर्मघातक णे रावणपर छोड़ दिया ॥ ६९ ॥ वह कालके समान अति भयंकर मुखवाला और वज्रपाणि इन्द्रद्वारा छोड़े हुए वज़के समान अति असद्य वाण रावणके वक्षःस्थटमें छगा ॥७०॥ वह शरीरान्तकारा महाभयंकर वाण उस महा- काय रावणके शरीरमें घुस गया और उसने तुरन्त हो उसका हृदय फाड डाला ७१॥ उसने रावणके प्राणाका अन्त कर दिया और फिर प्रथित्रीभं घुस गया । इस प्रकार . 8 रु रावणका वध करनेके उपरान्त बह बाण फिर भगवान्‌ स शरो रावण हत्वा रामतूणीरमाविशत्‌ ॥७२॥ | रामके तरकदामें चला आया ॥ ७२ | वाणके टगे तस्य हस्तात्पपाताशु सशरं कारुकं महत्‌ । | ही रावणका बा भारी धु वाणसहित तुरन्त उसके गतासु्रमिवेयेन राक्षसेन्दरी$पतद्वुवि ॥७३॥ | दासे गिर गया जर वह सज प्राणरहित व « भूम हते चक्कर खाकर प्रथिबीपर गिर पड़ा || ७३॥ उ ते इष्दवा पतितं भूमी हतशेपाथ राक्षसाः । पृथिवीपर गिरा देख मरनेसे बचे हुए राक्षसगण अनाय हतनाथा भयत्रस्ता दुदुबुः सर्वतोदिश्चम्‌ ॥७४॥ | हो जानेसे भयभीत होकर चारों ओर भाग गये॥ ७४ ॥ अंसिभरूप ततो रामं महेषुं महाथुजः । वेदेझीक्तेन विधिना सन्दथे कारके वली ॥६७॥ तसिन्सन्धी यमाने तु राघवेण- शरोत्तमे । सर्वभूवानि वित्रेसुश्चचाल च वसुन्धरा ॥६८॥ सं रावणाय सङ्कुद्धो सृशमानस्य कारकम्‌ । चिक्षेप परमायत्ततमख्ं मर्मघातिनम्‌ ॥६९॥ स बजू इव दुह्गंपों वजूपांणिविसजितः । कुपान्त इव घोरास्यो न्यपतद्रावणोरसि ॥७०॥ स "निमग्नो मद्दाघोरः शरीरान्तकरः परः । बिभेद हृदय तूर्णं रावणस्य महात्मनः ॥७१॥ रांवणस्याहरत्प्राणान्विषेश धरणीतले | RR RRP दशग्रीवस्य निधनं विजयं राघवस्य च | तव, बिजय-बिभूपित वानरगण अति प्रसन्न होकर A , श्रीरामचन्द्रजीकी जय और रावणकी उस पराजय- ततो विनेदुः संहृष्टा वानरा जितकाशिनः ॥७५ क छु शि शिन ॥। का बखान करते हुए भगवान्‌ रामकी जय वदन्तो रामविजयं रावणस्य च तद्दधम्‌। |आऔर रावणकी क्षयः का धोप करने लगे । अथान्तरिक्षे व्यनदत्सौम्यस्रिदशदुन्दुभिः ॥७६॥ | तथा आकाश-भण्डकों दिव्य दुन्टुमियोंका गम्भीर नाद होने लगा ॥ ७५-७६ || भगवान्‌ रामपर पपात पुष्पवृष्टिथ समन्ताद्राघवोपरि । सव ओरसे फलोंकी वर्षा होने लगी तथा मुनि, ष्यः सिद्वाथारणाश्च दिवौकसः ॥७७॥ | सिङ, चारण और देवगण उनकी स्तुति करने छो अथान्तरिक्षे चनूतुः सर्वतो5प्सरसो मुदा । ॥ Ri ॥ फिर आकाशम सब ओर अप्सराएँ असन्नता- सवणस्यचच होत ज्योतिर पूर्वक नाचने ठगी | (इसी समय) रावणके देहसे स्च देहोत्य ज्योतिरादित्यवत्सफुरत्‌\७८। | एक सूर्यके समान प्रकाशमान ज्योति निकली, ` ) मविवेश रघुभ्रेष्ठे देवानां पश्यतां सताम्‌ । र पह सब देवताओंके देखते-देखते औरघुनायजीमें प देव पृ + प्र T कः गयी कर प शो देवा ऊचुरही भाग्य रावणस्य महात्मन ॥७९॥ हाला तवय बहा णो रुगे-“अहों ! , त डा भाग्य है ॥ ७८-७९॥ हम शष ए सात्विका देवा विष्णो! कारुण्यभाजना! । ' देवगण सस्तगुणप्रधान है और श्रीविष्णभगवानके Lec Tov oper NN [तुक :खादिमिव्यीता! कॉ भयदुःसादिभिव्याप्ताः संसारे परिवतिनः ॥८०॥ | इपापात्र हैं, फिर भी हम भय और दुःखादिसे व्याप्त होकर संसारमें भटका करते हैं ॥ ८०॥ और यह रावण महाक्रर्‌ राक्षस है, (यही नहीं) यह ब्रह्म- परदाररतो विष्ण पस हिंसकाः घाती, अत्यन्त तमोगुणी, परस्रीपरायण, भगवदू- अयं तु राक्षसः करो ब्र्महाऽतीव तामसः । न /पड्यत्सु सर्वभूतेषु राममेव अविष्टवा्‌। |! <* ॥ किन्त देखो, यह सबके देखते-देखते भगवान्‌ | रे ® राममें ही छीन हो गया ।” एवं तुवत्सु देवेषु नारदः प्राह सुखितः ॥८२॥ | देवगणके इस प्रकार कहनेपर नारद्जीने मुसकाते शणतात्र सुरा यूयं धर्मतस्मविचक्षणाः | इए कहा--॥ ८२॥ “हे देवगण ! तुमलोग धर्मके रावणो राधवद्वेपादनिशं हृदि भावयन्‌ ॥८३॥ तत्वको भली प्रकार जाननेबाळे हो, अतः (इस विषयमें मेरा मत ) सुनो । रघुनाथजौसे द्वेप ' रहनेके कारण भृत्यः सह सदा रामचारत दपसशुतः। | रावण अहर्निश अपने सेवकोंसदित द्वेषपूर्यक हृदयमें श्वा रामात्स्निधनं भयात्सर्वत्र राघवम्‌ ॥८४॥ | सदा श्रीरामचन्द्रजीके चरित्रकी ही भावना रखता था; पश्यज्ननुदिन स्त्र रामभेवानुपश्यति। | तथा रामके हाथसे अपना वध सुनकर सर्वत्र रामहीको रोषोऽपि रावणस्पाशु ररुोधाविकोऽभवत८५। | देखता हुआ सम्रमें भी उन्हींको देखता था । न्‌ बा | व रावणस्या उर्वाधाधकाऱ्मबत इस प्रकार रावणका क्रोध भी उसके लिये कि [a ARS re रामेण निहतशान्ते निर्धूताशेषकट्मपः । | गुरुके उपदेशसे कहीं अधिक उपयोगी हुआ॥८३-८७॥ रामसायुज्यमेवाप रावणो युक्ततरन्धनः ॥८६॥ | अन्तमें स्वयं भगवान्‌ रामके हायसे मारे जानेके पापिष्ठो वा दुरात्मा परघनपरदा- | कारण उसके समस्त पाप धुळ गये थे । अतः | बन्धनहीन हो जानेसे उसने राममें सायुज्य मोक्ष रेष सक्तो यदि स्या- | प्राप्त किया ॥ ८६ || यद्यपि कोई पुरुष (पहलेका) निस खेहाळूयाहा रघुछुलतिलक हे महापापी, दुराचारी तथा परधन और परखीमें आसक्त भी भावयन्सम्परतः । हो तथापि यदि नित्य्रति प्रेमसे अथवा भयसे रघुकुल- भूत्वा शुद्धान्तरज्ञो भवशतजनिता- तिळक भगवान्‌ रामका चिन्तन करता हुआ नेकदोपेविंधुक्तः प्राणत्याग करता है तो वह झुद्ध-चित्त होकर सैकड़ों सद्यो रामस्य विष्णोः सुरवरविजुतं जन्मके उपार्जित नाना दुःखोंसे छूटकर शीघ्र ही याति वैकुण्ठमाद्यम्‌ ॥८७॥ भगवान्‌ बिण्णुके देवता और दैत्यांसे बन्दित आदिस्थाज्ञ चैकुण्ठछोकको चला जाता है ॥ ८७॥ जो त्रिळोकीके कण्टकस्वरूप रावणको युद्धमें मारकर अपने बायें हाथसे धनुपको प्रथिबीपर टेके हुए खड़े हैं, तथा दूसरे इत्वा युद्धे दास्य त्रिशुवनविपमे वामहस्तेन चाथ भूमी विष्टभ्य तिठ्ठत्रितरकरधतं हाथमें एक वाणळेकर उसे घुमा रहे है, जिनके नेत्रोंके श्रामयन्बाणमेकम्‌ । उपान्तभाग कुछ लाळ हो रहे हैं, वाणोसे छिन- आरक्तोपान्तनेत्रः$ शरदलितवपुः मिन हुआ शरीर करोड़ों सूरयोके समान प्रकाशित हो र्यकोटिम्रकाशो रहा है. ओर. उन्नत देह वौरश्रोसे सुशोभित है, बे र अध्यात्मरामायण [ सर्ग १२ RS NTT SN TOY NN NR ४४४ ९/५०६२५४५०६/४४५०५/४२५०५०५०५०९०-७ हकक वीर्रीबन्धुराङ्गख्िदशपतिच्ुतः देवराज इन्द्रद्वारा' वन्दित वीरवर राम मेरी रक्षा पातु मां वीरराम!।८८।| करें” ॥ ८८॥ ID इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेरचरसंवादे युद्धकाण्डे एकादशः सर्ग: ॥ ११ ॥ ° हादरा संगं विभीषणका राज्यामिषेक और सीताजीकी असि-परीक्षा । श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेचजी चोले-हे पार्वति ! श्रीरामचन्द्रजीने विभीषण, हनुमान, अंगद, लक्ष्मण, वानरराज सुग्रीव, ५ ; तथा परान्‌ ॥ १॥ जाम्बवान्‌ तथा अन्यान्य वीरोंकी ओर देख सभी लोगेसि लक्ष्म कापराज च जाम्बचन्त तथा पराच्‌ प्रसन्न-वित्तसे कहा--“आपलोगोंके वाहुवल्से आज ' परितुष्टे मनसा स्ीनवात्वीदवचः । | इने रावणको मार दिया | १-२॥ आप सवळोगोयी मवतां बाहुवीर्येण निहतो रावणो सया ॥ २॥ | पवित्र कौति जवतक सूर्य और चन्द्र रहे तवतक कीतिः खाखति वः पुण्या थावबन्द्रदिवाकरो । | स्थिर रहेगी और जो लोग मेरेसहित आप सबकी कलि. कीर्तयिष्यन्ति भवतां कथां त्रैलोक्यपावनीम्‌ ॥३॥। | कल्मष-नाशिनी त्रिलोकपावनी पवित्र कथाका कीन सयोपेतां कलिहरां यास्यान्ति परमां गतिम्‌ । | करेंगे वे परमपदको प्राप्त होंगे ।” एतस्मिन्नन्तरे दृष्टा रावणं पतितं ञ्चुवि॥ ४॥ | इसी समय रावणको प्रथिवीपर गिरा देख उससे _ 0 ~ सुरक्षित मन्दोदरी आदि समस्त ख्रियाँ उसके पास न्द § 4 ~ ~ पु मन्दोद्रीमुखा। सवा दियो रावणपाहिता । | (आकर ) गिर गयीं तथा शोकसे विलाप करने लगी पतिता रावणस्याग्रे शोचन्त्यः पर्यदेवयन्‌ ॥५॥ ॥ २-५॥ बिभीषण भी महान्‌ शोकाकुल हो आर्तभावसे | विभीषणः शुशोचातेः शोकेन महताऽऽव्ृतः | चिन्ताग्रस्त हो गये और रावणके पास गिरकर तिते _ नाना प्रकारसे विलाप करने लगे | तव पतितो रावणस्याग्ने बहुधा पर्यदेवयत्‌ ॥ ६ ॥ ।९॥ कत श्रीरघुनाथजीने लक्ष्मणजीसे कहा--"हे मानद ! रामस्तु लक्ष्मण प्राह बोधयस्व विभीषणम्‌ विमीषणको समझाओ कि वह भाईका ( ओष्वंदैहिक ) करोतु आतृसंस्कारं किं विलम्बेन मानद ॥ ७॥ | संस्कार करे, अब व्यर्थ देरी करनेसे क्या छाम है ६ जियो मन्दोदरीमुरुयाः पतिता विलपन्तिच । |! ° ॥ और दोदरी आदि सिया पछाड़ Ri नि शि विलाप कर रही हैं, सो उन रावणको प्रेयसी वारयतु ताः सर्वा राक्षसी राबणाम्रंयाः ॥८॥ | राक्षसियोंको ( समझाकर ) ऐसा करनेसे रोके” ॥ ८॥ एवद्चक्तोष्थ रामेण लक्ष्मणोऽगाद्विभीषणम्‌ । भगवान्‌ रामके इस प्रकार कहनेपर ्रळष्मणजी उवाच शतकोान्ते पतितं स्रतकोपमम्‌ ॥ ९॥ |. रावणके समीप मरे हुएके समान पडे हुए | दि वि सौर हि विभीषणके पास आये और उससे कहने लगे ॥९॥ इस शकेन सहता&डविष्ट सोमित्रिरिद्मजबीत्‌ । eT समय विमीषण महान्‌ शोकाङुळ थे उनसे श्रीलक्ष्मणजी य शाचात त्व दुःखेन कोऽयं तव विभीषण ॥१०॥ | इस प्रकार बोढे--“विभीषण ! जिसके लिये तुम रामो विभीषणं दृष्टा इनसन्तं तथाङ्गदस्‌ । ससे १२ ] युद्ध काण्ड २९५ त्वे वास्य कतमः सुटः पुरेदानीमतः परम्‌ । यद्वत्तोयौघपतिताः सिकता यान्ति तद्वशञाः।११॥ संयुज्यन्ते वियुञ्यन्ते तथा कालेन देहिनः । य॒थ्रा धानासु वे घाना भवन्ति न भवन्ति च॥१२॥ एवं भूतेषु भूतानि प्रेरितानीशमायया । त्वं चेमे वयमन्ये च तुल्याः कालवश्षोद्भवाः॥ १३॥ जन्मसृत्यू यदा यस्मात्तदा तखाङ्कविष्यतः । ईश्वरः सर्वभूतानि भूतैः सृजति हन्त्यजः ॥१४॥ आत्मसुष्टरखतन्त्रनिरपेक्षोऽपि बालवत्‌ । ~ देहेन देहिनो जीवा देहादेहोऽभिजायते ॥ १५ बीजादेव यथा बीजं देहान्य इव शाइवतः । हिदेहविभागोऽयमविवेकक्कतः पुरा॥१६॥ नानारपं जन्म नाशश्च क्षयो बृद्धि? क्रिया फलम्‌ । द्रष्टराभानत्यतद्धमों यथाशनेदोरुविक्रियाः ॥१७॥ त इमे देहसंयोगादात्मना भान्त्यसद्ग्रहात्‌ । "यथा यथा तथा चान्यद्भवायतोऽसर्सदाग्रहात्‌।१८। प्रसपस्पानहम्भावात्तदा भाति न संसृतिः । जीवतोऽपि तथा तहद्विसुक्तस्यानहडकुतेः ॥१९॥ तखान्मायामनोधमं जह्मइम्ममताञ्रमम्‌ । रामभद्रे भगवति मनो घेद्यात्मनीश्वरे ॥२०॥ दुःखी होकर शोक कर रहे हो यह तुम्हारा कौन है? ॥ १०॥ तथा तुम भी अपने जन्मसे पूर्व, इस समय अथवा इससे आगे इसके क्या हो! जिस प्रकार जलके प्रवाहमें पड़ी हुई बाळू उसके अधीन आती-जाती रहती है, उसी प्रकार देहधारी प्राणी काळके वशीभूत इए ही संयोग और वियोगको ग्राप्त होते हैं । जिस प्रकार बीजोंसे अन्य बीज उत्पन्न होते और नष्ट भी हो जाते हैं, उसी प्रकार भगवानकी मायासे प्रेरित समस्त प्राणी अन्य प्राणियोंसे उत्पन्न होते और मरते रहते हैं। तुम, हम, ये और अन्य सब भी समानमावसे काळके वशीभूत ही उत्पन्न इए हैं ॥ ११-१३ ॥ जन्म और मृत्यु जिस समय जिससे होनेबाळे हैं, उस समय उसीके द्वारा हो जायेंगे । अजन्मा ईश्वर ही, किसी प्रकारकी इच्छा न रहते हुए भी, बाळकके समान ( केवळ विनोदार्थ ) अपने रचे हुए अखतन्त्र प्राणियों- से समस्त प्राणियोंको उत्पन्न करता और नष्ट कर देता है। जीव देह-संयोगके कारण ही देही कहलाता है और देह अन्य ( माता-पिताके ) देहसे ही उत्पन्न. होता है, जैसे कि एक बीजसे दूसरा बीज | सनातन आत्मा तो देहसे परथक्‌-सा है । वास्तवमें तो यह देह और देहीका विभाग मी पहलेहीसे अविवेकके ही कारण है॥ १४-१६ ॥ जिस प्रकार अग्निमें छकड़ीके विकार दिखायी देते हैं उसी प्रकार साक्षी आत्मामें भिन्नता जन्म, मरण, क्षय, वृद्धि, कम और कर्मफल आदि प्रतीत होते हैं, जो वास्तवमें उसके धर्म नहीं है ॥ १७॥ मिथ्या भ्रान्तिके कारण आत्माके साथ देहका संयोग | माननेसे जिस प्रकार ये (सब धर्म) ( सत्यवत्‌) भासते | हे वैसे ही सत्य ( आत्मा ) का निश्चय कर उसीका ध्यान करते रहनेसे ये असत्य प्रतीत होने लगते हैं ॥ १८॥ जिस प्रकार गाढ़ निद्रामें सोये इए पुरुषको अहंकारका अभाव हो जानेसे प्रपञ्चकी प्रंतीति नहीं होती उसी प्रकार अहंकारहीन सुक्त पुरुषको जीते इए ही प्रपक्षका भान नहीं होता ॥ १९ ॥ “अतः तुम अहंता-ममता एवं श्रान्तिरूप मायामयं मनो- धर्मोंको त्यागो और इन्द्रियोंके बाह्य विषयोंसे अपने मनका श्या > >>“ २९६ : अध्यात्मरामायण - _/ [सर्ग १२ oor सर्वभूतात्मनि प्रे मायामानुषरूपिणि | सम्बन्ध छुटाकर उसे धीरे-धीरे अपने आत्मस्वरूप बाहेन्दरिय यित्वामनः य सर्वभूतान्तयामी परमेश्वर माया-मानवरूप भगवान्‌ द्रयर्थसम्बन्धास्याजयितवा मनः शने। ।२१॥| तू स्थिर करो ॥ २०-२१ ॥ ( चित्तको ) वाद्य तत्र दोपन्दर्ययित्वा रामानन्दे नियोजय । | विष्योंमें दोष दिखाकर उसे रामानन्द नियुक्त कर देह _ ~ खियः।२२। दो; ये माता, पिता, भ्राता, सुहृद्‌ और स्नेहीजन तो देहबुद्धया मवेदआता पिता साता सुद्दा °° | दह ुद्धसे ही होते हैं ॥ २२॥ जिस समय अपने विलक्षणं यदा देहाज्ानात्यात्मानमात्मना । | विशुद्ध अन्तःकरणद्वारा मनुष्य आत्माको देहसे त] बन्धुता साता पिता सुहृत्‌ २३| गण लेता है उस-समय कौन किसीका माता, पिता, तदा कः करय वा बन्छ त्‌ भाई, वन्धु अथवा सुहृद्‌ है! ॥ २२ ॥ ये स्री और मिथ्याज्ञानवशाज्ञाता दारागारादयः सदा । गुह आदि, शब्दादिः विषय, नाना प्रकारकी सम्पत्ति, शब्दादयश्व विषया विविधार्ैव सम्पदः ॥२४॥ | बळ, कोश, सेवकगण, राज्य, एथिबी और पुत्रादि तो ५ क र । सदा मिथ्या ज्ञानके कारण ही उत्पन्न हुए हैं. और र उ $ | बलं कोशो भृत्यवर्गा राज्य भूमः सुतादयः। | अज्ञानजन्य होनेके कारण वे सब क्षणमङ्गुर हैँ ॥ २४- अज्ञानजत्वात्सर्वे ते क्षणसङ्गममङ्गराः ॥२५। | २५॥ अतः, अव खड़े हो जाओ और हृदयमें भक्ति- ~ मु क्तिभावि वित भगवान्‌ रामका स्मरण करते हुए निरन्तर अथोत्तिष्ठ हृदा रामं भावयन्‌ भक्तिमावितस्‌। | गो § ४६द च भ्‌ प्रारव्ध भोगोमें तत्पर हो राज्यादिका पालन करो अनुबर्तख राज्यादि सुज्जन्पारव्धसन्वहम्‌ ॥२६॥ | | २६॥ भूत और भविष्यतकी चिन्ता न करते कतं मविष्यदसञन्वर्तमानमथाचरन्‌। | इए तया वतेमानका अलुगमन करते हुए न्यायानुकूळ { मवदोषैर्न हि | आचरण करो । इससे तुम संसार-दोपसे लिप्त न विहरख यथान्यायं मवदोपैर्ने रिप्यसे ॥२७॥ करो । इससे तुम संसार होगे || २७॥ भगवान्‌ राम तुम्हें आज्ञा देते हैं कि आज्ञापयति रामस्त्वां यद्शतुः साम्परायिकम्‌ । | अपने भाईका जो कुछ औष्वंदैहिक कर्म हो वह सब तत्कुरुष्ष यथाशाद्ध॑ रुदती्ापि योषितः ॥२८॥ शाख्रानुसार करो और हे महाबुद्धे ! इन रोती हुई निवारय महाबुद्धे लङ्कां गच्छन्तु भाचिरस । ख्ियोको यहाँसे अलग करो, ये सव लंकापुरीको जायं । इसमें देरी न हो ।” कुत्वा यथावद्चनं ठक्ष्मणस्य विभीषणः ॥२९॥ | ढ्दमणजीके यथार्थ वचन सुनकर विभीषण शोक त्यकत्वा झोकं च मोहं च रामपाश्चे्धपागसत्‌ । | और मोहक्रो छोड़कर भगवान्‌ रामके पास आये.। ~ ९ ५ धर्मज्ञ विभीषणने चित्तमें कुछ सोच-विचारकर श्रीराम- बिसृसय बुद्धया घर्मज्ञो धर्माथंसहितं वचः ।।३०॥ पक न भैवानबस्यर्थपचरं ह चन्द्रजीका ही अतुवतेन करनेके लिये यों धर्माथ-< रासस्यवानुदृत्यथेमुत्तर पर्यमापत | | युक्त उत्तर दिया--“प्रभो | यह रावण बड़ा दु नृशंसमनृर्त कूरं त्यक्तधर्मत्रतं प्रभो ॥३१॥ | मिथ्यावादी, क्रू और समस्त धर्मब्रत आदिसे रहित र था | हे देव ! इस परखीगामीका संस्कार करनेमें मैं नाहोऽस्मि देव सं रि न ।ऽस्मिदेव संस्कतुं परदाराभिमशिनम्‌ । | समर्थ नहीं हूँ ।” उसके ये वचन सुनकर औरामचन- त्वा तहचन प्रीतो रामो वचनमत्रवीत्‌ ॥३२॥ | जीने प्रसल होकर कहा-- “भैया ! वैर तो मरनेतक मरणान्तानि वैराणि निवृत्तं नः प्रयोजनम्‌ । दी होता है, सो अव हमारा काम हो चुका; अब तो | . | यह जैसा तुम्हारा है वैसा ही मेरा है | अतः इसका क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तब ॥३३।। | संस्कार करो” ॥२८-३३॥ सगे १२] ` युद्धकाण्ड २९७ ia OR आल न FE मच कक कलकत्ता OGIO NSS IETS TTS aan] ह ४७ १०० ७ कीच फट पे क फेल जे पटक ७७ ७४७० ७ जा फित न १४ (कक ७७ २४१७० %९ ७४ ३» २ ४०७, ३० ५०७ ७०७० ७४४७ ४ ४७ ४४ ७४0७ ७४४ १४८७७७७. ४७१७४ २० ७४ ४ ४७ ४७ ७४७० ७७४७ ४४७४७४ ७४७ का क ७ ७७ ७७ ७७ ४४ ७८७४ ३७७४१७१ ४० ४४१ ७४0७४ ३४ आल पट ७४७४७ फेशेकीकही गेलीच रामाज्ञां शिरसा शृत्वा शीघ्रमेव विभीषणः | तब विभीषणने भगवान्‌ रामकी - आज्ञा शिरपर सान्त्मवाक्ये्महाबु् राज्ञी मन्दोद्रीं तदा ॥२४।| धारणकर तुरन्त ही शान्त बचनोसे महाबुद्धिशालिनी सान्त्वयामास धमात्मा घर्मचुद्धिविभीषणः। त्वरयामास धर्मज्ञः संस्कारार्थं खबान्धवान्‌॥२५॥ चित्यां निवेश्य विधिवत्पितमेघविधानतः । आहितामेर्यथा कार्य रावणस्य विभीषणः ॥३६॥ तयैव सर्वमकरोद्धन्धुमि! सह मन्त्रिभिः । ददो च पावकं तस्य विधियुक्त विभीषणः ।३७।। खात्वा चेवाद्रेबस्रेण तिरान्दभीमिमिश्रितान्‌ । उदकेन च सम्मिश्रान्मदाय विधिपूर्वकम्‌ ॥३८॥ प्रदाय चोदकं तसे मूर्धा चैनं प्रणम्य च । ताः ख्रियोऽचुनयामास सान्त्वमुकत्वा पुनःपुनः २९ गम्यतामिति ताः सर्वा विविशुनेगरं तदा । प्रविष्टासु च सर्वासु राक्षसीषु विभीषणः ॥४०।॥ 'रामपार्श्रमुपागत्य तदाऽतिष्ठद्विनीतवत्‌ । रामोऽपि सह सेन्येन ससुग्रीवः सलक्ष्मणः ॥४१॥ हर्षं लेमे रिपून्हत्वा यथा वृत्त शतक्रतुः । मातलिश्र तदा रामं परिक्रम्याभिवन्य च ॥४२॥ अनुज्ञातथ रामेण ययौ खर्गे विहायसा । ततो हष्टमना रामो लक्ष्मणं चेदमब्रवीत्‌ ॥४३॥ विभीपणाय मे ठङ्काराज्यं दत्तं पुरेव हि । इदानीमपि गत्वा त्वं लङ्कामध्ये विभीषणम्‌ ॥४४। अभिषेचय विगरै्च मन्त्रचद्विधिपूर्षकम्‌ | इत्युक्तो लक्ष्मणस्तूर्णं जगाम सह वानरे? ॥४५॥। लङ्कां सुवर्णकरुशैः सञ्चद्रजलसंयुतैः । अभिपेकं शुभं चक्रे राक्षसेन्द्रस्य धीमतः ॥४६॥ ततः पौरजनैः साधं नामोपायनपाणिभिः । विभीषणः ससमित्रिरुपायनपुरस्क्ृतः ।।४७॥ दण्डप्रणाममकरोद्रामसाक्ति्कर्मणः । ३८ रानी मन्दोदरीको ढाँढस बँधाया और तदनन्तर धर्मबुद्धि धर्मात्मा धर्मज्ञ विभीषणने अपने बन्धु-बान्धवोंसे संस्कार- के लिये शीघ्रता करनेको कहा ॥ २४-२५ ॥ विमीषणने पितृमेधकी विधिसे शवको विधिपूर्वक चितापरं खा और जिस प्रकार अश्नहोत्रीका होना चाहिये उसी प्रकार अपने बन्धु-बान्धवों और मन्त्रियोके साथ मिलकर उन्होंने रावणके सब (अन्त्येष्टि) संस्कार किये । तत्पश्चात्‌ विभीषणने उसे विधिवत्‌ अग्निदान दिया ॥३६-३७॥ फिर स्नान कर गीले वससे तिळ और दूब मिले जलसे विधिवत्‌ जलाज्ञलि दी ॥३८॥ तथा जलाज्ञलि देनेके अनन्तर पृथिवीपर शिरं रखकर उसे प्रणाम किया ओर उन ख्रियोंको बारम्बार सान्तवनाके वचन कहकर ढॉँढस ' बँधाया ॥३९॥ (और कहा कि) 'अब तुम जाओ।' तब बे सव लङ्कापुरीको चली गयीं। समस्त राक्षसियोंके नगर” में चले जानेपर विभीषण भगवान्‌ रामके पास आकर अति विनीतमावसे खड़े हो गये । सेना, सुग्रीव औरं छक्ष्मणके सहित भगवान्‌ रामको भी शन्रुओंका नाश कर चुकनेपर वड़ा आनन्द हुआ, जैसा कि इन्नासुर- को मारनेके अनन्तर इन्द्रको हुआ था । तदनन्तर, मातळिने श्रीरामचन्द्रजीकी परिक्रमा की और उन्हें प्रणाम कर उनकी आज्ञा पा आकाश-मार्गसे खर्मळोकको चला गया । तब, श्रीरघुनाथजीने प्रसन्न- चित्तसे श्रीलक्ष्मणजीसे इस प्रकार कहा-॥४०-४२॥ “करने तो पहले ही विभीषणको छक्काका राज्य दे दिया है, तथापि तुम इस समय भी छ्लामें जाकर विभीषणका ब्राह्मणोंके द्वारा मन्त्र-पाठपूर्वक विधिवत्‌ अभिषेक कराओ |” भगवान्‌ रामकी ऐसी आज्ञा पा वानरोंकें सहित श्रीलक्ष्मणजी तुरन्त ही लङ्कापुरीको गये तथा समुद्रके जळसे भरे हुए सुवण-कल्शोंसे महाबुद्धिमान्‌ राक्षसराज विमीषणका मङ्गलमय अभिषेक किया ॥ ४४-४5 तब, पुरवासियोंके साथ हाथेंमें नाना प्रकारकी भेटे लिये छक्ष्मणजीके सहित विमीषणने बहुत-सा उपहार आगे रख लीलाविहारी भगवान्‌ रामको दण्डवत्‌ प्रणाम किया | विभीषणको राज्य प्राप्त हुआ देख © २९८ अध्यात्मरामायण [सगं १२ पप्पा TTT SST TTT मस्त Pe eee As Severe का | ४. Seem रामो विमीषणं दट ग्ाप्तराजयं सुदास्तितः ॥४८॥| श्रीरामचन्द्रणी बई रसच इए और गाई लक्ष्णणक सहिन अपनेक्तो कृतकृत्य-सा मानने छो । तदनन्तर भगवान्‌ हतङृतयामिवातमानममन्पत ददाह । शामने-सुग्रीवको हृदयसे लगाकर कहा १७-१९ सद्दायेन त्वया पीर जितो मे रावणो महान्‌ । ' जीता है और दे अनभ ! ( उससे ) विभीषणो भी विभीषणोऽपि लङ्कायामसिपिक्तो मयानघ ॥५०॥ , ठछ्स्‍ाक राज्यपर अभिषिक्त क्रिया हे? ॥ ५० ॥ फिर | पास ही बड़े विनीतमातरसे गरे हण हनुमानजीमे + ® विनयाव्यितम | | ततः आहे हृूमन्त गस प । कद्दा-- तुम विभीषणी सम्मतिमे रावणे मळा विभीपणस्याचुमते अच्छ त्व रावणालयम्‌ ॥५१॥, जाओ ॥५१॥ ओर जानकॉर्जीका शवणे बच आदिका जानकये सर्वमाख्याहि रावणस्य वघादिकम्‌। ' समस्त वृत्तान्त तुनाओ, पिर का जो ठु उन दें जानक्याः प्रतिवाक्यं मे शीघ्रमेव निवेदय ॥५२॥ ' वद मुझे सुनाना” ॥५२॥ एवमाङ्ञापितो धीमान्‌ रामेण पवनात्मजः । बुद्धिमान पत्रननन्दनने, भगवान रामकी ऐसी आरा विवेश कळ के. नाः ड ड ; ब : अरविवेशञ पुरी खङ्कां पूज्यमानो निश्चाचरेः ॥५३॥ ; सोसे पृजित हो, काध प्रवेश किया ॥५३॥ फिर रावणके महूलर्म जाफर दिदापसिसने तळे बेटी प्रविश्य रावण शिंशपामूलमाश्रिताम्‌। = अति रछ और द/सिनी अनिम्दिता जबक दद जानकी तत्र कृशां दीनामचिन्दिताम्‌॥५४॥ ¦ नन्दिनाकी देखा ॥५९॥ दे राक्षसियोंस निरी र! थीं राक्षसीभिः परिदृतां ध्यायन्तीं राममेव हि । और एकमात्र भगवान रामक दो ध्यान कर इही थी। विनयावनतो भूत्वा प्रणम्य पवनात्मजः ॥५७॥ पवनडमारने अति विनयावनन होकर उन्हे प्रणाम किया कृताञ्जलिपुटो भूवा प्रहो भक्त्याउग्रत। खितः । 1५०॥ और अत्यन्त नम्रतापृनक भनिभावसे हाथ जोड कर सामने खड़ है गये। उन्हें देखकर जानकीजी ( पहले ठा जानकी तूष्णीं खित्वा पूर्पतिं ययौ।५६। तो कुछ देर) चुप रही, पिर उसमें पर्वेस्मूति हो आगी शासा तं शामदूर्त सा हपात्सोम्यमुसो वभो । ॥५६॥ भीर्‌ उन्हें रामका दूत जानकर उनका मुख हसि त तां सौम्यी दृष्टा तसै प्रननन्दूनः | खिळ गया। हनुमानजीने उन्हें प्रसत्नमुणी देख उनसे रामस भागित सर्वभारुयातुमुपचत्मे irr! रामक सन्देश कहना आरम्भ किया ५०) देवि रामः ससुग्रीयो विभीषण (वे बोले-) “देवि ! बिर्नीपण जिनके सहायक हैं घे द वि ` सुर पि सहायवान्‌ । श्रीरामचन्दजी रक्षण, सुप्रीध और वानर-सेनाके कश । चाचरणा च सन्य सहलक्ष्मणः ॥५८॥ सहित कुडाल्पूर्वक हैं ॥ ५८ ॥ उन भगवान्‌ शमने एण ससुतं इत्वा सबलं सह मन्त्रिभिः । न सेना और मन्त्रियोके महित रावणको मारवार गाया शं रामो राज्ये का बिमीपणय्‌॥५९॥ "¬ “सा व्य विणीपणको देकर ठे अपनी ५ 5 : फुरीळ भेजी हद” ॥|। ५१ || F . 1 ~ R कृत्वा भतु प्रियं वाक्यं हरपगद्भदया शिरा | ` पतिका यह प्रिय सन्देश सुन श्रीसीतानो हसे किते प्रिय करोस्यद्य न पश्यामि जगत्त्रये ॥६०॥ ¦ "दाद णीस बोडी---“मैया, में तुम्हारा क्या प्रिय । वोर 2 तुम्हा ब्रेलोक सस ते प्रयबाक्यस्थ रल्नान्याभरगानि च। |; उ य याजय समान मुझे मिलको | गई त-आभूप्णादि भी दिखायी नहीं देते शः कर पयुक्तस्तु वदृह्या प्रत्युवाच पुज्ञमाः ॥६१॥ । ( जिन्हें देकर तुमसे उण हो ) |” जानकी जीके > [५ सग १२ ] | युद्धकाण्ड २९९ TTT १५५८१५१ ९४९०६८ ७७० ६. १.० ० ४८ ५०२०७ ५०, ~ ४ ४८४८४८० ५८ ९०२० ६० ९१६४ ८० ७४४७७१०७४० ४.१ ४ २६८ २४७७७० ५४३५४ ९ ७/७७७ NNN Ne ९७०७०१. ०७.७ ९. न] (७१७ प _ र रतरोषाद्विविधाद्वापि. देवराज्यादिशिष्पते । | इस प्रकार कहनेपर वानरश्रेष्ठ हनुमानजी बोले--- ~ 8 ॥ ६०-६१ ॥ “मातः ! मैं इत्रुके नष्ट होनेपर स्वस्थ हतशङु विजयिन राम पश्यामि सुस्थिरम्‌ ॥६२॥ | चित्तसे विराजमान विजयशाळी श्रीरामका दर्शन करता ; श्त्वा मैथिली हूँ~—यह मेरे लिये नाना प्रकारकी रहराशि और देव- श्रत्व तस्य तडचनं श्रुत्वा मैथिली ग्राह मारुतिभ्‌ । राज्यसे भी बढ़कर है” || ६२ ॥ उनके ये बचन रे सौम्या गुणाः सौम्य त्वय्येव परिनिष्ठिताई३ | उक मिथिलेशकुमारीने मारुतिसे कहा-- “हे सौम्य ! | जितने झुम गुण हैं वे सब तुम्हींमें वर्तमान हैं || ६३ ॥ रामं द्रक्ष्यामि शीघ्र मामाज्ञापयतु राघवः । अब, मैं र॒घुनाथजीके दर्शन करूँगी, वे शीघ्र ही . |, मुझे भी आज्ञा दे ।” तब हनुमानजी 'बहुत अच्छा' तथात ता नमस्कृत्य यया द्रष्ठ रवूत्तमस्‌ ॥६४॥ | कह उन्हें प्रणाम कर श्रीरघुनाथजीके दर्शनोंके लिये चल दिये ॥ ६४ ॥ जानक्या भापितं सर्व रामसाग्रे न्यवेदयत्‌ । ( वहाँ पहुँचकर ) हनुमानजीने श्रीरामचन्दजीके > ५ 8३ आगे जानकीजीका सारा सम्भापण कह सुनाया _ यच्निमिततोऽयमारम्भः कमणां च फठोदय॥६५॥ | | और कहा-) “गन्‌! जिनके डिये यह युद्ादि [देवी शोकसन्तप्तां य फेशिली सम्पूर्ण कमं आरम्म हुए थे और जो उन समस्त सन्तपां द्रष्टुमहसि मथिलीस । स्त तां देवी शोकसन्तपां ्रषडमहसि मथिलीम्‌ कर्मोंकी फलस्वरूपा हैं, अब उन शोकसन्तप्ता मिथिलेश- एवयुक्तो इनुमता रामो ज्ञानवतां वरः ॥६६॥ | नन्दिनी देवी जानकीको आप देखिये |” हनुमानजी- । परित्यक्त न के इस प्रकार कहनेपर ज्ञानियोंम श्रेष्ठ भगवान्‌ रामने . मायासीतां परित्यक्तुं जानकीमनले खिताम्‌। | प्राया-सीताको त्यागनेके लिये और अग्निखिता आदाहु मनसा घ्याला र ह य्‌ हुए विभीषणसे कहा-। ६५-६७॥ “राजन्‌ ! गच्छ राजन्‌ जनकजामानयाशु ममान्तिकम्‌ । | तुम जाओ और तुरन्त ही जानकीको स्नान करा शुद्ध निर्मळ बख पहना तथा सम्पूण आभूपणोसे _ त. क ° खातां विरजबस्नाव्यां सवोभरणभूषिताम ॥९८॥ | नसज्जित कर मेरे पास छे आओ ॥ ६८ ॥” | विभीषणोऽपि तच्छत्वा जगास सहमारुतिः । यह सुनकर विभीषण हनुमानूजीको साथ ले रि चळे और शुमळक्षणा जानकीजीको वड़ी-बूढ़ी ५ $ ~ स्‌ ९ तुरन्त हा म्च + र सि राक्षसीमिः सुद्भामिः खापयित्वा तु मोथिलीस्‌ ९ राक्षसियोंद्वारा खान करा,सम्पूण वसत्राभूषणोंसे सुसज्जित सर्वाभरणसम्पन्नामारोप्प श्ञिबिकोत्तमे। | होनेपर एक सुन्दर पाळकीपर चढाया और फिर उन्हे, ._ याष्टीकैबहुमिर्युप्रां कञ्चुकोष्णीपिमि? शुभास्‌।७०॥ जामा-पगड़ी आदिसे बने-ठने बहुत-से छडीदारोसे > ले चले ॥ ६९-७० | उस समय ! तां दृष्टमागताः सर्वे वानरा जनकात्मजासू । सुरक्षित कर नेवे " तांद्रइमागवाः सन वानर प सीताजीको देखनेके लिये सत्र वानर दौड़ आये । तान्वारयन्तो बहवः सर्वतो वत्रपाणयः ॥७१॥ | उन्हे चारों ओरसे रोकते तया ( हृटो-दृदो कहकर ) कोलाहरं प्रकुरवन्तो रामपारश्वसुपाययुः । | बडा कोलाहळ करते बहुत-से छडीदार रामचन््रजीके » मितिझारूठां रघत्तम! ॥७२॥ | पास छे आये । रघुनाथजीने दूरसे ही सीताजीक दृष्टा तां शिबिकारूढा दूराद र बे पाळकीपर चढ़ी देखकर कद्दा-॥७ १-७२॥ “विमीपण | विभीषण किमर्थ ते वानरान्यारयन्ति हि। [तुम्हारे ये छडीदार वानरोंको क्यों रोकते हैं! समस्त वि ¢ चर पद्यन्तु वानराः सर्वे मैथिली मातरं यथा ॥७२॥ | वानरगण जानकीका माताके समान दर्शन करे ३०० अध्यात्मरामायण [ सर्ग १२ RST TOISAS SCS owes 5४«४४०४०८ «८-० ee पादचारेण साऽऽयातु जानकी मम सन्निधि । |॥७२॥ और जानकीजी मेरे पास पैदल चळकर आयें !? रत्वा तद्रामवचनं श्िबिकादवरद्य सा ॥७४॥। | रामजीके ये वचन सुन श्रीसीताजी पाठकासि उतर हि हर ~ पड़ी और धीरे-धीरे पदळ ही श्रीरामचन्द्रजीके पास पादचारेण शनकेरागता रामसञ्नधिम्‌ । पहुँची । भगवान्‌ रामने कार्यवश रची हुई माया- रामोऽपि दृष्टा तां मायासीतां कार्याथनिर्मिदाम्‌ ७५| सीताको देखकर उनसे बहुत-सी न कहनेयोग्य अवाच्यवादान्बहुशः प्राह तां रघुनन्दनः । | (उनके चरितरके विपयमें सन्देहयुक्त ) बाते की, ५ श्रीरघुनाथजीद्वारा कहे हुए उन दारक्याका सहन न अम्ृष्यमाणा सा साता वचनं राववादितम्‌ ॥७३॥ कर सकनेके कारण सीताजीने उक्ष्मणर्जासि कददा-- लक्ष्मण आह में शाम ज्वालय हुताशनस्‌ । | “भगवान्‌ रामके विखासके लिये और लोकोंको निश्चय विश्वासार्थं हि रामस्य लोकानां प्रत्ययाय च॥७७॥। | करानेके लिये तुम शत्र ही मेरे लिये अशि प्रज्वलित राघवस्य सतं ज्ञात्वा लक्ष्मणोऽपि तदैव हि | करो” ॥ ७४--७७ || श्रोरघुनायजीका भी सम्मति है ५ समझकर शत्रदमन छक्ष्मगजीन उसी समय बहा महाकाइचयं कृत्वा ज्वालयित्वा हुताशनम्‌ ॥७८॥ ° काय महाकाठचपछ इुताशनम्‌ भारी काप्टसमूह इकट्ठा किया और उसमं अग्नि त्‌ NE ° < RR रामवार्श्क्षपायम्य तस्था “गामास्ल्द्मः | प्रज्वलित कर चुपचाप रामजी के पास आकर खडे हो गये| ततः सीता परिक्रम्य राघवं भक्तिसंयुता ॥७९ | तब सीताजीने भक्तिपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीकी परिक्रमा पश्यतां सर्बलोकानां देवराक्षसयोपिताम्‌। |कौ ॥ ७८-७९॥ और फिर श्रीमिथिनेदाङुमारीने णम्य देवतास्वथ आह्मणेस्यश्व मैथिली ॥८०॥ | समल लोको तथा देव और राक्षसोंकी सियोके देखते-. देखते देवता आर ब्राह्मणों नमस्कार कर अग्निके पास ह. ~ चेदः सुवा La पगा . . वेड्राझाठयुटा बल समी ॥। | जा हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा--“यदि मेरा हदय यथा से हृदय नित्यं नापसपेति राघवात्‌ ॥८१॥ | श्रोरधुनाथजीको छोड़कर कमी अन्यत्र नहीं जाता तो तथा लोकस साक्षी मां सर्वतः पातु पावकः । | समख लोकोंके साक्षी अग्निदेव मेरी सव ओरसे रक्ष एवपुकत्वा तदा सीता परिक्रम्य हुताशनम्‌ ॥८२॥ | करे” ऐसा कह सतोशिरोमणि श्रीसीताजी अझिका a + ASN (०७. ~ { परिक्रमा क निर्भय-चित्तसे से प्रज्य अग्निम विवेश ज्वलन दीपं निर्भयेन हृदा सती ॥८३॥ र्‌ चत्तसे उस प्रस्बलित अस्निने . | घुस गयीं ॥ ८०-८२ | दृष्टा ततो भूतगणाः ससिद्धाः ` उस समय सीताजीकों महा प्रचण्ड अग्निमे प्रविष्ट सातां महावह्विगतां भृशार्ताः | | इई देख समख सिद्ध ओर भूतगण अत्यन्त व्याकुळ परस्परं प्राहुरहो स सीतां | र hindi शक कुछ जानते हुए भी श्रीरामचन्द्रजीने अपनी लक्ष्मी रामः ।श्रय खा कथमत्यजज्ज्ञः ॥८०७॥ सीताजीको कैसे छोड़ दिया £? ॥ ८४॥ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे दुद््काण्डे द्वादशः सर्ग: | १२ ॥ सर्ग १३] युद्धकाण्ड ३०१ he सः र त्रयादश संग देवताओंका भगवान्‌ रामकी स्तुति करना, सीताजी सहित अभिदेवका प्रकट होना, अयोध्याके लिये प्रस्थान | श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेवजी बोले-हे पार्वति ! इसी समय रतिः शकः सहस्राक्षो यमश्च वरुणस्तथा । सहस्राक्ष इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, महातेजखी दृषभ- ल वाहन महादेवजी, मुनि, सिद्ध और चारणोंके सहित विदां ~ ~ ~ २ x न पं भरी ब्रह्मा त्रह्मबिदा श्रेष्ठी मुनिभिः सिद्धचारणः । अप्सराएँ और नागगण ये सब तथा और भी ~= 6 अन्यान्य देवगण श्रेष्ठ विमानोंपर चढ़कर जहाँ श्रीरघु- पितरो कपयः साध्या गन्घवाप्सरसोरमाः साध्य र | ॥॥ २॥ नाथजी थे आये । और वे सब हाथ जोड़कर परमात्मा एते चान्ये बिसानाग्रथराजग्मुयेत्र राघव! । श्रीरामसे वोठे-- ॥ १-३॥ “आप समस्त छोकोंके अह्लुन्परमात्मान रामं गराञ्जलयश्च ते ॥ ३॥ | क्ती, सवके साक्षी और विद्ध विज्ञानलख्य हैं 1 1 0 तथा वसुओंमें अष्टम वसु और रुद्रोंमे श्रीमहादेवजी हैं कृता त्यं सबेलोकानां साक्षी विज्ञानाविग्रह । ॥ ४॥ आप ही समस्त छोकोंके आदिकती चतुर्मुख ब्नामएमोऽसि त्व रुद्राणां शङ्करो भवान्‌ ॥ ४॥ | मह्याजी हैं, अश्विनीकुमार आपको प्राणेन्दिय हैं ओर आदिकतीऽति हका रहा ल॑ | सूर्य तथा चन्द्रमा नेत्र हैं ॥५॥ सब लोकोंके कै पं लाकाना ब्रह्मा त्व चुरान | आदि (उत्पत्तिखान ) और अन्त ( ल्यसान) आप अश्विनो घ्राणभूतो ते चक्षुषी चन्द्रमास्करो ॥ ५॥ | ही हैं तथा आप नित्यखरूप, एक, सदोदित _ देरन्तोऽति नित्य एकः सदोदि ( आविर्भाव-तिरोमावसे रहित नित्यप्रकाशखरूप ) गदिरन्तोऽसि नित्य एकः सदोदित ! लोकानामाईिसन्तोअत [नत्य एकः सदाद नित्यशुद्ध, नित्यबुद्ध, नित्यमुक्त, निर्गुण और अद्वितीय सदा शुद्ध) सदा घुद्धः सदा म॒क्तो ज्युणो5दय॥९॥ | हे ॥ ६ ॥ हे राम ! जो लोग आपकी मायासे आच्छादित व्वन्मायासंइतानां ल मासि माहुपविग्रह | दै उन्हे आप मदुध्यर्य प्रतीत होते है, किन्तु जो . ~ आपका नामस्मरण करते हैं उन्हें. तो आप सवदा चैतन्य- त्वन्नाम सरता राम सदा भात चिदात्मकः ॥ ७। | खरूप ही भासते हैं | ७॥ रावणने हमारे तेजके सहित रात्रणन हृतं खानमसाकं तेजसा सह। म खान भी छीन लायास सो आज वह दुष्ट आपके > ०० पनः प्रात पदं स्वक हाथसे मारा गया और हमें फिर अपना पद प्राप्त हो वाऽय निहतो दुः पुनः र पर सकस । ° हि गया ॥८॥ देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर साक्षात्‌ एवं स्तुवतसु देवेषु ब्रह्मा साक्षात्पितामहः । | पितामह ब्रह्माजी अति विनम्र होकर सत्यपथपर स्थित अन्नवीत्मणतों भूत्वा रामं सत्यपथे स्थितम्‌ ॥ ९ ॥ | भगवान, रामसे वोढे-॥९॥, ५ प्द्मोवाच प्रह्माजी बोळे-“हे राम ! सम्पूण प्राणियोंकी >> = विष्णामशेपसिथितिहेतुं स्थितिके कारण, आम्मज्ञानियोंद्वारा हृदयमें ध्यान किये वन्द दव विष्णुमशेपाथार' ५ जानेवाले, त्याज्य और ग्राह्मरूप इन्द्रसे रहित, सबसे परे त्यामध्यारमहानिभिरन्तहदि भाव्यम्‌ । | अद्वितीय, सत्तामात्र, सवके हृदयमें विराजमान, साक्षी- हेयाहेयहन्द्वविदीन॑ परमेकं खरूप आप विष्णुमगवानको मैं प्रणाम करता हूँ सत्तामात्रं स्दृदिखं दशिरूपम्‌ ॥१०॥ | ॥ १०॥ मोहहीन संन्यासीगण निश्चित बुद्धिके द्वारा | ) 4 अध्यात्मरामायण . [ सर्ग १३ ३०९ oor उन्रमनतरनयरकरन्रयकमकव् ऽ ni nino जज हलक चब ee २2>>>><:-:--'< १०५५५५४००० MP | प्राण और अपानको हृदयमें रोककर तथा अपने प्राणापानी निश्चयबुड्या हृदि रु नी संशय-वन्यन और विपय-आासनाओंका छेदन हित्त्वा सर्वे संशयवन्ध विषयोधान्‌ | | कर जिस ईश्वरका दर्शन करते हँ उन रत्तकिरीटधारी, पश्यन्तीश॑ ये गतमोद्या यतयस्तं | सूर्यके समान तेग गस एको ग रा PTI [हूँ ॥ जो मायासे पर, छमा ) संबक वन्दे रामं रत्किरीटं रविभासम्‌ ॥९१॥ | दारण जगतके उत्पत्ति-स्थान, प्रत्यक्षादि राण भायातीर्त माधवमाद्य॑ जगदादि ; से परे, मोहका नाश करनेवाले, मुनिजनोंसे वन्दनीय; मानातीतं मोहविनाशं मुनिवन्धम्‌। , योगियोसे ध्यान किये प जानेयोग्य, योगमार्गके रक, सर्वत्र परिपूर्ण और सम्पूर्ण संसारको आनन्दित करनेवाळे योगिध्येयं योगविधान परिपूर्ण ; हैं उन परम सुन्दर भगवान्‌ रामको में प्रणाम करता हूँ बन्दे रामं रख्जितलोक रमणीयम्‌ ॥१२। :॥ १२॥ जो भाव और अभावरूप दोनों प्रकारको व | प्रतीतियोसे रहित हैं, तथा जिनके युगळचरणकमर्टो- भावाभावप्रत्ययहीनं भवमुखूये- | का योगपरायण झंकर आदि पृजन करते हैं और जो योगासक्तैरचितपादाम्बुजयुग्मम्‌। | नित्य, शुद्ध, बुद्ध और अनन्त हैं, सम्पूर्ण दानवांके र , न ' लिये दावानठके समान उन ऑकारनामक वीरवर नित्यं शुद्ध बुद्धसनन्‍्त प्रणवारूय ` रामको मैं प्रणाम करता हैं ॥ १३ ॥ हे राम ! आप वन्दे रामं चीरमशेपासुरदाचम्‌ ॥१३॥ | मेरे प्रम हैं और मेरे सम्पूर्ण प्रार्थित कार्योको पूर्ण करने- er ८५ | वाले हैं, आप देश-काछादि मान (परिमाण ) से रहित, त्य स नाथों नार्थतका्यासिलकार | नारायणखरूप, अखिल विश्वकों धारण करनेवाले, मानातीतो माधवरूपो$खिठधारी । | भक्तिसे प्राप्य, अपने खरूपका ध्यान किये जाने- प याया | पर संसार-मयको दूर करनेवाले ओर योगाम्यास- सङत्या शस्यो भावितरूपो भवहारी | से शुद्ध हुए चित्तमें विहार वरनेवाळे हैं ॥ १४ ॥ योगास्यासैर्भावितचेत/सहचारी ॥ १७४1 आप इस छोक-परम्पराके आदि और अन्त ( अर्यात्‌ ,. .. 6 उत्पत्ति और प्रल्यके स्थान ) हैं, सम्पूर्ण लोकोंके रवामाचन्तं लोकततीनां परमीशं महेश्वर हैं, आए किसी भी लौकिक प्रमाणसे जाने लोकानां नो होकिकमानेरधिगम्यस्‌ । | गदी जा सकते, आप तो भक्ति और भ्रद्धासम्पनन वि वका पुरुषोंद्वारा ही भजन किये जानेयोग्य हैं, ऐसे नोल- कभ्नड्वासावससंतभजनाय कमलके समान श्यामसुन्दर आप श्रीरामचन्द्रजीको मैं दन्दे राम सन्दरमिन्दीवरनी ५॥ | प्रणाम करता हूँ ॥ १५॥ हे ढक्ष्मापते ! आप त त सन्दर वरनास्‌ ॥९ प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे परे तथा सर्वथा निर्मान हैं| मायामें को वा ज्ञातुं त्वामतिमानं गतमानं आसक्त कौन प्राणी आपको जाननेमें समर्थ हो सकता मायासक्तो माधव शक्तो मुनिमान्यस । हैं १ आप महर्पियोके माननीय हैं, तया ( इ्णावतार- न्दरण्ये वन्द्तवुन्दारकाइन्द के समय ) डृन्दावनमें अखिल देवसमृहकी वन्दना ८ ` क करते इए भी रामरूपसे शिव आदि देवताओंके खयं वन्दे रामं भवयुखबल्यं सुखकन्द्‌॥ १६॥ प हैं; ऐसे आप आनन्दघन भगवान्‌ रामको मै NRT प्रणाम करता हूँ ॥१६॥ जो नाना शाख और वेदसमूहसे नानाशास्ेबेंदकदम्बेः प्रतिपादय प्रतिपादित नित्य आनन्दखरूप, निर्विकल्प ज्ञान- सर्ग १३] नित्यानन्द नि्विपयज्ञानमनादिम्‌। मत्सेवार्थ मानुपभावं अतिपन्न दे रामं मरकतवर्णं मधुरेशम्‌॥१७॥ श्रद्धायुक्तो यः पठतीमं स्तवमाद्यं त्राह ब्रक्मज्ञानविधानं भुवि मर्त्य! । रामं श्याम कामितकामप्रदमीशं ३०३ खरूप और अनादि हैं तथा जिन्होंने मेरा कार्य करनेके लिये मलुप्यरूप धारण किया है उन मरकतमणिके समान नौल्वर्ण मधुरानाथ# भगवान्‌ रामको प्रणाम करता हूँ ॥ १७॥ जो मनुष्य इच्छित कामनाओंकों पूर्ण करनेवाले श्यामसूर्ति भगवान्‌ रामका ध्यान करते हुए ब्रह्माजीके कहे हुए इस ब्रह्मज्ञान-विधायक आद्य स्तोत्रका श्रद्धापूवंक पाठ करेगा वह ध्यानशीळ पुरुष SETTER ooo ५ ४-९४७९.०९//५ ४७४५-०९ ०७०५ ०२०२७ ५५ ५०००५ थ्यात्वा ध्याता पावकजाठांबगत! स्यात्‌ | सकल पार्पोसे मुक्त हो जायगा” ॥ १८॥ श्रुत्वा स्तुति लोकगुरोबविभावसुः खाझ्टे समादाय विदेहपुत्रिकाम्‌ । बिभ्राजमानां विमलारुणबुर्ति लोकगुरु भगवान्‌ ब्रह्माजीकी यह स्तुति सुन लोकसाक्षी अभिदेवने अपनी गोदमें निर्मल अरुण कान्तिसे सुशोभित और लाळ वक्ष तथा दिव्य रक्तास्वरां दिञ्यविभूपणान्विताग्र)१९॥ आभूपणोसे विभूषित विदेहपुत्री जानकीजीको लिये प्रोवाच साक्षी जगतां रघूत्तमं प्रपत्तसबातिदर॑ हुताशनः । गृहाण देवी रघुनाथ जानकीं ( प्रकट होकर ) शरणागत-दुःखहारी श्रीरघुनाथजीसे कहा--“हे रघुवीर ! पहले तपोबनमें मुझे सौंपी हुई देवी जानकीको अब ग्रहण कीजिये ॥ १९-२०॥ हे पुरा त्यया भय्यवरोपितां बने ॥२०॥॥ हरे | राबणका प्राणहरण करनेके लिये आपने मायामयी विधाय सायाजनकात्मजां हरे दणाननप्राणविनाशनाय च। हतो दशास्यः सह पुत्रवान्धवे- सीता रचकर राबणको उसके पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके सहित मार डाला। हे प्रभो ! ऐसा करके आपने प्रथिवीका भार उतार दिथा ॥ २१ ॥ वह प्रतिविग्ब- निराक्रतोध्नेन भरो भुवः प्रभो ॥२१॥ | रूपिणी मायासीता, जिस कार्यके लिये रची गयी तिरोहिता सा प्रतिविम्बरूपिणी कृता यदर्थ कृतकृत्यता गता । ततो5तिहु्टां परिग्रक्न जानकीं राम! प्रहृएः प्रतिपूज्य पाचकम्‌ ॥२२॥ स्वाट्ट समावेश्य सदाऽनपायिनीं श्रियं त्रिलोकीजननी श्रियः पति? दृष्ट्वाऽथ रामं जनकात्मजायुर्त श्रिया स्फुरन्तं सुरनायको गुदा । भक्त्या गिरा गद्रदया समेत्य थी उसे पूरा करके अब अदृश्य हो गयी है ।” अझि- देवके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने अति प्रसल हो उनका पूजन कर प्रसन्नवदना जानकी- जीको ग्रहण किया ॥ २२ ॥ फिर छक्ष्मीपति भगवान्‌ रामने अपनेसे कभी बिलग न होनेवाळी जगजननी जानकीको गोदमें बैठा ल्या । उस समय जनकनन्दिनी सीताजीके सहित भगवान्‌ रामको कान्तिसे सुशोभित देख देवराज इन्द्र अति प्रसन्नता- पूवंक हाथ जोड़कर भक्ति-गद्गद वाणीसे स्तुति कृताञ्जलिः स्तोतुमथोपचत्रमे ॥२३।। | करने गे ॥ २३ ॥ इन्द्र उवाच भजेऽहं सदा राममिन्दीवराभं भवारण्यदावानराभामिधानम्‌ । ह यहाँ भगवान्‌ रामको 'मधुरानाथ” कहकर शीराम और कृष्णकी अभिशषता मकर की है। इन्द्र बोळे -जो नौलकमलकी-सी आमावाले हैं, संसाररूप बनके लिये जिनका नाम दावानछके समान है, श्रीपार्वतीजी जिनके आनन्दखरूपका हृदयमें ध्यान अध्यात्मरामायण [सर्य १३ शि करती हैं, जो ( जन्म-मरणरूप ) संसारसे छुडानेवाळे हैं और शंकरादि देवोंके आश्रय हैं उन भगवान्‌ रामको मैं भजता हूँ ॥ २४ || जो देवमण्डलके दुःखसमूडका नाझ करनेके एकमात्र कारण हैं तथा जो मनुष्यरूपधारी, आकारहीन और स्तुति किये जानेयोग्य हैं, प्रथिवीका भार उतारनेवाले उन परमेश्वर परानन्दरूप के भगवान्‌ रामको मैं भजता हूँ ॥ २५ || जो शरणागतो.- को सब प्रकारका आनन्द देनेवाळे और उनके आश्रय हैं, जिनका नाम शरणागत भक्तोके सम्पूर्ण दुःखों- को दूर करनेवाळा है, जिनका तप और योग एवं बड़े-बड़े योगीश्वरोंकी भावनाओंद्वारा चिन्तन किया जाता है तथा जो सुग्रीवादिके मित्र हैं, उन मित्ररूप भगवान्‌ रामको मैं भजता हूँ॥ २६ ॥ जो भोगपरायण लोगोंसे सदा दूर रहते.हे और योगनिष्ठ पुरुषोंके सदा समीप ही विराजते हैं, श्रीजानकीजीके ढिये आनन्दस्वरूप उन चिदानन्दधन शरीरघुनाथजीको मैं सर्वदा भजता हूँ ॥ २७॥ हे भगवन! आप अपनी महान्‌ योगमायाके गुणोंसे युक्त होकर लीलासे ही मनुष्यरूप प्रतीत हो रहे हैं| जिनके कर्ण आपकी इन आनन्दमयी छीळाओंके कथामृतसे पूर्ण होते हैं बे संसारमें नित्यानन्दरूप हो जाते हैं || २८ || प्रमो ! मैं तो सम्मान और सोमपानके उन्मादसे मतवाला हो रहा था, सर्वेश्वरताके अभिमानवश मैं अपने आगे किसीको कुछ भी नहीं समझता था। अब आपके चरणकमलोंकी कृपासे मेरा त्रिलोकाधिपतित्वका अभिमान चूर हो गया | २९ ॥ जो चमचमाते हुए रत्जटित भुजबन्ध और हारोंसे सुशोभित है, पुथिवीके ३०४ OO IS FO I Tq PPP rT VAIO कम्फ रकम: कम कम रहकर का ७ 1 कक RI SN PS Mr ळक ANIL भवानीहृदा भावितानन्दरूपं मवामावहेतुं मवादिमर पन्नम्‌ ॥२४॥ सुरानीकदुःखौघनाधेकहेतुं नराकारदेहं निराकारमीड्यस्‌ । प्रेशं परानन्दरूपं बरेण्यं हरिं राममीशं मजे भारनाशम्‌ ॥२५॥ प्रपत्माखिलानन्ददोह अपन्न ग्रपञ्चातिनिशेषनाशामिधानम्‌ । तपोयोगयोगीशमभावामिमाव्यं कपीशादिमित्रं भजे राममित्रस्‌ ॥२६॥ सदा सोगमाजां सुदूरे बिभान्तं सदा योगभाजामदूरे विभान्तम्‌ । चिदानन्दकन्दं सदा राधवेशं विदेहात्मजानन्दरूपं प्रपधे ॥२७॥ महायोगमायाविशेषाचुयुक्तो विसासीश रीलानराकारबृत्तिः | तदानन्दलीलाकथापूर्णकर्णाः सदानन्दरूपा भवन्तीह ठोके ॥२८॥ अहं मानपानाभिमत्तश्रमत्तो न वेदाखिलेशामिमानासिमानः । इदानीं सपत्पादपस्रसादात्‌- ` वरिलोकाधिपरयाभिमानो विनष्टः | २९॥। 'इखतकूरहाराभिरामं माररूप राक्षसोंके लिये दाबानलके समान हैं, चरायारभूतासुरानीकदावस्‌ । | जिनका शरबन्द्रके समान सुख और अति मनोहर शरञन्द्रवक्त्रं हसत्पञ्चनेत्रं ेत्रकमछ हैं तथा जिनका आदि-अन्त जानना अत्यन्त कठिन है उन रघुनायजीको मैं भजता ह ॥२०॥ सुराधीशनीसाअनीलाइकास्ति जिनके शरीरकी इन्द्रनीछ मणि और मेघके समानं विराधादिरधोवधाह्नोकशान्ति श्याम वानिति है, जिन्होंने विराध आदि राक्षसों- किरीटादिशे ररक्षावधाळ्लोकशान्तिस्‌ । | को मारकर सम्पूर्ण छोकोंमें शान्ति स्थापित की है किरटादशोभ इरारातिछाभं | उन किरौटादिसे सुशोभित और ्रीमदादेवजीके परम- भजे रामचन्द्र रडमासधोशमु ॥३१। | पत्र रघुकुलेश्वर रामचन्केजीको मैं भजता हू ॥ ३१॥ ४ का Semmes > 3 णो दुरावारपारं भजे राघवेशम्‌ ॥३०॥ सगे १३ ] युद्ध काण्ड ` ३०५ _ लसचन्द्रकोटिम्रकाशादिपीडे समासीचम्ङ्के समाधाय सीताम्‌। स्फुरद्धेमवर्णां तडित्पुञ्जभासां भजे रामचन्द्रं निवृत्तातिंतन्द्रम्‌ ॥३२॥ त्तः प्रोवाच भगवान्भवान्या सहितो भव! । रामं कमलपत्राक्षं विमानस्थो नभस्थले ॥३२॥ आगमिष्याम्ययोध्यायां द्रष्ड त्यां राज्यसत्कृतम्‌। इदानीं पश्य पितरमस्य देहस्य राघव ॥३४॥ वतोऽपर्यद्विमानस्थं रामो दशरथं पुर! । ननाम शिरसा पादो मुदा भक्त्या सहाबुजः।३५॥ आहिङ्गच मूध्न्यवप्राय रामं दशरथोऽत्रवीत्‌। तारितोऽसिमि त्वया बर्स संसारादुःखसागरात्‌ ३६ इत्युक्त्वा पुनरालिङ्गथ ययो रामेण पूजितः। रामोऽपि देवराजं ते दृश्वा प्राह कृताझञलिम्‌॥३७। मत्कृते निहतान्सङ्कथे चानरान्पतिताच्‌ भुवि । जो तेजोमय छुवर्णके-से वर्णवाली और बिजलीके समान कान्तिमयी जानकीजीको गोदमें लिये करोड़ों चन्माओं- के समान देदीप्यमान सिंहासनपर विराजमान हैं उन निदुँःख और आळस्यहीन भगवान्‌ रामको मैं भजतां हैं ॥३२॥ तढनन्तर आकाशमें विमानपर बैठे हुए भवानी- सहित भगवान्‌ शंकरने कमल्दळलोचन श्रीरामचन्द्रजीसे कहा--| ३३ || “हे रघुनन्दन ! मैं आपको राज्या- भिपिक्त होते देखनेके लिये अयोध्यापुरीमें आऊँगा; इस समय आप अपने इस शरीरके पिता (दशरथ ) का दर्शन कीजिये” ॥३४। तब श्रीरामचन्द्रजीने अपने सामने विमानपर बैठे हुए महाराज दशरथको देखा । (उन्हें देखते ही ) उन्होंने प्रसन्न होकर भाई ठक्ष्मणके सहित भक्तिपूर्वक चरणोंमें शिर रखकर प्रणाम किया ॥ ३५ ॥ दशरथजीने श्रीरामचन्द्रजीकों हृदयसे लगा ल्या और उनका शिर सूँघकर कहा--“बेटा ! तुमने मुझे संसाररूप दुःखसमुद्रसे पार कर दिया” ॥ १६ ॥ ऐसा कह श्रीरामको फिर हृदयसे लगा और उनसे पूजित हो दशर॒थजी चले गये । तब शरामचन्द्रजीने देवराज इन्द्रको हाथ जोडे खड़ा देखकर कहा--1। ३७ ॥ “हे सहस्राक्ष ! मेरी आङ्गासे तुम अशत बरसाकर मेरे' लिये युद्धमें मरकर जीवयाशु सुधादृष्टया सहस्राक्ष ममाज्ञया ॥३८॥ | पुथिवीपर गिरे हुए वानरोंको तुरन्त जीवित कर तथेत्यसृतदृष्ट्या ताच्‌ जीवयामास वानरान्‌ । थे ये सृता सधे पूर्व ते ते सुप्तोत्थिता इव । पूर्वद्वलिनो हृष्टा रामपार्थ्मुपाययु! ॥३९॥ नोत्थिता राक्षसास्तत्र पीयूपस्पशनादपि। विभीषणस्तु साष्टाङ्ग प्रणिपत्यात्रवीदच) ॥४०२॥ देव भामलुग्रह्लीप्य मयि भक्तिर्यदा तव | दो” ॥ ३८ ॥ (ऐसा सुन देवराजने ) बहुत अच्छा कह अमृत बरसाकर उन सब वानरोंको जीवित कर दिया । जो-जो वानर पहले युद्धम मारे गये थे वे समी सोकर उठे हुएके समान पहलेकी भाँति ही वलवान्‌ और प्रसन्न होकर भगवान्‌ रामके पास चळे आये | २९ किन्तु वहाँ ( युद्धमें मरकर गिरे हुए) राक्षसगण अमृतका स्पर्श होनेपर भी नहीं उठे ।# इसी समय विभोषणने साष्टांग प्रणाम करके कहा-।४०॥ “भगवन्‌! आपकी सुझपर अत्यन्त प्रीति है; अतः इतनी कृपा कीजिये कि आज श्रीसीताजीके & असृतका स्वाभाविक गुण जीवनदान करना है, अतः असृतका स्पर्श होनेपर भी राक्षसोंफे जीवित न होनेसे स्वभाव-विपयेगक्रा दोप आता है। परन्तु भगवदिच्छाका प्रभाव इतना प्रबळ है कि उसके आगे कुछ भी असम्भव नहीं है; भगवानूक्ती इच्छा न होनेसे अझतका प्रभाव भी बाधित हो गया। इसके अतिरिक्त इसका दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि सादात्‌ भगवान्‌ रामके द्वारा मारे जानेके कारण रास सुक्त हो गये थे, इसलिये अम्ृतका संसर्ग भी उन्हें फिर जीवित न कर सका | ब्र CT १५१ ७. ९ ७८० अध्यात्मरामायण [ सगे १३ ३०६ rrr TETRIS ITS armen दाक ७७ पन कककेटकेकी ७४ क पक ककी कोश विशी अल कज बो Tre eee ese , अनाश्मम्जितिल* |, हित मंगलखान कीजिये ॥ ४१ ॥ फिर कळ माई मङ्गलखानमध त्वं कुरु सीतासमाच्चतः ॥४ र| स पो र र लक्ष्मणके सहित वख्नाभूपणोसे छुसजित हो हम सत्र -अखङत्य सह आवा श्वो गमिष्यामहे वयस्‌। | चळे |” विभीषणे ये वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी विर्भापणवचः शृत्वा अत्युवाच रघूत्तमः ॥४२॥ | बोले--॥ ४२॥ “मेरा भाई भरत अति सुकुमार और I कने मेरा भक्त है; वह जटा-वल्कळ धारण किये ऑकारका रोऽति तो मामवेक्षते । ! के इनार यका पै भरा ~ है | चिन्तन करता हुआ मेरी बाट देखता होगा ॥ ४३-॥ जटावृल्कलधारी स शब्दत्रह्मसमादितः ॥४२॥ उससे मिळे बिना मैं कैसे खान अथवा शप कर्थं तेन विना ख़ानमलङ्कारादिकं मम । | धारण कर सकता हूँ £ अतः अब तुम शीघ्र ढी 0 ~> | सुग्रीबादि वानरोंका ही बिशेष सत्कार कर दो ॥ ४४ ॥ ! सुग्रीवमुख्यांस्त्व पूजयाशु विशेषत) 11४४॥ , > वरं ee 3. अतः इ्रीवसुख्यास्थ पुजयाछ | इन वानर-वीरोका सत्कार होनेसे मेरा ही सत्कार कुक ण्याचा पूजितेषु कपौन्द्रे पूजितोऽहं न संशयः । होगा--इसमें सन्देह नहीं ।” - किक © ; इत्युक्तो राधवेणाशु खणरत्ताम्वराणि च ॥४५॥ ' ररुनाधनाके ऐसा कहनेपर रासभे विमीपणने = & ~ i + पर > ववष राक्षसश्रेष्ठो यथाकामं यथारुचि । ! वानरोंको उनकी इच्छा और रुचिके अनुसार i ततस्तात्पूजितान्दष्ट्या रामो रत्ैथ यूथपान्‌ ॥४६॥ वडत-से रत और सि द ये । इस परकार ह शू a , उन सब वानर-वृथपातियाक रक्रादस तत्कृत दखे अभिनन्दय यथान्यायं विससज हरीश्वराब्‌। : ˆ" भराची सतक इ स व ee [जीने सवकी यथायोग्य बडाई को और उन्हे विभीषणसमानीत पुष्पकं दव्यवचसम्‌ ॥४७॥ | बिदा किया । फिर दे, सकुचाती हुई यशस्विनी जानकी- आरुरोह ततो रामस्तद्विमानमनुत्तमम्‌ | | आको गोदमें ठे महापराक्रमी धनुर्धर भाई व्क्मणके र ९७ क त j बिभ री > तेजस्वी £ अड्डे निधाय वैदेही छजमानां यशखिनीम्‌ ॥४८॥ ' डितः विमीपणके छाये इए सुके समान ते अतिउत्तम पुष्पक बिमानपर आखूड हुए विमानपर |« ळर भ्र [a ha ण्‌ 1 लव न दे रात्रा कान्न दा | बैठकर भगवान्‌ रामने वानरराज सुग्रीव, अंगद, विभीषण अजवाच विसानसः श्रारामः सवेवाचरान्‌ ॥४९॥ | और समस्त वानरोसे कहा--“आप छोगोंने अन्य ग्रीवं हरिराजं च अङ्गदं च विभीषणम्‌ । | समल वानर-वीरोंके सहित, भित्रका जो कुछ कार्य ित्रकार्य कृतं सर्वे भवद्धि! सह वानरे! ॥५०॥ | हीत है वह खूब निभाया पे म्या नो मय क्ति ह 1 आज्ञानुसार आप अपन इच्छित सानवि अजुज्ञाता मथा सर्वे यथेष्टं गन्तुमहथ । जाइये । सुग्रीव ! तुम अपने समत्त सैनिकोंके सहित ग्री प्रतियाह्याशु किष्किन्धां सर्वसेनिकेः॥५१॥ | शीघ्र हो किष्किन्धाको जाओ ॥ ५१ ॥ विभीषण ! तुम खराज्ये बस लङ्कायां मम भक्तो विभीषण। (मा मकि तत्पर रहकर अपने राज्यपर लंकामें रहो 1“ प Or _ ~~ | अब इन्द्रके सहित देवगण भी तुम्हारा बाळ वाँका न.त्वां घपयितुं शक्ताः सेन्द्रा अपि दिवोकस!॥५२) „` आयोच्याया िचा ५२ | नहीं कर सकते ॥ ५२ ॥ अब में अपने पिताजीकी गाया गन्तुमिच्छामि राजघानों पितु्ेम। | राजधानी अयोध्यापुरीको जाना चाहता हूँ ।” एवयुक्तास्तु रामेण चानरास्ते महाबलाः ॥५३॥ | श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर वे समस्त ऊचुः ग्ाञ्ञलयः सर्वे राक्षसथच विभीषणः । महाबली वानरगण तथा राक्षसराज विभीषण हाथ जोड़कर वोले--“हे रघुश्रेष्ठ | हम सव आपके साथ अयाध्या गन्ताभच्छाम | न्हामच्छामस्त्वया सह रघूत्तम ॥५४॥ ' अयोध्या चळना चाहते हैं | ५३-५३ ॥ हे प्रमो ! दृष्टा त्यामभिपिक्त तु कोसल्यामभिवाद्य च। हम आपको राज्याभिषिक्त हुआ देखकर और मात ज्यमन शा दे कोसल्याकी बन्दना कर फिर अपना राज्य प्रहण पथादूवृणीमहे राज्यमनुजञां देहि नः ५ उहा दाह ना अभी ht | करेंगे; आप हमें (साथ' चळ्नेकी ) आज्ञा दीजिये! रामस्तथेति सुग्रीय वानरे! सविभीषणः ॥५५]॥ तब रामचन्द्रजीने कह्ा“बहुत अच्छा सुग्रीव ! अब वानरोंके सहित तुम शीघ्र ही विभीषः उके सहना शामरमारोह साम्यतम ॥५३॥ | और हनुमानको साथ लेकर इस विमानपर चढ़ों i ततस्तु पुष्पक दिव्य सुग्रीवः सह सेनया । |॥१६॥ तब, सेनाके सहित सुग्रीव और मन्तः सहित विभीषण-ये सभी बड़ी शोभरतासे दिव्य विमा विभीपणथ सामात्यः सवे चाररुहुदतम्‌ ॥५७॥ | पुष्यकपर चढ़ गये ॥ ५७॥ ेव्यारुढेषु स्वेषु कोवेरं परमासनम्‌ । उन सबके आरूढ दो जानेपर बह कुबेरका परम ho ~ राघदेणाम्यनुज्षातयुत्पपात चविहायसा ॥५८।॥ | यान भगवान्‌ रामकी आज्ञा पा आकाडा-मार्गसे उड़ वभौ तेन विमानेन हंसयुक्तेन भाखता। |चेछा ॥५८॥ उस तेज़ी विमानपर जाते हुए प्रहृश्थ तदा रामब्रतुपुख इवापरः ॥५९॥ | गवाय राम बड़े प्रस हर भौर ऐसे Fin ड ततो ` दमौ मारव मानो दूसरे ब्रह्माजी हंसपर चढ़े जा रहे हों ॥५९॥ उस कुवेरयानं ठर समय, वह तपस्यासे प्राप्त हुआ कुबेरका यान सूर्य- इम्ेरयानं तपसानुलव्यम । ब्िम्बके समान सुशोमित होने रगा तथा श्रीसीताजी रामेण शोभां नितरां प्रपेदे और भाई लक्ष्मणके सहित भगवान्‌ रामके कारण तो सीतासमेतेन सहाबुजैन ॥६०॥ | उसकी शोमा और भी अधिक बढ़ गयी ॥६०॥:. A इति श्रीमद'्यस्मिरामायणे उमामहेश्वरसंचारे मुद्धकाण्डे त्रयोदशः सर्ग: ॥ १३॥ es oer oe चतुर्दश सर्ग अयोध्या-यात्रा, भरढाज सुनिका आतिथ्य तथा भरत-मिलाप | श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेवजी वोळे-हे पार्वति ! तदनन्तर. सब पातयित्वा ततक्षुः सर्वतो रघुनन्दनः । ओर दृष्टि डाछकर श्रीरघुनाथजीने मिथिलेशकुमारी ` अनवीनेथिठी सीतां रामः शशिनिभाननाम ५१॥| + की सौताजीसे कहा-॥ १॥ “प्रिये ! जिकूठ ° ७. १ ५ ५ पर्वतकी चोटीपर बसी हुई यह परम प्रकोशमर्या त्रिकूटशिखराग्रखां पश्य ङ्का महापभाव | ळंकापुरी देखो और यह मांसमयी कौचड़से भरी हुईं एतां रणडुव पश्य मांसकर्दमपङ्किलास्‌॥ २॥ रणभूमि देखो ॥२॥ यहाँ राक्षसो और वानरोंका बडा असुराणां प्लवङ्गानामत्र घेशसनं महत्‌ । | आरो संहार हुआ है । यहीं मेरे हायसे मरकर राक्षस- अत्न मे निहृतः शेते रावणो राक्षसेश्वरः ॥। २॥ | राज रावण गिरा था ॥ ३॥ और यहीं कुम्मकर्ण, कुम्भकणेन््रजिन्सुख्याः स्वे चात्र निपातिता} ) | इन्द्रजित्‌ आदि समल राक्षस-बर मारे गये हैं । एप सेतुर्मया बद्धः सागरे सलिलाशये॥ ४॥ यह मैंने जलपूर्ण समुद्रपर पुछ बाँधा था ॥४॥ देखो, . अध्यात्मरामायण [ सम्‌ १४ eer > 7० 44७८७ ६०७ ४० ७४७ Noe PNA NINN NFU ८ on i, Pe क त्मनः समुद्रपर यह सेतुबन्ध नामसे विख्यात ती सागरस महात्मनः। | इस विशाल समुद्र है, जो तीनों ठोसे पूजनीय ह एच दश्यत तीर्थ दिखायी देता है, नो तीनों छोकोसि पूजनीय हैं सेतुबन्थमिति ख्यतं जैसोक्येन च पूजितम्‌ ५) | |... | बह अत्यन्त पवित्र है और दर्शनमाजसे ही एतत्पवित्रं परमं दर्शनात्पातकापहम्‌। | सम्पूर्ण पार्पोको नष्ट करनेबाठा है. । यहाँ मैंने , महादेवकी स्थापना की है ॥ ६ ॥ यहीं Ns प्या अतिष्ठित ॥ ६ ॥ | शरीरामे्वर | स्प ह ' अन्न रामेश्वरो देवो मया श्छ तिषठ मन्त्रियोंके सहित विभीपण मेरी शरणमे आया था ।. अत्र माँ शरणं प्राप्त मन्त्रिभिश्च विमीपणः। | (और देखो) यह विचित्र उपवरनोचाळी सुग्रीवी एवा सुंग्रीवनगरी किष्किन्था चित्रकानना ॥ ७॥ | राजधानी किप्किल्धापुरी हैं” ॥ ७ ॥ किप्कित्यामे त नह पहुँचनेपर भगवान्‌ रामक्री आज्ञासे सीताजीको प्रसन्न तत्र रामाज्ञया ताराप्रमुखा हरियोषितः । | करनेके छिये सुप्रीय अपनी तारा आदि खरियोंको छे ` आनयामास सुग्रीवः सीतायाः प्रियकाम्यया ॥८॥। | आये ॥८॥ जब रघुनाथजीने विमानको तुरन्त ही उन थतं शी विमान रे , सबको लेकर भी चलते देखा तो वे (फिर सौता- . ताभिः सहोत्थित शीधं विमान क्य राघवः । जीसे) कहने छो--“भह ऋष्पमूक-पर्वत देखो, यहाँ प्राह चाद्रिसष्यसूकं पश्य वाल्यत्र में हत।॥ ९ ॥| | मैंने वाळीको मारा था ॥९॥ इधर, प्नवटी है जहाँ मैंने एपा पञ्चवटी नाम राक्षसा यत्र मे हताः। | (खर्दूपणादि) राक्षसोका संहार किया था । देखो, है ये मुनिवर अगस्त्य और सुतौद्ष्णके अति पवित्र आश्रम अगस्त्यस्य सुतीक्षणस्य पश्याश्रमपदे छुमे॥१०। ३ ॥१०॥ हे सुन्दर वर्णवाली ! देखो, ये ये सव तपखी- एते ते तापसा? सर्वे दुश्यन्ते वरवर्णिनि । गण दिखायी दे रहे हैं और हे देवि ! यह पर्वतश्रेष्ठ असौ शेढवरो देवि चित्रकूटः प्रकाशते ॥११॥ | चित्रकूट दीख रहा हे ॥ ११ ॥ यहीं मुझे मनानेके कि लिये वोकेयीके पत्र भरत आये थे; और देखो, अन्न मां केकयीपुत्र। प्रसादय्रितुमागतः | वह यमुनाजीके तटपर भरद्वाज मुनिका आश्रम मरद्वाजाश्रमं पश्य इश्यते यमुनातटे ॥१२॥ | दिखळायी दे रहा है ॥१२॥ ये त्रिलोकपावनी भागीरथी *| गंगाजी दीख रही हैं और हे सीते ! (सूर्यवंशी राजाओं- के किये हुए यज्ञोके) यूपो (यज्ञस्तम्भों ) से युक्त यह एवा सा इश्यते सीते सरयूयूपमालिनी ॥१३॥ । सरयू नदी दिखायी दे रही हैं | १३॥ हे सुन्दरि ! | देखो, वह अयोध्यापुरी दीख रही है, उसे प्रणाम । करो ।” इस प्रकार भगवान्‌ राम कमसे भरद्वाज मुनिके एवं क्रमेण सम्प्राप्तो भरद्वाजाश्रमं हरि! ॥१४७॥ | आश्रमपर पहुँचे ॥ १४॥ ` एषा भागीरथी शङ्का इश्यते लोकपावनी । ` एषासा दृश्यतेड्योध्या प्रणामं कुछ भामिनि । पूर्ण चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां रघुनन्दनः | भरद्वाज युनिं दृष्टा ववन्दे सानुजः प्रञ्चः॥१५॥ | शरीरघुनाथजीने चौदह वर्पके समाप्त होनेपर | पञमी तिथिको मुनिवर भरद्वाजके दर्शन कर उन्हें भाई लक्ष्मणसहित प्रणाम किया ॥१५॥ फिर पप्रच्छ झुनिमासीनं विनयेन रघूत्तमः। | आाश्रममे विराजमान मुनिवरसे रघुश्रेष्ठ औरामचन्द्रजीने भृ अति नग्नतापूर्वेक पूछा-“आपने कुछ सुना है, भाई शृणोषि किङ कुशरयास्ते सहानुजः ॥१६॥ झातरुत्रसहित भरत कुरते हैन? || १६॥ अयोष्यामें सुभिक्षा वततेऽयोष्या जीवन्ति च हि मातर! । - | सुकाल तो है और हमारी माताएँ अभी जीवित हैं न १” क्षृत्वा रामस्य वचर्न सरद्वाजः प्रहृष्टधीः ॥१७॥ आह्‌. सर्वे कुशलिनो भरतस्तु महामनाः । फलमूलेकृताहारो जरावस्कलुधारकः ॥१८॥ पाहुके सकलं न्यस्य राज्यं त्यां सुप्रतीक्षते । Er] त्वया कमें दण्डके रघुनन्दन ॥१९॥ राक्षसानां विनाश च सीताहरणपूर्वकस्‌ । सवं ज्ञातं मया राम तपसा ते प्रसादतः ॥२०॥ त्वं जह्म परमं साक्षादादिमध्यान्तवजितः । त्वसग्रे सलिठं सुष्ठा तत्र सुप्तोऽसि थूतळुत्‌ ॥२१॥ नारायणोऽपि विश्वात्मन्नराणामन्तरात्मकः। त्वन्नाभिकमलोत्पन्नो ब्रह्मा लोकपितामहः ॥२२॥ अतस्त्वं जगतामीशः सर्वलोकनमस्कृतः । _ स्व विषणुर्जानकी लक्ष्मीः शेपो5य लक्ष्मणाभिधः॥ आत्मना सृजसीदं त्यमात्मन्येवात्ममायया । न सझसे नभोवरवं चिच्छकत्या सर्वसाक्षिक।२४। बहिरन्तश्च भूतानां त्वमेव रघुनन्दन । पूर्णोऽपि मूढ्ीनां विच्छिन्न इव क्ष्यते ॥२५॥ जगत्त्वं जगदाधारस्त्रमेव परिपालकः । त्वमेव सर्वभूतानां भोक्ता भोज्यं जगत्पते ॥२६॥ द्यते शूयते यद्यस्सर्यते वा रघूत्तम । त्वमेव सर्वमखिलं त्वद्दिनान्य्न किञ्चन ॥२७॥ माया सूजति लोकांश्र खगुणरहमादिमिः । त्वच्छक्तिप्रेरिता राम तसात्वययुपचयेते ॥२८॥ यथा चुम्बकसात्रिध्याचलन्त्येवायआदयः । जडास्तथा त्वया दृष्टा माया सूजति वे जगत्‌॥२९॥ देहद्यमदेहस्य॒ तथ विश्वं रिरक्षिो! । सुद्ध कार्णड ३० प 1989 ™1_™_\_\_ ०५ ह भगवान्‌ रामके ये वचन सुनकर भरद्वाज सुनिने प्रसन्न होकर कहा--“आपके यहाँ सब सङुशळ हैं | महामन] भरतजी तो जटा-वल्कळ धारण किये फल- मूछादिसे निबीह करते हुए राज्यका सारा भार आपकी पादुकाओंको सौंपकर आपहीकी प्रतीक्षा कर रहे हैं । हे रघुनन्दन | आपने दण्डकारण्यमें जो-जो' कार्य किये हैं तथा सीता-हरण होनेपर जैसे-जैसे राक्षसोंका वध किया है वह सव आपकी कृपासे मैंने तपोबल्से जान छिया है || १७-२० ॥ आप आदि, अन्त आर मध्यसे रहित साक्षात्‌ परब्रह्म हैं। आप समस्त भूतोंको रचनेवाले हैं | आपने सबसे पहले जळ रचकर उस- पर शयन किया था । हे विश्वात्मन्‌ ! आप समस्त मनुष्योंके अन्तरात्मा हैं, अतः आप नारायण हैं.। आपके नामिकमळसे उत्पन्न इए ब्रह्माजी सम्पूर्ण छोकोंके पितामह हैं ॥ २१-२२॥ अतः आप समस्त छोकोंसे वन्दित और सम्पूर्ण जगतके खामी हैं। आप साक्षात्‌ विष्णुभगवान्‌ हैं, जानकीजी लक्ष्मी हैं और ये लक्ष्मणजी रोषनाग हैं ॥२३॥ आप अधिष्ठान- खूपसे अपने भीतर ही अपनी मायाके द्वारा स्वयं अपने-आपसे ही इस सम्पूर्ण जगतको रचते हैं, किन्तु आकाशके समान किंसीसे भी लिप्त नहीं होते । आप अपनी चित-शक्तिसे सबके साक्षी हैं. ॥२४॥ हे रघुनन्दन ! समस्त प्राणियोंके भीतर और बाहर आप ही व्याप्त हैं, इस प्रकार पूर्ण होनेपर भी आप मूढ-बुद्वियोंको परिच्छिन (एकदेशी) से दिखायी देते हैं ॥ २५॥ हे जगत्पते ! आप ही जगत्‌, जगत्के आधार और उसका पालन करनेवाले हैं; तथा आप ही समस्त ग्राणियोंके (काळरूपसे) भोक्ता और (अन्नरूपसे) भोज्य हैं ॥२६॥ हे रघुश्रेष्ठ जो कुछ भी दिखायी देता है तथा जो कुछ सुना ओर स्मरण किया जाता हैं वह सब आप ही हैं; आपके अतिरिक्त और कुछ मी नहीं है ॥ २७॥ हे राम ! आपकी झत्तिसे प्रेरित होकर द्व माया अपने अहङ्कारादि गुणोंसे सम्पूर्ण छोकोंको रचती है, इसोलिये इन सबकी रचनाका आपहीमें.आरोप किया जाता है ॥ २८॥ जिसम्रकार चुम्बककी सब्रिधिसे लोहा आदि जड पदार्थ भी चछायमान हो जाते हैं उसी प्रकार आपकी दृष्टि पडनेसे ही माया सम्पूर्ण जगतकी रचना करती हे ॥ २९ ॥ बिश्वकी रक्षा करनेके इच्छुक आप | { ३१५ अध्यात्मरामायण [ सग १४ न ४४८१८0५ | 7७१७४५१ ४४४७ ००५ ४९/६४९७ ५ #५ 8 ६ PID NO Fee pope t स देहहीन होकर भी दो देहवाढे हैं। आपका स्थूळ विरार्‌ स्थूरं शरीरं ते समे सह्ममुदाहतस ॥१०॥ | ई धो मो द हे आपका तूर कोायान्त प्रविशल्त्येव बिराज रघुनन्दन ॥२१।। ¦ ये सहृलों अवतार उत्पन्न होते हे और अपना कार्य समाप्त कर फिर उसीमं छीन हा जाते हँ॥३१॥ अवतारकथां लोके ये गायन्ति गृणन्ति च । हे रघुश्रे्ट संसारम जो ठोंग अनन्य चित्तस आपके अनन्यमनसो दुक्तिसतेपामेव रघूत्तम ॥१२॥ ' अबतारोंकी कथा गाते और सुनते हैं उनकी तो कि अवश्य हा हा जाती है॥ २२॥ है राघव ! पृथका ले जगा इए इभवारहाराख राघव । ब्रह्माजाने आपसे प्रथिवीका भार उतारनके लिये प्रार्थितस्तपसा तुष्टस्त्वं जातोऽसि रघोः कुठे ॥३२॥ प्रार्थना की था) उनकी तपा सन्तु होकर हा आपनं रघुकुलम अत्तार लिवा हैं ॥ देवकार्यमशेपेण क्तं ते राम दुष्कर | राम ! जो अत्यन्त दुष्कर था देवाओंका अ न बहुवर्षसहस्राणि माजुर्ष देहमाश्रितः ॥३४॥ ` काम आपने कर दिया । अब कई सहस वर्तक = दे सि रहकर नों य ; कल्याणक इवन्दुष्करकमौणि लोकडयहिताय च। (ज ह वि पर ना पापहारीणि शुवनं यशसा पूरायिष्यसि ॥३५॥ इए आप सम्पूर्ण छोकोंकों अपने यसे परिपूर्ण ३०० न जग f ४ शः आर्थयामि जयच्चाथ पवित्रं रु भे ग्रहमू । गे ॥३४-३५॥ हे. जगनाथ ! मेरी टु आर्थना श्चि हा : है कि आज सेनासहित यहाँ ठहर कर और भोजन कर जाय उक्तवा सपठ; थी गमिण्यति पत्तनम्‌ । मेरा घर पवित्र कीजिये । पिर कल अपनी राजधानी" _ तथेति राघयोऽतिष्ठचसिन्नाश्रम उत्तमे । म पघार ३६ ॥ तत्र रधुनाबज विहत अच्छा या मुनिवर भरद्वाजसे सःकृत हो सेना, सीताजी और ळःमग- ससल्यः पूजितस्तेन सातया लक्ष्सणेन च्‌ ॥२१७ | जाके सहित उस अत्युत्तम आश्मन ठहर गय || ३७॥ Ce Py yd पत रामअन्तदित्वा मुहूर्त आह मारुतिस्‌ । । इस समय एक मुहूर्त विचार कर भगान्‌ राममे - ईशो गच्छ इनूमस्त्वमयोध्यां प्रति सत्वरः॥२८॥ | श्रीमारतिसे कद्ा-“हनुमन्‌ ! तुम शत्र हो यह जानीहि इशली कश्चिजनो नृपतिमन्दिरे | अयोष्याको जाओ ॥ ३८॥ और यह माळन करो कि शृङ्गवेरपुरं गत्वा नाहि पत्र गुह मम ॥३९॥ ¦ राजमन्दिरमें सव वुदालसे तो है | श्रंगवेरपरमं जाकर मित्र युहसे बातचीत करना ॥ ३९॥ और उ जा हे नकालक्ष्मगोपेतमागतं सां निवेद | जानकी और रक्ष्मणके सहित मेरे आनेकी सूचना कारक कक | शाप . इक स.हेत मेरी कुशल '. सातापहरणादीचि रावणस्य वधादिकम्‌ ॥४१॥ | उताना । वहाँ मैया भरतको साताहरणसे लेकर अहि क्रमेण भे आतुः सवे तत्र विचेष्टितम्‌ | | रावणके बघ आदि पर्यन्त मेरी समस्त टोलार क्रमते हत्या शहुगणास्सर्वान्समार्यः सहतमण; ॥४२॥ छुनाना और कहना कि रामचन्द्रजी समस्त इान्रओंको उपयांति ससदधार्थ सह करहरी | मारकर सफळमनोरथ हो सी और छत्रमणके सहित और वानरोंके गाथ इत्युकत्वा तत्र वृत्तान्तं भरतस्य विचेष्टितम्‌ ॥४३॥ साथ आ रहे हूँ । यह सत्र इत्तान्त उसे सुनाकर और भरतको सभी चेष्टाओंका सर्वे जञात्वा पुन! शघिमागच्छ मम साभेधिम्‌। ` | पता ल्गाकर रार ही मेरे पास लौट आना 1)” सर्ग १४ ] | ...युद्धकाण्ड | ३११ तथेति हलुमांस्तत्र माचुषं वपुरास्थितः ॥४४॥ | तब हतुमानूजी बहुत अच्छा? कह मनुष्य-रारीर नन्दिग्रामं यथौ तूर्णं वाथुवेगेन मारुति! । धारण कर तुरन्त ढी वायुवेगसे नन्दिग्रामको चळे, मानो निव वेगेन ह _ किसी श्रेष्ठ सपंको पकड़नेके लिये गरुडजी जाते गरुत्मानव वणन अश्च शुजगात्तमस्‌ ॥४५॥ | कै ॥ ४०-४५॥ श्रृंगवेरपुर पहुँचनेपर श्रीमारुतिने शृङ्गवेरपुरं प्राप्य गुहमासादय मारुतिः। । गुहके पास जाकर अति प्रसनचित्तसे मीठी बोलीमें ॥ | र ५ वाच सधुरं वाक्य अहृष्टेनान्तरात्मना ॥४६॥ कदा 1%३॥ “तुम्हारे मित्र परम धार्मिक एवं क्षेम = कु - युक्त दशरथकुमार श्रीमान्‌ रामचन्द्रजीने सीता और रामो दाशरथिः श्रीमान्सखा ते सह सीतया। लक्ष्मणके सहित अपनी कुशल कही है ॥ ४७॥ सलक्ष्मणस्तवां धर्मात्मा क्षेमी कुशलमब्रवीत्‌॥४७। | आज मुनिवर भरद्वाजकी आज्ञा लेकर शररघुनायजी अनुज्ञातोञ्य मुनिना भरद्वाजेन राघवः। | आयेंगे तब तुम्हें भी उन रघुश्रेष्ठ भगवान्‌ रामका आगमिष्यति तं देवं दरक्ष्यसि तवं रघूत्तमम्‌ ॥४८॥ | दर्शन होगा” ॥ ४८ ॥ पवञुक्त्वा महातेजाः सम्प्रहएतनुरुहम्‌। | जिसे हर्षसे रोमाञ्च हो रहा था ऐसे गुहसे इसप्रकार उत्पपात महावेगो वायुवेगेन मारुतिः ॥ ४९] | १ "दातेजस्वी और अत्यन्त वेगशाठी हनुमानजी फिर - न , ५ । वायुवेगसे उड़े ॥४९।| ( कुछ दूर जानेपर ) उन्होंने राम- सो5पश्यद्रामतीर्थ च सरयूं चमहानदीम्‌। ताई ( अयोध्या ) और महानदी सरयूके दर्शन किये। | रि ५." ~, ' उसे भी पारकर हनुमानजी अति प्रसन-चित्तसे नन्दि- तामतिक्रम्य हचुमान्नान्दग्राम यया मुदा ॥५०॥ | हि न्द शद । ग्रामको चले ॥ ५०॥ अयोध्यासे एक कोशकी दूरीपर क्रोशमात्रे त्ययो ध्याया्ीरकृण्णाजिनाम्परम्‌। मरतजीको अति दीन और दुर्बळ अवस्थामें चीरवख् ददर्श भरतं दीनं कृशमाश्रमवासिनम्‌ ॥५१॥ ` और कृष्णमृगचर्म धारण किये, आश्रमम निवास करते, मलपडूबिदिग्धाई जटिलं बल्कलाम्बरम | । शारीरमें भस्म रमाये, जटाजूट्र और बल्कल्बस कानाद्चाङ्ग जाटड चर्कलाम्वरस्‌ । धारण किये, फल-मूछादि भोजनकर भगवान्‌ रामके फलमूलकृताहारं रामचिन्तापरायणम्‌ ॥५२॥ , ध्यानम तत्पर हुए, रामचन्द्रजीकी उन दोनों पादुकाओं- पादुके ते पुरस्कृत्य शासयन्तं यसुन्धराम्‌ । ' को निवेदनकर एथिवीका शासन करते तथा काषाय: नि R | मुख्य-मुख्य पुरवासियोंसे मन्त्रिभिः पौरयुख्येश्व कापायाम्तरधारिभिः।५२॥| बारी मल्त्रियो और सुख्यमुख्य इरबासियोसे 4 गियर 0 | चिरे इए साक्षात्‌ मूर्तिमान्‌ घर्मके समान देखकर इदे सूतिमन्तं साकषाडूर्ममिय खितम्‌। | पबनछुमार हतुमाचजी हाथ जोड़कर बोठे--] ५१- उवाच ग्राञ्जरिर्वक्यं हचूमान्मारतात्मजः।।५४॥ | ५९ ॥ “हे भरतजी ! जिन. दण्डकारण्यचासी तपो- ५.०० - , , निष्ठ भगवान्‌ रामका आप चिन्तन करते हैं तथा जिनके यं त्वं चिन्तयसे रामं तापसं दण्डके खितम्‌ । हिये आप इतना अनुताप कराते हैं उन कहुससननदन अनुशोचसि काकुत्खः स त्वां छुशरूमब्रवीत्‌।५५।॥ रामने तुम्हें अपनी कुडाळ कहा भेजी है ॥ ५५ ॥ हे प्रियमाख्यामि ते देव शोक त्यज सुदारुणम्‌ । देव ! आप यह दारुण शोक त्यागिये । मैं आपको, ~ 1 अति प्रिय समाचार सुनाता हूँ । आप इसी सुहूर्चमे असिन्मुहूर्ते त्रा त्वं रामेण सह सज्ञतः ॥५६॥ | पने भाई रामसे मिलेंगे ॥ ५६ ॥ भगवान्‌ राम युद्धम समरे रावणे हत्वा राम! सीतामवाप्य च। ` ' रावणको मारकर और सीताजीको प्राप्तकर सफल-मनोरथ. न © ३१२ अध्यात्मरामायण . [ सगे १४ Fearne ९2७४ ५७ ६४४ awed ees) मी अंक जम, 'मणजीके सहिन आ रहे हॅ” || ५७॥ ATTRITION TSS ६४६५ ESSN ५० ५/ ee ee a उपयाति समृद्धार्थः ससीतः सहलक्ष्मणः ॥५७। | हो सीता और ल एवमुक्तो महातेजा भरतो हर्षभूच्छितः । श्रीहनुमानजीके इस प्रकार कहनेपर वौकेयीके प्रिय मर ञ - त्र महातेजस्वी भरतजी हर्षसे मूर्च्छित हो अपनी चाखखः केकयीप्रियनन्दनः ॥५८॥ | 3 पत ड 8 . सुध-बुध मुळा पृथिवीपर गिर पड़े | ५८॥ (विर आलिङ्गच भरत! शीध्रं मारुतिं प्रियवादिनय | सँभल्कर उठनेके अनन्तर ) भरतजीने तुरन्त ही प्रिय" आनन्दजैरक्षजले। सिपेच भरतः कपिम्‌ ॥५९॥ | बादी हृनुमान्‌जीको हदयसे रगा ल्या और आनन्द देवो वा मानुषो वा त्वमनुक्रोशादिहागत। । | कारण उमडे हुए अश्रुजळसे उन वानरश्रेष्ठकों साच ~ ~ छो ॥ ५९॥ (और वोटे-- ) "मैया ! तुम कोर ख्य $ ° < ur ७ मियाख्यानस्य ते सोम्य द्दाभि वत प्रियम्‌ ६ देवता हो या महुष्य हो, जो दया करके यहाँ आगे गवा शतसहस्रं च ग्रामाणां च शत बरम्‌। | हो ? हे सोम्य ! इस प्रिय समाचारके सुनानेके सर्वाभरणसम्पन्ना मुग्धा! कन्यास्तु पोडश ॥६१॥ | बदले में तुम्हें एक लक्ष गो, अच्छे अच्छे सी गाँव और गे ' समख आभूषणोंसे युक्त परमसुन्दरी सोलह कम्याएँ एवशुकत्वा पुन! आह भरतो मारुतात्मजस्‌। ` "ॐ हि है ह तड ह प | देता हूँ” || ६०-६१ ॥ ऐसा कह श्रीभरतर्जाने हनुमान- बहूर्नीभानि वर्षाणि गतस्य सुमहद्दनस्‌ ॥६२॥ जीसे फिर कहा--“आज, भयंकर बनमें जानेके कितने शृणोम्यहं औतिकर सम नाथस्य कीर्तनम्‌ । | ही वर्ष बीतनेपर मैं अपने प्रशुका यह प्रिय समाचार SN ~ | छुन रहा हूँ | आज मुझे यहद कल्याणमयी छोकिक थाणी बत ग ` | कर णी बत गाथेयं लोकिकी प्रतिभाति मे ॥६३॥ | कहावत बहुत ठक माढ होती है कि जीवित साने रति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि। । सौ वर्षमें भी मनुष्यो आनन्द मिठ सकता है ।' ॥॒ च राववस्य हरीणां च कथमासीत्समागमः ॥६४)| तुम्हारा शुभ हो, तुम यह सच-सच बताओ कि हा ~, । औरघुनाथजीके साथ वानरोंका समाग कैसे हआ ! वस्रमाख्याहि भटू ते विश्वसेयं वचस्तव । ' जिससे मैं तुम्हारे बचनका पूर्ण त के र नदय रि एवमुक्तो$्थ हनुमान भरतेन महात्मना ॥६५॥ | महात्मा भरतर्जाके इस प्रकार कहनेपर हनुमानजीने आचचक्षेज्थ रामस्य चरितं कृत्स्नशः क्रमात! नाका कशाः सम्पूर्ण चरित्र तुना दिया । श्रत RECS मारु।तसे वह चरित्र सुनकर श्रीभरतर्जीकों अत्यन्त उवा हु परमानन्दं भरतो मारुतात्मजात ॥६६॥ हभ ह चरित इनर शीमारजाको अ Ni । आनन्द इआ ॥ ६२-६६ ॥ और उन्होंने अति प्रसन्न आज्ञापयच्छबुहण शुदा युक्त मुदान्वितः । । होकर आनन्दमम्त शत्रु्रजीको आज्ञा दो कि ण्ह दैवतानि च यावन्ति नगरे रघुनन्दन ॥६७॥ | रघुनन्दन ! नगरमें जितने देवता हैं महाबुद्भि पण्डित- जन उन सवका नाना प्रकारको भेंट और चलि आहि ६ नानोप रब पूजय न्तु t $ 3 i प हे रिम र्‌ महाधियः । | देकर पूजन न सूत, बैतालिक, स्तुति-गान करने- पता वतालिकाथेव वन्दिनः स्तुतिपाठकाः ।।६८। वाले वन्दीजन अं मुल्य मुल्य बाराङ्गनाऐँ आज _ न सेकडोंकी सं ख्यामें टोळी बनाकर नगरके गरडर्याथ शतकी निर्यान्लदैव सह! |. ९३ , लके अतिरि है व्य नर न न राजमहिलाएँ, मन्त्रिगण हाथी- ""दाराखथाव्यार्‍्या: सेना हस्त्यश्वपत्तय!|1६९॥| घोडे और पदाति आदि सेना, ्राह्मणलोग, पुरवासी तलणाय तथा पोरा राजानो ये समागता।। | और यहाँ आये हुए समल राजाछोग भी श्ररघुनाथ- िर्यार न जीका मुखचन्द्र निहारनेके 3 यान्तु राघवस्याच द्रष्ठु शश्िनिभाननस्‌ ॥७०)| ॥ ६७ ५. लिये नगरके बाहर चढे | सर्ग १४] * युद्धकाण्ड | ३१३ भरतस्य वच! श्रुत्वा शत्रुघधपरिचोदिता! | भरतजीके वचन सुनकर इतरुन्रजीकी प्रेरणासे नाना अर्चक नगरं इुक्तारततमयोजज्यरेः ॥७१॥ | कारकौ रचनाओमे श पुरवासियोने अपने घरोंको | सजाना आरम्भ किया तथा अनेक प्रकारके उज्ज्वल तारणश्च पताकाभिर्विचित्रामिरनेकधा । मोतिया और रल्लोंकी बन्दनवारोसे एवं चित्र-विचित्र अरङ्कवन्ति वेइमानि नानाबलिविचक्षणा। ।॥।७२॥ | पताकाओंसे अयोध्यापुरीको सजा दिया ॥ ७१-७२ ॥ a तब, भगवान्‌ रामके दशनोंकी ळालसासे सब छोग ह गन्ति इृन्दशः सर्वे रामदर्शनठालसा; अनेकों ठोलियाँ बनाकर उनकी भेंटके लिये एक लाख हयाना शतसाहस गजानामयुत तथा ॥७३।॥ घोडे, दश सहस हाथी और सुनहरी बागडोरोंसे रथानां दशसाहसं खर्णस्रविभूषितम्‌ । विभूषित दश सहक्न रथ आदि बहुतसी ऐश्वर्यसूचक छोटी- द्व ~ बड़ी वस्तुएं लेकर नगरके बाहर निकळने लगे||७३-७४॥ पारमेषठीन्युपादाय द्रव्याण्युचचावचानि च ॥७४॥ छे पालकीमें हे ज रमेह्ठीन्युपादाय द्र चाप वा | उनके पीछे पाळकीमं चढ़कर राजमहिळाऐँ चली और ततस्तु शिविकारूढा नि्ेयू राजयोपितः। | फिर श्रोरघुनाथजीसे मिलनेके लिये भाई झत्रप्के सहित भरतः पादुके न्यस्य शिरस्येव कृताञ्जलिः ॥७५॥ | भरतजी शिरपर भगवान्‌की पाढुकाएँ रखकर हाथ AC जोड़े इए पैरों-पेरों चळे | इसी समय दूरहीसे ब्रह्माजी- शशुघ्नसहितो राम पादचारेण निरययो । का मनोनिर्मित चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ और सूय- तदेव इश्यते दूराद्रिमानं चन्द्रसन्िभम्‌ ॥७६॥ | के समान तेजस्वी पुष्पक विमान दिखायी दिया। उसे पुष्पक सर्यसड्ाओ मनसा ब्रह्मनिर्मितम्‌ | देखकर श्रीहनुमान्‌जीने कहा--“अरे लोगो ! देखो, एतसिन आतरो वारी वैदेह्या रामलक्ष्मणौ ॥७७ इसी विमानमें श्रीजानकीजीके सहित दोनों बीर भ्राता एतसिन्‌ आतरो बारी वैद द राम और लक्ष्मण तथा कपिश्रेष्ठ सुग्रीव और मन्त्रियोंके सुग्रीवश्च कपिश्रेष्ठो मन्त्रिमिश्च विभीषणः । | सहित बिभीषण दिखायी दे रहे है” ॥ ७५-७८॥ इश्यते पर्यत जना इत्याह पवनात्मज३ ॥७4॥ | तब तो 'राम ये है, राम ये हैं” ऐसा कहनेसे खी; र्ष बालक, युवा और दृद्धोंका हषके कारण ऐसा शब्द ततो हपैसमुदूभतो निःस्वनो दिवमस्एशत । हुआ कि जिससे आकाश गूँज उठा ॥७९॥ जो स्रीवाल्युववृद्धानां रामोऽयमिति कीनात्‌॥७९। | लोग रथ, हाथी और घोड़ोंपर चढ़े इए थे बे उतरकर रथकुज्ञरवाजिस्था अवतीये महीं गताः पृथिबीपर खड़े दो गये । उस समय वे सभी लोग विमानपर चढ़े हुए भगवान्‌ रामको आकाशमें चन्द्रमा- द्दशुस्ते विमानं जनाः सोममिवाम्बरे ॥८०॥। | ३ समान देखने छगे | ८० ॥ फिर प्रसन्नचित्त भरतजीने विमानपर बैठे इए _ ~ + मरतो राघवं श्रीरघुनाथजीके सम्मुख हो उन्हें छुमेरु प्वतपर प्रकट गत [घव मुदा ॥८१॥ ततो धिमानाय्रगत भरता रावन ह | हुए सूर्यके समान अति विनीतभावसे हर्षपूर्वक प्रणाम ववन्दे प्रणतो रामं मेरुख्थमिव भास्करम्‌ । किया । तब श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे विमान एथिवी- ततो रामाम्यचुज्ञातं विमानमपतद्भुवि ॥८२॥ | पर उतरा ॥ ८१-८२ ॥ तदनन्तर भगवान्‌ रामने भाई | शत्रध्नके सहित भरतजीको भी विमानपर चढा लिया; आरोपितो विमानं तद्धरतः साहुजसदा | रामचन्द्रजीके निकट पहुँचनेपर भरतजीने अति आनन्दित राममासाद्य मुदितः पुनरेवाभ्यवादयत्‌ ॥<३॥ , हो उन्हें फिर प्रणाम किया ॥ ८३ ॥ तब बहुत दिनोंमें पा्जलिर्मरतो भृत्वा प्रहृष्टो राघवोन्छुखः । ३१४ त्ता १४ अध्यात्मरामायण [सभ (८ सगुत्थाप्य विरादूदई भरतं रघुनन्दनः । | देखे इ हक तको phn नि य , ी श्‌ टमें ठेऋर भ CT 4 रं खाइमारोष्य दा त परिने ॥८४॥ त विदा पठार आनाको ततो उक्षमणमासाच वैदेही नाम कीेयन्‌। | नना नाम उच्चारण करते इए तिया प्रणाम अभ्यवादयत प्रीतो भरत! प्रेसविह्रणः॥८५॥ | क्रिया | ८५॥ तत्पश्‍्चात, मरतजीने सुगी, ज्वा सुग्रीवं जाम्बवन्तं च युवराज तथाऽङ्गदम्‌। | युबराज अगद; मैन्द, द्विविद, तील और पमां ेन्दद्विविदतीठांय कम चैव सस्वजे ॥८६॥ | तथा सुपेण, नल, गाध, गत र्म औ र्त सुपेण च नले चेय गवाक्ष गन्धमादनम्‌ । ' पनसको मी हृदयसे छया ॥ ८६/८७॥ ह ग , | भरतजीसे सत्कार पाकर प्रसन्न हुए उन सौम्य वानरा” शरभ पतसं चेव भरव: परिपखजे ॥८७॥ | ने मनुष्यरूप धारणकर उनका कुशल पूष्ठी ॥ ८८॥ सर्वे ते मालुर्ष रूपं कृत्वा भर्तमाहता।। ' तव भरतञीने सुप्रीवकों हदयसे लगाकर अति प्रेम- पपृच्छु' क्लं तोम्या! ग्रहृ प्छवङ्गमा; ।८८॥ , पूर्वक कहा--“पुग्रीब | तुम्हारी सहायतासे हो श्रोराम- दतः ुग्रीवमालिडय भरत! आह भाकित (चरकी विजय ह हो न न | गया; अतः हम 'चारक्रि तुम पाचच भार टा |. तवत्सहायेन रामस्य जयोऽभूटरायणो हतः ॥८९॥ तदनन्तर शत्रु्जीने ल्व्मणजीके सहित श्रौरामचन्दरवी- समसाकं चतुणा तु भ्राता सुग्रीव पञ्चमः । | को प्रणामकर अति विनीत भावसे सीताजीक चरणा शधुध्न्च तदा रामममिवाच सलक्ष्मणय्‌ ॥९०॥ | वन्दना की । फ्रि श्रीरामचत्रजीनि शोकके कारण अति सीतायाअरणौ पथाइचन्दे बिनयालित | ' के “रे उद्य हर माता बसा उ. _ RRR | जाकर अति विनीत भावसे उनके चरण छुए ऑर रामो मातरमासाध विणा शोकविहृलाम ॥९१॥ उने चितो रहन किया तया अपनी वियाता बैक जग्राह्रणतः पादो मनो मातुः प्रसादयन्‌ । | और सुमित्राको भी नमस्कार किया | ८९-९२ ॥ कैकेयी च सुमित्रां च ननामितरमातरी ॥९२॥ | तदुपरान्त मरतजीने श्रौरामधन्ूजीकी भडो प्रकार मरतः पाहुदे ते तु राववस्थ सुपजिते। | एना को ह पहु भिक उनके योजयामास रामस्य पादयोभक्तिसंयुत। ॥९३॥ | चरणो पहना दिया ॥९३॥ ( और कहा--) “परमो! मुझे घरोहररूपसे सापे इए आपके इस राज्यको में ~ + गति ° र गिता म लना अयोध्यामें आया हुआ देखता ई-इससे मेरा जन्म यस्पश्यामि समायातमयोध्यां सयामहं प्रभो । ' सफळ हो गया और मेरी सारी कामना पूरी हो गर्वी । कोष्ठागारं वरुं कोश कृतं दशगु्ण मया ॥९५॥ | हे जगनाथ | आपके प्रतापसे मैंने अन्न-भण्डार, सेना सत्तेजसा जगन्नाथ पाठयख पुरं स्वकम । | भौर मोशादे पहलेसे दहागुने कर दियेहें । अब आप इति मुबार्ण भरतं च्ष्टा सर्वे कपीश्वराः ॥९६॥। न के कहे देख ha कौजिये |" भरतजीको ws 586 RT कर ख सभी सह्यः मुख bi ताय मशशसुदुदा्यताः। | आंत गिराते हुए उनको प्रसा फले व्य ततो राम! परहुशत्मा भरते स्वाङ्गं ददा ॥९७॥ | तव श्रोरामचन्दजी अति हर्पपूर्वक भरतजीको गोदे यथी तेत विमानेन भरतस्याश्रमं तदा । | ज्य उसी विमानपर चढ़े हुए भरतजीके आश्रमको झुपरुद्द तदा रामो विमानाग्रचान्महीतल्य्‌ ॥९८॥ | गये । वहाँ विमाने पुष्पकसे नीचे पृथिवीपर उतरकर repre URNS Yessy "कटात पप सर्ग १५] ' युद्धकाण्ड _ ३१५ aoa iTS अन्रवीतपुष्पकं देयो यच्छ वैश्रवणं वह । अइुगच्छानुजानामि इुबेरं धनपालकम्‌ ॥९९॥ रामो वसिष्ठस्य गुरोः पदाम्बुजं नत्वा यथा देवगुरो। शतक्रतुः । दत्ता महाहासनशुत्तमं शुरो- भगवान्‌ रामने उससे कहा--“जाओ, मैं आज्ञा देता हँ---अब, तुम धनपति कुबेरका अनुसरण. करते हुए उन्हींको वहन करो” ॥९४-९९॥ फिर, इन्द्र जैसे बूहस्पतिजीकी वन्दना करते हैं वैसे ही, श्रीरामचन्द्रज़ी गुरु वसिष्ठजीके चरणकमळोंमे प्रणाम कर और उन्हें एक अति सुन्दर बहुमूल्य आसन दे स्वयं मी उन्हींके पास रुपाविवेशाथ गुरोः समीपृतः ॥१००॥ | बैठ गये ॥१००॥ ॒ ५०" "6900000 ` इति श्रीमदष्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे चतुर्दशः सगः ॥ १४॥ क -— पञ्चदश सगं श्रीराम-्राज्याभिषेक । श्रीबहादेव उवाच ततस्तु फेकयीपुत्रो भरतो मक्तिसंयुतः । शिरस्यञ्ञहिमाधाय ज्येष्ठं आवरमन्रधीत्‌ ॥ १॥ माता मे सत्कृता राम दत्तं राज्यं त्वया सम्‌ । ददामि तत्ते च पुनर्यथा त्वमददा मम॥ २॥ इत्युत्वा पादयोर्भक्त्या साष्टाङ्ग प्रणिपत्य च। वहुधा ग्रार्थयामास केकेव्या गुरुणा सह ॥ ३॥ तथेति ग्रतिजग्राह भरताद्राज्यमीश्रर! । मायामाश्रित्य सकलां नरचेशमुपागतः ॥ ४॥ खाराज्यानुभवो यस्य सुखज्ञानेकरूपिणः । _नेरल्रातिशयानन्दरूपिणः परमात्मनः ॥ ५॥ मानुषेण तु राज्येन किं तस्य जगदीशितुः । यस्य भ्रूभद्ठमात्रेण त्रिलोकी नश्यति क्षणात्‌ ६॥ यस्याचुग्रहमात्रेण मवन्त्याखण्डलश्रियः | लीठासृटमहासृटेः कियदेतद्गमापतेः ॥ ७॥ तथांपि भजतां नित्यं कामपूरविधित्सया । लीलामाचुपदेहेन ६. श्रोमद्ादेवजी बोळे-हे पार्वति | फिर कैकेयीपुत्र भरतजीने शीश झुकाये अज्ञलि वाँपकर अति भक्तिपूर्वक ज्येष्ठ भ्राता रामजीसे कहा--॥१॥ “हे राम ! आपने मुझे राज्य दिया था, इससे मेरी माताका सत्कार तोहो चुका । अब, जैसे आपने मुझे दिया था वैसे ही मैं फ़िर आपहीको उसे सौंपता हुँ”॥ २ ॥ ऐसा कह उन्होंने चरणोमें भक्तिपूर्वक साष्टाङ्ग प्रणाम कर (राज्य खीकार करनेके लिये) कैकेयी और गुरुजीके सहित बहुत कुछ प्रार्थना की ॥३॥ तब अपनी मायाको आश्रय कर सब प्रकारकी मनुष्य-लीलाएँ ' करनेमें प्रवृत्त हुए भगवान्‌ रामने बहुत अच्छा” कह भरतजीसे राज्य ठे लिया ॥४॥ जिन्हें हर समय खगीय राज्यका अनुभव होता है उन एकमात्र सुख और ज्ञानस्वरूप, समस्त विषयानन्दोसे रहित परमानन्दमूतिं परमात्मा जगदीश्चर- को तुच्छ मानवी रा्यसे क्या काम है! जिनके भकुटि- विछासमात्रसे तीनों ठोक एक क्षणमें नष्ट हो जाते हैं ॥५-६॥ जिनकी कृपासे इन्द्रकी राज्यलक्ष्मी प्राप्त होती है तथा जिन्होंने लीछासे ही यह महान्‌ सृष्टि रची है उन छक्ष्मीपतिके लिये यह (अयोध्याका राज्य) कितना है १ ॥७॥ तथापि अपने भक्तोंकी कामनाओ- को सदैव पूर्ण करनेके लिये वे माया-मानवदेहसे सर्वदा सर्वमप्यनुवतते ॥ ८ ॥ | सभी कुछ अभिनय करते. हैं ॥८॥ es रे ग ३१६ अध्यात्मरामायण [सग १५ क चणा, वन्त! तब शत्रप्नजीकी आज्ञासे झुदाठ क्षौरकार ( नाई ) ततः शत्रु्षवचनाजिपुणः शमशुकन्तक! । ची बा और पनामा गिक लि साफ सम्माराश्चामिपेकार्थमानीता राघवस्य हि ॥ ९ | ही की गयी ॥९॥ पहड़े भरतजीने और पिर महाला पूर्व तु भरते खाते लक्ष्मणे च महात्मनि | लक्ष्मणजीने लान! किया हुत गनत उ रीचे वानरेने न> ओर राक्षसराज विभीपण नहाय ॥१०॥ फिर - इ वानरेळे च रेळे वियीपणे ॥१०॥ टे कट जानेपर श्रीरधुनाथजीने स्वान किया और विशोधितजट! ख्नातकित्रमास्याचुलेपन।। | निरी मालाओं, अप्रागों तया बहुमूल्य व्ोंसे महाईवसनोपेतस्तखौ तत्र श्रिया ज्यलन्‌ ॥११॥ | सुसजित हो थे अपना कान्तिसे देदीप्यमान दोकर ९ ह ५ विराजमान हुए ॥११॥ मद्दामति लक्ष्मण और भरतने पतिकपे च रामस्य क्ष्ण महामतिः । श्रीरामचन्द्रजीको विभूषित कराया और राज-मद्िाओं- कारयामास भरतः सीताया राजयोपितः ॥१२॥ | ५ साताजीका श्रज्ञार क्रिया ॥१२॥ उन्होंने उस महाहवखाभरणेरलञ्चक्रः सुमध्यमामू । उदको नाना प्रकारके वहुमूल्य वर और आमूएणों- _ » 0 2. > से सुसज्ित किया । तदनन्तर पुत्रवत्सला शोमामयी ततो वानरपत्नीनां सर्वासामेव शोभना ॥१३॥ कोसल्याजीने अति प्रस हर समल वानरपमियो- अकारयत कोट्या प्रहृष्टा पुत्रवत्सला । | कामी श्र्तार कराया । ततः खन्दनमादाय शङ्ुध्नवचनात्सुधीः ॥१४। | इसी समय त्रु्जीक आज्ञासे बुद्विमान्‌, झुमन्तरने सुमन्तः सङ्काशं योजयित्वाध्यतः स्थितः । | के समान तेजस्त्री रथ जोडकर सामने छा खड़ा Te 01 किया । तब सत्यत्र्मपरायण भगवान्‌ राम उस ग्यपर आारसंह र्थ रामः सत्यधमंपरायणः ॥१५॥ | बहे ॥१३--१५॥ उस समय सुन अद, दमान सुभीबी युवराजश्व हनुमांथ विभीषणः। | और विभीषण स्नानादि कर दिव्य वताभूयणोसे स्नात्वा दिव्यास्परघरा दिव्याभरणभूषिता॥॥ १६॥ पुसजित हो रथ, घोड़े और दाथ आदि चाहनों पर राममन्बीयुरते च रथाश्रगजवाहना।। | ७ „९ चनो आगे चले तपा हुव n ° $ + पत्ियाँ और सीताजी सुन्दर पालकियोंपर ब्रेठकर अति उगरावपर्यः साता च ययुयोन। पुर महत्‌ ॥१७॥ | (दाल अयोध्यापुराकों चली ॥१६-१७॥ जिस प्रकार वजपाणियेथा देवेहरिताथरथे खिता। | इरितिर्ण घोडके रो बैठकर वज्रपाणिर वां प्रययौ रथमाखाय तथा रामो महपुरम्‌ ॥१८। के साथ चलते हैं उसी प्रकार भगवान्‌ राम रयपर चढ़ रथय के द कि कर महापुरी अवोध्याको चे ॥१८॥ तब महातेजस्त् भरतश्वक रत्रदण्ड महाद्युतिः | भरतजीने सारथी होकर रथ चलाया, शत्रन्नजोने श्रेतातपत्र॑ शरुन्नो लक्ष्मणो व्यजनं दधे ॥१९|| | रतजटित दण्डयुक्त श्वेत छत्र लिया और लक्ष्मणजीने व (१ च्यजन पत्त थ र्‌ एक री चामर च समीपस्यो न्यवीजयदरिन्दमः । व्यजन (पह्ला) धारण किया ॥१९॥ एक ओर पास ही , | न स्थित शन्नुदमन सुग्रीबने ओर दूसरी ओर राक्षस- शश्रिप्रकाश तपरं जग्राहासुरनायक! ॥२०॥ | राज विभीषणने चन्द्रमाके समान कान्तियुक्त चेक दिविजैः िद्सङच ऋषिभिदिव्यदर्शनैः । इलाया उस समय भगवान्‌ रामकी स्तुति करते हुए दिव्यदर्शन देवताओं, तिवस मूहों और स्टूयसानस्थ रामस्य शुश्रुवे मधुरध्याने! की चुनावी देने उगी ।३ १ शुछुव मधुरध्वनिः ॥२१॥ ऋपियोंकी सुमधुर ध्वनि सुनायी देने छगी ॥२१॥ 40७७७ Mos we जप] स] इइ २१७ FSS ४0४0०१७ १५७०१ ६४६७१७ १७०७००७ NANNY माहु रूपमास्थाय चानरा गजवाहना! | चानरगण मनुष्यरूप धारणकर हाथियोंपर सवार इए । भेरीशहनिनादेश सृदङ्गपणवानकेः ॥२२॥ : इस प्रकार रघुश्रेष्ठ भगवान्‌ राम सहनाई, शब्द, मृ, प्रयया राघभश्रेठस्तां पुरी समलक्ृताम। | ताशे और नगाड़े आदि बाजोंके घोषके साथ भली प्रकार दच्शुस्ते समायान्त राघव पुरवासिनः ॥२३॥ ¦ सजायी हुई अयोध्यापुरीमें गये | उस समय पुरवासी दूर्वादलश्यामतर्त॑ महाई- | जेग श्रीरघुनाथजीको आते हुए देखने छगे |२२-२३॥ किरीटरलाभरणाश्विताहूम्‌ । पे महाभाग पुरजन दूर्वीदळके समान स्याम-दारौर, आरक्तकञ्जायतलोचनान्तं ; महामूल्य मुकुट और रलजटित आमूषणोसे विभूषित, दृष्टा ययुमोंदमतीव पुण्याः ॥२४॥ ¦ कमलके समान कुछ अरुणवर्ण विशाल नयनोंवाले, रह्न- विचित्ररत्राथितसूत्रनडू- ! विरङ्गे रतोसे युक्त (सुनहरी) तारके कामका पीताम्बर पीताम्बरं पीनञ्चजान्तरालम्‌ । : घारण किये, विशाल वक्षःस्थल्वाठे, बहुमूल्य मोतियों- अनर्ध्यप्रक्ताफलदिव्यहारे- : के दिव्य हारोंसे सुशोभित, सुप्रीवादि शञान्तखभाव विरोचमानं रघुनन्दनं प्रजाः ॥२५॥ गानरते सेवित, सूर्यके समान तेजस्वी, समस्त शरीरम सग्नीवमुख्यईरिमिः प्रशान्तै- ` तरी और चन्दनका लेप किये तथा कल्पदृक्षके निपेव्यमाणं रवितुल्यभासग। ` पुष्पोंकी माळा धारण किये श्रीरघुनाथजीको देखकर कस्त्रिकाचन्दनलिप्तगात परम आनन्दको रत हुए ॥२४-२६॥ जब लियोंने निवीतकस्पद्रमपुष्पमारुम ॥२६॥ | भगवान्‌ रामको आते सुना तो प्रसन्नतासे महान्‌ ७ | हपके कारण उनके मुखकी कान्ति उज्ज्वल हो रत्वा खियो रामयुपागर्त मुदा गयो और वे जिस गृहकार्यमें रगी हुई थीं उसे छोड़ प्रहपंवेगोत्कलिताननश्रिय: ( ' मली प्रकार सज-धजकर अपने-अपने घरोंके ऊपर चढ़ अपास्थ स गृहकार्यमाहित , गयीं ॥२७॥ सुमधुर सुसकानसे जिनका मुख मनोहर हर्म्यांणि चवारुरुहुः ख़लडूताः।२७॥ ` हो रहा है वे पुरनारियाँ, सबके नयनानन्दस्वरूप दृष्टा हारे सर्वद्णुत्सवाहृ्ि ; भगवान्‌ रामको देखकर, फलोंकी वर्षा करने लगीं पुष्पः किरम्त्यः सितश्ञोभिताननाः। ' और फिर उन्होंने, नेत्र और मनको प्रिय छगनेबाली उस दर्भिः पुनर्नेत्रमनोरसायनं । आनन्दमयो मूर्तिको नेतरोंद्वारा हृदयमें छे जाकर, मनसे खानन्दमूर्ति मतसाभिरेमिरे २८ ¦ आलिद्वन किया ॥२८॥ इस प्रकार विष्णुलरूप भगवान्‌ रामः सितरिनग्घदशा प्रजातथा , राम दूसरे प्रजापतिके समान मुसकानयुक्त मनोहर दृष्टिसे पञ्यन्ग्रजानाथ इवापरः प्रञ्चुः । | अपनी प्रजाको देखते हुए भौरे-धोरे मळी प्रकार सजाये शनेजंगामाथ पितुः खलझ्ूत॑ हुए अपने पिताके इन्द्भवनके समान महळमें गये गृहं महेन्द्रालयसन्निमं हरि? ॥२९॥ | ॥२९॥ राजमहङके भीतर जाकर श्रीरामचन्द्रजीने प्रविकय वेइ्मान्तरसंखितों मुदा अति प्रसन्नचित्तसे अपनी माता (कौसल्या) के चरणों- रामो ववन्दे चरणो खमातुः । की बन्दना की और फिर उन रघुबंशशिरोमणि ग्रभुने क्रमेण सर्वाः पितयोपितः प्रथु- क्रमशः सभी विमाताओंको भक्तिपूर्वक प्रणाम ननाम भक्तया रघुबशकेतुः ॥३०॥ | किया ॥३०॥ ३१८ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १९ NSO reer णी ्ट “>> ्०::::::::::्ग््््ट््प्ख्श््श्य्ेु्ि््््ण्ण््फः्‌ 8० ७३७७०० ६३ ९०० ६४ 0 क्तता कक क कह pepe अ कश न टक देन हे जक बल १९०७८७००७० ९७ लाकयगधननशकरकककामकिककनकन की ee ee US we UE ककती | ततो भरतमाहेदं रामः सत्यपराक्रमः । तव सत्यपराक्रमी भगान्‌ रामने भरतजीसे कहा-- सर्वसम्पत्समायुक्तं मम मन्दिरुतमस्‌॥२१॥ | “मेरा समपि श्रेष्ठ महड i त मित्राय वानरेन्द्राय सुग्रीवाय प्रदीयतासू | | उश्रीमको दो तथा म अर उ ० ee ' रहनेयोग्य महल बताओ” || ३१-३२ ॥ श्रीरथुनाथ स्वस्यः सुखनासाथ मन्दिराणि प्रकल्पय ॥२२॥ | जोक आज्ञा पाकर भरतजीने वैसा हॉ क्रिया रामेणेबं समादिष्टो भरतथ तथाऽकरोत्‌ ) | किर तेजस्वी भरतजीने सुरते का-॥।३३॥ “श्री उवाच च महातेजाः सुग्रीवं राघवाचुजः ॥२२॥ | रामचन्दजाके अभिपेकके लिये चारों समुद्ोका मंगठ राघभस्याभिषेकार्थ चतुःसिन्धुजरं शुभम्‌ । | मय जळ छानेके लिये तुरन्त ही शीघ्रगामी दूत भेजिये' आलेत ग्रेषयखा्यु दूतांस्त्वरितविक्रमान्‌ ॥३४॥ ¡ ॥३४॥ तव धुप्रीवने जाम्बवान्‌, हनुमान, अज्ञद जी प्रेषयामास सुग्रीवो जास्ववन्त मरत्सुतम्‌ |, उपेणका भेजा | दे तुर्त ही बायुवेगसे जाक अङ्गदं च सुपेणं च ते गत्वा वायुषेगतः ॥३५॥ ` रको ज च च जाल । उनके ठाय हु अपूरयन्‌ शातझुम्भकलद्यांथ समानयत्‌। ‰ रग गन्तिकेसहित शूने भगवान्‌ रामः आतं तीर्थसलिल॑ शतरुभो सन्त्रिमिः सह ॥३६॥ | Hd विचको निवेदन कर द्या : MRPs i , तब त्राह्णोके सहित वयोवृद्ध जितेन्द्रिय वसिष्टजार राववस्यािषकाय पेसिष्ठाय न्यवेदयत्‌ | सीताजीके सहित श्रोरामचन्द्रजीको रत्नसिंहासनप ततरतु अयता बद्धा वसिष्ठा आाह्मणे! सह ॥२७॥ , वेठाया और फिर वसिष्ट, वामदेव, जाबालि, गोतम तथ राम र्नमये पीठे ससीतं संन्यवेशयत्‌ | | वाल्मीकि आदि समस्त महर्पियोने अति प्रसन होक वसिष्ठो वामदेवश्च आवालिगोतमसथा ॥३८॥ ¦ कुश और तुख्सीके सहित पित्र गन्धयुक्त जल वाहमीकिश्च तथा चक्र! सर्वे रामाभिपेचनम्‌ | | श्रीरामचन्द्रजीका अभिप्रेक किया ॥३५--३५९॥ कुशाग्रतुलसीयुक्तपुष्यगन्धजलैर्गुदा ॥३९॥ | फिर ऋत्विों, रेट तराणं, कन्याओं ओर मन्त्रियोंत् स्पि रघु वासवं असमो यथा! सित उन महर्पियोने आक्राशश्चित देवताओं तथ ऋतिवग्भित्राह्नणेः श्रेष्ठ: कन्याभिः सह मन्त्रिभिः || अपने ग सहित जारो ठोकपाठांके सुर बेर देवमासे खितेः। . ग सवन लत भ भा इस प्रकार अभिषेक किया जैसे बसुओंने इन्दक ल च्य EN चंताभ्रलोकपालेश स्तुवद्धिः सगणैस्तथा ॥४१॥ | किया था ॥४०-४ १॥ छत्र च तस्य शाह शप्तः पाण्डर शुभस्‌। ' उस समय रनुक्षजीने भगवान्‌ रामके ऊपर अटि हैं,» जम च्य र सु स॒ग्रीवराक्षसेन्द्र ता. दधतु! श्वेतचासरे ॥४२॥ ' सुन्दर खेत छत्र लगाया और सुग्रीव तथा विभापणरे मालां च काश्वनी वायुदंदौ वासवचोदितः। न वी कि ॥ र रकी प्रेरणा 0 सपरत , a वायुने सुवणमयी माझा दी ओर फिर स्वयं इन्ट्रने "लाक सणिकाशनथूपितय्‌ ॥४३॥ | अति तिक महाराज ह. जब ददौ हार सराय कसु भि र मणि पमण रह दे न्द्राय खय शक्रस्तु भक्तितः । युक्त और मणि तथा छुबर्णसे विभूषित हार दिया | सः प न he “क .नजशुद्वगन्थवा ननतृतृाप्सरोगणाः ॥४४।।| तदनन्तर, देवता और गन्ने गान आरम्भ किया, और 'देबडुन्हुभयो नेः पुष्टिः पपात खात । ना मो य ज ॥ ४३-४४ ॥ तथा सवदा | पदप [क -दुन्दुभयाके धोपके साध पुष्पोकी | एषा यतेक्षणम्‌ ॥४५॥ । वर्षा होने छगी । फिर नवीन दूर्वादलके समान ब्यान Cn en -- र R सग १५] युद्धकाण्ड ३१९ De ५-७-७०५७ 2-0-37 re TT RRR 0000 न्या १ ७१४"४0४४१४४४४४४१४७४४४/४ ४४१0५ त्न रविकोटिप्रभाथुक्ताकिरीटेन ` विराजितम्‌ | | वर्ण, कमल्दलके समान बिश्ञाळनयन, करोड़ों सूर्यॉ- कोटिकन्दर्यलावण्यं पीताम्बरसमाइतम्‌ ॥४६॥ | के समान प्रकाशयुक्त मुकुटसे सुशोभित, करोड़ों दिव्याभरणसम्पन्नं दिव्यचन्द्नलेपनम्‌ । कामदेवोंके समान कमनीय, पीताम्बर-परिवेष्टित, अगुतादित्यसङ्काशं द्विभुज रघुनन्दनमू ॥४७॥ | दत्यामरणविमूषित, दिव्यचन्दन-चर्चित, हजारों वाममागे समासीनां सीतां काञ्चनसन्निभम्‌ । सके i एक अविक शोभायमान दिश पहवांभरणसम्पन्ना वामाङ्गे सञ्ुपस्थितास्‌ ॥४८॥। | i अपनी के और करकमठमे र रक्तोत्पलकराम्भोजां वामेनालिइम्य संस्थितम्‌ । चारण किये बैठी हई सर्बायूषणविभूपिता झु तिया वहीत र | वर्णा सीताजीको अपनी बायीं भुजासे आलिंगन सवातशयशोभाळ् रट्टा भक्तिसमन्वितः ॥४९॥ | किये देख पार्वेतीजीसहित भगवान्‌ शंकर मक्ति- उमया साइत दच! शङ्करा रुनस्दनस्‌ । भावसे भरकर समस्त देवताओंके सहित स्तुति करने सर्वदेवगणैयुक्तः स्तोतुं सम्मुपचक्रमे ॥५०॥ | छो || ४५-५०॥ श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेवजी बोले- नीलकमलके समान सुकोमल नमोऽस्तु रामाय सशक्तिकाय श्यामशरीरवाले, किरीट हार और भुजबन्ध आदिसे नीलोत्पलश्यासलकीमलाय । विभूषित तथा अपनी शक्ति (श्रीसीताजी ) के सहित किरीटहाराङ्गद भूषणाय सिंहासनपर विराजमान महातेजस्वी शरीरामचन्द्रजीको सिंहासनस्थाय महाप्रमाय ॥५१॥ | नमस्कार है ॥ ५१ ॥ हे राम ! आप आदि, अन्त तवमादिमध्यान्तविहीन एकः और मभ्यसे रहित अद्वितीय हैं, अपनी मायासे आप ही सृजस्यवस्यत्सि च लोकजातम्‌ । | सम्पूर्ण छोकोंकी रचना, पाळन और संहार करते हैं, तो खमायया तेन न लिप्यसे त्ब भी उससे लिप्त नहीं होते क्योंकि आप निरन्तर स्वानन्द- यत्खे सुखे्जसरतो$नवद्य! ॥५२॥ | मश और अनिन्य है ॥ ५९ ॥ अपनी मायाके गुणोसे हां चि धवतस्त्व॑ आदृत होकर आप अपने शरणागत भक्तोंको मागे लील | “नावान | दिखानेके लिये देव-मनुष्यादि नाना प्रकारके अबतार ' नानावतारैः सुरमाचुषाचेः | डेकर विचित्र.छीलाएं करते हैं। उस समय सदा ' प्रतीयसे ज्ञानिभिरेव नित्यम्‌ ॥५२॥ ज्ञानीजन ही आपको जान पाते हैं ॥ ५२ ॥ आप री प अपने अंशसे सम्पूर्ण छोकोंकी रचना करके - खांशेन लोकं सक विधाय त उन्हें शेषरूप होकर नीचेसे धारण करते हैं तथा 6. भात च तदप फणीश्वरः । सूर्य, वायु, चन्द्र, ओषधि और बृष्टिरूप होकर उनका उपवा भान्यानलाइम वाजः नाना प्रकारसे उपरसे पाळन करते हैं ॥५४॥ आप ही रवर्षरूपोऽवासि नैकधा जगत्‌ ॥५४।। | जठराग्निरूप होकर (प्राण, अपान आदि) पाँच प्राणों- त्वमिह देहभ्रतां शिखिरूपः की सहायतासे ग्राणियोंके खाये हुए अन्नको पचाकर "पचसि इुक्तामशेषमजस्तम्‌. । उसके द्वारा सर्वदा सम्पूर्ण जगतका पालन करते हैं पचनपश्चकरूपसहायो ॥ ५५ ॥ हे ईश ! चन्द्र, सूर्य और अझिमें जो तेज जगदखण्डमनेन बिभर्षि ॥५५॥ * है, समस्त प्राणियोंमे जो चेतनांश है तथा देहधारियों- २२९० | अध्यात्मरामायण [ सर्ग १५ RSIS TTR ee ऑल कीट > TOD Se even rae or we oe दम्कनना-्छचदन्यामकण्करययमकमयन्यनकणंककककमु त गी we में जो धैय, शोर्य और आयुर्वेल-सा दिखायी देता है वा चनद्र्र्यशिखिमध्यगतं यत्तेज ईश चिदशेपतनूनास्‌ । आपहीकी सचा है॥ ५६॥ दे राम ! भिन-भिज प्रामवत्तनुसृतामिव धैर्यं इट्वरवादियोंक एक आप ही झा, महादेव और शोर्यमायुराखिलं तव सत्वम्‌ ॥५६॥ | विष्णुको तथा काढ, कर्म, चन्द्रमा और सर्यके अरम त्वं विरिश्वि शिवविष्णुविभेदात्‌- पृथक-परयक्से भासते हैं; किन्तु इसमें सन्देद नहीं, कालकमशशित्वयेविभागात्‌॒ । घास्तवगे आप हैँ. एक अद्वितीय ब्रह्म दी ॥ ५७१ वादिनां एथयिवेश विभासि | जिस प्रकार बेद, पुराण और छोवमें आप एक # रह्म निश्चितमनन्यदिहैकम्‌ ॥५७॥ | सस्यादि अनेक रुयोंसे परसि है; उसी प्रकार संसार मत्स्यादिरूपेण यथा त्वमेकः में जो कुछ सत-असत-ख्प-चिभाग ४, वह आप ही श्रुती पुराणेषु च ठोकसिद्ध । | आपसे मित्र और इ नह ६ ॥ ५८ इस तथैव सर्व सदसद्विभाग- | अनन्त सिम जो कुछ उन दरा ६. ना उन | होगा और जो हो. रदा है उस रथावर-जंगमादिरूप स्त्वमेव नान्यद्भवतो विभाति ॥५८॥ | ˆ ` 5 ए है त रप । सम्पूर्ण प्रपश्षमें आपके विना और कोई दिखायी नटी यद्यत्समुत्पन्नसचन्तदृ्टा- हि ५ ~ > ह. दुत्पत्स्यते यञ्च भवच यज्ञ। ¦ देता । अतः आप (प्रकुति आदि) परमे भी पर हॅ त च्यते खावरजड़मादौ णशा है राम ! आपका मायने माहित दोनेके कारण त्वया विनातः परतः परस्त्वम्‌ ॥५९।। ! सव ठोग आपके परमात्मत्वरूपका नन्व नही जानने। तरं न जानन्ति परात्मनस्ते ' अतः जिनका अन्तःकरण आपके भक्तों की सेवा के प्रभाग जनाः समस्तास्तव माययाऽ्तः। सेनिर्मणहो गया है उन्हीकों आपका अद्वितीय ईइवर त्वङ्कक्तसेवाऽमलमानसानां , रूप भासता है ॥ ६०॥ जिनकी माल पदार्थीमे विभाति तसं परमेकमैशम्‌ ॥६०॥ ; सत्यवुद्धि है वे म्रसादि भी आपके चिल्वरूपको नहीं ब््लादयरते न विदुः खरूपं , जानते, (फिर औरोंका तो करना हाँ ज्या है 7) चिदात्मतरवं बहिरर्थमावाः । ' अतः बुद्धिमान पुरुष इस इयामसुन्दरत्वरूपसे हीं ठतो बुधस्त्वामिदमेव रूपं ! आपका भक्तिपूर्वक भजन करके दुःखोसे पार होकर भक्त्या भजन्शुक्तसुपैत्यदुःख! ॥६१॥ गोक्ष प्राप्त कर वेता है॥ ६१ ॥ प्रभो ! आपने अहं भवन्नाम गृणन्कृताथों नामोच्चारणसे एतार्य होकर में अहनिदा पार्वतोजीके वसामि काइ्यामनिशं सवाच्या | सहित कामं रहता 54 और बहा मरणासन सरू्पमाणस्य विदक्तयऽह पुरुषोंको उनके मोक्षके लिये आपके तारक मन्त हमे सर वि राम नाम ॥६२॥ | धामः नामका उपदेश करता हूँ ॥ ६२ ॥ (अव ' भृण्वन्ति गायन्ति ठिसन्ति ये । आपसे यही प्रार्थना है कि) जो लोग मेरे कहे हुए इस _ ८७५८ १तिशायान्तलखान्तयंच। | स्तोत्रको अनन्य भक्तिसे नित्यप्रति छुनें, कहें अथवा ल सर्वसौए्यं प्रस च ल्व्ध्वा लिखें वे आपकी कृपासे सम्पूर्ण परमानन्द = उ बजे मवत्पद यान्तु भवत्मसादात्‌ ॥६३॥ | पके निजः पदक णे परमानन्द लाभ करके न्द्र उचाच आपके निज-पदको प्राप्त हों ॥ ६३ ॥ इन्द्र बोले-हे देव | ब्रझाजोके चरके प्रभावसे राक्षसराज रावणने मेरे समस्त देवोचित सुखको हर लिया था | अब उस दुष्ट शत्र, राक्षसराजके मारे रक्षोधिपेनाखिठदेव सौख्यं | हतं च मे ब्रह्मवरेण देव | सगे १५] - पुनथ्च सर्वे भवतः प्रसादात. युद्धकाण्ड ' ३२१ ४८४४४४ ४४ ४४४५७४ ७७५७४७७८७० ७ NUE UN ONIN जानेपर आपकी कृपासे मुझे वह सब सुख फिर प्राप्त ooo Ne प्राप्त हता राक्षसदुष्टशत्रु। ॥६४॥ | हो गया ॥ ६४॥ देवा उच्‌ हुता यज्ञभागा धरादेवदत्ता मुरारे खलेनांदिदेत्येन विष्णो । . श्तो5्च त्वया नो वितानेषु भागा! पुरावञ्भविष्यन्ति युष्मस्रसादात्‌॥६५॥ वितर उचुः हतोऽ त्वया दुष्टदैत्यो महारमन्‌ गयादौ नरेदत्तपिण्डादिकानः । बलादत्ति हत्वा गृहीत्वा सम्रस्ता- निदानं पुनर्लव्धसत्वा भवामः॥६६॥ यक्ता ऊचुर सदा विष्टिकर्मण्यनेनामियुक्ता वहामो दशास्यं बलाइ!खपुक्ता! । दुरात्मा हतो रावणो राघवेश त्यया ते बय दुःखजाताद्िमुक्ता! ॥६७॥ गन्धर्वा ऊचुः चयं सञ्गीतनिषुणा यायन्तस्ते कथासृतम्‌ । आनन्दामृतसन्दोहयुक्ताःपूर्णा! खिताः पुरा॥६८॥ पथादुरात्मना राम रावणेनाभिविद्र्ताः | तमेव गायमानाथ तदाराधनतत्पराः ॥६९॥ खितास्त्वया परित्राता हतोऽय दृष्टराक्षसः । एवं महोरगाः सिद्धाः किन्नरा मरुतस्तथा ॥७०॥ ` >सवो मुनयो गावो शुद्यकाश्च पतत्त्रिणः । सम्रजापतयश्रेते तथा चाप्सरसां गणाः ॥७१॥ सर्वे रामं समासाद्य इष्टा नेत्रमहोत्सवम्‌ । स्तुत्वा पथक्‌ एथक्‌ सर्वे राघवेणाभिवन्दिताः।७२। ययुः खं खं पदं सर्वे ब्रह्मरद्रादयस्रथा । शंसन्तो मुदा रामं गायन्तस्तस्य चेष्टितम्‌ ॥७३॥ “्यायन्तस्त्वभिपेकाद्रं सीतालक्ष्मणसंयुतम्‌ । “टा देवगण बोले--हे मुरारे ! हे विष्णो ! इस दु आदिदेत्यने ब्राह्मणोह्वारा दिये हुए हमारे समस्त यज्ञ- भागोंको हर लिया था । अब आपने उसे मार डाला, अतः आपकी कृपासे अब हमें फिर पहलेके समान ही यज्ञोंमें भाग मिलने लगेंगे || ६५ || पितृगण बोळे-हे महात्मन्‌ | यह दुष्ट दैत्य गया आदि पुण्यःक्षेत्रॉमे मनुष्योंके दिये हुए हमारे पिण्डोद- कादिको बलात्कारसे छीन कर खा लेता था; आज आपने इसे मार डाला । अतः अब अपना भाग. प्राप्त करके हम फिर शक्ति प्राप्त कर लेंगे। ६६ ॥ यक्ष बोळे-हे रघुनाथजी | यह रावण हमें बळात्‌- कारसे वेगारमें छगा देता था और हम इसकी पाल्की आदिमें जुतकर बड़ा कष्ट मानकर इसे ले चलते थे | अतः आज इस दुरात्माको मारकर आपने हमें अनेकों दुःखोंसे छुडा दिया ॥ ६७॥ गन्धर्व बोले--प्रभो ! हम संगीतकुशळ लोग आपकी अमृततुल्य कथाओंका गान करते हुए पहले आनन्दामृतसमूहसे युक्त होकर मञ्न रहते थे ॥ ६८॥ किन्तु फिर दुरात्मा रावणद्वारा . आक्रान्त होकर हम उसीके गुणगान और उसीकी सेवामें तत्पर हो गये । इस दुष्ट राक्षसको मारकर अब आपने ' हमें भी बचा छिया । इसी प्रकार सिद्ध, किन्नर, मरुत्‌, वसु, सुनि, गौ, गुह्यक, पक्षी, प्रजापति और अप्सराओंके समूह सभी भगवान्‌ रामके पास प्रथिवीळोकमें आये और उन नयना- नन्दवर्षन प्रभुको दर्शन कर उनकी पृथक-पृथक्‌ स्तुति की तथा उनसे प्रशंसित हो अपने-अपने लोकोंको चले गये | तदनन्तर ब्रह्मा और महादेव आदि भी आनन्द- पूर्वक भगवान्‌ रामकी प्रशंसा करते, उनकी छीछाओंका गान करते और सिंहासनपर विराजमान अभिषेकसे आद्र राजराजेश्वर श्रीरामचन्द्रजीका सीताजी और छक्ष्मणके सिंहासनर्थ राजेन्द्रं ययुः सर्वे हृदि स्थितम्‌ ॥७४॥ सहित हृदयमें ध्यान करते वहाँसे विदा इए॥६९-७४॥ ३१ कर न्ती पु हि -रै२ै९ै अध्यात्मरामायण [ सभ १६ ४७७७७० ८२७ देवइन्दे! स्तुवद्धि- देवताओंका बृन्द स्वर्गमें प्रसन्न हृदयसे स्तुति करता 1५] जता = द्धिः पुष्पवुष्टि दिवि मुनिनिकरे- हुआ पुष्प बरसा रहा था तथा महदवि-मण्डळ चारों राडयमाचः समन्तात । ओर खित होकर स्तुति कर रहा था, करोड सूरयोके रामः इयामः प्रसन्नसितरुचिरमुसः समान प्रकाशमान प्रसन्नतायुक्त सुसकानसे मनोर सूर्यकोटिप्रकाशः मुखवाळे इयामसुन्दर भगवान्‌ राम सांता, लक्षण, _ तासोमित्रिवातात्मजमुनिहरिमि! ' हनुमान, मुनिजन तथा वानरगणोंस सेवित होकर अः र सेव्यमानो विभाति ॥७५॥ | सुशोभित हुए | ७५ ॥ I क आ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे पञ्चदशः सगः ॥ १५॥ I © > MN पोडश सर्ग वानरोंक्री विदा तथा अन्धप्रशंसा | महादेव उवाच ` शरमहादेयजी बोले-है पाति ! सगल लोकको रामेअमिपिक्ते राजेन्दे सर्वलोकसुखावहे। ' इंख देनेवाठे राजराजेबर भगात्‌ रामके राज्याभिपिक होनेपर पृथिवी भन-धान्यसे पूर्ण हो गयी और शक डप सस्वसम्यनञा फणवन्हो महर्हाः ॥१॥ फल्युक्त ह। गय ॥ १॥ तथा जो पुष्प गन्धहीन थे दें गन्बह नात पुष्पाणि गन्धवन्ति चकाशिरे। | मो सुगन्ययुक्त होकर शोभा पाने लगे | श्रोरघुनाथर्मो- सहस्तशतमश्चानां धेनूतां च गयां तथा ॥ २॥ ने ( राज्याभिपिक्त होकर ) पहले एक ठाउ घोरे, ददो शतइपानपूते हविजेम्यो रघुनन्दनः एक खख दृध देनेबाळी गोऐँ और ई्रदों मेर माह्मणोंको दिये और पिर उन्हें हीम करोऽ २ वेण तिशत्काट सुबर्णस्य नाह्लणस्या दद पुनः || ३ ॥ मुद्रा दिये ॥ २-३ || तसात्‌ उन्होंने प्रसन्न होकर दुल्लाभरणरक्षाने घ्राह्मणेभ्यो युदा तथा । ' नाना प्रकारके चत्र, आभूषण आर्‌ रत्नादि भा ब्राह्मण।- सकान्तिसमग्रण्यां सर्वसत्मयी सरलम्‌ ॥ ४॥ को दिवे । फिर मत्तवत्सळ रघुनाथजाने सतर प्रकारके रतस युक्त एक सूर्यकी कान्तिके समान चमकती हः झुय्रावाय ददा ग्रीत्या राघवो भक्तवत्सलः । ` माला अत्यन्त ग्रीतिपूरवक सुग्रीबको दो और अंगदकों अङ्गदाय दृदौ दिव्ये गदे रघुनन्दनः ॥ ५ || ' दो दिव्य अंगद ( सुजवन्ध ) दिये ४-५ | तदनन्तर चन्द्रकोरिप्रतीक्षां मागिरतविभूषितय । 9 तिलक श्रीरामचन्दजीने अति प्रेमभावसे करोडो | चन्द्रमाओंके समान प्रकाशमान अमूल्य मणि और साताय प्रददा हार प्रीत्या रघुकुलाचमः ॥६॥ | रल्लोसे विभूपित एक हार श्रीजानकौजीको दिया ॥६॥ अवयुच्यात्मनः कण्ठाद्वारं जवफेचान्द्नी | श्रीबनकनन्दिनी उस हारको अपने गटेसे उतार- अवेक्षत हरीन्सवीस्‌ भर्तारं चे मुहुमुहु। ॥ ७॥ ¦ ९ वारम्वार अपने पतिदेव और वानरोकी आर देखने लगी ॥ ७ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने साताजीका - रायलामाह वेदेहीसिङ्गितश्ञो विलोकयन्‌ । | कर उनकी ओर देखते हुए जहा हे समर, >> ध्य्प्य्य््य्स्य्य्स््य्य्स्य्य्य्य्ल्ल्ख्च्ल्््् सपा ore Pro Dis ene PO RYT pe क पेड काटा कार पक वकर एक फर काट जज के पीक कक पेड जन पर क २ पी पी ७० ७७०७ ७०७ बल ने क ककल कल जज फिट २ ७ क क चेदेहि यस्य तुष्टाऽसि देहि तरी चरानने ॥ ८ ॥ इनूसते ददो हार पञ्यतो राघवस्य च। ` Chas तेन हारेणं शुशुभे मारुतिगोरवेण च॥९॥ -रामोऽपि मारुति इष्ट्या कृताजञलिमुपस्थितम्‌ । 'भक्त्या परमया तुष्ट इदं वचनमब्रवीत्‌ ॥१०॥ हनूमंस्ते ्रसनोऽसि वरं वरय काङ्कितम्‌ । दास्यामि देवैरपि यदुर्लमं ्चुवनत्रये ॥११॥ हनूमानपि तं ग्राह नत्वा रामं प्रहृष्टधीः । त्मन्नाप सरतो राम न ठप्यति मनो सम॥१२॥ अतस्त्वन्नाम सततं स्मरन्‌ स्थास्यामि भूतले। यावत्खास्यति ते नाम ठोके तावर्‍्कलेघरम्‌॥ १२) मम तिष्ठतु राजेन्द्र वरोऽयं मेऽभिकाङ्वितः । रामस्तथेति तं प्राह सुक्तस्िष्ठ यथासुखम्‌ ॥१४॥ करपान्ते मम सायुज्यं प्राप्स्यसे चात्र संशयः । तमाइ जानकी प्रीता यत्न कुत्रापि मारुते ॥१५॥ खितं त्वामचुयास्यन्ति भोगा! सर्वे ममाझ्या । इत्युक्तो मारुतिसाभ्यामीशराभ्यां प्रहुएधी। ॥१६॥ आनन्दाश्रुपरीताक्षो भूयोभूयः प्रणम्य तो । कच्छाचयों तपस्तप्तु हिमवन्तं महामतिः ॥१७॥ नतो मुहं समासाय रामः ग्राज्ञलिमत्रवीत्‌ | एखे गच्छ पुरं रम्यं शृङ्गवेरमचुत्तमम्‌॥१८॥ मामेव चिन्तयन्नित्यं शङ्क भोगान्निजा्जितान्‌। अन्ते ममैव सारूप्य प्राप्स्यसे त्वं न संशयः ॥१९॥ इत्युकत्वा प्रददौ तसै दिव्यान्याभरणानि च । राज्य च विपुल दत्वा विज्ञान च ददाव च्चः ॥२०॥। रामेणालिड्वितों हुटो ययो खभवन गुहः जनकनन्दिनि | तुम जिससे प्रसन्न हो उसे यह हार दे दो” ॥ ८ ॥ तब सीताजीने श्रीरामचन्द्रजीके सामने ही वह हार हनुमान्‌जीको दे दिया । उस हारको पहन और गौरवान्वित हो शहचुमानूजी अत्यन्त शोमाको प्राप्त हुए ॥ ९॥ भगवान्‌ रामने भी सामने हाथ जोड़े खडे हुए हनुमान्‌जीसे उनकी भक्तिके कारण अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा--॥ १ ०॥ “हङुमन्‌ | में तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हें जिस वरकी इच्छा हो माँग छो । जो वर त्रिलोकीमें देवताओंको “भी मिलना कठिन है वह भी मैं तुम्हें अवश्य दूंगा” || ११॥ तब हनुमानजीने अत्यन्त हर्षित होकर उनसे कहा--“हे रामजी ! आपका नाम-स्मरण करते हुए मेरा चित्तु नहीं होता ॥१२॥ अतः मैं निरन्तर आपका नाम-स्मरण करता हुआ पृथिवीपर रहँ । हे राजेन्द्र ! मेरा मनोवाड्छित वर यही है कि जबतक संसारमें आपका नाम रहे तबतक मेरा शरीर भी रहे ।” श्रीरामचन्द्रजीने कहा--“ऐसा ही हो, तुम जीबन्सुक्त होकर संसारमें सुखपूर्वक रहो ॥१३-१९॥ कल्पका अन्त होनेपर तुम मेरा सायुज्य प्राप्त करोगे, इसमें सन्देह नहीं ।” फिर जानकीजीने उनसे कहा-- हे मारुते | तुम जहाँ कहीं भी रहोगे वहीं मेरी आज्ञासे तुम्हारे पास सम्पूर्ण भोग उपस्थित हो जायँगे।” अपने प्रभु भगवान्‌ राम और सीताजीके इस प्रकार कहनेपर महामति हनुमानजी अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ १५-१६॥ ओर पिर नेत्रॉमें आनन्दाश्रु भर उन्हें वारम्वार प्रणाम कर बड़ी कठिनतासे, तपस्या करनेके लिये हिमाळयपर चले गये || १७॥ तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने हाथ जोड़े खड़े हुए गुहके पास जाकर कहा --/मित्र | अब तुम अपने परम रमणीय प्राम श्रंगवेरपुरको जाओ ॥ १८॥ वहाँ मेरा ही चिन्तन करते इए अपने शुभकर्मोसे प्राप्त हुए भोगों- को भोगो । इसमें सन्देह नहीं, अन्तमें तुम मेरा. ही सारूप्य प्राप्त करोगे” ॥ १९॥ ऐसा कह भगवान्‌ रामने उसे दिव्य आभूषण, बहुत-सा राज्य और तरव- ज्ञानका उपदेश दिया ॥ २०॥ फिर श्रीरघुनाथजीसे | आलिंगित होकर गुह अपने धरको गया | और भी वि टश ण © अध्यात्मरामायण सभ १ sos SN ST nee फक 80 ककी कोकण seu eee of ENR एमी घटी Soe क चल. ST ps a Ne कर कळकळ कोची मे चान्ये वानराः श्रे अयोध्यां समुपागता॥२ १॥ जो-जो वानरश्रे् अयोध्यामें आय थे श्रीरामचन्द्रजीन चा उन सबका भो अगूल्य वख ओर आशृपणसि सत्कार अमृल्याभरणवेल! पूजयामास राघवः । किया । इस प्रकार यिरभीपणके सहित सुग्रीव आदिं सुग्रीवप्रपुखा। संध वानराः संविभीपणा! ॥ २२॥ समस्त बानरगग परमा रागरे यथोचित सतकार यथाई पूजितासेन रामेण परमात्मना । | पाकर अपने-अपने खानोंकों चळे गये ॥ २१-२३ ॥ हृष्टमनसः सवं जगुरव तम्‌ ॥२३॥ ुग्ीवादि समस्त वानरगण प्रसन-चित्तस किंष्किन्धाको सग्रीवग्रमुखाः सर्वे किष्किन्धां प्रययुप्दा । | गये और भगवान्‌ रामसे सत्त दो अनिन्दित, प्‌ विभीपण अपना निष्कण्टक राज्य पाकर प्रातिपू्वका विभीषणस्तु सम्प्राप्य राज्यं निहतकण्टफेमू 11२४) सीकर | लंकाको गये तथा सबके ऊपर दया करनेवाले रामेण पूजितः श्रीत्या यथौ लङ्कामनिस्मितः। = | औररामचन्द्रजी अपने सम्पूर्ण राज्यक्रा झासन करने राघवो राज्यमखिलं शशासाखिलवत्सर! ॥२५॥ | लगे ॥ २४-२५ ॥ अनिच्छन्नपि रामेण यौवराज्येऽभिफेचितः। | भगवान्‌ रामने श्रीलक्ष्मणजीको उनकी इच्छा न लक्ष्मण! परयःमव्मारामसेमाप्रेऽमयत्‌॥२६॥ | छोनेपर भी युवराज-पदपर अभिषिक्त किया और वे । भी अत्यन्त भक्तिपृषक रामजीकी सेवामं रहने गे शाप कसाध्यक्षाअप नमल! । | तस्तु परमात्मा पि कोध्य [॥ २६॥ परमात्मा रामन समस्त कर्माकर साक्षी, नित्य ेत्वादिविह्दीनोऽपि नि्विकारोऽपि सबंदा॥२७॥ | निर्मळज्ञखूप, कर्तृत्यादिस रहित, सर्वदा निर्विकार बानन्देनापि तुष्टः सन्‌ लोकानामुपदेशकृत्‌। | और खझानन्दसूप्त होकर भी समल लोकोको उपदेदा गश्वेथादियत्ञे्च स्ैंविंपुलदक्षिणंः ॥२८॥ | करनंक छथि मलुप्यकूप धारण कर बहनी पयजत्परमानन्दो मालुप॑ वपुराश्रितः दक्षिणाओंबाले अश्‍वमेब्रादि समरत यर्जेका अनुष्ठान महाराज रागके राज्य-शासन त ; पर्यदेवन्विधवा न च व्यालकृतं भयम्‌ ॥२९॥ | किया । महा ते करत समय कभी विघरवाओंका त्रन्दन नहीं हुआ; सपो ग व्याधिज भयं चासीद्रामे राज्यं प्रशासति | व्याधियों और ठरेरॉका भय नही था और न कोई डोके दस्युभयं नासीदनर्था नास्ति कश्चन ॥३०॥। | अनर्थ ही होता था ॥ २७-३०॥ बृर्दोके रहते द्वेष सत्सु वालानां नासीन्सत्युभयं तथा । | इए वाढकाका सृत्युका भय नहीं था, सत्र पू -_. ~ लोग भगवान्‌ रामकी पूजा और उनका स्मरण करने- एमपूजापराः से सर्वे रायवचिन्तकाः ॥३१॥ | त= ६ बल क उनव | वाळे थ ॥ ३१॥ मध सपदा ठोक समयपर यग्रष्ट Ce ~ ® ¢ ~ ववडुजलदासाय यथाकारं यथारोच। | जळ वरसाते थे, प्रजा अपना-अपना धर्म पालन करने- प्रजाः खधर्मनिरता चणाश्रसशुणान्वता। ॥३२॥। | वाळी आर वर्णाश्रमक्े शुणोसे युक्त थी ॥ ३२ ॥ तथा ओरसानिव रामोऽपि जुगोप पितृवत्मजा! | श्रीरामचन्द्रनी मी अपनी प्रजाका सगे पुत्रके समान 1 ७७. | पितुवत, पाटन करते थे, इस प्रकार सर्वलक्षणसम्पन, सवेलक्षणसयुक्त! सबघमपरायणः ॥३३॥ | $ ६परायण भगवान्‌ रागने दश सहल वर्षे राज्य- दशवपेसहस्राणि रामो राज्यसुपास्त सः॥३४।। | शासन किया ॥ ३३-३४ ॥ इदं रहस्यं धनधान्यक्ाद्वम- धन-धान्यादि समस्त वैभव देनेवाले तथा दीर्घायु, दीघोयुरारोग्यकर सुपुण्यदभ्‌ । | आरोग्य और पुण्यकी वृद्धि करनेवाले इस आध्यात्मिक पवित्रमाध्यात्मिकसंज्ञितं पुरा परम पवित्र और गोपनीय रहस्यको रामायण भापितमादिशम्अना ॥३५॥ ¦ पर्वकाठमें श्रीआदिमहादेवने पार्वतीजीको सुनाया सर्ग १६] शृणोति भक्त्या मनुजः समाहितो „ भक्त्या पठेद्वा परितुष्टमानस! । सवाः समाझोति मनोगताशिषों विभुच्यते पातककोटिभिः क्षणात्‌।३६॥ रामाभिषेके प्रयतः शृणोति यो ` शनाभिराषी लभते महद्धनम्‌ । पुत्राभिलापी सुतमार्यसम्मतं ग्राझोति रामायणमादितः पठन्‌ ॥३७॥ शृणोति योऽध्यात्मिकरामसंहितां ` प्रामोति राजा सुवमृद्भसम्पदम्‌ । शत्रून्विजित्यारिभिरप्रधर्षितो व्यपेतंदुःखो विजयी भवेन्नृपः ॥३८॥ खियोऽपि शुण्पन्त्यधिरामसं हितां भवन्ति ता जीविसुताश्च पूजिताः । वन्ध्यापि पुत्रं लभते सुरूपिणं कथामिमां मक्तियुता शुणोति या॥३९॥ श्रद्वान्बितो यः शुणुयात्पठेन्नरो विजित्य कोपं च तथा विमत्सरः । दुर्गांणि सर्वाणि विजित्य निर्भयो भवेत्सुखी राघवभक्तिसंयुतः॥४०॥ सुराः समस्ता अपि यान्ति तुश्तां विमा! समस्ता अपयान्ति शुण्वताम्‌ । अध्यात्मरामायणमादितो नृणां भवन्ति सर्वा अपि सम्पदः पराः ।।४१। रजस्वला वा यदि रामतरपरा शणोति रामायणमेतदादितः । पुत्रं प्रसते ऋषभं चिरायुषं पतिब्रता लोकसुपूजिता भवेत्‌ ॥४२॥ पूजयित्वा तु ये भक्त्या नमस्कुर्वन्ति नित्यशः| सर्वे! पापेवनि्युक्ता विष्णो यान्ति परं पदम्‌ ४३॥ अध्यात्मरामचरितं कृतं शुण्बन्ति भक्तितः। पठन्ति वा खर्य वकत्राततेषां रामः प्रसीदति ॥४४॥ राम एव परं ब्रह्म तर्मस्तुटे$खिलात्माने | युद्धकाण्ड Ton बची फल कट थक पट कट पल थे ० कक था ॥३५॥ जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक समाहित- चित्तसे सुनता अथवा प्रसन्न-चित्तसे भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह अपने मनकी समस्त कामनाओंको प्राप्त करता है और एक क्षणमें ही करोड़ों पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २६॥ जो धनकी इच्छा रखनेवाळा पुरुष इस रामामिषेकका एकाग्र-चित्तसे श्रवण करता है वह महान्‌ सम्पत्ति प्राप्त करता है और जो पुत्रा- मिलाषी इस ग्रन्थका आरम्भसे ही पाठ करता है बह सत्पुरुषोंद्दारः सम्मान पानेयोग्य पुत्र पाता है ॥ ३७॥ जो राजा इस अध्यात्मरामायणका श्रवण करता है वह धन-धान्यसम्पन्न पृथिंवी प्राप्त करता है और शत्रुओंसे अपमानित न होकर सब प्रकारके टुःख- से छूटकर विजय लाभ करता है ॥ ३८ ॥ ब्ियोंमें भी जो कोई इस आध्यात्मिक रामसंहिताको सुनती हैं उनकी सन्तान चिरजीवी होती है और वे खयं उनसे सम्मानित होती हैं तथा जो वन्ध्या भी इस कथाका भक्तिपूर्वक श्रवण करती है बह सुन्दर रूपवान्‌ पुत्र प्राप्त करती है ॥३९॥ जो मनुष्य क्रोधको जीतकर ईर्ष्या रहित हो इसे श्रद्धापूर्वक सुनता या पढ़ता है. वह समस्त अवगुणोंको जीतकर निर्भय, सुखी और रामभक्तिसे सम्पन्न हो जाता है ॥ ४० ॥ इस अध्यात्मरामायणका आरम्भसे ही श्रवण करनेवाले पुरुषासे समस्त देवगण प्रसन्न हो जाते हैं, उनके सम्पूर्ण विन्न दूर हो जाते हैं और उन्हें सब प्रकारकी उत्तम सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥ ४१ ॥ यदि रजखला खी भगवान्‌ रामका स्मरण करती हुईं आदिसे ही इस रामायणका श्रवण करे तो अति उत्तम और दीर्घायु पुत्र उत्पन्न करती है और वह खयं संसारसे सम्मानित पतित्रता होती है ॥ ४२ ॥ जो छोग इसका भक्तिपूर्वक पूजन कर इसे नित्यप्रति नमस्कार करते हैं वे समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान्‌ विष्णुके परम धामको ग्राप्त होते हैं ॥ ४३ ॥ जो पुरुष इस सम्पूर्ण अध्यात्मरामायणको भक्तिपूर्वक सुनते अथवा खयं अपने मुखसे ही पढ़ते हैं उनसे भगवान्‌ राम प्रसन्न होते हैं || ४४॥ भगवान्‌ राम ही परज हैं; अतः उन सवीत्मा रामके प्रसन्न 11109 क्ती ३२६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १६ स या eT TS brpetparurarr pny ८००७० ७ ९ ४५७७४४ ७०९ ७१७४७७ TT i we धर्मार्थकामसोक्षाणां यद्यदिच्छति तद्भवेत्‌ ४५॥ | होनेपर धमे, अथ, काम, मोक्षमेसे जिसकी इच्छा हो श्रोतव्यं निंयमेचेतद्रामायणमखण्डितम्‌ । वही मिल सकता है ॥ ४५॥ इसलिये आयु और आयुष्यमारोग्यकरं करपकोटयघनाशनम्‌॥ ४६ | आरोग्यकी देनेबाली तथा करोड़ों कल्पोंके पापसमृहका देवाश्च सर्वे तुष्यन्ति ग्रहाः सर्वे महपयः। | नाश करनेत्राढी इस रामायणका निरन्तर नित्यप्रति रामायणस्य श्रवणे ठृप्याच्त 1पंतरस्तथा | (४७ नियमपूर्वक श्रवण करना चाहिये |[४६॥. इसका श्रवण करनेसे समस्त देवगण, सम्पूर्ण प्रह एवं मद्दपिंगग प्रस अध्यात्मरामायणमेतददूशुत॑ वैराण्याविज्ञानयुतं पुरातनम्‌। हो जाते हैं तथा पितृगण भी तृप्ति लाम करते हैं ॥२७॥ ज पठन्ति शण्वन्ति लिखन्ति ये नरा- | पुरुप ज्ञान-वेराग्यसे युक्त इस अति अद्भुत प्राचीन सेपां भवेडस्मित्न पुनभंचो भवेत्‌ ॥४८॥ ¦ अध्यात्मरामायणको पढ़ते, लिखते अथवा सुनते हैं उनका आलोडयाखिलवेदराशिमसक- इस संसारम फिर जन्म नहीं होता ॥ ४८ ॥ भूतनाथ चारकं ब्रह्म त- ' भगवान्‌ शंकरने वारम्बार समस्त वेद-रादिका गन्धन दामो विष्णुरहस्यमूतिरिति यो विज्ञाय भूतेश्वरः उद्त्याखिलसारसङ्गहमिदं सङ्घेपतः ग्रस्फुटं करके यह निश्चय किया कि तारक मन्त्र राम विप्ण- भगवानूकी शुप्त मति है । अतः उन्होने समस्त चेडा- | के सार ( उपनिपदों) का संग्रहरूप यह भगवान श्रीरामस्य निगूढतत्वमाखिलं | रामका सम्पूर्ण गुप्त तत्व अपनी प्रिया श्रीपार्यतीजीकों प्राह प्रियाय भवः संक्षेपसे सुनाया ॥ ४९ ॥ oer इति श्रीमदभ्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे पोडवाः समः | १६॥ DOA समाश्षमिदं युद्धकाण्डम्‌ | रन [ क्र श्रीसीतारासाभ्यां नमः अव्यात्मरामायण rE 26 REDE DER MEX AG NES TS ना “1 7 , CSN PPE Sr» Le AF TAG TAG यद्रपराकेशमयूखमाला5नुरज्ञिता राजरमाऽपि रेजे । तं राघवेन्द्र विद्युधेन््रबन्धं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि || AG 4४१ * क आयाळ 3.2 4 खक 3. कि E AOS, ISS Mee ९४00 7०98-23 » फैल कक eles, Des २02. ४८५५ 9२३ « 200 » 2920134 हैं 2५७ 40५3 97% 9४१५ hee DNs OTP 33, म 7, 1278 2322 77/17/7728, 6107177/77777/77777( 17717, edo य य यण य / 700 600 ए2//22 70 Bed TEN ® 9 ०० र ४ 17777717 1 a ` क | 11 ८० CrP) प्र्टफ्ट5 CC 2272 2927५2 ट्ट AN CY 2202202200 ४७७०: SPSS LTTE} मीता -त्रिपिनमं श्रीराम क्रीडा ग | ‘a err क» क gr sr ff 1958 | : | हैं | ॥..! I f `- | | if. है. 1 "६. ५... ~ ५७.1२3१ ese #३ ड + १1.13 ET तरेता न जोरी सुभग । जो 'सियपिय- घि छवि-ससि निराखि | सिय चि उर-अस्दु 2» 2 ¢ नवो च्च आनंद-वी लसत के उम्रगत ४ w 39 अध्यात्मरामायण उत्तरकाण्ड SS प्रथम सर्ग भगवान्‌ रामके यहाँ अगस्त्यादि मुनीश्वरोंका आना और रावणादि राक्षष्लोका पूचचरिर सुनाना । जयति रघुवंशतिलक! कोसस्याहृदयनन्दनो रामः | श्रीकोसल्याजीके हृदयको आनन्दित करनेवाले, दशवदन रावणको मारनेवाछे, रघुवंरातिळक दशरथ- | कुमार कमलनयन भगवान्‌ रामकी जय हो ॥१॥ पार्वत्युवाच श्रीपावंतीजी बोळीं-कोसल्याजीके आनन्दको अथ रामः किमकरोत्कोसल्यानन्दवर्धन! । वढ़ानेवाले महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीने युद्धम ॥ रावणादि राक्षसोंको मारकर अयोध्यापुरीमें सीताजीके हत्वा सधे रावणादीच्‌ राक्षसान्भीमविक्रमः ॥ २ ॥ सहित राज्याभिषिक्त होनेके अनन्तर कौन-सा कार्य अभिपिक्तस्त्वयोध्यायां सीतया सह राघचः। | किया ? लीळाहीसे माया-मानव भावको प्राप्त हुए बे मायामातुपतां प्राप्य कति वर्षाणि भतले ॥ ३ ॥ सनातन परमात्मा पृथ्वोतलपर कितने वष रहे, १ स्थितवान्‌ लीलया देवः परमात्मा सनातनः। (पा. तम उन रघुनन्दनने इस मरत्योकका हे ' जद पदाततः किस प्रकार त्याग किया? ॥२-४॥ हे प्रभो ! अत्यजन्मानुपं लोकं कथमन्ते रघूद्वहः ॥ ४ ॥ | मुझ श्रद्धावतीको आप यह सब वृत्तान्त एतदाख्याहि भगवन्‌ श्रदधत्या मम प्रभो । सुनाइये । हे भगवन्‌ ! श्रीरामकथामृतका आखादन | ने करनेसे मेरी तृष्णा बहुत ही बढ़ती जाती है. द्ष्णा कथापीयूपगास्वाद णया मेज्तीब भते लिये आप श्रीरामचन्द्रजीकी कथा विस्तारपूवकं ` रामचन्द्र भगवन्‌ ब्रूहि विस्तरशः कथास्‌॥ ५ ॥ | कहिये ॥५॥ श्रीमहादेव उवाच श्रोमहादेवजी बोळे-हे पार्वति | राक्षसोंका वध ५, - करनेके अनन्तर भगवान्‌ रामके राजपदपर विराजमान कृत्वा राज्ये राम उपारिथते। | राक्षसानां वं कृत्या राज्ये रास उपार होनेपर समस्त मुनिजन उनका अभिवादन करनेवे आयसयुरदुनय/ सवे औरामसभिवन्दिलुय्‌ ॥ ६ ॥ | लिये आये ॥६॥ उस समय विरवामित्र, असित, कण्व, सा, भृगु, अंगिरा, कश्यप, बामदेव, अत्रि तथा ऽसितः कण्वो दुर्वासा भृगुरङ्गिराः । 80 छह कया तह ॥ _ विश्वामित्रोडसितः क्यो दुवासा झृुराङगर। । निर्मळ खभाव सप्तर्षिगण और अपने शिष्यो तथा अन्यान्य कडयपो वामदेचोऽत्रिस्तथा सपर्षयोऽमलाः। ७॥ | मुनिजनोंके सहित अगस्त्यजी आये | उन अगस्त्यजी 2२ eo eee NYA £. 3 9 या दशवदननिधनकारी दाशरथिः पुण्डरीकाक्षः ॥१॥ ३३० ९ अध्यात्मरामायण [सर्ग १ अगस्त्यः सहदिष्पेश्व सुनिभिः सहितोऽभ्यगात्‌ । | ने भगवान्‌ रामके द्वारपर पहुँचकर द्वारपाठसे कद्दा- द्वारमासाध् रामख द्वारपालमथात्रबीत्‌ ॥ ८ ॥-| ॥०-<॥ तुम महाराज रामसे जाकर कह! कि भवा हि रामाय मुनयः समागत्य बहिस्थिवाः। | आशीष अभिनन्दन करनेके ले अगल्य आदि अगस्त्यप्रमुखा । सर्वे आशीमिरमिनन्दितुम्‌ ॥९॥ | समर मुनिगण आये ह आर बाहर खड़े हुए ह. ॥%॥ प्रतीहारस्ततो राममगस्त्यवचनादूहुतम्‌ । तब द्वारपाठ अगस्पजीके कहनेसे तुर्त दी है भगवान रामको नमस्कार कर उनसे अति व्रिनयपूर्वकॉ नमस्कृत्मःऽग्रवीद्वाक्यं विनयावनतः प्रशुम॥१०॥ | यों कहने ठगा॥ १०॥ बह दाथ जोकर बोडा-- "देव ! लर he © रोकि > त क हि श्री अगस्त्य कृताञजलिरुवाचेदमगस्त्यो सुनिमिः सह । | आपके दर्शनोंक्रे लिये सुनियोके सद्दित श्रीअगस्त्यजी - 0 : आये हैं और बाहर खड़े हुए हैं” ॥११॥ भगवान्‌ देव सवदरशवार्थाय प्राप्ती वहिरुपस्थितः ॥११॥ | न दवारपालसे कहा--"डन्हरं आनन्दपूर्वक भीतर तसुवाच द्वारपालं प्रवेशय यथासुखम्‌ । {छे आओ |” तब सुनियोंने विधिवत्‌ पूजित दोकर ~ A | नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित महळों प्रवेश किया पूजिता विविश्ेश्म नानारत्रविभूषितम्‌ ॥१२॥ | ॥१२॥ भगवान्‌ राम मुनियोक्रों देखते ही सुस्त इष्ट्वा रामो मुनीच्‌ शीघ्र प्रत्युत्थाय कृताञ्जलिः | हाथ जोड़कर खडे हो गये और अर्थ्य-पायादिसे : उनका पूजनकर उन्हें विधिपूर्वक एक-एक गो भेंट की 0. । ॥१३॥ फिर उन सत्रको नमस्कार कर यथायोग्य दिव्य नत्वा तेम्यो ददो दिव्यान्यासनानि यथाईतः । . आसन दिये । उनपर थे मुनिगण भगवान रामसे ~ ht ~ पू जत होकर ति हूर्पपूर्वक विर अमान ह १७ उपविष्टाः गरहृ्टाश्च मुनयो रामपूजिताः ॥१४॥ ; एजित होकर अति हू्षपूवक विराजमान इर ॥ १४ सम्पृष्ठुशलाः सर्वे रामं कुशलमहुवच्‌ । : श्रीरामचन्द्रजीद्वारा कुशळ पूछे जानेपर सबने अपनी , ड _ इशान ! कुहल कही और उनसे बोलि--“है रघुनन्दन ! हे इशरत महावाहाँ सवत्र रघुनन्दन ॥१५॥ ' महाबाहो ! तुम्हारे राज्यमे तो सर्वत्र बुद्ध है न १ 'दिधवेदानीं ग्रपश्यामो हतशबुमरिन्दम। ।॥१५॥ हे शत्रुदमन ! आज हम बड़े भाग्यसे आप- ~ > | को सत्रुहीन देख रहे हैं | हे राम ! आपके लिये नहि सारः स ते राम रावणो राक्षसेश्वरः ॥१६॥ | हन स २९७1 हैं राम ¦ आपके लिये , । राक्षसराज रावण (का मारना ) कुछ भारी नहीं सधजुस्त्वं हि लोकांखीन्‌ विजेतुं शक्त एव हि। | था ॥१६॥ क्योंकि आप धनुप्र धारण करनेपर तीनों [a क; कोः जीतनेमं यं र्थ चि हमा पोस दिष्टया त्यया इताः सवे राक्षसा रावणादयः ॥१७॥| जोकोको जीतनेम भौ समय है । (हमारे ) सोभाग्यते सहमेतन्महाबाहो रावणस्य गिव । आपने रावण आदि समी राक्षसेक्रों मार डाटा ॥१७॥ हाबाहा रावणस्य निवहणम्‌ । । और हे महावाहो ! रावगका मारना तो फिर भी असद्यमेतत्सस्पाएं राषणेरयेननिपूदनम्‌ ॥१८॥ | सुगम था परन्तु रावणके पुत्र मेंधनादका वध करना _ सिर है । तो बड़ा ही दुष्कर कार्य थ कुम्भकण अन्तकप्रतिमाः सर्वे कुम्भकर्णादयों मूधे । . ग दि हौ इर का कपटी वै च दि TR . | सभी राक्षस युद्धमं कालके समान थे | हे रघुश्रेष्ठ ! अन्तकप्रतिमैबाणेईतास्ते रघुसत्तम ॥१९॥ | वे संत्र आपके कालके समान कराळ वाणोंसे मारे दत्ता चेयं स्याऽसा पुरा झभयदाक्षिणा। . गये ॥१९॥ आपने हमें तो पहले ही अभयदान दे 1 1. कोका | दिया था। अत्र आप स्वयं भी इन राक्षसोंको युद्धमें | हत्वा रक्षागणान्सङ्कचे कृतकृत्यो उच्च जीवासि॥२० | मारकर कृतकृत्य हुए जीवित हैं ॥२०॥ पाद्याध्योदिभिरापूज्य गां निवेद्य यथाविधि ॥१३॥ सगे १] उत्तरकाण्ड ३३१ IIIT IIIS ONIN oN Ne See we be Ue UN we न कल फट पक शरुत्वा हु भाषितं तेषां युनीनां सावितात्मनाम्‌ । विसयं परमं गत्वा रामः प्राज्ञलिरन्रबीत्‌ ॥२१॥ उन आत्मनिष्ठ सुनीश्वरोंका भाषण सुन श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त विस्मित हो उनसे हाथ जोड़कर पूछा ॥२१॥ “हे मुनिगण | आपलोग रावणादीनतिक्रम्य कुम्मकर्णादिराक्षसान्‌ | | त्रिलोकविजयी राषण और झुम्मकर्णीदि राक्षसोको छोड़कर रावणके पुत्र मेघनादकी ही प्रशंसा क्यों त्रिरोकजयिनो हित्वा किं प्रशंसथ रावणिम्‌ पर्स करते हैं ?” ॥२२॥ महात्मा रघुनाथजीके ये वचन सुनकर परम तेजखी मुनिवर भगरतयजीने उनसे अति प्रौतिपूर्वक कहा--॥२३]॥ “हे राम ! तुम राबण और उसके पुत्रके जन्म, कर्म और वर-प्राप्ति आदिका वृत्तान्त सुनो; मैं ततस्तद्वचनं शुत्वा राघवस्य महातमनः। । | कुम्भयोनिमहातेजा रामं प्रीत्या वचोऽन्रवीत्‌।२३॥ शृणु राम यथा वृत्त रावणे रावणस्य च | जन्म कर्म वरादानं सङ्घेपाद्वदतो मम ॥२४॥ | उनका संकषेपसे वर्णन करता हुँ ॥ २४ ॥ हे राम ! पुरा कृतयुगे राम पुलस्त्यो ब्रह्मणः सुतः | पूवकारमें सतयुग ब्रह्माके पुत्र महामति विद्वान्‌ : गवो विद्वान्मेरों! पाच महामतिः ॥२५॥। । पुलस्त्यजी तप करनेके लिये सुमेरु पर्षतपर गये तपस्तष्ठुं गतो विद्वान्मेरोः पार्थ महामतिः ॥२५॥ | | २०॥ वे महातेजली मुनिश्ेष्ठ त॒णबिन्दुके आश्रम दृणविन्दाराश्रमऽसा न्यवसन्सुनिषुद्धेंच/। | रहने छगे और बहाँ निरन्तर स्वाध्याय ( प्रणब-जप ) तपस्तेपे महातेजाः खाध्यायनिरतः) सदा ॥२६॥ | में तत्पर रह तप करने छंगे॥ २६ || उस महा- तत्राश्रमे महारम्ये देवगन्धकन्यकाः। | रमणीयं आश्रममें देवता और गन्धवोकी सुन्दरी | नि कन्याएँ गाती, बजाती और हँसती हुई नाचने तथा गायन्त्यो ननृतुस्तत्र हसन्त्यो बादयन्ति च॥२७॥ पुलल्यजीके तपे विध्न डाळने लगी तव महातेजस्वी पुलस्त्यस्य तपोविध्न चक्र! सर्वा अनिन्दिता।। | पुलत्त्यजी अत्यन्त कुद्ध होकर बोढे--॥२७-२८॥ क क १) गन्ध ए ह ज + ततः कुदो महातेजा व्याजहार वचो महत्‌ ॥२८॥ | “निस (देव या गतव) कन्यापर मेरी दृष्टि पड़ जायगी > | वही गर्भवती हो जायगी ।” तब उस शापसे भयभीत या मे दृष्टिपथ गच्छेत्सा गमे घारमिष्यति । होकर उनमेंसे कोई भी उस स्थानपर न आयी ॥२९॥ ताः सर्वाः शापसंविया नतं देश प्रचक्रमुः ॥२९॥ | किन्तु राजर्षि तृणविन्दुकी कन्याने ये वाक्य नहीं सुने; ठृणबिन्दोस्तु राजर्प कन्या तजाशूणोडवच! । इसलिये व्हू सुनीश्वरके ` सामने निर्भयतापूर्वक उन्हे Oe , देखती हुई घूमती रही ॥३०॥ इससे वह ( गर्भा- विचचार सनेरभे निर्भया -त॑ प्रपश्यती ॥३०॥ | उको प्राप्त होकर ) पौडी पड़ गयी, तथा उसके पैज्ञितान्तःशरी स्तन ( स्थूळ होकर ) साफ प्रकट होने ढगे । अपने चभूव पाण्डुरतचुव्या्जतान्तशशररिजा | स्त र व व ड शरीरको विवर्ण हुआ देख वह डरती हुई अपने देहयैचण्यं पितरमन्वगात्‌ ॥३ १॥ दृष्टा सा देहबंचण्य भीता पितरमच पत्‌ ॥रे१॥ | = न पास आयी ॥ ३१ ॥ जब उसे महातेजस्वी तृणविन्दुथ तां च्यवा राजपिरमितशुतिः । राजर्ि तृणबिन्दुने देखा तो उन्होंने ध्यानद्वारा अपनी च्यात्वा झुनिकृतं सर्सयैहिज्ञानचक्षुया ॥३२। | ज्ञानदृष्टिसे मुनिवर पुछस्यका सब कृत्य जान लिया RRS क ॥३२॥ तत्र पिता तणबिन्दुने वह कन्या मुनिश्रेष्ठ [कन्यां याय ददो पिता। ४ तां कन्या झुनिवयाय एरर द्‌ पुलस्त्यको दी और उन्होंने 'बहुत अच्छा' कह उसे तां प्रगृद्याजवीस्कन्यां वाढमित्येष स दिजः ॥र३।। स्वीक्तार कर ल्या ॥३२॥ उसे अत्यन्त जुश्रुषापरायण शुश्रूपणपरां दृष्टा झुनिः प्रीतोऽग्रवीहचः । देख मुनिवर पुरुख्यने उससे प्रसन्न होकर कहा: इह असा यापव अध्यात्मरामायण [सर्ग १ tw (२२ ४७ ४ ४७०१७१० धर आग चर ~ हक्यनक्वक-्य्क ind TTA २४५२१४५४४५ ४४४४ | मङ्ग तुझे दोनों वंझों ( मातृपक्ष और पितृपक्ष ) को बढानेवाळा एक पुत्र दगा? ॥३४॥ * ५ Se | दारा एक विलाक ततः रात सा पुत्र पुलस्त्याक्लोकविश्रुतस्‌ । | तव उस कम्यान इल 3 निलो विख्यात पुत्रको जन्म दिया, जो पुछसय-पुत्र ब्रह्म विश्रवा इति विख्यात! पौरो बरकवि्युिः २५ >. मुनिवर विक नागते प्रसिद्ध आ ॥ २५ तस्य शीलादिकं इष्टा भरद्वाजो मदाः | | विश्रवाका शीळ-लभावादि देखकर महागुनि भरदाजने भायार्थ स्वां दुहितरं ददौ विश्रवसे मुदा ॥३६॥ | प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पुत्री विवाह दा. ॥ ३६ ॥ . _ = उससे पळस्यनन्दन विश्ववाने एक त्रिकोकीम प्रतिष्टित था तु पुत्रः सञ्गञ्च पोलस्त्याछ्लाकसम्मत! | तस्या तु पुद: सञ्ज पारुरतया पुत्र उत्पन्न किया । बह विश्रवाका पुत्र अपन पिना- ~ पेतृतुर ७ अ ha ho «मकर व रि , , पितृतुल्यो वेश्रवणी ब्रह्मणा चानुमोद्त। ॥रै७॥ , हुक समान था तथा त्रक्माजीने भी उसकी प्रदांसा दास्यामि पुत्रमेकं ते उमयोवैशवर्धनम्‌ ॥३४॥ ददौ तत्तपसा तुष्टो ब्रह्मा तस्मै वरे शुभम्‌ । की थी ॥ ३७॥ उसके तमसे प्रसन्न होकर व्रमाजीने _ 6 _ ~ उसे मनोवान्छित श्रेष्ट घर देकर अखण्टिन धनरवरता मनोऽभिलपितं तस्य धनेश्त्वमखण्डितम्‌ ॥३८॥ से ना हि दी ॥३८॥ ब्रग्माजीके वादानमे भनाम्यक्ष होकर ततो लब्धवरः सोऽपि पितरं द्रष्टुमागतः | | वह उन्हीके दिये हुए मदातेजस्वी पुष्पका विभानपर पुष्पकेण धनाध्यक्षो भह्मदत्तेन भार्यता ॥३९॥ | चढ़कर अपने पितासे मिलनेक लिये आया ॥ ३९॥ और उन्हें अपने तपका पल निवेदन कर प्रणाम करके नमस्क्षत्याथ न $ स्याथ पितरं निवेध तपसः फलमू। | रोहान्‌ र्जे मु यद असुत्तम वर आह मे भगवान्‌ बक्ला दच्या वरमनिन्दितम्‌ ॥४०॥ | दिया है ॥ ४० ॥ किन्तु उन परमेस्वरने मुझे रहनेके निवासाय न से स्थानं दत्तवान्परमेश्वरः । | लिये कोई खान नहीं दिया । अतः आप मुझे कोई ऐसा निश्चित स्थान बताइये जहाँ रहनेस किसीक 7 तब विश्रवाने उससे कहा-- विश्वा अपि तं ग्राह लड्भानाम पुरी शुमा । | “(दाजरबोके) विनि ठया नामकीएक इन्दर पुर ' राक्षसेकि रहनके लिये बनायी हे ॥ ४२ ॥ किन्तु देत्य- राक्षसाना निवासाय विमिता घिश्वकमणा ॥४२॥ | लोग बिष्णुभगवानके भयसे उसे छोड़कर रसातलको तयक्त्वा बिष्णुमयादूत्या विदिशुस्ते रसातलम्‌ । | ठे गये र । उस पुरीक का किसी शनुसे आक्रान्त होना व CN अत्यन्त कठिन है, क्योंकि बह समुद्रके बॉचम बसी सा पुरा टुष्प्रधपार्‍यमध्य सागरमारस्थता॥४३॥ हुई है॥ ४२ तुम वही रहनेके लिये जाओ । उस तत्र वासाय गच्छ स्वं नान्येः साऽधिष्ठिता पुरा । | परीपर इससे पहले और किसीका अधिकार नहीं पित्रादिशस्त्वसौ गत्वा ता पुरी घनदोऽविशत्‌ ४४|| 5 ।” तव धनपति छुत्रेरने पिताकी आज्ञासे जाकर उस पुरीम प्रवेश किया ॥ ४४ ॥ वहा अपने पि स तत्र सचि ताकी 3 पत्र शुर कालुवास पिदृसम्मतः सम्मतिसे उन्होंने बहुत समयतक निवास किया । .' करयाचरचथ कारस्य उपाली नाम राक्षस! ४५h किसी समय सुमाछी नामक एक मांस-भोजी राक्षस रसातलान्मत्यलोक चचार पिशिताशनः । साक्षात्‌ रक्ष्मीदेवीके समान रूपवती अपनी छारी पुत्री- ग्ृरह्त्वा तनयां कन्यां साक्षाद्देवी मिव श्रियम्‌।४६॥ | साथ लिये रसातल्से आकर मर्व्यळोकमें घूम रहा था ४५-०६ || उसने भावान्‌ घुबरेरको पुष्पक विमान- अपश्यदूनद पुष्पक विमानः ड्‌ द्‌ दव चरन्त पुष्पक्रेण सः पर चढकर विचरते देखा | तब महामलि समाळी सगे १] उत्तरकाण्ड | ३३३ NINN NIAAA ४९७७७ NNN LINN NNN, ४९ हिताय चिन्तयामास राक्षसानां महामना! ।।४७)। | राक्षसोंके हितका उपाय सोचने ल्गा ॥ ४७॥ वह उवाच तनयां तत्र कैकसीं नाम नामतः । कैकसी नामवाळी अपनी कन्यासे बोळा--“बेटी ! तेरे कं कं ५ र विवाहका समय और यौवनकाळ बीता जा रहा है॥ 9८॥ वत्से विवाहकालस्ते यो त् ट तार दकालस्ते यौवन वक ॥४८॥ | दत्तु हे सुन्दरि ! 'द छोड देगी! इस भये तुझे प्रत्याख्यानाच्च भीतेस्त्वं न परेगृह्यसे शुभे । | कोई बर वरण नहीं करता | अतः तेरा कल्याण हो, प्र चं घरय भद्रं ते मुनि जह्मकुलोद्धवम्‌ ॥४९॥ | द. स्वयं ही जाकर ब्रह्माजीके बंशमे उत्पन्न हुए मुनिवर च [a मे | = / खयमेव ततः पुत्रा भविष्यन्ति महावलाः । | "की वरण कर । हे भे! उनसे तेरे इस इर क्यो > | के समान सर्वशोभासम्पन्न महाबल्वान्‌ पुत्र उत्पन्न ईदृशा! सर्वशोभाठ्या धनदेन समाः शुभे ॥५०॥ | क | होंगे ॥ ४९-५० || तथेति साऽऽश्रमं गत्वा मुनेरंग्रे व्यवस्थिता । तब वह बहुत अच्छा' कह सुनीशवरके आश्रमपर ~ भुवमग्रेण पादेनाधोग्रुखी रि ¦ जाकर खड़ी हो गयी और नीचेको मुख किये चरण- लिखन्ती भुवमग्रेय पादेनाधोग्नुखी खिता ॥५१॥! ५ वि वि ड है हि हि न र | नखसे पृथिबी कुरेदने ल्गी ॥ ५१ ॥ मुनीश्वरने उससे तामप्रच्छन्मुनिः का त्वं कन्याऽसि वरवार्णिनि। पूछा-“हे हुन्दरवर्णयाळी | त. कौन ओर किसकी है गे 1 कैकर्स साध्यवीत्याझलिगक्ाच ध्यानेन झातुमईसि॥५२॥ (पा है (तथा किस्य यहाँ आयी है!) कैकसीने. | हाथ जोड़कर कहा--“प्रह्मन्‌ ! आप ध्यानद्वारा ततो '्यात्वा मुनि! सर्व ज्ञात्वा तां प्रत्यभापत। समो कुछ जान सकते हैं” ॥ ५२॥ तब सुनिवरने ० मद ध्यानद्वारा सब वात जानकर उससे कहा--मैं तवामिलपितं मत्त! पुत्रानभीप्स्यसि ॥५२॥ | _ की ज्ञात तवामिलवित मत्तः पुतरानभीप्स्पसि ॥५२ तेरी अमिळापा जान गया, प्‌ मुझसे पुत्रोंकी इच्छा दारुणायां तु वेलायामागतासि सुमध्यमे । । करती है ॥ ५३ ॥ किन्तु, हे सुन्दरि | त. इस दारुण SS Se | समयमें आयी है इसलिये तेरे पुत्र मी दो महाभयंकर दारुणा परतरो राक्षसो सम्मविष्यतः ॥५४॥ | _ अतल दारणो उना रासला सम्मान हि | राक्षस होंगे” | ५४ ॥ उसने कह्दा-- हि मुनिश्रेष्ठ ! ५ क त ~ ~ 3 ~ De साऊन्रवीन्मुनिद्यादूल सत्तो5प्येवंविधो सुतो। क्या आपके द्वारा भी ऐसे पुत्र होने चाहिये ! तब तामाह पश्चिमो यस्ते भविष्यति महामतिः ॥५५॥। | मुनौखरने उससे कहा--“उनके पश्चात्‌ तेरे जो पुत्र भकतत्प होगा वह महावुद्धिमान्‌, परम भगवदूभक्त, श्रीसम्पन्न महाभागवतः श्रीमान्‌ राममक्सेकतत्परः:। | और एकमात्र रामभक्तिमें ही तत्पर होगा ।” इत्युक्ता सा तथा काठे सुपुवे दशकन्धरम्‌ ॥५९॥ | मुनीशवरके ऐसा कहनेपर उसने यथासमय दर ‘Ord 1६ शिर और बीस भुजाओंबाले अति भयंकर रावणको विँ दशशीप शुदारुणम्‌। | | श यातन सश पुर प ५ । जन्म दिया । उस राक्षसके जन्म लेते ही प्रथिवी कॉपने तद्रध्षाजातमात्रण चचाल च वसुन्धरा ॥५७॥ | लगी [| ५५--५७॥ और संसारके नाशके समस्त बभूवुन शिहेत्‌नि निमित्तान्यखिलान्यपि । कारण उपस्थित हो गये-। उसके पश्चात्‌ महापर्वतके ~ [os -डोळ्वाळ ९ उत हु _ कुम्भकर्णस्ततो जाता -महापर्वतसऩिभ! ॥७टी | समान बड़े डौळ-डोळाला कुम्मकर्ण उत्पन्न हुआ- भदरी ॥ ५८ | फिर रावणकी बहिन शर्पणखाका जन्म ततः शसा नाम जाता राबणसोदरी | |, और उसके पीछे अति शान्तवित्त सोम्यपूर्ति (ज्य _ र हि च LR ततो विभीषणो जातः शान्तात्मा सीम्यद्शन ५९) दिभीषण उत्पन्न हुआ,जो अत्यन्त खाथ्यायशीळ मिताहारी खाध्यायी नियताहारो नित्यकमेपरायणः। |आऔर नित्यकर्मपरायण था। अत्यन्त दारुण दुष्टात्मा कुम्भकर्णस्तु दुशत्मा द्विजान्‌ सन्तुष्टचेतसः॥६०। कुम्भकर्ण सन्तुष्टचित्त ब्राह्मण और ऋषियोंके समूहको ३३४ अध्यात्मरामायण [सर्ग २ ~~~ पर ४ २०/९-/२/९//९/४/९७ AU NTN NANI eas ९ ही ap effet FA Tf We ~ ~ ५ थिवीपर त्रमन छगा । तथा यन्तृपिसद्वांथ्च विचचारातिदारुणः । भक्षण करता इआ ९ 2 ण भक्षयन्तु सम्पूर्ण छोकोंको भयभीत करनेवाला मदात्रळी रावणोऽपि महासा लोकानां भयदायक रावण भी प्राणियांका नादा करनवाढे रोगक समान ववृषे लोकनाशाय ह्यामयो देहिनामिव ॥६१॥ | प्रिलोकीको नष्ट करनेके लघि बढ़ने लगा ॥५९--६१॥| राम त्वं सकलान्तरखमभितो हे राम | आप सबके अन्तःकरणोमें विराजमान हैं | जानासि विज्ञानदक और साक्षीरूपसे अपनी ज्ञानदृष्टिद्ारा सबके षु | स्थित विचारोको मळी भाँति जानते हूँ | आप | परम श्रेष्ट, नित्य-प्रचुद्ध और निर्मळ हैं | है अपनी महिमामें स्थित रहनेवाड़े परमदवर ! आपने लीलास हँ साक्षी सर्वहुदि खितो हि परमो नित्योदितो निर्मल! । 3०७७ यह मनुष्यरूप धारण किया है, किन्तु आप मायाके मायागुणेनाज्यसे गुणोंसे लिप्त नहीं होति । आपने ठौठावदा मुझसे पूछा लीलाथे प्रतिचोदितो5च भवता है, इसलिये मैं यह राक्षसोंका जन्मदृत्तान्त तुना रहा वक्ष्यामि रक्षोङ्कवम्‌ ॥६२॥ | हूँ ॥.६२॥ हे राम! में आपको एकमात्र, अनन्त, जानामि केबलमनन्तमचिन्त्यशक्ति अचिन्त्यशक्ति, चिन्मात्र, अक्षर, अजन्मा और आत्मवाध- ~ ‘~~ स्वरूप जानता हूं तथा ( मायाके हारा ) अपन स्वरूपक्ता चिन्सान्नस वाद्तात्मतर -_ ५ 3 हद त्रमक्षरसज वादतात्मतच्वम्‌। गुप्त रखनेवाले आपमें ( भजनद्वारा ) परायण हो मैं मूढ त्वां राम गूढनिजरूपमचुभ्रवृत्तो भी आपकी कृपासे स्वच्छन्द विचरता रहता हूँ मूठो 5प्यह भवदनुग्रहतथराम ॥६२॥ | || ६३ ॥ अगस्यजीक इस प्रकार कहनेपर सूर्यबंदाके एवं वद्न्तमिनवंशपवित्रकीर्ति! सुयशस्वरूप शरघुनाथंजीन अगल्यजीस हसकर इुस्मोडरन रघुपतिः गरहसन्बमापे। | सपूर्ण संसार मायामय क्योकि वालव पायाश्रिते सकरुमेतदनन्यकत्या यह मुझसे पथक्‌ नहीं हैं; हे मुने ! तुम मरे मायाश्रितं सकठेतदनन्यकत्या- वि गुण-कीतेनको हा इस संसारम सम्पूर्ण पापोंका नाश यी Os [a न्मत्कोपनं जगति पापहरं निवोध ॥६४॥। ' करनेवाला जानो ॥ ६४॥ nn 2s इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे प्रथमः सर्गः | १॥ द्वितीय सर्ग राक्षलोंके राज्यधापनका विवरण ! भराव महादेव उवाच श्रीमदादेचजी वोले-हे पार्वति ! रघुनाथजीके वचनं शरुत्वा परमानन्दनिर्भरः । ' | ये वचन सुनकर अगस्त्य मुनि अत्यन्त आनन्दसे भर युनि? प्रोवाच सदसि सवे तत्र शृण्वताम्‌ ॥ १ ॥ गये और इस सभामें सबके सुनते हुए फिर कहने अथ वित्तेशवरो देवसत्र काठेन केनचित्‌। |. ¦ ॥ दे राम! किसी समय धनपति कुवेरजी आययौ पृष्पकारूढः पितर दरष्टुमजञसा ॥ २॥ | अपन पितासे मिलनेके लिये पुष्पक विमान- पर चढ़कर आये ॥ २ || जव राक्षसी कैकसीने महा- ट ~ टा तं कैकसी तत्र भ्राजमानं मदाजसम्‌। | तेजस्वी बेरको पिताके पास विराजमान देखा तो | सर्ग २] उत्तरकाण्ड ३३५ राक्षसी पुत्रसामीप्यं गत्वा रावणमन्रवीत्‌॥। ३ | | | वह अपने पुत्र रावणके पास जाकर बोली--॥ ३ ॥ पुत्र पस्य घनाध्यक्षं ज्वलन्तं खेन तेजसा । | “विटा ! अपने तेजसे प्रकाशमान इस धनपतिको देखो त्वमप्येवं यथा भूयास्था यत्नं कुरु प्रभो ॥ ४॥ और हे समर्थ ! तुम भी बही प्रयत्न करो जिससे ऐसे हो तच्छ न _ जाओ” ॥४॥ यह सुनकर रावणने तुरन्त ही बड़े रोषसे च्छूत्वा रावणो रोपात्‌ अतिज्ञामकरोद्द्ृतम्‌ । ` प्रतिज्ञा की--“हे शुमबतवाली ! तुम खेद न करो, "नेन समो चाऽपि धिको चाऽचिरेण तु ॥ ५ ॥ | "देखो, मातः ! मैं शीघ्र ही कुबेरके समान अथवा इससे भिविष्याम्यम्ब मां पश्य सन्तापं त्यज सुबते। | भी अधिक ऐस्वर्यशाली हो जाऊँगा ।” त्युक्त्वा दुष्करं कतु तपः स दशकन्धरः। ६॥| ऐसा कह भाइयोंके सहित रावण इच्छित फल- ~ आज प्राप्तिके लिये गोकण-्षेत्रमे दुष्कर तपस्या करने चला अगमत्फलसिद्भथर्थं गोकणे ; ने तीनों | | ी धे ०७ डे पदा गया । वहाँ वे तीनों भाई अपने-अपने व्रतमें दृढ रहकर से ख नयसमास्यथाय तरल तपा महत्‌ || ७ ॥ | समसत लोकोंको तपानेवाला अति महान्‌ तप करने आखिता दुष्करं घोरं संबंठोकेकतापनमू । | छे । उनमेंसे कुम्मकर्णने दश हजार वर्ष तप किया दशवर्षसहस्राणि ङुम्भकर्णोऽकरोत्तपः॥ ८॥ | ॥ ५--< ॥ सत्यधर्मपरायण धर्मात्मा विभीषण भी विभीषणो5पि धर्मात्मा सत्यधर्मपरायणः | | पाँच हजार वर्षतक एक ही पावसे खड़े रहे ॥ ९॥ व ७ ~ एः दन्य ष ह्या पञ्चवर्षसहस्राणि पादेनैकेन तखिवान ॥ ९॥ | रगण एक हजार दिव्य वतक निराहार रहा, फिर Ly © ७ उसने व्यवर्पसहर्स तु निराहारो दश्ञाननः। | सहस्र वर्ष पूणं होनेपर उसने अपना एक मस्तक अग्नि पूर्ण वर्षसहर्से तु शीपमों जुहाव सः। | में हवन कर दिया । इसी प्रकार उसे नो हजार दिव्य वर्षे वड व | वीत गये ॥ १० || जब दश हजार वर्षे बीतनेको हुए एवं बषसहस्राणि नव तस्थातिचक्रमुः ॥१०॥ | और [जिस समय रावण अपना दश्वाँ शिर भी अथ वर्षसहस्र तु दशमे दशमं शिरः। | काटनेको उच्चत हुआ तो (धर्मात्मा ' ब्रह्माजी प्रकट हुए छेतुकामस्य धर्मात्मा प्राप्तभाथ प्रजापतिः । | और बोठे--“बेदा रावण | मैं प्रसन्न हँ ॥ ११॥ द. बरत वस्स दशग्रीव ग्रीतोऽ्सीत्यम्यसापत ॥११॥ | पर माँग, मैं तेरी जो इच्छा होगी बही पूर्ण करूगा ।” है ५ | यह सुन रावणने अति प्रसन्न होकर कहा---॥१२॥ “हे बरं वरय दास्यामि यतते मनति काह्वितस्‌ । | ईश्वर ! यदि आप मुझे वर ही देना चाहते हैं तो मैं अमरता दशग्रीयोऽपि तच्छृत्वा प्रहूटेनान्तरात्मना ॥१२॥ मागता हूँ । मैं गरुड, सर्प, यक्ष, देव और दानव आदि अमरत्वं बृणोमीक्च वरदो यदि मे भवान्‌ । किसीसे भी न मारा जा सकूँ । ( बस, मैं यही बर सुपर्णनागयक्षाणां देवतानां तथाऽसुरेः । | माँगता हुँ ) बेचारे मनुष्य तो तिनकोंके समान हैं-- ढा ~ ७. ७ ¢ जीने >पध्यर देहि तणभूता हि माहुपाश।१३॥ ( उनसे मुझे भय नहीं है ) ॥ १३॥ तब ब्रह्म अल छु म दो दयुता ह | 'ऐसा ही हो! यह कहकर रावणसे फिर कहा--हि तयासि प्रजाध्यक्षः पुनराह दशाननस्‌। | दुर! तुमने अपने जो सि अग्नि होम दिये अग्नौ हुतानि शीपाणि यानि तेऽसुरघुङ्गव ॥१४॥ | है वे पहलेके समान फिर हो जायेंगे तथा हे साधुश्रेष्ठ ! भविष्यन्ति यथापूर्वमक्षयाणि च सत्तम ॥१५॥ | उनका कमी नाश न होगा” ॥ १४-१५ ॥ एवञ्चुकस्वा ततो राम दशग्रीबं प्रजापतिः । हे राम ! रावणसे इस प्रकार कह फिर भक्तवत्सल विभीपणमुवाचेदे प्रणतं भक्तवत्सलः 11१६] | तरह्लाजीने अति विनीत विभीषणसे कहा--॥ १६॥ NI 2 ८ ~= = ~ "४700000 7 ःः ५ ३३६ अध्यात्मरामायण [ सगे २ fT yr 00 NN सुन विभीषण त्वया वत्स कृतं धमी वत्स विभीषण | तुमने यह श्रेष्ट तप धर्मसम्पादनके बिभीषण त्वया वत्स कृतं धंमोथेश्ुतसमर । वत्स वत्स इणीष्याभिमत हितम ॥१७ लिये किया है, इसल्यि बेटा ! तुम्हें जो हितकर वर तपस्ततो वरं वत्स वृणीष्वाभिमतं हितम॥१७॥ अमीष्ट हो मॉगो? ॥ १७॥ तब विमीपणने उन्हे विभीपणो$पि ते नत्या प्राञजलिर्वाक्यमब्रवीत्‌ । | नमस्कार कर उनसे हाथ जोड़कर कहा--“भगवन्‌ ! देव मे सर्वदा बुद्धि्म तिष्ठतु शाश्रती । । मेरी बुद्धि सबंदा निश्चकरूपसे धर्ममे ही रहे, उसकी ही वादा हाद क | कभी किसी अवस्थामें भी अधर्ममें रुचि न हो”॥ १ का | मा रोचयलधमे मे बुद्धिः सवत्र सर्वदा ॥१८॥ | इसपर ब्रह्माजीने अति प्रसन होकर विभीपणसे कहा a ~ 6 र जैस -ततः प्रजापतिः ग्रीतो विभीषणमथात्रनीत्‌ । “बेटा ! तुम बडे धर्मनिष्ठ हो, तुम जैसा चाहते हो , ५ वेसा ही होगा ॥ १९ || हे विभीपण ! यद्यपि तुमने वत्स तव घर्मशीलोऽसि तथेव च भविष्यसि॥१९॥ | मा नहीं है, फिर भी मैं तुम्हें अमर्यका वर और Ro ~ © अयाचितोऽपि ते दास्ये द्यमरत्यं विीषण। | देता ई । ” तदनन्तर वे कुम्मकणसे वोळे-"हे सुब्रत ! णैमथोवाच इर तुम वर मँगो” ॥ २० || तब छुम्भकर्णने ( देवताओं- हत्या पर घरय सुब्रत ॥२०॥ | कौ मेरणासे फैलायी हुई ) सरस्वती देवीकी मायासे बाण्या व्यासतऽथ तं ग्राह कुम्मकर्णः पितामहम्‌ । | मोदित होकर ब्रह्माजीसे कहा--'हे देव ! मैं छः वप्त्यामिदेव पण्यासा सिन येव मोजन ' महीने सोऊ और एक दिन भोजन करूँ” ॥ २१ | स्वप्स्यामि दव षण्मासान्दिनमेकं तु 1२१ ब्रह्माजीने उससे, देवताओंकी ओर देखते हुए कहा-- एवसस्त्विति तं प्राहजह्या दृष्टा दिवौकसः) |“ ऐसा ही हो |” उनके ऐसा कहते ही सरखत॑ र तुरन्त ही उसके मुखसे निकलकर स्वर्गलोकको चलं सर न्नर्गता ने अतीच तदबत्रान्निगेता प्रययौ दिवस्‌ ॥२२॥ गव | २२ ॥ तब दुष्चित्त कुम्मकर्णने मन-ही-मन इुम्भकर्णस्तु दुशत्मा चिन्तयामास दुःखित। | | दुःखित होकर सोचा--“अहो ! भाग्यका चक्र ते र नह देखो, जिसकी मुझे इच्छा ही नहीं है ऐसी बात में अनाभिग्रेतमेवा स्थात्कि निर्गतमहो विधि ` आतम फक नि्ेतमहो विधि।॥२३॥ मुखसे क्यं निकल गयी ?” || २३ ॥ माली वरलब्धास्त पौत्रान्‌ नि सु वाताच जञात्वा पत्रान्‌ निशाचरान्‌ | अपने नाती तीनों राक्षसोंको वर मिलनेका समाचार १ [oa री पाताळान्रिभयः प्रायात्‌ प्रहस्तादिभिरन्वित ।२४| | इनकर माली प्रहस्तादि राक्षसोंको साथ छिरे निर्भयतापूर्वक पाताळसे आया ॥ २४ || और रावणक दशग्रीवं परिष्वज्य वचनं चेदमन्नर्ीत्‌ । हृदयसे लगाकर बोळा,--“बेटा ! बड़े आनन्दकी बा दिश्याते पुत्र संदरतो वाब्छितो भे मनोरथ: ॥२५॥ दै कि आज मेरा चाहा इआ तुम्हारा मनोरथ पूण हो गया ॥ २५ | जिसके भयसे हम छंकापरीको छोड ङ्च वह इभ लंकापुरीकों छोड़ द्याच वय डं तयक्त्वा याता रसातलस्‌। | कर पाताळलोकको चले गये थे हे महावाहो ! आउ उडत नो महानाहो महद्विष्णुकृत॑ अयम्‌ ॥२६॥ | हमारा बह विष्णुका भय जाता रहा ॥ २६॥ इर ~ छंकाएरीमें, जो अब तुम्हारे भाई कुबेरवे असाभिः पूर्वयुपिता लड्केय > विकारों ई कुबेरवे ससुषिता य॑ धनदेन ते । ञ्‌ है पहले हम रहा करते थे । अब तुम आताऽऽ्ास्तामिदाना तव प्रत्यानेतुमिहाईसि २७ इसे सामनीतिसे अथवा वढपूर्वक फिर खेटा लेन चाहिये, (बन्घुत्वका विचार न करना चाहिये) क्योंदि सार २७ |] + न ना वाऽथ बलेनापि राज्ञा बनधु कुतः हहत्‌ ` राजाओंके वन्ध उनके कब हितकारी हुए हैं? उत्तरकाण्ड इत्युक्तो रावणः प्राह नाईस्येचं प्रभाषितुम्‌ ॥२८॥ वित्तेशो गुरुरस्माकमेचे श्रुत्या तमन्रवीत्‌ । प्रहस्तः प्रश्चितं वाक्यं रावणं दशकन्धरम्‌ ॥२९॥ रावण यलेन नेवं रं वक्तमहसि । ला धीता राजधर्माले नीतिशास तथैव च ॥३०॥ शूराणां नहि सौभ्रात्रं शृणु मे वदतः प्रभो । कश्यपस्य सुता देवा राक्षसाश्च महाबलाः ॥३१॥ प्रस्परमयुध्यन्त त्यक्त्वा सोद्ृदमायुधेः । नेवेदानीन्तनं राजन्‌ पैरं देवेरचुष्ठितम्‌ ॥२२॥ प्रहस्तस्य वचः श्रुत्वा दशग्रीवो दुरात्मनः | तथेति क्रोधताप्राक्षस्निकूटाचलमन्वगात्‌ ॥३३॥ दूत प्रहस्तं सम्प्रेष्य निष्कास्य घनदेश्वरम्‌ | लङ्कामाक्रम्य सचिव राक्षसैः सुखमास्थितः॥२४॥ घनदः पितृवाक्येन त्यक्त्वा लङ्कां महायशाः । गत्वा कंलासशिखर तपस्ताऽतापयच्छिवम्‌॥ ३५ तेन सख्यमलुप्राप्य तेने परिपालितः । अलकां नगरीं तत्र निर्ममे विश्वकर्मणा ॥३६॥ दिकपालत्वं चकारात्र शिवेन परिपालितः । रावणो राक्षसैः सार्धमभिपिक्तः सहाचुजेः ॥२७॥ राज्यं चकारासुराणां त्रिलोकी वाधयन्खलः । भगिनीं काळखञ्जाय ददौ बिकटरूपिणीम्‌॥२८॥ विझ्ुजिह्वाय नाम्नासी महामायी निशाचरः । ततो मयो विश्वकमो राक्षसानां दितेः सुतः ॥२९॥ सुतां मन्दोदरीं नाम्ना ददो लोकेकसुन्द्रीम्‌ । ४३ सुमालीके ऐसा कहनेपर रावणने कहा--“आपको ऐसी वात नहीं कहनी चाहिये ॥ २७-२८ || धनपति कुबेर हमारे बड़े हैं।” यह सुनकर प्रहस्तने रावणसे अति नम्रतापूर्वेक कहा--॥। २९ ॥ “हे रावण ! मैं जो कुछ कहता हूँ सावधान होकर सुनो । तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। अमी तुमने राजधर्म और नीतिशाख- का अध्ययन नहीं किया है ॥| ३० ॥ शूरवीरोंमें भ्रातृत्व नहीं हुआ करता । हे समर्थ ! इस विषयमें मैं जो कुछ निवेदन करता हूँ सुनिये । महर्षि कर्‍्यपजीकी सन्तान देवता और राक्षस बड़े शूरवीर थे ॥ ३१ ॥ इसलिये वे बन्धुत्वको तिछाञ्जलि देकर परस्पर अख-शसख्रोंसे । लड़ने छगे | हे राजन्‌ ! देवताओंके साथ हमारा वैर कुछ हालहीका नहीं है ( यह तो आरम्भसे ही चछा आता है )” ॥ ३२॥ दुरात्मा प्रहस्तके ये वचन सुनकर रावणने -कहा- तो ठीक है।' उस समय उसके नेत्र क्रोधसे छाल हो गये और वह तुरन्त ही त्रिकूट पर्वतपर पहुँचा ॥ ३३ ॥ उसने ग्रहस्तको अपना दूत बनाकर भेजा और कुबेर- को छंकापुरीसे निकाळकर उसपर अपना अधिकार किया तथा अपने राक्षस-मन्त्रियोंके सहित वहाँ सुख- पूर्वक रहने छगा ॥ ३४ ॥ महायदास्वी कुबेरने छंका- पुरीको छोड़कर पिताके कहनेसे कैलास-पर्वतपर जा- कर तपस्वाद्वारा श्रीमहादेवजीको प्रसन किया ॥ ३५॥ तथा उनसे मित्रता स्थापित कर उन्हींसे सुरक्षित हो वहाँ विइवकर्मसे अळका नामकी नगरी बनवायी || ३६ ॥ वहाँ वे भगवान्‌ शांकरकी रक्षामें रहकर दिवपालत्ब ( एक दिशाका अधिकार ) भोगने लगे । इधर, महादुष्ट रावण राक्षसोंसे अभिषिक्त हो अपने भाइ्योंके सहित तीनों छोकोंको कष्ट देता हुआ राक्षसोंका राज्य करने छगा। उस महामायावी राक्षसने अपनी विकराल्वदना बहिन | काळखञ्चके वंशमें उत्पन हुए विदुजिक्व नामक राक्षस- को विवाह दी। इसी समय, राक्षसोंके विश्वकर्मा दितिः पुत्र मयने अपनी त्रिळोकसुन्दरी कन्या मन्दोदरी रावणको दी, और फिर उसे प्रसन-चित्तसे एक अमोब्र eye 2 SRT मै (३. i ३३८ अध्यात्मरामायण [ सभ २ RIO romp ooaepaoror 0 Yi n २११” ५ २ प१०१प्०प0?”८४7०२०1य41 २०2) २1 1 २२41 नी avr ofa NP Paro fee ee wie wad मक कीच, शक्ति भी दी॥ ३७-४० ॥ तदनन्तर रावणन, स्वयं रावणाय पुनः शक्तिममोधां प्रीतमानसः ॥४०॥ ३ | लाकर दी हुई पेरोचनकी धत्रती ब्रन्नम्वाळाके साथ । कुम्भकर्णका विवाद्द किया ॥ ९१ ॥ तथा गन्वर्वरा वैरोचनस्य दौहित्रीं इत्ज्वारेति विश्रताम्‌। _ ९ , | श्र । खयन्दत्तावुदवहत्कुम्मकणाय रावणः ॥४१॥ । महात्मा शीळपकी पुत्री सरमाको, जो अति सुन्दरी सर्व गन्धर्वराजस्य सुतां शैद्धपस्प महात्मनः। | सुखक्षणसम्पन्ना और समन्न धर्मोको जाननेवाटी थी, विभीषणस्य भायीर्थे धर्मज्ञां सञचुदावहत्‌ ॥४२॥ | उसने पत्नीरूपसे विभीपणको विवाह दिया । तत्पश्रात्‌ सरमां नाम सुभगां सर्वलक्षणसंयुतास्‌ । | मन्दोदरीने मेधनाद नामक पुत्र उत्पन किया ॥ 2 २-४ शॉ ततो मन्दोदरी पुत्र मेघनादमजीजनत्‌॥४२॥ | जिसने उत्पन्न हेते ही मेधके समान अन्द किया । त्रस्त यो नादं मेघवत्यमो | इसलिये सबने वारम्वार वदी कडा कि “ट तः सवो गोपित चाह [> ।; मेवनाद हैं! ॥ ४४ ॥ तदनन्तर इममर्ण वोटा-- ७ १. | “प्रभो ! मुझे निद्रा सता रही है ।” (उसके तुख- झुस्सकणेसततः ग्राह निद्रा मा बाधत प्रभा । | पूर्वक सोनेयोग्य कोई स्थान नहीं था इसलिये ) फिर ततश्च कारयामास गुहां दाधां सुविस्तराम्‌॥४५॥। | उसने एक बड़ी लम्बी-चौड़ी गुहा वनवायी ॥४५॥ A कुम्भकर्ण i देत हआ सो गय तत्र सुष्वाप मूढात्मा कुम्भकर्णो विधूमितः। | ऽं मन्दुमति कुम्भक सुरि हेता हुआ सो गया । निद्विते इम्भके तु रावणो लोकरावणः ॥४६॥ | इम्भकरणके सो जानेपर सगल लोकोंकी सटानेबाठे ब्राह्मणान्‌ कश्या व । | रावणने ब्राह्मण, मुख्य-मुख्य ऋषि, देवता, दानव, हष आज पास दवदानवकिचराय्‌ | | किन, सर्प और मनुष्य समीको मारा तया देवताओंकी देवश्रियों मजुष्यांश्च निजम्ते समहोरयान्‌ ॥४७॥ | सम्पत्ति नष्ट कर दी ॥ ४६-४७ ॥ धनदोऽपि ततः श्रृत्वा रावणस्याक्रमं प्रुः 1 | भगवान्‌ कुबेरने जब रावणकी उच्छु खढताका दताका समाचार अधम मा इरुष्येति दूतवाकयैन्यवारयत्‌ ॥४८ | उना तो उन्होंने दूतके मुखसे यह संदेश भेजकर कि he q | ई ? बण तवः बृद्धो दशग्रीयो जगाम घनदाल्यस | | 1.7 करो” उसे रोका ॥ ४८ ॥ इसपर रावण नेनि , | क्रोधित होकर कुवेरकी पुरीपर चढ़ आया और उन्हं बाचाजत्य धनाध्यक्ष जहारात्तमपुष्पकमू ॥४९॥ | पराख कर उनका अति उत्तम पप्पक विमान छीन ततो यमं च वरुणं निजित्य समरेऽसुरः । | सवा न हि ॥ तदनन्तर वह राक्षस युद्धमें यम और (3 ७ गात्तू स ७.» { वरुण जीत कर इन्द्रका es करनेकी इच्छासे स्वगलोकमगात्तणं दवराजजिघासया | [५०॥ | वरुणक भभ त्वाठोकप इन्द्रका वव करनेको च्छ ततो5्भवन्महचुद्धमिन्द्रेण 33 | परन्त हा स्वगढाकपर चढ़ आया ॥ ५० ॥ वहा इन्द्र न डक सह दुवते | |आऔर अन्य देवताओंके साथ उसका बड़ा धमासान युद्ध ततो रावणमभ्येत्य बवन्ध त्रिदशेश्वरः ॥५१) | इआ । इस समय देवराज इन्द्रने आगे बढ़कर रावणः . 9 छवा सहसाऽऽगतय मेघनादः प्रतापवाच्‌। | को बॉ लिया ॥ ५१ ॥ जव यह समाचार महाप्रतापी ` + ५ ~ | मेधनादने सुना तो उसने अकस्मात्‌ आकर देवताओंसे कत्वा घोर महश्चद्धं जित्वा त्रिदश पुङ्गवान्‌ ॥५२।॥ “पी स्यात आकर दवताअ न्‌ ।।५२। घोर युद्ध किया और उन्हें जीतकर रको पकड़कर a त्वा $ ~ ~ wy र शीर बच्याऽसा मंघनादो महाबल! । | बाँध छिया | फिर महाबली मेधनादने अपने पिताको मांचयित्वा तु पितरं गृहीलेन्द्रं ययौ पुरम्‌ ॥५३॥ | देवा और इन्द्रको अपने साथ छेकर लंकापुरीमें रक्षा तु मोचयामास देवेन्द्रं मेधनादतः । लौट आया | ५२-५३ | फिर मरहाजीने जाकर इन्द 0 "| को मेघनादसे छुडाया और उसे बहतसे वर देकर चे दला परान्वहससे बका स्वभवनं ययौ ॥५४ | अपने जोकको चळे गये ॥ ५४ || ˆ समग्र २] . ३३९ च्च्ख्च्च्च््ल््य्््च्य्स्स्च्ट्य्स््स्स्स्स्य्््य््स्स््स््ल्य्स्य्य्य्््य्ल्य्स्््स्ट््ड्डंडििि चिसिक्‍ि-.->-०-.2क्‍ल०>क्‍न2वतनहतह6लईल..................... रावणो विजयी लोकान्सर्वान्‌ जित्वा करमेण तु। से + न | = छह), केलास तोलयामास बाहुमिः परिघोपमेः ॥५५॥ तत्र नन्दीशवरेणेवे शप्तोऽयं राक्षसेश्वरः । वानरेमोनुपेश्रेव नाश गच्छेति कोपिना ॥५६॥ ०३५५ ह मय वाक्यं ययो हैहयपत्तनम्‌ । तेन बद्धो दशग्रीवः पुलस्ेन विमोचित ॥५७॥ ततोडतिवळमासाद्य जिषांसु्हरिपु्धवम्‌ । धृतस्तेनेव कक्षेण वालिना दशकन्धर! ॥५८॥ आमयित्वा तु चतुरः समुद्रान्‌ रावण हरि! । विसर्जयामास ततस्तेन सख्यं चकार स! ॥५९॥ रावणः परमप्रीत एवं ठोकान्महाबठः । चकार स्ववशे राम बुझे स्वयमेव तान्‌ ॥६०॥ एवम्प्रभावो राजेन्द्र दशग्रीवः सहेन्द्रजित्‌ । त्वया विनिहतः सहुये रावणो झोकरावणः॥६१॥ मेघनादश्च निहतो ठक्ष्मणेन महात्मना । कुम्भकर्णश्च निहतस्त्वया पर्वतसन्निमः ॥६२॥ भवान्नारायणः साक्षाजगतामादिकृद्रिभः | त्वत्स्वरूपमिदं सवं जगत्खावरजद्भमम्‌ 11६३) त्वक्नषाभिकमलोत्पत्नो रह्मा लोकपितामहः । अग्निस्ते मुखतो जातो वाचा सह रघूत्तम ॥६४॥ बाहुभ्यां लोकपालौघाश्र्षुर्या चन्द्रमार्करो । दिशश्च विदिशशेव कर्णाभ्यां ते सश्चत्थिताः॥६५॥ घ्राणारप्राणः सञ्चुरननशचाश्चिनौ देवसत्तमौ । जङ्काजानूरुजघनाद्भवलोकादयोऽभवन्‌ ॥६६॥ कुक्षिदेशात्समुत्पत्नाथत्वारः सागरा हरे। | स्तनाभ्यामिन्द्रवरुणो वाठखिल्याश्व रेवसः ॥६७॥ मेदाथमो गुदान्मत्ुरमन्यो रुद्खिलोचनः । 5 ४१४५७७०३८०४०४१४५५५५५६५३५५/९५५५०५/३६.०५३५५५५५७०५:५३४५:५८७५:०५०५०४०००/० ० जि न SS विजयी रावणने क्रमसे सब छोकोंको जीतकर अपनी परिघके समान बड़ी-बड़ी झुजाओंसे केलास पर्वतको उठा लिया ॥५५॥ वहाँ नन्दीश्वरने क्रोधिंत होकर राक्षसराज रावणको शाप दिया कि 'त्र. मनुष्य और वानरोंके हाथसे मारा जायगा' ॥५६॥ किन्तु रावणने इस शापको कुछ भी न गिना और तुरन्त ही हैहयराज ( सहस्नाजुन ) की राजधानीको चळ दिया । वहाँ सहखालुनने रावणको बाँध लिया |. तब उसे पुछसत्यजीने जाकर छुड़ाया ॥५७॥फिर्‌ वह अत्यन्त । बळी वानरराज बालीको मारनेके लिये उद्यत हुआ, किन्तु उलटे उन्दने रावणको अपनी काँखमें दबा लिया ॥५८॥ और फिर चारों समुद्रोपर घुमाकर उसे छोड़ दिया । तब राबणने उनसे मित्रता कर छी ॥५९॥ हे राम ! इस प्रकार महाबली रावण सम्पूर्ण छोकोंको अपने अधीन कर उन्हें प्रसन्नतापूर्वक खयं ही भोगने ढगा ॥६०॥ है हे राजेन्द्र ये दशानन और इन्द्रजित्‌ ऐसे प्रभावशाली थे | ( उनमेंसे ) छोकोंको रुळानेवाळे रावणको आपने मारा और मेधनादका वध महात्मा लक्ष्मणजीने किया तथा पर्वतके समान दौर्धकाय कुम्भकर्णका भी आपहीने संहार किया ॥ ६१-६२ ॥ आप सब छोकोंके रचनेबाले साक्षात्‌ सर्वव्यापक नारायणदेव हैं | यह सारा चराचर जगत्‌ आपही- का स्वरूप है ॥६२॥ लोकपितामह ब्रह्माजी आपकी नाभिसे प्रकट हुए कमळे उत्पन्न इए हैं तथा हे रघुश्रेष्ठ ! बाणीके सहित अश्निदेवने आपके मुखसे जन्म छिया है ॥६४॥ आपकी युजाओंसे छोकपालोंके समूह, नेत्रोसे चन्द्रमा और सूर्य तथा कानोसे दिशा- विदिशाएँ उत्पन्न हुई हैं ॥६५॥ इसी प्रकार आपकी घराणेन्द्रियसे प्राण और देवताओमें श्रेष्ठ अश्विनीकुमार प्रकट इए हैं तथा जद्घा, जानु; उर और जघनादि अङ्गोसे मुबर्डोक. आदि हुए हैं ॥६६॥ हे हरे | आपकी कुक्षि- से चार समुद्र, स्तनोसे इन्द्र और बरुण तथा बौर्यसे वालखिल्यादि मुनीश्‍वर हुए हैं ॥६७॥ आपको उपस्थेन्द्रिसि यम, शुदासे मृत्यु, क्रोधसे त्रिनयन इछ अतभ विनर अध्यात्मरामायण [ सग र १००५ Tres uv wave ee क्क्व अखिस्यः पचता जाताः केशम्या मसात ॥६८॥ क | महादेवजी, अभ्धियोसे पर्वतमगूह, सेटि मेघ, रामेसि ओपलियों तथा नसग गये आदि उत्पन्न हुए ओपध्यस्तव रोमेम्यो नसेभ्यश्च खरादयः। । आप गायादकिे बुक आए दी विश्व वं विश्वरूप! पुरुषो मायाशक्तिसमन्त्ितः ॥६९॥ | परम परुष ६॥ ६८०% प्रगानिके गुणेमि वत हेनि- डक ककी _ ~ पर आप ही नानारपलो दिखायी देन लमे ह नानारूप इवामासि गुणव्यतिकरे सति। | क आश्रमम देवगश योम अमृतपान सामाश्रित्यव विघुधा! पतन्त्य सूतसभ्वर्‌ ॥७०] | करते हैं ॥७०॥ यह सम्पूण रथावरन्बङ्गय जगती ल | आपहीने रचा है शर समल चराचर प्राणी आप- त्वया सृष्टमिदे सर्वे विश्वं खावरजजमम । । हाके आश्रय आवित रहने हैं शीट रपुनाथरजा | त्वामाशित्यव जीवन्ति सप स्थावरजङ्गमाः ॥७१॥ | जिस प्रकार दधर्भ निहा हुआ थी गनर न्याप्त त्वद्धक्तमखिल वस्तु व्यवहारेऽपि राघव | | पं आप र जा रि , ee कषीरमध्यगतं सर्पिर्यथा व्याप्याखिलं पयः ॥७२॥ ¦ भी सव आपटीके प्रवादि प्रकादित हेमे £ दिन । आप उनसे प्रकाशित नाई होने । आप संगत, £ | और एक हैं, जिस परुषका शानि प्राह हा जाल सवग नित्यसेक त्वां ज्ञानचक्षविलाकयंत्‌ ॥७३॥ | हे चही आपको देख सकता है ॥७३॥ जिस! जन नाज्ञानचश्षुसतां पशवेदन्धर्य्‌ भास्करं यथा। | “को सये नई दिखायी दे मना उसो प्रकार त्वद्भासा भासतेऽकादि न त्वं तेनावभाससे । योरि [षि स्ति खडे प ज। ज्ञाननन्रस र चह आपदा ददान नही कार योगिनस्त्वां विचिन्वन्ति खदेहे परमेश्वरम्‌॥७४॥ | सकता । योगिजन अनासम-पदा्योका वाथ रसेन अतन्निरसनश्षसेवेदशीपरह निश्चम्‌ | | उपनिषपद्वान्योद्ारा अहनिद् आप परमाध्याक्ती अपने इारीरमें ही खोजते हैं । यदि उन योगियोपर आपके; चरणोंकी भक्तिका छेदमात्र भी प्रभाव होता है विचिन्वन्तो हि पश्यन्ति चिन्मात्रं त्वां न चान्यथा | तभी वे स्योजतेन्योजते अन्त. सिन्मात्रसरप आपको देख पाते हैं, और किसी प्रकार नही | मेने आप सर्वके सामने कुछ प्रजाप ( ब्याद ) धषन्तुमहासि देवेश तवाचुग्रहभायहस्‌ 11७६) | किया हे, सो आप क्षमा करे, क्योकि हे देवेश्वर ! दिगदेशकालपरिहीनमनन्यमेई मैं आपकी कृपाचा पात्र हैं ॥७४---७६॥ जो दिदा, हे हु देश और कासे रहित तथा अनन्य, एक, चिन्मात्र,- चल्मात्रमक्षरमज चलनादिहीनसू । | अविनाशी, अजन्मा और चलनादि क्रियासे रहित £ संबज्ञमीश्वरमनन्तगुणं यदतः । उन सवज्ञ, सर्वरवर, अनन्तमुणसम्पन्न, मायाहीन आर अपने भक्तजनांसे सदा अभिन्न रहनेत्राठे मायं भजे रघुपति भजतामाभन्नम्‌ ॥७७॥ | रघुनायजीको मे भजता हुँ ॥७७॥ ~ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥२॥ RT - त्वत्पादभक्तिलेशेन गृहीता यदि योगिनः ॥७५॥ मया म्रझपितं किञ्चित्सर्यज्ञस्य तवाग्रतः । (कात य कटर १९ ० पकी कोक १.० २७०0-66 प खक कर न ०० कर कर ७७ ७७ ७०२ २७० ७७०५० ३०२० ~ + दा कीर १ री ५७० ०० नी प कल १५४१५ १८ ४४ ४८९१ २१७० ७८८९१८८ ९५ ७४ १० ७८० A ६.४ ५० ४७०९७ करी ७४४७१७१ ६८ ३० ७८ १७८ ee ९० ७७० ९१९० ७१९० LS ७७० ००७० ७० (७० PU Ue ७९ क 2९९ ५० ९० ९० ४८४८१०७०७० A तृतीय सर्ग ` वाली और सुग्रीचका पूचचरित्र तथा रावण-सनत्कुमार-संचाद । श्रीराम उवाच श्रीरामचन्द्र्ी बोळे-दे सुने | मैं वाळी और वाहिसुग्रीवयोर्जन्म श्रोतुमिच्छामि तत्वतः । सुग्रीवके जन्मका यथावत्‌ वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ । नील a मैंने सुना है कि ये इन्द्र और सूर्य ही वानरखूपसे वीन्द्री वानराकारो जज्ञात इति नः शुतस्‌ ॥ १॥ | उतपन्न हुए ये ॥१॥ अगस्त्य उवाच अगस्त्यजी बोळे-हे राम ! मेरुपवेतके मणिके S हाजा रोः सर्णमयसाद्रमध्यशङ्गे मणिप्रमे। | पण प्रकाशमान सुवर्णमय मभ्यशिखरपर अल्लाजी- की सो योजन विस्तारवाली सभा है ॥२॥ उसमें ho VS ~ गखिन्समाङले विस्तीणों ब्रह्मणः शतयोजना॥।२॥| चतुर्मुख ब्रह्माजी किसी समय ध्यानस्थ हुए बैठे थे, उस उस्यां चतुर्मुख! साक्षात्कदाचिद्योगमाख्थित!। | समय उनके नेत्रोंसे बहुत-से दिव्य आनन्दाश्रु गिरे॥३॥ त्राभ्यां पतितं दिव्यमानन्द्सलिल बहु ॥ ३ ॥ क अपने हमें लेकर ब्रह्माजीने कुछ चिन्तन कर _ ~ प्रथिवीपर डाळ दिया | पृथिवीपर गिरते ही उनसे एक बहुत उद्गृहीत्र ध्यात दुगृहीत्या करे त्र्या तवा का्द त्यजत्‌ | बड़ा वानर उत्पन्न हुआ ॥४॥ उससे ब्रह्माजीने कहा भूमी पतितमात्रेण तसाजातो महाकपिः ॥ ४॥ ~ 1 0 “वत्स ! तू कुछ समय यहाँ मेरे पास इस सर्वशोभा- तमाह ठ्ुहिणो वत्स किश्वित्कालं बसात्र मे । सम्पन्न स्थानमें रह, इससे तेरा कल्याण होगा”॥५॥ पमीपे सर्वशोभाढच ततः श्रेयो भविष्यति।। ५ ।। | त्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर बह वानरश्रेष्ठ वहीं त्यक्तो न्यवसत्तत्र ब्रह्मणा वानरोत्तमः । रहने लगा | इस प्रकार बहुत समय बीत जानेपर एक A le दिन उस परमबुद्धिमान्‌ ऋक्षराजने# फल-मूलादिके एबं बहुतिथे काले गते ऋक्षाधिपः सुधीः ॥ ६॥ | ० घूमते-घूमते एक दिव्य जल्पूर्ण और रक्तजटित > फदाचित्प © ~ . से तसर्यटन्नद्रा फलमूलार्थयुद्यतः । शिळाओंसे सुशोभित बावड़ी देखी ॥६-७॥ जब वह अपश्यद्दिव्यसलिलां वापी मणिशिलान्वितास्‌।।७। वहाँ पानी पीनेके लिये गया तो उसने जल्में एक छाया- पानीयं पातुमागच्छततत्र छायामयं कपिम्‌ । मय वानर देखा । उसे अपना प्रतिद्वन्द्वी वानर समझकर ba w गे दृष्टा प्रतिकं मत्वा निपपात जलान्तरे ॥ ८॥ | वह जग्मे कूद पडा ॥८॥ किन्तु वहों कोई भौ बानर भी ; न मिलनेपर वह तुरन्त ही उछलकर बाहर निकल तत्राइट्टा हरि शीघ्र पुनरुत्पछुत्य वानर।। | आया और अपनेको एक अति झुन्दरी रमणीके अपब्यस्सुन्दरी रामामात्मानं विस्मयं गतः ॥ ९ ॥ | रूपमे देखकर बड़ा ही चकित हुआ ॥९॥ . ततः सुरेशो देवेशं पूजयित्वा चतु्भुखम्‌ । उस समय देवराज इन्द्र मध्याह कालमे ब्रह्माजीकी _ ~ पूजा करके लोट रहे थे । उस परमसुन्दरी ख्ीको गच्छन्मथ्याहृसमये दृष्टया नारीं मनोरमास्‌॥१०॥। | टक्कर थे कामदेवके वाणोंसे बिंध गये और उनका कन्दर्पणरविद्वाइस्त्यक्तवान्यीयमुत्तमम्‌ | उत्तम वीर्य स्खलित हो गया । वह वीर्य उस ख्रौकों तामप्राप्यैव तद्गीजं वालदेशेब्पतद्भुवि ॥११॥ | श न दोकर उसके बा्लेक्रो छूता इथा परथिवीपर गिर पडा ॥१०-११॥ उससे इन्द्रके समान पराक्रमी चाळी समभवत्तत्र शक्रतुल्यपराक्रम। | वाळीका जन्म हुआ । देवराज इन्द्र उसे एक सुबर्ण- तस दसा सुरेशानः स्वर्गमालां दिव गतः ॥१२॥ | मयी माढा देकर खगडोकको चळे गये ॥१२९॥ सुरेशान! स्वर्णमालां दिवं गतः ॥१२॥ | मयी माळा देकर खगलोकको चळे गये ॥१२॥ & यह उस वानरका मास था । , , eee Teen eee PON महिन्याची ३४२ अध्यात्मरामायण [ सर्ग क्यान केशशकक फिटे ५७ ०४६१ ५८५ ४१०७ उसी समय वहाँ सूर्यदेव भी आग्रे । उस सुन्दरीको - देखकर वे कामवश द गये तथा उसकी ग्रीचापर अपना ठा कासवश्ो भूला ग्ीादेसेऽसृजन्महत्‌ ॥ १ रे॥ उम्र वीर्य छोड़ा। उससे उसी समय एक बहुत बड़े बीजं तस्यास्ततः सद्यो महाकायोऽभवद्धरिः। | शरीरवाला वानर उत्पन्न हुआ | नूर्यदेव उसको कै को हवमानम देकार चळे तस्य दुर्वा हचूमस्तं सहायार्थ गतो रविः ॥१४॥ | = ३. रि उसका हजुमानूजी देकर चरे | ये ॥१२-१४॥ * पुत्रद्वयं समादाय गत्वा सा निद्रिता चित्‌ । ! उन दोनों पुत्रोको लेकर बह सी कही जाकर ्रभातेऽपञ्यदात्मानं पूर्वबद्वानराकृतिम्‌ ॥१५॥ | सो गयी । न स (उठनेपर) उसने पढे oN भ्यां सहितः , | समान अपनक ४ वानरख्प हा दरा फमूठादिमिः पा पुत्राभ्यां सहितः कपिः । | ॥१५॥ किर बह पर बुद्धिमान क्षराज पलादि नता चतुश्र ऋ्षराजः स्थितः सुधीः 1१६), ३३३ अपने पुत्रके सहित त्रह्माजीकी सभामें आया ' ततोऽग्रवीत्स माश्चास्य बहुश! कपिफुक्षरम्‌ |. और उन्हे नमस्कार कर उनके आगे लगा हो गया तैकं देनतादूतमाहयामरसञ्चिमम्‌ ॥१७॥ ' ॥१६॥ तव तर्जने न चानर-वौरको बहुत ठु दू दिष्टो ग्रहीर : समझाया और एक देवतुल्य देखरतकों बुछावर | पश दा हहा वानरोत्तम ' ` उससे कहा--॥१७॥ “है वृत ! व मेरी आशाते इग किष्किन्या दिव्यनगरी वाता विश्वकमंणा।१८। बानरश्ेष्को हेर विश्वकर्मा बनायी हुई विन्या सर्वेसोभाग्यवठितां देवैरपि इुरासदाम्‌। नामकी दिव्य पुरीको जा ॥ १८॥ बह सम्पूर्ण र्य तस्यां सिंहासने बीरं राजानमभिपेचय ॥१९॥ : सरपन्न है और देवताओंके लिये भी दुर्जय है । उक >. 6 । सिंहासनपर इस बीरका राज्याभिषेक करदे॥ १०] सपतदवीपगता ये ये वानरा? सन्ति दुर्जयाः | सातो पमे जो-जों बड़े दुर्जय वानरः ह सेते ऋक्राजस्य भविष्यन्ति वशेतुगा ॥२०॥ | सत्र ऋ्राजके अधीन रहेंगे ॥२०॥ जिन समय यदा नारायण! साक्षाद्रामो भूत्वा सनातनः साक्षात्‌ सनातन पुरुष नारायणदेद पृथिनीचा भार सूभारासुरनाशाय सम्भविष्यति भूतले 1२ 4 ॥ | द ल्यि मूर्छ क्म रामङ्पसे अवतीर्ण हट च ' उस समय समस्त वानरगण उनकी सदामतामे तद्‌ a ग्‌ न्तु $ j w ` 1 सव सहायार्थ तस्य गच्छन्तु वानराः । ' लिये जायें |” ब्रह्माजीके इस प्रकार कदनेपर उस इत्वुक्ती र्मणा दूतो देवानां स महामतिः ॥२२॥ ' महाबुद्विमान्‌ देवदूतने जिस प्रचार उनकी आज्ञा इ यथाऽऽशपस्तथा चक्रे जद्मणा तं हरीश्वरम्‌ । : थी उसी ओर परकार उस घानरराजको सत्र व्यक्षत्या देवहू ग्ट च्य ~ दौ भै फर ब्र जाके जाकर उन्हें सव दसतो गतता ब्रह्मे तन्न्यवेदयत्‌ ॥२३॥| "८.९ अ पिर ब्रह्मज पास जाकर उन्हें सव समाचार सुना दिया । तत्रसे वह किप्किन्धापुरी परादि वानराणां सा किकित्धाध्यूल्तुपाअय॥२४। वानरो राजधानी हो गयी ॥२१-२४॥ र थित | a सवेश्वरस्त्वसेवासीरिदानी ब्रह्मणाऽथिंतः | हे राम! आप सके सामी हैं | म्राजीकी प्राथनासे अब माया-मानव-रूप धारणकर आपने पृथिवीका सव भार उतार दिया । जो सब भूतोंके भीतर विराजमान नित्यमुक्त और चेतनखरूप हे उन अखण्ड और अनन्तरूप आपके ठिये यह ऐसा कौन बड़ा पराक्रम है? तथापि सम्पूर्ण छोकोंके भाचुरप्यागतस्तत्र तदानीमेव भामिनीम्‌ । Oe (६ “~ भूसभारो हुतः कृत्खस्त्वया लालावृदोहिना | 0 (क ~ सवेभूतान्तरस्थस्य नित्यश्चक्ताचिदात्मनः | ।२५।। यखण्डानन्तरूपस्य कियानेप पराक्रमः | सगे ३ ] उत्तरकाण्ड ॒ ३४३ eT ertrereneio orto rere armgpr rrr api rN www Fes अध्य ७०६. मन तथाऽपि वर्ण्यते सद्धिलीलामाजुंवरूपिण! ॥२६॥ | पापोंका नाश करनेके लिये और उन्हें सुख देनेवे यशस्ते सर्वलोकानां पापहत्ये सुखाय च । लिये साधुजन आप माया-मानुष-रूप भगवानका सुया र * कीपर टिसुम्रीवयोर् वर्णन करते ही हैं । जो मनुष्य वाळी और सुग्रीचवे य इद कोतयन्मत्या वाहिसुग्रीवयोमहत्‌ ॥२७॥। इस महान्‌ चरित्रका कीर्तन करेगा वह आपके आश्रित जन्म त्वदाश्रयतवात्स मुच्यते सर्वपातंकेः ॥२८॥। | होनेके कारण सब पापोसे छूट जायगा ॥२५--२८! :- गन्यां सम्प्रवक्ष्यामि कथां राम त्वदाश्रयाम्‌। हे राम ! अब आपसे सम्बन्ध रखनेवाली एक वह सीता हुता यदर्थे सा रावणेन दुरात्मना ॥२९॥ | कथा और झुनाता हूँ जिस कारण कि दुरात्म _ RR रावणने सीताजीको हरा था ॥ २९॥ पहले एक बार 1 कृतयुग च उरा के बे श “जापान विशय । रावणने एकान्तमें बैठे हुए ब्रह्माजीके पुत्र श्रीसनत सनत्कुमारमेकान्ते समासांन दशाननः । कुमारजीसे अति नम्रतापूर्वक प्रणाम करके कहा- विनयावनतो भूत्वा ध्यमिवाधेदमब्रवीतू ॥३०॥ ° न आश्रय पाकर ग क यु ने स्वस्पिन्मवरो लोके देवानां , को जीतते हैं इस संसारमें सब देवताओंमें श्रेः का "हिन्वा ठाक देवाना बलवत्तर । और अधिक वळ्वान्‌ वह कोन देव है ? ॥११॥ देवाश्च य सभाश्रित्य युद्धे शत्रु अयन्ति हि ॥३ १॥ | ब्राह्मणगण किसका पूजन करते हैं और योगीगण * 25... (७ PN [aS ha , ¢ भगव | व कार क॑ यजन्ति द्विजा नित्यं क॑ ध्यायन्ति च योगिनः। | किसका ध्यान भरते हैं ¦ भगवन्‌ | आप सब प्र _ शिका ` | के प्रश्नोंका उत्तर जाननेवालोंमे श्रेष्ठ हैं, अतः मेरे इस एतन्मे शस भगवन्‌ प्रश्न अश्नत्रिदोचर ॥२२॥ | दनका उत्तर दीजिये? ॥१२॥ भगवान्‌ सनत्कुमारने ज्ञात्वा तस्य हृदिख यत्तदशेपेण योगद । ` योगदृष्टिते राबणके अन्तःकरणकी सब बात जानकर दृशाननशुवाचेदं णु वक्ष्यामि पुत्रक ॥३३॥ उससे कहा--“वत्स मैं तुम्हारे प्रश्‍नका उत्तर देता हूँ ९. > र शतम i द वि । सुनो ॥३३॥ जो सर्वदा सम्पूर्ण संसारका पोषण सुरासरै्ुतों नित्य हरिरनारायणोऽन्ययः ॥३४॥| जो देवता और दैत्योंसे सदा वन्दित अविनाशी नारायण जिपजाजञातो बरा विश्वसजां पतिः । श्रीहरि कहलाते हैं ॥ २४॥ सृष्टि-कर्ताओंके स्वामी यन्नामपद्कजाजञाता वला वचलुजा पातः रीब्रझाजी भी जिनके नाभिकमळसे उत्पन्न हुए हैं, |] क . बर ७, सृष्ट येनेव सकते जगत्स्थावरजङ्कमम्‌ !!३५।|| तथा जिन्होंने यह स्थावर-जज्ञम-रूप सारा संसार भी है हि | रचा है उन्हींके आश्रयसे देवगण संग्राममें शत्रुओंको तं समाश्रित्य तरिधा जयन्ति समरे रिपून्‌ । जीतते हैं तथा योगिजन मौ ध्यानयोगके द्वारा उन्हींका योगिनो ध्यानयोगेन तमेंवानुजपन्ति हि ॥३६॥ | जप करते हैं? ॥३५-३६॥ ' महृपे्षेचनं शृत्वा प्रत्युवाच दशाननः । महर्षि सनल्कुमारके ये बचन सुनकर रावणने भगिनि फिर पूछा-“हे युनिश्रेष्ठ ! उन विष्णुमगवानद्वारा मारे दैत्यदानवरक्षांसि विष्णुना निहतानि च ॥३७॥ हर दल, दानत और राक्षसगण मरकर किस गतिको का वा गतिं प्रपद्यन्ते प्रेत्य ते युनिपुङ्गव । ग्राप्त होते हैं £” तब सुनिबर सनत्कुमारने राक्षसराज ~ , टू -[३७-३८॥ “अन्य साधारण देवताओं- त्च रावणं राक्षसाधिपम्‌ ॥३८॥ | रावणसे कहा-॥३७ पच झनिश्रष्ा रावण राक्षसा यय के हाथसे मरकर तो वे अति उत्तम स्वर्गळोकको ही जाते दैवतैनिहृता नित्यं गत्या स्वर्गमलुत्तमम्‌। | है और अपना भोग क्षीण होनेपर वहाँसे गिरकर फिर भोगध्षये पुनर्तसमादभषटा भूमी मवन्ति ते ॥२९॥ | भूमकर उसन होते हैं॥३९॥ फिर पूव-जन्मोमि किये इए SOS IO ee मु ३४४ अध्यात्मरामायण ____ अपने पाप-पुण्योंके अनुसार जन्मते-मरते रहते किन्तु जो भगवान्‌ विष्णुके हाथसे मारे जाते ह विष्णुना ये हतास्ते तु ग्राप्चुबन्ति हरेगेतिम्‌॥४०॥ | तो बिष्णु-पद ही प्राप्त कर लेते हैं” ॥४०॥ | श्रीसनतुमारजीके सुखसे ये सब बातें सुनकर | रावण मन-ही-मन अति प्रसन्न हुआ और वह योत्स्येऽहं हरिणा सार्धमिति चिन्तापरोऽभवत्‌ ४१ | सोचने ढगा कि मैं हरिके साथ अवस्य युद्ध सनःस्थित॑ परिज्ञाय रावणस्य महाशनिः । | कखँगा ॥४१॥ सुनिवरने रावणके चित्तकी वात जानकर कहा--“वरस ! इसमें सन्देह नहों तेरी इच्छा अवश्य सफळ होगी ॥ ४२॥ हे दशानन ! कञ्चित्कालं प्रतीक्षस्व सुखी भव दशानन । अभी चैनसे रह, कुछ काळ और प्रतीक्षा कर ।” एवशुक्तवा महाबाहो मुनि: पुनरुवाच तम्‌ ॥४३।।| हे महावाहो रघुनाथजी ! रावणसे ऐसा कह मुनि उससे फिर बोळे--।४३॥ “रावण ! वे रूप-रहित तस्य स्वरूपं वक्ष्यामि ह्यरुपस्यापि मायिनः। (हे, तथापि मैं तुझे उन मायावीके ( मायासे धारण था > किये बतछाता हूँ । वे नद और नदी स्थावरेषु च स्वे नदेषु च नदीषु च॥४४॥ जादि दल सा व्याप्त ह ॥ ४४ ॥ ओंकार, सत्य, सावित्री, प्रथिवी तथा सम्पूर्ण जगतूके आधार शेषनाग भी वे ही हे ॥ ४५ ॥ सम्पूर्ण देवगण, समुद्र, काळ, सूर्य, चन्द्रमा, सूर्योदय, दिन, रात्रि, सर्वे देवाः समुद्राथ्न काः द्यश्च चन्द्रमा! । यम, वायु, अभि, इन्द्र, मृत्यु, मेघ, वसुगण, अह्या बर्योदयो दिवारात्री यमथैव तथाउनिलः ॥४६॥ ¦ और रह आदि तथा और गौ जितने देव या पन | हैं वे सब भी उन्हींके रूप हैं ॥ ४६-४७॥ सम्पूर्ण अयिरिन्द्स्तथा मृत्यु! पर्जन्यो वसवस्तथा । | विश्वको रचनेवाळे वे सनातन विष्णुभगवान्‌ निर्विकार होकर भी ( अपनी मायाके आश्रयसे ) नाना प्रकार- की लोलाएँ करते हैं । वे ( विद्युत्‌ होकर ) चमकते हैं, ( अभि होकर ) भ्रज्वल्ति होते हैं, ( बि्णु- खूपसे ) रक्षा करते हैं और ( रुद्ररूपसे ) सबको तन सा क भक्षण कर जाते हैं ॥४८ यह स्थावर-जंगम सम्पूर्ण तन सवामद व्याप्त त्रेलोक्य सचराचरस्‌। | त्रिलोकी एकमात्र उन्हीसे व्यास हे । वे नीळकमलदलके नीछोत्पलद्लश्यामो विद्युर्णाम्बराइत! ॥४९॥ | समाग श्यामवर्ण और विजलीको-सी आमावाला पीताम्बर धारण किये हुए हैं ॥४९॥ तथा अपने झदजास्वूनदप्रस्या थियं चामाङ्कसंस्थिताञ्‌ । | वाम भागमें बैठी हुई झुद्ध खुवर्णकी-सी कान्तिवाळी सदानपायिनीं देवीं प्यत्नालिड्ग्य तिष्ठति ॥५०।| कमी नष्ट न होनेवाळी भगवती ढक्ष्मीजीकी ओर निहारते हुए उन्हें आलिङ्गन किये विराजमान हैं ॥५०॥ रड न. शक्यते केश्रिदेवदानवपन्नगे!। | वे किसी भी देव, दानव या नागसे देखे नहीं जा ४७ ४५०४१४१ 2 ४१ ुकुडकन्यकलयळकरनककिन ०९, ४९५८४४ ९५४४४४ ४४ ७0४0 उक्र edd [ष we छि म्रियन्ते = ~ हैं, पूवीजितेः पुण्यपापेग्रियन्ते चो्ूवन्ति च । : श्रुत्वा युनिश्चुखात्सर्वे रावणो हृष्टमानसः । उवाच वत्स तेऽभीष्टं भविष्यति न संशयः।४२।॥ ओड्वारभैव सत्यं च सावित्री पृथिवी च सः। | समस्तजगदाधारः शेषरूपघरो हि सः ॥४५॥ | ब्रह्मा रुद्रादयश्चैव ये चान्ये देवदानवाः ॥४७॥ | ~ किक | विद्योतते ज्वठत्येंष पाति चात्तीति विश्वकृत्‌। क्रीडा करोत्यन्ययात्मा सोऽयं विष्णु) सनातनः४८ | सगे रै ] उत्तरकाण्डः ३४५ यस्य . प्रसादं कुरुते स चने द्रष्ट्महति ॥५१॥ | सकते, जिसपर उनकी प्रसन्नता होती है वही उनका दशन्‌ कर सकता है ॥५१॥ यज्ञ, तप, दान, अध्ययन | अथवा और किसी भी उपायसे भगवान्‌ नहीं देखे [कयते - भगवान्द्रष्डसुपायेरितरेरपि ॥५९॥ | जा सकते ॥५२॥ जो उनके भक्त हैं, जिनके प्राण > सत वितैरपतकरमपेः और मन उन्हीमें छगे रहते हैं तथा वेदान्त-विचारसे कित स्तना रता चत दतकलय ! जिनकी . दृष्टि मल्हीन हो गयी है उन निष्पाप षयते भगवान्विष्णुबेंदान्तामलदृष्टिमिः ॥५३॥ | महात्मांओको ही भगवान्‌ विष्णुके दर्शन हो सकते थवा द्रष्टुमिच्छा ते शृणु स्व परमेश्वरम्‌ । हैं ॥५३॥ अब यदि मुझे भी ( बिना किसी उपायके ताये स देवेशो भरि ही ) उन परमेश्वरे दशनोंकी इच्छा है तो.छुन-- रतायुगे स देवेशो भविता नृपविग्रह। ॥५४॥ | दे देवाधिदेव हरि, त्रेतायुगे देव और मुष्योंके A $ कल्याणके लिये, राजवेषसे, इक्ष्वाङुके बंशमें दशरथजीके दिता त्यानामिक्ष्वाङूणां कुले हरिः । ! ? व थे देवम ५ साहा इस हार पुत्र महाबीर और पराक्रमी भगवान्‌ राम होकर एसो दादारथिभूत्वा महासखपराक्रमाः ॥५५॥। | अवतीर्णं होंगे ॥ ५४-५५॥ वे परम. धार्मिक पेतुर्नियोगात्स आप्रा भार्यया दण्डके वने । रघनाथजी पिताकी आज्ञासे अपने भाई ( छक्ष्मण ) और अपनी स्री जगजननी मायाके सहित दण्डक वनमें वेचरिष्यति घमात्मा जगन्मात्रा खमायया ॥५६ विचरंगे ॥५६॥ हे रावण ! इस प्रकार यह सारां वते समाख्यातं मया रावण विस्तरात्‌ । | तच गने उन निलारते इना दिया । अब त. ठव्मी- जी सहित भगवान्‌ रामका सदा भक्तिपूवक भजन पस्त मक्तिमावेन सदा रामं श्रिया युतम्‌ ॥५७॥ | कर? ॥५७॥ अगस्त्य उवाच । अगस्त्यजी बोळे-हे राम ! यह सुनकर राक्षस- श्रुत्वाध्सुराध्यक्षो ध्यात्वा किश्चिद्विचार्य च । | राज रावणने कुछ देर सोच-विचार करनेके अनन्तर अयां सह विरोघेप्सुर्शसुदे राणो महान्‌ ॥५८॥ आपके साथ विरोध करना निश्चित किया और ऐसा सतो वसित: ) निश्चय कर वह मन-ही-मन बड़ा प्रसन्न हुआ 11५८] इद्धार्थी सवतो लोकान्‌ पथटन्‌ समवाखितः , बह युद्धकी इच्छासे सम्पूर्ण छोकोंमें घूमने गा । हे. न च यज्ञतपोसिवा न दानाध्ययनादिभिः |` ` एतदर्थ महाराज रावणोऽतीव बुद्धिमान्‌ । | महाराज ! आपके हायसे मारे जानेकी इच्छासे ही हृतवान्‌ जानकी देवी त्ययाऽऽत्मचथकाङ्कया ।५९)। | महाुद्धिमान रावणने देवी जानकौजीको चुरा इमा कथा यः शणुयात्परुद्वा लिया था ॥५९॥ जो पुरुष इस कथाको सुने श्रावयेद्वा श्रवणाथिनां सदा । । या, पढ़ेंगा अथवा सुननेकी इच्छावाछोंको -सदा' आयुष्यमारोग्यमनन्तसोख्यं . | | सुनावेगा वह दी्े-आयु, आरोग्य, अनन्त सुख, इच्छितः प्रामोति हाम घनमक्षयं च ॥६० | डम और्‌अक्षय षन पह कोणा ॥६२॥ इंति श्रीभदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अततरकाण्डै तृतीयः सर्गः ॥३॥ AT. र्‍ [सै इ अध्यास चत अध्यात्मरामायण ४. > र . « चतुर्थ सर्ग, शाम-राज्यका वर्णन तथा छीता-वतवास | | श्रीमहादेंव गदेव उवाच _ श्रीमहादेवजी बोळ-हे पार्वति ! छोकान्तरोंमं द णो ठो 4 नारद निम्‌ । घूमते हुए रावणने एक दिन श्रीनारदजीको त्रह्मलोकसे हज il ग] Pais hi ए ;॥१। आते हुए देखकर उनसे नमस्कार करके पूछा-॥। १॥ मचा दोकाऱ्हद्ा नत्वाव्जेवाडच ॥ “गन्‌ ! मैं वळवानोंके साथ युद्ध करना चाहता हू अगवन्तरूहि मे थोड कुत्र सन्ति महाबलाः । आप तीनों लोले परिचित है । पया बतळाइयै योदमिच्छामि वलिभिसत्वं्ाताऽसि जगत्रयम्‌) मुझसे छड़नेयोग्य महाबडी पुरुष कहाँ हैं !” ॥ २॥ उिध्योत्वा5व्ह सुचिरं श्रेतद्वीपनिवासिन!। | ` तम सुनीखरने बहुत देरतक सोचकर कहा- है हि नि महामते ! श्रेतद्वीपके रहनेबाळे बड़े बलवान्‌ और भावला महाकायाखत्र याहि महामते | ३े ॥ | विशाळ शरीरवाळे हैं; तुम वहीं जाओ ॥ ३ ॥ जो ~ - , |छोग भगवान्‌ विष्णुकी पूजामें तत्पर रहते हैं. अथवा दिष्णुपूजारता ये वै विष्णुना निइताथ ये । ' | जो स्वयं विष्णमगवानके ही हाथसे मारे गये हैं वे ही वहाँ उत्पन्न हुए हैं | वे देवता या दानव आदि किसीसे भी नहीं जीते जा सकते” ॥ ४ ॥ श्रुत्वा तद्रावणो वेगान्मन्त्रिसि! पुष्पकेण तान्‌ । ह सुनकर रावण तुरन्त ही अपने Ps सहित पुष्पक ।वमानपर चढ़कर अ्तद्वा नकट $ ग $ रोहीन योडुकाम! समागत्य श्ेतद्वीपसमीपतः ॥ ५ ॥ | या ॥ ५॥ उस पकी पासे तेजोहीन हो तत्मसाहततेजस्क पुष्पक नाचलत्तत! | जानेके कारण पुष्पक और आगे नहीं बढ़ सका । सकवा विसानं प्रययो माजिणश्व दशाननः ॥ ६ || अतः विमान और मन्तरियोंकी छोड़कर रावण स्यं Ce ne हक ~ ही चला ॥ ऊः गैपमें घुसते ही एक गने विशसे तद्वयं शतो हस्तेन योषिता । . | ८ 5 ! \॥ उस ष कलाही एकी *- 8 -_ उसका हाथ पकड़कर पूछा-- बता, तू कोन है? ए त्वं छुतः कोऽसि प्रेपितः केन वा वद ।। ७ ॥ | हांसे . आया है ? और यहाँ तुझे किसने भेजा है १” इत्युक्तो लीलया ख्रीमिहसन्तीभिः पुन! पुनः ॥ ७॥ इसी प्रकार वहाँ बहुत-सी ख्रियोने लीळापूर्वक झुच्छाडूरादविनिईक्तस्तासां स्रीणां दश्ञाननः॥८॥| रते हसते उससे वही वात कही और रावणको उन ख्रियोंके हाथसे बड़ी कठिनतासे छुटकारा मिला आक्षयसतुठ उब्च्वा चिन्तयासात दुमातेः | |॥ ८॥ यह देखकर उसे असीम आश्चर्य हुआ और वह विष्णुना निहतो यामि वङण्डमिति निश्चितः ॥९॥ | ढुरबृद्धि सोचने छमा, "मैं विष्णुमगवानके हाथसेई शि विषु्था इप्येत्तथा कार्य करोम्यहम । | मरकर निःसन्देह वैकुण्ठको जाऊँगा ॥ ९॥ अतः NC {1 3०१ हीं न ee मुझे ऐसा कार्य करना चाहिये जिसंसे भगवान्‌ विष्णु इति निश्चित्य पैदेही असुरः देहा अहार पिपिनेऽसुरः॥१०॥ मुझपरं कुपित हों! ऐसा सोचकर ही उस असुरने जानन्नेव परात्मानं स जहारावनीसुतासू । _ | बनमें श्रीजानकीजीको हर ळ्या था॥ १०॥ हे सादवत्पाल्यासास स्वत्तः काइन्वध खकप॥११॥ | राम ! आपके हायसे अपना वध करानेकी इच्छासे ही रो i, रावणनेःआपको परमात्मा जानते हुए भी श्रीसीताजीको राम त्व परमेश्वरोऽसि सकलं चुरा लिया और उनका माताके समान पालन किया जानाशि विज्ञानशझू ॥ ११॥ हे राम! आप परमेश्वर हैं, आप त्रिकालदर्शी दःएव तत्र सञ्जाता अजेयाथ सुरासुरंः॥ ४॥ ए” सगे ४] भूत भव्यमिंद त्रिकालकलना- : ” साक्षी बिकल्पोज्झिव। । ` ' भक्तानामेनुवतेनाय सकलां ` | ` ` कुर्वन्‌ क्रियांसंहति "त्वं भृण्वन्मनुजाकातिहुनिवचो f i, सासाश . लोकार्चितः ॥१२॥ स्तुत्वेवं राघवं तेन पूजितः कुम्भसम्भव! । स्वाश्रमं. युनिभिः साधं प्रययो हृष्टमानसः ॥१३॥ रामस्तुःसीतया साथे आआतृमिः सह मन्त्रिमि! | संसारांव रमानाथा रममाणोऽवसदूशुदे ॥१४॥ ~ अनासत्तोऽपि विषयान्बुश्चजे प्रिया सह । इंनुमत्मरमुखेंः सङ्भिवीनरेः परिवेष्टित ॥१५॥ पुष्पक, चागमद्राममेकदा पू्वेबत्मर्चस्‌ । ` प्राह देवं: कुबेरेण प्रेषितं त्वामह ततः ॥१६॥ जितं त्वं रावणेनादो पशचाद्रामेण निजितम्‌ । अतस्त्वं. राघव” नित्य वह. यावहसेद्भावे.॥१७॥ यदा गच्छेद्रधुभ्रेष्ठी वैङुष्ठं याहि मां तदा । तच्छत्वा राघवः प्राह पुष्पक सर्यसान्नमम्‌ ॥१८॥ यदा स्मरामि मद्रं ते तदाऽऽगच्छ ममान्तिकम्‌ तिष्ठान्तथाय सवत्र गच्छेदानीं ममाज्ञया ॥१९॥ इत्युक्त्वा रामचन्द्रोऽपि पोरकायाणि सेशः । . आतृमिर्मन्त्रिमिः साधं यथान्यायं चकार सः २० राघवे शासति . सुवं ` लोकनाथे रमापतो । वसुधा _ सस्यसम्पन्ना फलवन्तथ, भूराः ॥२१॥ जना धर्मपराः सर्वे पतिभक्तिपरा! खयः | . , उत्तरकाण्ड- : TITTIES IIIS STREET Smee Pees लीच (४८0 ४८५४८१०0७४ क कक Sh Uh har pe 0 कवी NAN Wo Wer क कका का नह सळी ३४४ ~ =| एवं विकल्पसे रहिते होकर अपनी ज्ञान-रष्टिसे भूत भविष्य और. वर्तमान ये. सब“ कुळ जानते. हैं, है = | स्वामिन्‌ ! आप अपने भक्तोंको माग दिखानेके लिये ही सारी छौछाएं रचते हैं! तथा आप सम्पूर्ण लोकोंसे पूजित होकर भी मनुप्यरूपसे हम-मैसे मुनियोंके वचन सुनते हुए दिखलायी दे रहे हें ॥१२|| इसप्रकार .श्रीरधुनाथजीकी स्तुतिकर ओर उनसे सत्कार पा श्रीअगरत्यजी अन्य मुनीरवरोके साथ प्रसन-चित्तसे अपने आश्रमको चले गये | १३॥ ` छक्ष्मीपति भगवान्‌ राम सीताजी, भाइयों तथां मन्त्रियोके सहित संसारी पुरुषोंके समान रमण (आचरण) करते हुए घरमें रहने लगे । १४॥ ' | उन्होंने असंग होते हुए भी अपनी प्रियाके साथ नाना प्रकारके भोगोंको भोगा । वे सदा ही हचुमान्‌ आदि श्रेष्ठ वानरोंसे घिरे रहते थे || १५॥'एक वारं पहळेहीके समान भगवान्‌ रामके पास पुष्पक विमान `| आया और बोला--“भगवन्‌ ! मुझे कुवेरजीने - अपने यहाँसे फिर आपहीकी सेवामें भेजा है ॥ १६ (वे कहते.. हैँ कि ) पहले तुझे, रावणने . जीता. था और फिर उससे शरीरामचन्द्रजीने जीता है । अत जबतक वे पृथिवीतलपर रहें तबतक त. उन्हींकोः धारण कर ॥ १७॥ जिस समय रघुनाथजी वैकुण्ठको चले जायं उस समय तू मेरे पास आ जाना !? यह ` . | सुनकर श्रीरघुनाथजीने सूर्यके समान देदीप्यमान पुष्पकसे कहा-))-१८ ॥ “तेरा कल्याण हो, जिस समय. मैं तेरा स्मरण करू उसी समय तू मेरे पास आ जाना, अब तू जा और मेरी आज्ञासे गुप्तरूपसे सबत्र रह” ॥ १९ ॥ पुष्पकको .इसप्रकार- आज्ञा दै श्रीरामचन्द्रजी अपने भाइयों और मन्त्रियोंके साथ , - | मिलकर पुरवासियोंके सम्पूर्ण कार्य यथायोग्यं 'रीतिसे करने ठो ॥ २०॥ कि 7, 11२ त्रिकोकीनाथ लक्ष्मीपति भगवान्‌ रामके शासनः :' -कांलंमे प्रथिवी धनधान्यिसे पू्ण ओर दक्ष फलांदिसे सम्पन्न थे || २१.॥ श्रीरघुनाथजीके राज्यमें समस्त. पुरुष धर्मपरायण थे, लिया पति-सेवार्म तत्पर रहती नापेब्यत्पुनरमरण -कथिद्राजनि सघवे ॥२२॥ | थीं और किसीको भी, अपने पुत्रका मरण नहीं देखना न ३३८. अध्यात्मरामायण ' [:संगे.४. NS समारुह्य विमानाचं राघवः सीतया सह| पड़ता था ॥ २२ ॥ भगवान्‌ राम सीताजी, भाइयों आति और वानरोंके साथ विमानपर चढ़कर प्रथिवीपर धूमा वारेभिः सार्थ स्षचाराव्नि प्रथुः ॥२३॥ | =. 9 ॥२३॥ उन्होंने संसारम बहुत-सी अमानवीय अमांदुपाणि कार्याणि चकार बहुशों शुवि। | छीछाएँ की । एक वार क णो : में ही असमय मरा देख और उस गस्य सुतं दृष्टा बाल सृतमकालतः॥२४॥ | बाल्यावस्याम ह असम मरा रन्‌ नास द ड ल _ ब्राह्मणको बहुत शोक करते जान रघुश्रेष्ठ परमात्मा शोचन्त बाह्मण चापि शात्वा रामो महामतिः । | महामति रामने वनर्मे तपस्या करते इए एक शद्ग तपस्यन्तं वने शूट हत्वा त्राह्मणवारकस्‌ ॥२५॥ | (उसका कारण मानकर) मारा और उस चाळकको जी यै स्वर्गमजुत्तमम । | जीवित किया तथा शूद्वको अध्युत्तम स्वगलोक दिया जावयायास शख ददा सननङ्चमच्‌ ॥ २९-२६ ॥ उन्होने लोगोंको उपदेश देनेके लिये ठोकानाबुपदेशार्थं परमात्मा रघूत्तमः ।।२६॥ | जगह-जगह करोड़ों शिव-लिंग खापित किये और कोटिशः ख्यापयामास शिवलिद्वानि सर्वज्ञः । | सौताजीका सब प्रकारके अलौकिक भोगेंसे अलुरजन सीतां सर्वमोगैरमाजुपैः ॥२७। किया ॥ २७ ॥ इस प्रकार परमधार्मिक भगवान्‌ राम | ता चे स्सयासास स ह i धर्मपूर्वक राज्य-शासन करते रहे और उन्होंने सम्पूर्ण शशास रामो धर्मेण राज्यं परमधमबित्‌ । छोकोंके पाप दूर करनेवाळी अपनी पवित्र कौर्ति-कथा कथां संखापयामास सर्वलोकसछापहाम्‌ ॥२८॥ | संसारमे स्थापित की ॥ २८॥ तीनों छोक जिनके हि दंशवर्षतहसा | णिः यामाइुपवि्रह चरणकमलोंकी बन्दना करते हैं उन माया-मानवं- is य 1 | झरीरधारी औरामचन्द्रजीने विधिपूर्वक दश हजार वर्ष, चकार राज्य विधिवल्लोकवन्यपदाम्बुजः ॥२९॥|| राज्य किया ॥ २९ ॥ एकपलीवतो रामो राजर्षिः सर्वदा शुचिः । राजर्षि भगवान्‌ राम एकपत्लीत्रतका पाठन करने- , गहमेंवीसमसितमा लिल्माचरन शि वाले थे । वे पवित्र-चरित्र रामजी छोगोंको शिक्षा देते उहयेचीय चर्व (शिक्षयन्‌ जनाब, ॥२०॥ | इर्‌ गृहस्थाश्रमके समस्त धर्मोका पालन करते.रहे ॥२०॥ साध्वी सीताजी भी उनके हृदयका रुख परखने- न | वाली. थीं। उन्होंने अपने प्रेम, आज्ञापालन, नम्नता,' यहुसनाहरा साध्वी भावज्ञा सा हिया भिया ॥३१॥।| इन्द्रियसंयम, ज्ञा और भौरुता आदि गुणोंसे पतिका | | मन हर लिया था ॥ ३१ || एक दिन श्रीरघुंनाथजी न अपने क्रीडावनके सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न, भवनमें: एकान्ते दिव्यमवने सुखासीनं रघ्त्मम्‌॥३२॥ | एकान्ते घुखपूर्वक बैठे थे। उनके शरीरकी "९. | आमा नौल्मणिके समान थी, थे दिव्य भूषणोंसे' नीलमागिक्यसंकाओं दिव्यामरणशूपितसू। | भूषित थे, उनका सुख प्रसन्न और भाव गम्भीर. - . |. _ |थातथा वे विद्युत्युज्ञके समान देदीप्यमान पीताम्बर मसबदनं न्तं विशलुक्लनिभाग्वस्स ॥३२ | (रण क्रिये ये | उस समय संबाल्ट्टारसुसजिता सीता कमलपत्राक्षी सर्वाभरणधूकिता | . कमळ्दरुछोचना श्रीसीताजीने अपने करकमंलीसे त - - - | रघुनाथजीकी चरणसेवा करते हुए उनसे समाद करास्याँ सा लालयन्ती पदाम्डुजे ॥३४॥ । कहा-॥ १२-३४ ॥ “हे देवाधिदेव व "डे: सीता ग्रेस्णाब्लुदृस्या च प्रश्रयेण दमेन च । एकदा. ऋडविपिने सर्वेसोगसमर्तविते । सर्ग ४] . उत्तरकाण्ड . १४९ देवदेच जगन्नाथ परमात्मन्सतातन । | जगन्नाथ | हे सनातन परमात्मन्‌ ! हे चिदानन्द- चिदानन्दादिमध्यान्तरहिताशेषफारण ॥१५॥ | रुप ! -हे आदि, मध्य और अन्तसे रहित सबके देव देवाः समासाच मामेकान्ते रण ! हे देव | देवताओंने आकर मुझसे एकान्तमें ' ससासाध मारकाल्तञ्जवन्वच! । बहुत कुछ प्रार्थना करते हुए आपके वैकुण्ठ पधारनेके बहुशोज्थयमानास्ते वकुण्ठागमनं प्रति ॥३६॥ | विषयमें कहा है ॥ ३५-३६ || बे कहते हैं कि 'तुझ खया समेतश्चिच्छकत्या रामस्तिष्ठति भूतठे । नित युक्त शकर ही एम हा ह्म कक और ~ न्खक धाम रै म्‌ अपने सनातन स्थान वैकुण्ठको छोड़कर पृथिवीतलमें विसुज्यासान्खक धाम चकुण्ठ च सनातनम्‌ ।३७। ठरे इए है ॥ ३७॥ हे जगद्धात्रि ! कमछनयन राम आस्ते त्वया जगद्धात्रि रामः कमरुलोचनः । | सदा तेरे साथ ही रहते हैं | यदि त पहले बैकुण्ठको अग्नतो याहि वैङण्ठं सं तथा चेद्रपूत्तमः ॥३८॥ | ची जाय तो ए उ न आकर हमे > त त र सनाथ कर देंगे ।' मुझसे उन्होंने इसप्रकार कहा आगसिष्याति ! करिऽ - या भक्त सनामा क पपि! |है सो मैने आपको सुना दिया ॥ २८-२९ || हे इति विज्ञापिताऽह तमया विज्ञापितों भवान्‌ ॥३९ प्रभो ! मेरा कोई आदेश तो है नहीं, अब आप जैसा यदुक्तं तर्कुरुष्वाद्य नाहमाज्ञापये प्रभो । | उचित समझें वैसा करें ।” सीतायासद्वचःश्रुतवा रामो ष्यात्वाऽब्रवीतक्षणम्‌४०/ सीताजीके ये वचन सुनकर रघुनाथजीने कुछ देर ५. + 5 सोचकर कहा-॥ ४० ॥ “देवि ! मैं यह सत्र जानता दावे जानामि सकल तत्रांपाय घदाम त । ह । उसके लिये मैं तुम्हे उपाय बतळाता हूँ। मै कल्पयित्वा मिषं देवि ठोकवादं त्वदाश्रयम)४१)॥ | तुमसे सम्बन्ध रखनेवाले छोकापबादके भिषसे तुम्हें त्यजोमि त्यां बने लोकबादाक्लीत इवापरः । | लोकनिन्दासे डरनेवाले अन्य पुरुषोंके समान 'वनमे श्र त्याग दूँगा । वहाँ श्रीवाल्मीकिजीके आश्रमके पासः भविष्यतः मारौ दो वारमीकेराश्रमान्तिके।४२॥॥ तुम्हारे दो बाळक होंगे॥ ४१-४२ ॥ इस समय, ९ य तुम्हारे शरीरमें गर्मावस्थाके चिह्न दिखायी दे रहे इदानीं ध्श्यते गर्भः पुनरागत्य मेऽन्तिकप्र। | ड कप, | ह (बालकों उतपनन होनेपर) तुम मेरे पास फिर लोकाना ग्रत्ययाथ त्व कृत्वा शपथमाद्रातू । |४३॥॥ आओगी और छोकोंकी प्रतीतिके लिये आदरपूवक ˆ स NE VR ° शपथ करके तुरन्त ही प्रथिबीके (फट्नेपर उसके) मेविवरमात्रेण बेकुण्ठ यास्यां. द्वतम। गी | पीछे 4, र यार 3 वो हिद्रद्वारा बैकुण्ठको चछी जाओगी । पीछे मैं भी वहाँ पश्नादह गमिष्यामि एप एवं सुनिश्चय। ॥४४॥ | जा जाऊँगा; बस, अब यही निश्चय रहा” ॥४३-४४॥ इत्युकत्वा तां विसृज्याथ रामो ज्ञानेकठक्षण1 । | एकमात्र ज्ञानस्वरूप भगवान्‌ रामने सीताजीसे ऐसा कह उन्हें अन्तःपुरको भेज दिया और खयं नौतिशात्रके जाननेचाळे मन्त्रियों तथा मुख्य-मुख्य तंग्रोपविर्ट श्रीरामं. सुहृदः पर्युपासत॥ | सेनापतियोंसे घिरकर वहाँ विराजमान हुए । झुहृदूगण वहाँ बैठे हुए रामकी परिचर्यामें रो हुए थे और हासंप्रोदकथासुज्ञा हासयन्त। यता हरिम्‌ ॥४६॥ | हास्योक्तिमें - कुशळ विदूषकगण उन्हें हसा रहे थे ॥ ४५-४६ || कथाप्रसद्धात्पप्रच्छ रामा विजयचामकस्‌ । ` तब भगवान्‌ रामने प्रसंगवश बिजिय-नामक एक पौरा जानपदा मे किं वदन्तीह शुभाशुभम्‌ ॥४७॥ दूतसे पूछा--“मेरे, सीताके, मेरी. मातां और ; 3 _ “णा t मन्त्रिभिमन्त्रतन्वज्ञवलञ्ख्यश्च सवतः ॥४५॥ _ ३५० अध्यात्मरामायण [सर्ग ४ - | भाइयोंके अथवा कैकेयीके विषयमें पुरवासी लोग क्या कहते. हैं ? मैं तुम्हें अपनी शपथ कराता हूं, तुम भय न भेतव्यं त्यया ब्रहि शापितो5सि ममोपरि ॥४८! न करके सच-सच कहना” ॥9७-३ ८॥ सीतां वा मातरं वा मे श्रातृन्वा केकयीमथ। इत्युक्तः आह विजयो देव सर्वे वदन्ति ते । भगवानके इस प्रकार पूछनेपर विजयने कहा- देव | सभी लोग कहते हैं कि आत्मज्ञानी महाराज ण पत्मना ॥४९॥ कज है व यी वडे ष्र हैं कृतं सुदुष्करं सर्वं रामेण चिदितार रामने जो कार्य किये हैं वे समी वडे दुष्कर हैं ॥१९॥, किन्तु हत्वा दशग्रीवं सीतामाहृत्य राघवः । | किन्तु उन्होंने रावणको मारकर सीताको विना किसी अमर्ष एष्ठतः कृत्वा खं वेइम प्रत्यपादयत्‌ ५०|| | प्रकारका सन्देह किये ही अपने साथ छाकर घर रख > , छिया (यह ठीक नहीं किया ) ॥५०॥ मळा, जिस कीस हृदये तख सीतासम्मोगजं सुखम्‌ । ja हुरात्मा रावणने निर्जन वनमें हर लिया था या हृता बिजनेऽरण्ये रावणेन दुरात्मना ॥५१॥ | न जाने उसके साथ भोग भोगते इए उन्हें क्या तुख असाकमपि दुष्कर्म योषितां मर्षणं भवेत्‌ | मिळता है ? ॥५१॥ अब हमें भी अपनी स्रियोके व्र क्या दुश्चरित्रकों सहन करना पडेगा, क्योंकि जैसा राजा याइृस्‌ भवाति वे राजा ताइरुयाचयत प्रजा।५२। होता है प्रजा भी निःसन्देह वैसी ही होती है” |५२॥ शरुत्वा तद्वचनं रामः खजनान्पर्यएच्छत । उसके ये बचन सुनकर श्रामचन्द्रजीने अपने आत्मीयोंसे पूछा । उन्होंने भी रघुनाथजीको प्रणाम तेऽपि नस्वाऽत्रवच्‌ राममेवभेतन्न संशयः ।।५३।। | __ Ra पड नरवानर च सशयः १२ करके यही कहा कि निःसन्देह ऐसी ही बात है॥५३॥ ततो विसुज्य सचिवान्विजयं सुहृदस्तथा । तव औरामचन्द्रजीने मन्त्रीगण, विजय और अपने आहूय लक्ष्मणं रामो वचनं चेदमब्रवीत्‌ ॥५४॥ सुहृदोंको विदाकर श्रीलक्षणजीको चुळाया और उनसे ग ! इस प्रकार कहने लगे--“भैया लक्ष्मण ! सीताके कारण लाकापवादस्तु मंहान्सातासाश्रत्य मऽसचत्‌ | श प्‌ मेरी बड़ी लोकनिन्दा हो रही है। अतः तुम कळ सेरे तां प्रातः समानीय वा | सी वारमीकेराश्रमान्तिके || ५५।। ही सीताको रथपर चढ़ाकर वाल्मीकि मनिके आश्रमके त्यकत्वा शीघं रथेन त्वं पुनरायाहि लक्षमण । , समीप छोड़ आओ । इस विपयमें यदि तुम इष कहोगे वक्ष्यसे यदि वा किञ्चिदा सां हतवानसि ॥५६॥ | तो मानो मेरी हत्या ही करोगे” ॥५४-५६॥ ` इत्युक्तो लक्ष्मणो भीत्या प्रातरुत्थाय जानकी । भगवानका ऐसी आज्ञा पाकर लक्ष्मणजी डर गये । उन्होंने सवेरे उठते ही सुमन्त्रसे रथ जुड़वाया और सुमन्त्रेण रथे कृत्वा जगा ७ उुडनाला जार झु छत य सहसा वनम्‌ ॥५७॥ | उसमें जानकीजीको चढ़ाकर तुरन्त बनको चल दिये वारपीकेराश्रमसान्ते तयकतवा सीताञचुवाच सः। | ॥५७॥ बाल्मीकि मुनिके आश्रमपर पचते ही उन्होंने सीताको उतार दिया ओर उनसे कहा--“रघनायजीने कापषाद्भीत्या त्वा त्यक्तवान्‌ राघवो वने।५८॥। जोकापवादसे डरकर तुम्हें त्याग दिया हे ॥५८॥ हे व | मातः ! इसमें येरा कोई दोप नहीं है, अब तुम मुनी- दोषो न कशिन्मे मातर्गच्छ i श्रमपद युन! श्वरके आश्रमपर चली जाओ ।” सीताजीसे इस प्रकार इत्युकत्वा लक्ष्मण! शीघ्र गतवा कह. लक्ष्मणजी तुरन्त श्रीरामचन्द्रजीके पास चले परामसक्षिषिस्‌॥ | आवे | ५९ | ॥ वापि इभ्खसन्तमा विठछापातियुग्थवत्‌ | ` उस समय सीताजी अत्यन्त दःखातरा होकर अति संगे ५ ] ` उत्तरकाण्ड | ३५१ शिष्यःशुत्वा च वारमीकिःसीतांज्ञात्वा स दिव्य | मखी खियोंके समान विछाप करने लगी । महर्षि वाल्मीकि- जब झिष्योंके मुखसे यह बात सुनी (कि एक खी रो रही है) तो उन्होंने दिव्यद्ृष्टिसे जान लिया कि जञात्वा भविष्यं सकलमार्पयन्ध्षुनियोषिताम्‌॥६१॥ | वह सीताजी ही हैं ॥६०॥ सुनि भविष्यमें होनेबाळी , संब बातें जानते थे | अतः उन्होंने तासां सम्पूजयन्ति स सीतां भक्त्या दिने दिने । | अष्यादिसे सीताजीका पूजन किया और उन्हें समझा- हावा परात्मनो लक्ष्मी पुनिवाक्येन योपितः । | इकर सुनिपतियोंकों सौंप दिया ॥६१॥ वे मुनि" पत्नियाँ मुनीश्वरके कहनेसे उन्हें साक्षात्‌ परमात्माकी सेवां चक्रः सदा तस्या विनयादिभिराद्रात्‌॥६२॥| भायी छक्ष्मीजी जानकर नित्यप्रति भक्ति-भावसे उनकी अल उसी पूजा करतीं और सदा ही अत्यन्त आदरसे नम्रतापूबक -रामोऽपि सौतारहितः परात्मा उनकी सेवा करती: थीं ॥६२॥ इधर, सीताजीको विज्ञानइक्केवल आदिदेषः। ।| त्याग देनेपर, जिनके चरणकमछोंका मुनिजन सेवन करते हैँ वे विज्ञानचक्लु, अद्वितीय, आदिदेव परमात्मा राम भी समस्त भोगोंको छोड़कर पैराग्यपूर्वक सुनियों- मुनिमतो5भून्मुनिसेविताड्ध्रि। ॥६३॥ । के समान रहने छगे ॥६३॥ क्व ans ane: hn इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे चतुर्थः सगः | ४॥ अध्यादिमि। पूजयित्वा समाश्रास्य च जानकीम्‌ । - सन्त्यज्यः भोगानखिलान्विरक्तो — ade. पञ्चम सर्ग रामगीता ! श्रीमहादेव उवा श्रीमहादेवजी बोळे-हे पार्वति ! तदनन्तर, रघुश्रेष् ततो जगन्मङ्गलमङ्गलात्मना भगवान्‌ राम, संसारके मङ्गळके लिये धारण किये विधाय रामायणकीर्तिंगुतमाम्‌। | अपने दिव्यमङ्गछ देहसे रामायणरूप अति उत्तमकीर्ति- चचार पूर्वचरितं रपूत्तमो की स्थापना कर पूर्वकाढमें जैसा आचरण राजपिवयेरमिसेवितं यथा || १ ॥ | राजषिश्रेष्ठोंने किया है वैसा ही खयं भी करने लगे | सौमित्रिणा पष्ट उदारबुद्विना ॥१॥ उदारबुद्धि लक्ष्मणजीके पूछनेपर बे प्राचीन , रामः कथाः आह पुरातनी? शुभा; । | उत्तम कंयएँ सुनाया करते थे | इसी प्रसज्ञमें शरधु- रातः प्रमत्तस्य नृगस्य शापतो “ | नाथजौने, राजा तृगको प्रमादवशं ब्राह्मणके शापंसे द्विजस्य तिर्थक्त्वसथाह राघवः ॥ २॥ | तिर्यग्योनि प्राप्त होनेका वृत्तान्त भी सुनाया ॥२॥ 'कदाविदेकान्त उपखितं ग्रु _ किसी दिन, भगवान्‌ राम,जिनके चरणकमलोंकी सेवा : > क साक्षात श्रीलक्ष्मीजी करती हैं, एकान्तमें बैठे इए थे । उस ॒ सा 2०७७७ | ,... समय शुद्ध विचारबाढे ढक्ष्मणंजीने (उनके पास जा) उन्हें सौमित्रिरासादितशुद्धभमावनः . . | सत्तिपूर्षेक प्रणाम “कर अति विनीतभावसे .कहा-- प्रणम्य भक्त्या बिनयान्बितोऽञ्रवीत्‌॥ ३। ॥३॥ “हे महामते ) आप झुद्धज्ञानखरूप, समस्त | ४ 1707700 7 7 क (भि १५९ अध्यात्मरामायणे [ सभ ५ देहधारियोंके आत्मा; सबके खामी और खरूपसे निरा- कार हैं । जो आपके चरणकमलोंके लिये भ्रमररूप हैं. उन परमभागवतोके संहवासके रसिकोंको ही पादाब्जमृङ्गाहितसङ्गसङ्गिनास्‌ ॥ ४ ॥ | आप ज्ञानदृष्टिसे दिखठायी देते हैं ॥ ४ ॥ हे प्रभो ! अहँ प्रपन्नोऽसि पदाम्बुज प्रभो योगिजन जिनका निरन्तर चिन्तन करते हैं, संसारसे भवापवर्ग तव योभिभावितम्‌ | छुडानेवाळे उन आपके चरणकमलोंकी मै शरण हूँ, यथाञ्ञसाऽज्ञानमपारवारिधिं आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये जिससे में सुगमतास सुखं तरिष्यामि तथाजुशाधि मास्‌ | | ही अज्ञानरूपी अपार समुद्रके पार हो जाऊं "॥ ५॥ . श्रुत्वाऽथ सोमित्रिवचो5खिलं तदा श्रीडक्ष्मणजीके ये सब वचन सुनकर शरणागत- ग्राह अपन्नातिहरः प्रसन्नधी! । बत्सल भूपालशिरोमणि भगवान्‌ राम, सुननके लिये ह बी उत्सुक हुए ढक्ष्मणको उनके अज्ञानान्धकारका नाडा विज्ञानमश्ञानतम.प्रश्षान्तय करनेके लिये प्रसनचित्तसे ज्ञानोपदेश करन टगे ॥६॥ श्रुतिप्रपत्न क्षितिपालभूषणः॥ ६ ॥ | (वे बोठे--) सबसे पहले अपने-अपने वर्ण और आदौ खवर्णाश्रमवणिताः क्रियाः आश्रमके लिये ( शा्खोमें ) बतलायी हुई क्रियाओंका कृत्वा समासादितशुद्वमानसः । यथावत्‌ पालन कर, चित्त शुद्ध हो जानपर उन कर्मोको , छोड़ दे और शमदमादि साधनोंसे सम्पन्न हो साप्य तत्यूवछुपाचसाचनः आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये सदगुरुकी शरणमे जाय समाश्रयेत्सहुरुमात्मलब्धधे ॥ ७॥ | || ७॥ कर्म देहान्तरकी प्राप्तिके लिये ही स्वीकार क्रिया शरीरोद्धवहेतुरादता किये गये हैं, क्योंकि उनमें प्रेम रखनेवाळे पुरुषोंसे इषट- मियाम्रियौ तौ भवतः सुरागिणः। | निट दोनो ही प्रकारकी क्रियाएँ होती हैं। उनसे धर्म ओर अधमे दोनोंहीकी प्राप्ति होती है और उनके ` तं झुद्दबोधोउसि हि सर्वदेहिना- मात्माञ्यधीशो5सि निराकृतिः खयय़ | प्रतीयसे ज्ञानदृशा महामते धर्मेतरो ण पुचः तितर कारण शरीर ग्राप्त होता है जिससे फिर कर्म होते है । पुन! क्रिया चक्रवदर्यितं सच! || ८ ॥ | इसी प्रकार यह संसार चक्रके समान चल्ता रहता है अज्ञानमेवार्य हि मूलकारणं ॥८॥ संसारका मूल कारण अज्ञान हां है और टर्न तद्घानमेवात्र विधौ विधीयते। | (शाखीय) विवव उस (अज्ञान) का नाझ ही व्र ~ ( संसारसे सुक्त होनेका ) उपाय बतलाया गया है । विव "जनवरी पटीयसी अज्ञानका नाश करनेमें ज्ञान ही समर्थ हैं, कर्म नहीं, क्यो- न कमं तर्ज सविरोषमीरितस्‌॥ ९॥ | कि उस(अज्ञान) से उत्पन्न होनेवाला कर्म उसका बिरोधी वाज्ञानहाविने च शगसंक्षयो नहीं हो सकता # | ९ | कर्मद्वारा अज्ञानका नाश भवेत्ततः कर्म सदोषयुद्धवेत | |... रोगका क्षय नहीं हो सकता बल्कि उससे ततः पुनः संसृतिरप्यवारिता रे सदोष का उत्पत्ति होती है । उससे पुनः तसाद्गो ज्ञानविचारवान्भवेत्‌ ॥१ सरका ग्रति होना अनिवार्य है। इसलिये बुदिमान्‌- एज एक्स दित प होना चाहिये ॥१०| > °| को ज्ञान-बिचारमें ही तत्पर होना चाहिये ॥१०॥ ` सम्बन्धके नायका कारण नही रिभ वाडधातस्य' अर्थात्‌ जो कार्य जिस सस्वन्धसे उत्पन्न होता है वह उस ht र्ण न्यायके + हो पका 1... ...... लक्ता इली न्यायके अजुसार अज्ञानसे उत्पन्न कर्के द्वारा. अशान नष्ट नहीं सर्ग ५] नलु क्रिया वेदसुखेन चोदिता | तथैच विद्या पुरुपार्थसाधनम्‌ । कतेव्यता प्राणभृतः प्रचोदिता . विद्यासहायस्वमुपेति सा. पुनः ॥११॥ .नुमाकृतौ दोषमपि श्रुतिजेगौ ` तसात्सदा कार्यमिदं सुयुक्षुणा । नज खतन्त्रा ध्रुबकार्यकारिणी __ निद्या न किखिन्मनसाब्प्यपेक्षते ॥१२॥ न सत्यकार्योऽपि हि यद्ददध्वर! प्रकाहुते$न्यानपि कारकादिकान । तथेव विद्या विधितः प्रकाशितैः विशिष्यते फर्मभिरेव मुक्तये ॥१३॥ केचिद्टदन्तीति वितर्कवादिन- सदप्यसदु्टविरोधकारणात्‌ । देहाभिमानादभिवर्धते क्रिया विद्या गताव्हळूतित! प्रसिद्धधति ॥ १४। विशुद्धविज्ञानपिरोचनाखिता विद्याउ5त्मइततिथ्रमेति भण्यते । उदेति कर्माखिलकारकादिभि- निइन्ति विध्याऽखिलकारकादिकम्‌)) १५) तसार्‍्पजेत्कार्यमशेपतः सुधी- विंद्चाविरोधान्न सञ्चुच्चयो भवेत्‌ । _ आत्मातुसन्धानपरायणः सदा निवृत्तसर्वोन्द्रियतृत्तिगोचरR। ॥१६॥ यावच्छरीरादिए माययाऽऽत्मथी- स्तावद्विधियो विधिवादकर्मणाम्‌ । नेतीति वाक्येरखिल निपिष्य त- जञात्वा परातंमानमथ त्यजेर्क्रिया; ॥१७॥ यदा परात्मात्मविमेद भेदके विहानमात्मन्यवभाति भास्वरम्‌ | . उत्तरकाण्ड ` ovo oeair v2 > सन कक 999 ७92७» ५ ९9५49» 4५ «व धान++ उन नव“ वश5 धन V1V19 9 TTT THR or ४००० ५० कटक कल क क कच कक footer anima “ee vw क rnp emer ins gianna ३५३ कुछ वितर्कबादी ऐसा कहते हैं कि--जिसप्रकार वेंदके कथनानुसार ज्ञान पुरुषार्थका साधक है वैसे ही कर्मे वेदविहित हैं; और प्राणियोंके लिये कर्मोंकी अवश्य-कर्ततव्यताका विधान भी है, इसलिये वे कर्म- ज्ञानके सहकारी हो जाते हैँ । साथ ही श्रुतिने कर्म न करनेमें दोष भी बतलाया है; इसलिये मुमुक्षु- को कर्म सदा ही करते रहना चाहिये, और यदि कोई कहे कि ज्ञान खतन्त्र है एवं निश्चय ही अपना फल देनेवाल है, उसे मनसे भी किसी औरकी सद्वायता- की आवश्यकता नहीं है, तो उसका यह कहना ठीक नहीं क्योंकि जिसप्रकार (वेदोक्त) यज्ञ सत्य कर्म होनेपर भी अन्य कारकादिकी अपेक्षा करता ही है, उसी प्रकार विधिसे प्रकाशित कर्मोंके द्वारा ही ज्ञान मुक्तिका साधक हो सकता है ( अतः कर्मॉका त्याग उचित नहीं है) ॥११-१३॥ (सिद्धान्ती-) ऐसा जो कोई कुतर्की कहते हैं उनके कथनमें प्रत्यक्ष विरोध होनेके कारण वह ठीक नहीं है, क्योंकि कर्म देहाभिमानसे होता है और ज्ञान अहंकारके नाश होनेपर सिद्ध होता है॥१४॥ (वेदान्त- वार्क्योका विचार करते-करते) विशुद्ध विज्ञानके प्रकाशसे उद्घासित जो चरम आत्मवृत्ति होती है उसीका नाम विद्या ( आत्मज्ञान ) है। इसके अतिरिक्त कर्म सम्पूर्ण कारकादिकी सहायतासे होता है किन्तु विद्या समस्त कारकादिका ( अनित्यत्वकी भावनाद्वारा:) ` नाश कर देती है ॥१०)॥ इसलिये समस्त इन्दियोके विषयोंसे निवृत्त होकर निरन्तर आत्मानुसन्धानमें छगा हुआ बुद्विमान्‌ पुरुष सम्पूर्ण कर्मोका सर्वथा त्याग कर दे। क्योंकि वियाका विरोधी होनेके कारण कमेका उसके साथ समुच्चय नहीं हो सकता ॥१६॥ जबतक मायासे मोहित रहनेके कारण मनुष्यका शरीरादिमें. आत्मभाव है तभीतक उसे वैदिक कर्मानुष्ठान कर्तव्य है! निति-नेति' आदि वाक्योसे सम्पूर्ण अनात्म- बस्तुओंका निषेध करके अपने परमात्मखरूपको जान छेनेपर फिर उसे समस्त कर्मोको छोड़ देना चाहिये॥ १७॥ जिस समय परमात्मा और जीवात्माके मेदको दूर करने- वाळा प्रकाशमय विज्ञान अन्तःकरणे स्पष्टतया भासित १५४ ` .वंदेव माया ग्रविलीयतेऽञ्जसा `. सकारका कारणमात्मसंसृतेः ॥१८॥ श्रृतिममाणाभिबिनाशिवा च सा ` „ ` कर्थं भविष्यत्यपि कार्यकारिणी । विज्ञानमात्रादमलाहितीयत- स्तसादविद्या न पुनर्भविष्यति ॥१९॥ . यदि स्प नश न पुनः प्रसयते कर्ताव्हमस्येति मतिः कथं भवेत्‌ । ` तस्मात्स्वतन्त्रा न किमप्यपेक्षते विद्या विमोक्षाय बिभाति केवला ॥२०॥ सा तेचिरीयश्रतिराह सादरं न्यासं प्रशस्ताखिठकर्मणां स्फुटम्‌ | एतावदित्याह च घाजिनां श्रुति- शीनं विमोक्षाय न कमे साधनम्‌ ॥२१॥ विद्यासमत्वेन तु दसितस्स्वया कतुर्न इष्टान्त उदाहृतः समः | फले? पृथक्त्वाहहुकारके! ऋतु! संसाध्यते ज्ञानमतो विपर्ययम्‌ ॥२२॥ सप्रत्ययायो ह्यहमित्यनात्मधी- प्रसिद्धा न तु तरषदर्शित । तस्सादूुधेस्त्याज्यमविक्रियात्मभि- विधानतः कर्म विधिप्रकाशितम ॥२२॥ ` शद्धान्वितस्तमसीति चाक्यतो गुरोः प्रसादादपि शुद्भमानसः । ` विज्ञाय चेकात्म्यमथात्मजीबयो! अध्यात्मरामायण RDI प्यप्नप्पयाग यन्य ep Tew he UT ss ८४९७४४७ A ही दश्यण्यथका््या मुह "कर ४ [सर्ग ५ Cir] होने लगता है उस्री'समय आत्माके लिये संसार-प्राह्तिकी कारण माया अनायास ही कारकादिके सहित लीन दो जाती है ॥१८॥ श्रुति-प्रमाणसे उसके नष्ट कर दिये जानेपर फिर वह किसप्रकार अपना कार्य कारनेमें समर्थ हो सकती है ? इसलिये उस एकमात्र ज्ञानखरूप निर्मल और अद्वितीय बोधकी ग्राहि होनेपर फिर अविद्या उत्पन्न नहीं हो सकती ॥१९॥ जब एक वार न हो जानेपर अवियाका पिर जन्म ही नहीं होता तो बोधवानको में कर्ता हैं! ऐसी बुद्धि दोस छो सकती है ? इसलिये ज्ञान खतन्त्र है उसे जीवके मोक्षके लिये किसी और ( कर्मादिकी ) अपेक्षा नहीं है, बह खयं अकेला ही उसके लिये समर्थ है ॥२०॥ इसके सिवा तैत्तिरीय शाखाकी प्रसिद्ध धरुतिः भी स्पष्ट कहती है कि समस्त कर्माका त्याग करना ही अच्छा है, तथा “एतावत' इत्यादि वाजसनेयी झाखाकी श्रुति भी कहती हैं कि मोक्षका साधन शान ही है कर्म नहीं ॥२१॥ और तुमने जो तानकी समानतामें थठादिका दशान्त दिया सो ठीक नहीं है, क्योंकि उन दोनोके फल अल्ग-अछग हैं। इसके अतिरिक्त यह तो (होता, ऋत्विक्‌, यजमान आदि) बहुत-से कारकेसि सिद्ध होता हैं और ज्ञान इससे विपरीत है (अर्थात्‌ वह कारकादिसे साध्य नहीं है) ॥२२॥ (कर्मके व्याग करनेसे) में अवय प्रायश्ित्त-भागी हो ऊँगा--ऐसी अनास-बुद्धि अज्ञानियोकरो हुआ करती है, तर्वज्ञानी- को नहीं । इसलिये विकाररहित चित्तव्राठे वोधवान्‌ पुरुपको विहित कर्मोका भी विधिपूर्वक त्याग कर देना चाहिये ॥२३॥ फिर झुद्र-चित्त होकर श्रद्धापएवक गुरुक पासे 'तचमसि' इस महाबाक्यके द्वारा परमात्मा और जीवात्माकी एकता जानकर सुमेरुके समान सुखी भवेन्मेहरिवाप्रकन्पन; ॥२४ | निश्चळ एवं सुखी हो जाय ॥२४॥ यह नियम ही है न > अक आदो पदार्थांवगतिहि कारणं कि प्रत्येक वाक्यका अर्थ ~उ वालयका अधे जानने पह उसके दोक पहले उसके पदोके 1 Sr ~= ® न कमणा न प्रजया घनेन व्यागेनेके असुतर्वमानशञुः । परेण नाकं निहितं गुहायां विश्नाजते | "एतावदरे खश्वसतत्वसमा ` यद्यतयो विशन्ति ॥ सै० आ० अ० १० अ० १० ST eee < उत्तरकाण्ड . पक रेष १५५४११४४१० ane ७९०३०५ २८ Nees oo pp कक ne वाक्याथविज्ञानविधो विधानतः। ` | अर्थका ज्ञान ही कारण है | इस 'तखमसि! मंहा- तसम्पदाथो परमात्मजीवका- वाक्ये 'तत” और “वम्‌? पद क्रमसे परमात्मा और जीवात्माके वाचक हैं और 'असि' उन दोनोंकी एकता त भकारम्यमथानयोभवेत ॥२५॥ | करता है ॥२५॥ इन दोनों (जीवात्मा और परमात्मा) प्रत्यकूपरोक्षादिविरोधमात्मनो- में जीवात्मा प्रत्यक्‌ (अन्तःकरणका साक्षी) है. और विहाय सङ्गह तयोश्रिदात्मतामू । परमात्मा परोक्ष (इन्द्र्यातीत) है, इस (वाच्यार्थरूप) शोधिता हे | विरोधको छोड़कर और छक्षणावृत्तिसे छक्षित उनकी - संशाधता ठक्षणया च लक्षितां शुद्ध चेतनताको ग्रहण कर उसे ही अपना आत्मा जाने ज्ञात्या खमात्मानमथाद्दयो भवेत्‌ ॥२६॥ और ख FR ॥२६॥ इन "तत्‌? एकात्मकर _ और “बम्‌! पदोमें एकरूप होनेके कारण जहतीळक्षणा त्मफत्वाञ्जहती न सस्भव- नहीं हो सकती ओर परस्पर विरुद्ध होनेके कारण त्तथा5जहलळक्षणता विरोधतः । (यह वही है भी i हो पकती । इसलिये 'सोऽयम्‌' 6५५ यह वही है) इन दोनों पदोंके अथकी भाँति इन तत साज्यम्पदाथा[वव भागरक्षणा और लग पद भी मागत्यागळक्णा ही निर्दोषतासे युज्येत तत्वम्पदयोरदोपत! ।।२७॥ | हो सकती है # ॥२७॥ रसादिपश्वीकृतभूतसम्भवं परथिबी आदि पञ्चीक्कत भूतोंसे उत्पन्न हुए, सुख भोगालयं दुःखसुखादिकर्मणाम्‌ |. | दुःखादि कर्म-भोगोके आश्रय और पूर्वोपार्जित कर्मफलसे शरीरमादयन्तवदादिकर्मजं प्राप्त होनेवाले इस मायामय आदि-अन्तवान्‌ शरीरको मायामय स्थृलमुपाधिमात्मन। ॥२८॥ | विज्ञजन आत्माकी स्थूळ उपाधि मानते है और मन, यक्षम सनो चुद्धिदशेन्द्रियेयुत ` | बुद्धि, दश इन्द्रियाँ तथा पाँच प्राण (इन सत्रह अङ्गी) से णरपञ्चीकृतभूतसम्भवम्‌ | युक्त और अपन्ञीक्ृत भूतोंसे उत्पन इए सूक्ष्म शरीरको a aes enn We a & जहाँ पाव्दोके वाच्यार्थ ( अर्थाद्‌ उनकी शक्तिवृत्तिसे सिद्ध होनेवाले अर्थ ) को छोड़कर दूसरा अर्थ रिया जाता है वहाँ लणणा घृति होती है । पह जहती, थजदती और जहृष्यजहती नाससे तीन प्रकारकी . है । जहती छक्षणामें शब्दके याच्यार्थका सत्था व्याग करके उसका विछकुल नया ही अर्थ किया जाता हे । जेते “गद्गायाँ घोषः? (गङ्गाजीपर पश्मशाला हैँ) इस चाकयके वाच्यार्थसे गहपमीके प्रवाहपर पशुद्यालाका होना सिद्ध होता हे'। परन्तु यह सर्घथा असम्भव है | इसलिये यहाँ "गाझा! शाठदका अर्थ 'गह्वाप्रवाह' न करके 'गङ्गा-तीर? किया जाता है । परन्तु “तव्‌? सोर एवम! पदके वाच्यार्थ इश्वर? और 'जीव? का सर्वधा त्याग कर देनेसे उन दोनोंकी चेतनताका भी त्याग हो जाता हैं घौर चेतनताकी एकता ही अभीष्ट है; इसलिये जहतीलक्षणासे इन पदके अर्थकी एकता नहीं हो सकती । ` अलइतीळवणामे वाच्यार्था त्याग न करके उसके साथ अन्य अर्थ भी अहण किया जाता है । जैसे काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्‌? ( कौओंसे दद्दीकी रक्षा करो) इस चाक्यका अभिमाय केवल कोओसे दहोकी रक्षा कराना ही नहीं है बढिक उसके साथ कुत्ता, बिल्ली आदि अन्य जीवोंसे सुरक्षित रखना भी है । यहाँ 'तत्‌! और “स्वम! पदके वाच्यार्थे सं विरोध है फिर अन्य भर्थको सम्मिलित करनेसे भी वह विरोध तो दूर होगा ही नहीं; इसलिये अजहलक्षणासे भी इनकी एकता सिद्ध नहीं हो सकती । इन दोनोंके सिवा जहाँ कुछ अर्थ रकखा जाता है और कुछ छोड़ा जाता है चह गदत्यजहती ( भाग त्याग ) लक्षणा होती है । जैसे 'सोऽयम्‌? (यह वही है ) इस वाकयमें “यम्‌? पदसे कहे जामेचाळे पदार्थही अपरोदता और "सः? पदके चाच्य पदार्थकी परोक्षताका त्याग करके इन दोनोंसे रहित जो निर्विरोष पदार्थ है उसकी एकता कही जाती है । इसी प्रकार महावीक्यके "तत? पदके वाच्य 'ईश्वर' के गुण सर्वज्ञता, परोक्षता आदिका और "द्वम्‌? पदके वाच्य 'जीव' के गुण अल्पता, प्रव्यक्ता आदिका त्याग करके केवळ चेतनांश्रमें एकता पतळायी जाती है । [सगे ५ खि ५६ अध्यात्मशामायण 11 ___ य, ह*एछा भोक्ताके सुख-दुःखादि-अनुभवका साधन है, : मोकुः सुखाद्रखुसाधन भत णी दूसरा देह मानते है ॥ २८-२९ ॥ (इनके | च्छरीरमन्यद्विहुरात्मनो बुधा! ॥२९ अतिरिक्त) अनादि और अनिर्वाच्य मायामय कारण- “ अंबाधनिर्वाच्यमपीह कारणं शरीर ही जीवका तीसरा देह है । इसप्रकार मायाप्रथानं तु परं शरीरकम्‌ । उपाधिःभेदसे सर्वथा प्यक स्थित अपने आत्मखरूपको उपाविमेदात्तु यतः पथक्‌ खितं क्रमशः ( उपावियोंका वाध करते हुए ) अपने हृदयमें निश्चय करे ॥१०॥ स्फठिक्रमणिके समान यद्द आत्मा - खात्मानमात्म'न्यवधारयेत्क्रमात्‌ ॥३०॥ लि भी ( अन्नमयादि ) भिन्न-भिन्न कोझोंमें उनके सद्ठसे | श ठिकोपहो यथा | उन्दीके आकारका भासने लगता है । किन्तु इसका भर्ठी- प्रकार विचार करनेसे यह अद्वितीय होनेके कारण - असङ्गरुपोऽपमजो यतद ~ असङ्गलप और अजन्मा निश्चित होता है ॥३१॥ विज्ञायतेडस्मिन्परितो विचारिते ॥३१॥ त्रिगुणात्मिका बुद्धिकी ही खम, जाग्रत्‌ और सुपृत्ति-भेदसे द्वेधा इत्तिरपीह इश्यते तीन प्रकारकी इत्तियों दिखायी देती हैँ किन्तु इन तीनों स्वम्नादिमेदेन शुणत्रयात्मनः। | वृत्तियोमिसे प्रत्येकका एक दृसरीमें व्यमिचार होनेके , अन्योन्यतोऽस्मिन्व्यभिचारतो सपा कारण, ये (तीनों ही) एकमात्र कल्याणख्वरूप नित्य नित्ये परे ब्रह्माणि देवरे शिवे ॥१२॥ | परमम मिथ्या हैं ( अर्थात्‌ उसमें इन दृत्तियोका सर्वथा अभाव है) ॥२२॥ बुद्धिकी चृत्ति ही देह,इन्द्रिय,प्राण,मन और चेतन आत्माके संघातरूपसे निरन्तर परिवतित | होती रहती है। यह वृत्ति तमोगुगसे उत्पन्न होनेबाली देहेन्द्रियप्राणमनश्रिदात्मनां सङ्घादजस्तं परिवतेते धियः । शत्ळसासूठतयाव्हुलक्षणा होनेके कारण आज्ञानरूपा हैं और जबतक- यह यावद्धवेत्तावदसो मवोळूवः ॥२२॥ | रहती है तवतक ही संसारमें जन्म होता रहता हैं नेतिप्रमाणेन निराहताखिलो । ॥३३॥ निति-नेति' आदि श्रति-प्रमाणसे निखिल हृदा समाखादिताचिदनाइत।। । संसारका बाघ करके और हृदयर्म चिदघनामृतका न त्यज्ञेदशेपं जगदात्तसद्रसं आस्वादन करके सम्पूण जगत्को, उसके साररूप पारवा यथाऽम्धः प्रजहाति तत्फलम्‌ ३४ सत्‌ (त्रह्म) को ग्रहण करके त्याग दै, जैसे नारियलके झदाचिदात्मा न सृतो न जायते जलकी पीकर मत्य उस्ते फेक देते हैं ॥३४॥ ` .. न कषीयते वापि विवतेऽनदः । | आत्मा न हक मरता है न जन्मता है; वह न कभी 1. भै क्षीण होता हे ओर न बढ़ंता ही है | वह पुरातन,-- ` यिरखसवातिशयः सुखात्मका सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित, सुखस्वरूप, स्वयंप्रकाश, खयस्प्रमः सर्वेगतोड्यमद्रय। ॥३५॥ | सवगत और अद्वितीय है॥३०॥ खो एवंबिधे ज्ञानमये सुखात्मके जो इसप्रकार ज्ञानमय और सुख-खरूप है. उसमें कथं सनो दुःखमयः तीयते । (ज्ञान होनेके बाद) यह दुःखमय संसार कैसे प्रतीत हो सकता है ? यह तो अध्यासके कारण अज्ञान- से ही प्रतीत होता है ज्ञानसे RP तो यह एक क्षणमें ही शाने विलीयेत विरोधतः वणात्‌ ॥२६॥ | लीन हो जाता है क्योंकि ज्ञान और अज्ञानका परस्पर अशावतोऽध्यासवशात््रकाशते सर्ग ५] , उत्तरकाण्ड .- ण्‌ यदन्यदन्यत्र विभाव्यते माः ` | विरोध है ॥ ३६॥ अमसे जो अन्यमें अन्यकी ` (1. दध्यासमित्याहुरमु विपश्चितः । होती है उसीको बिद्वानोंने अध्यास कहा है| भर असर्पभूतेऽहिविभावनं यथा प्रकार असपेरूप रजुें सर्पकी प्रतीति होती है उत रज्वादिके तद्ददपीश्वरे जगत्‌ ॥३७ | ^ ईश्वरमें संसारकी प्रतीति हो रही है ॥ ३७। विकल्पमायारहिते चिदात्मके- जो विकल्प और मायासे, रहित है उस सबके .९ आऋड्स्‍ार एप प्रथमः किपः । |^ दवितीय और चित्र परमात्मा ने PE मर । पहले इस “अहंकार! रूप अध्यासकी ही कल्पना होती अध्यास एवारमनि सर्वकारणे | है ॥ ३८ ॥ सबके साथी जलात इच्छा, दनि निरामये ब्रह्मणि केवले परे ॥३८॥ | रुग-द्ेष और सुरू-ुःखादिरूप बुद्धिकी दृतियाँ ही इच्छादिरागादिसुखादिधगिकाः | जन्म-मरणरूप संसारकी कारण हैं; क्योंकि सुति सदा धियः संसृतिहेतवः परे। | इनका अमाव हो जानेपर हमें आत्माका 'सुख- यसाससुप्तौ तदभावतः पर! | रूपसे भान होता है ॥ ३९ ॥ अनादि अविदासे सुखखरूपेण विभाव्यते हि न! ॥२९॥ | उत्पन्न हुई बुद्धिमें प्रतिबिम्बित चेतनका प्रकाश ही अनाद्यविद्योद्धवधुद्विविम्वितो । जीव” कहलाता है । बुद्धिके साक्षीरूपसे आत्मा उससे Nr पृथम्‌ है, वह परात्मा तो बुद्धिसे अपरिच्छिन्न है जीवः प्रक्राशोऽयमितीयेते चितः । ॥ १० ॥ अञ्निसे तपे इए छोहेके समान चिदाभास, आत्मा थिय? साक्षितया पृथक्‌ खितो साक्षी आत्मा तथा बुद्धिके एकत्र रहनेसे परस्पर बुद्धथापरिब्छित्रपरः स एव हि ॥४०॥ | अन्योन्याष्यास दोनेके कारण क्रमशः उनकी चेतनता विद्विम्त्रसाक्ष्वात्मधियां ग्रसङ्गत- और जडता प्रतीत होती ` | (अत जिस प्रकार स्त्वेकत्र चासादनलाक्तलोइवत्‌ । अग्निसे तपे इए छोहपिण्डमें अभि और लोहेका तादात्म्य अन्योर त्पतीयरे हो जानेसे लोहेका आकार अशिमें और अभिकी स्स्विसध्याउतशाहतासत | उष्णता छोहेमें दिखायी देने लगती है. उसी प्रकार जडाजडत्वं च चिदात्मपतसा; ॥४१॥ | न्धि और आलाका तादाल्य हो जानेसे आत्माकी गुरोः सकाशादपि वेदबाक्यतः चेतनता बुद्धि आदिमें और बुद्धि आदिकी जडता सज्ञातविधानुभवो निरीक्ष्य तस्‌ | आत्मामें प्रतीत होने लगती है । इसलिये अध्यासवश खात्मानमात्मस्थमुपाधिवजितं बुद्धिसे ढेकर शरीरपर्यन्त अनात्म-वस्तुओंको ही आत्मा | त्यजेदशेप॑ जडमात्मगोचरस ॥४२॥ | मानने छगते हैं ) ॥ ४१ ॥ गुरुके समीप रहनेसे और > व्य पसि आत्मज्ञानका अनुभव होनेपर अपने हृदयस्थ प्रकाशरूपोऽहमजोऽहमद्वयो- वेदवाक्योंसे आत्मज्ञानका अनुभव होनेपर ६ > ~ उपाधिरहित आत्माका साक्षात्कार करके आत्मारूपसे द्रेभातोऽहमतोय निमलः । उतकाद्माता- हमती चमर प्रतीत होनेवाठे देहादि सम्पूर्ण जडपदार्थोका त्याग विशुदधविश्ञानघनो निरामयो कर देना चाहिये ॥ १२ ॥ मैंप्रकाशलरूप, अजन्मा सदैव युक्तोऽहमचिन्त्यशक्तिमा- विज्ञानघन, निरामय, क्रियारहित और एकमात्र आनन्द- नतीन्द्रियज्ञानसविकियात्सकः । खरूप हूँ ॥ ४३ ॥ मैं सदा ही सुक्त, अचिन्त्यशक्ति, अनन्तपारोऽहदमहर्निशं बुथे" अतीन्द्रिय, अविकृतरूप और अनन्तपार हूँ । वेद-बादी गे5ह हृदि वेदवादिमि डत मेरा हृदयमें चिन्तन करते हैं ॥४४ विंमावितोऽहं हृदि वेदवादिभिः ॥४४॥ । पणि जन अहर्निश मेरा हद र्‌ है ॥ / ३५८ : एवं सदात्सानमखण्डितात्मना `. बिचारमाणख विशुद्धभावना | हन्यादवि्यामचिरेण कारकै ' रसायनं यद्वद्यासितं रुजः ॥४५॥ विविक्त आसीन उपारतेन्द्रियो विनिजितात्मा विमलान्तराश्यः । विधावयेदेकमनन्यसाधनो विज्ञानच्केवट आत्मसंखितः ॥४६॥ विश्वं यदेतत्परमात्मदशनं विलापयेदात्मनि सर्वकारणे । पूर्णश्रिदानन्दमयो5्वतिष्ठ ते न वेद वाह्यं न च किञ्चिदान्तरस्‌ ॥४७॥ ` पूर्व समाधेरखिलं विचिन्तये- दोङ्ारमात्रं सचराचरं जगत | तदेव वाच्यं प्रभवो हि वाचको विभ्षाव्यतेऽज्ञानवशान्न बोधतः ॥४८॥ . अकारसंज्ञः पुरुषो हि विश्वको हकारकसैजस इते कमात्‌ । प्राज्ञो सकारः परिपठधतेऽखिलेः समाधिपूर्व न तु तच्वतो भवेत्‌ ॥४९॥ . विश्वं त्वकार पुरुष विलापये- दुकारमध्ये वहुधा व्यस्थितम्‌ । ` ततो मकारे प्रविलाप्य तैजसं द्वितीयवर्ण प्रणवस्य चान्तिमे ॥५०॥ मकारमप्यारमनि चिद्वने परे _. विलापयेत्माइसपीह कारणम्‌ । सोऽहं पर ब्रह्म सदा वि्नुक्तिम- - द्वि्ञानदुङ्‌ मुक्त उपाधितो5म७) ॥५१॥ एवं सदा जातपरात्मभावनः खानन्द्तुष्टः परिविस्सृताखिठ! । आले स नित्यात्मसुखग्रकाशकः साक्षाद्वियक्तो$चलवारिसिल्युवत ॥५२॥ अँध्योत्मरामायण इस प्रकार सदा आत्माका अखण्ड-बृत्तिसे चिन्तन करनेवाले पुरुषके अन्तःकरणमें उत्पन्न हु विशुद्ध भावना तुरन्त ही कारकादिके सहित अविद्याका नाश कर देती है, जिस प्रकार नियमानुसार सेवन की हुई ओषधि रोगको नष्ट कर डालती हे ॥ ४% ॥ ( आत्मचिन्तन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि ), एकान्त देशमें इन्द्रियोंको उनके विपयोसे हटाकर और अन्तःकरणको अंपने अधीन करके वेठे तथा आक्माम खित होकर और किसी साधनका आश्रय न लेकर शुद्धःचित्त हुआ केवळ ज्ञानदृष्टिद्वारा एक आत्माकी ही भावना करे ॥४६ || यह विश्व परमात्मलरूप है ऐसा समझकर इसे सबके कारणरूप आत्मा छीन करे; इस प्रकार जो पूर्ण चरिदानन्दखरूपसे स्थित हो जाता है उसे वाझ अथवा आन्तरिक किसी भी वस्तुका ज्ञान नहीं रहता ॥४७॥ समाधि प्राप्त होनेके पूर्व ऐसा चिन्तन करे कि सम्पूर्ण चराचर जगत्‌ केवळ ओंकार- मात्र है । यह संसार वाच्य है और ओंकार इसका वाचक है । अङ्गानके कारण ही संसारको प्रतीति होती है ज्ञान होनेपर इसका कुछ भी नहीं रहता ॥ ४८ ॥ ( ओंकारमें अ उ ओर म ये तीन वर्ण हैं; इनमेंसे ) अकार विश्व ( जागृतिके अभिमानी ) का वाचक है, उकार तेजस ( खप्तका अभिमानी ) कहलाता है और मकार प्राज्ञ ( सुपृप्तिके अभिमानौ ) को कहते हैं; यह व्यवस्था समाषिळाभसे पहलेकी है, तत्त्वदृष्टिसे ऐसा कोई मेद नहीं है ॥ ४९ ॥ नाना प्रकारसे खित अकाररूप विश्व पुरुपको उकारमें लीन करे और ओंकारके द्वितीय चर्ण तैजसरूप उकारको उसके अन्तिमदर्ण मकारमें लीन करे ॥ ५० || फिर. कारणात्मा प्राज्ञरूप मकारको भी चिदूधनरूप परात्मा- में छीन करे; ( और ऐसी भावना करे कि ) वह नित्यमुक्त विज्ञनखरूप उपाधिहीन निर्मळ परन्हम मैं ही हूँ ॥ ५१॥ इसप्रकार निरन्तर परात्ममावना करते-करते जो आत्मानन्दमें मग्न हो गया है तथा जिसे सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च विस्मृत हो गया है वह नित्य आत्मानन्दका अनुभव करनेवाला जीबन्हुक्त योगी निस्तरंग समुद्रके सर्ग५] उत्तरकाण्ड ३५९ ro - ०-७५-४४ TTR यग्््यमयाम ee न 0 ध ~ एवं सदाऽभ्यस्तसमाथिंयोगिनो ` समान साक्षात्‌ मुक्तखरूप हो जाता है॥५२॥ इसप्रकार ` निवृत्तसर्वेन्द्रियगोचरस्य हि। | जो निरन्तर समाधियोगका अभ्यास करता है, विनि्जिताशेपरिपोरह॑- सदा जिसके सम्पूर्ण इन्द्रियगोचर विषय निवृत्त हो गये हैं तथा ~ ~ ¢ < = | न्न | इञ्यो मवेय॑ जिर्तपद्भुणात्मनः ॥५३॥ FR bo त्य रात कर शिका Ne 1 है, उस छहों इन्द्रियों (मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियों) # ष्य ~ = ० तयालवमात्याननहानशे हान को जीतनेवाळे महात्माको मेरा निरन्तर साक्षात्कार . सिष्ठत्सदा इृक्तसमसतबन्धन! । | होता है॥५३॥ इसप्रकार अहर्निश आत्माका ही चिन्तन प्रारूधमश्नन्नभिमानवजितो i करता हुआ मुनि सर्वदा समस्त बन्धनोसे सुक्त होकर रहे मय्येव साक्षा्विलीयते ततः ।५४॥ | तथा ( कर्ता-मोक्तापनके ) अभिमानको छोडकर प्रारब्ध- ` आंदौ च मध्ये च तथेव चान्ततो . | फल भोगता रहे । इससे वह अन्तमें साक्षात्‌ मुझहीमें भवं विंदित्वा भयशोककारणम्‌। | लीन हो जाता है ॥५४॥ संसारको आदि, अन्त और हित्वा समस्तं विधिवादचोदितिं ' ` | मध्यमेंसव प्रकार भय और शोकका ही कारण जानकर , वेद्वि £ ए भजेस्मात्मानमथाखिलात्मनाम्‌।५५॥ | समख वेदविहित कर्माको त्याग दे तथा समू प्राणिर्यो- के अन्तरात्मारूप अपने आत्माका भजन करे॥ ५५॥ जिस प्रकार समुद्रमें जळ, दूधमें दूध, महाकाशमें घटा- काझादि और वायुमें वायु मिलकर एक हो जाते हैं आत्मन्यभेदेन विभाषयन्निदं भवत्यमेदेन मयात्मना तदा । यथा जलं वारिनिधौ यथा पयः उसी प्रकार इस सम्पूर्ण प्रपञ्चको अपने आत्माके धीरे वियद्वयोञ्जयनिले यथानिल॥।५६) | साथ अमिन्नरूपसे चिन्तन करनेसे जीव मुझ परमात्मा- ` इत्थं यदाद्षेत हि लोकसंखितो के साथ अभिन्न भावसे स्थित हो जाता है॥५६॥ जगन्मृपेवेति विभावयन्छुनिः । यह जो जगत्‌ है वह श्रुति, युक्ति और ग्रमाणसे बाधित निराकृतत्वाच्छृतियुक्तिमानतो होनेके कारण चन्द्रभेद और दिशाओंमें होनेवाले दिर्भ्रम- के समान मिथ्या ही है-ऐसी भावना करता हुआ यथेन्दुभेदो दिशि दिः्अमादया ॥५७॥ लोक (व्यवहार ) में स्थित मुनि, इसे देखे | ५७॥ यावन्न पञ्येदखिछं मदात्मक ._ |जबतक सारा संसार मेरा ही रूप दिखायी न दे तब- तायन्मदाराधनतस्परो मवेत्‌ । तक निरन्तर मेरी आराधना करता रहे.। जो श्रद्धा _ श्रद्धाढरत्यूजितभक्तिलक्षणो और उत्कट भक्त होता है उसे अपने हृदयमें सर्वदा मेरा यस्तस्य इश्योऽहमह्र्निशं हृदि ॥५८।। | ही साक्षात्कार होता है ॥ ५८॥ . रहस्यमेतच्डतिसारसङ्कह ह ` हे प्रिय | सम्पूर्ण श्रुतियोंके साररूप इस गुप्त मया 'बिनिश्चित्य तबोदित प्रिय । रहस्यको मैंने निश्चय करके तुमसे कहा है । जो बुद्धिमान्‌ | क) क्षणात ॥५९॥ ईतका मनन करेगा वह ताड समल पापे इक आदी परिरृक्यते जग- . हो जायगा ॥ ५९॥ भाई ! यह जो कुछ जगत ` न्मायेव सर्वे परिहृत्य चेतसा। | दिखायो देता है वह सब माया है। इसे अपने चित्ते >-+- ` [सम अध्यात्मरामायण ROSS IRI निकालकर मेरी मावनासे शुद्धचित्त और सुखी होकर आनन्दपूर्ण और कवेशशत्य हो जाओ ॥ ६०॥ जो पुरुष अपने चित्तसे मुझ गुणातीत निर्युणका अथवा ३६० ६ च क क ३४७० tn TT ited र्क मद्भावनाभाविवशुद्धमानस। ˆ सुखी भवानन्दमयो निरामयंः।।६०॥ यः सेवते माय युगात र _ कमी-कमी मेरे सगुण खरूपका भी सेवन करता है हदा कदा वाया गा उपात्‌ | वह. मेरा ही रूप है। वह अपनी चरणरजके स्पशंसे सोऽहं खपादाखितरेशुमिः सशशच्‌ सूर्यके समान सम्पूर्ण त्रिलोकीको पवित्र कर देता हैं” पुनाति छोकत्रितयं यथा रविः ॥६१॥ | | ६, | यह अद्वितीय ज्ञान समस्त श्रुतियोंका एकमात्र \ विज्ञानमेतदालि शुतिसारमें सार है इसे बेदान्तवेय भगवत्पाद मैने- ही कहा है । जो बेदान्तवेद्यचरणेन मयेव गीतम्‌ । गुरुमक्तिसम्पन्न पुरुप इसका श्रद्धापूर्वक पाठ यः श्रद्धया परिपठेद्‌ गुरुभक्तियुक्तो करेगा उसकी यदि मेरे बचनोंमें प्रीति होगी तो वह महूपमेति यदि मद्वचनेषु भक्ति¦॥६१।। | मेरा ही रूप हो जायगा ॥ ६२ ॥ ~ BNO इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे पञ्चमः सगेः ॥ ५ ॥ “ERIS र षष्ठ सग लव॒ण-चघ, भगवान्‌ रामके यश्षमे कुश-छवके सहित महदपि चाल्मीकिक्रा पधारना और कुशको परमार्थोपदेशा करना! श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेवजी बोळे-<हे पार्वति | एक दिन यमुना- एकदा झुनय! सर्वे यशुनातीरयासिन! । | तटपर रहनेवाले समस्त मुनिजन ळ्वण राक्षससे भय- कका भीत होकर श्रीरामचन्द्रजोका दर्शन करनेके लिये आये अजण्सू राघव द्रष्ट भयाहवणरक्षस! _ क है निभ कड कि छ "स्स ॥१॥ ॥ १॥ वे अगणित सुनिगण भृगुपुत्र मुनिश्रेष्ट च्यवन- छत्वाऱ्य ठु डान भागव च्यवन द्विजाः । | को आगे कर भगवान्‌ रामसे अभय-छाभ करनेकी इच्छा- असङ्घयाताः समायाता रामादभयकाङ्किणः ॥१॥ | से आये ॥२॥ रघुकुलश्रेष्ठ रामजीने उन मुनीरचरोंका तान्पूजयित्वा परया भक्त्या रघुझुलोत्तमः | | सन्त भक्तिमावसे पूजन कर उन्हें प्रसन्न करते हुए 8 a मधुर बाणीसे कहा-॥ ३ ॥ “हे मुनिभ्रेष्टगण ! आपके उपाच मधुरं वाकयं हर्षयन्धुनिमण्ड री 5 ी , धु इंषयन्ययानमण्डल्यू ॥ ३ ॥ यहाँ पधारनेका क्या कारण है? ( मुझे जो आज्ञा करवाणि गुनिश्रेष्ठा। किमागमनकारणस्‌। | होगी) मैं वेसा ही करूँगा । यदि आप लोग मुझे धल्यो5स्मि यदि यूयं मां प्रीत्या द्रष्टुमिहागता1191 | म्रीतिपूर्वक देखनेके लिये ही यहाँ आये हैं, तो मैं धन्य हैँ दुष्करं चापि यर ५ ॥४॥ आपका जो अत्यन्त दुष्कर कार्य होगा दुष्कर चापि यर्कार्यं भवतां तत्करोम्यहम । ड्‌ दाना , र्‌ ₹ स्‌। वह भी मैं अवश्य करूँगा । आप मुझ सेवकको आज्ञा आज्ञापयन्तु मां भृत्यं ब्रह्मणा दैवतं हिमे ॥ ५॥ | दीजिये; ब्राह्मण ही मेरे इष्टेन हैं? | ५॥ तच्छृत्वा सहसा हृष्टाव्यवनी वाक्यसन्रबात्‌। भगवान्‌ रामके ये वचन सुनकर महर्षि च्यवनने मडुनामा महादत्यः पुरा कृतयुगे प्रभो || ६॥ | सहसा प्रसन्न होकर कहा---“प्भो ! पहले संतयुगमें समें६] ` | उत्तरकाण्ड ३६१ य भ्या 9 द: a Dpentnmae Ieee tr ककत Da a DN PO NN er फेक फेक चोर rT न DRC DE ToT ञ्च « आसीदतीव धर्मात्मा देवब्राक्षणपूजकः । ` मधु नामक एक. बड़ा ही धर्मात्मा और -देवता तथा तस्य तुटो महादेचो ददौ झूलमचुततमम्‌॥ ७॥ ब्राक्षणोंका भक्त महादैत्य था । उससे प्रसन्न होकर रे भविष्य | श्रीमहादेवजीने उसे एक अत्युत्तम त्रिशूळ दिया ६-७॥ प्राह चानन य दल ए भस्माभावण्यात ' | और कहा कि इससे द. जिसपर प्रहार करेगा बही रावणस्याचुजा भाया तस्य कुम्भीनसी श्रुता॥ ८ ॥ | मस्मीभूत हो जायगा । सुना जाता है १ ष्ण तु लवणो नाम राक्षसो भीमविक्रमः। |राषणकी छोटी बहिन कुम्मीनसी उसकी भार्या कं हि [थी ॥ ८॥ उससे उसके लवण नामका एक हाण } | आसाद्रात्मा दषो देवजाह्मणहिसकः ॥ ९॥ महापराक्रमी दुष्ट-चित्त, दुर्जय और देवता-आह्मर्णोको पीडितास्तेन राजेन्द्र वयं त्वां शरणं गता! । दुःख देनेवाला राक्षस उत्पन्न हुआ ॥ ९ ॥ हे राजेन्द्र ! उससे अत्यन्त पीडित होकर हम आपकी शरण आये ! है |” यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने कहा--“हे .मुनि- लवण नाशयिष्यामि गच्छन्तु विगतज्वराः | , श्रेष्ठ | आपलोग किसी प्रकारका भय न करें ॥ १ ०)| आप त्यकत्वा राह रामोऽपि _ ~ | निथिन्त होकर पघारं में छवणको अवश्य मार डाडँगा ।” र ग्राह रामाजप ठन्‌ का चा हनिष्यति॥ | मुनीश्‍्वरोसे ऐसा कह भगवान्‌ रामने अपने आइयोसे लवणं राक्षस दद्याद्‌ ब्राह्मणेस्योऽमयं महत्‌ । पूछा-“तुममेसे कौन लवण राक्षसको मारेगा और तच्छुत्वा पराञ्जलिः प्राह भरतो राघवाय वै ॥१२॥ | “लेक महान्‌ अमय देगा ¦` यह घुनकर मरतजी- $ | ने श्रीरघुनाथजीसे हाथ जोड़कर कहा-॥ ११-१२'॥ अहमेव हनिष्यामि देवाज्ञापय मां प्रभो । | “देच | उवणको मैं ही माँगा । प्रभो ! इसके लिये सुशे > a । ही आज्ञा दीजिये।” फिर शन्रुघ्नजीने श्रीरामचन्द्रजीको ततो रामं नमस्कृत्य शत्रुधो वाक्यमत्रवीत्‌ ॥१३॥ | अणाम करके कहा--] १३ || “हे राघव ! औरुद्मण- लक्ष्मणेन महत्कार्य कृतं राघव संयुगे | । जी युद्धमें बड़ा भारी कार्य कर चुके है, महामति भरत- नन्दिग्रामे महाजुद्वि्भरतो दुःखमन्यभूत ॥१४॥ | जीने भी नन्दिआममें रहकर बहुत कष्ट सहा है॥ १४॥ _ हि | अब लवणका बध करनेके लिये तो मैं ही जाऊँगा । अहसेब गमिष्यामि लवणस्थ वधाय च। [हे रघुश्रेष्ठ ! आपकी कृपासे मैं उस राक्षसको युद्धमें तलतातादादपुश्रेष्ट हन्यां तं राक्षसं युधि ॥१५॥ | अवश्य मार डाळूंगा” || १५ || !। तच्छूत्वा राघवोऽप्याह मा भीर्वो सुनिपुज्ूवा! १०। शत्रुष्नके ये वचन सुनकर शात्रुदमन रघुनाथजीने उन्हें अपनी गोदमें उठा लिया और कहा-“में आज ही तुम्हारा ( ढ्वणकी राजधानी ) मथुराके राज्यपर तच्छत्वा स्वाइमारोप्य शत्रुध शजुसदनः । भाहायेवामिपेक्ष्यामि मथुराराज्यकारणात्‌॥१६॥ आमाव्य च सुसम्भारालक्ष्मणेनाभिपेचने । अभिषेक करूँगा” || १६॥ ऐसा कह 'लक्ष्मणजीसे र 2 es पे भँगा शत्रध्नजीकी इच्छा न होने- अनिच्छन्तमपि खेहाद्मिपेकमकारयत्‌ ॥१७॥ | अनेकौ सामओी मगा शुल्क ३ क या पर भी श्रीरामचन्द्रजीने उनका प्रीतिपूर्वक अभिषेक दत्वा तस्मै शर दिव्यं रामः शङुपनमत्रवीत्‌। | कर दिया ॥ १७॥ फिर उन्हें दिव्य बाण देकर अनेन जहि वागेन छवणं लोककण्टकम्‌ ॥१८॥ | कहा--“तुम संसारके कण्टकरूप ढबणको इस बाण- मेहे ` | से मार डाढना ॥ १८॥ राक्षस छवण अपने घरमे स तु सम्पूज्य तच्छूल गेहे गच्छति काननम्‌। से मार ॥ १ ही. उस त्रिशूलंकी पूजा कर नाना प्रकारके जीवोंको मक्षार्थ तु जन्तूनां नानाप्राणिवघाय च ॥१९॥ । खाने और मारनेके ल्मि वनको जाया करता है | १९॥ ३६२ . अध्यात्मरामायण ` [सर्ग ६ fv SN NYT LT UT RN (नु $ _ सः तु नायाति सदनं याबद्गनचरो भवेत्‌ । , अतः जवतक वह लौटकर घर न आवे, वनहीमें रहे, तावदेव पुरद्वारि तिष्ठ त्वं धतकार्मुकः ॥२०॥ | उससे पूर्वे ही तुम नगरके द्वारपर धतुव धारण कर खड़े ` योत्स्यते स त्वया क्रद्धलदावध्यो भविष्यति । ` दो जाना ॥ २० ॥ लोटनेपर वह क्रोधपूर्वक तुमसे लड़ंगा ऑर उसी समय मारा जायगा । इस प्रकार महा- श्षितम्‌ ॥२१॥ | ते हत्वा लवण क्रं तद्वनं मधुसंशितम्‌ ॥२१ | क्रूर ख्वणासुरको मारकर उसके मधुवनमें नगर वसा- निवे नगरं त्र कि लं गज कक त कर मेरी आज्ञासे वहीं रहो । तुम पहले जाकर उस अशना पशसाहल रथानां च तदर्धकम्‌ ॥२२॥ राक्षसो ठीक करो, फिर तुम्हारे पीछे वहाँ पाँच हजार यजानां षद्‌ शतानीह पत्तीनामयुतत्रयम्‌ । घोडे, उनसे आधे (ढाई हजार ) रथ, छः सी हाथी आगायण्यात पश्चाचमत्र साधय राक्षसस्‌ ॥२३॥ | और तीस हजार पैदल भी पहुँचेंगे ॥ २१-२३ ॥। इत्युकत्वा यूध्न्यवप्राय प्रेपयामास राघवः । / ऐसा कह शरीरधनाथजीने शत्रध्नका शिर सँबक्रर शद निभिः सार्थभाशीमिरमिनन्ध च ॥२४॥ | उनका माझर्बादसे अभिनन्दन किया और उग र इ bd । के साथ विदा किया ॥ २४ ॥ शत्रध्नजीन भी, भगवान शडुघोपि तथा चक्रे यथा रामेण चोदितः रामने जेसी आज्ञा दी थी वैसा ही किया | उन्होंने द्धे मधुपुत्र ल्वणासुरको मारकर मथुरापरी वसायी|| २५ || हज! बधुठुत शुद्ध मधुरामङ्रोत्पुरीव्‌ ॥२५॥ | और दान-मानसे (लोगोंको सन्तुष्ट कर) उन्होंने मधरा- सकता जनपद चके मथुरां दानसाततः । : को एक समृद्विशाली नगर वना दिया ! सीतापि सुपुवे पत्रो हो वारमीकेरथाअमे ॥२६॥ इत बीचमें श्रोसाताजीवे वाल्मीकि झुनिके आश्रममे उनिलयोर्जाम चङे कुशो ज्येहों ोऽलुजो लः दो पुत्र उत्पन्न इए ॥२६॥ सुनिने उनमेसे वडेका नाम वी Ra जो लव कुश और छोटेका ख्व रक्‍्खा। धीरे-धीरे सीताजीके मेण विधासम्पत्नों सीतापुत्रो पथूवठु, ॥२७॥ | वे द्वोनों पत्र विद्यासम्पन्न हो गये ॥ २७॥ मनिके उपनीतो च झुनिना वेदाध्ययसतत्परी | | उपनयन-संस्कार करनेपर वे वेदाध्ययनमें तत्पर इए । श्रीवाल्मीकिजीने उन दोनों बालकों को सम्पूण रामायणकान्य पढ़ा दिया ॥२८॥ शङ्करेण इरा प्रोक्तं पार्वत्यै पुरहारिणा । पूर्वकाळ्ें इसे त्रिपुरविनाशक भगवान्‌ शंकरने पार्वती- देदेपइंहणार्थाय तावग्राहयत प्रश: ॥२९॥। जीको सुनाया था | उसी आख्यानको समर्थ सुनि । वाल्मीकिने वेदोंका विस्तृत ज्ञान करानेक्रे लिये उन डया खरसम्पन्ना सुन्द्रायश्चिनाविष। ' वाळ्योको पढ़ाया ॥ २९॥ बे अश्विनीकुमारके समाने“ तन्त्रीवाल्समायक्तों गायन्तौ चेरतुवेने ।।३०।| ` अति सुन्दर कुमार उसे वीणा बजाकर खरसहित गाते हुए न तक नीनां वनमें विचरा करते थे ॥३०॥ उन देवखरूप वाल्यो- तत्र वत्र युनीनां तो समाजे सर जे सुररूपिणौ । को जहाँ-तहाँ मुनियोंक्रे समाजमें गाते देख दे गायन्दावामेतो इद्टा विसिता इुनयाऽघुवन्‌॥३१।। सुनिगण अत्यन्त विस्मित हो आपसर्मे कहने लगते मर्धवेणित किन्नरेषु शुवि वा देवेषु देवा ये-॥ ३१ ॥ “हम चिरजीवियोंने बहुत दिनोंसे देवेषु देवालये थवा जल दिशाएँ देख; किन्तु पाताठेष्वशया चतुुख्यदे लोकेपु सर्वेपु च । नो, नाड पातार ज. ha आदि 3 3 1 अस्पामिबिरजीविमिशिरवर चटा दिशः स्तो किसी भी लोक गाने-बजानेकी ऐसी कुशलता Ce इत्स रामायण आह काव्य वालकयाप्रोन।॥२८।॥ ' TT माट ता र्यं ६ ] ' उत्तरकाण्ड ३६३. REITs Ne २५५ ne, १२८०८४७ १०१०० ७ RSTO pp PONDS PYG नातांयीरशगीतवाद्यगरिमा तादाश नाश्रावि च॥ एवे स्तुवझ्धिरखिठेमुनिमिः अतिवासरम्‌ । 7३० ९/०९/०३८०६७०७/० ७ (९७४४७ MANNY ANUP ४०१० ९४४०७४५ न कभी जानी, न देखी और न सुनी ही है” ॥१२॥ इसप्रकार प्रतिदिन प्रशंसा करनेवाले समस्त मुनियोंके साथ वे दोनों बालक बहुत समयतक श्रीवाल्मीकिजीके एकान्त आश्रममें सुखपूर्वक रहे ॥ ३३ ॥ आसाते सुखमेकान्ते वा्ल्मीकेराश्रमे चिरम्‌ ॥३३॥ अथ रामोऽश्वमेघादीश्चकार बहुदक्षिणानं। | . इधर परम तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने सुवर्णकी सीता ग्या , ~ [1 म (शान सममयी सीतां विधाय विपुलययुति1३४॥ | बनाकर अश्वमेध आदि बहुत-से वड़ी-बड़ी दक्षिणाओं- या र वाळे यज्ञ किये ॥२४॥ उस यद्गशालामें यज्ञोत्सव देखनेंके . न लिये सभी ऋषि, राजर्पि, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य माहाणाः दाया वेश्याः समाजग्युदिरक्षवः।२५। आदि आये थे ॥ २% | मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिजी भी गान्‌ बाल्मीकिरपि सञ्च गायन्तौ तौ कुशीलवौ । | करते इए कद और खवको साथ ळे वहाँ आये जगास ऋपिदारस्य समीप प्निएडवः ॥३६॥ और जहाँ सुनियोंके ठहरनेका स्थान था वहाँ उतरे | विवि 1 युनिुङ्वः ॥२६ ' ॥ ३६॥ वहाँ एक दिन एकान्तमें शान्तमावसे बेठे' तत्रकान्त खित शान्त समाधिविरमे घुनिस्‌। हुए वाल्मीकि मुनिसे उनकी समाधि खुलनेपर कुने, कुण! पमच्छ पारमीकिं घानश्चासं कथान्तरे॥३७॥ ' कथाके वीचमें ही ज्ञानशाखके विषयमें पूछा ॥ ३ ७ | - ~ नस : (वह बोळा---) “भगवन्‌ मैं आपके मुखारबिन्दसे संक्षेपः भगत्‌ श्रोतुमिच्छामि सह्शङ्कयतोऽखिलम्‌। | भे यह बात सुनना चाहता हूँ कि जीवको यह घुर दहिनः संसृपिमेल्धः कथयुत्पद्यते हः ॥३८॥ | संसारवन्थन किस प्रकार प्राप्त होता है !॥ ३८॥ कथ लिगात्यते देही दढवस्थाद्ववामिधात । | और फिर इस संसार नामक दढ बन्धनसे उसे छुटकारा ५२४4 i “शां व ८5५४ त्‌ 1 केसे मिळता है 2 हे मुने ] आप सर्वज्ञ हैं, मुझ प्रणत बदतुमहसि सबंध महो शिप्याय ते घुने ॥३९॥ ¦ झिष्यसे आप यह सम्पूर्ण रहस्य कहिये” ॥ ३९॥ ` | RS वार्ल्मीकिरुवाच । वाउमीकिजी बोले--हुन, मैं तुझे संक्षेपसे साधनः के सहित बन्ध और मोक्षका सम्पूर्ण खरूप सुनाता है । हूँ । मैं जैसा कहूँ वह सब सुनकर त्‌ उसी प्रकार आचरण खरप साधन चापि मत्त श्रुत्वा यथोदितस्‌।४०॥ | कर । इससे तेरा कल्याण होगा और त. जीवन्मुक्त हो तगरवाचर सद्र त जीवन्मुक्तों भविष्यसि। जायगा। देहहीन चेतन आत्माका यह देह ही बड़ा देह एव महागेहमदेहस्थ विदात्मना ॥8 १॥ | भरी घर दै ॥ ४०-११ ॥ इसमें उसने अहंकारको:ही है RI , अपना मन्त्री बना रक्ला है । यह अहंकाररूप. मन्त्री तस्माहद्षार एवासिन्मन्या त्च काल्पतः |, देहगेहामिमानरूप अपने आपको ,चेतन आत्मे दडगेहाभिमानं खं समारोप्य चिदात्मनि ॥४२॥ | आरोपितकर उससे एकरूप होकर अपनी सारी चेष्टाओं- | का.आरोप उस चिदानम्दरूप आत्ममें ही करता है । & तदवा सितनपुः खयम्‌ ॥४३॥ उस अहंकारसे व्याप्त हुआ देही ( जीव ) उसीके संकल्प- बिदथाति चिदानन्दे तद्वासितवः खयम्‌ से प्रेरित होकर संकल्परूपी वेड़ियोसे बॅधता है और पवन सद्ल्ितो देही सद्श्पनिगडाइतः। ` | फिर रात-दिन पुत्र, त्री और गृह आदिके लिये संकल्प- ने सहस्पयति चारि बिंकह ४२-४४ ॥ इस प्रक पुत्रदारमृहादीचि कुटप्याति चानश्षय्‌ ॥४४॥ | विकल्प करता रहता है ॥ ४२ इस प्रकार तखिन्विताने ऋषयः सर्वे राजपयस्तथा | मृफु यक्ष्यामि ते सब सङ्भेपाद्वन्धमोक्षयोः । तन वादात्म्यमायन्न खचेष्टितमशेपतः । १६४ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ६ संडूल्पयन्खयं देही परिशोचति सर्वदा | संकल्प करनेसे जीव खयं ही सदा शोक करता है । 9 ' अहंकारके सत्त्व, रज, तम नामक उत्तम, अधम ध्याहमों देहा. अधमोत्तममध्यमाः ॥४५॥ |. इस अहंकारके सत्त्व, रज, तम नामक उत्तम, ्रयस्तस्याह्मा , द्‌ा अमात्य म्या और मध्यम तीन प्रकारके देह हैं । ये ही तीनों संसारकी तम!सच्वरजःसंज्ञा जगतः कारण शितः । खितिके कारण हैं। इनमेंसे तामस संकल्पे नित्त्यप्रति तमोरूपाद्वि सडूल्पानित्यं तामसचेष्ट्या ॥४६॥ | तामसिक चेटा करनेसे ही जीव अत्यन्त तमोगुणी | ~ [ता र अत्यन्त तामसो सूत्वा कृमिकीटस्वमाप्लुयात। | होकर कोडे मकोड़े आदि योनिर्योको प्राप्त ह सखरूपो हि सहृस्पो धर्मज्ञानपरायणा ॥9७॥ है। जो साखिक संकल्पवाढा होता हे वह धर्म आं सरूपा हैं सटर पाजाना ज्ञानमें ही तत्पर रहनेके कारण मोक्ष-साम्राज्यके पास \ रजोरूपो हि सडूल्पो ठोके स व्यवहारवाच्‌ (!४८!॥ लोकव्यवहार करता हुआ संसारमें पुत्र, खी आदिमे परितिएति संसारे पत्रदाराजुरज्ितः अनुरक्त रहता है । हे महामते | जो पुरुष इन तीना प्रकारके संकल्पोंकों छोड देता है बह चित्तके छीन न्महासते ॥४९॥ | त्रिवि हु परित्यज्य रूपसंतन्महा होनेपर परमपद प्राप्त कर लेता है | इसलिये तू समस्त सहप परमाम पदमात्मपारक्षय । | किचारोको छोडकर और अपने मनसे ही मनका संयम- इष्टीः सवाः परित्यज्य नियम्य मनसा मनश।५०॥ | कर बाहर-मौतरके सम्पूर्ण संकल्पोंका क्षय कर दे । सवा्वाभ्यन्तरार्थस्य सङ्र्पस् क्षयं कुरु | । दे अनघ ! यदि त. पाताळ, पृथिवी अथवा स्वर्ग आदिमं यादि वर्षसहस्ताणि तपश्चरसि दारुणम्‌ ॥५१॥ | क भौ रहकर हजारों वर्ष कठोर तपस्या भी करे तो | भी ( संसार-वन्धनसे मुक्त होनेका तो ) संकल्पनाइाकै ७७४ भूख्स्य स्वगैख्सस्यापि तेऽनघ | अतिरिक्त और कोई उपाय है हो नहीं ॥ १५-५२ ॥ नात्य? कथिदुपायोऽरित सडल्पोपशमाइते।५२॥ | इसलिये जो दुःखहीन, विकारहीन, स्वानन्दस्वरूप अनावाषेऽविकारे स्वे सुखे परमपावने । और परम पवित्र है उस पशन लिये त सङ्कपोषशमे यत्न परुषेण परं छुछ॥५१॥ | पुरुषाथपूवक पूण प्रयत्न कर ॥५१॥ हे अनघ ! ये जितने भाव-पदाथ हैं वे सत्र संकल्पे तागेमें पिरोये हुए हैं; सङ्कट्पतन्ता वाखला भावा! प्राता? किलानघ | | जिस समय वह ताया ट्ट जाता है उस समव पता हिले तन्तं न जानीमः छ यान्ति विभवाः परा! || | भी नहीं चलता कि संसारके ये परम वेमव कहाँ चले निःसडुल्पो यथागनापतव्यवहारपरो भव | | जाति ¦ ॥ ५४ ॥ अतः संकल्प-विकल्पकों छोड़कर ग्रारव्ब-प्रवाहस प्रात इए व्यवहारम तत्पर रह । क्य सङ्कर्पजालस्य जीवी बहाच्यप्ा | त्माप्वुयात ॥५५॥ संकल्पजालके क्षीण हो जानेपर जीवको ब्रह्मत्व आह-4 <विंगतपरमाथतायुपेत्य ' हो जाता है ॥ ५५ ॥ परमार्थज्ञानसे. सम्पन्न होकर “- ८= ` पेमेमपास्य िकरपजञालमुचे 1. ' तू हृठपूर्वक सम्पूर्ण बिकल्पजालकों -त्याग.दे ओर पृण धिंगसय पृढ्न्तदद्वितीयं ___ | आनन्दकी प्रातिके छिये चित्तवृत्तिको हीन करके उस वितततुखाय सदुप्तचित्तवृत्ति! ॥५३॥ | अद्वितीय पदको प्राप्त कर छे ॥ ५६ || ae Fx gv pM इति श्रोमदथ्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे षष्ठः समः ॥६॥ Aes. । भगवान्‌ रामके यज्ञमें कुश और लळवका गान, सीताजीका पृथित्री-प्रवेश, रामचन्द्रजीका माताको उपदेश । ' श्रीमहादेव उवाच श्रीमहादेबजी बोले--हे पावेति ! वाल्मीकि मुनि- उ्मीकिना बोधितोष्सो कुश! सद्योगतभ्रमः । | कै स रकार समझानेपर तुरन्त ही कुदका सारा श्रम 0-2 8. 8 जाता रहा और वह अपने अन्तःकरणसे मुक्त होकर त्त भुक्ता 2 $ सवंमनु व्‌ कै w ~ ~ बका वाहू कुवेथचार सः १॥ | हरते सम्पूर्ण क्रिया करते हुए विचरने छगा॥ १॥ लमीकिरपि ता माह सीतापुत्रो महाधियौ । तत्र वाल्मीकिजीने जहाँ-तहाँ नगरकी गलियोंमें सब म तत्र च गायन्तो पुरे वीथिपु स्तः | २ ॥ | ओर गाते हुए उन दोनों महाबुद्धिमान्‌ सौता-पुत्रोसे माग्न प्रगायेतां शुशूपर्यदि राघव! | | २ ॥ यदि महाराज रामकी छुनने- र वं युवाभ्यां तच्चदि किशित्मदास्यति ॥३॥ कछ देने हि ते ठेला स ग ग न ति ता चादिती तत्र गायमानो विचेरतुः । मनिकी ऐसी आज्ञा होनेपर वे गाते हुए विचरने छगे। भक्त ऋषिणा प्‌ तन वत्रास्ययायताय्‌ १ ४॥ ऋपिने जहाँ-नहाँ गाने करनेको पहले कहा था' उन्हीं- स श॒थाद काहस्थः पच्या ततस्ततः। | उ सायर उन्होने गान किया । तव ककुत्थनन्दून जे रघुनाथजीने जहाँ-तहाँ अपने पूबे-चरिञ्रके , गाये पूर्वपाठजाचि च गेयेन समभिप्छुताम्‌ ॥ ५ ॥ | जानेका समाचार सुता । भगवान्‌ रामको यह (लयो राघवः कत्या कोतृहलमुपेयिवात । | सुनकर कि, उन बाढकोंकी गान-विधि निराळे ही भर कमोन्तरे राजा समाहूय महामुनीन्‌॥६॥ | ढंगकी और खर-ताल-सम्पत्न है, बड़ा ही कुदळ हुआ जैव नरच्याच्रा पण्डिताय अतः नरशादरू महाराज रामने यज्ञकमंके चिश्राम- मधान चरल्याव पाण्डताश्चव चगसाच्‌ । समयमे सम्पूर्ण सुनीयरों, राजाओं, पण्डितों, झां पराणिकान झब्दविदों ये च बड़ा दिजातय। ॥|७॥ | पोराणिको, शब्दशाद्ियों, बड-वूढों और द्विज्ञातियोको तान्तर्यान्सिमाहूय आयको समवेशयत्‌ । | इडाया ॥ 9-७ | इन सबको घुळा चुकनेपर उन्होंने ` "न - व गानेवाळे बाळकोंको घुळाया । वे सब राजा और (खन हृष्टमतला राजाना ब्राह्मणादयः ॥ ८ ब्राह्मण आदि ग्रसन्न-चित्तसे महाराज राम, और उन गने तो दारको दृष्टा विस्मिता ह्निमेपणा!! | दोनों बालकोंको देखकर आश्चर्यचकित हो गये और ६ ०० : उनकी टकटकी बँध गयी | , रोचन सर्द एव परस्परमथायताः॥ ९॥ | ने 00 मी रागस्य सदश विस्माहिस्वमियोदितों। _ से प्रकट हुए प्रतिबिग्बके समान, श्रीरामचन्द्रजीके समान | | डी दिखायी. देते हैं | यदि ये जटाजूट और 'वल्कंठ | धारण किये न होते तो इनमें और रघुनाथजीमें कोई ' विशेष नाधिगस्‍्छागों राघवस्पानयोसदा। . करा हीन ना. सता |! इस पका जब बे रसा नां विस्मितानं ¦ सब लोग आश्चर्यचकित होकर आपसमें विवाद क एई संवदतां तपा विश्मितानों परससय। ।१९॥ रे वे उन दोनों मुनिकमारोनि नेकी तैयारी की और उपचक्रग॒तुर्गातु ताबुभी युनिदारका । । (कुछ ही देरमें ) वहाँ अत्यन्त मधुर एबं अलोकिक ततः प्रवर्ण मधुर गान्धममतिमाञ्चपम्‌ ॥१२॥ | गान होने लगा ॥ १०--१२॥ | नोन ~ + ~ बे जटिलो यदि न स्यातां न च पस्कलधारिणा॥।१०। अध्यात्मरामायण ” [ सग.७ SSS = त्वा तन्मधुरं गीतमपराह्ने रघूत्तमः । ब मधुर गान सुनकर श्रीरघुनाथजीने दिन ढठने- है ५ ५ | पर भरतजीसे कहा--- इन्हें दश सहस सुवर्ण-मुद्रा दो” उवाच भरतं चाभ्यां दीयतामझुतं वद ॥१२॥ | १३ । न्तु उन वाठकोंने उस दिये इ सर्को दीयमानं सुवर्णं तु न तजगृहतुस्तदा । ग्रहण न किया । वे ऐसा कहकर कि है राजन्‌! क्विमनेन सुवर्णन राजब्ों वन्यभोजनौ ॥१४1 | हम तो वनके कन्द-मूल-फलादि खानेवाले हैं, हम यह । द्रव्य लेकर कया करेंगे! उस दिये हुए सुबर्णकी वही 6 Oe ति सन्त्यज्य सन्दत्त | य इत सन्त्यज्य स जम्मतुनिसचिविम्‌ | छोड़कर मुनिके निकट चळे आये | इस प्रकार भगवान्‌ एवं भ्र॒त्वा तु चरितं रामः खस्येव विखितः ॥१५॥ | राम अपना ही चरित्र नकर विसित हो गये ॥ १४- ज्ञात्वा सीताकुमारों तौ शत्रुधं चेदमत्रवीत्‌। | १५॥ और उन्हें सीताजीके पुत्र जानकर झनुत्न, : जेण च विभी | सुपेण, विभीषण और अंगदादिसे कहा-- हः वेभीपणमथाङ्गदस्‌ ॥१६॥ | | 7 छ । > मन्तं सुपेणं च बिभीषणमथाङ्गदस्‌ ' | १६॥ “देवतुल्य महाजुभाव मुनिश्रेष्ट भगवान्‌ मगवन्तं महात्मानं वाल्मीकि युनिसत्तमस्‌ । | श्रोबाल्मीकि मुनिको सीताजीके सहित छाओ ॥ १७॥ आवयध्यं धुनिवरं ससीतं देवसम्मितस्‌॥१७॥ | इस समामें जानकीजी सबको विश्वास करानेकें छिये अस्यास्तु पर्षदों मध्ये प्रत्यय जनकात्मजा । , शपथ करें, जिससे सव लोग साताको निष्कलंक है १ 6 जान जाये ।” भगवान्‌ रामके ये चचन सुनकर करोतु शर्थ सर्वे जानन्तु गतकसमपाम्‌ ॥१८॥ , उनके वे सतर दूत अति आश्चर्यचक्रित हो सीतां तदच शरुत्वा गता! स्वेऽतिविस्मिताः। | बाल्मीकिजीके पास गये और जैसा श्रोरामचन्दजीने उचुर्यथोक्तं रामेण वाल्मीकि रामपार्षदाः ॥१९॥ | कहा था वह सत्र उनसे कह दिया ॥ १८-१९ ॥ रामस्य हतं सर्व ज्ञात्या बाल्मीकिजवीत्‌ ` इससे भगवान्‌ रामका आशय जानकर श्रीवात्मौकिजीने RR 1. , ; कहा-“सीताजी कछ जनसाधारणमें शपथ करेंगी श्वः करिष्यति वे सीता शपर्थं जनसंसदि ॥२०॥ ,॥ २० ॥ इसमे सन्देह नहीं, सियोके लिये सबसे बड़ा योषितां परमं देवं पतिरेष न संशयः। ` देव पति ही है ।” मुनिके ये वचन सुनकर उन तच्छुत्वा सहसा गत्या सर्वे प्रोबुदुनेवचः ॥२१॥| सवने सहसा जाकर वे सत्र बातें रघुनाथजीसे कह रायवस्यापि रामोऽपि शुत्वा जुनिवचथा। £| पत शरामचनद्रीने मुनिका सन्देश सुनकर जानो कं ~ , कहा--“हे नृपतिगण और मनिजन ! अब राजानो मुनयः सर्वे शृणुध्वमिति चाब्रवीत ॥२२॥ त्या डे यु व॥२२ , आप सब लोग सीताजीकी शपथ सुनें; और उससे सीतायाः शपथ लोका बिजानन्तु शुभाशुभस्‌ । । उनका श्रुमादयुम जान छे ।” इस्ुक्ता राघवेणाथ लोकाः सर्वे दिइक्षवः ॥२३॥ : भगवान्‌ रामके इस प्रकार कहनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, य महर्षि माझाः त्रिया वैश्यः शूद्वाबैव मह्यः । | ^ शह, महर्षि और वानर आदि सभी लोग कुतहल- वश सीताजीकी शपथ देखनेके लिये आये।| २१- हक ~ वरस्त्‌ः [$ ~ ह. मुनी३बर ततो थुनिषरस्तू्णे ससीतः सञ्चपागमत्‌ । भी आये । श्रीसीताजीने वाल्मीकि मुनिको आगे कर अग्रतस्तमरषि कृत्वा5ध्यान्ती किश्चिदवाड्युखी २५ ( उनके पीछे-पीछे) मुख कुछ नीचेको किये कृताञ्जलिबाष्पकण्डा सीता यज्ञं वि हाथ जोड़े गद्गद-कण्ठसे यज्ञराछामें प्रवेश किया | कै विवेश ता ब्रह्माजीके पीछे आती हुई लक्ष्मीजीके समान दृष्टा लक्यीमिवायान्ती बल्लाणमसुयायिनीस]।२६॥ सोताजीको बाल्मीकि . मनिके पीछे आती सर्ग ७] उत्तरकाण्ड ३६७ पार्मीकेः पृष्ठतः सीता साधुवादो महानभूत्‌ । | देख उस जन-समाजमें बड़ा भारी साधुवाद ( धन्य तदा मध्ये जनौघस्य प्रविस्य मुनिषुद्धच) ॥२७॥ है, धन्य है-ऐसा शब्द ) होने लगा । तब सीताजीके सहित सुनिश्रष्ठ वाल्मीकिने उस जन-समूहमें घुसकर श्रीरघुनाथजीसे कहा--“हे दशरथनन्दन ! इस पतित्रता ईय दाशरथे सीता सुत्रता धर्मचारिणी ॥२८॥ | धर्मपरायणा निष्कलंक्रा सीताको तुमने कुछ समय हुआ ता ते पुरा त्यक्ता ममाश्रमसमीपतः | Fb डरकर भयंकर वनमें मेरे आश्रमके पास | छोड़ दिया था || २५--२९ || अब वह अपना विश्वास लाकापताइ a शातय त्यया राम महावने ॥२९॥ | देना चाहती है, आप उसे आज्ञा दीजिये । ये दोनों प्रत्ययं दास्यते सीता तद्शुज्ञातुमहसि । ( कुदा और छव ) सीताके एक साथ उत्पन्न हुए पुत्र इमो तु सीतातनयाविभौ यमलजातको ॥३०॥ | हैं ॥ ३०॥ मैं सच कहता हूँ, ये दोनों दुर्ज़ब-बीर | आपहीकी सन्तान हैं । हे राघव ! मैं प्रजापति ग्रचेता- सुतो तु तब दुर्धपो तथ्यमेतह्रबीमि ते। ¦ न दा पत्र हं ॥ ३१॥ मैंने कमी मिथ्या भाषण प्रचेततयोव्हं दशमः पुत्रो रघुकुलोहनह ॥३१॥ किया हो-ऐसा मुझे स्मरण नहीं है; बही मैं आपसे कहता हूँ कि ये बालक आपढीके पुत्र हैं । मैंने अनेकों अवृत न खराम्युक्त यथेसो तव | र्‌ 3 थिमौ त त्को वर्षेतक खब तपस्या की है ॥३२॥ यदि इस मिथिलेश- बहुत्वपगणासू सस्यक्तपश्चया मया कृता | ३ २ | | कुमारीमें कोई दोष हो तो मुझ उस तपस्याका कोई नोपाश्रीयां फं तस्या दुऐय यदि मैथिली । फ न मिले !” वाल्याकिनेवसुक्तस्तु राघवः गत्यमापत ॥२२॥ वाल्मीकिजीके इस प्रकार कहनेपर श्रीरघुनाथजी तन्या बोळे--| ३३ ॥ “हे महाप्राज्ञ ! हे सुत्रत ! आप जैसा एयभतन्पदा्राह यथा वदासि हुव्रत । कहते हैं, बात ऐसी ही है । आपके निर्दोष वाक्‍्योंसे CoE सीतासहाथो वार्मीकिरिति प्राह च राघवम्‌ । प्रत्ययो जनितो मह्यं तय वाक्येरकिल्बिषेः ॥३४॥ ! ही सके तो पूर्ण विश्‍वास हो गया || १४॥ जानकी- . LL _ जीने लंकाम भी देवताओंके सामने बड़ी विकट परीक्षा लक्षायामापे दत्तो म बंदह्या अत्यया महान्‌ । । दी थी, इसीलिये मैंने-उन्हें अपने घरमें रख लिया था दवाना पुरतस्वत सान्द्र सस्म्रवाश्चता ॥२५॥ | ॥ ३५॥ किन्तु हे ब्रह्मन्‌ | उन्हीं संती सीताजीको पेय लोकमयाहरलञत्जपापाऽपि सती पुरा। ; सर्वथा निर्दोष होते हुए भी, मैने छोकनिन्दाके भयसे कुछ दिन हुए छोड़ दिया, सो आप मेरा यह अपराध सीता मया परित्यक्ता मवांस्तरक्षन्तुमईति ॥३६॥ | | कुछ दिन हुए छोड़ दिया, सो आप मेरा यह 3 क्षमा करें ॥ ३६॥ मैं यह भी जानता हूँ कि ये दोनों “मब जातौ जानामि पुत्रावेतो कृशीलषौ । ` पुत्र कुश और ख्व मुझहीसे उत्पन्न हुए हैं; संसारमें शुद्धायां जगतीमध्ये सीतायां प्रीतिरस्तु मे ॥३७॥ | परम साध्वी सीतामे मेरी प्रीति हो” ॥ ३७॥ है जीका अभिप्राय जानकर समस्त हद! रामाभिप्रायमुत्सुका! उस समय, राम न देवा! सर्वे परिज्ञाय रासाभिम्रायशुर देवगण अति उत्सुक हो अह्ाजीको आगे कर न्ह्माणमग्रतः कृत्वा समाजग्सुः सहसश' ॥३८॥ । सहखोंकी संख्यामें वहाँ आये | २८ ॥ तथा बहुत-से Da a3 a १ PH SN जोड़कर कहा-- दडी ; प्राज्ञलिवाक्यमञ्रचीत्‌। ३९॥ नेत्र किये खड़ी हुई श्रीसीताजीने हाथ जोड़ उदड्युखी द्यधोडटि' प्रा त्‌ तः ee ३६८ | अध्यात्मरामायण 3०७ न) के कक क बट चुत जन कल क पट ऊन क पेन आ बेट का बट कट क कल आक मेल का ७९ दल ६ पटक पड कर क ७० ल पक के "क कक २८००-४८ ८. ४८ ४८९ ४० २ > ७०७७ ७८० ७, ७७ ७७ ७९ ७० ७० से टही का फटीफ के थे ५ ये क ७८ पक का ५० पड ७ ० ७११५ ४ कक फेकला अत पल बनी य्यम | = १॥ ३९ ॥ “यदि मैं भगवान्‌ रामके अतिरिक्त अन्य . ५.५७ - , ७... ,.. , “पुरुषका मनसे भी चिन्तन नहीं करती तो प्रथ्िवीदेवी तथा मे घरणा देवा विवर दातुमहाते ४०1 ! मुझे आश्रय दें? ॥ ४०॥ । च तथा शपन्त्याः सीतायाः आदुरासीन्महाद्भु तम्‌ । | श्रीसीताजीके इस प्रकार शपथ करते ही भूमितळसे भूतलादिव्यमत्यथ॑ सिंद्दासनमधुत्तमम्‌ ॥४१॥ | एक अति अङ्क] परम दिव्य और raid TN ` | सिंहासन प्रकट हुआ ॥ ४१ ॥ उस सूर्यके he नागेन्द्रै्रियमाणं च दिव्यदेह रविग्रभम्‌ । तेजस्वी सिंहासनको दिव्यशरीरधारी नागराजोंनि भूदेवी जानकी दो म्या गृहीत्वा खेहसंयुता ॥४२॥ | धारण किया हुआ था । तब पृथिवीदेवीने जानकोजीको \ खागतं ताञ्ुवाचेनामासने संन्यवेशयत्‌ । | अपनी दोनों भुजाओंसे प्रेमपूर्वक अहण कर उनका सिंहासनखां वेदेही प्रविशन्तीं रसातलम्‌ ॥४१॥ | „१ किया और उन्हे नपर विठा लिया । नन हि बशा है श्रीसीताजी सिंहासनपर बेठकर रसातलको जानें लगीं निरन्तरा पुष्पवृश्टिदिव्या सीतामवाकिरत्‌ । | तो उनपर दिव्य पुष्पोंकी निरन्तर वर्षा होने लगी और साधुवादश सुमहान्‌ देवानां परमादूशुतः ॥४४॥ | देवताओंके मुखसे साधुवादंका अति अद्भुत और महान्‌ ऊश्च बहुधा वाचो हन्तरिक्षणवा! सुरा! । व्या होने ल्गा बे ४२--४४ ॥ आकाशे स्थित न्ति ग नाना प्रकारके वचन बोलने लगे | सीताजीके रिक्ष च धूमा च सर्वे खावरजङ्गमाः ॥४५॥ | ज करनेसे आकाश और प्रथिवीतलके समस्त भानराब महाकायाः सीताशपथकारणात्‌। | स्थावर-जंगम प्राणियों और बड़े-बड़े डोख्याठे बानरॉ- केचिचिन्तापरास्तस्य केचिठ्ठयानपरायणा!॥४६॥ मेंसे कोई चिन्ता करने ढगे, कोई ध्यानस्थ हो गये ~ ‘mn ~ [aN hed षु 7 तः थ्‌ गई मजी क ही ओ हई सी f- केचिद्रामं निरीकषन्तः केचित्सीतासचेतसः । | ॥ ४५-४६ ॥ तथा कोई रामजीकी और कोई सीताजी त तत्र तरणं भूतमचे | की ओर देखकर अचेत हो गये । एक मुके लिये सहतेमात्र तत्सव तृष्णीं भ्रूतमचेतनम्‌ ॥४७।॥ | वह सारा समाज समध और चतनायन्य हो गया ४७ | रामादन्यं यथाऽहं वे मनसापि न चिन्तपे । सौतावेशनं टा सर्व सम्मोहितं जगत्‌ । सीताजीका प्ृथिवी-प्रवेश देखकर सारा संसार रामस्तु सव ज्ञात्वेब भविष्यत्कायगौरवस्‌ ॥४८॥ | मोहित हो गया । भगवान्‌ राम आगामी कार्यका सम्पूर्ण अजानब्नित्र दुःखेन शुशोच जनकारमजामू । महत्व जानते थे तथापि अनजानके समान साताजीक्े नहा ऋषिभिः सार्थ बोधितो न्दनः ॥४९॥ |. शक करने छ । तव पियो सहित जहाजीने अतिदुद्ध इव स्वमाचकारानन्तरा! किया; | पोकर उठ है व है Ms उन्होंने विससज क्रपीच्‌ सर्वाचृत्विजो ये समागताः।।५०।। | किया और यज्ञके ऋषि न भेकर जो "ग सात "1१०॥ | विया और चज्ञके ऋत्विक्‌ होकर जो ऋषिगण आये तान्‌ सर्वान्‌ धनरत्ादयेस्तोषयामास भूरिशः। | उन सबको रत्न और धन आदिसे मळी प्रकार सम्तुष्ट- उपादाय ङुमारौ तावयोध्यामगमस्रञचुः ॥५ 4 | ग विदा किया । फिर प्रभु राम उन दोनों कुमारोंको तदादि निःस्पृहो रामः सर्वभोगेषु सर्वदा । साथ लेकर अयोध्यापुरीमें आये ॥ ५०-५१ || तत्रसे आत्मचिन्तापरो नित्यमेकान्ते सशुपस्थितः।५२॥। मालकिन करते डर पका र ने by ततन क्‌ कान्तं रहने छगे || ५२ || एकान्ते ध्याननिरते एकदा राधे सति । न बार | कदा राघवे सति एक दिन जब श्रीरघुनाथजी एकान्तमें ६ ता नारायण साक्षात्कोसल्या | भयवादिनी।५३॥ थे, प्रियमाषिणी श्रीकौसल्याजीने उन्हे साक्षात्‌ नारायण सर्य७] उत्तरकाण्ड a oS भकत्याऽऽगत्य प्रसन्न तं प्रणता पराह हृष्टधीः । राम त्वं जगतामादिरादिमध्यान्तवितः ॥५४॥ परमात्मा परानन्दः पूर्णः पुरुप इश्वर! । जातोडसि मे गर्भगृहे मम पुण्यातिरेकतः ॥५५॥ *बताने समाप्यद्य समयो&भूदधूत्तम । गायाप्यवोधजः कुत्खो भचवन्धो निवतेते ॥५६॥ दानीसपि मे ज्ञानं भवयन्धनिवर्तकम्‌ । यथा सङ्केपतो भूयाचथा बोधय मां बिभो ॥५७॥ निर्वेदवादिनीमेयं मातरं मातृवत्सलः । दयाङः प्राह धमोत्मा जराजजेरितां शुमाम्‌।५८॥ यार्गास्रयो सया ग्रोक्ता। पुरा मोक्षाप्िसाधकाः। कमेग्रोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च शाश्रत॥५९॥ भक्तिविमिधते मातस्मिविधा गुणभेदतः । स्वभावो यस्य यस्तेन तस्य मक्तिविभिद्यते ॥६०॥ यस्तु हिंसां समुद्श्य दम्भं सात्सर्यमेव वा । भेद्रष्टिथ संरम्भी मत्तो मे तामसः स्पृतः॥६१॥ फूलामिसन्धिमाँगाथी घनकामो यशस्तथा । अर्चादा भेदबुद्ध्या मां पूजयेरस तु राजस।६२॥ ' प्रसि्नपित यस्तु कमेनिहरणाय वा । कर्वच्यमिति वा कु्याद्केदवुद्धया स सात्विक! ६३) मद्वणाश्रयणादेव मस्यनन्तगुणालये । अविच्छिन्ना मनो वृत्तिर्या गङ्गाम्बुनोऽम्बुधो । . तदेन भक्तियोगस्य रक्षणं निर्शुणस हि ॥६४॥ अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिमौयि जायते । जानकर अति भक्तिमाबसे उनके पास आ उन्हें प्रसन्न; जान अति हर्षसे विनयपूर्वेक कहा-“हे राम | तुम संसारके आदिकारण हो, तथा स्वयं आदि, अन्त और मध्यसे रहित हो ॥ ५३-५४ || तुम परमातमा; परानन्द्स्वरूप, सर्वत्र पूर्ण, जीवरूपसे शरीररूप पुरें शयन करनेवाले और सबके स्वामी हो; मेरे प्रबळ पुण्यके '| उदय होनेसे ही तुमने मेरे गर्मसे जन्म लिया है ॥५५॥ हे रघुश्रेष्ठ ! अब अन्त-समयमें मुझे आज ही (आपसे कुछ पूछनेका ) समय सिला है, अभीतक मेरा अज्ञानजन्य संसार-बन्धन पूर्णतया नहीं टूटा ॥ ५६॥ हे. विभो!! मुझे संक्षेपमें कोई ऐसा उपदेश दीजिये जिससे अब भी. मुझे भववन्धनका काटनेवाळा ज्ञान हो जाय” ॥५७॥ माताके इस प्रकार वैराग्यपूर्ण बचन कहनेपर मातृ- भक्त, दयामय, धर्मपरायण भगवान्‌ रामने जराजर्जरिंत झुभळक्षणा कौसल्याजीसे कहा-॥| ५८ ॥ “ मैंने. पूर्वे- कामें मोक्षप्रा्तिके साधनरूप तीन मागे बतलाये हैं--कर्मयोग, ज्ञानयोग और सनातन भक्तियोग ॥ ५९ || हे मातः ! ( साधकके ) गुणानुसार भक्तिके तीन मेद हैं । जिसका जैसा स्वभाव होता है उसकी भक्ति भी वैसे ही भेदवाळी होती है ॥ ६०॥ जो: पुरुष हिंसा, दम्भ या मात्सर्यके उद्देशयसे भक्ति करता हे, तथा जो भेद्दष्टिवाला और क्रोधी होता है. वह तामस भक्त कहा गया है ॥ ६१ ॥ जो. फल्की इच्छाचाळा, भोग चाहनेबाला तथा धन और यशकी कामनावाळा होता है और भेदबुद्धिसे प्रतिमा आदिमें मेरी पूजा करता है वह रजोगुणी होता हैं ॥ ६२ ॥ तथा जो पुरुष परमात्माको अर्पण. किये हुए कर्म-सम्पादन करनेके लिये अथवा करना. चाहिये इसलिये मेदबुद्विसे कर्म करता है वह सात्त्विक है ॥ ६३ ॥ जिस प्रकार गंगाजीका जळ समुद्रमें अविच्छिन्नः. भावते छीन रहता है उसी प्रकार मनोवृत्तिकामेरे गुणो के आश्रयसे मुझ अनन्त. युणधाममें निरन्तर लीनः हों जाना ही मेरे निर्गुण 'भक्तियोगका लक्षण. है. ६४॥ मेरे प्रति जो निष्काम और अखण्ड भक्ति उत्पन्न होती है. अध्यात्मरामायण [ सगे ७ सा में सालोक्यसामीष्यसाशिसायुज्यमेव वा ॥६५॥ पको साद ते इमाम दृदात्यपि न ग्रहत्ति सक्ता मत्सेवन विना । | ६ पत्तजन मेरी सेवाके अतिरिक्त और कुछ ग्रहण नहीं 5 एवान्तको योगो भक्तिमार्गस्य मामिनि ६६ | करते । हे गातः ! भक्तिमा्गका आत्यन्तिक योग मही * है है ॥ ६५-६६ ॥ इसके द्वारा भक्त तीनों गुणोंको पार सङ्कावं प्राप्ठुयाचेन अतिक्रम्य शुणत्रथस्‌॥६ | „=. हो रूप हो जाता है ॥ ६७॥ सहता कामहीनेन खधर्माचरणेन च । | (अब इस निगुण गतिका सात बम कर्मयोगेन शेन पर्जितेन विहि अपने धर्मका अत्यन्त निष्क र चर प श्न वी दसन | नरे अत्युत्तम हिंसाहीन कर्म-योगसे, मेरे दर्शन, महर्शनस्तुतिमहापूजाभिः स्पृतिवन्दनेः 1६८) दुत, महापूजा, स्मरण और वन्दनसे ॥६८॥ प्राणियों- सूतेषु मद्भावनया सल्लेबासलवर्जने! । | में मेरी भावना करनेसे, असतयके जण कर सत्सप़से, च + सरि ! महापुरुपांका अत्यन्त मान करनेसे, दूःखिर्यापर दया वुलन oy ६ उता UR | करनेसे ॥६९॥ अपने समान परुषेसि तरी करनेसे खतमानेषु येत्या च यमादीनां निपेषया। ' यम-नियमादिका सेवन करनेसे, वेदान्तबाक्योंका वेदान्ववाक्यश्रवणान्मम नामालुकीतनात्‌ ॥७०॥| | अनण करनेसे, मेरा नाम-सद्वीतेन करनेसे ॥७०॥ व ५ ' सत्सङ्ग और कोमलतासे, अहझ्ारका त्याग करनेसे सत्सङ्गेनाजवेणेच ह्यहमः परिवजनातू। , और मेरे मागवत-धर्मोकी इच्छा करनेसे जिसका चित्त काडया मम धर्मस्य परिशुद्धान्तरो जनः ॥७१॥ | झद्ध हो गया है, वह पुरुष मेरे गुर्णोका श्रवण _ करनेसे ही अति सुगमतासे मुझे प्राप्त कर छेता है महुण भवणादेव याति मामझसा जनः ॥७२॥ | ॥७१-७२॥ जिस प्रकार वायुके द्वारा गन्ध अपने यथा वायुवशाइन्घः खाश्रयादूघाणमािशेत्‌ । । आश्रयको छोड़कर प्राणेन्दियमे प्रविष्ट होता है उसी प्रकार योगाभ्यासमें लगा हुआ चित्त आत्मामं डीन हो जाता है । समस्त प्राणियोंमें आत्मारूपसे में ही सर्वेधु ग्रागिजातेचु ह्ृहमात्सा व्यवस्थितः [७३॥ | खित हुँ ॥७३॥ हे मातः ! उसे न जानकर मूह- तमज्ञात्या विसूढात्मा कुरते केवल बहिशः। | ९१ ^ तो दै, किन्तु कियासे उत्पन हुए करोते है अनेक पदाथसि भो मेरा सन्तोप नहीं होता | ७४॥ त्यबैनेंकभेदेर्रव्यैंसें चाम्ब तोषणम्‌ ॥॥७४॥ | अन्य जीवोंका तिरस्कार करनेवाले प्राणियोंसे प्रतिमामें भूतावमानिनाअर्चायामचितोज न पूजित 1७५ | जित दोकर भी मे बालवे पूजित नहीं होता. , __ 6. 1 ५. 1७५॥ मुझ परमात्मदेवका अपने कर्षोद्रारा प्रतिमा तावन्मामचेयहव प्रातमादा खकमाभे! | | आदिमे तमीतक पूजन करना चाहिये जबतक कि यावत्सु भूतेश खितं चात्मनि न स्मरेत्‌ ॥७६॥ | समस्त आणियेमि और अपने आपपमें मुझे सित न यस्तु भेदं रुते खात्मनथ परख च! जाने ॥७६)॥ जो अपने आत्मा और परमात्मामें भेद- मिरदेपय मर 6. बुद्धि करता है उस भेददशीको मृत्यु अवइय भय मिञ्ञद्टभय मृत्युसतस्य कुर्यान्न संशय) ॥७७॥ | उत्पन्न करती ¬= सल इयान संशय! ॥७७॥ | उसल करती है, इसमें सन्देह नहीं ॥७७॥ इस इसमें सन्देह नहीं ॥७७॥ इस- | उत्पन्न करती छ, इसमे सन्देह नहीं ॥७७॥ इस- >. # बेकुण्ठादि भगवाने होकॉको प्रास करना 'सालोक्य! सुक्तिहै। हर समय भगवानहीके निकट रहना 'साभीप्य' है, भगवानके समान ऐश्वर्य लाभ करना 'साश्‍िँ' है और भगवाजूर्मे छीन हो जाना “सायुज्य? है । योगाभ्यासरतं चित्तमेवमात्मानमाविशेत्‌ । IRR oreo ४४१४४५४ ८ ४१७ uuvvevelLCS NS मामतः सर्वभूतेषु परिच्छिन्रेष संखितम्‌ । एकं ज्ञानेन मानेन मैत्र्या चार्चेदमिन्नधी॥७८॥ चेतसेवानिशं सर्वभूतानि प्रणमेत्सुधीः । जञात्वा मां चेतनं शुद्धं जीवरूपेण संखितम्‌ ।७९॥ - तस्मास्कदाचिन्नेसेत भेदमीश्वरजीवयो} । |िक्तयोगो ज्ञानयोगो मया मातरुदीरितः ॥८०॥ ` आलरूयेकतरं वापि पुरुपः शुभमृच्छति। ततो मां भक्तियोगेन मातः सर्वहुदि स्थितम्‌ । पुत्ररूपेण वा नित्यं स्मृत्या शान्तिमवाप्सयसि!!८१॥ शृत्वा रामख वचनं कोसल्या55नन्दसंयुता ॥८२॥ राम सदा हृदि ध्यात्वा छिखा संसारबन्धनम्‌ | अतिक्रम्य गतीलिस्रोऽप्यवाप परमां गतिम्‌ ॥८३॥ केकेयी चापि योगं रधुपतिगादितं ूर्वमेवाधिगम्य श्रद्धामक्तिप्रशान्ता हृदि रघुतिलक भावयन्ती गतासु? | गर्या खगं स्फुरन्ती दशरथसहिता मोदमानावतस्ये माता श्रीलह्षमणस्याप्यतिविमलमतिः . उत्तरकाण्ड . लिये अभेददर्शी भक्त समस्त परिच्छिन्न प्राणियोमें खित मुझ एकमात्र परमात्माका ज्ञान, मान और मैत्री आदिसे पूजन करे ॥७८॥ इस प्रकार मुझ शुद्ध चेतनको ही जीवरूपसे स्थित जानकर बुद्धिमान पुरुष अहर्निश सब प्राणियोंको चित्तसे ही प्रणाम करे ॥७९॥ इस- लिये जीव और ईश्वरका भेद कमी न देखे । हे मातः | मैंने तुमसे यह भक्तियोग और ज्ञानयोगका वर्णन किया ॥८०॥ इनमेसे एकका भी अवळम्बन करनेसे पुरुष आत्यन्तिक शुभ प्राप्त कर लेता है । अतः हे मातः | मुझे सब ग्राणियोंके अन्तःकरणमे ' स्थित जानते हुए अथवा पुत्ररूपसे मक्तियोगके द्वारा नित्यप्रति स्मरण करते रहनेसे तुम शान्ति ग्राप्त करोगी” ॥८१॥ भगवान्‌ रामके ये वचन सुनकर कोसल्याजी आनन्दसे भर गयीं ॥८२॥ और हृदयमें निरन्तर श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान करती हुई संसार-बन्धनको काटकर (जाग्रत्‌, खम और सुषुप्ति) तीनों प्रकार- की अवस्थाओको पारकर परम गतिको प्राप्त हुई ॥८३॥ कैकेयीने भी रघुनाथजीद्वारा पहले (चित्रकूट पर्वतपर) कहे इए योगको हृदयंगम करं श्रद्धा और भक्ति-भावसे शान्तिपूर्वक हृदयमें रघुकुलतिळक भगवान्‌ रामका ध्यान करते हुए प्राणत्याग किया और ' स्वगे- लोकमें जाकर दशरथजीके साथ सुशोभित हो आनन्दपूर्वक रहने लगी | इसी प्रकार श्रोलक्ष्मणजीकी माता अत्यन्त विमछ बुद्धिवाली सुमित्राने मी अपने प्राप भतुः समीपस्‌ ॥८४॥ | पतिका सामीप्य प्रात किया ॥ ८४॥' ADRESS इति श्रीमदध्यात्मरामायणें उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे सप्तमः सगेः ॥७॥ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ८ ३७९ si mrp 11५ २००४ ster mae ais rnne १.०० ४११९ शात 7 टली २22५0०५०४४ - र menemmnetm en TTT ७४४४०४७४४४ अष्टम सर्ग काळका आगमन, छक्ष्मणजीका परित्याग आर उनका रुवगगमन | श्रीमहादेव उवाच श्रीमटादेयजी थोडे-हे पावरति ! कुछ काढ ~ तरीतनेपर उम्रपराक्रमी भरती अपने मामा युधाजित- अथ काहे ते किद्‌ मरतो मीमविक्रमः ढं द्वारा बुलाय जानपर भगवान शामका आजा टकर युधाजिता मातुठेन ह्याहूतोगात्ससैनिकः ॥ १॥ | सेनासदित उनके यहा गये। कहाँ चकर रघु रामाज्ञया गतसत्र हत्वा गन्धर्षनायकान्‌ । नन्दन भरताने तीन पे मर गन्धर्वा गी ल कर दो नगर बसाये ॥१-२॥ उनगस पष्करावनांग तिसः कोटीः पुरे ढे ठु निवेश्य रघुनन्दनः ॥ २ ॥ गर न शिया तत नामक अपने दो पुष्कर पुष्करावत्यां तक्ष तक्षशिलाहये । पत्रको अभिपिक्त कर भो न-शान्य नथा मित्र अभिषिच्य सुतौ तत्र धनधान्यसुहुदूधृती ॥ हे ॥ | मण्डरसे सम्पन्न वार घे लोट आगे और भगवान राग- पुनरागत्य भरतो रामसेवापरोऽभवत्‌ । | भग तयर धा गग | त दुमधा रा = € on रीतो रेष्ठ , होकर आदरपृयवा सब्मगजोंस करान्नदिन्शा "६ $ क्ष्मण ४॥। 5 -_ ततः श्रीतो रघु लक्ष्मण ग्राह सादरम्‌ ॥ ४ । | सुमित्रानन्दन ! तुम अपने दाना दुगाराळी अकर उभौ कुमारो सौमित्र गृहीत्वा पश्चिमां दिशम्‌ | | पथचिम दिशा जाओ और मो सबका अपार DN दाण पन याम os I ८६ करनाल दुष्ट मंदिका अतिपर दानि म द त्त्र भि्ठान्विनिजित्य दाव संबोपकारिग!|५॥) | न बताओ और उन गटाइलयाम और परारी अङ्गदाित्रफतुश्च सहासल्पराक्रमां | + अठद द तया चित्रमेलुका हाथां, भः , ~ र रत्नादि दयो नगरे कृत्वा गजाश्रधनरलके। || ६॥ | उपकरगोसे राजतिलक् कर दिर तरत हॉ में? पान अभिषिच्य सुती तत्र शीघ्रमागच्छ मां पुन! लेट आशा |! भगवान रानी इस आशवो शिरॉ- रामस्याज्ञां पुरस्कृत्य गजाश्रवठवाहनः ॥ ७॥ | "1 "९ ० जी दासो आदि दळ-बले सहित | गये ओर सगल रवूर्भाकी नारकर दोनों कुमर शत्वा हत्वा रिपून्‌ सवान्‌ खापयित्वा झुमारफो । को राजपदपर निगुरा कर लोट शाव तथा दिर राग- सामाब्रः पुनरागत्य रामसेवापरोऽभवत्‌ ॥ < ॥ | सवाम चपर हा गय ॥०-८॥| ततस्तु कारे महति प्रयाते तदनन्तर बहुत-ता काल व्यतीत होनिपर सदा धर्म- Ly “क क र समाग वधार सित हारम ! मागेका अवलम्बत करनेवाले भगवान्‌ रामका दान वारे समागादपवेपधारी लिये ऋषिबेष धारण कर काळ आया और रकण कालतो दक्ष्मणमित्युवाच ॥ ९॥ निवेदयखातिबलस्य दूतं मां द्रष्टुकामं पुरुषोत्तमाय। रामाय विज्ञापनमस्ति तस्य महर्षियुर्यस्य चिराय धीमन्‌ ॥१०॥ वस्य तद्चन श्रुत्या सो सित्रिरत्वरयान्मितः। जास या ब्रोछा-॥%॥ “इ बुद्धिमन्‌ ! तुग परुषोगश | महाराज रामसे निवेदन करो कि महापे अधिवलका | दूत आपके दर्शनकी इच्टासे आया है | मञ्च उन्हें | बहुत देरतक उन मरिष्का सन्देश सुनाना है" । ॥१०॥ उसके ये वचन सुनकर छःमग्जीने तुरन्त है शररिघुनाथजीसे कदा कि 'एक तपोधन आगे है॥ १ श]| आवचक्षेऽथ रामाय स सम्प्राप तपाथनस्‌ ॥११॥| | रक्मणजीके ऐसा कहनेपर श्रीरधुनायजीन उनसे घर + कली लसता ठकषमण्‌ राघवा वचः | फेहा-- भिया, सुनिराजको तुरन्त ही बड़े सत्कार- रणता तात डुलिः सत्कारपूवकर्‌ ॥१२॥ | पूर्वक भीतर 8 आओ” ॥१२॥ र ह , ॥॒ सभ्‌ < | उत्तरकाण्ड । ३७३ S000 20 20a 0 onan a nino rnx PSN लक्ष्मणस्तु तथेत्युकरया प्रावेशयत तापसम्‌ । तब लक्ष्मणजी बहुत अच्छा' कह घृताइतिसे प्रज्वलित ee अग्निके समान अपने तेजसे देदीप्यमान उस खतेजसा ज्वलन्तं तं घृतसिक्तं थथाऽ इर आ यो व त्व च यथाव्नल्यू ॥१२॥ तपस्बीको भीतर छे आये ॥१३। अपनी कान्तिसे सोऽभिगम्य रघुश्रेष्ठ दोप्यमानः खतेजसा । | प्रकाशमान उस सुनिने श्रीरघुनाथजीके पास पहुँचने- ~ ~ A € ९ । मुनिर्मधुरवाक्पेन वर्धस्वेत्याह राघवम्‌ ॥१४॥ | ९ ऽ अति मधुर वारम आपका अन्यद हो इस प्रकार कहा ॥१४॥ तब श्रीरामचन्द्रजीने उस | “स स सुलय रासः पूजा कृत्वा यथापिधि। | मुनिकी विधिपूर्वक पूजा की और फिर शान्त भावसे पृष्टाउनामयमव्यप्रो रामः एशेड्थ तेन सः ॥१५॥॥ | रामचन्दरीने सुनिसे और सुनिने रामचन्द्रजीसे कुदळ पूछो॥ १५) तदनन्तर दिव्यासनपर विराजमान महा- , राज रामने मुनिसे कहा-“आप जिसळिये यहाँ यदथमागतोऽसि त्वामिह तत्प्रापयस्य भे ॥१६॥ | पधारे हैं वह ( सन्देश) मुझसे कहिये” ॥१६॥ वाक्येन चोदितेन रामेणाइ झुनिेचः। | "गाय रामके इस बाक्यसे प्रेरित होकर सुनिने _ इ , कहा--वह बात हम द्रोनोंके बीच ही कही जा इन्द्रमेव प्रयोक्तव्यमनालक्ष्य तु तद्वचः ॥१७॥ | तकती हे और किसीको प्रकटन होनी चाहिये ॥१७॥ नान्येन चेतच्छोतव्यं नाख्यातव्य च कस्यचित। उसे न तो कोई सुने और न वह किसीसे कही जाय । म सा न यदि उसे कोई सुने अथवा देखे तो हे प्रभो! आपको शृणुयाद्वा निरोक्षेद्रा यः स वध्यस्त्वया प्रभो॥ १८] उसे मारना होगा” ॥ १८ ॥ तब रामचन्द्रजीने तथेति च प्रतिज्ञाय रामो लक्ष्मणमन्रवीत्‌। | “बहत अच्छा' कह लक्ष्मणजीसे कहा--/लक्ष्मण ! तुम ~ Se ~ द्वारपर रहो, इस एकान्त स्थानमें मेरे पास कोई न र शमत्र नायास्मत्र १॥१९॥| ` ` *, तिष्ठ खं दवारि स स्र जना रहः ॥ आवे ॥१९॥ यदि यहाँ कोई भी आया तो इसमें सन्देह यद्यागच्छति को वापि स बध्यो मे न संशयः । (| नहीं, वह अबश्य मेरे हाथसे मारा जायगा ।” फिर ततः पराह मुनि रामो येन वा त्रं विसर्जित! ॥२०) | उन्होंने सुनिसे कहा--“तुम्हे जिसने भेजा है और Oe ॥२१॥ तुम्हारे मनमें जो बात है वह सब मुझसे यत्ते सनीपितं वाक्यं तद्वदस्व ममाग्रतः नहो” । २८-२१ ततः प्रह युिर्वाकयं शृणु राम यथातथस्‌।. . | तब सुनिने कहा--“हे रामं | जो वास्तविक .... , _, [बात हैसो सुनिये। हेः ई | हे प्रभो | मुझे 'एक ह्मण प्रेपितोऽसीश काये तेऽनतिकं प्रभो। | कार्यके लिये ब्रह्नाजीने आपके पास भेजा है। दे देव! - जज हि पर्वजो दे १ परन्तपः हे इत्रुदमन ! मैं आपका अ्येष्ठ पुत्र हुँ ॥२२॥ अहे हि पूवेजों देव तव पुत्रः पर दप ॥२२॥ दे साथ आपका स हनेपर है प्रकट हुआ था। मैं सबका नाश करनेवाला हूँ ' सर्वदेवरपिपूजितः ५, | और . कांढ “नामसे - प्रसिंद्रे हूँ । समस्त देवर्षियासे ज्मा त्यामाह भगवान्‌ सर्वेदेवाषपूजतः । 1२२ पूजित, भगवान, माजी . आपके लिये कहा है कि रक्षितु स्वर्गलोकस्य समयस्ते महामते । E मा | अब आपका rs रक्षा करनेका नर टा समय है । पूवकालमं. समस्त लोकोका संहार कर पुरा लमेक एवासीलोकान्‌ संहृत्य मायया ॥२४॥ कस र फिर. भार्यया सहितस्त्यं मामादो पुत्रसजीजन$ । ` ˆ` | आपने अंपनी भार्या मायाके संयोगसे सबसे पहंले अपने दिव्यासने समासीनो रामः ग्रोवाच तापसम्‌। मायासङ्गमजो वीर कालः सर्वहरः स्वतः । _. ३७४ अध्यात्मरामायण ट rrr परोगवतं वे के जलमें शयन करनेवाले अनन्त था मोगवतं नागमनन्तमुद्केशयम्‌ ॥२५॥ | पत्र सुझको तथा जल्म : रि नामक फणधारी शेषनागकी रचा ॥२७॥ इस प्रकार ¢ सस्ती | च * मायया जनयित्वा तवं दो ससच््ौ महाबळो।| | पायासे हमें उत्पन कर आपने महाबली और वडे शूरवीर मधुकेटभको देत्यो हत्वा मेदोऽख्िसञ्चयस्‌॥२६॥ | दो मधुकैठम नामक दैत्योंको मारा तथा उनके मेद और : | मेदिनी ५ अखियोंके समूहरूप इस पर्वेतादिसें युक्त पथिवीर इमां परवेतसम्बद्धां वेदिनीं पुरुषपेम । रचा । हे पुरुषश्रेष्ट ! फिर अपनी नाभिसे प्रकट हुए न्ने दिव्याकंसज्ञाशे नाभ्यामुत्याद्य मामपि॥२७॥ | र्य सर्के समान तेजस्वी कमहसे मुझे उतपन्न कर T यां विधाय ग्रजाध्यक्षं माये सर्व न्यवेदयत्‌। | और सुझे ही प्रजापति बनाकर सृष्टिरचनाका सारा _ चं जगते ॥२८॥ | "र मुझे ही सौंप दिया । हें जगत्पते! इस साऽह सउृक्तसम्भारस्वायवाच जलता प्रकार भार ग्रहण करनेपर में आपसे बोळा-।२६-२८॥ रक्षा विधत्स्व भूतेस्यो ये मे वार्यापहारिणः । | “जो प्राणी मेरे वीर्य (प्रजा) का नाश करनेवाले हैं किक हि वामनरूपधारी विष्णुभगवान्‌ होकर प्रकट इए॥२९॥ हतेवानांद भूभार वधाद्रक्षागणस्य च | ५ हे और राक्षसोंका नाश करके आपने पृथ्वीका भार सबा्तसायसाणाहु प्रजासु धरणाधर ॥३०|| | उतारा । हे धरणीधर ! ( इस समय भी) सारी प्रजा- रावणस्य वधाकाही मर्त्लोकङ्चपागतः। (को उच्छित्त होते देख आप रावणका वध कानके दृशवासहसाणि. दशवशतानि च १॥ ल्यि मतयो पधारे थे । यहाँ रहनेके ल्यि आपने पूवकालमं देवताओंमें ग्यारह सहन वपंका समय कृत्या वासस्य समयं त्रिदशेष्वात्मनः पुरा । | निश्चित किया था, सो आपकी मानव-शरोरको आयु सते मनोरथ! पूर्णः पूर्णे चायुषि ते नृषु ॥३२॥ | पूर्ण होनेके साथ ही आपका वह मनोरथ पूर्ण हो कारस्तापसरुपेण ्समीपशुपागम्‌ । चुका है |३ ०-३२॥ अब, तापसरूपसे काळ आपके ते बद्धियीदि रा पास आया है | यदि अभी आपका विचार कुछ ततो भूयश्च ते बुद्विर्यदि राज्यशुपास्तितुस्‌ ॥३ ३॥ दिन और राज्य करनेका हो तो आपका झुभ हो, तचथा सव भद्रे ते एवसाह पितामह! । वैसा ही कीजिये”-ऐसा पितामह ब्रह्माजीने कहा हैं । यदि ते गमने बुद्धिदेवलोक जिपेन्द्रिय॥३४॥ | दे जितेन्िय | यदि आपका विचार भी देवलोक इनाथा दि चलनेका हो तो ( आप ) विष्णभगवान्‌से सनाथ था विष्णुना देषा भवन्तु विगतञ्चराः | ।३५। | होकर देवगण निश्चिन्त हो जाये” ॥३ ३-३५॥ चतुुखस्य तडक सवा कालेन भावितम्‌ | | कालके सुखसे ब्रहमाजीके ये वचन सुनकर रामजी इ रामस्तदा वाक्यं कत्सस्यान्तकमअवीत्‌ । हसे और सबका अन्त करनेवाले कालसे बोठे--“मैंने श्चुत तव बचो मेज्च समापीष्टतर॑ तु तत्‌ ॥३६॥ तुम्हारी सब बातें सुन ली । घे मुझे भी अत्यन्त सस्तोषः परमो ज्ेयस्लवदागमनकारणाहू। | दै ॥ ३६॥ दुरे आनेके कारण मुझे ह ~ ३ त बडा सन्तोष हुअ है ये अवत नों ठ नोक वयाणामापे ठोकानां कार्याय मम सम्भवः ३७।। कार्य करनेके यि ही घमा करता है १३ 9] कोका ऱ्य [a ल कर्‌ ७॥ तुम्हारा जहे तञस्वायामिष्यामि यत एवाहमागतः। ` | कल्याण हो, अब मैं जहाँसे आया था वहीं फिर सर्ग ¢ ] उत्तरकाण्ड ३७५ ५४४४४५ TS I VN NFPA ANNAN YYW VY Wa wr मनोरथस्तु सम्प्राप्तो नमेऽञास्ति विचारणा॥३८॥| पहुँच आउँगा; मेरा सारा मनोरथ पूर्ण हो गया, इसमें मुझे कुछ विचारना नहीं है॥३८॥ दै पुत्र ! देवगण मेरे सेवक हैं मुझे, जैसा कि त्रह्माजीने कहा है, खातव्यं मायया पुत्र यथा चाह प्रजापतिः ॥३९॥ | गायारे उनके सब कायोमें अवश्य तत्पर रहना . `| चाहिये” ॥२९॥ एवं तयोः कथयतोदुचासा झुनिरभ्यगात्‌। ' | उनके इस प्रकार वार्ताछाप करते समय मुनिवर द्वारं ामवस्य दर्शनापेशया हुतम्‌ ॥४० | इनी ताप दनी इ स्र साथ राजद्वारपर पहुँचे ॥४०॥ वहाँ हुर्वासा सुनिने शुनिमणमासाच दुवीसा वाक्यमन्रबीत्‌। | उक्मणजीके पास आकर कहा-“ ञे तुरन्त ही महाराज शी दर्शय रामे कार्य रामसे मिलाओ, मेरा उनसे एक अत्यन्त भावश्यक रं दय रामं मे कार मेजलन्तमाहितम्‌ ॥४१॥ | कार्य आ पडा है” ॥४१॥ यह सुन श्रीलक्ष्मणज़ीने उन तच्छृत्वा रह सोमित्रिईनिं ज्वरूनतेजसम्‌ । ' अञ्निके समान तेजस्वी मुनिसे कहा-“इस समय जेण झा हि तेऽयि तेऽीषट । महाराज रामसे आपको क्या काम है! आपकी क्या रामेण कार्य कि तेऽद्य कि तेऽभीष्टं करोम्यहम्‌ ४२। | इच्छा है ! उसे मैं ही पूरा करूँगा ॥४२॥ इस समय मत्सेवकानां देवानां सर्वकार्येषु घे मया । राजा कार्योन्वरे व्यग्रो मुहूर्त सम्पतीक्षयताम्‌। | महाराज एक और कायी सं है, कुछ देर ठहरिये ।” रता ओधसन्तसो पुनिः सौमित्रिमनवी | यह सुनते ही सुनिने क्रोधसे व्याकुळ होकर छक्षमणजीसे 63 करोधसन्त्त झाचः सा ४३ कहा-॥४२॥ “लक्ष्मण | यदि इसी क्षण तुमने मुझे अस्मिन्‌ क्षणे तु सौमित्रे न दर्शयसि चेदिभुम | | भगवान्‌ रामसे न मिठाया, तो इसमें सन्देह RO SY नहीं, मैं देशके सहित तुम्हारे वंशको अमी मस्म राम सविपर्य वंशं भस्मीकुर्या न संशयः ॥४४॥ | कर डाढँँगा' ॥४४॥ रत्वा तवरन घोरमूपेदु्वाससो भूशम्‌ । दुवीसा ऋषिका यह भयङ्कर वाक्य सुनकर लक्ष्मण- ५ ~ लक्ष्मणः॥ जीने उसके स्वरूपका मलौमाँति विचार किया और स्वरूप तस्य वाक्यस्य चिन्तयित्वा स कमणः निश्चय कर कि एकके कारण सबके नाझसे तो. सर्वनाशाहर मेऽ्य नाशो ह्कस्य कारणात्‌ | (अकेले) मेरा नष्ट होना ही अच्छा है, उन्होंने निश्चित्येद ततो गरवा रामाय प्राह लक्ष्मण॥॥४३॥ रामचन्द्रजीके पास जाकर सारा इत्तान्त कह छुनाया NAN , || ३५-४६॥ लक्ष्मणजीके वचन सुनकर रामचन्द्रजीने तरच त्वा रामः काले व्यसजयत्‌। | काढको विदा किया और शीर बाहर आ अन्रिनन्दन शीघ्र निर्गम्य रामोऽपि दर्शाते! सुतं मुनिम|४४७ | दुर्बासाजीसे मिळे ॥ शा रघुश्रेष्ठ रान मुनिको प्रण उनसे आदर- रामो5मिवाध सम्भीतों मुनि प्रच्छ सादरम्‌ । पक, पा Mer ने कि कार्य ते करोमीति मुनिमाह रूस ॥४८॥ | मैं आपका क्या कार्य करूँ !? ॥४८॥ श्रीरामके ये बचन सुनकर दुर्वीसाजीने कहा--“आज मेरा एक ५ हजार वर्षका उपवास समाप्त हुआ है ॥४९॥ इस- अद्य. पर्षसहखाणाप्रुपवाससमापनस | ।४९॥ | जह सुरे! आपके यहाँ जो मोजन तैयार हो अतो मोजनमिच्छामि सिङ यत्ते रधूत्तत। | उसीकी इच्छा है।” मुनिके ये बचन पुन | तच्छत्वा रामवचनं दुर्वासा राममत्रवीत्‌ । २७६. अध्यात्मरामायण ROSS Td स सिद्धमन्नं मुनये यथावत्सञचपाहरत्‌। - | (पकाया हुआ) अन्न दिया और मुनि उस अमृततुल्य ुनिुकवातनममृतं सन्तुष्टः पुनरभ्यगात्‌ ॥५१॥ | अनको खाकर ठ होकर चले गये ॥५०-५१॥ स्वसाश्रम॑ गते तसिन्‌ रामः सस्मार भाषितम्‌ । जव दुर्वासा मुनि अपने आश्रमको चळे गये तो रघुनाथजीको काळके कहे हुए वचनोंका स्मरण हुआ। कालेन शोकटुः्खातो विमनाश्वातिविद्दल!॥५२॥ | इससे वे शोक और दुःखसे आर्ची तथा अति क) ५] a as व्य कुल ५ रघुकुट- ण्‌ अवाङ्मुखो दीनमना न शशाकामिभापितुम्‌। उदास और व्याकुठ हो गये ॥५२॥ रघुकुट-भषण ५ रामने मन-ही-मन लक्ष्मणको मरा हुआ-सा मान लिया मनसा लक्ष्सणं ज्ञात्वा इतप्राय रघूइ॒ह।॥५३)॥ | जिन्त वे दीन चित्तसे नीचेको मुख किये बैठे रहे, अवाड्युखो बभूवाथ तूष्णीमेबाखिलेश्वरः | ! उनसे कुछ कह न सके ॥५३॥ सश्र भावान 06 राम नीचा मुख किये चुपचाप रह गये | तब रघुनावजी- ततो रासं विलोक्याह सोमित्रिदं/खसम्प्लतम्‌।५8)॥ को अत्यन्त दुःखातुर, मौन, चिन्तित और स्नेह-बन्धनकी दृष्णीस्थूत चिन्तयन्त वन्त सेहवर । निन्दा करते देख छक्ष्मणजीने कहा --“हे रघुनन्दन ! रणीस्थूत चिन्तयन्त गहेन्त खेहबन्धनस । त कीक है र शा प | 'मेरे ल्थि सन्ताप न कीजिये, मुझे झाँघ्र ही मार सत्कृत त्यज सन्ताप जाह मा रघुनन्दन ।।५५॥। ' डाल्यि ।५४-५५॥ प्रमो ! मेने पहले ही निश्चय | कर ल्या था, काकी गति ऐसी ही है । ५ है | आपके प्रतिज्ञा-भङ्ग करनेसे तो मुझे भी अवद्य नरक त्वयि होनग्रतिज्ञे तु नरको मे धुव मवेत।५३६॥ | भोगना पड़ेगा ॥५६॥ अतः यदि आपकी मुझपर [a CO ~ | ही और ज़ करनेयोग्य ¥ ~ मयि प्रीति्दि भयेचद्यजग्रा्वता तब । | “विद और यदि में अनुद करनेयोग्य हूँ तो हे , मतिमान्‌ रामजी ! श्रा छोड़कर मुझे मार डालिये | त्यकत्वा शङ्गा जाह प्राश मा सा घ त्यज प्रभो।५७ ग्रमो ! धर्मका त्याग न कीजिये ॥५७॥ en Ne ~ | ~ सामिणि तच्छुत्वा रामथरितमानसः। | ढक्ष्मणजीका यह कथन सुनकर श्रौरघुनाथजीका | चित्त चञ्चल हो गया । उन्होंने सब मन्त्रियोंको आहूय मन्त्रिणः स्वात्‌ वसिष्ठं चेदमन्रबीत्‌५८॥। ! को है सवाद वर चदमनरवीत्‌॥५८॥ ` बुद्धकर यह सब इत्तान्त बसिष्टजीको सुनाया ॥५८॥ हनेरागमनं यत्तु कालस्यापि हि भाषितम। प्रभु रामने दुर्वासा सुनिका आगमन, कालका भाषण | और अपनी प्रतिज्ञा ये सब बातें उनसे कह दी ॥५९॥ रामचन्द्रजीका कथन सुन पुरोहित वसिष्टजीके सहित गतिः कालस कलिता पूर्वमेषेदरशी प्रभो । ग्रतिज्ञामात्मनभैव सर्वमावेदयत्परु: ॥५९॥ डला रामस्य बचन मान्त्रणः सपुरोहिता। । | समस्त मन्तियोने सब कार्य छीछाहीसे करनेवाले भगवान ऊचु! प्राज्ञ्यः सर्वे राममङ्किष्कारिणस्‌ ॥६०॥ | रामसे हाथ जोड़कर कहा-॥६०॥ “प्रमो! एथिबीका 0: re, मार उतारनेवाछे आपका छक््मणजीसे पहले ही वियोग पूवेसेव हि नि रिण! | प ह ल हि > 22 > कं प युरिया । होना निश्चित है--यह वात हमने ज्ञान-दृष्टिसे जान छक्सर्णव वयोगस्ते ज्ञातो विज्ञानचक्षुषा (६१॥ | ठी है ॥६१॥ अतः हे राम ! तुरन्त ही लक्ष्मणजी- त्यजाशु क्ष्मं राम मा प्रतिज्ञा तयज ग्रो । | त्याग दीजिये, प्रभो ! अपनी प्रतिज्ञा अज्ञ न 21 कीजिये क्योंकि प्रतिझा-मज्ठ करनेसे सारा धर्म निष्फळ ते परिचिजे: नन > ५ रा घर्म निष्फल शितज्ञात पारत्यक्त धर्मों भवति निष्फलः ॥६२॥ | हो जाता है ॥६२॥ और हे राम ! सम्पूर्ण धर्मका „~ सगे ८ ] २ ५-0-५ ज ७ ४-७७-२७०७ ७-७- ४५ धर्मे नष्टेऽखिरे राम त्रैलोक्यं नश्यति ध्रुवम्‌ । त्वं तु सर्वस्य लोकस्य पारकोऽसि रघृत्तम । he) त्यक्त्वा लक्ष्मणमेवेक Ree [७४रःामध्ये समाशुत्य ग्राह सोमित्रिमज्ञसा । च गच्छ ` परित्यागो वधो वापि सतामेवोभयं समम्‌ । | Se सोमित्रे माभूद्धमेस्य संशयः॥६५॥ एवमुक्ते रघुभ्रेष्ठ दुःखव्याक्ुठितेक्षणः ॥६६॥ Dene ` रामं प्रणम्य सौमित्रिः शधं गृहमगात्स्वकम्‌। : ततोऽगारसरयूतीरमाचम्य स कृताञ्जलिः ॥६७॥ नव द्वाराणि संयम्य मूधि प्राणमधारयत्‌ । - यदक्षरं परं ब्रह्म वासुदेवाख्यमन्ययस्‌ ॥६८॥ पदं तत्परमं धाम चेतसा सोऽभ्यचिन्तयत्‌ | वायुरोधेन संयुक्त सर्वे देवाः सहर्षयः॥६९॥ साग्नयो लक्ष्मणं पषपेरतुष्टुयु्च समाकिरन्‌। अदृश्यं विघ्ुयेः केथ्रित्सशरीरं स वासवः ॥७०॥ ` गृहीत्वा लक्ष्मणं शक्रः खर्गलोकमथागमत्‌ । १, ७ $ ततो विष्णोश्रतुर्भाग तं देवं सुरसत्तमा। । ` सर्वे देवर्षयो दृष्टा लक्ष्मणं समपूजयत्‌ ॥७१॥ लक्ष्मणे हि दिवमागत हरो सिद्गलोकगतयोगिनस्तदा । “नक्षणा सह समागमन्दुदा उत्तरकाण्ड ३७७ नाश हो जानेपर निश्चय ही त्रिळोकीका नाशे हो जाता है । हे रघुश्रेष्ठ ! आप तो सम्पूर्ण. लोक्षोंके रक्षक हैं; अतः अकेले ल्क्ष्मणजीको ही त्यागकर आप- क ७७ ® ~ चैकं त्रैलोक्यं त्रातुमहेसि ॥६२ | को त्रिळोकीकी रक्षा करनी चाहिये” ॥६३॥ रामो घमोर्थेसहितं वाकयं तेषामनिन्दितम्‌ ॥६४॥ रघुनाथजीने सभामें उनके धमार्थयुक्त और निर्दोष वचन सुनकर तुरन्त ही लक्ष्मणजीसे कहा-- लक्ष्मण ! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो वहाँ चळे जाओ, जिससे धर्ममे संशय उपस्थित न हो ॥५४-६०॥ सप्पुरुषोंके छिये त्याग और बघ दोनों समान ही हैं ।” रघुश्रेष्ठ भगवान्‌ रामके ऐसा कहनेपर उक्ष्मणजीकी आँखें दुःखसे डब- डबा आयीं और वे शीघ्र ही उन्हें प्रणाम कर अपने घर आये । बहाँसे बे सरयूतटपर पहुँचे और आचमन करनेके अनन्तर उन्होंने हाथ जोड़ अपने नवाँ इन्द्रिय- गोलकोंको रोककर प्राणोंको ब्रह्मरन्भमें स्थिर किया” फिर जो वासुदेव नामक अव्यय और अविनाशी पर- ब्रह्म पद हैं उस परमधामका चित्तमें ध्यान किया । इस प्रकार प्राणनिरोध करनेपर ऋषियों तथा अश्निके सहित समस्त देवताओंने लक्ष्मणजीपर पुष्प बरसाये.और उनकी स्तुति की । इसी समय इन्द्र किसी भी देवता- को दिखायी न देते हुए उन्हें सशरीर ठेकर स्वगे- लोकमें चळे आये । तब विष्णुभगबान्‌के चतुर्थीदरूप उन छक्ष्मणदेवको देखकर समख देवताओं और देवर्षियोंने उनका पूजन किया ६६--७१॥ भगवान्‌ लक्ष्मणजीके स्वग पधारनेपर ब्रह्माजीके सहित सिद्ध छोकनिवासी समस्त योगीजन अति प्रसन्न होकर महासर्प (शेष) रूपधारी श्रीलक्ष्मणजीका दर्शन करने- दरष्टुमादितमहाहिरूपकम्‌ ॥७२॥ | के ल्यि आये ॥७२॥ 0 ee —— इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेखरसंबादे उत्तरकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥ 43 ३७८ अध्यात्मरामायण we ववसं न्क क त तक शघ इक 6 कक कक + कर्क 1 क_क पक फकक्कक_७्आ डी eur Fw A ७१३४७४ ४ ७७१४७ AE LUI ASIA LN NS ७४४१४४४७४४ कट पीट सर्ग महाप्रयाण । श्रीमहादेव उवाच लक्ष्मणं तु परित्यज्य रामो दुश्खसमन्वित।। शन्त्रिणो चेगसांभेव यसिष्ठं चेदमब्रवीत्‌ ॥ १ अभिषेक्ष्यामि भरतमधिराज्ये महामतिस्‌ । अघ चाहं गमिष्यामि रकष्मणस्य पदानुग! | २॥ एबहुक्ते रघुश्रेष्ठ पौरजानपदासदा । हुमा इवच्छिन्मूला दुःखार्ताः पतिता दुवि ॥३॥ यूच्छितो सरतो वापि शुस्वा रामाभिभाषितम्‌ । गर्हयामास राज्यं स प्राहेदं रामसन्जिधौ ॥ ४॥ सत्येन च शपे नाहं स्वां विना दिवि वा भुवि । दाहः राज्यं रघुश्रेष्ठ शपे त्वत्पादयो; प्रभो ॥ ५ ॥ इभी छुशलुवो राजन्नभिषिश्वर्र राघव | कोशरेषु कुश वीरश्त्तरेपु लवं तथा ॥ ६॥ गच्छन्तु दृतास्त्वरितं शतरुप्रानयनाय हि । अखाकमेतद्दमनं खर्वासाय शृणोतु तः ॥७॥ भरतेनोदितं श्रुत्वा पतितास्ताः समीक्ष्य तस्‌। मंजाथ भयसंविम्ना रामविश्छेषेकातराः। ८॥ बसि्ठे भगवान्‌ रासश्चुवाच सदयं वचः | पञ्य तातादरात्सर्वा! पतिता भूतले प्रजाः ॥ ९ ॥ तासां भावालुगं राम प्रसाद कर्तुमईसि । त्वा बसिष्ठवचनं ताः समुत्थाप्य पूज्य च ॥१०॥ ससेहो रघुनाथः कि करोमीति चाजबीत्‌ । ततः माझल्य! परो प्रजा भक्तया रघूइहम ॥ १ १॥ गन्तुमिच्छति यत्र त्वसनुगच्छामहे वय्‌ । ` असाकमेषा परमा ग्रीतिर्धमोऽयमक्षय। ॥ १२ तबाबुगमने रास हृता नो रहा मतिः । उत्रदारादिभिः सार्मचुयामोऽ्य सर्वथा ॥१३॥ तपोवने वा खै वा पुरं वा रघुनन्दन । श्रीमहादेवजी चोछे-हें पार्वति ! टक्ष्मणजी त्याग देनेपर रघुनाथजीने अत्यन्त दुःखातुर मन्त्रियों, वेदवेत्ताओं और बसिष्टजीसे इस प्रकार कहा- ॥१॥ “आज महामति भरतको राजतिछक कर में भ॑ छक्ष्मणके मागेका अनुसरण करूँगा” ॥२॥ रघुनाथजीः के इस प्रकार कहनेपर प्रवासी तथा देशवासी छोर दुःखातुर होकर जड़से कटे हुए वृक्षके समान प्रथित्री- पर गिर पडे ॥३|॥ रामजीका कथन सुनकर भरतजीके भी मूर्छा आ गयी । उन्होने रघुनायजीके निकर राज्यकी निन्दा करते हुए इस प्रकार कह्दा-॥१॥ “हे रघुश्रेष्ठ ! में सत्यकी शपथ करके कहता हैं, हे प्रभो | मुझे आपके चरणोंकी सोगन्य है कि आपके बिना मुझे स्वरग-छोक या भूर्लोक कहींके भी राज्यको इच्छा नहीं है ॥५॥ हे महाराज राम | इन कुडा और ठ्रको ही राजतिळक कोजिये---अवधमें वीरवर दुदा- को ओर उत्तरमें लको राजा बनाइये ॥६] शीघ्र ही ्रुप्रको ठानेके लिये दूत जाने चाहिये, जिससे वह भी हमारे स्वर्ग-बासके लिये जानेका वृत्तान्त सुन छे” ॥।७॥ भरतजीका कधन सुन उनकी ओर देखकर सम्पूर्ण प्रजा भयभीत तथा रामजोके बियोगसे व्याकुल हो पृथिवी- के ह्‌ । पर गिर पडी । तव भगवान्‌ वसिष्ठजीने रघुनायजीसे करुणायुक्त वचन कहा --“हे तात ! सारी प्रजा पथिवी- पर पड़ी हुई है उसे कृपा-दश्सि देखो ॥८-९] हे राम! इनके प्रेम-भावानुसार तुम्हें भी इनपर कृपा करनी चाहिये ।” वसिष्ठजीके ये वचन सुनकर रघुनाथजीनेप उन संबोंको उठाया और उनका सत्कार कर उनसे प्रेमपूर्वक पूछा--“कहो, मैं तुम्हारे लिये क्या कखँ १” ६३ Th, : तब प्रजाजन हाथ जोड़कर रघुनाथजीसे भक्तिपूर्वक बोळे १०-१ १॥ “आप जहाँ जाना चाहते हैं इम भी वहीं आपका अनुगमन करेंगे | यही हमारी सबसे बड़ी प्रसन्नता और अक्षय धर्म है | १२] हे राम | हमारे हृदयमें आपका अनुगमन करनेका ही दृढ विचार है। अतः हे रखुनन्दन ! आप तपोवन, नगर, स्वर्ग आदि कहीं सर्ग ९ | ' उत्तरकाण्ड ` ज्ञात्वा तेषां मनोदादथ कारस्य वचनं तथा॥ १४॥ | भी जायँ अब हम खा-पुत्रादिके सहित सर्वधा जा , .॥ सक्त पारजन चच वाढसित्याह राघव! । कुत्वव निश्चय रामस्तस्मिन्नेवाहनि प्रभ! ॥१५॥ अस्थापयामास च तो रामभद्रः कुशीलवौ । ही अनुसरण करंगे 1” तब रघुनाथजीने उनके मन की दृढता और कालका वचन समझकर उन भक्त पुरवासियोंसे “बहुत अच्छा, ऐसा ही करो' यह कंह दिया । पिर, ऐसा निश्चय कर प्रभु रामने उसी दिन अष्टा रथसहस्राणि सहस्तं चेव दन्तिनाम्‌ ॥१६॥ | कुश ओर लबको (अपने-अपने राज्यपर) भेजा । उनमेंसे १४ चाश्वसह्ताणामेकेकर्मे ददो वलम्‌ । नेहुरलौ बहुधनों अभिवाद्य गतौ रामं कृच्छ्रेण तु कुशीलवो । हटपुटजनाइतोा॥१७॥ ग्रत्येकको आठ हजार रथ, एक हजार हाथी और साठ हजार धोड़े दिये तथा बहुत-से रत्न, धन और हृष्ट-पुष्ट मनु्ष्योको साथ कर दिया ॥१३-१७॥ कुरा और छव रामजीको प्रणाम करके बड़ी कठिनतासे चले | इसी समय शुप्नानयने दूतान्प्रेपयामास राघवः ।।१८॥ | रघुनाथजीने शत्रुधजीको छानेके लिये दूत भेजे ॥१८॥ ते दूतारत्यरितं गत्वा शत्रुध्नाय न्यवेदयन्‌ । ठक्ष्मणस्य च नियाण ग्रातिज्ञा राघवस्य च । पुत्राभिपेचनं चेव सर्वं रामचिकौर्पितम्‌ ॥२०॥ भुत्वा तद्दूतवचनं शत्रुघ्नः कुलनाशनम्‌ । व्यथितोऽपि धृर्ति लब्ध्वा पुत्रावाहूय सत्वरः अभिषिच्य सुवाहु वे मथुरायां महावलः ॥२१॥ यूपकेठुं च विदिशानगरे शतुबदनः | अयोध्यां तवरितं ग्रागात्स्वयं रामदिरक्षया॥२२॥ दद च महारमानं तेजसा ज्वलनप्रभगू। हुकूलयुगसंवीतं ऋपिभिश्राक्षयेप्वतस्‌ ॥२३॥ अभिवाद्य रमानाथं शत्रुध्नी रुएङ्गधम्‌ । प्राज्नलिधमसहि्त वाकयं प्राह महामतिः ॥२४॥ अभिषिच्य सुतौ तत्र राज्ये राजीवलोचन । ‹ ” तवाचुगमने राजान्विद्धे मां कृतनिथयस्‌ ॥२५॥ त्यक्तु नाईसि मां बीर भक्त तव विशेषतः । शत्रुघ्नस्य इढां बुद्धि विज्ञाय रघुनन्दनः ॥२६॥ सज्ञीभवतु मध्याहे भवानित्यत्रवीद्वचः । अथ क्षणारसश्चुतेतुर्वानराः कामरूपिणः ॥२७॥ ऋक्षा राक्षसायैच गोपच्छा् सहसशः। | कऋूपीणां देवतानां च पुत्रा रामस्य निर्गमम्‌ ॥२८॥ उन दूतोंने तुरन्त ही जाकर कालका आगमन, दुर्वासा- जीको करतूत, छक्ष्मणजीका महाप्रयाण, रघुनाथजीकी | प्रतिज्ञा, पुत्रोंका अभिषेक और अब राम क्या करना हते है--ये सब समाचार शत्रध्नजीसे निवेदन कर दिये॥१९-२०॥ इस प्रकार दूतोंके सुखसे अपने कुलके नाशका समाचार घुनकर इत्रष्नजी अति व्याकुल | हुए, किन्तु फिर धैर्ये धारण कर तुरन्त ही अपने दोनों पुत्रोंको बुलाया; और उनमेंसे महाबळी सुबाह- को मधुराके और यूपकेतुको विदिशा नगरीके राज्य- पर अभिषिक्त कर स्वयं बड़ी शीघ्रतासे रघुनाथजीके दरॉनके लिये अयोध्याको चले॥ २१-२२ ॥ . वहाँ पहुँचनेपर उन्होंने अपने तेजसे अग्निके' समान देदीप्यमान महात्मा रामको दो वस्र धारण किये और चिरजीवी ऋषियोंसे घिरे इए देखा ॥२१॥ महामति शत्रघ्नजीने लक्ष्मीपति -श्रीरछुनाथजीको प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर ये धमयुक्त वाक्य कहे-।२४॥ “हे कमलनयन | मैं अपने राज्यपर दोनों पुत्रोंका अभिषेक कर आया हुँ; हे राजन्‌ ! अब मैंने मी आपही- का अनुगमन करनेका निश्चय कर छिया. है--ऐसा आप जानें ॥२५॥ हे वीर ! मैं आपका मक्त हूँ, अतः आपको मुझे छोड़ना न चाहिये |” शत्रुघतका दढ निश्चय ' जान शरघुनाथजीने कहा-'तुम आज दोपहरके समय | तैयार रहो । इसी समय इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर, रीछ, राक्षस और गोपुच्छ वानर हजारोंकी संख्यामें आ कूदे, तथा ऋषि और देवताओंके पुत्ररूप वे समस्त वानर और राक्षसगण रघुनाथजीका निर्याण ' 1 | CSS SST STS TSS See अध्यात्मरामायण [ सर्गं ९ ॥ रोच शघभेष्ठं सर्वे १ । सुनकर उनसे कहने ठगे-/प्रमो ! आप हमें भी अपने त्वा ओचू रघुभे्ट सर्वे वानरराक्षसाः व | क टा पा रि रामे सीरीज महा इतनेहीमें महाबळी सुम्रीवन भी यथावत्‌ प्रणाम करके यथाबदसिनायाह राधं भक्तवत्सठम्‌ ॥३०॥ | भक्तवत्सळ रघुनाथजीस .कदा--॥ ३० ॥ “हे राम! अभिपिच्याइद राज्ये आगतोऽरिम सहावलय |. में मदावली अंगदकों राजतिठक कर आपके साथ चलने: तवाहुग्सने राम विद्वि सां कृतनिश्चयस्‌ ॥३१॥ | का निश्चय करके आया हॅ ऐसा आप जानें? ३१ ॥ कृत्या तेषां हढं वाकयं कक्षवानररक्षसाय्‌ | | तब उन रीछ, गन और रासो देसे दृढ वाक्य RR = ५ सुनकर श्रीरधुनाथजीन विभीपणसे आदरपूर्वक इस प्रकार | वाचेद वचनं सदु सादरम्‌ ॥२२९॥ ४ मा विभीवणदबाचेद हे ~~ | मधुर वचन कहा--॥३२॥ “म तुम्ह अपनी दापथ करात भरिष्यति धरा यावत्मजासावत्तशाधि मे। । हूं, जवतक पृथिवीं प्रजा वारण करे तबतक मेरे कहने वचनाङ्ग राज्यं शापितोऽसि ममोपरि ॥२३॥ | ह तुम राक्षसोंका राज्य करी ॥ ३३ ॥ तुम मेरे लिये | दू क डौ. कौ न किश्चिदुत्तरं वाच्यं त्वया मत्कृतकारणात्‌। , ऐसा करो, अब इस विषयमे कुछ और उत्तर न देना | ‘ne, n । विमीपणसे इस प्रकार कह फिर वे हनुमानजीसे बोे--- छत चि त्वा हनुमन्त शा! दी हा - र विभीएर्णं तूकरवा हनूमन्तमथात्रवीत्‌ ॥२ ` ॥३४॥ “हे मारुते ! तुम चिरकाटतक जित साइत त्व चिर्जीच ममाज्ञां सा यूपा कृथाः | , रहो, मेरी (पूर्व ) आहाको मिथ्या गत करो । दिर जाम्दमत्यमथ प्राह तिष्ठ त्व॑ द्वापरान्तरे ॥३५। | जाम्बबानसे कद्दा--/तुम द्रापरके अन्तत्तक रहो सया साई मपेहुई परिका ~ ।॥ २५॥ किसी कारणवश मेरे साथ तुम्हारा युद्ध सया हाइ सषेछुद्ध थर्किश्चित्कारणान्तरे। ! `, पेर गचन ॐ व । दोगा 1” फिर श्रोरघुनाथजोन रोप सब्र रॉछ, वानर तुतखातू राघवः प्राइ मक्षराक्षसवानरात्‌ | और राक्षर्सोसे दयापृर्वक बाहा--- तुम सच लोग भा सरवनिद अया सार्थ प्रयातेति दयान्वितः ३६) | साथ चलो” ॥ ३६ ॥| उतः अगाते रघुधंशनाथों ! दूसरे दिन सेरे ही विश्ालहदय कमलनयन भगवान वशालबक्षाः सितकज्ञनेत्रः । | रामने पूज्य पुरोहित वसिष्ठनीसे कहा--“हे गुरो ! ३८० res ware IRANI Se पुरोधसं ग्राह विषमाय | यास्लाबिहोत्राणि पुरो युरो मे ॥३७॥ ल्क $ मेरे आगे अभिहोत्रको आहनचनीयादि अशिया चहे' तहो पसिहेऽपि चकार सई |! ३७॥ तव बसिष्टजीने वडे विधिपूर्वक समज भारानिकं कर्म महद्विचानात्‌ । | प्राखानिक कर्म किये | उस समय करोड़ों चन्द्रमाओं- कासास्दरो दर्भपविश्रपाणि- के समान कान्तिमान्‌ भगवान्‌ राम रेशमी स्र धारण | म्हा प्रयाण दि! _ ) के शाप्रयाणाय गृहीतबुद्विः ॥३८॥ किये, कुशाकी पवित्री हाथमें पहने तथा महाप्रयाणमे निष्कम्य रामो नगरास्सिताभ्रा- चित छाये च्छ्शी न लगाये नगरसे इस प्रकार निकले जैसे शेत च्छशीव यातः शशिकोटिकान्तिः | रसे इस प्रकार निकले जैसे : रासस्थ सब्ये सितपद्महस्ता ` | वादलोमिसे चन्द्रमा निकल्ता हो | उनके वाया ओर ` पी गता. पद्यविशालनेत्रा ॥३९॥ | हाथमें खेत कमल लिये कमळके समान विशाल नेत्रवाली रे ददऽर्णकञ्जहस्ता . . | लक्ष्मीजी चली ॥३८-२९॥ तथा दायी ओर हवाथमें लाल च्छ ~ ह श्यामा ययो भूरपि दोप्यमाना | | कमळ लिये अत्यन्त दीप्तिशालिनी व्यामवणी पिवी सर्भ९] शा्राणि शस्राणि धनुश्च बाणा जम्मु। ` पुरस्तादधतविग्रहास्ते ॥४०] चेदाश सर्वे धतविग्रहाश्र ४.” ययुश्र सर्वे मुनयश्च दिव्याः माता श्रतीनां प्रणवेन साध्वी ययो हरिं व्याहृतिभिः समेता॥४१॥ “गच्छन्तमेचाुगता जनास्ते सपुत्रदाराः सह बन्धुवर्गें अनाइतद्वारमिवापवगं राम ब्रजन्तं ययुराप्तकामाः । सान्तःपुरः सानुचरः सभाथे शत्रुधयुक्तो भरतोऽलुयातः॥४२॥ गच्छन्तमालोक्य रमासमेतं श्रीराघर्यं पोरजनाः समस्ताः । सवालवृद्धाश्च यथुद्विजाग्रयाः | सामात्यवगाथ समन्त्रिणो ययुः ॥४३॥। ' सर्वे गताः क्षत्रमुखाः अह | वेब्याश्र श्द्रात् तथा परे च। . सुग्रीवमुझ्या हरिपुङ्गवाश्च - खाता विशुद्धाः शुभशब्दयुक्ता। ॥४४॥ न कश्चिदासीङ्कवटुःखयुक्तो दीनोऽथवा बाह्यसुखेषु सक्तः । आनन्दरूपाचुगता विरक्ता ययुश्र॒ रामं पशुसृत्यवर्गं/ ॥४५॥ भूतान्यञ्यानि च यानि तत्र ये प्राणिनः ख्यावरजङ्गमाश्च । साक्षात्परात्मानमनन्तशक्ते > जग्मुर्विरक्ताः परमेकमीशम्‌ ॥४९॥ नासीदयोध्यानगरे तु जन्तुः कश्चित्तदा राममना न यातः । शून्यं बभूवाखिलमेव तत्र पुरं गते राजनि रामचन्द्रे ॥४७) ततोऽतिदूई नगरात्स गरवा इष्टा नदीं तां दरिचेत्रजाताम्‌ । ननन्द रामः स्ृतपावनोऽतो ददर्श चाशेषमिद हृदिखम्‌॥४८॥। : ` उत्तरकाण्ड TTT RITTER Smemmnmnn क्‌ we ४४४४ ५४५७८ ७ NNN नकम्‌च्नयमक््न्सन्कम्r-यामकनन््ङन्यxछस्क््दकपक्मा् rr ow ३८१ चली । भगवानूके आगे सम्पूर्ण शात्र, श्न और उनके धजुष-वाण मूतिमान्‌ होकर चले ॥ ४० ॥ इसी प्रकार समस्त वेद, समस्त दिव्य मुनिजन तथा “कार और व्याहृतियोंके सहित बेदमाता गायत्री--ये.सब भी शरीर धारण कर श्रीहरिके साथ चळे || ४१ ॥ इस प्रकार रघुनाथजीके चळनेपर अपने बन्धु-बान्धव और खी-पुत्रादिके सहित समस्त पुरजन इस प्रकार चले मानो सफळमनोरथ हो स्व्गेके खुळे वारको जाते हों । फिर रनवास, सेबकगण, खी और इत्रुघ्के सहित भरतजी भी चले ॥ ४२ | रघुनाथजीको छक्ष्मीजीके सहित जाते देख बाळक ओर वृद्रोंके सहित समस्त पुरजन तथा अमात्य और मन्त्रयोंके सहित समस्त ब्राह्मणगण चले ॥ 9३ ॥ उनके पश्चात्‌ मुख्य-मुख्य क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ओर अन्य अन्त्यजादि सभी लोग अति हर्षपूर्वक चले । फिर सुम्रीवादि श्रेष्ठ वानरगण खानादिसे शुद्ध हो ( 'श्रीरामचन्द्रजीकी' जय आदि) मंगलमय शब्द करते हुए चले ॥४४॥ ( उनमेंसे ) कोई मी संसार-दुःखसे दुःखी, दीन अथवा बाह्य विषयोंमें आसक्त नहीं था । वे समी परमानन्दस्ररूप भगवान्‌ रामके अनुगामी संसारसे उपराम होकर अपने प्ल और नौकर-चाकरोंके सहित रघुनाथजीके साथ चले गये ॥ ४५॥ जो प्राणी कभी दिखलायी नहीं पड़ते थे तथा जितने स्थावर और जंगम जीव थे वे सभी संसारसे विरक्त होकर एकमात्र परमेश्‍वर अनन्तशक्ति साक्षात्‌ परमात्मा रामके साथ चळे ॥ ४६॥ उस समय अयोध्यामें ऐसा कोई जीव नहीं था जो भगवान्‌ राममें चित्त छगाकर उनका अनुगामी न हुआ हो। महाराज रामचन्द्रके कूच करते ही षह सारा नगर सूना हो गया ॥ ४७॥ नगरसे बहुत दूर निक जानेपर श्रीरघुनाथजीने विष्णुभगवानके नेत्रसे प्रकट हुई ( सरयू ) नदी देखी । उसे देखकर भगवान्‌ बड़े ग्रसन्न हुए और उन्हें अपने विशुद्ध स्वरूपक्री स्मृति हो आयी; अतः बे इस सम्पूण जगतूको अपने हृदयमें स्थित देखने लगे ॥ ४८ ॥ अध्यात्मरामायण [सरं ९ rr TT gman जप erro did we 0000000000. काकोककव्ककी इसी समय, वहाँ पितामह ब्रह्माजी तथा अन्य समस्त थागत ताग यथ सिद्धाः । देवता, ऋषि और सिद्रगण आये | उस समय जिनमें विसानकोटीभिरपारपारं देवगण. विराजमान थे ऐसे सूर्यके समान तेजस्वी करोड़ों समाइतं खं सुरसेवितामिः ॥४९॥ | विमानोंसे अनन्तपार आकाश खचाखच भर गया । रविग्रकाशामिरभिस्फुरतस्वं (उनके प्रकाझसे ) प्रज्वळित होकर वह स्वयं भी ज्योतिर्मयं तत्र नभो वधू । | देदीप्यमान हो उठा । ( इनके अतिरिक्त पुण्यलोवोसे.. खयग्प्रकारीपहतां महद्भिः आये हुए) पुण्यवानोमें श्रेष्ठ तथा महात्माओंमें समावृतं पृण्यक्षतां वरिष्ठ! ॥५०॥ | महान्‌ स्वयंप्रकाशमय दिव्य पुरुषोंसे भी आकाश ववुश्च वाताश्च सुगन्धवन्तो मानो ढँक गया ॥ १९-५० || उस समय छुगन्ध- ववर्ष वृष्टिः इुसुमावलीनास्‌ । मय वायु चरने लगा और कुसुमसमूहोंकी (निरन्तर) उपख्थिते देवमृदङ्गनादे बषौ होने उगी | तव देवताओंका मृदंगनाद और गायत्सु विद्याधरकिन्नरेषु ॥५१॥ | विद्याधर तथा किन्नरोंका गान होते इए अनन्तशक्ति रामस्तु पद्धयां सरयूजलं सक- भगवान्‌ रामने एक बार सरयूजलका स्पर्शी (आचमन) कर त्सपष्टा परिक्रामदनन्तशक्तिः ॥५२॥ चरणोंसे उसकी परिक्रमा की ॥ ५१-५२ ॥ नरा तदा ग्राह कुताज्ञलिस्तं | उससमयन्रह्माजी हाथ जोड़कर भगवान्‌ रामसे कहने रासं परात्मन्‌ परमेश्वरसत्वस्‌। छोगे--हि परमात्मन्‌! आप सवके स्वामी, नित्यानन्द- विष्णुः सदानन्दमयोऽसि पूणो मय, सर्वत्र परिपूर्ण और साक्षात्‌ विष्णुभगवान्‌ हैं । जानासि तसं निजमैशमेकम्‌। | अपने एकमात्र ईश्वरीय तत्वको आप ही जानते हैं | तथापि दासस्य ममाखिलेश तयापि हे अखिडेशवर ! आपने मुझ दासका निवेदन पूर्ण तं कचो मक्तपरोसि बिन्‌ ॥५श॥ | विग (सो अंकही योक) हे किन ! आप ल॑ आदभिवेष्णवभेवमाद्य भक्तवत्सल हें ॥ ५३ ॥ हे परमो | अब आप भाइयोंसहित ` अविश्य देह परिपाहि देवात्‌ । अपने आदिविग्रह विष्णुदेहमें प्रविष्ट होकर देवताओंकी यदा परो वा यदि रोचते त रक्षा कीजिये, अथवा यदि आपको कोई और शरीर 2 प्रिय हो तो उसीमें प्रवेश करके हम सबका पालन अधिश्य दृह पारपाहि नस्त्वस्‌ (५४! कीजिये ॥ ५४॥ आप हो देवाधिपति विष्णुमगवान्‌ त्वमेव देवाधिपतिथ विष्णु- हैं | इस बातको मेरे सिवा और कोई पुरुष नहीं जानन्ति न त्वां पुरुषा विला माम्‌ । | जानता । हे देवेश | आपको हजारों बार नमस्कार . सहसकत्वस्तु नमो नमस्ते है, आप प्रसन्न होइये, आपको पुनः-पुनः नमस्कार प्रसीद देवेश, पुननेसस्ते ॥५५॥ | है” ॥ ५५॥ पितामहपआथेनया स रामः :, तब पितामह ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे महातेजोमय | पश्यत्सु देवेपु महाप्रकाशः ) भगवान्‌ राम सब देवताओं के देखते-देखते उनकी दृष्टिको मुष्णंध चक्षूँपि दिवौकसां तदा चुराते हुए चक्रादि आयुधोसे मुक्त चतुर्भुजरूप हो बभूव चक्रादियुतश्चतुर्ृजः ॥५६॥ | गये | ५६ ॥ लक्ष्मणजी अड्भुत फणा धारण कर भगवान्‌ न ०---०- - oe सगं ९] उत्तरकाण्ड | शटर शेपो बभूवेशरतल्पभूतः | की शब्यारूप शेषनाग हो गये, तथा कौकेयीपुत्र भरत वर्भवतुअक्रद्रों सोमित्रिरत्यद्भतभोगधारी \ और ल्वणान्तक शन्नुन्न दिव्य चक्र और शंख हो गये रो च दिव्यौ "य चक्र भर कैकेयिस नुरलवणान्तकश्र ॥५७॥ |! १९ | सीताजी तो पहछे ही लक्ष्मीजी हो गयी रामो हि विष्णुः पुरुषः पुराणः । सहानुजः पूर्वेशरीरकेण म यदिव्यमि वभूव तेजोमयदिव्यमूतिंः ॥५८॥ वे भाइयोंके सहित अपने पू्व-शारीरसे तेजोमय दिव्य- स्वरूपवाळे हो गये ॥ ५८ ॥ विष्णुं समासाद्य सुरेन्द्रमुख्या | फिर उन विष्णुभगवान्‌के पास चारों ओरसे इन्द्रादि देवाश्च सिद्धा नयश्च यक्षाः। | देवता, सिद्ध, मुनि, यक्ष और ब्रह्मा आदि प्रजापतिगण पितामहादयः परितः परेश | आकर उन परमेश्वरकी खोत्रोंद्रारा स्तुति करते हुए -स्तबभृणन्तः परिपूजयन्तः।|५९॥ आनन्दसम्प्हाबितपूर्णचित्ता बभूविरे ग्रा्चमनोरथासे । तदाह विष्णुट्टहिण महात्मा एते हि भक्ता साये चालुरक्ताः ॥६०॥ यान्तं दिवं मामनुयान्ति सर्वे पूजा करने छगे और अपना मनोरथ पूर्ण हो जानेसे | मन-ही-मन आनन्दमञ्न हो गये । तब महात्मा विष्णुभगवानने ब्रह्माजीसे कहा--“ये सव मेरे भक्त ओर मुझमें प्रीति रखनेवाठे हैं ॥ ५९-६० ॥ मेरे साथ ये सब भी खगलोकको जाना चाहते हैं । इनमें तिर्यकयारीरा अपि पुण्ययुक्ताः | जो तियक्ररीरधारी हैं वे भी बड़े पुण्यात्मा हैं। ` बैकुण्ठसाम्य परमं प्रयान्तु ये सब वेकुण्ठके समान उत्तम छोकोंको प्राप्त हों; मेरी समाविशखाशु ममाज्ञया त्वम्‌ ॥६१॥ | आज्ञासे तुम शीप्र वहाँ इनका प्रवेश करा दो” ॥६१॥ श्रुत्वा हरेवीक्यमथात्रवीरकः भगवानूके ये वचन सुनकर ब्रह्माजीने कहा-- सान्तानिकाम्यान्तु विचित्रभोगान्‌ । | “मगबन्‌ ! आपकी भक्तिसे युक्त ये महापुण्यशाली लोग लोकान्मदीयोपरि दीप्यमानां- मेरे लोकसे भी उपर अत्यन्त दीप्तिशाली और विचित्र स्त्वद्भावयुक्ताः कृतपुण्यपुञ्जाः ॥६२॥ | मोगोंसे सम्पन्न सान्तानिक लोकोंको प्राप्त हों ॥ ६२ ॥ ये चापि ते राम पवित्रनाम हे राम ! और भी जो ळोग मरनेके समय ही आपका गृणन्ति मत्या लयक्ाल एव । पवित्र नाम लेंगे अथवा जो भूलकर भी आपका अज्ञानतो वापि भजन्तु लोकां- भजन करेंगे वे भी योगियोंको ग्राप्त होनेयोग्य उन्हीं स्तानेव .योगंरपि चाधिगम्यान्‌॥६२॥ | छोकोंको जायेगे” ॥ ६३॥ ततोऽतिदृटा हारराक्षसाद्या! यह सुनकर समस्त वानर ओर राक्षसादि अति स्पृष्टा जलं, त्यक्तकलेवरास्ते। | प्रसन्न हुए और जलस्पर्श करके शरीर छोड़ने - रगे । प्रपेदिरे प्राक्तनभेष रूपं थे रीछ और वानर आदि जिस-जिसके अंशसे उत्पन्न यदंशजा ` ऋक्षरीश्वरास्ते ।६४॥ | हुए थे उस-उस देवताके पूर्वेूपको ही प्राप्त हो गये प्रभाकरं आप हरिग्रवीरः ॥ ६४ ॥ वानरराज सुग्रीव सूर्यके बौर्यसे उत्पन हुए . सुग्रीव आदित्यजयी्वस्वात्‌ ॥१५॥ | थे अतः वे सूर्यमें छीन दो गये ॥ ६५॥ तदनन्तर [ सर्ग ९ SSS ITI अध्यात्मरामायण अयोच्या-निवासी लोग सरयूके जलमें इूव-डूवकर मनुष्य देहको त्याग दिव्य आभूपणोसे बिभूपित हं विमानोंपर चढ़कर सान्तनिक नामक लोकोंमें पहुँच गये ॥६६॥ रे ८ ततो विमग्नाः सरयूजठेषे नराः परित्यज्य मनुष्यदहम्‌ | आरुद्य दिव्याभरणा विमानं प्रापुथ ते साल्तनिकाख्यलोकान्‌ ॥६६॥ | जो तिर्यक्‌ योनियोंमें उत्पन हुए थे वे ( कूकर-शकर | आदि ) भी भगवान्‌ रामकी दृष्टि पडनेसे जलमें इववार । खर्मलोकको ही चढे गये । जो देशवासी लोग यह सर्वी ` जलं प्रविष्टा दिवमेव याता! । दिइक्षबो जानपदाश्च ठोका | कौतुक देखनेके लिये आये थे वे भी श्रॉरामचन्द्रनीका | रासं समालोकय विद्ठक्तसद्वाः | | दर्शन कर संसारकी आसक्तिको छोड लोकगुरु परमेश्वर तिरयळूप्रजाता अपि रामदृष्टा त्वा हरिं लोकगुरुं परेश भगवान्‌ विष्णुका स्मरण करते हुए जटस्पर्शे कर स्पृष्ठ जलं खर्गमवापुरक्ष: ॥६७॥ | अनायास स्वगेको चले गये ॥ ६७ ॥ एतावदेवोत्तरमाह शम्हः | श्रीमहादेवजीने भगवान, रामको कथाका परिझिष्ट श्रीरामचन्द्रस्य कथावशेषस्‌ । | रूप यह इतना हीं उत्तरकाण्ड कहा है | जो पुरुष यः पादमंप्यत्र पठेत्स पापाः । इसका एक पाद ( चोथाई छोक ) भी पढ़ता हैं. बह हि दचयते जन्यसहस्चजातात्‌ ॥६८॥ | अपने हजारों जन्मेंके पापे मुक्त दो जाता है॥ ६८॥ दिय दिन पापचय मुवतू | नित्यप्रति अनेकों पाप करनेवाला पुरुप यदि भक्ति- ~ नरः शे ^ हे _ | दि ... टला व्हाकपपाहे अव्या । | पूर्वक इसका एक छोक भी पढ़े तो सम्पूर्ण पापरादिसे 14छसवाधचप मयात रामस्य सालोक्यमनव्यलभ्यम्‌ ॥६९॥ | सरो र प | जो दूसरोंके लिये अलभ्य है ॥ ६९॥ श्रौरघुनाथ- छूटकर श्रीरामके सालोक्य-पदको प्राप्त हो जाता है आए्यानमेतद्रघनायकस्य |, वि व , दा जीको प्रेरणासे उनकी इस कयाको, जिसमें कुत पुरा राघवचोदितेन । भविष्य चरित्रोंका हो वर्णन किया > ~ kl 5 गय महेथरेणाप्तभविष्यदर्थ श ता द _ रितोपमेरि पहले श्रीमहादेवजीने रो दनकर शुत्या तु रामः परितोषमेति ॥७०॥ हादेवजीने रचा था। इसको सुनकर रामायणं काव्यमनन्तपुण्यं श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न होते हे | ७०॥ रामायण श्रीशङ्करेणाभिहदितं भवान्ये। |" पदे जनन्त उण्यप्रद काव्य औराकरभगवाननेः भक्त्या पठेद्यः शृणुयात्स पापैः पार्वतीजीसे कहा है । जो पुरुप इसे भक्तिपूर्वक पढ़ता .बिधुच्यते जन्मशतोङ्कवैश्च।७१॥ | अथवा सुनता है वह अपने सैंकड़ों जन्मोंके पापपुज्ञसे अध्यात्मरामं पठतथ नित्यं मुक्त हो जाता है || ७१॥ इस अध्यात्मरामायणको श्रोतु मक्या लिखितुश्च रामः | | नित्यप्रति पढ़ने, सुनने अथवा भक्तिपूर्वक छिखनेवालेसे अतिप्रसन्नध सदा समीपे अत्यन्त ग्रसन्न होकर भगवान्‌ राम सीताजीके सहित सौतासंमेतः श्रियमातनोति ॥७२॥ | उसके पास रहकर उसकी श्रीइृद्धि करते हैं ॥ ७२ | ~ सर्ग ९ ] उत्तरकाण्ड ३८५ रामायणं जनमनोहरसादिकाव्यं ` | ब्रह्म आदि पुरश्रेष्ठोसे प्रशंसित और मलुष्योंके मनको ब्रह्मादिमिः सुरवरेरपि संस्तुतं च। हरनेवाळे' इस आदिकाव्य रामायणको जो पुरुष कका कि नित्यप्रति श्रद्धापूबंक पढ़ता या सुनता है वह विशुद्ध चद्धान्यतः पठति या यया वित्य झरीर धारण कर भगवान्‌ विष्णुके धामको प्राप्त होता विष्णोः प्रयाति सदनं स विशुद्देहश।७२॥। है ॥ ७३ ॥ tO इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे नवमः सगः ॥ ९॥ समाप्षमिदशुत्तरकाण्डम्‌ । ०००००००००2 पार्वत्ये परमेश्वरेण गदिते द्यध्यात्मरामायणे काण्डेः सप्तमिरन्वितेशतिशभदे सगाथितुःपष्टिकाः । छोकानान्तु शतद्वयेन सहितास्युक्तानि चत्तारि चे साहसाणि समापितः श्षतिशतान्युक्तानि तखार्थतः ॥ साक्षात्‌ परमेश्वर ( श्रीमहादेवजी ) द्वारा पार्वतीजीके प्रति कहे हुए, सात काण्डोसे युक्त इस झुभप्रद अध्यात्मरामायणमें चौंसठ स हैं। इसकी समातिपर्यन्त कुछ चार हजार दो सौ छोक कहे गये हैं तथा तत्तार्थका विवेचन करते हुए सैकड़ों श्रुतियाँ कही गयी हैं । डू षः ) श्रीरामाय नमः ~ ' `. ्रीजानकीजीवना्कम्‌ आलोक्य यस्यातिळलामलीलां सद्भाग्यभाजी पितरौ कृतार्थौ । तमर्भकं दर्पकदुर्पचौरं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ १॥ श्रुलेव यो भूपतिमात्तवाचं बनं गतस्तेन न नोदितोऽपि । तं लीलयाऽऽह्वादविषादशून्यं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ २॥ जटायुषो दीनदशां विलोक्य म्रियावियोगप्रभवं च शोकम्‌ | यो वै विसस्मार तमाद्रेचिचं श्रीजानकीजीवनमानतोऽरिमि ॥ ३॥ यो वालिना ध्वस्तबळं सुकण्ठं न्ययोजयद्राजपदे कपीनाम्‌ | तं स्वीयसन्तापसुतपाचित्तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ ४॥ यद्याननिर्धूतवियोगवह्विविदेहबाळा विभुधारिवन्थाम्‌ | प्राणान्दधे प्राणमयं प्रसुं तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽरिम ॥ ५॥ यस्यातिवीयास्मुधिवीचिराजौ बश्यैरहो वैश्रवणो बिलीनः । तं वैरिविध्वंसनशीललीलं श्रीजानकीजीवनमानतो ऽस्मि ॥ ६॥ यूपराकेशमयूखमालाऽचुरञ्जिता राजरमाऽपि रजे | तं राघवेन्दं विवुधेन्दवन्थं श्रीजानकीजीवनमानतो;स्मि ॥७॥ एवं कृता येन विचित्रलीला मायामलुष्येण नृपच्छछेन | + Ww क न श ४९ ते १ सराळ सुनिमानसानां आजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥८॥ "२३२७६६७६००. डौ 4 CRN “® ग्य डू कोड PTO मककन नः कक AR उडे ae हर ८02७२): 222 .203-2/%% ९२२ अपन 224 श्रीहरिः [a ha पुर (९ ~ गीताप्रेस, गोरखपुरकी पुस्तके — ~ 'गीता-[ धोशांकरभाष्यका सरल हिन्दी-अनुवाद ] इसमें सूल भाष्य तथा भाष्यके सामने ही अर्थ लिखकर पढ़ने और समकनेमें सुगमता कर दी गयी है, भाष्यके पदोंकों अय-शग करके लिखा गया है और श्रुति, स्टति, इतिहासाकि उद्धत प्रसाणोंका सरळ अर्थ दिया गया है तथा गीताम आये हुए दरेक शब्दकी पूरी सूची है, २ तिरंगे, १ इकरंगे चिन्न, एष्ट ५०४, मू० साधारण जिल्द २॥), बढ़िया जिरद २॥।) गीता-सूल, पदच्छेद, अन्वय, साधारण भापाटीका, टिप्पणी, प्रधान और सूचमविपय एवं त्यायसे भगवत म्रासिसहित,. मोटा टाइप, मजवूत कागज, सुन्दर कपड़ेकी जिए, १७० पृष्ठ, ७ बहुरंगे चित्र, सातवां संस्करण ( अबतक २६००० छुप चुकी है ) । बिना अधिक परिभ्रमके ही समझ सकते हैं, विधार्थिंयोंके भी बड़े कामकी है । अर्थमें खींचातानी नहीं है, ऐसी सस्ती गीता और न मिलेगी । म्‌ "`° १1) गीता-प्रायः समी विषय १!) वालीके समान, श्लोकोंके सिरेपर भावाथ छुपा हुआ है, चार बहुरंगे चिन्न, साइज और टाइप कुछ छोटे, पुष्ठ ४६८, यह १५००० छप चुकी है । म० ॥£) स० "१ पटो गीता-छोक और साधारण भापाटीकासहित आकार २० > ३० सोळहपेजी, ए० ३१६ टिप्पणी, प्रधान चिपय और त्यागसे भगवत्‌ु-प्राप्ति नामक निवन्धसहित मोटा टाइप सू० ॥) स० °° ॥&) _ गीता~मापारीका, सचिन्न, त्यागसे भगवत-प्राप्िसहित, पाकेट-साइज (३५०००० छप चुकी है), सभी विषय आठ आनेवालीके समान, मृएय =)॥ सजिदद " छो गीता-मूल, मोटे अच्तरवाली, माद्दात्म्य, ्रंगन्यास, करन्याससहित, सचित्र, मृत्य ।-) सजिएद._ ** 5) यीता-केवळ भाषा, संस्कृत 'होक न पढ़ सकनेवालोंके लिये बड़ी उपयोगी है सू० 1) सजिष्द "“* ।%) गीता-मल, विष्णुसहस्तननामसद्वित, ए० १३२ आठवा संस्करण ( १७६०० छुप चुकी है ) सचित्र और सजिए्द॒ =) गीता-मृत्न, ताबीजी, साइज २९ २॥ इन्च, सजिएद और सचित्र, इसमें माहात्म्य, करन्यास, ध्यानादि भी दिये गये है, सुह्य «as ¢) गीता-दो प्नॉमे सम्पूणं १८ ध्याय, इसे ताबीजमें भरकर गले या हाथमें बाँध सकते हैं, मू. ... ०) गीता-केवल दूसरी श्रष्याय, मूल और अयंसहित, पाकेटन्साइज, यद्व पुस्तक बाँटनेके लिये बढ़ी उपयोगी है )। गीता-सूची, (61४० 1180) सिन्न-मेत्र भापाओंकी गीताओंकी सूची, सू० `” “* ॥) गीताका सूक्ष्म विषय-गीताके प्रत्येक शळोकांका हिन्दीमें सारांश है, मू. *** " टो श्रीकुप्ण-विक्षान-गीताका शछोकॉसहित हिन्दी-पद्याजवाद | सचित्र १) स० क) श्रीमद्धगवद्वीता गुजराती भाषामें सभी विपय १!) चाळी गीताके समान, भूशय *** “* ४). श्रीमद्भगवद्गीता मराठी मापामें सभी विषय १।) वाळी गीताके समान, सूल्य ** १) श्रीमङ्कगवद्गीता बंगला भाषामें सभी विषय ॥>) वाली गीताके समान, मूल्य १) सजिद वि “* १) — fer (२) श्रीजयदयालजी गोयन्दकाकी पुलक तत्त्व-चिन्तामणि [ भाग १ 1-7(सचित्र) यह अन्य एरमउपयोगी है । इसके मननसे घमं श्रद्धा, भगवाचूः मेँ प्रेस और विश्वास एवं नित्यके वर्तावर्मे सत्य व्यवहार और सबसे प्रेम,भव्यन्त आनन्द एवंशान्तिकी प्रापि होती है । एए २५२, मूल्य ॥”) स० ॥।”) परमार्थ-पत्नावली-(सचित्र) कल्याणकारी ११ पर्धोका छोटा-सा संग्रह, एए १४४, सू० ॥। गीता-निवन्धावली--पह गीताकी अनेक वार्ते समसने- के किये उपयोगी है। ए० पम, सू० छ) गीताके कुछ जानने योग्य विपय--गीताके कछ विषय समझानेकी चेष्टा की गयी है, ए० ४३, मूल्य ~) ख्या सुख और उसकी प्राप्तिके उपाय--साकार और निराकारके ध्यानादिका रहस्यपूर्ण वर्णन सू० <)॥ गीतोक्त सांख्ययोग और निष्कामकर्मयोंग-विपय ~ श्रीप्रेमसक्तिप्रकाश-(सचित्न) इसमें सगवानकी भार्यना तथा भानसिक पूजा आदिका चर्णन है । मूल्य ~) त्यागसे भगचत्ाप्ति--्यायोके द्वारा मोचसन्दिरकी प्रातिके लिये पथप्रदृ्शक है । मूर ~) नामसे ही प्रकट है। मू." भगवान क्या हैं !--इसमें परमार्थतधव भर देनेकी ! चेट की गयी है। मूळ “* >») | धर्म क्था है --नामसे ही पुस्तकके विपयका पता लग जाता है । सू० रा 9 गजळगीता-छइकोके गाने योग्य एवं नित्य पाठ करने योग्य सरल हिन्दीमें गजलके उद्भपर गीताके १३ वें अध्यायके कड उपदेश्ोंका अनुवाद है, चौथी वार ५००५० छुपी है | मूस्य “* आधा पैसा श्रीहलुमानम्सादजी पीद्दारडारा लिखित आर सम्पादित पुस्तक विनय-पत्रिका--सरल दिन्दी-टीकान्सदित एए ४५५ चित्र ३ सुनारी, २ रंगीन, १ सादा मू १)स० १ )) स्वामीजीके पर्दाका सरळ हिन्दी भापासे सबके समझने योग्य भावार्थ लिखा गया रि प्रचारक विवारसे मूल्य बहुत अनुकूल रक्या गया नैवेय--धर्म-सम्बन्धी चुने हुए २ हेज कौर ६ पिता” गरका सचित्र संग्रद। म्‌० ॥८) स० `” ॥०) तुलसी-दळ--शस्गे इतने पिप्य हैं कि समळे लिये कुचु-्व-्कद षये सनकी बात मिळ सलगी ४! ए० २६४, मुल्य ॥) सजिटद tz) भक्त-बालक--इसमें गोविन्द, मोहन, धन्ना जाट, यन्य” हास और सुधस्वाकी कथाएं हैं। ५ घित्र,०८०,।०) भक्तनारी--इसमें शबरी, मीरा, अना, फरमेती झौर रवियाकी प्रेमपूर्ण फयाएँ है । ६ चित्र, ९०८०, टो भ्क्त-पञत्चरल--इसमें रघुनाय, दामोदर शौर सकी पत्नी, गोपाल, शान्तोया और ठसफी पनी आर नीद्ञाम्परदासके धरित हँ । सू० ~) पत्र-पुषप-7( सचित्र, कविता-संग्रद ) प्रएसंग्या ३६ मू० &)॥ स० *** in मानव-धर्म--एसमे धर्मके दस जयो पर प्या वियेषन *»4 कक है। ५० १६४मू० `" =) साधन-पथ--सचित्र एए ७३,म: `” =)॥ खी-र्मप्रश्‍नोत्तरी--नये संनये १ तिरंगा चित्र भी है 1 ४० ५६ सू हौ आवन्दकी ळर्रे--हसरमे इम दूमरोंफो सुख पुँचाते हुए सुद यैसे सुखी हों, यह पताया गया है। मू >) मनको बशमे करनेके उपाय--इसमें एफचित्रऐ। =) प्रह्यवय--प्रहा्र्यफी रणके अनेक सरल उपाय पताये गये हैं। मूर * “ > समाज-सुधार--समाप्के जटिल प्ररनॉपर प्रकाश डाला गया ऐ। मू “ण ~) दिव्य सन्देश--वर्तमान दाम्मिक युयमे फिस उपायसे शीघ्र भगवत-प्राप्त हो सकती ऐ, इसमें उसके सरळ उपाय बतलाये गये हैं । सू० "* भर — eee (३) खासीजी श्रीमोरेबावाजीद्वारा लिखित पुस्तके कुछ अन्य लेखकोंकी पुस्तके- श्रुति-रलावली--( सचित्र ) चेद-उपनिषद्‌ आदिके | श्रीअरबिन्द॒ घोष चुने हुए सन्त्रोका अर्थित संग्रह मूल्य ॥) | ग्राता--इस पुस्तकका इतना ही परिचय देना श्रुतिक्षी टेर--( सचित्र ) एष्ट-संख्या १५०, पुखक बहुत होगा कि यह श्रीअरविन्दकी सीधी-सादी वोळचालकी कवितामें लिखी गयी है, विचारधारा या एक ग्रिय श्रेष्ठ रचना है । वेदान्तके विषयकी हे । मूल्य केवळ 1) मूख्य हा १, घेदान्त-छन्दावली--( सचित्र) इसमें वेदान्तके श्रीमाळवीयजी दिचारणीय प्रश्‍न भर उपदेश हैं, पुखक सुन्दर | शरेवर मदाना मालवीयजीने इस पुखकर्मे कवितामें लिखो गयी है। एष्ट-संख्या ७५ सु० £)॥ ईश्वरे स्वरूपका और धसका वेद््याख- वियोग ~ rn सम्मत बहुत ही सुन्दर निरूपण किया श्रीवियोगी हरिजीकी पुस्तर्के- है । सूरय केवळ ~ ~) प्रेम-योग-भापकी भाबुकतापूणं लेखनीसे लिखा हुआ | भौगान्धीजी यह न्य अपने इंगका एक ही दै । सजीव भाषा | सप्त-महात्रत--इसमें सत्य, अहिंसा, अस्तेय, और दिष्य भावोंसे सना हुआ यह भेम-योग प्रेम. | . परिग्रह, अहाचये, अस्वाद और अभय साहित्यक एक पूर्ण गून्ध कधा जा सकता है। दो इन सात सहाजतोंपर महातमा गान्धीजी खण, ए० ४२०, मूल्य १1) सजिल्द $1) द्वारा लिखित बढ़ी ही सुन्दर अनुभवपूर्ण में रा डो व्याख्या हे । सूल्य केवळ ~ गीतामें धक्तित्योग--आपके अन्य गून्यांकी सरह यह पोशइराचार्य श्री है। सूरू ) पुस्तक भी सुन्दर हुई है। ष्ठ १०८, दो चिन्न,मू०।-) | "° भारती कृष्णतीथं यके ~ > , का वि आचायके सदुपदेश--रष्ट-संख्या २२ सूल्य / भजन-संग्रह पहला भाग--इस भागमें तुलसीदासभ, डपद मूल्य 7) सूरदासजी, कवीरओीके भजन हैं। भू =) श्रीनारामणस्वासी , एक सन्तका अनुभव-साधको और सच्चे सुखके भनम-संत्रह दूसरा भाग-- इसमें ठितहरिवंश,स्वामी अभिळापियोके लिये बहुत ही काकी चीज एरिदास, गदाघर भद, व्यांसजी, मद, सूरदास, है, पुरक नित्य मनन करने योग्य है नागरीदाप, नारायदास्वामी, ललितकिशोरी, दादू- ५०० मूल्य ~) दयाल, रैदास, मलक़दास, घरनदास, शुरु नानक | ६, श्रीभवानीशक्करजी महाराअ ~ 3 os पादिके भनन घं । सूः ^ | ज्ञानयोग--शषट १२०, मूल्य ४ i) मजन-संत्रह तीसरा भाग--इसमें मीराबाई, सहजो- | रायबहादुर झाला श्रीसीतारामजी वाई, यनीठनी, प्रतापधाळा, श्रीयुयलप्रिया, श्री- चित्रकूटकी फॉँकी--इसमें पावन तीर्थ चित्रकूटका राममिया, रानी झप परि आदिके सजन हैं । मू०८) और उसके आस-पासके तीथौंका विश्वद Ans टी र > णंन हे । चित्रकूट-सम्चन्धी १२ चित्र चतुर्वेदी प॑० श्री्ारकाम्रसादजीकी पुस्तके- हे लय i ०) भागवतरल प्रदवाद्‌-- यह पवित्र चरित्र इम माँ, चहिन, | श्रीज्वालासिंदजी चेटी, भाई, भौजाई आदि सबके हाथमे पढ़नेके मनन-साला--सचिन्न, गयके साथ-साथ अनेक लिये दे सकते हैं । एछ ३४०,३ रंगीन थौर १ सादे पद भी हैं सूल्य "` #)॥ चित्रा मू १) सणिदद भर १) | ह्लीअरण्डेळ ट | देवपि नारद्‌--नैते भगवानके चरित्रांते हमारे धर्म- | सेयाके मन्त्र-- सच्ची सेवा क्या है? और सच्चा शास्त्र भरे पढ़े हैं, वैसे ही नारदजीकी पुस्यमयी सेवक कौन है, इस वातका यह छोटी-सी गाया भी इमारे शाखोंमें ओतप्रोत हें । एए पुखिका पढ़नेसे पूरा पता लग जायगा, - २४०, २ रंगीन, ३ सादे चित्र मू 11) स० १) पृष्ठ-संस्या ३२, मूल्य ` "” ) DODO ~ (४) नयी पुस्तकें- अध्यात्मरामायण--आपके दाथमें है । इसकी विशेषताएँ देखिये । संस्कृत इलोकॉका अर्थ इस टंगसे अन्य ग्रन्थ श्रीक्षीचेतन्‍्य-चरितावली(खण्ड १)--(सचित्र) ` श्रीचैतन्यकी इतनी बढ़ी जीवनी अभीतक हिन्दीसें | ना गया है कि समझनेमें सुगमता घो। हो सके तो नहीं निकली । यह पाँच खरडोंमें सम्पूर्ण होगी । | एक पुस्तक लेकर घर-परिवारके सव टोगॉको सुना्टये । बहुत ही सुन्दर अन्थ है । मूल्य ॥/) सजिल्द १०) ' श्रीश्रीचेतन्य-चरिताबली दूसरा खण्ड (क तिरंगे, दुरंगे,इकरंगे चित्रोंसद्वित !) बहुत शीघ्र प्रकाशित --( सचित्र ) दक्षिणके > ST भीएकताथ-चरित्र-( सचित्र ) इ , होनेकी आगा है । श्री चेतन्यदेचकी एतनी यदी ऐसी सुन्दर महान्‌ भगवद्भक्तकी यह जीवनी अलौकिक है । जीवनी हिन्दोमें अभीतक नहीं छुपी | आपने पदका भगवान्‌ स्वयं आपके नौकर थे, पढ़ने योग्य है । मू०॥) | खण्ड देखा होया, नहीं तो दोनोंके लिये साथ छी टर श्रीरामकृष्ण परसहस--(सचित्र) आप कुछ ही दिन पहले अत्यन्त प्रसिद्ध भगवद्भक्त छो गये हैं! | देकर एक-एक रति संपा लीजिये । दूसरे भागकी एष्ट" । संख्या लगभग ४५० होगी | उपन्यास आदिके पदनेसे | समय बचाकर सदानु घुरपॉकी जीवनियाँ पदनेमें बहुत भेरि भै, न आपका नाम विलायत और अभेरिकातक प्रसिद्ध है । | लाभ प्रतीत होता हैं । इस पुस्तकें ३०० उपदेश भी संग्रहीत हैं मूल्य 2) भक्त-भारती--( ७ चिन्न ) सरल कचितामें ह || छपाई सुन्दर ह, मूल्य सात भक्तोकी सुन्दर रोचक कथाका वर्णन है, सव- के लिये सुगम है । सूल्य "° 8) श्रीसङ्गागचत एकादश रसुकत्थध--सचिन्न-सटीक, भागवतमे दशम भौर एकादश स्कन्ध सर्वोपरि हैं। लगभग ३२० पेजकी पुसकका दाम केवळ ॥।) स० १) विवेक-चूडामणि--(सचित्र) सूळ शोक शौर हिन्दी-अनुवाद पृष्ठ २२४, म्‌०।5) स° ''' ॥=) प्रबोध-खुधाकर--( सचित्र) विपय-भोयोकी तुच्छता और आत्मसिद्धिके उपाय बताये गये हैं, £)॥ अपरोक्षानुभृति--(सचित्न) मूळ छोक थौर हिम्दी-अनुवाद-सहित, मू० "° | मनुरुखति--केवल दूसरा अध्याय और उसका हिन्दी-अजुपाद, मू० बहन ~) विष्णुसहस्जनाम-मूल्य)॥। सजि० ~) हरेरामभजन--मूल्य पातश्चलयोगद्शन--मूछ 9 वलिवेश्‍बदेवविधि--मूल्य yn प्रश्वोत्तरी-इसमें भी मूळ श्छोकोंसहित -हिन्दी-अचुवाद है, मू० सन्ध्या--हिन्दी-विधि-सहित, मू० 33 रामगीता संरीक--एसमे धरीरामचन्दजीने लट्ष्मणजीको जानका विपय उत्तम रीतिस समझाया क ~) दिननर्था--इस पुग्नकका विषय नाससे ही प्रकट है । हिन्दू-संस्कृतिके थनुसार सपेरे भख खुलनेसे राग्िको सो जानेतक किस भाव कौर फ्रियासे जीवन व्यत्तीन करना चाहिये, यह बताया है, साथ ऐ प्र्रचय, सृहरय आदि श्राध्रमोके कुछ धर्स-नियम, स्थास्यके नियम- साधन, ध्यान-प्राणायाम विपयकी बातें भी यत्तायी हँ । नित्य-पाउके उपयुक्त कई सोत्र सूळ थर सरीक सौर तुलसी दासजी, सूरदासजी आदि कई भक्तेकि भजन भी दिये गये हैं। पुस्तक शीघ्र प्रकाशित होनेकी आझा ई । तत्त्व-चिन्तामणि द्वितीय भाग --(सचिग्र) ले? धरीजयद्यालजी गोयन्द्का । एसका पहला भाग आपने देखा होगा । इसमें सनुष्य-कर्तव्य, भगवानकी प्रासिके विविध उपाय, सन्ध्या, बलिबेशदेव और यदो प्रणाम करनेकी आवश्यकता इत्यादि परमार्थ सम्बन्धी घहुतन्से लेखोंका संग्रह हैँ । श्रीविष्णपुराण भाषारीका प््तित -- यह शार पुराणोमेसे एक है । यह प्रसिद्ध और अत्यन्त उपयोगी धर्मग्रन्थ है। इसके विषयमे अधिक क्या लिखे । एसकी छपाई अध्यात्मरामायणके ढंगसे ही ऐ रही है। विष्णुसहस्ननाम-- भगवान्‌ विष्णुके सहस नासोंका श्रीशंकराचार्यजीने विस्तृत व्पास्या की हैं । उसीका यह भाष्यसहित सरल हिन्दी -अनुयाद प्रकाशित किया जायगा। भक्तोंके लिये यह यहुत ही उत्तम और सुन्दर, सचित्र न्थ होगा । बजपरिचय(सचित्न)--लछेखक गोस्वामी छईमणा- चायेजी | इसमें घ्रजके सुख्य-मुख्य स्थानके विवरण सुन्दर डंगसे रहेंगे, घरज-प्रे मियोके लिये बडे कामको चीज झोगी । EPI TOT ( [1 चित्र का छोटे, बड़े, रंगीन और सादे धार्मिक चित्र श्रीकृष्ण, श्रीराम, श्रीविष्ण और श्रीशिवके दिव्यदर्शन । निसको देखकर हमें भगवान्‌ याद आवे, वह वस्तु हमारे लिये संग्रहणीय है। किसी भी उपायसे हमें भगवान्‌ सदा स्मरण होते रहें तो हमारा धन्य माग हो । भक्तों और भगवानके स्वरूप एवं उनकी मधुर मोहिनी छीलाओंके सुन्दर दृश्य-चित्र हमारे सामने रहें तो उन्हें देखकर थोड़ी देरके लिये हमारा भन भगवत्‌-सरणमें लग जाता है और हम सांसा- रिक पाप-तापोंको भूल जाते हैं। ये सुन्दर चित्र किसी अंशमे इस उद्देश्यको पूण कर सकते हैं। इनका संभ्रहकर प्रेमसे जहाँ जापकी दृष्टि नित्य पडती हो, घर्हा घरमें, चैठकर्मों और मन्दिरोमें गाइये एवं चित्रोंके वहाने भगवानको यादृकर अपने मन-प्राणको प्रफुझित कोजिये । भगवान- की मोहिनी मूर्तिका ध्यान कीजिये | कायजका साइज १० इञ्च चौड़ा १५ इन्च लवा, सुनहरी चित्रका -)॥ रंगीन चित्रका मूल्य >), दो रंग- के और सादे चित्रका मूल्य )॥, यह छोटे ब्लाकोंसे ही चेल (बार्डर) छगाकर वड़े कागजोपर छापे गये हैं कागजॉका साइज ७॥ ९१० इन्च, सुनहरीका मूल्य /)।, रंगीनका मूल्य )॥॥, सादेका )॥ मात्र । | इनके सिवा १६)९९३, १५५२० और २१८७1 के बढ़े और छोटे चित्र भी सिलते हैं। दूकानदार और थोक खरीदारोंको कमीशन भी दी जाती है । चित्रोंकी बढ़ी सूची अल्या मुफ्त मंगवाइये ! पता- गीता ग्रेस, गोरखपुर ) “कल्याण” धार्मिक मार ( इर महीनेमे २०५०० छपता भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और घर्मसर मालिक पत्र, पृष्ठ-संख्या ८०, मूल्य ४७), 9४६ कै ` सें एक विशेषांक भी निकलता है जो आइ in मूल्यमे मिल जाता है। अबतक ६ विगो चुके हैं । ( डाकसहसूलसहित ) भगवन्नामांक 5, एष्ट-संख्या ११०, चित्र-संख्या ४१, भू `. रामायणाक इष्ठ-संस्या ५००, चित्र-संस्या १६०, सू० | श्रीकृष्णांक पृष्ट-संख्या १२२, चित्रनसंख्या १०८, मू ० ईश्वरांक सपरिशिशंक । पृष्ठ-संख्या ६२४, चित्रन्संख्या ३३, मूर | तीसरे वर्षकी फाइल--( प्रसिद्ध श्रोभक्ता र k सहित ) अनेक सुन्दर चित्र और उपादेय लेख पुद: कविताओंका यह संग्रह आपकी पुसतकॉर्मे स्थान he र योग्य है । सत्संग और पउन-पाउनकी अच्छी सामी" है। धार्मिक विचारोंका सुन्दर संग्रह और स्थायी! साहित्य है । भक्तोंकी कथाएँ विशेष सनोहर हैं । पूरी! ५२ अड्लॉंकी फाइलका मूल्य केवल ४६) मात्र, डाक- : खर्च माफ । (भक्तांक अलग नहीं मिछता ) ५ चौथे वर्षकी फाइल--( सुविख्यात श्रीगीतांक- सहित) लगभग २०० चित्र और १४०० पृष्ठ । मूल्य केवळ ४७), डाकव्यय माफ । ( गीतांक अलग नहीं मिळता ) जब श्रीगीतांक निकला तब ऋष्याणकी आइकन संख्या ७५०० से लगभग १३००० हो गयी थी । यह गीताके सम्बन्धमें अपने दंगका अनोखा अन्ध है। बहुत थोड़ा बचा है। पहले-दूसरे या पाँचव-छठे चप की तरह ये फाइलें भी समाप्त हो जानेपर मिलनी करिन हैं। मेंट आदिमें देवेके किये भी यह उत्तम सामग्री है। ( ६) श्ीरामायणांक बहुत ३ ` दूसरा संस्करण ! पुनः छप गया ! नवीन संस्करण ! की प्रासिके लिये अनेक प्रेमी लाळायित्त थे चही 'रामायणांकः पुनः छुप गया | केवळ १००० छपा सहान्‌।=) ही रवखा गया है । जिन सज्जनॉकी साँग छोटा दी गयी थी, वे अय मेंगवा सकते हैं । एष्ट भगवा ऊपर और सैकड़ों चित्र हे । , नाथणांकका गेटप, छपाई, सफाई, कागज और बाहंडिंग सब सुन्दर हैं । दी दिमायणाक्रर्मे श्रीरामजीकी लीलाओंके अनेक सुनइरी। बहुरंगे, सादे चित्र एवं अनेक पवित्र तीर्थ आपव प्रयाग, काशी, चित्रकूट, पञ्चवटी, रामेशवर, जनकपुर, शेरपुर आदिके दर्शनीय चित्र हैं; राभायण- इस भारतके कई भौगोलिक मानचित्र भी हैं | रामायणांकपें अनेक सहात्मा्ओं, देशी-विदेशी विद्वानों और रामायणग्रेसियोके लेख है । सात रामायणांक सुखमय जीवनका अमोघ साधन है । के ह आजतक कल्याणक सिवा इतने बढ़े किसी भी सामयिक पत्रको दुव्रारा छपकर आपकी सेया करनेका र नहीं सिछा । यदिं आप इस वार इस अङ्कको न अपना सकेंगे तो समभ छीजिये कि एक उत्कृष्ट वन्नुसे त रह जायेगे, क्योंकि इसके शीघ्र तीसरी वार छपनेकी आका इस अभी आपको नहीं दिला सकते । 1 खरीदनेम शीघ्रता कर सकते हैं) हैं व्यवस्थापक- -.. “कस्याण-कार्यालय,” गोरखपुर न Morigen नर $ च्य कर दा RRR re